Showing posts with label ब्रिटेन. Show all posts
Showing posts with label ब्रिटेन. Show all posts

Tuesday, May 7, 2019

बुढ़ापे का उम्र से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है!

इधर दुनिया भर में बुढ़ापे को लेकर अनगिनत अध्ययन और शोध किये जा रहे हैं. भावी आर्थिक  नीतियों के निर्धारण के लिए यह बेहद ज़रूरी है. इन्हीं शोधों और अध्ययनों से अनेक दिलचस्प बातें छन छन कर सामने आ रही हैं. उनमें से कुछ की चर्चा करने बैठा हूं तो अनायास मुझे सन 2001 में बनी अमिताभ बच्चन की एक लोकप्रिय फिल्म का शीर्षक याद आ रहा  है – ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप!’  शीर्षक से ही यह स्पष्ट है कि बुड्ढा कहलाना किसी को पसन्द नहीं आता है. सच तो यह है कि लोग बुढापे में भी ‘अभी तो मैं जवान हूं’ ही गुनगुनाना पसन्द करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि उम्र के लिहाज़ से बुढ़ापा कब शुरु होता है? 

आपको यह बात तो मालूम  ही है  कि अतीत में ब्रिटेन में फ्रेण्डली सोसाइटीज़ एक्ट (1875) के आधार पर पचास की उम्र  से बुढ़ापे की शुरुआत मानी जाती थी. लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो नई शोध की है उसके अनुसार पैंसठ पार की उम्र से बुढ़ापे की शुरुआत मानना प्रस्तावित है. इस शोध में हमारी आयु के विभिन्न पड़ावों को इस तरह से पहचाना गया है: शून्य से सत्रह बरस तक: अल्पायु या अण्डर एज, अठारह से पैंसठ बरस तक: युवावस्था, छियासठ से उनासी बरस तक: मध्य वय, अस्सी से निन्यानवे बरस तक: वरिष्ठ या बुज़ुर्ग, सौ बरस से अधिक वाले: दीर्घजीवी वरिष्ठ. सत्तर के दशक में जो नृवंशशास्त्रीय अध्ययन हुए उनमें मुख्यत: तीन आधारों पर यह वर्गीकरण किया गया था. आधार थे:  पहला- वर्ष की गणना, दूसरा– सामाजिक भूमिका में आया बदलाव (जैसे सेवा निवृत्ति, बच्चों का बड़ा हो जाना और रजोनिवृत्ति वगैरह), और तीसरा- क्षमताओं में आया बदलाव (जैसे शारीरिक अक्षमता, बुढापा, शारीरिक दक्षताओं में आया बदलाव). इनमें से भी दूसरे आधार को अधिक महत्वपूर्ण  माना गया.  

भारत में हम यह मान लेते हैं कि सरकारी सेवा निवृत्ति की उम्र से बुढ़ापा आ जाता है. सामान्यत: अभी यह उम्र साठ बरस है. कनाडा में सेवा निवृत्ति की आयु पैंसठ तो अमरीका में छियासठ बरस है और आशा की जा रही है कि दोनों ही देश शीघ्र ही इसे बढ़ाकर सड़सठ बरस कर देंगे. लेकिन सेवा निवृत्ति  की उम्र को बुढ़ापे के आगमन की बात मानना भी सबको स्वीकार्य नहीं है. वियना, ऑस्ट्रिया की एक शोध संस्था के विशेषज्ञों का मत है कि बुढ़ापे का फैसला वर्तमान आयु  के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि किसी के पास ज़िन्दगी के और कितने बरस बचे हैं. उनका मानना है कि जब किसी के पास जीने के लिए पन्द्रह या इससे कम बरस बचे हों तो उसे बूढ़ा कहा-माना जाना चाहिए. अब इस  लिहाज़ से देखें तो पचास के दशक में एक सामान्य अंग्रेज़ के पन्द्रह बरस और जीने की उम्मीद की जाती थी, लेकिन आज पश्चिमी  देशों में यह माना जा रहा है कि एक औसत सेवा निवृत्त व्यक्ति कम से कम चौबीस बरस और पेंशन  का लाभ उठा लेगा. यानि मौज़ूदा हालात में चौहत्तर वर्षीय व्यक्ति को बूढ़ा माना जा सकता है. 

