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Tuesday, January 2, 2018

जीवन रक्षक भूमिका भी है सोशल मीडिया की!

सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी में बहुत गहरे उतर चुका है. हममें से ज़्यादातर लोग उसे बरतते हैं, और साथ ही उसकी बुराइयों का रोना भी रोते रहते हैं. बहुतों को यह समय बर्बाद करने वाला शगल लगता है और समय-समय पर कुछ लोग इससे कुछ समय का अवकाश लेने और कुछ इसे सदा के लिए अलविदा कह देने की घोषणाएं करते रहते हैं. कुछ और ऐसे भी हैं जो इसके हानिप्रद  प्रभावों से तो पूरी तरह वाक़िफ़ हैं, लेकिन फिर भी इसे छोड़ नहीं पाते हैं. लेकिन वो कहते हैं ना कि हर बुराई के पीछे कोई  न कोई अच्छाई भी ज़रूर छिपी रहती है, तो ऐसा ही एक वाकया सामने आया है सात समुद्र पार ब्रिटेन  से. लंकास्टर की 33 वर्षीया गृहिणी शॉर्लट सॉल्सबरी  ने जब फ़ेसबुक पर अपनी बिटिया फेलिसिटी की रेटिनोब्लास्टोमा नाम नेत्र व्याधि से ग्रस्त एक आंख की ऐसी तस्वीर पोस्ट  की जिसमें उसकी  आंख की पुतली में एक असामान्य सफेद धब्बा नज़र आ रहा है, तो उन्हें सपने में भी इस बात का अनुमान नहीं था कि उनके द्वारा पोस्ट की गई यह तस्वीर एक और बच्ची के लिए जीवन–रक्षक साबित हो जाएगी.

हुआ यह कि शॉर्लट द्वारा पोस्ट की गई इस तस्वीर पर एक अन्य शहर की निवासी बीस वर्षीया ताओमी की नज़र पड़ी तो यकायक उनका ध्यान इस बात पर गया कि उनकी बीस माह की बेटी लीडिया की आंखें भी कुछ-कुछ ऐसी ही दिखाई देती हैं. ताओमी उन दिनों घर से बाहर रहकर छुट्टियां मना रही थीं. करीब दो सप्ताह बाद जब वे घर लौटीं तो वे अपनी बेटी को एक डॉक्टर के पास ले गईं, और डॉक्टर ने जांच करने के बाद जो बताया उससे उनके पैरों के नीचे की ज़मीन ही खिसक गई. डॉक्टर के अनुसार उनकी इस  नन्हीं बिटिया की बांयी आंख इण्ट्राओक्युलर रेटिनोब्लास्टोमा के सबसे भीषण प्रकार, जिसे टाइप ई कहा जाता है,  से ग्रस्त थी. सरल भाषा में इसे यों समझा जा सकता है कि उसकी आंख के भीतर का ट्यूमर या तो बहुत बड़ा है और या इस तरह का है कि उसका कोई इलाज़ मुमकिन ही नहीं है और न ही उस आंख को बचाया जा सकता है. रोग और ज़्यादा न फैले, इसके लिए यह ज़रूरी है कि उस आंख को जल्दी से जल्दी निकाल दिया जाए. ताओमी के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. डॉक्टरों ने भी  यही किया. इस बुराई में भी अच्छी बात यही थी कि रोग दूसरी आंख को अपनी गिरफ़्त में नहीं ले पाया था. अन्य कई जांचों के परिणाम अभी आने शेष हैं, लेकिन डॉक्टर आश्वस्त हैं कि उनके उपचार कारगर साबित होंग़े यह नन्हीं बच्ची सामान्य रूप से बड़ी होने लगेगी.

