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Tuesday, May 14, 2019

एक अमरीकी की नज़र में भारतीय शिक्षा व्यवस्था

हाल में एक अमरीकी महिला लीसल श्वाबे एक शोध परियोजना के सिलसिले में भारत आईं और क्योंकि उन्हें यहां लम्बे समय तक रहना था, वे अपनी सात वर्षीया बेटी को भी साथ ले आईं. अमरीका में उनकी बेटी ब्रुकलिन के एक सरकारी स्कूल में पढ़ रही थी. यहां कोलकाता में उन्होंने उसे एक अंग्रेज़ी माध्यम के ग़ैर सरकारी स्कूल में प्रवेश  दिलवाया. अपने एक लेख में लीसल ने अमरीकी और भारतीय स्कूलों के अंतर को स्पष्ट करने के बाद जिस बात पर संतोष व्यक्त किया है, उस पर आम तौर पर हमारी नज़र नहीं जाती है. 

लीसल ने अपनी बात बेटी के लिए स्कूल द्वारा तै किये गए जूते खरीदने के अनुभव से शुरु की है. अब तक उनकी बेटी अपने स्कूल में भी फैशनेबल जूते पहन कर जाती थी लेकिन यहां उसे बड़ी नीरस किस्म के जूते खरीदने पड़े, क्योंकि स्कूल ने वे ही निर्धारित कर रखे थे. और यहीं उन्हें महसूस होने लगता  है कि अमरीका में उपभोक्तावाद लोगों को विकल्प देता है जबकि भारत में विकल्पों का अभाव है. विकल्पों के अभाव की यह बात मां-बेटी को बाद में भी बार-बार महसूस होती है. अमरीका में उसे स्कूल सोमवार को जो होमवर्क देता था उसे शुक्रवार तक कभी भी कर लेने की छूट थी. वहां वर्तनी पर अधिक ज़ोर नहीं दिया जाता था यानि शब्दों को मनचाहे तरीके से लिखे  जाने की छूट थी. साल में कुछ दफा थोड़ा  कुछ लिख कर बताना होता था लेकिन क्या और कैसे लिखना है यह विद्यार्थी को ही तै करना होता था. कला की कक्षा में शिक्षक प्रयोगशीलता को प्रोत्साहित करते थे और अभिभावक भी मौलिकता की सराहना करते थे. कक्षाओं में बच्चों को इधर उधर घूमने की और मनचाहे सवाल पूछने की पूरी स्वतन्त्रता  थी.  

लेकिन उसी बच्ची को जब कोलकाता में कक्षा दूसरी डी में भर्ती करवाया गया तो इन लोगों को काफी कुछ बदला हुआ लगा. बच्चों के पास बहुत ही कम विकल्प थे. कक्षाओं में उन्हें आपस में बात करने की छूट नहीं थी. उन्हें हर विषय के लिए अलग-अलग नोटबुक रखनी होती थी और नोटबुकों के लिए भी यूनीफॉर्म जैसी व्यवस्था थी. इन नोटबुकों में सारे बच्चे एक जैसे जवाब लिखा करते थे. सप्ताह में दो बार आर्ट क्लास भी होती थी, लेकिन सारे बच्चे लगभग एक जैसी चीज़ों का निर्माण करते थे. कुछ समय बाद इसी बच्ची ने भारत और अमरीका के स्कूलों के फर्क़ को इन शब्दों में बयान किया: “भारत में हमें अपने दोस्तों के साथ खेलने  के लिए कोई समय नहीं मिलता है जबकि अमरीका में अपने स्कूल में हम सिर्फ अपने दोस्तों के साथ खेलते ही थे.” 
इन बच्ची को यहां गणित समझने में बहुत दिक्कत महसूस हो रही थी. उसे लम्बे लम्बे हिंदी और फ्रेंच शब्दों की वर्तनी भी याद करना बहुत कठिन लग रहा था. कभी वह घर पर इस बात से घबराती कि कल स्कूल में ग़लत नोटबुक ले जाने पर उसे कितनी डांट  सहनी पड़ेगी और एक बार तो किसी शब्द की मुश्क़िल वर्तनी को याद न कर पाने से आतंकित होकर वह अपना सूटकेस पैक कर अमरीका लौटने के लिए ही उतारू हो गई थी. लेकिन सब कुछ ऐसा ही नहीं था. वो बच्ची आहिस्ता आहिस्ता अपने स्कूल को पसंद भी करने लगी थी. उसने खूब दोस्त बना लिये थे और स्कूल की छुट्टी के वक़्त दोस्तों के साथ उछलते कूदते हुए उसका बाहर आना या शनिवार की शाम स्कूल लाइब्रेरी से अपने दोस्तों के साथ प्रसन्न मुद्रा में बाहर निकलना उसकी मां को भी आश्वस्त करने लगा था. पढ़ाई का बोझ था और विकल्प भी बहुत कम थे, लेकिन इस सबके बीच भी उसकी मां बहुत सारी अच्छाइयां देख पा रही थी. 