लेकिन सोचने की बात यह भी है कि क्या केवल यह चौहत्तर का अंक ही बुढ़ापे के आगमन का निर्धारक हो सकता है ? चौहत्तर बरस की उम्र के हर व्यक्ति की स्थिति एक जैसी नहीं हो सकती है. ग़रीब और अमीर की, ग्रामीण और शहरी की, अनपढ़ और पढ़े लिखे की, अनुकूल और प्रतिकूल  जीवन स्थितियों वाले समान उम्र के व्यक्ति की दशा में बहुत बड़ा फर्क़ हो सकता है. स्त्री पुरुष के मामले में तो यह अंतर प्रमाण पुष्ट भी है. इसके अलावा अपवाद तो होते ही हैं. यह भी अनुमान लगाया गया है कि अभी हाल में रिटायर हुए बारह  में से एक पुरुष और सात में से एक स्त्री कम से कम सौ बरस तक जीवित रहेंगे. तो क्या उन्हें अधिक उम्र से  से बूढ़ा माना जाए? अगर आप अपने घर में भी कोई पुरानी तस्वीर देखें तो पाएंगे कि पिछली पीढ़ी के लोग साठ बरस की उम्र में ही खासे जर्जर दिखाई देते थे जबकि आज उसी उम्र के लोग उनकी तुलना में बहुत सेहमतमन्द और ऊर्जावान दिखाई देते हैं और उन्हें कोई भी बूढ़ा नहीं कहना चाहेगा. सही बात तो यह है कि आज के सत्तर बरस अतीत के पचास बरस के बराबर हो गए हैं. कहना अनावश्यक है कि बेहतर जीवन स्थितियों और अपनी सेहत के  प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण यह बदलाव आया है.

तो, कुल मिलाकर मामला बहुत जटिल है और इस बात का कोई सर्वमान्य और सार्वकालिक उत्तर नहीं हो सकता कि किस उम्र के व्यक्ति को बूढ़ा माना जाए. वैसे, एक उत्तर हो सकता है जिससे शायद ही कोई असहमत हो, और वह यह कि बुढ़ापे का उम्र से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है. यह तो एक मानसिक अवस्था है जो हरेक की भिन्न भिन्न होती है. 

आप क्या सोचते हैं?  
•••
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 2, 2018

जीवन रक्षक भूमिका भी है सोशल मीडिया की!

सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी में बहुत गहरे उतर चुका है. हममें से ज़्यादातर लोग उसे बरतते हैं, और साथ ही उसकी बुराइयों का रोना भी रोते रहते हैं. बहुतों को यह समय बर्बाद करने वाला शगल लगता है और समय-समय पर कुछ लोग इससे कुछ समय का अवकाश लेने और कुछ इसे सदा के लिए अलविदा कह देने की घोषणाएं करते रहते हैं. कुछ और ऐसे भी हैं जो इसके हानिप्रद  प्रभावों से तो पूरी तरह वाक़िफ़ हैं, लेकिन फिर भी इसे छोड़ नहीं पाते हैं. लेकिन वो कहते हैं ना कि हर बुराई के पीछे कोई  न कोई अच्छाई भी ज़रूर छिपी रहती है, तो ऐसा ही एक वाकया सामने आया है सात समुद्र पार ब्रिटेन  से. लंकास्टर की 33 वर्षीया गृहिणी शॉर्लट सॉल्सबरी  ने जब फ़ेसबुक पर अपनी बिटिया फेलिसिटी की रेटिनोब्लास्टोमा नाम नेत्र व्याधि से ग्रस्त एक आंख की ऐसी तस्वीर पोस्ट  की जिसमें उसकी  आंख की पुतली में एक असामान्य सफेद धब्बा नज़र आ रहा है, तो उन्हें सपने में भी इस बात का अनुमान नहीं था कि उनके द्वारा पोस्ट की गई यह तस्वीर एक और बच्ची के लिए जीवन–रक्षक साबित हो जाएगी.