उधर फेलिसिटी भी, जो अब एक बरस की हो चुकी है धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है.  उसे कीमोथैरेपी दी जा रही है. जब वह मात्र नौ माह की थी तब उसके मां-बाप को पता चला कि वो रेटिनोब्लास्टोमा से ग्रस्त है. असल में यह रोग उसे जन्म से ही था, लेकिन मां-बाप इस बात से अनजान थे. एक दिन उनकी एक पारिवारिक मित्र लॉरा पॉवर  जो कि एक नर्स है, का ध्यान उसकी आंखों की असामान्यता पर गया और उसने शॉर्लट सॉल्सबरी  को किसी डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह दी. बाद में शॉर्लट ने बताया कि उन्हें कोई अंदाज़ ही नहीं था कि उनकी बेटी किसी रोग से पीड़ित भी हो सकती है. उनके लेखे तो वह एकदम सामान्य थी. हां, इस बात पर ज़रूर उनका ध्यान गया था  कि जब फेलिसिटी घुटनों के बल रेंगने लगी तो कई बार वह किसी चीज़ से टकरा जाया करती थी. लेकिन उन्हें यह बात असामान्य नहीं लगी. बाद में जब लॉरा की सलाह पर वे डॉक्टरों के पास गई तो अनेक जांचों के बाद उन्हें पता चला कि उनकी इस नन्हीं बिटिया की दोनों आंखों में तीन-तीन बेहद आक्रामक ट्यूमर्स हैं.

बिटिया का इलाज़ करा  चुकने के बाद शॉर्लट सॉल्सबरी ने महसूस किया कि उनका फर्ज़ बनता है कि वे अन्य मां-बापों को भी इस गम्भीर रोग के बारे में जानकारी दें. वैसे, जब शुरु-शुरु में फेलिसिटी की इस बीमारी का पता चला तो वे इसे गोपनीय रखती रहीं थी, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि ऐसा करना उचित नहीं है. और तब उन्होंने फेसबुक पर इस रोग के बारे में पूरी जानकारी पोस्ट की. उनका खयाल था कि वहां उनके जो दोस्त हैं वे इस पोस्ट को पढ़कर सचेत होंग़े, लेकिन देखते ही देखते उनकी इस पोस्ट को दुनियाभर में पैंसठ हज़ार लोगों ने साझा कर दिया. ज़ाहिर है इस पोस्ट से जो लोग लाभान्वित हुए उनमें से ताओमी भी एक हैं. ताओमी ने शॉर्लट  के प्रति  अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा भी कि अगर आपने यह पोस्ट नहीं लिखी होती तो मैं अपनी बिटिया के इस रोग से अनजान ही रह गई होती.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित अलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 3, 2017

सपनों का राही चला जाए सपनों के आगे कहां

1971 में बनी और बाद में राष्ट्रीय एवम एकाधिक फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाज़ी गई फ़िल्म आनंदमें गीतकार योगेश का लिखा एक अदभुत गीत था:  “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय/ कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये”. गीतकार ने इसी गीत में आगे लिखा था, “कभी देखो मन नही जागे/ पीछे पीछे सपनों के भागे/ एक दिन सपनों का राही/ चला जाए सपनों  के आगे कहां” और इसी भाव का विस्तार हुआ था आगे के बंद में: “जिन्होंने सजाये यहां  मेले/ सुख दुख संग संग झेले/ वही चुनकर खामोशी/ यूँ चले जाये अकेले कहां”. अच्छे कवि की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह बड़े सरल शब्दों में ऐसी बात कह जाता है जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. अब देखिये ना, हाल में सात समुद्र पार अमरीका में एक साधारण परिवार पर जो बीती उसे यह गीत किस कुशलता से घटना के करीब पांच दशक पहले व्यक्त कर गया था!

