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Wednesday, December 31, 2025

राजकीय महाविद्यालय, सिरोही: आज रंग है!



आज मेरे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही में पूर्व छात्र सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. महाविद्यालय के प्राचार्य डो अजय शर्मा ने इस अवसर पर महाविद्यालय के पूर्व शिक्षकों को भी आमंत्रित किया है. मेरे लिए यह स्वर्णिम अवसर था अपने खूबसूरत अतीत को एक बार फिर से जी लेने का, लेकिन मैं इस अवसर को लपक लेने से वंचित रह गया. डॉ अजय शर्मा ने बहुत आग्रह किया, और अगर वे न भी करते तो मुझे इस आयोजन में होना ही था. लेकिन.... सब कुछ अपने वश में कहां होता है! मैं सिरोही से 400 किलोमीटर दूर, जयपुर में हूं और कल्पना कर रहा हूं कि वहां क्या-क्या हो रहा होगा! इस कॉलेज में और इस कस्बे में मैंने अपनी उम्र के बेशकीमती ढाई दशक गुज़ारे हैं! स्मृतियों का एक पूरा कोठार है मेरे पास. भले ही अब मैं सिरोही में नहीं रहता हूं, सिरोही अब भी मुझ में सांस लेता है! हमेशा लेता रहेगा. 


जब भी सिरोही याद आता है, शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ भी साथ-साथ याद आ जाते हैं. उनकी एक  बहुत लोकप्रिय ग़ज़ल के मतले की दूसरी पंक्ति (मिसरा-ए-सानी) है: अपनी ख़ुशी न आए न अपनी खुशी चले! मेरे बारे में यह बात सौ फ़ीसदी सही है. 06 अगस्त 1974 को जब चित्तौड़ छोड़कर सिरोही आना पड़ा था तो वह मेरी मज़बूरी थी. अच्छा ख़ासा वहां जमा हुआ था. लेकिन तत्कालीन विधायक (अब स्वर्गीय) प्रो निर्मला सिंह को मुझसे जाने  क्या नाराज़गी हुई कि उन्होंने मेरा तबादला वहां से सिरोही करा दिया. मज़े की बात यह कि तबादला कराने के बाद वे मुझे आश्वस्त भी करती रहीं कि मैं आपका ट्रांसफर कैंसल करा दूंगी. निर्मला जी मेरी सहकर्मी थीं और उनसे सघन पारिवारिक आत्मीयता थी. उनके बारे में मैंने विस्तार से अपनी किताब 'गए दिनों का सुराग़ लेकर' में लिखा है. समय और सुविधा हो तो ज़रूर पढ़ें. अच्छा लगेगा. तो अनचाहे सिरोही आया, और आया तो फिर उर्दू के एक और मशहूर शायर को मन में बसा लिया: हज़रते दाग़ जहां बैठ गए, बैठ गए! 1974 में सिरोही आया और 1996 तक तो यहां बना ही रहा, इसके बाद भी कुछ और वक़्त टुकड़ों-टुकड़ों में  यहां गुज़ारा. य्हां गुज़ारे  वक़्त की चर्चा आगे कर रहा हूं. सिरोही से बाकायदा मेरा रिश्ता ख़त्म हुआ 17 जुलाई, 2000 को और इस बार भी कारण एक राजनेता ही बने. 21 मार्च 2000 को मैं राजकीय महाविद्यालय सिरोही का प्राचार्य बन कर आया और इसके दूसरे ही दिन तत्कालीन स्थानीय विधायक संयम लोढ़ा ने फ़ोन पर मुझे कहा, "अग्रवाल साहब, आप यहां आ तो गए हो, मैं आपको यहां रहने नहीं दूंगा." और उन्होंने नहीं ही रहने दिया. मात्र चार माह बाद 18 जुलाई को मैंने सिरोही को अलविदा कहा. लेकिन इन दोनों प्रसंगों का दूसरा पहलू यह भी है कि ये दोनों अप्रिय प्रसंग अंतत: मेरे लिए वरदान साबित हुए. अनचाहे सिरोही आया, लेकिन यहां लगभग 25 वर्ष रहा और इसने मुझे जितना दिया, उसका वर्णन नामुमकिन है. कुछ बातों की चर्चा आगे करूंगा. सिरोही से अनचाहे धकियाया गया, तो इसकी परिणति इस बात में हुई कि जयपुर पदस्थापित हुआ और अंतत: यहां का निवासी भी बना. कहां तो मेरा सपना यह था कि सिरोही कॉलेज से रिटायर होकर सिरोही में ही बस जाएंगे और कहां यह हुआ कि जयपुर से रिटायर होकर जयपुर में बस गए! लेकिन जयपुर में अपने विभाग के (लगभग) सर्वोच्च पर पर रहना और फिर यहां बस जाना मेरे व्यक्तित्व के विकास के लिए जितना  सकारात्मक रहा, उसको बताने के लिए बहुत सारे शब्दों की ज़रूरत पड़ेगी. यहां रहकर साहित्य कला संस्कृति की दुनिया से मेरा रिश्ता और मज़बूत हुआ और अपने बहुत सारे सपने पूरे करने के मौके मिले. तो मुझे इन दोनों राजनेताओं के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए! 


जैसा मैंने कहा, मैं अनचाहे सिरोही आया था. आया क्या, फेंका गया था. यहां का पहला दिन मुझे अब भी याद है. रात तीन बजे सिरोही के बस स्टैण्ड पर उतरना और भौंकते कुत्तों से जैसे-तैसे बचते हुए डाक बंगले पहुंचना. लेकिन कॉलेज में पहुंचने के बाद जैसे बहुत तेज़ी से सब कुछ बदलता गया. हिंदी विभाग के श्री सोहन लाल पटनी (तब वे डॉ नहीं हुए थे) ने अपने स्कूटर, जिसे उन्होंने गरुड़ नाम दे रखा था, पर मुझे शहर का एक चक्कर लगवाया और फिर अपने घर ले जाकर घी में डूबी रोटी खिलाई. तब उनसे जो रिश्ता कायम  हुआ वह उनके जीवन पर्यन्त चलता रहा. वे विलक्षण व्यक्ति थे. उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा, और अपरिमित दुलार पाया. कॉलेज में और बहुत ज़बर्दस्त शख्सियतें थी, जैसे प्रो अमरलाल माथुर, प्रो गणपत लाल बोहरा, प्रो एम एल एच शाह, प्रो बीके गौड़ और भी बहुत सारे विद्वान शिक्षक गण. हरेक से अपार स्नेह मिला, और मिला मार्गदर्शन. कॉलेज का ऑफिस - उसके तो कहने ही क्या. श्री मोहम्मद शब्बीर ख़ान, श्री अब्दुल लतीफ - ये तो इंसान के रूप में फरिश्ते थे. काम में एक सौ दस फीसदी दक्ष. पूरे राजस्थान के उच्च शिक्षा जगत में इनकी धाक थी. लाइब्रेरियन मूल चंद सेठ - इनका तो कहना ही क्या! इन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया. 


