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Tuesday, June 25, 2019

लड़कियां शादी के बाद सरनेम नहीं बदलना चाहती हैं !


दुनिया के ज़्यादातर समाजों और देशों में यह चलन है कि विवाह के बाद लड़की अपना कुलनाम (सरनेम)  बदल कर अपने पति का कुलनाम अपना लेती है. उदाहरण के लिए मेरी पत्नी विवाह पूर्व अपने पिता का कुलनाम गुप्ता प्रयुक्त करती थीं,  विवाहोपरान्त वे गुप्ता नहीं, अग्रवाल कुलनाम काम में लेने लगीं. भारत जैसे परम्परा प्रधान देश में इस बात का अपवाद वे लोग रहे जो कला संस्कृति आदि के ऐसे क्षेत्रों में कार्यरत थे या हैं जहां कुलनाम बदलने से पहचान का संकट पैदा हो सकता था. यही कारण है  कि कथाकार मन्नू भण्डारी (राजेंद्र यादव से विवाह के बाद भी) मन्नू यादव नहीं हुईं या सुधा अरोड़ा सुधा भाटिया नहीं हुईं. वैसे सबने ऐसा नहीं किया. बहुतों ने परम्परा का अनुसरण भी किया. लेकिन जैसे-जैसे नया सोच प्रमुखता पाने लगा, इस बात पर सवाल उठाये जाने लगे कि आखिर लड़की ही क्यों अपना कुलनाम बदले? इस सवाल का  सकारात्मक जवाब देते हुए कुछ पुरुषों ने भी विवाहोपरान्त अपना कुलनाम  बदल पत्नी का कुलनाम अंगीकार किया, और कुछ स्त्रियों ने समझौते का मार्ग अपनाते हुए अपना विवाहपूर्व का कुलनाम बरक़रार रखते हुए उसके साथ पति का कुलनाम भी जोड़ लिया. इस तरह कुछ स्त्रियों ने एक की बजाय दो कुलनाम धारण कर अपने विवाह पूर्व  के कुलनाम को भी अपने साथ जोड़े रखा. इसका एक उदाहरण अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा के नाम में देखा जा सकता है. लेकिन बहुतों के लिए दो कुलनाम  अपना लेना भी स्त्री पुरुष समानता का परिचायक नहीं है. यहां एक सवाल यह भी उठता है कि पुरुष और स्त्री में से किसका कुलनाम पहले प्रयुक्त किया  जाए, और क्यों! एक व्यावहारिक दिक्कत भी इसमें है  और वह यह कि जैसे जैसे वंश आगे बढ़ता जाएगा, नाम के साथ और कुलनाम  जुड़ते जाएंगे और पांच सात पीढ़ियों के बाद तो नाम इतना लम्बा हो जाएगा कि लेख जैसा लगने लगेगा.

भारत में भले ही यह सवाल बहुत अहम न हो, पश्चिम में, जहां से स्त्री मुक्ति और स्त्री समानता का वर्तमान  विमर्श सारी दुनिया में फैला है वहां इस समस्या के नए नए समाधान खोजे जा रहे हैं और उन पर चर्चाएं भी खूब हो रही हैं. हाल में वाशिंगटन डी.सी. अमरीका की एक बत्तीस वर्षीया चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव शैरॉन गोल्डबर्ग ने जब योनाथन क्विक से विवाह करने का निर्णय किया तो उन दोनों ने इस मसले पर खूब गहनता से विचार विमर्श किया. उनके इस विमर्श की परिणति  इस बात में हुई कि विवाह के बाद वे दोनों अपने-अपने वर्तमान कुलनाम त्याग कर एक नए कुलनाम गोल्डक्विक का प्रयोग करने लगेंगे. ज़ाहिर है कि यह नया कुलनाम उन दोनों के वर्तमान कुलनामों का मिश्रण है. उनका सोच यह है कि अंतत: विवाह भी तो एक नए परिवार  का सृजन है, तो फिर नया कुलनाम भी क्यों न सृजित कर लिया जाए! वैसे विवाह के बाद स्त्री पति का नाम अपनाये या नहीं, इस बात को लेकर अमरीकी समाज में पर्याप्त खुलापन पहले से विद्यमान रहा है लेकिन यह खुलापन कुलनाम को अपनाने या न अपनाने तक ही सीमित रहा है. दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम रचने का यह सिलसिला अपेक्षाकृत नया है. इस बदलाव को एक और नव विवाहित युगल ने कुछ दूसरे अंदाज़ में अपनाया है. रैचेल एकॉफ ने जब ली लेविटर से विवाह किया तो उन दोनों ने अपने-अपने कुलनाम बरक़रार रखे, लेकिन यह तै किया कि उनके बच्चे एक नए कुलनाम का प्रयोग करेंगे. यह कुलनाम होगा – लेविकॉफ जो ज़ाहिर है कि इन दोनों के कुलनामों को मिलाकर बनाया गया है.