पश्चिमी  मिशिगन राज्य के  एक सामान्य  परिवार की असामान्य कथा है यह. बात मार्च माह की है. निक डेक्लेन की सैंतीस वर्षीया पत्नी केरी डेक्लेन की तबीयत कुछ ख़राब रहने लगी थी. डॉक्टर की सलाह पर कुछ परीक्षण करवाए गए तो एक बहुत बड़ा आघात उनकी प्रतीक्षा में था. केरी को ग्लियोब्लास्टोमा नामक एक भयंकर आक्रामक किस्म का दिमाग़ी कैंसर था. भयंकर इसलिए कि इसे करीब-करीब लाइलाज़ माना जाता है और अगर समुचित इलाज़ किया जा सके तो भी मरीज़ औसतन एक से डेढ़ साल जीवित रह पाता  है. लेकिन इलाज़ तो करवाना ही था. एक शल्य क्रिया द्वारा अप्रेल में केरी के दिमाग का ट्यूमर निकाल दिया गया. मुश्क़िल से दो माह बीते थे कि इस युगल को दो और ख़बरें मिलीं! पहली तो यह कि केरी का ट्यूमर फिर उभर आया था, और दूसरी यह कि उसे आठ सप्ताह का गर्भ था! स्वाभाविक है कि ट्यूमर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी का सहारा लिया जाता. लेकिन इसमें एक पेंच था. कीमोथैरेपी से गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचता है इसलिए इस उपचार से पहले गर्भपात करवाने का फैसला करना था.  इस युगल के सामने एक दोराहा था:  या तो मां केरी के हित में अजन्मे शिशु की बलि दी जाए, या अजन्मे शिशु के पक्ष में केरी अपने मृत्यु पत्र पर हस्ताक्षर करे! जैसे ही यह ख़बर समाचार माध्यमों में आई, पूरे अमरीका में इस पर बहसें होने लगीं. लेकिन फैसला तो इस युगल को ही करना था! क्योंकि केरी अपनी धार्मिक आस्थाओं की वजह से गर्भपात विरोधी विचार रखती थी, यही तै किया गया कि अजन्मे शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाए! यह भी जान लें कि डेक्लेन  दम्पती के पांच संतानें पहले से हैं जिनकी आयु क्रमश: 18, 16, 11, 4 और 2 बरस है.

फैसला हो गया तो बेहतर का इंतज़ार करना था. लेकिन जुलाई मध्य में केरी की तबीयत फिर खराब हुई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. वो दर्द से तड़प रही थी. बताया गया कि उसे एक ज़ोरदार दौरा पड़ा है. तब उसका गर्भ उन्नीस सप्ताह का हो चुका था. केरी अस्पताल के पलंग पर लेटी थी और एक नली और सांस लेने में मददगार मशीन की सहायता से बेहोशी के बावज़ूद ज़िंदा रखी जा रही थी. उसके दिमाग को गम्भीर क्षति पहुंच चुकी थी और इस बात की उम्मीद बहुत कम थी कि ठीक होकर भी वह किसी को पहचान  सकेगी. कुछ समय बाद उसे एक और दौरा पड़ा. तब उसका गर्भ 22 सप्ताह का हो चुका था और चिंता की बात यह थी की शिशु का वज़न मात्र 378 ग्राम था जबकि उसे कम से कम 500 ग्राम होना चाहिए था. डॉक्टर अपना प्रयास ज़ारी रखे थे. दो सप्ताह और बीते, और एक अच्छी ख़बर आई कि शिशु  का वज़न बढ़कर 625 ग्राम हो गया है. लेकिन इसी के साथ एक चिंता पैदा करने वाली खबर भी थी, कि शिशु तनिक भी हिल-डुल नहीं रहा है. डॉक्टरों के पास एक ही विकल्प था कि सिज़ेरियन ऑपरेशन से शिशु को दुनिया में लाया जाए! यही किया गया और छह सितम्बर को इस दुनिया में एक और बेटी अवतरित हुई, जिसका नाम उसके  मां-बाप की इच्छानुसार रखा गया: लाइफ़. मात्र छह दिन बाद केरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया!