उसकी मां को लगता है कि भारत के स्कूलों में विकल्पों का न होना भी एक अच्छी  बात है. यहां विकल्प भले ही न हों, ज़िम्मेदारियां हैं और यह सराहनीय है. उसकी मां इस बात को समझती हैं कि गणित जैसे विषय के भारी भरकम पाठ्यक्रम ने उनकी बेटी को वह सब सिखाया है जो वह अमरीका में कभी नहीं सीख पाती. यहां आकर ही उसने सही वर्तनी का महत्व समझा है. यहां आकर उसे ज़्यादा पढ़ना पड़ रहा है और उसकी एकाग्रता बढ़ी  है. अब तक वो खुद को जितना कुछ कर पाने में समर्थ समझती थी उससे कहीं ज़्यादा कर पा रही है. मां ने यह बात भी नोट की है कि भारत में स्कूल व्यवस्था  बच्चों में अपने कर्म के प्रति उत्तरदायित्व का भाव बढ़ाती है. लीसल यह तो मानती हैं कि भारत में बच्चों पर पढ़ाई का बहुत ज़्यादा बोझ व दबाव है और इसे आम तौर पर नुकसानदेह  समझा जाता है, लेकिन इसके बावज़ूद उन्हें यह उम्मीद है कि जब वे अपनी बेटी के साथ अमरीका लौटेंगी तो उसमें अपनी उम्र के अन्य अमरीकी बच्चों से अधिक आत्मविश्वास होगा. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, April 10, 2018

एक चौंकाने वाला प्रयोग और उसमें से निकली नई सोच!


लीजिए, अब एक नई शोध ने जो बताया है उससे आप भी  यह सोचने लगेंगे कि बच्चों को स्कूल भेजा जाए या नहीं! हम सभी अपने बच्चों को उनके बहुमुखी विकास के लिए स्कूल भेजते हैं. लेकिन हाल में हुई एक शोध ने जो बताया है वह तो इसका उलट है. मैं आपके धैर्य की अधिक परीक्षा नहीं लेना चाहता इसलिए सारी बात सिलसिलेवार बता देता हूं.

हुआ यह कि नासा ने दो बहुत विख्यात विशेषज्ञों डॉ जॉर्ज लैण्ड और बेथ जार्मान को एक ऐसा  अत्यधिक विशेषीकृत टेस्ट विकसित करने का दायित्व सौंपा  जो नासा के रॉकेट वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सर्जनात्मक संभावनाओं का समुचित आकलन कर सके. इन विशेषज्ञों ने एक  टेस्ट का निर्माण किया और नासा ने भी उसे अपने लिए बहुत उपयोगी पाया. बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए थी, लेकिन हुई नहीं. टेस्ट पूरा हो जाने के बाद ये दोनों विशेषज्ञ और इनके साथी एक और सवाल से जूझने  लगे. सवाल यह था कि आखिर सर्जनात्मकता का उद्गम क्या है? वो कहां से आती है?  क्या यह कुछ लोगों में जन्म  से ही होती है, या इसे शिक्षा से अर्जित किया जाता है? और या फिर इसे अनुभवों से हासिल  किया  जाता है!

