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Tuesday, September 30, 2014

तबादलों की दुनिया का अंतरंग

राजस्थान में पिछले चौदह महीनों से तबादलों पर लगी रोक को हटा लिया गया है और अपने वर्तमान पदस्थापन से असंतुष्ट सरकारी कर्मचारियों को एक बार फिर आस बंध गई है. राज्य के ज़्यादातर सरकारी विभागों में औपचारिक रूप से कोई तबादला नीति नहीं है और बावज़ूद इस बात के कि राज्य कर्मचारियों को राजनीतिक संलग्नता की अनुमति नहीं है,  करीब-करीब सारे ही तबादले राजनीतिक आकाओं की मनमर्जी और कृपा से ही होते हैं.

अपनी लम्बी सरकारी नौकरी के आखिरी तीन सालों में मुझे सरकार के तबादला तंत्र को न केवल भीतर से देखने, उसका एक हिस्सा बनने का भी मौका मिला, और अब क्योंकि उस बात को समय बीत चुका है, कुछ अनुभव साझा करना अनुपयुक्त नहीं होगा. अपने इस कार्यकाल में मुझे दो मंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला, जो समान सरनेम के बावज़ूद अपने आचरण में एक दूसरे से एकदम अलहदा थे. जिन पहले वरिष्ठ मंत्री के साथ मैंने काम किया वे तबादलों में बहुत कम रुचि रखते थे और सारा दायित्व हम प्रशासनिक अधिकारियों पर छोड़ कर आश्वस्त रहते थे. अलबत्ता वे किसी भी तबादला या पदस्थापन प्रस्ताव के औचित्य के बारे में पूछ कर हमारी सदाशयता की जांच ज़रूर कर लेते थे. कम से कम तबादले हों इस बात की उनकी इच्छा का एक ही उदाहरण देना चाहूंगा. मेरे पास मुख्य मंत्री कार्यालय से कुछ तबादलों के लिए बार-बार सन्देश आ रहे थे. मैंने जब अपने मंत्री जी को इस बाबत बताया तो उन्होंने बेलौस अन्दाज़ में कहा कि अबके जब वहां से कोई सन्देश आए तो आप साफ कह दें कि मंत्री जी ने मना कर रखा है.

इनके बाद जिन दूसरे मंत्री जी के साथ काम करने का मौका मुझे मिला, उनकी रुचि सिर्फ तबादलों में थी. मंत्री जी के यहां ही सारी सूचियां बनती, बाकायदा फाइल पर हमें आदेश मिलता और यथानियम अनुपालना कर दी जाती. हमें कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं थी. यथाप्रस्तावित – सरकारी शब्दावली का यह शब्द हमारे लिए पर्याप्त था. ज़ाहिर है कि इतने सारे तबादले अपने साथ बहुत सारा अपयश भी लाते हैं. लेकिन उन दिनों अपने सुलझे हुए उच्चाधिकारी के मार्गदर्शन और निर्देशानुसार हम लोग इन तबादलों से एकदम निस्पृह थे. हमारे पास अगर कोई अनुरोध या परिवेदना लेकर आता भी तो हम स्पष्ट कह देते कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है, जो भी करना है मंत्री जी ही करेंगे. इस तटस्थता का लाभ यह रहा कि हम अपयश से बचे रहे.   

लेकिन इन ताबड़तोड़ होने वालों तबादलों का एक मज़ेदार पहलू यह रहा कि मेरे हस्ताक्षर से किनके तबादले हो रहे हैं, कई बार यह भी देखना सम्भव नहीं हुआ. इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे एक बेहद करीबी मित्र ने फोन किया कि उसका तबादला हो गया है.  निश्चय ही यह बात बेहद कष्टप्रद थी. मैंने अपने उच्चाधिकारी से इस बारे में बात की और उनसे अनुमति चाही कि मैं मंत्री जी से कहकर इस तबादले को निरस्त करा दूं. उन्होंने बहुत साफ शब्दों में अपनी यह इच्छा दुहरा दी कि हमें तबादलों के इस जंजाल से दूर रहना चाहिए. जब मैंने ज़्यादा इसरार किया तो वे बोले कि जो मैं उचित समझूं  कर लूं, उनसे न पूछूं! मुझे उनकी बात समझ में तो आ रही थी लेकिन जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो आपको तर्क के खिलाफ जाने को विवश कर देते हैं. मैंने मंत्री जी को पूरी स्थिति बताई और उन्होंने बिना एक पल की भी देर किए जो करणीय था वो कर दिया. यह इकलौता उदाहरण है जब उस दौर में मैंने किसी तबादले में व्यक्तिगत रुचि ली.  