लेकिन जीवन की असल विडम्बना तो सामने तब आई जब मात्र 14 दिन यह दुनिया देखकर लाइफ़ ने भी आंखें मूंद लीं! इन आघातों से टूटे-बिखरे पिता निक ने अपनी प्यारी पत्नी केरी की कब्र खुदवाई ताकि बेटी को भी मां के पास ही आश्रय मिल सके. निक का कहना है कि उसे समझ में नहीं आता कि ईश्वर ऐसे अजीबो-ग़रीब काम क्यों करता है! वह कहता है कि जब भी उसे मौका मिलेगा, वो ईश्वर से इस सवाल का जवाब मांगेगा. और तब तक वो अपने बच्चों को पालता पोसता  रहेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Sunday, August 10, 2008

जान लेवा भी साबित हो सकती हैं कुछ मेडिकल मिथ्स

चिकित्सा विषयक हज़ारों मिथ्स यानि मन-गढंत बातें सदियों से प्रचलित हैं. उन्हें इतनी बार दुहराया गया है कि वे हमें एकदम प्रामाणिक लगने लगी हैं. वर्तमान सूचना क्रांति ऐसी बातों के भण्डार में और भी वृद्धि करती जा रही है. अगणित वेब साइट्स पर ऐसी बहुत सारी जानकारियां, सूचनाएं और सलाहें सर्व सुलभ हैं जिनका कोई उचित आधार नहीं है. ऐसी बहुत सारी बातें फॉर्वर्डेड मेल्स के माध्यम से और भी अधिक प्रसारित होने लगी हैं. हम इन्हें प्रामाणिक मान कर अपनी या औरों की बेशकीमती ज़िन्दगी से निरंतर खिलवाड़ करते रहते हैं. पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय में कैंसर शल्यचिकित्सक और एन बी सी न्यूज़ की चीफ मेडिकल एडिटर डॉ नैंसी एल स्नाइडरमैन ने अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक “मेडिकल मिथ्स देट केन किल यू एण्ड द 101 ट्रुथ्स देट विल सेव, एक्सटेण्ड एंड इम्प्रूव युअर लाइफ” में सात खण्डों में बांटकर ऐसी ही 101 मनगढंत मिथ्स का परीक्षण किया है और हमें एक स्वस्थ जीवन शैली की राह दिखाई है.

स्नाइडरमैन कहती हैं कि ऐसी कुछ बातें मात्र बेहूदा होती हैं और कुछ पर्याप्त हानिप्रद, लेकिन हमें तो सभी पर विचार कर उनको कसौटी पर कसना चाहिए ताकि मिथ और यथार्थ को अलग कर हम अपनी ज़िन्दगी को न केवल बेहतर बना सकें, बल्कि बचा भी सकें. वे एक मिथ का ज़िक्र करती है जो यह सलाह देती है कि हार्ट अटैक के समय ज़ोर-ज़ोर से खांसना चाहिए. स्नाइडरमैन कहती हैं कि इस मिथ का कोई आधार नहीं है और यह सलाह प्राणघातक सिद्ध हो सकती है. एक अन्य मिथ, जो पिछले दिनों फॉर्वर्डेड मेल्स के कारण खूब प्रचारित हुई है यह बताती है कि खाना खाने के साथ या उसके बाद ज़्यादा ठण्डे पानी का प्रयोग कैंसर को बढावा देता है. मिथ के अनुसार, ठण्डा पानी भोजन में शामिल फैट यानि वसा को जमा देता है और जमी हुई फैट पेट की अम्ल से मिलकर कैंसर को बढावा देती है. स्नाइडरमैन के अनुसार यह एकदम बेहूदा मिथ है. ऐसी ही एक मिथ है कि कॉलेस्ट्रॉल घटाने की दवा से लिवर खराब होता है. लेखिका कम से कम आठ गिलास पानी रोज़ पीने वाली सलाह को भी ऐसी ही बेमानी मिथों में गिनती हैं. लेकिन एक दूसरी तरह की मिथ का खण्डन करती हुई वे यह बताना भी नहीं भूलती कि रक्तदान से हृदय रोग होने के खतरे में कमी आती है. इसी तरह वे इस मिथ का भी पुरज़ोर शब्दों में खण्डन करती हैं कि कान का मैल साफ करने के लिए रुई वाली डण्डी (कॉटन स्वाब) का प्रयोग किया जाना चाहिए. वे आगाह करती हैं कि इससे मैल कान में और गहरे धंस सकता है और उसकी परिणति श्रवण क्षमता में कमी में भी हो सकती है. इस मिथ का खण्डन वे एक मिथ बन चुकी मेडिकल सलाह से करती हैं, कि अपने कान में आप कुहनी से छोटी कोई चीज़ न डालें!