और इस सवाल से जूझते हुए इन वैज्ञानिकों ने चार और पांच बरस की उम्र वाले सोलह सौ बच्चों को एक टेस्ट दिया. असल में इस टेस्ट में कुछ समस्याएं दी गई थीं और उनको हल करने के लिए बच्चों ने जो जवाब दिये थे उन्हें इस कसौटी पर गया कि समस्याओं को सुलझाने के बच्चों के तरीके  कितने अलहदा,  कितने नए और कितने मौलिक हैं. इस टेस्ट के परिणाम बेहद चौंकाने वाले थे. आप भी यह जानकर आश्चर्य से उछल पड़ेंगे कि चार से पांच बरस की उम्र वाले अट्ठानवे  प्रतिशत बच्चे उन वैज्ञानिकों की कसौटी पर जीनियस साबित हुए. अब शायद इन वैज्ञानिकों को भी अपनी शोध में मज़ा आने लगा था, सो इन्होंने  पांच बरस  बाद फिर से इन बच्चों को परखा. तब ये बच्चे दस बरस की उम्र के आसपास पहुंच गए थे. अब जो परिणाम आए वो और भी ज़्यादा चौंकाने वाले थे. अब इन्होंने पाया कि उन अट्ठानवे  प्रतिशत जीनियस बच्चों में से मात्र तीस  प्रतिशत बच्चे ही कल्पनाशीलता के स्तर पर जीनियस कहलाने के काबिल रह गए हैं. पांच बरस बाद फिर से इस प्रयोग को दुहराया गया और तब पाया गया कि पंद्रह बरस के हो चुके  इन बच्चों में मात्र बारह प्रतिशत बच्चे ही जीनियस कहलाने काबिल रहे हैं. और इसके बाद इन वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष  दिया है वह तो हम सब को अपने मुंह छिपाने के लिए विवश कर देगा. उनका कहना है हम वयस्कों में तो मात्र दो प्रतिशत ही जीनियस कहलाने के हक़दार होते हैं!

यह कहना अनावश्यक है कि पांच, दस और पंद्रह बरस के जिन बच्चों पर यह टेस्ट किया गया वे सभी स्कूल जाने वाले बच्चे थे.  तो क्या यह समझा जा सकता है कि स्कूल, या कि हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों की सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करने की बजाय उसे कुचलती है? इसका जवाब मिलता है जोहानिसबर्ग में पले बढ़े और अब अमरीका वासी एक चर्चित लेखक गाविन नासिमेण्टो  के इस कथन में: “जिस संस्था को हम ऐतिहासिक रूप से स्कूल के नाम  से जानते हैं, उसका तो निर्माण ही शासक वर्ग की -न कि आम लोगों  की-  सेवा के लिए हुआ है.” अपनी बात को और साफ़ करते हुए गाविन कहते हैं, “उन्होंने यह भली भांति समझ लिया है कि तथाकथित अभिजन की ठाठदार विलासिता वाली उस जीवन शैली के निर्वहन के लिए जिसमें वे बहुत कम देकर बहुत ज़्यादा का उपभोग करते हैं,  बच्चों को बेवक़ूफ बनाया जाना और कृत्रिम अभावों की लालची व्यवस्था, अंतहीन शोषण और अनवरत युद्धों के स्वीकार के लिए ही नहीं बल्कि इनकी सेवा के लिए भी उनके दिमागों का अनुकूलन ज़रूरी है.” मुझे नहीं लगता कि वर्तमान स्कूलों पर इससे कड़ी टिप्पणी कोई और हो सकती है!

चलिये, फिर डॉ लैण्ड की तरफ लौटते हैं. उनका कहना है कि हम सबमें यह क्षमता है कि अगर हम चाहें तो अट्ठानवे  प्रतिशत यानि जीनियसों में शुमार हो सकते हैं. इसके लिए करना बस इतना है कि हम अपने आप को पांच साल के बच्चे में तब्दील कर लें. इस डर से निजात पा लें कि अगर ऐसा करेंगे तो ऐसा हो जाएगा. मुक्त ढंग से सोचना और सपने देखना शुरु करें. वे एक उदाहरण देकर अपनी बात साफ़ करते हैं. अगर किसी छोटे बच्चे के सामने  एक फॉर्क (टेबल पर रखा जाने वाला कांटा) रखें तो वो उसे बेहतर बनाने के लिए फटाफट अनेक सुझाव दे देगा. बस! हम भी उस जैसे बिंदास  बन जाएं! ठीक है ना?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 10 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 11, 2017

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना!