एक से बढ़कर एक प्राचार्य-उपाचार्य यहां रहे. सबको याद करना संभव नहीं होगा, लेकिन प्रो श्याम लाल माथुर, प्रो महेश कुमार भार्गव, प्रो डी सी कृष्णानी, प्रो एचके रावत, डॉ जीसी छाजेड़ हरेक अपनी तरह से अप्रतिम. प्रो एचबी सक्सेना का व्यक्तित्व अलग ही था. उन जैसा रौब दाब वाला  प्राचार्य मैंने अपने पूरे सेवा काल में नहीं देखा, हालांकि मैंने कभी वैसा बनना नहीं चाहा.   इन सब प्राचार्यों ने मुझे इतना अधिक प्रभावित किया कि जब मुझे प्राचार्य की उसी कुर्सी पर बैठने का मौका मिला तो बैठने से पहले बहुत देर तक सोचता रहा कि जिस कुर्सी पर ऐसे महान लोग बैठ चुके हैं, क्या मैं उस कुर्सी पर बैठने के काबिल भी हूं? 


सिरोही में पढ़ाने का बहुत सुख मिला. मैंने अपने अध्यापन को यहां तराशा भी खूब. पुस्तकालय बहुत समृद्ध था, और हमने इसे और अच्छा बनाया. खूब पढ़ा, और कोशिश की कि उसका लाभ विद्यार्थियों तक पहुंचे. विद्यार्थियों से मुझे अपार अपनापन मिला. छोटा कॉलेज था, इसलिए अगर कोई बाकायदा मेरा विद्यार्थी न भी रहा तो उसने गुरु वाला मान दिया. एक से ज़्यादा पीढ़ियां विद्यार्थी के रूप में मुझसे जुड़ीं.  अब सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत सारे पूर्व विद्यार्थी मुझसे जुड़े हैं. कॉलेज में खूब गतिविधियां कीं, और कॉलेज से बाहर शहर की गतिविधियों में भी सक्रिय सहभागिता की. बरसों मैंने विभिन्न ज़िला स्तरीय समारोहों का संचालन किया और इस निमित्त ज़िला प्रशासन ने मुझे अनेक बार सम्मानित भी किया. 


आज सिरोही कॉलेज में जो आयोजन हो रहा है उसका सबसे बड़ा आकर्षण हैं श्री शैलेश लोढ़ा. शैलेश लोढ़ा ने भारतीय मनोरंजन की दुनिया में जैसी पहचान बनाई है वह हम सबके लिए, विशेष रूप से इस पूरे राजकीय महाविद्यालय, सिरोही परिवार के लिए अत्यधिक गर्व की बात है. शैलेश ने साहित्य और मनोरंजन इन दो दुनिया में समान ख्याति अर्जित की है. जब मैं इस कॉलेज में पढ़ाता था, तभी शैलेश भी यहां के विद्यार्थी थे. शैलेश अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे. मुझे याद है कि तब मैं अपने कॉलेज के वार्षिक समारोहों का संचालन किया करता था, और बरस दर बरस मुझे शैलेश की उपलब्धियों की बहुत लम्बी सूची पढ़नी पड़ती थी. वैसे तो वे विज्ञान के विद्यार्थी थे, साहित्य में गहरी रुचि रखने के कारण उनका मुझसे भी नियमित सम्पर्क था. बल्कि इस कॉलेज के वे छात्र बने उससे पहले से, जब वे बालकवि शैलेश के रूप में जाने जाते थे, हमारा पारस्परिक सम्पर्क रहा. सम्पर्क के और भी कारण रहे, मसलन यह कि उनके पिता जी, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, मेरे प्रिय मित्र थे. शैलेश की दो बहनें एमए हिंदी की मेरी प्रिय छात्राएं थीं. शैलेश में जो सबसे बड़ा गुण मैं पाता हूं वह है उनकी अध्ययन वृत्ति. अपनी सारी व्यस्तताओं के बीच वे नया से नया पढ़ते हैं और उन्हें उस पर बात करना भी अच्छा लगता है. मैं आज सिरोही में नहीं हूं इसमें मेरा यह मलाल भी शामिल है कि शैलेश से मिलने का एक अवसर मैं खो रहा हूं. उनके लिए मेरी शुभ कामनाएं! 


सिरोही कॉलेज के सारे स्टाफ में ग़ज़ब का भाईचारा था. किसी भी एक का सुख या दुख पूरे स्टाफ़ का सुख दुख होता था. होली दिवाली हरेक हरेक के घर जाता था. कोई ईद ऐसी नहीं बीती जब हम लोग शब्बीर साहब और लतीफ़ साहब के यहां न गए हों, और कोई होली दिवाली ऐसी नहीं बीती जब वे हमारे घर न आए हों. तब जो रिश्ते बने वे अब तक बरक़रार हैं. लम्बे समय तक यहां कम ही शिक्षक रहे, अत: सबमें भाई चारा रहा. बाद में जब उनकी संख्या बढ़ी तब भी यही आत्मीयता बनी रही. यह बहुत स्वाभाविक है कि कुछ लोगों से मेरी आत्मीयता ज़्यादा रही और वे मेरे सारे सुख दुखों के साथी रहे, अब भी हैं. व्यक्तिगत चर्चा यहां नहीं करूंगा.


सोहन लाल पटनी के कारण, और इस कारण भी कि उस काल खण्ड में राजस्थान साहित्य अकादमी बहुत सक्रिय थी, सिरोही में खूब सारी साहित्यिक गतिविधियां आयोजित हुईं और इस कारण हम राजस्थान के तो करीब-करीब सारे भी ख्यात साहित्यकारों को अपने कॉलेज में भी ला सके. हिंदी के बड़े कथाकार स्वयं प्रकाश उन दिनों सुमेरपुर में पद स्थापित थे, और मेरे आत्मीय थे. वे  मेरे कॉलेज में न जाने कितनी बार आए होंगे. विद्यार्थी भी उनसे घुल मिल गए थे और अगर वे महीना भर कॉलेज में नहीं आते तो विद्यार्थी इसरार करते कि सर, स्वयं प्रकाश जी को बुलाइये ना! और वे आ जाते. स्वयं प्रकाश ने मेरे ही कॉलेज से स्वयं पाठी विद्यार्थी के रूप में हिंदी में एम ए किया, और फिर इसी कॉलेज की लाइब्रेरी का लाभ उठाते हुए मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय से पी-एच. डी. भी की. मेरे कॉलेज से अपने लगाव का और यहां के अनुभवों का बहुत रोचक वर्णन उन्होंने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक 'धूप में नंगे पांव' में किया है. अद्भुत किताब है यह. 


जब मैं सिरोही आया तब परिवार में हम तीन प्राणी थे- पत्नी बेटा और मैं. यहां मेरा परिवार बड़ा हुआ. बेटी का जन्म यहीं हुआ. यहीं से बेटे ने पीईटी में सफलता प्राप्त कर अपनी जीवन राह चुनी. जब मैं उपाचार्य था, तब यहीं से उसका विवाह हुआ. सिरोही में जन्मी मेरी बेटी ने राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की सैकण्डरी परीक्षा में मेरिट में स्थान पाया और फिर उसने भी अपने भाई वाली ही राह चुनी. बाद में बेटी नौकरी करने अमरीका चली गई और बेटा ऑस्ट्रेलिया. बेटी के जीवन से सिरोही इस तरह भी जुड़ा कि सिरोही का निकटवर्ती गांव वराड़ा उसका ससुराल बना. यहां रहते हुए ही मेरी मां और फिर मौसी ने प्राण त्यागे. 


हम लोगों के जीवन में सिरोही ऐसा घुला मिला है कि हमारे बच्चे कहते हैं कि जब भी उन्हं घर का कोई सपना आता है, सपने में वही शांति नगर का किराये वाला घर आता है! 