हुआ यह कि शॉर्लट द्वारा पोस्ट की गई इस तस्वीर पर एक अन्य शहर की निवासी बीस वर्षीया ताओमी की नज़र पड़ी तो यकायक उनका ध्यान इस बात पर गया कि उनकी बीस माह की बेटी लीडिया की आंखें भी कुछ-कुछ ऐसी ही दिखाई देती हैं. ताओमी उन दिनों घर से बाहर रहकर छुट्टियां मना रही थीं. करीब दो सप्ताह बाद जब वे घर लौटीं तो वे अपनी बेटी को एक डॉक्टर के पास ले गईं, और डॉक्टर ने जांच करने के बाद जो बताया उससे उनके पैरों के नीचे की ज़मीन ही खिसक गई. डॉक्टर के अनुसार उनकी इस  नन्हीं बिटिया की बांयी आंख इण्ट्राओक्युलर रेटिनोब्लास्टोमा के सबसे भीषण प्रकार, जिसे टाइप ई कहा जाता है,  से ग्रस्त थी. सरल भाषा में इसे यों समझा जा सकता है कि उसकी आंख के भीतर का ट्यूमर या तो बहुत बड़ा है और या इस तरह का है कि उसका कोई इलाज़ मुमकिन ही नहीं है और न ही उस आंख को बचाया जा सकता है. रोग और ज़्यादा न फैले, इसके लिए यह ज़रूरी है कि उस आंख को जल्दी से जल्दी निकाल दिया जाए. ताओमी के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. डॉक्टरों ने भी  यही किया. इस बुराई में भी अच्छी बात यही थी कि रोग दूसरी आंख को अपनी गिरफ़्त में नहीं ले पाया था. अन्य कई जांचों के परिणाम अभी आने शेष हैं, लेकिन डॉक्टर आश्वस्त हैं कि उनके उपचार कारगर साबित होंग़े यह नन्हीं बच्ची सामान्य रूप से बड़ी होने लगेगी.

उधर फेलिसिटी भी, जो अब एक बरस की हो चुकी है धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है.  उसे कीमोथैरेपी दी जा रही है. जब वह मात्र नौ माह की थी तब उसके मां-बाप को पता चला कि वो रेटिनोब्लास्टोमा से ग्रस्त है. असल में यह रोग उसे जन्म से ही था, लेकिन मां-बाप इस बात से अनजान थे. एक दिन उनकी एक पारिवारिक मित्र लॉरा पॉवर  जो कि एक नर्स है, का ध्यान उसकी आंखों की असामान्यता पर गया और उसने शॉर्लट सॉल्सबरी  को किसी डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह दी. बाद में शॉर्लट ने बताया कि उन्हें कोई अंदाज़ ही नहीं था कि उनकी बेटी किसी रोग से पीड़ित भी हो सकती है. उनके लेखे तो वह एकदम सामान्य थी. हां, इस बात पर ज़रूर उनका ध्यान गया था  कि जब फेलिसिटी घुटनों के बल रेंगने लगी तो कई बार वह किसी चीज़ से टकरा जाया करती थी. लेकिन उन्हें यह बात असामान्य नहीं लगी. बाद में जब लॉरा की सलाह पर वे डॉक्टरों के पास गई तो अनेक जांचों के बाद उन्हें पता चला कि उनकी इस नन्हीं बिटिया की दोनों आंखों में तीन-तीन बेहद आक्रामक ट्यूमर्स हैं.