उन प्रसाधन कक्षों में, जिनका रख-रखाव सलीके से किया गया हो, दर्पण का होना सामान्य और स्वाभाविक बात है. अपने देश में सरकारी भवनों की बात अगर छोड़ दें तो मॉल्स वगैरह के साफ-सुथरे और बेहतर तरीके से संधारित टॉयलेट्स में दर्पण अनिवार्यत: होते हैं. और दर्पणों की जितनी ज़रूरत सार्वजनिक स्थलों के प्रसाधन कक्षों में होती है, उतनी ही स्कूलों के प्रसाधन कक्षों में भी होती है. अगर थोड़ा हास्य स्वीकार्य हो तो यह और जोड़ दूं कि दर्पण की ज़रूरत छात्रों के प्रसाधन कक्षों से भी अधिक छात्राओं के प्रसाधन कक्षों में होती है. इस प्रसाधन कक्ष में दर्पणविषयक चर्चा से भारत के सरकारी स्कूलों को अलग कर लेना बेहतर होगा. ख़ास तौर पर लड़कियों के स्कूलों को, क्योंकि उनमें दर्पण का सवाल तो तब उठेगा जब प्रसाधन कक्ष होंगे. लेकिन सब जगह तो ऐसे हालात नहीं हैं. ख़ास तौर पर अमरीका जैसे देश में, जहां सर्वत्र साफ सुथरे प्रसाधन कक्ष अपवाद नहीं नियम की तरह मौज़ूद हैं. तो आज चर्चा  इसी अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य में स्थित एक हाई स्कूल की. पिछले महीने वहां के लागुना हिल्स हाई स्कूल में जो  बदलाव हुआ, जिसकी चर्चा आज सर्वत्र हो रही है.

इस स्कूल की  छात्राओं के प्रसाधन कक्ष से दर्पण हटा दिये गए. उनकी जगह छोटी-छोटी पट्टिकाएं लटका दी गईं, जिनपर कुछ खूबसूरत जुमले लिखे हुए थे. मसलन: “आप खूबसूरत हैं. आप मुकम्मल हैं. आप महत्वपूर्ण हैं. आप बहुत अच्छी हैं. आप सबसे अलहदा हैं. आप स्मार्ट हैं. आप विलक्षण हैं. आप अकेली नहीं हैं” वगैरह. कहना अनावश्यक है कि ये सारे जुमले सकारात्मक हैं और जो इन्हें पढ़ेगी उनमें  आशा, उल्लास  और ऊर्जा का संचार होगा. इस मंज़र की कल्पना कीजिए कि आप दर्पण देखने को आगे बढ़ते हैं, उम्मीद करते हैं कि उसमें अपना चेहरा देखेंगे लेकिन वहां आपके चेहरे की बजाय आपको यह संदेश मिलता है कि आप खूबसूरत हैं! कैसा लगेगा आपको? जो जवाब आपकी ज़ुबां पर आएगा, कदाचित वही भाव इस स्कूल की छात्रा सब्रीना के मन में उस वक़्त रहा होगा, जब उसने  अपने स्कूल के छात्रा प्रसाधन कक्ष में यह बदलाव लाने के बारे में सोचा होगा. यह सत्रह वर्षीय लड़की अपने स्कूल में काइण्डनेस क्लब नामक एक गतिविधि का संचालन करती है और इसी गतिविधि के अंतर्गत उसने स्कूल में एक सप्ताह मनाया, जिसका शीर्षक था: व्हाट इफ...    यानि क्या हो अगर ऐसा हो. और योजना बनाई कि इस सप्ताह के हर दिन वो अपने सहपाठियों को एक संदेश देगी. जैसे, एक दिन उसने यह संदेश दिया कि क्या हो अगर हम अधिक प्रेम से रहें!और यह सप्ताह मनाने के लिए इस तरह के संदेश तैयार करते हुए उसने सोचा कि क्यों न इन संदेशों को प्रसाधन कक्ष में लगा दिया जाए? अपने स्कूल प्रशासन से भी उसे सहमति और सहयोग हासिल हुए और जैसा बाद में स्कूल की गतिविधियों की डाइरेक्टर  चेल्सिया मैक्सेल ने कहा, सबरीना ने उस सेमेस्टर के लिए इस बात को अपना लक्ष्य ही बना लिया कि वो पूरे स्कूल परिसर में सकारात्मक संदेशों का प्रसार करेगी. और इस तरह जो गतिविधि सिर्फ एक सप्ताह के लिए शुरु की गई थी, उसके स्वागत से प्रफुल्लित होकर स्कूल प्रशासन ने तै किया है कि वे इसे ज़ारी रहने देंगे. इस बारे में खुद सबरीना ने जो कहा है वो ग़ौर तलब है. उसने कहा है कि “मैंने यह कभी नहीं सोचा है कि मैं ऐसा कुछ कर रही हूं जिससे औरों की ज़िंदगी प्रभावित हो. मैं तो बस यह जानती हूं कि मेरे इस काम से उनका एक दिन थोड़ा ज़्यादा उजला हो सकता है या उनका मनोबल थोड़ा बढ़ सकता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस काम का कोई बहुत बड़ा असर  होगा.” लेकिन सबरीना ने इससे आगे जो कहा है वो बहुत महत्वपूर्ण है. उसने कहा है कि “हमारे इन संदेशों ने लोगों को यह याद रखने में मदद की है कि हम में से हरेक खूबसूरत है, हरेक महत्वपूर्ण है, हरेक बेहद अच्छा है और हरेक के साथ समानता का बर्ताव किया जाना चाहिए. मैंने ऐसा  इस कारण किया है कि मैं इस बात को लेकर बेहद जुनूनी हूं कि हरेक महत्वपूर्ण है और हरेक का खयाल रखा जाना चाहिए.”

लेकिन खूब सराहे गए इस प्रयास को सभी ने स्वीकार नहीं किया है. कुछ लोगों का कहना है कि भले ही यह काम नेक इरादों से किया गया हो, दर्पण को हटाकर हम यथार्थ की अनदेखी करने का ग़लत काम कर रहे हैं. ऐसे लोग चाहते हैं कि सकारात्मकता और यथार्थ से आंख मिलाने से कतराने को अलग-अलग करके देखा जाए. और भी कुछ बातें कही गई हैं. यह सब पढ़ते हुए हो सकता है, आपको वो गाना याद आ जाए: कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना!    


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 11 अप्रेल, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 8, 2016

ताकि स्कूल कल किसी और की बेटी का अपमान न करे!

अमरीका के मेरीलेण्ड राज्य के वाल्डोर्फ शहर के एक मिडिल स्कूल में जैसे ही श्रीमती एबॉनी बैंक्स की ग्यारह वर्षीया बेटी पहुंची, स्कूल प्रशासन ने उसे क्लास में बैठने की अनुमति देने से मना कर दिया, उसे एक अलग कमरे में बिठाया और कहा कि वो अपनी मां को फोन करे. बिटिया  ने मां से कहा कि वो उसके लिए एक जीन्स  लेकर फौरन स्कूल आ जाए. स्कूल प्रशासन का कहना  था कि वो लड़की जिस वेशभूषा में स्कूल आई थी उससे उनके ड्रेस कोड का उल्लंघन हो रहा था. लड़की ने काले रंग की लेगिंग्स पहनी थी और उस पर कमर तक पहुंच रहा काले रंग का छोटी आस्तीन वाला शर्ट और गुलाबी रंग का स्वेटर जैकेट पहना था. स्कूल की अपेक्षा थी कि जो लड़कियां लेगिंग्स पहनें वे पाँव की उंगलियों तक पहुंचने वाले शर्ट भी पहनें ताकि वे अपनी देह की तरफ़ अनावश्यक ध्यान आकृष्ट न कर सकें.

मेरीलेण्ड के ही विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर और जेण्डर एक्सप्रेशन की विशेषज्ञ  ड्रेस इतिहासकार जो पाओलेत्ती ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. उन्होंने कहा है कि इस बात की परिभाषा सदा बदलती रहती है कि क्या अनुपयुक्त या सेक्सी है. अपनी बात को और खोलते हुए वे कहती हैं कि फैशन निरंतर नए आविष्कार करता रहता है और उन्हीं के पीछे चलते हुए ड्रेस कोड लेखकों को यह तै करना होता है कि क्या अनुपयुक्त है और किसे बैन किया जाना है. ड्रेस कोड का मसला स्कूलों  में विशेष अहमियत रखता है और वहां भी इसके घेरे में लड़कों की बजाय लड़कियां ज़्यादा आती हैं. अमरीका के विभिन्न राज्यों में, और अपने भारत में भी, स्कूलों में कौन क्या पहने और क्या न पहने इस पर प्राय: विवाद होते रहे हैं. बहुत सारे स्कूलों ने तो इस विवाद से निजात पाने का आसान तरीका यह तलाश किया है कि उन्होंने अपने यहां यूनीफॉर्म निर्धारित कर दी है. लेकिन जहां ऐसा नहीं हुआ है वहां विवाद भी अधिक हुए हैं.