लेकिन तबादलों की इस सारी गाथा को याद करते हुए मैं एक प्रसंग को कभी नहीं भूल सकूंगा. एक दिन एक युवती एक बहुत अजीब अनुरोध लेकर मेरे पास आई. वो चाहती थी कि उसका तबादला जहां वो वर्तमान में पद स्थापित है उस जगह से जितना दूर सम्भव हो, किसी भी जगह कर दिया जाए. जब मैंने इस अजीब अनुरोध के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि उसके ससुराल वालों ने उसके दाम्पत्य जीवन को नरक बना रखा है और वो चाहती है कि उनसे दूर जाकर अपने पारिवारिक जीवन के बिखरे सूत्रों को सम्हाले. व्यावहारिक रूप से मुझे इस अनुरोध को मानने में कोई दिक्कत नहीं लगी,  दिक्कत तो तब होती है जब कोई यह चाहे कि मेरा तबादला इसी जगह हो जाए और वहां पद रिक्त न हो. लेकिन अगर हर व्यावहारिक काम आसानी से हो जाए तो फिर सरकार ही क्या! इतना ही कहूं कि अपनी तमाम कोशिशों के बावज़ूद उस युवती को कोई राहत न दिला पाने का मलाल अब भी मेरे मन में है. 

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 सितम्बर, 2014 को तबादला महापुराण: मांगे मिलै न 'पोस्टिंग' शीर्षक से किंचित परिवर्तित रूप में प्रकाशित मेरे आलेख का मूल पाठ.         

Thursday, March 6, 2014

यह योग्यता हममें भरपूर मात्रा में है!

पिछले दिनों एक सरकारी विभाग के अनुभव की अपनी व्यथा-कथा सोशल मीडिया के मंच पर साझा की तो बहुत सारे मित्रों ने भी अपने वैसे ही अनुभव साझा कर दिए. लगा कि  बस ज़ख्म को कुरेद भर देने की देर थी. वैसे अपने यहां सरकारी दफ़्तरों  में कमोबेश एक-सा हाल है. अगर कभी कहीं सुगमता से काम हो जाए तो विश्वास ही नहीं होता है. आप किसी दफ़्तर में किसी भी काम के लिए चले जाएं,  पहला जवाब तो यही मिलेगा कि यह काम नहीं हो सकता. बल्कि उससे भी पहले यह होगा कि अगर आप सुबह पहुंचे हैं तो बताया जाएगा कि यह काम शाम को होता है और शाम को पहुंचे हैं तो आपको सुबह आना चाहिए था. अगर किसी चमत्कार से आप सही सुबह या सही शाम पहुंच भी गए हों तो जो सज्जन आपका काम करने के लिए नियुक्त हैं वे छुट्टी पर/दौरे पर/मीटिंग में होंगे, इसलिए आपको कलआना होगा. एंड यू नो, टुमारो नेवर कम्स!

काम करवाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं होती है. एक आवेदन पत्र लिखिए, उसके साथ आवश्यक दस्तावेजों की राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित करवाई हुई फोटो प्रतियां नत्थी कीजिए, उस आवेदन पत्र पर दफ्तर के बड़े साहब से मार्किंग करवाइये, फीस जमा करवाइये, और फिर आवेदन पत्र जमा करवाइये. शायद ही कभी ऐसा हो कि आपको बताया जाए कि कल आपका काम हो जाएगा, और हो जाए! लगाते रहिये चक्कर! तंग आकर बड़े साहब से मिलना चाहेंगे तो या तो वे चेम्बर में नहीं होंगे (दौरे पर या  मीटिंग में कौन जाएगा?) और अगर हुए तो उनका पी ए आपको उनसे मिलने नहीं देगा.