बिटिया का इलाज़ करा  चुकने के बाद शॉर्लट सॉल्सबरी ने महसूस किया कि उनका फर्ज़ बनता है कि वे अन्य मां-बापों को भी इस गम्भीर रोग के बारे में जानकारी दें. वैसे, जब शुरु-शुरु में फेलिसिटी की इस बीमारी का पता चला तो वे इसे गोपनीय रखती रहीं थी, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि ऐसा करना उचित नहीं है. और तब उन्होंने फेसबुक पर इस रोग के बारे में पूरी जानकारी पोस्ट की. उनका खयाल था कि वहां उनके जो दोस्त हैं वे इस पोस्ट को पढ़कर सचेत होंग़े, लेकिन देखते ही देखते उनकी इस पोस्ट को दुनियाभर में पैंसठ हज़ार लोगों ने साझा कर दिया. ज़ाहिर है इस पोस्ट से जो लोग लाभान्वित हुए उनमें से ताओमी भी एक हैं. ताओमी ने शॉर्लट  के प्रति  अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा भी कि अगर आपने यह पोस्ट नहीं लिखी होती तो मैं अपनी बिटिया के इस रोग से अनजान ही रह गई होती.
●●●

जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित अलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 4, 2017

मशीनें मनुष्य की पूरक ही हैं, विकल्प नहीं!

अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेन मे शुरु हुई औद्योगिक क्रांति ने हमारे जीवन को आधारभूत रूप से बदल कर रख दिया. जीवन का हर पहलू इससे प्रभावित हुआ. कल तक जो काम मनुष्य सिर्फ और सिर्फ अपने हाथों से करता था, वे काम आहिस्ता-आहिस्ता मशीनों की मदद से किये जाने लगे. स्वाभाविक ही है कि ऐसा होने से मनुष्य को बहुत सारे मेहनत-मज़दूरी वाले  कामों से मुक्ति मिली और उसका जीवन सुगम हुआ. औद्योगिक क्रांति का असर केवल मानवीय श्रम तक ही सीमित नहीं रहा, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तमाम क्षेत्रों को इसने प्रभावित किया. अपने श्रम और प्रयत्नों को कम कर वे तमाम काम मशीनों से करवाने के मनुष्य के प्रयास अभी भी थमे नहीं हैं. बल्कि कुछ अर्थों में तो ये प्रयास और अधिक तेज़ भी हुए हैं. कल तक जिन कामों को मशीनों से करवाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी, अब वे काम भी मशीनों से करवाये जाने लगे हैं.

ऐसा करने से जहां मनुष्य के श्रम में काफी कटौती  हुई है वहीं एक नई आशंका भी उत्पन्न हो गई है. समझदार लोग इस बात से चिंतित होने लगे हैं कि अगर यही क्रम जारी रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि मनुष्य द्वारा किये जाने वाले तमाम काम मशीनों से ही करवाये जाने लगें. मशीनों को इतना समर्थ बना दिया जाए कि वे उन सभी कामों को अधिक दक्षता से और अपेक्षाकृत कम खर्चे में करने लग जाएं! अगर वाकई ऐसा हो गया तो क्या सारी मानवता बेरोज़गार नहीं हो जाएगी? बहुत सारे लोग अभी से यह सोच कर आशंकित हैं कि कल को उनका काम मशीनें करने लगेंगी और उनके पास करने को कुछ रह ही नहीं जाएगा!  इसी आशंका के तहत ऑक्सफोर्ड  विश्वविद्यालय के फ्यूचर ऑफ ह्युमेनिटी (मानवता का भविष्य)  संस्थान ने दुनिया के 352 शीर्षस्थ वैज्ञानिकों से जवाब मांग कर उन जवाबों के आधार पर यह अनुमान लगाने का प्रयास किया है कि कितने बरसों में मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले सारे काम मशीनें करने लगेंगी. इस पड़ताल में पाया गया है कि फिलहाल इस बात की पचास प्रतिशत सम्भावना है कि आगामी एक सौ बीस बरसों में मशीनें  मनुष्यों द्वारा किये  जाने वाले सारे काम करने लगेंगी. इस निष्कर्ष से उन सभी को आश्चर्य हुआ है जो यह सोच कर भयभीत थे कि ऐसा निकट भविष्य में ही हो जाएगा!

