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Tuesday, June 13, 2017

चार देशों में स्त्री की हैसियत का पैना विश्लेषण

पाउलिना पॉरिज़्कोवा एक जानी-मानी सुपर मॉडल रही हैं और उनका उपन्यास अ मॉडल समरखूब पढ़ा गया है. भारत में उनकी अधिक चर्चा नहीं हुई है, लेकिन मुझे हाल में उनका एक लेख पढ़ने को मिला और उसे पढ़ते हुए लगा कि इसके सार को अपने पाठकों के साथ साझा किया ही जाना चाहिए. इस छोटे-से लेख में उन्होंने बहुत ही कुशलता से साथ दुनिया के अनेक देशों में स्त्री की हैसियत को बयान कर दिया है.

पाउलिना मूलत: चेकोस्लोवाकिया की रहने वाली हैं, जहां स्त्री की हैसियत एक दासी जैसी है. दिन भर मेहनत मजदूरी, और शाम को घर लौट कर घर का सारा काम, पति की सेवा और उसके बाद भी उपेक्षा  और अपमान. लेकिन मात्र नौ बरस की  उम्र में जब उन्हें स्वीडन जाना  पड़ा तो वहां उन्हें एक नई ही दुनिया देखने को मिली. स्कूल में उन्हें एक लड़के ने इस बिना पर थोड़ा सताया कि वे एक आप्रवासी हैं, तो तुरंत ही उनकी एक दोस्त ने, जो कद-काठी में बहुत छोटी थी, जम कर उस लड़के की कुटम्मस कर डाली. पाउलिना के लिए यह बात  कल्पनातीत थी  लेकिन उन्हें इस बात से और अधिक आश्चर्य हुआ कि उनकी कक्षा में किसी को भी यह बात असामान्य नहीं लगी. इस एक घटना से उन्हें यह बात समझ में आ गई कि स्वीडन में उनकी हैसियत किसी लड़के से कमतर नहीं है. यह जैसे उनके जीवन का पहला पाठ था. फिर तो उनका ध्यान इस बात पर भी गया कि स्वीडन में घर का काम भी स्त्री-पुरुष मिल-जुल कर करते थे. खुद उनके पिता भी घर की सफाई और खाना पकाने का काम निस्संकोच करने लगे थे. वैसे इसकी एक वजह यह भी थी कि तब तक वे अपनी चेकोस्लोवाकियन  पत्नी को तलाक देकर एक स्वीडिश स्त्री को जीवन साथी बना चुके थे.

पाउलिना हाई स्कूल में पहुंची तो उन्होंने नोटिस किया कि लड़के लड़कियों की तरफ आकर्षित होते हैं, उनके निकट आना चाहते हैं, लेकिन निर्णायक  हैसियत लड़कियों की है. वे चाहें तो उनके अनुरोध को स्वीकार करें, चाहे तो अस्वीकार. और इस एहसास ने खुद उन्हें अपनी निगाहों में ताकतवर बनाया. वहां हाल यह था कि कि अगर कोई लड़की किसी लड़के का प्रणय प्रस्ताव स्वीकार कर लेती तो वह लड़का ईर्ष्या का पात्र बन जाता और इस बात का उत्सव मनाया जाता. लड़की को कोई बुरी निगाह से नहीं देखता था. पाउलिना लिखती हैं कि स्कूल की नर्स बग़ैर कोई सवाल पूछे  मांगने पर गर्भ निरोधक दे दिया करती थी और स्कूल में दी जाने वाली सेक्स एजूकेशन की वजह से वे यौन रोगों और अवांछित गर्भधारण के बारे में काफी कुछ जान गई थीं. सबसे बड़ी बात यह कि उन्हें यह समझ में आ गया था कि स्त्रियां न केवल वह सब कुछ कर सकती हैं जो पुरुष कर सकते हैं, वे ऐसा भी कुछ कर सकती हैं जो पुरुष कभी नहीं कर सकता. वे मां बन सकती हैं. और इस एहसास ने उन्हें महसूस करा दिया कि स्त्रियां पुरुषों से अधिक सामर्थ्य रखती हैं.