मां-बाप के कुलनाम बाद वाली पीढ़ियां भी काम में लें, यह रिवायत इंगलैण्ड में बारहवीं शताब्दी के आसपास चलन में आई थी. असल में तब वहां बहुत थोड़े से नाम चलन में थे और इस कारण किसी छोटे-से गांव में पंद्रह बीस रॉबर्ट और तीस-चालीस जेम्स मिल जाया करते थे. एक रॉबर्ट को दूसरे से अलग करके पहचानने और सम्पत्ति का सही उत्तराधिकारी निर्धारित करने के लिए कुलनाम की ज़रूरत पड़ी. अब क्योंकि स्त्रियों  को भी सम्पत्ति ही माना जाता था, वे भी पति का कुलनाम धारण करने लगीं.

लेकिन दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम बनाने से भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है. इसलिए नहीं हो रहा है कि बहुत सारे पुरुष (और स्त्रियां  भी) अपने वर्तमान कुलनाम से इतना गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं कि वे उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. जो लोग बहुत सम्पन्न या अत्यधिक प्रतिष्ठित हैं वे भी इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि जिस कुलनाम से उनकी प्रतिष्ठा प्रदर्शित  होती है उसे छोड़ दें. भला कोई टाटा-बिड़ला-अम्बानी-बच्चन अपना कुलनाम कैसे छोड़ सकता है? फिर नया कुलनाम अपनाने की एक व्यावहारिक कठिनाई भी नज़र अंदाज़  नहीं की जा सकती है. कठिनाई यह कि अमरीका जैसे देशों में एक कुलनाम को त्याग कर दूसरा कुलनाम अपनाना खासा झंझट का और खर्चीला काम है.

लेकिन इन तमाम उलझनों  और असुविधाओं के बावज़ूद स्त्री समानता के पक्षधर पुरानी रिवायत को ज़ारी रखने को तैयार नहीं हैं. वैसे भी, बदलाव तो आहिस्ता-आहिस्ता ही होता है. क्या पता दो-चार सौ बरसों बाद कुलनाम लुप्त ही हो जाएं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गगत मंगलवार, 25 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 2, 2014

कितनी गिरहें अब बाकी हैं!

हरियाणा के सोनीपत ज़िले की दो लड़कियों की खूब चर्चा हो रही है. मैं सोच रहा हूं कि आखिर हम कैसे समय और समाज में जी रहे हैं कि लड़कियों को यह सब करना पड़ रहा है! क्या उनकी ज़िन्दगी सतत संघर्ष का ही पर्याय नहीं है? कौन ज़िम्मेदार है इसके लिए? दो लड़कियां कहीं जाने के लिए बस अड्डे पर पहुंचती हैं और तीन लड़के उनके साथ बदतमीज़ी करना शुरु कर देते हैं. लड़कियां मना करती हैं तो उनकी बदतमीज़ी और बढ़ जाती है. चलती बस में भी यह बदसुलूकी जारी रहती है. सब मूक दर्शक बने रहते हैं. बस, एक लड़की विरोध करने की कोशिश करती है तो लड़के उसके साथ भी बतदमीज़ी से पेश आते हैं. इन दोनों लड़कियों के साथ वे लड़के मारपीट भी करते हैं. लेकिन बस का कोई यात्री उन्हें नहीं रोकता! आखिर इन लड़कियों में से ही एक अपना बेल्ट खोल कर उनको मारती और अपनी रक्षा करती है.