वैज्ञानिकों का सोच यह है कि मशीनें मेहनत का काम तो आसानी से कर लेती हैं लेकिन जहां विवेक की आवश्यकता होती है वहां वे पिछड़ जाती हैं, हालांकि कृत्रिम बुद्धि (आर्टीफीशियल इण्टेलीजेंस) का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ता जा रहा है. अब यही बात देखें कि सन दो हज़ार दस में एक रोबोट एक साधारण तौलिये  को तह करने में उन्नीस मिनिट लगा रहा था वहीं दो बरस बाद ही वह पांच मिनिट में एक जीन्स को और छह मिनिट में एक टी शर्ट को तहाने लगा था. कृत्रिम बुद्धि का प्रयोग करते हुए सन दो हज़ार सत्ताइस तक मानव रहित ट्रक चालन की कल्पना की जा रही है.

हममें से बहुतों ने यह बात नोट की होगी कि जब हम किसी ऑनलाइन  स्टोर  पर कोई चीज़ तलाश करते हैं तो तुरंत हमें उससे मिलती-जुलती चीज़ों के लिए सुझाव मिलने लगते हैं, और यह काम मानव नहीं करता है. इसी कामयाबी से उल्लसित होकर यह कल्पना भी की जाने लगी है कि सन दो हज़ार तरेपन तक आते-आते शल्य चिकित्सक का काम रोबोट करने लगेंगे और उससे भी चार बरस पहले यानि सन उनचास तक मशीनें ही बेस्ट सेलिंग उपन्यास भी लिखने लग जाएंगी! इस काम की शुरुआत तो हो ही चुकी है. गूगल अपने यंत्रों को रोमाण्टिक उपन्यास और समाचार लेख लिखने के लिए प्रशिक्षित कर रहा है. बेंजामिन नामक उनका एक यंत्र छोटी-छोटी साइंस फिक्शन पटकथाएं लिखने भी लगा है.

लेकिन सबसे अच्छी बात यह है कि इस क्षेत्र में जो लोग काम कर रहे हैं वे अपने लक्ष्यों को लेकर बहुत स्पष्ट हैं. उनके मन में यह बात एकदम साफ़ है कि यह तकनीक मनुष्य के लिए पूरक बन कर आएगी, न कि उसका विकल्प बनकर. उनके मन में यह बात भी बहुत साफ़ है कि तकनीक कभी भी मनुष्य को विस्थापित नहीं कर सकती है. और यह सब तब जबकि वे यह भी जानते हैं कि जिस गति से तकनीकी विकास हो रहा है उसे देखते हुए ऐसा कोई काम नहीं बचने वाला है जो मनुष्य करता हो और जिसे मशीन न कर सके. लेकिन ये लोग मज़ाक-मज़ाक में एक गम्भीर बात कह देते हैं. इनका कहना है कि सबकुछ हो चुकने के बाद भी कुछ काम तो मनुष्य के लिए ही बच रहेंगे, जैसे गिरजाघर के पादरी का काम. खुद मनुष्य यह नहीं चाहेगा कि किसी चर्च में उसे हाड़-मांस के पादरी की बजाय रोबोट मिले!

●●●

जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 जुलाई, 2017 को इसी  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 21, 2017