सिरोही कथा अनंत है. अपनी दो किताबों - ‘समाज का आज’ और ‘गए दिनों का सुराग लेकर’ में मैंने सिरोही के बहुत सारे प्रसंग लिखे हैं. लेकिन जितने लिखे हैं उससे अधिक अभी लिखे जाने हैं! 


जीवन की इस  संध्या वेला में सिरोही में बिताए दिन बहुत याद आते हैं! वे दिन लौट कर नहीं आएंगे, लेकिन उनकी यादें मन को हमेशा प्रफुल्लित करती रहेंगी. 


मेरे मन में डॉ अजय शर्मा और उनकी पूरी टीम के प्रति असीम कृतज्ञता का  भाव है जिनंने इस आयोजन को कामयाब बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश की है. मेरा सुझाव है कि इसे महाविद्यालय कैलेण्डर का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए.   जो मित्र सिरोही कॉलेज के इस आयोजन में भाग ले पा रहे हैं, उन सबको मेरा सप्रीत अभिवादन और हार्दिक शुभ कामनाएं! 


मान लें कि मैं भी इस समय आपके साथ हूं. 

Thursday, April 23, 2020

मेरा स्कूटर पुराण


समय और स्थितियों में इतनी तेज़ी से बदलाव आया है कि जब मैं अपने कॉलेज के दिनों और उसके तुरंत बाद नौकरी शुरु करने के समय की बातें किसी को बताता हूं तो उन बातों को संशय के साथ सुना जाता है. 1967 में जब मैंने कॉलेज प्राध्यापक के रूप में अपनी नौकरी की शुरुआत की तो मेरे कॉलेज के सारे प्राध्यापक,  बल्कि प्रिंसिपल भी,  साइकिल पर ही  कॉलेज आते थे. सड़कों पर भी स्कूटर, मोटर साइकिल बहुत कम नज़र आते थे, कारें तो और भी कम. कोई आठ बरस नौकरी करने के बाद मैंने अपने जीवन का पहला स्कूटर खरीदा, और वो भी सरकार से कर्ज़ा लेकर. तब तनख़्वाहें भी ज़्यादा कहां होती थीं? उस समय मैं जिस सिरोही कॉलेज में कार्यरत था वहां मुझसे पहले मेरे दो साथियों के पास स्कूटर थे. एक के पास लैम्ब्रेटा और दूसरे के पास राजदूत. एक के लिए स्कूटर मज़बूरी था और दूसरे ज़रूरत से ज़्यादा शाही तबीयत के धनी थे. अन्यथा किसी को स्कूटर रखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती थी. जब मैंने भी स्कूटर खरीदा तो मेरे कई शुभ चिंतकों ने मेरी इस फिज़ूल खर्ची पर सवाल उठाये. उन्होंने बाकायदा गणना करके मुझे समझाया भी कि मैं अनावश्यक रूप से हर माह पैट्रोल पर इतना खर्चा करने की मूर्खता कर रहा हूं.

जिस ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उसमें स्कूटरों का राजा हुआ करता था वेस्पा. भले ही इसे स्टार्ट करने के लिए एक तरफ झुकाना होता था, जिनके पास यह होता था उनकी शान और ऐंठ अलग ही होती थी. लेकिन वेस्पा आसानी से मिलता कहां था? बुकिंग करवानी होती थी और लम्बी प्रतीक्षा सूची का धैर्य रखना होता था. जब लगभग उन्हीं दिनों उदयपुर में वेस्पा की बुकिंग शुरु हुई तो ऐसी भगदड़ मची कि घुड़सवार पुलिस को उसे काबू करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी और उस भगदड़ में कई लोगों ने अपनी जानें तक गंवाई.  और यह हालत वेस्पा की ही नहीं थी. लैम्ब्रेटा भी बुक करवाने के बाद इंतज़ार के बाद ही मिलता था. सरकारी कर्मचारियों के लिए एक अलग प्रतीक्षा सूची भी होती थी जिसके आधार पर उन्हें यह स्कूटर देने में प्राथमिकता दी जाती थी. ख़ुद मैंने भी इस सरकारी प्राथमिकता के लिए आवेदन किया था. यह बात अलग है कि मेरा नम्बर कभी आया नहीं. उन्हीं दिनों एक सरकारी उपक्रम स्कूटर्स इण्डिया का नया स्कूटर विजय डीलक्स बाज़ार में उतरा तो स्कूटर स्वामी बनने की मेरी आकांक्षा ने भी ज़ोर मारा, और मैंने भी उदयपुर  में  अपने लिए एक विजय डीलक्स स्कूटर बुक करवा लिया.  स्कूटर की कीमत थी चार हज़ार सात सौ सैंतालीस रुपये. लयात्मक राशि (चार सात चार सात)  होने के कारण यह मुझे अब तक स्मरण है. लेकिन इतना पैसा एक मुश्त चुकाने की अपनी क्षमता थी नहीं सो सरकारी ऋण के लिए आवेदन किया और वो मिल भी गया, जिसकी कटौती कई बरस होती रही. जब उदयपुर के डीलर से सूचना मिली कि हम डिलीवरी लेने आ सकते हैं तो सिरोही से हम दो साथी अपने दो मित्रों के साथ उदयपुर गए. तब तक मुझे स्कूटर चलाना आता ही नहीं था. स्कूटर खरीदने वाले दूसरे साथी  का भी यही हाल था. लौटते हुए रास्ते में थोड़ी देर हिम्मत कर मैंने स्कूटर चलाया तो नदी की एक रपट पर फिसला भी सही. लेकिन उस समय स्कूटर स्वामी बन कर जो खुशी हासिल हुई वो खुशी बाद में चौपहिया वाहन खरीद कर भी हासिल नहीं हुई,  दूसरा स्कूटर खरीदने के मौके की तो बात ही क्या की जाए. मेरे यह स्कूटर खरीदने के बाद मेरे कॉलेज के कई अन्य मित्रों ने भी उदयपुर  से  ही यह स्कूटर खरीदा और अनुभवी होने के नाते उनमें से अनेक के साथ इस बड़ी खरीददारी के लिए उदयपुर जाने का सौभाग्य मुझे मिला.

आज भले ही यह बात अविश्वसनीय बल्कि हास्यास्पद लगे, उस ज़माने में विजय स्कूटर का स्वामी होना भी बड़े गर्व की बात थी और हम दोनों ने अपने दोनों बच्चों के साथ इसी स्कूटर पर कई बार सिरोही से उदयपुर की यात्राएं कीं. शिवगंज सुमेरपुर तो इतनी बार गए कि उसकी गिनती ही मुमकिन नहीं. यह गर्व बोध काफी समय तक बरकरार रहा. 1998 से 2000 के बीच जब मैं आबू रोड कॉलेज में प्राचार्य रहा तब भी न जाने कितनी बार हम दोनों अपने स्कूटर पर आबू रोड से अम्बाजी और माउण्ट आबू गए. तब तक स्कूटर को एक  सम्मानजनक वाहन माना जाता था. उसका अवमूल्यन तो आगे जाकर हुआ.