किताब में स्नाइडरमैन ने जिन सात मुख्य मिथों की चर्चा की है वे हैं: वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण बेमानी है, टीकाकरण केवल शिशुओं के लिए है, डॉक्टर कोई पक्षपात नहीं करते, हम कैंसर के खिलाफ लड़ाई हार रहे हैं, हृदय रोग और हृदयाघात सिर्फ बूढों को होता है, हर प्राकृतिक चीज़ सुरक्षित होती है, और मानसिक रोगों से छुटकारा आपके अपने वश की बात है. ये सारी मिथें आधारहीन हैं. इन्हीं सात विषयों पर चर्चा करते हुए स्नाइडरमैन ने 101 मिथों की चर्चा व परीक्षा की है. उनकी कुछ सलाहें ध्यान देने योग्य हैं :

-आप अपनी ज़रूरत, स्वास्थ्य और पारिवारिक इतिहास के अनुसार वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण ज़रूर कराएं.

-कोई भी टीका पूरी ज़िन्दगी प्रभावी नहीं रहता. तीस की उम्र के बाद बूस्टर डोज़ ज़रूरी हो जाती है. नए निकले वैक्सीनों की जानकारी भी लेते रहें.

-कैंसर कोई एक बीमारी नहीं, सैंकड़ों बीमारियों के समूह का नाम है. कैंसर के इलाज़ की दिशा अब उसके उपचार से हटकर नियंत्रण की तरफ है.

-हृदय रोग किसी भी उम्र में हो सकता है.
-यह कभी न समझें कि जो प्राकृतिक है, वह सदा ही सुरक्षित है. प्राकृतिक तो तम्बाकू भी है और संखिया भी. ये कहां सुरक्षित हैं? इसके विपरीत, वे बहुत सारी दवाइयां जो प्राकृतिक नहीं हैं, मानवता के लिए जीवन-रक्षक भी सिद्ध हुई हैं.

स्नाइडरमैन जहां ऐसी मिथ्स की बढती संख्या पर चिंतित होती हैं वहीं वे यह कहना भी नहीं भूलती कि बहुत सारी मिथ्स समय के साथ अपने आप नष्ट भी हो जाती हैं. जैसे, पहले यह माना जाता था कि बुखार के लिए कोई दवा नहीं ली जानी चाहिए लेकिन अब कोई ऐसा नहीं मानता. फिर भी, स्नाइडरमैन बहुत ज़ोर देकर यह कहती हैं कि बीमारियों के खिलाफ लड़ाई में हमारे दो सबसे बड़े दुश्मन हैं अज्ञान और निजी विश्वास. उनका कहना है कि इनसे मुक्ति पाकर हम बीमारियों के खतरों से पूरी तरह मुक्त भले ही न हो पाएं, उस राह पर अवश्य बढेंगे. वे सेल्फ डाइग्नोसिस को बहुत खतरनाक मानते हुए इससे बचने की सलाह देती हैं.

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Discussed book:
Medical Myths That Can Kill You: And the 101 Truths That Will Save, Extend, and Improve Your Life
By Nancy L. Md Snyderman
Published by: Crown
288 pages, Hardcover
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे नए पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत दिनांक 10 अगस्त 2008 को प्रकाशित आलेख का किंचित विस्तृत रूप.










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