उसने जान लिया है कि जीवन में धन ही सब कुछ नहीं है

सामान्यत: हम सोचते हैं कि अगर हमें खूब सारा  धन मिल जाए तो हमारे  सारे कष्ट दूर और सारे सपने साकार हो जाएंगे. निश्चय ही ब्रिटेन  की सुश्री जेन पार्क ने भी सन 2013 में अपनी ज़िंदगी का पहला लॉटरी टिकिट खरीदते वक़्त ऐसा ही सोचा होगा. लेकिन देश  की सबसे कम उम्र यूरोमिलियन्स विजेता बनने के बाद महज़ तीन-चार बरसों में उनकी सोच इतनी बदल चुकी है कि अब तो वे उस लॉटरी कम्पनी पर कानूनी  कार्यवाही तक करने के बारे में सोच रही हैं जिसने उन्हें रातों रात इतना अमीर बना दिया. जेन पार्क को इस लॉटरी में एक लाख मिलियन पाउण्ड यानि भारतीय मुद्रा में  क़रीब साढ़े आठ करोड़ रुपये मिले थे. स्वभावत: इन पैसों से उन्होंने प्रॉपर्टी खरीदी, अपनी खूबसूरती बढ़ाने पर खासा खर्चा किया, एक महंगी गाड़ी खरीदी और जमकर सैर सपाटा किया. कल तक जो चैरिटी वर्कर थी, वह अपने आप को डेवलपर कहने लगीं. उनके जीवन में भौतिक साधनों की इफ़रात हो गई. लोग उन्हें देखते तो ठण्डी आहें भरते और कहते कि काश! हमारे पास भी उतना पैसा हो जितना इस लड़की के पास है. लेकिन खुद जेन पार्क बहुत जल्दी इस वैभव से इतनी त्रस्त हो गईं कि उन्हें लगने लगा कि भले ही  उनके पास भौतिक साधनों की भरमार हो, उनका जीवन तो एकदम रिक्त है. इस वैभव से दुखी होकर वे तो यहां तक कह बैठीं कि “मेरा खयाल था कि यह राशि मिल जाने से मेरी ज़िंदगी दस गुना बेहतर हो जाएगी, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह दस गुना बदतर हो गई है. कितना अच्छा होता कि मैंने यह लॉटरी जीती ही ना होती और मेरी जेब एकदम खाली होती!”

जेन ने जब यह लॉटरी जीती तब उनकी उम्र सत्रह बरस थी. अब इक्कीस बरस की हो चुकने और ऐसी अमीरी से उपजे खूब सारे तनाव झेल चुकने के बाद उन्हें लगता है कि ब्रिटेन में लॉटरी का टिकिट खरीदने के लिए न्यूनतम उम्र सोलह बरस है और यह बहुत कम है. इसे कम से कम अठारह बरस तो होना ही चाहिए. लेकिन यह  निर्णय तो वहां की संसद करती है. जेन पार्क ने सन 2015 में अपने बॉय फ्रैण्ड मार्क स्केल्स को स्नेककहते हुए त्याग दिया. वजह यह रही कि उनके दोस्तों ने उन्हें बताया कि उसकी एकमात्र दिलचस्पी उनकी सम्पत्ति में थी. इसके बाद वे अपने एक और बॉय फ्रैण्ड कॉनोर जॉर्ज से भी अलग हो गईं. यह किस्सा खासा मनोरंजक किंतु त्रासद भी है. जब जॉर्ज इबिज़ा में किशोरों के एक हॉलिडे पर जाने लगा तो जेन ने उसे हिदायतों  की एक सूची थमाई जिसके अनुसार उसे हॉलिडे में किसी भी लड़की से बात नहीं करनी थी और उस द्वीप पर छुट्टियां मनाते हुए हर वक़्त जेन का डिज़ाइन किया हुआ वो टी शर्ट पहने रहना था जिस पर इस कन्या की तस्वीर बनी हुई थी. समझा जा सकता है कि ये बातें जेन के असुरक्षा  बोध की परिचायक थीं. अलगाव तो होना ही था.  उसके बाद से वे ऐसे बॉय फ्रैण्ड की तलाश में  ही हैं जिसकी दिलचस्पी उनके वैभव में न हो. डिज़ाइनर वस्तुओं को खरीदते-खरीदते वे ऊब चुकी हैं और अमरीका और  मालदीव जैसी चमक-दमक भरी जगहों और बेहद महंगे रिसोर्ट्स  में छुट्टियां बिताने से अब वे इतनी तंग आ चुकी हैं कि साधारण और सस्ती जगहों पर छुट्टियां मनाने के लिए तरसने लगी  हैं.