यहां हमने जिन श्रीमती एबॉनी बैंक्स के ज़िक्र से अपनी बात शुरु की, वे अपनी बेटी के स्कूल के इस फैसले से बेहद नाराज़ हैं. इतनी कि उन्होंने स्कूल के सर्वोच्च  प्रशासन से शिकायत  करने के साथ-साथ संघीय अधिकारियों का दरवाज़ा भी खटखटाया है और सिविल राइट्स में भी शिकायत दर्ज़ कराई है. उनका कहना है कि उनकी बेटी स्कूल की ऑनर रोल विद्यार्थी है और वो डॉक्टर बनने का ख्वाब देखती है. ऐसी ज़हीन लड़की को महज़ चन्द इंच कपड़ों की खातिर पूरे बीस मिनिट कक्षा से वंचित कर देना नाइंसाफी  है. उनका यह भी कहना है कि स्कूल का यह कृत्य उस बच्ची के मन पर नकारात्मक असर डालेगा, उसके स्व-देह-बोध और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाएगा. एबॉनी बैंक्स ने कहा कि स्कूल का यह कृत्य निहायत ही सेक्सिस्ट है और इसने मेरा  खून खौला दिया है. इस विवाद का एक पहलू यह भी सामने  आया कि यह बच्ची जिस अफ्रीकी अमरीकन समूह से ताल्लुक रखती है उनकी देह औरों की तुलना में अधिक मांसल होती हैं, और कदाचित इसी वजह से स्कूल प्रशासन ने उसकी ड्रेस को आपत्तिजनक माना हो. हालांकि स्कूल प्रशासन ने इस सम्भावना को सिरे से नकारा है और कहा है कि वे लड़कों से भी उम्मीद करते हैं कि अपनी पतलूनों को नितम्बों से नीचे न बांधा करें. स्कूल ने अपने कृत्य को उचित ठहराते हुए एक तर्क यह भी दिया कि जैसे चौराहे का सिपाही बहुत सारे वाहन चालकों में से कुछ का ही चालान कर पाता है वैसे ही वे भी सबमें से कुछ ही विद्यार्थियों की वेशभूषा पर आपत्ति कर सके हैं. स्कूल की इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि स्कूल का एकमात्र उद्देश्य यह होता है कि विद्यार्थी अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान दें और साथ ही यह भी  समझें कि जीवन में अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग  वेशभूषा की ज़रूरत होती है. 

लेकिन स्वाभाविक है कि सभी लोग स्कूल के इस कृत्य से सहमत नहीं हैं. तेरह वर्षीया सोला   बियर्स ने स्कूल के इस कृत्य के विरुद्ध अपनी आवाज़  बुलन्द करते हुए कहा कि स्कूल का यह ड्रेस कोड वाकई सेक्सिस्ट है. इसमें लड़कियों के लिए तो बहुत सारे नियम-कायदे हैं, लेकिन लड़कों के लिए एक भी प्रतिबन्ध नहीं है. सबसे उम्दा बात तो कही खुद एबॉनी बैंक्स ने. उन्होंने कहा कि उनकी बेटी घटना वाले दिन से ही विचलित रही लेकिन उसने इस बात को जल्दी ही भुला भी दिया. लेकिन खुद उन्होंने इस मामले को किसी परिणति तक पहुंचाने के लिए अपने प्रयास ज़ारी रखे हैं. वे यह महसूस करती हैं कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर व्यापक विमर्श की ज़रूरत है. “मैं नहीं चाहती कि किसी और लड़की को भी मेरी बेटी की तरह अपमानित करके कक्षा से बाहर निकाला जाए!. यह बेहद अपमानजनक  है.”      

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 08 नवम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Sunday, June 29, 2014

अपना शहर, अपना घर और अपना स्कूल

पिछले डेढ़ दो सालों से मुझे अपना शहर, अपना घर और अपना  स्कूल बहुत याद आ रहे थे.