इससे मुझे याद आया कि कुछ बरस पहले जब मैं अपने विभाग के एक बड़े पद पर आसीन हुआ और वहां आने वाले लोगों को सहज रूप से सुलभ होने लगा तो सबसे पहली शिकायत मेरे पी ए साहब को ही हुई. पहले तो उन्होंने मुझे सदाशयतापूर्ण सलाह दी कि मैं इस तरह आसानी से लोगों से न मिला करूं और जब मैंने उनकी सलाह नहीं मानी तो उन्होंने इधर-  उधर कहना शुरु किया कि ये साहब तो दफ्तर का अनुशासन ही ख़त्म किए दे रहे हैं!

जब बात सरकारी काम काज की चल  ही निकली है तो लगे हाथों अपना एक और मज़ेदार अनुभव आपसे साझा कर लूं. हुआ यह कि मेरी बेटी ने,  जिस शहर में वो पढ़ रही थी वहां एक मोपेड खरीदी. परिवहन विभाग के एक अजीबो गरीब नियम के अनुसार  उसका रजिस्ट्रेशन उसी शहर में हो सकता था जहां के आप मूल निवासी हों. और हमारा यह मूल निवास बेटी की पढ़ाई वाले उस शहर से 200 किलोमीटर दूर था. मेरे शहर के डीटीओ (ज़िला परिवहन अधिकारी) से मेरी अच्छी जान पहचान थी, सो मैं उनके पास सारे कागज़ात लेकर पहुंचा कि वे उस वाहन का रजिस्ट्रेशन कर दें. उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे बिठाया, चाय पिलाई और फिर मेरे कागज़ देखकर पूछा कि वाहन कहां है? मैंने बताया कि वाहन तो वहीं है जहां से उसे खरीदा गया है. उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा कि बस आप दो मिनिट के लिए वो वाहन  यहां ले आइये, मैं फौरन रजिस्ट्रेशन कर दूंगा, ज़रा भी देर नहीं लगाऊंगा. मेरे सारे अनुरोध उनकी  सरकारी नियमों से बंधी कर्तव्यपरायणता के आगे निष्फल रहे. मुंह लटका कर बाहर निकल ही रहा था कि मेरा एक पड़ोसी  मिल गया. दुआ सलाम के बाद उसने मुझसे वहां आने की वजह पूछी, और मैंने अपनी पूरी राम कहानी उसे सुना दी. वो वहीं मुझे एक ट्रांसपोर्ट एजेण्ट के पास ले गया, जो संयोग से मेरा भी परिचित था. उसने कहा कि यह तो कोई काम ही नहीं है. आसानी से हो जाता, लेकिन आप क्योंकि साहब के पास चले गए थे और मामला उनके ध्यान में आ चुका है, इसलिए थोड़ा खर्चा होगा. जितना खर्चा उसने बताया वो 200 किलोमीटर दूर से वाहन लाने ले जाने से तो कम ही था. मैंने हामी भरी, कागज़ात उसे सौंपे, और अगले दिन उसके बताए समय पर जब पहुंचा तो वाहन के रजिस्ट्रेशन के कागज़ात तैयार थे. एक बार तो मेरा मन हुआ कि अपने उन डीटीओ मित्र के पास जाऊं और पूछूं  कि कल जो काम नियम  विरुद्ध था, आज वही काम उन्हीं के हस्ताक्षरों से कैसे हो गया, लेकिन फिर सोचा मेरा चाहे कुछ न बिगड़े, उस एजेण्ट को परेशानी हो सकती है, और यह सोचकर सीधा अपने घर चला आया.

इतने बरस बहुत सारे सरकारी दफ्तरों  की  धूल फांककर मुझे एक ही बात समझ में आई है और वह यह कि काम की प्रक्रिया को जटिल बनाने में, लोगों की परेशानियों में वृद्धि  करने में और आपको ग़लत तरीकों से काम  करवाने के लिए मज़बूर करने में हमारी सरकारी मशीनरी का कोई जवाब नहीं है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे  साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  में  मंगलवार दिनांक 05 मार्च, 2014 को 'सरकारी दफ्तर...और काम कल होने का फेर' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ!