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Tuesday, August 12, 2014

चौंको, जल्दी चौंको!

इधर राजकुमार हिरानी की नई फिल्म ‘पीके’  के लिए आमिर खान के एक पोस्टर को लेकर जो घमासान मचा हुआ है वह बड़ा दिलचस्प है. वैसे यह बात सभी जानते हैं कि आमिर खान हर बार कुछ ऐसा कर जाते हैं कि लोग चौंक पड़ते हैं, इसलिए नई फिल्म ‘पीके’  के इस पोस्टर को भी उसी  तरह लिया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अपनी प्रतिक्रिया देने से भला कैसे रोका जा सकता है? वैसे यह पोस्टर है सीधा सादा. इसमें मिस्टर परफेक्ट एक रेल की पटरी के बीचों बीच अपनी आकर्षक देह को दिखाते हुए खड़े हैं. देह पर, जैसा मुहावरे की भाषा में कहा जाता है, एक धागा तक नहीं है. उन्होंने अधोवस्त्र धारण कर रखा है या नहीं, इस बारे में निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है. इसलिए नहीं कहा जा सकता है कि आमिर खान ने पुराने ज़माने वाला एक  कैसेट प्लेयर अपने दोनों हाथों में थाम रखा है. अब वे उसे हटायें तो पता चले कि उन्होंने किस ब्राण्ड का अण्डरवियर पहन रखा है, या वे अपनी बर्थडे पोशाक में ही हैं. ज़ाहिर है कि इस तस्वीर का कोई न कोई सम्बन्ध उस ‘पीके’  नामक फिल्म से ज़रूर होगा. क्या है यह जानने की उत्सुकता इस पोस्टर ने बढ़ा दी है.

वैसे, इस पोस्टर को देखकर सबसे पहले तो मुझे उस भले और भोले आदमी की याद आ गई जिसके बारे में हम अपने बचपन में खूब सुना करते थे. अरे वही भला और भोला आदमी जो एक ही फिल्म को बारहवीं या तेरहवीं दफा देखते हुए पकड़ा गया था और जिसने पूछने पर बताया था कि इस फिल्म में एक दृश्य है जिसमें नायिका नदी पर स्नान करने जाती है और वह जैसे ही अपने कपड़े उतारने लगती है, कम्बख़्त ट्रेन बीच में आ जाती है. वह भला और भोला इंसान इस उम्मीद में उस फिल्म को बार-बार देखने जाता रहा कि कभी तो ट्रेन लेट होगी. लेकिन अब समय बहुत बदल गया है. भोलापन बीते ज़माने की बात  हो गया है. अब कोई इस  बात का इंतज़ार नहीं करने वाला कि कभी तो आमिर का हाथ दुखेगा और वो अपने कैसेट प्लेयर को नीचे रखेगा, या और कुछ नहीं तो उसकी बैट्री ही बदलने की ज़रूरत पड़ जाएगी, और तब अपने आप पता चल जाएगा कि कैसेट प्लेयर के पीछे क्या है!

इस पोस्टर पर जो शोर-शराबा  है, मुझे लगता है कि उसके मूल में यही मासूमियत का खो जाना है, वरना तो इसमें आपत्तिजनक जैसा कुछ भी नहीं है. इसमें कोई आपत्तिजनक नग्नता नहीं है. हां, हो सकता है कि रेल की पटरियों के बीच खड़ा रहना आपत्तिजनक और शायद ग़ैर कानूनी हो, लेकिन मेरे खयाल से इस एंगल से किसी ने भी इस  पोस्टर को नहीं देखा है. हुआ यह है कि शोर  करने वालों ने कल्पना कर ली है कि आमिर खान ने इस कैसेट प्लेयर को अपनी नग्नता के आवरण  के तौर पर इस्तेमाल किया है, यानि उन्होंने कल्पना कर ली है कि कैसेट प्लेयर के पीछे क्या है! इस बात पर क्या आपको जाकी रहनी भावना जैसी वाली बात याद नहीं आती? या याद तो आती है, लेकिन इस सन्दर्भ में नहीं आती. वो तो तभी याद आती है ना जब हमें लगता है कि किसी भले इंसान को बेवजह आरोपित किया जा रहा है. यहां मामला दूसरा है. हमने मान लिया है कि कोई फिल्मी शख़्स इस तरह खड़ा है तो ज़रूर कहीं पीछे से गुरदास मान की आवाज़ भी आ ही रही होगी – मामला गड़बड़ है!

मैं बात मासूमियत के खो जाने की कर रहा था. कभी आप इस पोस्टर  को किसी बहुत छोटे बच्चे को दिखा कर देखें. क्या उसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होगी जैसी हममें से बहुतों की है? क्या वह भी इस पोस्टर को देखकर पूछेगा कि ये अंकल नंगू फंगू क्यों खड़े हैं? पक्की बात है कि वो ये सवाल नही पूछेगा क्योंकि उसकी मासूमियत अभी बरक़रार है. उसके मन में यह बात जमी हुई है कि इतने बड़े  अंकल ने कुछ न कुछ तो पहन ही रखा होगा, लेकिन वो कैसेट प्लेयर के पीछे  छिप गया है. एक और बात है. असल में जब हम किसी तस्वीर को देखते हैं तो सिर्फ उसी को नहीं देखते हैं. उसके साथ पूरा एक सन्दर्भ  हमारे मन में नेपथ्य में चलता है. यहां वही हो रहा है. देख तो हम तस्वीर को रहे हैं, लेकिन साथ में हमारा दिमाग हमें यह फीडबैक भी देता चल रहा है कि देखो ऐसी तस्वीर तुम्हें चौंकाने के लिए दिखाई जा रही है, इसलिए चौंको, जल्दी चौंको! (रघुवीर सहाय मुझे माफ़ करेंगे!) और हम चौंक जाते हैं! और यही उनकी कामयाबी है जिन्होंने हमें यह तस्वीर दिखाई है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 अगस्त, 2014 को मिस्टर परफेक्ट का अनोखा अंदाज़, चौंको जल्दी चौंको शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.