वैसे, ये तीनों अब अपने नहीं हैं, लेकिन फिर भी मुंह से अपना ही  निकलता है. उदयपुर में जन्म हुआ, बड़ा हुआ, पढ़ा लिखा और 1967 में नौकरी करने उदयपुर से बाहर निकला तो फिर वापस उदयपुर लौट ही नहीं सका. न कभी वहां तबादला हुआ, और सच कहूं तो इसके लिए प्रयत्न भी नहीं किया, और न रिटायर होने के बाद वहां बसने की सोची. इसके लिए मेरे परम मित्र सदाशिव श्रोत्रिय अब भी गाहे-बगाहे मुझसे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते रहते हैं. उदयपुर में अपना घर था. वो घर जहां मेरा जन्म हुआ, जहां रहकर पढ़ाई वगैरह की. जहां मेरे मां-बाप रहे. जिस घर में मेरे गर्दिश के दिन बीते. वो घर भी आहिस्ता-आहिस्ता बेगाना होता गया, और अंतत: इस शताब्दी के शुरुआती बरसों में उसे बेच कर उससे जैसे आखिरी नाता भी तोड़ लिया, या तोड़ना पड़ा. और स्कूल? 1955 में जगदीश रोड़ पर अपने घर के सामने वाली नानी गली में स्थित जिस कंवरपदा स्कूल में दाखिला लिया था, और जहां से 1961 में हायर सैकण्ड्र्री परीक्षा उत्तीर्ण कर निकला, उस स्कूल में फिर कभी जाना हुआ ही नहीं. बावज़ूद इस बात के 1940 के बाद भी चालीस बरस मेरा घर वही रहा और वहां जाना भी होता रहा, लेकिन उस स्कूल में फिर कभी जाना नहीं हुआ. लेकिन इधर डेढ़ दो बरसों से मुझे अपना घर, अपना स्कूल और अपना शहर बहुत याद आ रहे थे. शायद
उम्र का असर हो!

तो मार्च 2014 में उदयपुर जाने का प्रोग्राम बना, और वहां रहते हुए एक सुबह निकल पड़ा मैं अपना घर और अपन स्कूल देखने.

तो ये है जगदीश रोड़, और आई सी आई सी आई बैंक का जो लाल बोर्ड नज़र आ रहा है, उसके ऊपर वाला घर था जिसमें मेरी 1945 से 1967 तक की ज़िन्दगी बीती और जहां से मेरे जीवन ने एक दिशा प्राप्त की. नीचे हमारी दुकान हुआ करती थी, जो 1959 में पिता के निधन के बाद  कुछ बरस घिसटती हुई चली (और जिसने मेरी पढ़ाई के लिए आर्थिक साधन भी दिए) लेकिन फिर मेरे नौकरी कर लेने के कारण बन्द हो गई. मेरी मां को सदा यह मलाल रहा कि मैंने उनके पति का नाम (जो उस दुकान का भी नाम था) मिटा दिया. हां, तब यहां ये घर इतनी ज़्यादा ऊंचाइयों वले नहीं थे और बहुत लम्बे समय तक मेरा यह घर सबसे ज़्यादा ऊंचे घरों में से एक था. धीरे-धीरे और घर ऊंचे उठते गए और हम जहां के तहां रह गए. 

इसी घर के करीब-करीब सामने, जहां गाय खड़ी है उसी के  थोड़ा-सा आगे,  एक गली है जिसका नाम नानी गली है. ये नीचे वाली तीन तस्वीरें उसी गली की है. मेवाड़ी में नानी का अर्थ होता है  छोटी. यानि छोटी गली. और प्रसंगवश बता दूं कि इसी नानी गली के सामने एक गली थी और है जिसका नाम था मूत गली, क्योंकि उसमें एक सार्वजनिक मूत्रालय था. पता नहीं अब है या नहीं! ये तीन छवियां उसी नानी गली की हैं:





इस ठीक ऊपर वाली तस्वीर में जो भारतीय पुस्तक भण्डार दीख रहा है वह उस ज़माने में और बहुत बाद तक पूरे उदयपुर शहर में संस्कृत और प्राच्य विद्या विषयक  पुस्तकें मिलने का एकमात्र ठिकाना था. 

इसी गली में थोड़ा-सा आगे  चलकर  बांये हाथ पर है वो स्कूल जिसमें मैंने कक्षा छह से ग्यारह तक पढ़ाई की. ये रही उस स्कूल के प्रवेश द्वार की छवियां.




