Showing posts with label कुन्नूर. Show all posts
Showing posts with label कुन्नूर. Show all posts

Tuesday, May 27, 2014

अनेकता में एकता का देश हमारा

हम सबने अपनी अपनी पाठ्य पुस्तकों में भारत की अनेकता में एकता की बातें पढ़ी हैं, लेकिन इसका सही अनुभव तो अपने जाने-पहचाने प्रदेश से बाहर निकलने पर ही होता है.   खान-पान, बोली-चाली, पहनावा, रीति रिवाज़, जीवन जीने का ढंग – सब कुछ तो अलग मिलता है आपको. खुद मुझे इस बात की बहुत तीव्र अनुभूति अपनी हाल की ऊटी-कुन्नूर की एक छोटी-सी यात्रा में हुई. ऊटी के लिए यहां बैंगलोर में सुबह जल्दी घर से निकले और इस महानगर की सीमा से बाहर आते ही जैसी गंध नथुनों में भरने  लगी, जैसे पेड़ पौधे फूल पत्तियां दिखाई देने लगे, जैसे चेहरे और पहनावे  नज़र आने लगे, वे सब मेरे वास्ते नए थे.  और जैसे  इतना ही काफी न हो, सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में कहूं तो यह प्रकृति परिवेश पल-पल बदल रहा था. जैसे पेड़ पौधे अभी देखे, कुछ ही देर बाद उनसे एकदम अलग पेड़ पौधे मिल रहे थे. दक्षिण की एक सुपरिचित श्रंखला के रेस्तरां में नाश्ते के लिए रुके तो वहां वो कुछ भी नहीं था जो आम तौर पर हम नाश्ते में लेने के आदी हैं. बल्कि वो भी नहीं, जिसे हम ‘साउथ इण्डियन फूड’ के नाम से जानते हैं. अलबत्ता उससे मिलता-जुलता ज़रूर. कुछ और आगे जाने पर बच्चों की फरमाइश पर एक विदेशी श्रंखला वाले रेस्तरां में रुके तो वहां सब कुछ स्टैंडर्ड था. यानि कश्मीर से कन्याकुमारी तक, बल्कि देश से बाहर भी   उनकी श्रंखला में वही के वही उत्पाद आप पा सकते हैं. असल में भारतीय जीवन शैली और पाश्चात्य जीवन शैली का यही तो बहुत बड़ा फर्क़ है – कि हम अपनी विविधता  के साथ जीने का आनंद लेते हैं जबकि वे दुनिया की सारी विविधता को कुचल कर एकरस कर देना चाहते हैं.

हम लोग पहले कुन्नूर गए.  कुन्नूर और उसके आसपास देखने को खूब है और हमें यह भी बहुत अच्छा लगा कि कुन्नूर अभी  उस भीड़-भाड़ और अस्त व्यस्तता से काफी हद तक बचा हुआ है जिसके शिकार हमारे ज़्यादातर पर्यटन केन्द्र हो चुके हैं. असल में इस बात का त्रासद एहसास तो हमें अपनी  इस यात्रा के तीसरे दिन ऊटी पहुंच कर हुआ. एक तो रविवार और फिर वहां चल रहे ग्रीष्मकालीन फेस्टिवल के दौरान पुष्प प्रदर्शनी का आखिरी दिन. पूरा कस्बा गाड़ियों और पर्यटकों के अन्य छोटे-बड़े वाहनों से खचाखच भरा हुआ. पैदल चलने वालों के वास्ते तो कोई जगह ही नहीं. और गाड़ियां भी चल नहीं रहीं, रेंग रही. हमने भी जाने किस कुबेला में ऊटी के सर्वोच्च शिखर डोड़ाबेट्टा जाने का फैसला कर लिया. कोई दस किलोमीटर का सफर तीन घण्टों में तै कर जब हम इस शिखर पर पहुंचे तो वहां देखने को नरमुण्ड और सुनने को छोटी-मोटी चीज़ें बेचने वालों की आवाज़ों के सिवा और कुछ नहीं था. पार्किंग की मारा-मारी, भयंकर गन्दगी. लगा कि जितनी जल्दी यहां से भाग  निकलें, अच्छा रहे. और वही किया भी. डेढ घण्टे में नीचे आए और पेट पूजा के लिए रेस्तरां खोजने लगे तो फिर जगजीत की गाई वो गज़ल गुनगुनाने को मज़बूर होना पड़ा – हर तरफ बेशुमार आदमी. जैसे तैसे खाना खाया, ऊटी से भागे और बीस-तीस किलोमीटर दूर आकर चैन की एक लम्बी सांस ली.