लेकिन जब पंद्रह की होने पर वे मॉडलिंग के लिए पेरिस  गईं तो उनका ध्यान इस बात पर गया कि वहां पुरुषों  का बर्ताव स्त्रियों के प्रति कितना भिन्न है! वे आगे बढ़कर स्त्रियों के लिए दरवाज़े खोलते हैं, उनकी डिनर का बिल चुकाने को तत्पर रहते हैं, और कुल मिलाकर यह एहसास कराने की भरसक कोशिश करते हैं कि स्त्रियां बेहद नाज़ुक और इतनी बेवकूफ होती हैं कि वे खुद का खयाल नहीं रख सकती हैं. यहां आकर पाउलिन को खुशी नहीं हुई. लगा जैसे उनके पास जो ताकत थी, उसे ढक दिया गया है! और फिर अठारह की होने पर वे अमरीका जा पहुंचती हैं, एक अमरीकी से उन्हें प्रेम हो जाता है. वहां के बारे में अब तक की उनकी धारणाएं तेज़ी से बदलने लगती हैं. वे एक चिकित्सिका के पास जाती हैं तो वो उनकी देह के बारे में बड़े संकोच से बात करती है. और वहीं उन्हें यह एहसास होता है कि अमरीका में स्त्री की देह पर खुद उसके सिवा सबका हक़ है. उसकी यौनिकता पर उसके पति का हक़ है, खुद अपने बारे में उसकी राय पर उसका नहीं उसके सोशल सर्कल का हक़ है, और उसके गर्भाशय पर सरकार का हक़ है. सब चाहते हैं कि वो एक मां का, एक प्रेमिका का और बहुत कम वेतन पर एक कामकाजी औरत का किरदार निभाये और साथ ही छरहरी और युवा भी बनी रहे. पाउलिना बहुत अर्थपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहती है कि अमरीका में स्त्री को कहा तो यह जाता है कि तुम सब कुछ कर सकती  हो, लेकिन जब वो ऐसा करने की कोशिश  करती है तो उसे धराशायी कर दिया जाता है! और यह सब देख कर उन्हें लगता है कि जिस फेमिनिस्ट शब्द को वे भूल चुकी थीं, उसे फिर से याद कर लेना ज़रूरी है!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 जून, 2017 को फेमिनिज़्म की कसौटी  पर पश्चिमी  देश शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 11, 2016