                   


हां, जब मैं यहां पढ़ता था तब दरवाज़े पर इतना ताम झाम नहीं था. खुला-खुला-सा हुआ करता था. आज जहां यह आंखों को चुभने वाला  लाल दरवाज़ा है, इसमें से अन्दर जाने पर एक लम्बा-सा खुर्रा हुआ करता था, जिसके बांयी तरफ हमारी क्राफ्ट की कक्षा होती थी (मेरा वैकल्पिक क्राफ्ट विषय पहले सुथारी था और बाद में टेलरिंग हुआ). जैसे ही खुर्रा चढ़ते हैं, आपके सामने होती है स्कूल की भव्य इमारत. अभी वहां कुछ काम चल रहा था, इसलिए वह भव्य इमारत उतनी भव्य नहीं लगी, जितनी वह वास्तव में है, और मेरी स्मृतियों में थी. फिर भी यह देखिए:





असल में यह कंवर (राजकुमार) लोगों के लिए निर्मित भवन था, इसलिए नाम पड़ा कंवरपदा. अब कंवर लोगों के लिए था तो भव्य  तो होगा ही. भवन के सामने जो मैदान-सा नज़र आ रहा है वही हमारे ज़माने में प्ले ग्राउण्ड हुआ करता था. लेकिन अब इसी के पास खेलने के लिए  एक और जगह बना दी गई है:

जैसे ही भवन के अन्दर जाते हैं एक छोटा-सा बरामदा मिलता है यहां सूचनाएं लगाई जाती थीं. शायद अब भी ऐसा ही होता है: 



इससे आगे बढ़ने पर एक काफी बड़ा चौक है, जिसमें बांयी तरफ उस ज़माने में हेड मास्टर का कमरा और स्कूल का ऑफिस हुआ करते थे. ऊपर सगसजी बावज़ी का एक मन्दिर भी है, जिसके पुजारी जी मुझे उस दिन मिल गए और बड़ी आत्मीयता से मुझे ऊपर ले जाकर दर्शन करवाए. एक तस्वीर (पहली तस्वीर में - सीढियां चढ़ते हुए) में वे पुजारी जी भी हैं. यह बात  बहुत आश्चर्य की लगती है कि कैसे हमारे धर्म निरपेक्ष कहे जाने वाले देश के सरकारी स्कूलों में भी बाकायदा पूजा पाठ चलता है. जो लोग इसाई मिशनरी स्कूलों और मदरसों में चलने वाली धार्मिक शिक्षा पर दुखी होते हैं वे इस तरफ से आंखें मूंदे रहते हैं. बहरहाल, देखिये ये तस्वीरें:





इस तत्कालीन हेडमास्टर कक्ष के सामने यानि इस चौक के दांयी तरफ एक छोटा-सा दरवाज़ा है जिसमें से होकर और नीचे उतरकर हम  एक और चौक में पहुंचते हैं. यह है वह छोटा दरवाज़ा(दांयी तरफ, गोलाई लिए हुए): 



और जब इस दरवाज़े को पार कर आप नीचे उतरते हैं तो बांयी तरफ वे कमरे नज़र आते हैं जिनमें बैठकर और गुरुजन से ज्ञान  प्राप्त कर 1961 में मैंने हायर सैकड्री उत्तीर्ण कर इस स्कूल से विदा ली. यहां यह भी  याद  करता चलूं कि 1961 में इस स्कूल से हायर सैकण्ड्री का पहला बैच निकला था और उस बैच में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण  होने वाले तीन विद्यार्थियों में से एक मैं था. कहना अनावश्यक है कि प्रथम श्रेणी किसी को नहीं मिली थी.



जिस दिन मैं अपना स्कूल देखने गया, उस दिन परीक्षा तैयारी के कारण वहां छुट्टी का-सा माहौल था. एक युवा चपरासी वहां मुझे मिला, जिसने  मेरे अनुरोध  पर  इस कमरे के भीतर मेरी एक फोटो ली, लेकिन यह मेरा दुर्भाग्य कि बस वही फोटो बिगड़ी. तस्वीर खिंचवाने के लिए  मैं  उस कमरे में एक कुर्सी पर उसी तरह बैठा था जैसे 1960-61 में बैठता रहा होऊंगा, और जैसे ही मैं बैठा,  मेरी बहुत तेज़ रुलाई फूट पड़ी. जाने क्यों?

और यह तस्वीर  है मेरी कक्षाओं के कमरों के सामने के कमरों की:




क्या पता इस जनम में फिर कभी  उस स्कूल भवन में जाना होगा या नहीं?