इस प्रकरण की कोई बहुत बुरी परिणति भी हो सकती थी. निर्भया  प्रकरण अभी भी हमारी यादों में ताज़ा है. अब इन लड़कियों और इनके परिवार वालों पर दबाव पड़ रहा है कि ये उन लड़कों को ‘माफ़’ कर दें! पंचायत भी बीच में आ गई है. वही सब जीवन नष्ट हो जाने वगैरह  की बातें. जीवन लड़कों का ही तो होता है! लड़कियों का भला क्या जीवन? वे पैदा ही क्यों होती हैं? दूधों नहाओ पूतों फलो वाले देश में भला लड़कियों की क्या ज़रूरत है? ये इतने सारे सोनोग्राफी केन्द्र आखिर किस दिन काम आएंगे? लिंग परीक्षण पर सरकारी रोक है तो क्या हुआ? चांदी का जूता है न अपने पास! और सोनोग्राफी नहीं तो और बहुत सारे तरीके भी हैं... और फिर भी बेशर्म अगर इस दुनिया में आ जाए तो उसका जीना मुहाल करने के अनगिनत तरीके हैं हमारे पास. घर में उसके साथ भेद भाव, स्कूल में भेद भाव और फिर सार्वजनिक जगहों पर यह सब. शादी के लिए दहेज की लम्बी चौड़ी मांग और फिर ससुराल में प्रताड़नाओं और यातनाओं का अंतहीन सिलसिला. बेशक इनके अपवाद भी हैं, लेकिन अपवादों के बावज़ूद यह एक बड़ा यथार्थ है. ठीक ही तो लिखा था राष्ट्रकवि ने – अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी! आंचल में है दूध और आंखों में पानी! और महाकवि जयशंकर प्रसाद ने भी तो उसे ‘केवल श्रद्धा’ कहकर अलमारी में ही सजाया था, ठीक वैसे ही जैसे बहुत पहले का मनु स्मृति का एक आप्त वाक्य हमने आड़े वक्त काम आने के लिए संजो रखा है – यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते  तत्र देवता:
शायद कुछ लोगों की आत्मा को इस बात से बड़ी शांति मिले कि महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार के मामले में हम अकेले नहीं हैं. हाल ही में सुदूर जर्मनी में भी एक लड़की को लड़कों की बदतमीज़ी का विरोध करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. इस 23 साल की लड़की टुगसी अलबायर्क ने फ्रैंकफर्ट के पास ऑफनबाख में एक रेस्टोरेंट के शौचालय से लड़कियों के चिल्लाने की आवाज़ें सुनीं. उसने जाकर देखा कि वहां कुछ लोग दो लड़कियों से छेड़छाड़ कर रहे थे. टुगसी ने  इनका विरोध किया. बाद में इनमें से एक आदमी ने कार पार्किंग में टुगसी अलबायर्क के सिर पर पत्थर या बल्ले से हमला कर दिया. इस हमले के बाद वो अचेत हो गईं. डॉक्टरों ने उनके दिमाग को मृत घोषित कर दिया और कहा कि अब वो भी नहीं उठेंगी. कुछ समय उन्हें जीवन रक्षक उपकरणों पर रखा गया लेकिन फिर उनके परिवार वालों की इच्छा पर उन उपकरणों को हटा  लिया गया और अब टुगसी इस दुनिया में नहीं हैं. जर्मनी के राष्ट्रपति योआखिम गाउक ने इस छात्रा को औरों के लिए आदर्श बताया है.
इससे मेरा ध्यान इस बात की तरफ जाए बग़ैर नहीं रह रहा है कि हर छोटी बड़ी बात पर अपने मुखारविंद से कुछ न कुछ उवाचने वाले हमारे नेतागण हरियाणा की इन लड़कियों की बहादुरी पर मौन क्यों हैं? क्या इसलिए कि वे एक वर्चस्ववादी और रूढिबद्ध समाज को नाराज़ करने का ख़तरा नहीं उठाना चाहते? ये वे ही लोग हैं जो किसी न किसी बहाने से महिला आरक्षण बिल को रोके हुए हैं! ये वे ही लोग हैं जो आए दिन महिला विरोधी अटपटे बयान देते रहते हैं. कभी इन्हें उनके वस्त्रों से आपत्ति होती है कभी उनके बाहर निकलकर नौकरी करने से और कभी समानता की मांग से.

लेकिन इन सबके बावज़ूद, यह भी एक यथार्थ है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों में औरत हमारे समाज में संघर्ष करती हुई आगे बढ़ रही है. गुलज़ार ने ठीक ही तो लिखा है: कितनी गिरहें खोली हैं मैने/ कितनी गिरहें अब बाकी हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 दिसम्बर, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.