सिरोही में मेरे दो दशक से भी अधिक के कार्यकाल में आरजेडब्ल्यू 1615 नम्बर प्लेट वाला वह नीला विजय डीलक्स स्कूटर मेरे व्यक्तित्व के साथ इस तरह एकाकार हो गया था कि कहीं उस स्कूटर के खड़े होने का मतलब ही वहां डीपी अग्रवाल के होने का होता था. बाद में जब मेरा बेटा भी मेरे इस स्कूटर का इस्तेमाल करने लगा तो मेरे दोस्त बड़े सहज भाव से मुझसे अपना यह ज्ञान  साझा कर लिया करते थे कि कल आप अमुक जगह गए थे, जबकि असल में वहां मेरा बेटा गया होता था. इसी  पहचान की वजह से एक मज़ेदार प्रसंग भी उत्पन्न हो गया, जिसकी चर्चा आगे चलकर करूंगा.

1996 में उपाचार्य पद  पर मेरी पदोन्नति हुई और मुझे सिरोही छोड़ कर कोटपूतली जाना पड़ा. तब तक मेरा यह स्कूटर भी वृद्धावस्था को प्राप्त होने लगा था. लेकिन मुझे इससे लगाव भी था, और यह मेरी ज़रूरत भी था सो इसे साथ ले गया. जब दो-एक बार वहां इसकी रिपेयर की ज़रूरत पड़ी तो जिस भी मैकेनिक के पास  मैं इसे लेकर  गया, उसने इसे आगे-पीछे, ऊपर नीचे देखकर पहला सवाल यही किया कि यह है क्या चीज़?  ज़ाहिर है कि उन लोगों ने इससे पहले विजय स्कूटर नाम की कोई चीज़ नहीं देखी थी. वो लोग इसकी रिपेयर करने के प्रति भी उदासीन ही रहते, क्योंकि यह उनके लिए अपेक्षाकृत नई चीज़ था. ख़ैर! जैसे–तैसे मेरा काम तो इस स्कूटर से वहां चल  ही गया.
मात्र दस माह में मेरा स्थानांतरण वहां से सिरोही हो गया. और क्योंकि यह स्थानांतरण मेरे इच्छित स्थान सिरोही हुआ था, मैं बिना एक भी दिन का विलम्ब किये वहां से सिरोही के लिए रवाना हो गया. गृहस्थी का सामान तो ज़्यादा था नहीं, सो वह तो साथ ही ले आया. असल संकट तो इस स्कूटर का था. कोटपूतली में रेल्वे स्टेशन है नहीं सो स्कूटर ट्रांसपोर्ट से ही सिरोही भेजा जा सकता था, और यह काम करने का मेरे पास समय था नहीं.  इसलिए अपना यह स्कूटर मैं वहीं अपने कॉलेज के एक  प्रयोगशाला सहायक राजेश सैनी के पास इस अनुरोध के साथ छोड़ आया कि वह यथासुविधा इसे ट्रांसपोर्ट से बुक करवा के सिरोही भेज दे. कुछ दिनों के बाद उसने मेरा स्कूटर ट्रांसपोर्ट से बुक करवा के सिरोही भेज दिया. ट्रांसपोर्ट वाले ने इसके लिए एक हज़ार रुपये चार्ज किये. अब आगे की बात बड़ी दिलचस्प है. ट्रांसपोर्ट में थोड़ी बहुत टूट फूट तो होती ही है. मेरे वयोवृद्ध स्कूटर के भी बांये हाथ में कुछ चोट आ गई जिसे बड़ी मुश्क़िल से सिरोही में मेरे स्थायी स्कूटर मैकेनिक डाया लाल ने ठीक किया. इस पर करीब पांच सौ रुपये का खर्चा और आ गया. लेकिन तब तक मुझे लगने लगा था कि अब इस स्कूटर के साथ मेरा रिश्ता और नहीं निभ सकेगा, इसलिए मैंने एक नया स्कूटर ले  लिया. अब सवाल उठा कि इस पुराने, बूढ़े स्कूटर का क्या किया जाए?  इधर उधर बात की, लोगों से कहा कि मुझे मेरा पुराना स्कूटर बेचना है तो एक ग्राहक घर में ही मिल गया. मेरे पुराने कॉलेज का एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उसे खरीदने को तैयार हो गया. और उसे मैंने अपना यह लाड़ला स्कूटर बड़े भारी मन से बेच दिया. पूछना चाहेंगे कि कितने में बेचा? पूरे एक हज़ार रुपये में! बेचने के बाद ख़ुद मुझे लगा कि मैं कितना बड़े वाला वोहूं! अगर मैं इस स्कूटर को सिरोही न लाया होता और इसे कोटपूतली की सड़क पर लावारिस भी छोड़ आया होता तो मुझे शुद्ध पांच सौ रुपये की बचत होती. लेकिन जो हुआ सो हुआ!

लेकिन किस्सा यहीं ख़त्म नहीं हो गया. इस कथा का एक और लेकिन अभी बाकी है.  केक पर आइसिंग का मज़ा तो अब आएगा. भले ही मैंने एक नया, मिलिट्री ग्रीन रंग का स्कूटर खरीद लिया था, सिरोही में आरजेडब्ल्यू 1615 नम्बर प्लेट वाला नीला विजय डीलक्स स्कूटर मेरे व्यक्तित्व के साथ स्थायी रूप से जुड़ चुका था. लोग स्कूटर देखते तो कल्पना कर लेते कि डीपी अग्रवाल भी आसपास यहीं कहीं होंगे. जब मैंने यह स्कूटर अपने उस पुराने कर्मचारी को बेच दिया तो उसके कुछ ही दिनों बाद दबे स्वरों में सिरोही में यह चर्चा सर उठाने लगी कि आजकल अग्रवाल साहब के रंग-ढंग कुछ ठीक नहीं हैं. इस कुचर्चा के मूल में था मेरा वह 1615 नम्बर का स्कूटर जिसे लोग पिछले कुछ दिनों से हर शाम स्वरूप क्लब के पास वाले देशी दारु के ठेके के पास खड़ा देख रहे थे. यह मान लिया गया कि जब उनका स्कूटर यहां है तो अग्रवाल  साहब भी यहीं होंगे! और देशी दारु के ठेके पर होंगे तो ज़ाहिर है कि उसका सेवन भी कर ही रहे होंगे! असल बात यह थी कि मेरे कॉलेज का वह कर्मचारी देशी मदिरा का नियमित सेवन करता था, और अब जब उसने स्कूटर खरीद लिया था तो बड़ी शान से हर शाम उस स्कूटर पर आसीन होकर अपना शौक पूरा करने जाने लगा था. जैसे ही यह कुचर्चा मुझ तक पहुंची, मैंने उस शौकीन मिजाज़ कर्मचारी को बुलाया और उसे पाबंद किया कि वो अपना शौक भले ही ज़ारी रखे, मेरा स्कूटर लेकर वहां न जाया करे! मैं तो उससे अपना स्कूटर वापस भी खरीद लेने को तैयार था, लेकिन उसने  इसके बिना ही मेरी बात मान ली.

तो, यह था मेरा संक्षिप्त स्कूटर पुराण!
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Tuesday, May 13, 2014

मैंने सर झुकाया उसके सामने!