किस्सा पेरिस के एक अनूठे बुक स्टोर का

हाल ही में पेरिस के बांये किनारे पर स्थित किताबों की एक अनूठी दुकान की रोचक दास्तान चार सौ पृष्ठों की एक किताब का विषय बनी है. शेक्सपियर एण्ड कम्पनी नामक यह दुकान छोटी-सी और जीर्ण-शीर्ण है लेकिन इसकी अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि इसी दुकान ने उस समय जब उसे कोई छापने को तैयार नहीं था,  जेम्स जॉयस की अब अमर हो चुकी कृति यूलिसिस को प्रकाशित करने का जोखिम उठाया था. कहा जाता है कि यह दुकान आधुनिक साहित्य के कुछ सबसे प्रखर लेखकों जैसे अर्नेस्ट हेमिंग्वे, एफ स्कॉट फिट्ज़ेरल्ड, जैक कैरुआक और एलेन गिंसबर्ग का अनौपचारिक बैठक कक्ष, और कभी-कभार तो  उनका शयन कक्ष भी रही है.
इस दुकान का अतीत बड़ा दिलचस्प है. इसके मालिक थे अमरीका में जन्मे जॉर्ज  व्हिटमैन जो सन 2011 में 98 साल की उम्र में दिवंगत होने तक इसी दुकान के ऊपर एक छोटे-से कमरे में रहते थे. उनके लिए यह दुकान महज़ एक व्यापारिक स्थल न होकर और भी बहुत कुछ थी. असल में वे इसे बुकस्टोर के आवरण में एक समाजवादी सपना मानते थे जिसके दरवाज़े हरेक के लिए खुले थे. वे इसे एक सजीव कलाकृति मानते थे. उन्होंने कहा था, “मैंने इस बुकस्टोर को ठीक वैसे ही सिरजा है जैसे कोई लेखक उपन्यास लिखता है. मैंने इसके हर कक्ष को उपन्यास के एक अध्याय की तरह रचा है. मैं चाहता हूं कि लोग इसके दरवाज़ों को वैसे ही खोलें जैसे वे वे किसी किताब को खोलते हैं,  उस किताब को जो उन्हें उनकी कल्पनाओं के जादुई लोक में ले जाती है.” 
वैसे व्हिटमैन इस दुकान के मूल संस्थापक नहीं थे. इस दुकान को इसके वर्तमान ठिकाने के नज़दीक ही सिल्विया बीच नामक एक युवती ने शुरु किया था. उसने 1941 तक इसका संचालन किया. इस साल पेरिस पर नाज़ी कब्ज़े के दौरान अन्य हज़ारों लोगों के साथ सिल्विया को भी नज़रबन्द कर दिया गया. पचास के दशक के उत्तरार्ध  में सिल्विया ने अपनी इस दुकान का मालिकाना हक़  जॉर्ज व्हिटमैन को दे दिया. जॉर्ज सिल्विया से इतने अधिक प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी इकलौती संतान के नामकरण में भी उन्हें याद रखा. वही सिल्विया बीच व्हिटमैन अब 35 बरस की हैं और अपने साथी डेविड डिलानेट के साथ मिलकर इस दुकान को चलाती हैं. डेविड से उनकी पहली मुलाकात इसी दुकान में हुई थीं. सिल्विया का कहना है, मेरा खयाल है कि डेविड जल्दी ही इस बात को समझ गया कि अगर हमें साथ रहना है तो उसे इस दुकान को भी अपनी ज़िन्दगी में शामिल करना होगा. सिल्विया के पिता जॉर्ज द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पेरिस आए थे और यहीं के होकर रह गए. उनके पास खुद की किताबों का इतना बड़ा संग्रह था कि अंतत: उन्होंने किताबों की एक दुकान ही खोल डाली. अपनी डायरी में पचास के दशक में उन्होंने लिखा है, “मेरी तमन्ना है कि मैं कोई ऐसा ठिकाना बना सकूं जहां  से मैं दुनिया के त्रास और सौन्दर्य को एक साथ निहार सकूं.”  और यही कल्पना  उन्होंने शेक्सपियर एण्ड कम्पनी के रूप में साकार की. यहां लेखक अपनी रचनाओं का पाठ करते, डिनर पार्टियां होती और बाद के बरसों में ये जॉर्ज महाशय आगंतुक विशिष्ट जन के साथ अपने पाजामे में या कि उस बेल बूटेदार ब्लेज़र में, जो शायद ही कभी  ड्राइक्लीन हुआ हो, तस्वीरें भी खिंचवाते.
और आहिस्ता-आहिस्ता जॉर्ज का यह ठिकाना दुनिया भर के घुमंतू लेखकों की शरणगाह बन गया. जॉर्ज ऐसे लेखकों को टम्बलवीड्स कहते थे. यानि वे पौधे जो पतझड़ में हवाओं के साथ इधर-उधर भटकते रहते हैं. जॉर्ज कुछ शर्तों पर इन लेखकों को यहां टिकने की इजाज़त देते थे. मसलन, हर लेखक को हर रोज़ दो घण्टे काम करना होगा, साथ ही उसे हर रोज़ कम से कम एक किताब पढ़नी होगी. इन शर्तों को पूरा करने के वादे पर कोई भी लेखक यहां मुफ्त में ठहर  सकता था, किताबों की अलमारियों के बीच फंसाई  गई खाटों में से किसी  पर सो सकता था और पास के सार्वजनिक नल पर जाकर नहा सकता था. दुकान में एक बोर्ड लगा हुआ है जिस पर अंकित है: “अजनबियों के प्रति असत्कारशील न हों, क्या पता कोई देवदूत ही उनका छद्म वेश धर कर चला आया हो.” . और हां, यह बुक स्टोर अपने यहां ठहरने  वाले लेखकों  पर एक और शर्त लागू करता है.  शर्त यह है कि यहां ठहरने के बदले में उन्हें एक पृष्ठ की आत्मकथा लिख कर देनी  होगी, जिसे वे वहां रखे हुए हल्के नीले रंग के कागज़ पर दुकान के टाइपराइटर पर टाइप करके  दे सकते हैं. कहना अनावश्यक है कि शेक्सपियर एण्ड कम्पनी के पास ऐसे हज़ारों पन्नों का विशाल संग्रह है. वस्तुत: इस संग्रह की बहुत सारी रोचक सामग्री ‘द रैग एण्ड बोन शॉप ऑफ द हार्ट’  शीर्षक वाली इस किताब में शामिल की गई है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 अक्टोबर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 21, 2016