तमाम खूबसूरत  विविधताओं का मज़ा कुछ चीज़ें किरकिरा करती हैं, और हर जगह करती हैं. हमारे सारे पर्यटन केन्द्र वहां आने वालों की बढ़ती जा रही भीड़ से त्रस्त हैं और जिन लोगों पर  उनकी देखरेख का दायित्व है वे इस त्रास को कम करने के लिए कुछ भी करते दिखाई नहीं दे रहे हैं. परिणाम  यह कि पर्यटन स्थल सुख चैन की बजाय अशांति और आपाधापी दे रहे हैं. आप किसी भी पर्यटन स्थल पर चले जाएं, सफाई नाम की चीज़ आपको ढूंढे से भी नहीं मिलेगी. पीने  का पानी तो अब  सुलभ कराना बन्द ही कर दिया गया है (बोतल खरीदिये और प्यास बुझाइये!) साफ सुथरे शौचालय भी मुश्क़िल से मिलते हैं. क्या पर्यटन का काम करने वालों को पर्यटकों की इस ज़रूरत का कोई अनुमान नहीं होता है?

इधर दक्षिण में एक और बात  का बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ. यहां आपको सब जगह तमाम निर्देश और सूचनाएं यहां की प्रांतीय भाषाओं  में लिखी मिलती हैं. प्रांतीय भाषाओं के प्रोत्साहन की बात अपनी जगह ठीक हो सकती है, लेकिन इससे अन्य भाषा भाषियों को  जिन कठिनाइयों से रूबरू होना पड़ता है उनके बारे में भी ज़रूर सोचा जाना चाहिए. बहुत सारी जगहों पर एक-सा कुछ लिखा हुआ देखकर जब मैंने एक स्थानीय से जानना चाहा कि यह क्या लिखा हुआ है तो उसने बताया कि ‘फूल तोड़ना मना है!’  क्या यही बात  छवि के माध्यम से नहीं कही जा सकती थी?  
इन पर्यटन स्थलों पर घूमते हुए मुझे अपने देखे विदेशी पर्यटन स्थल भी याद आते रहे. वहां हर पर्यटन स्थल पर उससे जुड़े स्मृति चिह्न, जैसे की रिंग, गिलास, नेल कटर,  चाय के कोस्टर, टी शर्ट, टोपियां, वगैरह ज़रूर मिलते हैं और जिन्हें बतौर यादगार पर्यटक खरीदकर अपने साथ ले जाते हैं. हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता? इसमें तो सरकार को भी कुछ नहीं करना है! हर पर्यटन स्थल पर वहां की प्रामाणिक जानकारी देने वाला खूब साहित्य (प्राय: निशुल्क) मिल जाता है. क्या हमारे यहां इस दिशा में कोई कुछ नहीं कर सकता? और आखिरी बात यह कि अब जबकि हार हाथ में मोबाइल है, और  उसमें स्टिल और वीडियो  दोनों तरह के कैमरे हैं, फोटोग्राफी वर्जित है या कैमरा शुल्क इतने रुपये का क्या मतलब है?

●●●





लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 27 मई, 2014 को किंचित संशोधित रूप में जब मुश्क़िलों ने किरकिरा किया सफर का मज़ा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.