इस सारे किस्से का एक किरदार वो लॉटरी कम्पनी भी है जिसने जेन पार्क के जीवन में इतनी उथल-पुथल पैदा की है. इस प्रसंग में केमलोट समूह नामक इस लॉटरी कम्पनी के एक प्रतिनिधि का बयान भी ध्यान  देने योग्य है. अपनी सफाई पेश करते हुए उन्होंने कहा है कि सुश्री जेन पार्क के इनाम जीतने के फौरन बाद कम्पनी ने एक स्वतंत्र वित्तीय और विधिक पैनल का गठन किया और जेन का सम्पर्क उन्हीं के आयु वर्ग के अन्य इनाम विजेताओं से करवाने और पारस्परिक अनुभवों के आदान-प्रदान का प्रबंध किया. कम्पनी की तरफ़ से यह भी बताया गया कि जेन के विजेता बनने के बाद से कम्पनी लगातार उनसे सम्पर्क बनाए हुए है और उन्हें अपना संबल प्रदान करने के लिए तत्पर है. लेकिन इस बात का फैसला तो अंतत: विजेता को ही करना होता है कि उन्हें कोई सहयोग लेना है या नहीं लेना है. बावज़ूद इस बात के कम्पनी उन्हें सहयोग देने को सदैव प्रस्तुत रहेगी. लॉटरी के औचित्य अनौचित्य पर तमाम  बातों से हटकर कम्पनी के इस सोच की तो प्रशंसा की ही जानी चाहिए.

सुश्री जेन पार्क का यह वृत्तांत  उन लोगों के लिए आंखें खोल देने वाला हो सकता है जो मान बैठे हैं कि जीवन की सारी समस्याओं का एकमात्र हल पैसा है.

▪▪▪  
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  अंतर्गत मंगलवार, 21 फरवरी, 2017 को  प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 5, 2016

सामान्य की सम्भावनाएं चुक जाने के बाद असामान्य का रुख

बहुत सारी फिल्मों और टीवी प्रोग्रामों को देखते हुए क्या आपको भी ऐसा लगता है कि इनको क्यों बनाया गया है और कोई औसत  बुद्धि वाला इंसान भी इन्हें कैसे देख या झेल सकता है! उनका तर्कातीत होना, ऊल जुलूल होना, मूर्खतापूर्ण होना और अशालीन होना जैसे महज़ यह परखने लिए होता है कि उन्हें  देखते हुए आप अपना धैर्य खोते  हैं या नहीं! लेकिन जिन चीज़ों को देखते हुए आप कुढ़ते-चिढ़ते हैं उनका भी एक वफ़ादार दर्शक समुदाय होता है. अगर न हो तो उन्हें बनाया ही न जाए! जो लोग इस तरह की फिल्में या प्रोग्राम बनाते हैं उनकी नज़रें बॉक्स ऑफिस या टी आर पी पर टिकी होती हैं. अगर आप मनोरंजन की दुनिया के निकट अतीत को खंगालें तो पाएंगे कि इस तरह की निर्मितियों की अतार्किकता और बेहूदगी घटने की बजाय बढ़ी ही है. जो चीज़ दस-पाँच बरस पहले कल्पनातीत थी आज वह इतनी आम हो चुकी है कि आपको चौंकाती तक नहीं है. क्या पता कि इन्हें बनाने वालों का संकट यह हो कि सामान्य की तो सारी सम्भावनाएं चुक गई हैं, इसलिए अब उन्हें असामान्य का ही रुख करना है.