फ्रांस से शुरु हुआ नई तरह का जन-आन्दोलन

इस बरस मार्च के आखिरी दिन से फ्रांस की राजधानी पेरिस से एक नई तरह के आन्दोलन का सूत्रपात हुआ है. हिन्दी में इस आन्दोलन को कहा जा सकता है ‘जागो  सारी रात!’ और जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर हो जाता है, हर शाम छह बजते-बजते लोग पेरिस के रिपब्लिक चौक में इकट्ठा होते हैं और विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात कहते हैं. पृष्ठभूमि में यह बात कि   पेरिस  में फरवरी माह में कोई तीन चार सौ लोग मिले और यह विचार करने लगे कि ऐसा क्या किया जाए कि सरकार थोड़े दबाव में आए. और तब एक विचार यह भी आया कि क्यों न लोग एक जगह एकत्रित हों और घर जाएं ही नहीं. बस इसी विचार से जन्मा यह आन्दोलन.   इसकी  शुरुआत हुई फ्रांस के जटिल  श्रम कानून को शिथिल बनाने वाले वहां की वर्तमान सरकार के तथाकथित सुधारवादी कदमों का विरोध करने के लिए लोगों के इकट्ठा होने से. पहला अनुभव बहुत दिलचस्प रहा. लोग पेरिस के उस चौक में इकट्ठा होने ही लगे थे  कि मूसलाधार बारिश होने लगी. इसके बावज़ूद लोग आते रहे और डटे रहे. काफी देर बाद बारिश रुकी, लेकिन लोग फिर भी वहां से गए नहीं. और फिर हर रोज़ लोग वहां जुटने लगे. तब इस आन्दोलन का कोई सुविचारित स्वरूप निर्धारित नहीं  था. चौक में अनगिनत लोग सिर्फ इस आस में इकट्ठा हो गए थे कि सरकार उनकी मांगों की तरफ ध्यान देगी. न आन्दोलन का कोई नेता था और न कोई रूपरेखा. जिसकी जो मर्ज़ी में आए, बोलने लगता था. कुछ अराजक तत्वों के घुस आने की वजह से यदा-कदा यह जमावड़ा छोटी-मोटी हिंसा का शिकार भी हुआ, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता एक व्यवस्था  कायम होने लगी. लोग ही एक दूसरे की मदद करने लगे, संसाधन जुटाने लगे और एक आत्मीयतापूर्ण लेकिन प्रतिरोधक मेले का–सा माहौल बनने लगा.  वक्ताओं के लिए स्टैण्ड आ गया, छोटे-मोटे टैण्ट लगा दिये गए और साधारण काम चलाऊ जलपान की व्यवस्था भी हो गई. कुछ समितियां भी बना ली गई जो समाज और संविधान की नई रूपरेखाओं पर विचार करने लगी हैं. इतना ही नहीं, एक गायक समूह भी तैयार हो गया जो क्रांतिकारी गाने गाता है, और कुछ लोग नारे कविताएं भी रचने लगे हैं. ऐसा लगता है जैसे एक नया लघु समाज उभरने लगा है.