अपनी कामकाज़ी ज़िन्दगी के करीब 36 बरस कॉलेजों में गुज़ारे तो स्वाभाविक ही है कि अपनी स्मृतियों के पिटारे में ज़्यादा माल भी वहीं का है. जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि उस ज़िन्दगी में काफी कुछ ऐसा था जिसे अपने पाठकों से साझा करूंगा तो उनके चेहरों पर भी मुस्कान आ जाएगी. मैंने अपने इस सुदीर्घ अध्यापन काल में अपने विद्यार्थियों से काफी कुछ सीखा है. कभी अपनी तरफ़ से सीखा तो कभी उन्होंने आगे बढ़कर  सिखाया. याद आता है कि अपनी नौकरी के शायद पहले या दूसरे बरस में जब मैं उसकी किसी शरारत पर अपने एक विद्यार्थी को बहुत ही शालीन और मुलायम लहज़े में ‘डांट’ चुका (और ज़ाहिर है कि वह डांट निष्फल रही) तो कक्षा से बाहर निकलते समय मेरे एक अन्य विद्यार्थी ने मुझे सलाह दी कि अगर मुझे किसी को डांटना है तो अपनी आवाज़ को तेज़ और लहज़े को कड़ा रखना होगा. उसने कहा कि अगर आप इसी मुलायम लहज़े में डांटेंगे तो कोई असर नहीं होगा. बाद में इसी तरह बहुत सारी अन्य ट्रिक्स ऑफ द ट्रेड सीखने को मिलीं.

लेकिन आज मुझे एक अन्य प्रकार का प्रसंग आपसे बांटने का मन हो रहा है. उन दिनों कॉलेजों में विद्यार्थियों के लिखे को प्रकाशित करने के लिए महाविद्यालय पत्रिकाएं निकालने का रिवाज़ था, और करीब-करीब हर महाविद्यालय कम से एक एक वार्षिक पत्रिका तो ज़रूर ही प्रकाशित करता था. कम से कम इसलिए कहा कि बहुत सारे महाविद्यालय इसके अलावा मासिक, त्रैमासिक आदि पत्रिकाएं  भी निकालते थे. अब आहिस्ता-आहिस्ता ऐसी तमाम गतिविधियां और परम्पराएं नष्ट हो चुकी हैं. हो सकता है कि उनकी जगह नई गतिविधियों ने ले ली  हो. तो मेरे उस कॉलेज में भी एक वार्षिक पत्रिका निकलनी थी और उसका सम्पादक मुझे बनाया गया था. मैंने नोटिस बोर्ड पर सूचना लगवा दी कि अपनी रचनाएं प्रकाशित करवाने के इच्छुक  विद्यार्थी अमुक तिथि तक मुझे अपनी रचनाएं दे दें. मेरा आग्रह इस बात  पर रहता था कि हम विद्यार्थियों की मौलिक रचनाएं प्रकाशित करें. कई अन्य सम्पादक तथाकथित  संकलित रचनाओं वाली पत्रिकाएं भी  निकाला करते थे. मौलिकता के मेरे आग्रह को लेकर कई बार विद्यार्थियों से छोटी-मोटी बहस भी हो जाती थी. लेकिन मैं अपने सोच पर कायम रहने की भरसक कोशिश करता था.

काफी सारी रचनाएं आ चुकी थीं. एक दिन एक विद्यार्थी एक पन्ना  लेकर मेरे पास आया और बोला कि  “सर! यह मेरी शायरी है, इसे पत्रिका में प्रकाशित कर दीजिए.”  सामान्यत: तो मैं रचनाएं लेकर अपने पास रख लेता था और बाद में उन्हें देखकर गुणावगुण के आधार पर उनको प्रकाशित करने न करने का निर्णय  करता था लेकिन उस दिन न जाने क्यों मेरा इरादा बदल गया. मैंने एक नज़र उस विद्यार्थी के दिए पन्ने  पर डाली तो पाया  कि अरे! यह तो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल है. सोचा, अगर यह कहूंगा कि यह ‘शायरी’ तुम्हारी मौलिक रचना नहीं है तो विद्यार्थी को बुरा लगेगा, इसलिए मैंने अपनी बात कहने के लिए ज़रा घुमावदार  रास्ता चुना. गम्भीरता ओढ़ते हुए मैंने उस पन्ने की चन्द लाइनें पढ़ीं और फिर उससे बोला कि यह तो बहुत अच्छी रचना है.  विद्यार्थी प्रसन्न हुआ. मैंने उससे पूछा  कि यह किस विधा की रचना है? उस विद्यार्थी को मेरा विधा शब्द समझ में नहीं आया, तो मैंने अपनी बात को सरल करते हुए पूछा कि यह ग़ज़ल है, नज़्म है, या रूबाई है?  विद्यार्थी ने पूरे आत्म विश्वास से मुझ अज्ञानी को ज्ञानवान बनाते हुए कहा – “सर, मैंने कहा ना कि यह शायरी है!”  मैंने भी जैसे उसकी बात को समझते हुए  कहा कि “अच्छा, अच्छा! यह शायरी है. मुझे तो उर्दू आती नहीं है, इसलिए यह बात मालूम नहीं थी.”  फिर मैंने उस ‘शायरी’ के एक कठिन शब्द का अर्थ उससे जानना चाहा  जिस पर उस महान विद्यार्थी का जवाब बहुत ही शानदार था. बोला, “सर! शायर ऐसे कोई शब्दों को लेकर थोड़े ही शायरी करता  है. उसके मन में जब खयाल आते हैं तो शब्द अपने आप कागज़ पर उतर आते हैं!”  अब उससे किसी और शब्द का अर्थ पूछने का कोई मतलब ही नहीं था. मैंने एक बार फिर उसकी महान शायरी की (जो वाकई  महान थी! आखिर मिर्ज़ा ग़ालिब की जो थी) तारीफ की और उससे पूछा कि क्या उसने और भी ऐसी शायरी लिखी है? मैंने उससे अपनी यह इच्छा ज़ाहिर की कि अगर उसने लिखी हो तो मैं उन्हें भी प्रकाशित करंना चाहूंगा. वो विद्यार्थी वाकई बहुत महान था! बोला: “सर! अभी तो यह एक ही लिखी है! जब और खयाल आएंगे तो और लिखूंगा!” मैं उस महान विद्यार्थी और बड़े शायर के सामने नत मस्तक होने के सिवा और कर भी क्या सकता था? हां, इतना और बताता चलूं कि मैं कई बरस उस कॉलेज में रहा, और शायद फिर कभी उस विद्यार्थी को वैसे महान खयाल नहीं आए!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 13 मई 2014 को छात्रों से सीखी ट्रिक्स ऑफ द ट्रेड शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख.         

Tuesday, May 6, 2014

जब ज़िंदगी इतनी इंस्टैण्ट नहीं थी!

कुछ सुविधाओं और चीज़ों के हम इतने अधिक अभ्यस्त हो जाते  हैं कि यह खयाल तक नहीं आता कि जब ये हमें सुलभ नहीं थी तब हमारी ज़िंदगी कैसे चलती थी, और वो ज़िंदगी बेहतर थी या बदतर थी!  अब दूर संचार को ही लीजिए. अब मोबाइल हमारी ज़िंदगी से इतना एकाकार हो चुका है कि इसके बिना हम अपने आप को अधूरा समझने  लगे हैं. अगर आप किसी बस या ट्रेन में सफ़र कर रहे हों और कोई स्टेशन आने वाला हो, तब का मंज़र याद कीजिए. मोबाइल की घण्टियां (बल्कि किसम किस्म की रिंग टोन्स) आपको चेता देती हैं कि अब कोई स्टेशन आने वाला है. या तो आपका हम सफर अपने किसी मित्र-परिजन को बता रहा होता है कि उसकी मंज़िल आने ही वाली है या फिर वो प्रतीक्षारत अपने किसी परिजन को अपने जल्दी ही पहुंचने का सुसमाचार दे रहा होता है.