इधर ब्रिटेन  से एक ख़बर यह आई है कि वहां के एक लोकप्रिय चैनल पर जो कि नई तरह के कार्यक्रम प्रस्तुत करने के जुनून में सीमाएं लांघ जाने के लिए जाना जाता है,  एक नया शो  लाया जा रहा है. इस शो का नाम है ‘साइंस ऑफ अट्रेक्शन’  यानि आकर्षण का विज्ञान. लेकिन कहते हैं न कि नाम में क्या रखा है? असल बात तो है शो की विषय वस्तु. तो यह एक डेटिंग शो होगा, लेकिन इसके निर्माताओं का कहना है कि यह अब तक के तमाम डेटिंग शो’ज़ से नितान्त  भिन्न होगा. अब यह भी जान लीजिए कि इसमें भिन्न क्या होगा? इस शो के शुरु में आठ युवा स्त्री-पुरुषों को एक सी-थ्रू बक्से में रखा जाएगा! नयापन यह होगा कि ये सबके सब एकदम निर्वस्त्र होंगे! इन आठ में से एक स्त्री और एक पुरुष वे होंगे जिन्हें शेष छह में से अपने लिए एक-एक साथी का चयन करना है. इस शो का शीर्षक तो  सम्मानजनक है ही, इसे और गरिमा प्रदान करने के लिए इसमें एक साइकोलॉजिस्ट  को भी शामिल किया गया है जो प्रतियोगियों का मनोविश्लेषण प्रस्तुत कर इस शो में बौद्धिकता का तड़का लगाएगा. चुनाव करने वाले स्त्री-पुरुष एक-एक करके प्रतियोगियों को भिन्न-भिन्न मापदंडों  पर परखते हुए खारिज करते जाएंगे और अंत  में जब इन दोनों के लिए एक-एक साथी बच रहेगा तो ये उसके साथ डेट पर चले जाएंगे.  यह पूरा शो कुल तीन राउण्ड्स में होगा. पहले राउण्ड की तो चर्चा हो ही चुकी  है. दूसरे राउण्ड में प्रतियोगियों को वस्त्र धारण करने होंगे और फिर उनका आकलन उनके ड्रेस सेंस के आधार पर होगा. तीसरे और अंतिम दौर में प्रतियोगी अपने-अपने बारे में बताएंगे और इस आधार पर उनके व्यक्तित्वों का विश्लेषण किया जाएगा. जिन दो प्रतिभागियों को अपने लिए साथी चुनने हैं वे भी अपनी बात कहेंगे और बताएंगे कि किसी को वे क्यों पसन्द या नापसन्द कर रहे हैं.

इस शो की विषय वस्तु के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जा रहा है कि शायद इसका नाम ‘साइंस ऑफ अट्रेक्शन’  न होकर ‘नेकेड अट्रेक्शन’  रहे. इस अनुमान का एक आधार यह भी है कि अमरीका में ‘डेटिंग नेकेड’  शीर्षक वाला एक शो काफी कामयाब रह चुका है. लोकप्रिय तो ‘ब्लाइण्ड डेट’  शीर्षक कार्यक्रम भी काफी रहा है लेकिन जिस शो की हम चर्चा  कर रहे हैं उसके निर्माताओं का दावा है कि उनका यह शो अब तक का सबसे अनूठा शो होगा. कहना अनावश्यक है कि अपने शो को अनूठा बनाने के क्रम में वे नग्नता और अश्लीलता से कोई दूरी नहीं बरतेंगे. अभी तक इस शो के जो प्रोमोज़ जारी हुए हैं उनसे भी इस बात की पुष्टि होती है. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, निर्माताओं की तरफ से यह भी कहा जा चुका है कि इस शो में गे और लेस्बियन प्रतिभागियों पर भी एपिसोड होंगे.

सुखद आश्चर्य की बात यह है कि भले ही इस शो का निर्माण प्रारम्भ हो चुका है, निर्माताओं को इसके लिए आठ प्रतिभागी जुटाने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ रही है. वे सोशल  मीडिया पर लोगों को पुकार रहे हैं लेकिन लोग हैं कि अपनी गरिमा को दांव पर लगाने को तैयार नहीं हैं. लेकिन देर-सबेर प्रोग्राम तो बनेगा ही. मुझे फिक्र इस बात की सता रही है कि हमारे अपने देशी निर्माता जो हर विदेशी प्रोग्राम की नकल करने को आतुर रहते हैं, उन्हें इस प्रोग्राम से ‘प्रेरणा ग्रहण’ करने से कौन रोकेगा, और कब तक?  
▪▪▪
जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 अप्रेल, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.