और अब जब इस आन्दोलन  चलते हुए तीन माह से ज़्यादा बीत चुके हैं, इसकी निरंतरता शेष  दुनिया का भी  ध्यान आकर्षित करने लगी है. इस आन्दोलन का बगैर किसी नेतृत्व के इतने समय तक चल जाना यह साबित करता है कि फ्रांस की जनता का अपने राजनीतिज्ञों से मोहभंग  हो चुका है और वहां की वाम सरकार यह साबित करने में नाकामयाब रही है कि वह शक्तिशाली वित्तीय संस्थाओं के दबाब से मुक्त है. लोग  अपने देश के शासन  से भी नाखुश हैं. उनमें से अनेक को लगता है कि वहां आपातकाल जैसे हालात हैं. नागरिकों पर नज़र रखने वाले नए कानून, न्याय व्यवस्था में किए गए बदलाव और सुरक्षा विषयक धर-  पकड़ का बढ़ते जाना लोगों को आहत कर रहा है.  अब यह आन्दोलन पेरिस और फ्रांस की सीमाओं से बाहर निकलकर बेल्जियम, जर्मनी और स्पेन के अस्सी  से ज़्यादा शहरों में फैल चुका है. जर्मनी से बाहर के देशों में इसी तरह के आन्दोलन के माध्यम से सरकारी बजट में कटौती, वैश्वीकरण, बढ़ती जा रही असमानता, निजीकरण और यूरोप महाद्वीप की कठोर प्रवासी  विरोधी नीतियों का विरोध  हो रहा है. किसी ने बहुत सही टिप्पणी की है कि इस जन-प्रतिरोध की शुरुआत पेरिस में नहीं हुई है और न यह फ्रांस तक सीमित रहने वाला है. यह आन्दोलन सीमा रहित है, देशों की परिधियों से मुक्त है और  जो भी इससे जुड़ना चाहते हैं उन सबका स्वागत करता है.

इस आन्दोलन का खुद-ब-खुद शुरु होना और इतने समय तक न सिर्फ जारी रहना बल्कि मज़बूत भी होते जाना इस बात की भी गवाही देता है कि अगर दुनिया में कहीं वास्तविक बदलाव आया तो उसके वाहक नागरिक गण ही होंगे. बहुत दिलचस्प  बात यह है कि अभी तक इस आन्दोलन का न  तो कोई नेता है और किसी संगठन का बैनर यहां दिखाई देता है. यह बात खुद फ्रांस वासियों को चकित करती है. इस स्वत: स्फूर्त आन्दोलन की एक महती कामयाबी यह भी है कि फ्रांस सरकार इसका नोटिस लेने को विवश हुई है और उसने युवा आन्दोलनकारियों के तात्कालिक तुष्टिकरण के लिए चार पाँच सौ मिलियन यूरो की विद्यार्थी सहायता की घोषणा कर दी है. एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार इस राशि से रोज़गार की तलाश कर रहे युवा स्नातकों  को अनुदान और  अन्य काम सीखने वालों व विद्यार्थियों को सहायता दी जा सकेगी.      


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 जून, 2016 को इसी शीर्षक  से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 14, 2016

बिना काम वेतन मिलने से दुःखी यह प्राणी

आम तौर पर हर नौकरी करने वाले की एक ही शिकायत होती है कि उससे बहुत ज़्यादा काम लिया जा रहा है. इसी शिकायत को हमारे ‘ये बेचारा काम के बोझ का मारा’ जैसे विज्ञापन भी अपना अप्रत्यक्ष समर्थन देते हैं. लेकिन हाल में सुदूर पेरिस में एक कामगार फ्रेडरिक डेस्नार्ड ने इससे भिन्न ही शिकायत की है. बहुत महंगे परफ्यूम्स के लिए विख्यात पेरिस की एक कम्पनी में दिसम्बर 2006 से काम कर रहे और वहां 2010 से 2014 के बीच जनरल सर्विस डाइरेक्टर रहे डेस्नार्ड का कहना है कि कम्पनी उनसे बिना कोई काम लिये चार हज़ार डॉलर प्रतिमाह का भुगतान करती रही. पैसा तो उन्हें  ठीक मिल रहा था, लेकिन केवल इतने भर से वो संतुष्ट नहीं थे. डेस्नार्ड ने अपने वकील की मार्फत कम्पनी पर आरोप लगाया है कि हालांकि वे एक वरिष्ठ प्रबन्धकीय पद पर नियुक्त थे, उनके  वरिष्ठ जन उन्हें  बॉय कहकर बुलाते और उनसे  अपने बच्चों को खेल के मैदान से लाने जैसे बहुत छोटे-मोटे निजी काम करवाते. बाद में तो उनके  पास करने को इतना कम काम रह गया कि उनके  बॉस ने उनसे यह कह दिया कि वो घर चले जाएं,  जब उन्हें ज़रूरत होगी वे वे बुला लेंगे, और फिर उन्होंने बुलाया ही नहीं. डेस्नार्ड का आरोप है कि उनसे  कम काम  लेने की यह प्रक्रिया उन्हें  नरक में धकेलने का एक छद्म थी और यह उनके  लिए दु:स्प्वन साबित हुई. इससे उन्हें कई किस्म की स्वास्थ्य समस्याएं होने लगीं जिनमें अल्सर, नींद की समस्या और गहन अवसाद शामिल हैं. इन्हीं समस्याओं के चलते वे  मिर्गी का दौरा पड़ने से एक कार दुर्घटना का शिकार हुए, काफी दिनों तक कोमा में रहे और  फिर उन्हें छह माह से भी ज़्यादा समय सिक लीव पर रहना पड़ा. सन 2014 में इस सिक लीव पर रहते हुए ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया.