लेकिन बहुत पुरानी बात नहीं है जब हम सब इस सुविधा के बिना भी जी रहे थे. और न सिर्फ जी रहे थे, मज़ेदार अनुभव भी कर रहे थे. मैं एक कस्बाई  कॉलेज में हिंदी पढ़ाता था.  मेरे कॉलेज का हिंदी विभाग बहुत सक्रिय था. हम लोग अक्सर कोई न कोई आयोजन करते रहते थे. प्रांत का हिंदी का शायद ही कोई बड़ा लेखक हो जिसका सान्निध्य उन दिनों हमारे विभाग को न मिला हो. तो हुआ यह कि हमने पास के एक बड़े शहर के एक नामी रचनाकार को अपने यहां काव्य पाठ और व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया. वो चिट्ठियों के आदान-प्रदान वाला ज़माना था. टेलीफोन धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था और मोबाइल की तो कोई पदचाप भी सुनाई नहीं दे रही थी. चिट्ठियों के आदान प्रदान से उनका कार्यक्रम तै हो गया. कस्बा छोटा था, होटल संस्कृति तब चलन में नहीं थी. तय किया गया कि उन्हें बस से उतार कर साथियों में से किसी के घर ले जाएंगे ताकि वे फ्रेशहोना चाहें तो हो लें, फिर कॉलेज ले जाकर उनका कार्यक्रम करा लेंगे और उसके बाद किसी के घर पर सब लोग एक साथ भोजन करेंगे और उसके बाद उन्हें उनकी सुविधानुसार किसी बस में बिठा कर विदा कर देंगे.

बस स्टैण्ड दूर था, उससे पहले एक चौराहा था जहां ज़्यादातर सवारियां उतरती थी, और वो चौराहा हमारे उस साथी के घर (और कॉलेज)  के भी निकट था, जहां उन्हें पहले ले जाना तै हुआ था. हम चार साथी उस चौराहे पर खड़े हो गए कि बस आएगी तब अपने अतिथि को वहीं उतार लेंगे. एक-एक करके तीन बसें वहां से गुज़र गईं, लेकिन हमारे अतिथि नज़र नहीं आए. उनके पहुंचने का सम्भावित समय भी बीत चुका  था. सोचा किसी मज़बूरी के चलते वे नहीं आ पाए हैं. निराश मन कॉलेज गए, कार्यक्रम स्थगित किया और अपने इतर कामों में व्यस्त हो गए.

तीसरे दिन डाक से उन साहित्यकार महोदय का पत्र आया. बहुत संयत भाषा में, लेकिन शब्दों के पीछे से उनकी नाराज़गी झांक रही थी. पत्र उन्होंने शायद लिखा भी अपनी नाराज़गी के इज़हार के लिए ही था. जो कुछ उन्होंने लिखा उसका सार यह था कि जिस बस से उन्होंने आने की सूचना दी थी, उस बस से वे हमारे कस्बे में पहुंचे, बस स्टैण्ड पर जब बस रुकी तो खिड़की में से झांक कर देखा कि वहां हममें से कोई है या नहीं! उन्हें हममें से कोई वहां दिखाई नहीं दिया. वे बस से उतरे, और क्योंकि उसी वक़्त एक बस वापस उनके बड़े शहर जाने को तैयार खड़ी थी, उसमें बैठ कर वे अपने शहर लौट गए. उन्होंने हमसे कोई शिकायत नहीं की. यह उनका बड़प्पन था.

आज पीछे मुड़कर इस घटना को याद करता हूं तो उनकी खुद्दारी के प्रति माथा झुक जाता है. उन्हें लगा होगा कि जिन लोगों में इतनी भी तमीज़ नहीं है कि अपने मेहमान के स्वागत के लिए पहुंचें, उनके यहां क्या जाना! बेशक, इसमें हमारी कोई ग़लती नहीं थी. बसों की भीड़भाड़ में और लोगों के चढ़ने-उतरने की आपाधापी में न उन्होंने हमें देखा और न हमने उन्हें! लेकिन उन्होंने अपने पत्र में एक भी कठोर शब्द नहीं लिखा. यह कोई मामूली बात नहीं है. लेकिन अगर आज की तरह  मोबाइल चलन में होता तो निश्चय ही यह घटना घटित नहीं हुई होती. थोड़ी-सी देर उनका इंतज़ार  करने के बाद हम लोग जाने कितनी दफ़ा उनके मोबाइल को ज़हमत दे चुके होते! और इसके बावज़ूद भी अगर कोई चूक हो गई होती, और उसके बाद उनसे बात हुई होती तो शायद उन्होंने भी हमसे अपनी नाराज़गी व्यक्त की होती, और हमने भी कुछ न कुछ ज़रूर कहा होता  जिससे बदमज़गी पैदा हुई होती.  सोच-समझकर अपने आप को व्यक्त करने की जो सुविधा चिट्ठी में है वो भला मोबाइल की तात्कालिकता में कहां? अपनी तात्कालिकता में मोबाइल पर तो हम उनसे नाराज़ हुए होते और वे हमसे! लेकिन अपने घर पहुंच कर चिट्ठी लिखते हुए वे अपनी नाराज़गी पर काबू पा चुके होंगे.
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में दिनांक 06 मई, 2014 को मेरे साप्ताहिक  कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत 'तब ज़िंदगी इतनी इंस्टैण्ट नहीं थी' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, February 18, 2014

किताबें और हम

किताबों के साथ हमारा रिश्ता बहुत अजीब है. चाहते हैं कि हमारे चारों तरफ किताबें ही किताबें हों. बस उन्हें छूते, सूंघते, देखते और पढ़ते हुए ज़िंदगी कट जाए! लेकिन जब किताबें इकट्ठी हो जाती हैं तो दूसरी तरह की बेचैनी घेरने लगती है! अरे! वक़्त इतना कम है और कितना कुछ पढ़ने को शेष है! मुझ जैसे मध्यवर्गीय लोगों का एक संकट और है और वह यह कि किताबें इकट्ठी  करने वाले मन का मकान की सीमित जगह से कोई तालमेल नहीं बैठ पाता है. और अगर पत्नी सुरुचि सम्पन्न हो तो यह कष्ट और कि किताबें उनकी आंखों में रड़कती हैं. ख़ास तौर पर पुरानी और जीर्ण-शीर्ण किताबें! मेरी पीढ़ी के लोगों की एक और बहुत बड़ी चिंता यह भी है कि हमारे बाद इन किताबों का क्या होगा? अपने अनेक दिवंगत आत्मीय साहित्य रसिकों के परिवार जन को उनकी बड़े जतन से संजोई लाइब्रेरियों के लिए फिक्र करते मैंने देखा है.

बहरहाल, आज तो मुझे किताबों से जुड़ी एक मज़ेदार घटना की याद आ रही है, उसी को आपसे साझा कर रहा  हूं. इस घटना को साझा करने से पहले यह कह दूं कि जिन मित्र से इस घटना का ताल्लुक है, उनके प्रति अवज्ञा या अवमानना का लेश मात्र भी भाव मेरे मन में नहीं है और उनकी मज़बूरी को अच्छी तरह समझता हूं.  महज़ अपने पाठकों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए इसे साझा कर रहा  हूं.

दिवाली से पहले के दिन थे. ये दिन कबाड़ियों के लिए ख़ास होते हैं. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, अनुपयोगी सामान निकालते हैं और इस वजह से कबाड़ी लोगों का कारोबार उन दिनों अपने यौवन पर होता है. वो एक छोटा-सा कस्बा था जहां हम रहते थे. कुछेक कबाड़ी जो ठेलों पर अपना धंधा चलाते थे, मुझे भी जानते थे. जानने की वजह यह थी जब भी उनके ठेलों पर किताबें नज़र आतीं, मैं उन्हें रोकता और उनमें से अपने काम की किताबें छांट कर बिना मोलभाव किए खरीद लिया करता था. वे कबाड़ी कोई खास पढ़े लिखे तो थे नहीं, पर उन्हें यह ज़रूर समझ में आता था  कि  यह आदमी वो किताबें खरीदता है जिन्हें कोई दूसरा छूता तक नहीं है. मुझे इन कबाड़ियों से कई दफा बेशकीमती साहित्यिक सामग्री मिल चुकी थी, इसलिए मैं भी उनकी  तलाश में रहता था.

तो उस दिन जब मैं अपने कॉलेज जा रहा था, ऐसे ही एक परिचित कबाड़ी ने मुझे आवाज़ दी, और कहा कि साहब आज तो आपके काम का बहुत सारा माल मेरे पास आया है. मैं रुका, उसने अपना ठेला सड़क के किनारे खड़ा किया और किताबों के एक बड़े ढेर की तरफ इशारा कर मुझे अपने पसंद की किताबें चुन लेने को आमंत्रित किया. वाकई वे उम्दा साहित्यिक किताबें थीं. कविताओं की, कहानियों  की, लेखों की, आलोचना की. शीर्षक देख कर एक किताब हाथ में ली, उसे खोला तो देखा भीतरी पन्ने पर लिखा था – आदरणीय अमुक जी को सादर भेंट! और नीचे लेखक के हस्ताक्षर थे. मेरी दिलचस्पी जागी. दूसरी किताब देखी, वही बात. तीसरी, चौथी, पांचवीं....यानि ये सारी किताबें मेरे मित्र और सहकर्मी के यहां से आई थीं. बात मुझे समझ में आ गई. रचनाकार, विशेष रूप से युवा और उभरते हुए रचनाकार अपनी  नव प्रकाशित किताबें  सम्मति और  आशीर्वाद के लिए अपने वरिष्ठ रचनाकार सथियों को भेंट करते हैं. मेरे उन  मित्र को भी स्वभावत: ऐसी बहुत सारी किताबें  भेंट  में प्राप्त हुई थीं, और उन्होंने दिवाली की सफाई के दौरान उन किताबों से इस तरह निज़ात पाई थी. जैसा मैंने कहा, हम मध्यवर्गीय  लोगों के घरों में इतनी जगह नहीं होती कि जितनी किताबें हम चाहते हैं उन सबको सहेज कर रख सकें, ऐसे में किताबों की छंटनी एक मज़बूरी के रूप में सामने आती है.

ख़ैर! मुझे मज़ाक सूझा. दोस्तों में यह आम बात है. मैंने कोई बीसेक किताबें उस ठेले से खरीदीं. तब वो पचास पैसे में एक किताब देता था. दस रुपये बहुत ज़्यादा नहीं थे मज़ाक के नाम पर. किताबें घर लाया, और जहां-जहां उनके लेखकों ने मेरे परम मित्र का नाम लिखकर अपने दस्तखत कर रखे थे, उनके ठीक नीचे लिखा, आदरणीय अमुक जी को पुन: सादर भेंट! और अपने हस्ताक्षर कर दिए. शाम को उनके घर गया, और पूरी गम्भीरता और विनम्रता से उनसे कहा कि आपके लिए एक छोटी-सी भेंट लेकर हाज़िर हुआ हूं. और यह कहकर उन किताबों का ठीक से बनाया हुआ पैकेट उनके सामने रख दिया. उन्होंने बड़ी उत्सुकता से उस बण्डल को खोला......

और फिर?

बस! फिर क्या हुआ यह मत पूछिये!

इतना कह दूं कि बरसों बीत जाने के बाद अब भी हमारी दोस्ती उतनी ही प्रगाढ़ है! 

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लोकप्रिय दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में 18 फरवरी, 2014 को सप्रेम मिली किताबें कबाड़ी को चढ़ी भेंट शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख. 

Tuesday, February 11, 2014

यादें सांस्कृतिक कार्यक्रमों की

पिछले कुछ बरसों से जनवरी-फरवरी के महीने अपने प्रांत में शिक्षण संस्थाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए आरक्षित हो गए हैं. अगस्त में छात्र संघों के चुनाव होते हैं, फिर नेताओं की उपलब्धता के अनुसार उनका उद्घाटन होता है (आजकल तो छात्र संघ कार्यालयों का उद्घाटन अलग से होने लगा है) और फिर साल बदलते-बदलते सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मूड बनने लगता है. अपनी पैंतीस से भी ज़्यादा  सालों की नौकरी के दौरान मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों  के अनगिनत रोचक और मज़ेदार अनुभव हुए हैं. आज उन्हीं  में  से कुछ आपसे साझा कर रहा हूं.

जिस  ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उस ज़माने में मेरे उस कॉलेज में विद्यार्थियों को नाटक करने का बड़ा शौक था. एक पूरी सांझ नाट्य संध्या के नाम से आयोजित की जाती थी और कम से कम दस-बारह एकांकी मंचित किए जाते थे. कलाकारों का उत्साह अपनी जगह और दर्शकों की हिम्मत अपनी जगह. दोनों में जैसे रस्साकसी चलती थी. उस रात नाट्य संध्या का संयोजन मैं कर रहा था. तेज़ सर्दी थी. कोई छठा या सातवां नाटक ख़त्म हुआ था, मैंने अगले नाटक की उद्घोषणा की और नेपथ्य में अपनी कुर्सी पर आ बैठा. कोई चार-पांच मिनिट हुए होंगे कि उस नाटक के कलाकार भी स्टेज छोड़ वहीं आने लगे. मुझे ताज्ज्जुब हुआ. पूछा क्या हुआ? तो बजाय कुछ बोलने के उन्होंने मुझे मंच की तरफ जाने का इशारा कर दिया.  जाकर  देखा तो ऐसी तनहाई का जवाब नहींवाला आलम था. पूरा पाण्डाल खाली पड़ा था. बेचारे किसके लिए नाटक करते?

थोड़ा और पीछे की तरफ लौटता हूं तो याद आता है कि उस छोटे कस्बे में सहशिक्षा का कॉलेज होने के बावज़ूद लड़कियां मंच पर आने में झिझकती थीं. लड़कियों की भूमिकाएं लड़कों को ही निबाहनी पड़ती थीं. हम लोग एक साहित्यिक नाटक कर रहे थे और सभी चाहते थे कि उसमें नायिका का रोल कोई लड़की ही करे. कई छात्राओं से बात की लेकिन सभी ने अपने मां-बाप की मनाही की दुहाई देते हुए मना कर दिया. अंतत: एक साथी प्राध्यापिका ने मां बाप को मनाने की ठानी और वे बड़े उत्साह के साथ एक लड़की के घर जा पहुंची. अभिभावकों ने भी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, चाय-पानी करवाया. लेकिन जैसे ही उन्होंने यह अनुरोध किया कि वे अपनी बेटी को नाटक में अभिनय करने की अनुमति दें, मां-बाप के तेवर एकदम से बदल गए. दोनों एक स्वर में बोले: “देखो मैडम जी, नौकरी आप करती हो. आपको जो करना है कर लो. हमारी बेटी तो स्टेज पर न आज जाएगी और न कल!” कहना गैर ज़रूरी है कि उस साल वो  नाटक नहीं हुआ.