डेस्नार्ड ने इस मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य क्षति के लिए तथा उन्हें न मिल सकी पदोन्नति की वजह से  हुई क्षति की एवज में कम्पनी से चार लाख डॉलर का हर्ज़ाना मांगा है. डेस्नार्ड ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए यह भी कहा है कि हालांकि अपनी नौकरी के काल में उन्हें बहुत कम काम देकर नैतिक और विशेष रूप से शारीरिक रूप से भी नष्ट किया जा रहा था फिर भी वे बिना किसी शिकायत के वहां बने रहे क्योंकि उन्हें पता था कि नौकरियों के लिहाज़ से बाज़ार बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा था. डेस्नार्ड ने अपनी अवस्था के लिए एक नूतन अभिव्यक्ति ‘बोर आउट’ का प्रयोग किया है. असल में एक प्रचलित अभिव्यक्ति है ‘बर्न आउट’ जिसका आशय है किसी को बहुत ज़्यादा काम के बोझ के नीचे कुचल डालना. डेस्नार्ड की यह अभिव्यक्ति इसी का विलोम है, जिसका अभिप्राय यह  है कि किसी को बहुत कम काम देकर नष्ट कर डालना. डेस्नार्ड के वकील का कहना है कि ‘बोर आउट’ को काम की कमी की वजह से होने वाले नैतिक शून्यीकरण के रूप में समझा जा सकता है जिसके मूल में यह विचार होता है कि मुझे कुछ नहीं करने के एवज़ में इतना पैसा दिया जा रहा है.


डेस्नार्ड के वकील ने आरोप लगाया है कि कम्पनी की  तो नीयत ही यही थी कि डेस्नार्ड को इतना बोर कर डाला जाए कि वह खुद नौकरी छोड़ दे ताकि कम्पनी उसे काम से निकालने पर देने वाले बेरोज़गारी भत्ते  या और किसी भी तरह के मुआवज़े के भुगतान से बच जाए. इस वकील ने कहा कि शुरु-शुरु में तो डेस्नार्ड को ऐसा आदर्श कर्मचारी माना जाता था जो अपने काम के प्रति पूर्णतया समर्पित है. लेकिन 2009 से उसको दिए जाने वाले काम में कटौती की जाने लगी और फिर 2012 में जब कम्पनी के हाथ से एक बड़ा अनुबंध फिसल गया और कम्पनी अपने बहुत सारे कर्मचारियों को काम से निकालने पर मज़बूर होने लगी तब से उसके पास करने को कुछ रह ही नहीं गया. डेस्नार्ड की इस शिकायत पर स्वाभाविक ही उनकी नियोजक कम्पनी ने अपना बचाव किया और कम्पनी के वकील ने कहा कि अगर ऐसा था तो डेस्नार्ड अपने उच्चाधिकारियों से या किसी कर्मचारी संगठन से इस बारे में कोई शिकायत क्यों नहीं की.

कहा जा रहा है कि डेस्नार्ड का यह केस फ्रांस में अपनी तरह का पहला केस है, हालांकि वहां की अर्थव्य्वस्था बहुत बुरे दौर से गुज़र रही है. एक शोधकर्ता ने बताया है कि लगभग तीस प्रतिशत फ्रेंच कर्मचारी इसी तरह के बोर आउट अवसाद के शिकार हैं. यह भी एक तथ्य है कि अभी तक फ्रेंच कानून में इस अभिव्यक्ति बोर आउट को कोई स्वीकृति नहीं है.

देखना है कि फैसला किसके हक़ में आता है – डेस्नार्ड के या कम्पनी के!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 14 जून, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.