एक साल तो और भी मज़ेदार वाकया हुआ. मैं नृत्य प्रतियोगिता का प्रभारी था. प्रभारी के नाते मेरी सबसे बड़ी फिक्र यह थी कि कोई अशालीन प्रस्तुति न हो जाए. एक शाम मैं नृत्य प्रस्तुतियों की स्क्रीनिंग कर रहा था. उन दिनों कैसेट पर संगीत बजाकर नृत्य किए जाते थे. ज़्यादातर विद्यार्थी फिल्मी और राजस्थानी गाने बजाकर उनपर नृत्य करने के इच्छुक थे. तभी एक सीनियर छात्र काफी बड़ा कैसेट प्लेयर लेकर आया. मैंने उससे पूछा कि वो किस गाने पर नृत्य करेगा, तो उसने कुछ लापरवाही के भाव से कहा, सर! मैं इंगलिश गाने पर डांस करूंगा.  मैंने उससे गाने का नाम जानना चाहा तो उसने फिर वही जवाब दुहरा दिया. शायद  उसे लगा होगा कि ये हिंदी के प्रोफेसर साहब भला अंग्रेज़ी गाने की अदरक का स्वाद क्या जानते होंगे! ख़ैर! उसने अपना कैसेट प्लेयर सेट किया, अपना हुलिया दुरुस्त किया और अपने एक साथी को इशारा किया तो उसने प्लेयर का प्ले बटन दबा दिया और इसने थिरकना-मटकना शुरु कर दिया. तीन-चार सैकण्ड बीते होंगे कि मुझे समझ में आ गया कि जिस इंगलिशगाने पर वो डांस  करना चाहता है वो फ्रेंच संगीतकार शेरोने का उन दिनों कुख्यात नम्बर लव इन सी-माइनर था  जिसमें  शारीरिक सम्बंधों के  संकेत देने वाले ड्रम और  कामोत्तेजक ध्वनियां थीं. ज़ाहिर है कि मैं उस नम्बर से भली  भांति परिचित था (अखिर हम भी तो जवान थे) और उस पर डांस करने की अनुमति देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था. मैंने फौरन संगीत बंद करने का इशारा किया, और कहा कि वह अपने डांस के लिए कोई और गाना चुन ले. वह विद्यार्थी बार-बार कह रहा था कि सर यह अंग्रेज़ी गाना है, और मैं इसी पर डांस करना चाहता हूं,  और मैं था कि बार-बार उससे कह रहा  था कि वो कोई और गाना चुने. उसे लग रहा था कि मुझे अंग्रेज़ी गाना समझ में नहीं आ रहा है जबकि  मुझे वो नम्बर  कुछ ज़्यादा ही समझ में आ रहा था. चचा ग़ालिब ने शायद  ऐसी ही किसी स्थिति में कहा  होगा: 
यारब न  वो समझे  हैं  न समझेंगे  मेरी बात
दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 फरवरी, 2014 को जब हिंदी के प्राध्यापक ने जाना अंग्रेज़ी गाना शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख. 

Tuesday, December 24, 2013

जब एक विद्यार्थी ने पूरे कॉलेज को मामू बना डाला

प्रदेश में नई सरकार बन गई है और उसने जोर-शोर से काम शुरु कर दिया है. आम तौर पर सरकारें या तो शुरु में सक्रिय होती हैं या उस वक़्त जब उनके अस्तित्व पर कोई संकट आता है,  वरना तो वे सरक-सरक कर ही चलती हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि राजस्थान की नई सरकार इस धारणा को मिथ्या साबित करेगी और जन आकांक्षाओं पर खरी उतरेगी.  बहरहाल, मुझे आज याद आ रहा है 1975 का इमर्जेंसी का वो दौर जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए तमाम प्रजातांत्रिक नागरिक अधिकारों को  स्थगित कर दिया.  

उन दिनों प्रधानमंत्री का  बीस सूत्री कार्यक्रम बहुत उत्साह से प्रचारित किया जा रहा था. जनता को बताया जा रहा  था कि यह कार्यक्रम उसकी हालत बदल देगा. सरकारी संस्थाओं पर यह अनकहा दबाव था कि वे जी-जान से इसके प्रचार-प्रसार में जुट जाएं. कुछ दबाव और इससे भी अधिक सरकारी अमले की वफ़ादारी. हर तरफ बीस-बीस का ही शोर था.  मैं उन दिनों राज्य के एक छोटे कस्बे के एक महाविद्यालय में हिन्दी पढ़ाया करता था. मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य जी को भी अपनी वफ़ादारी  दिखाने का जोश चढ़ा  और उन्होंने आनन-फानन में बीस सूत्री कार्यक्रम से होने वाले फायदों पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन  करने की घोषणा कर डाली. उस छोटे कस्बे के छोटे महाविद्यालय में कोई सभा भवन तो था नहीं. एक बड़े कमरे में वह गोष्ठी आयोजित की गई. हर संस्थान में, और ख़ास तौर पर शिक्षण संस्थानों  में ऐसे कुछ लोग अवश्य ही होते हैं जो किसी भी विषय पर अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत करने को सदा सुलभ रहते हैं. हक़ीक़त तो यह है कि ऐसे वीर पुरुषों के दम पर ही इस किस्म के  आयोजन सम्पन्न किए जाते हैं. संस्था प्रधान भी यही चाहता है कि कुछ लोग प्रस्ताव के पक्ष में कुछ सुन्दर-सुन्दर विचार व्यक्त कर दें और सुख शांति पूर्वक रस्म अदायगी हो जाए!  और यही उस गोष्ठी में भी हुआ. विद्वान प्राध्यापकों ने बताया कि बीस सूत्री कार्यक्रम के आते ही देश की तक़दीर बदलने की शुरुआत हो चुकी है और बस कुछ ही समय में सब कुछ फर्स्ट क्लास हो जाने वाला है. ‘मौका भी है, दस्तूर भी’ का निर्वहन करते हुए एक से बढ़कर एक अच्छी-अच्छी  बातें की गईं.

गोष्ठी समापन की तरफ़ बढ़ रही थी, तभी एक विद्यार्थी ने संयोजक से अनुरोध किया कि वह भी अपने विचार व्यक्त करना चाहता है. छोटा महाविद्यालय था, सभी सबको जानते थे. किसी तरह के ख़तरे की कोई आशंका नहीं थी. वो विद्यार्थी वैसे भी अच्छा वक्ता और लोकप्रिय डिबेटर था. अत:  संयोजक ने सहर्ष उसे बोलने की अनुमति दे दी. उस विद्यार्थी ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा कि प्रधानमंत्री जी ने बीती रात अपने बीस सूत्री कार्यक्रम में पाँच  सूत्र और जोड़े हैं और अब यह पच्चीस सूत्री कार्यक्रम हो गया है. उसने यह बात इतने आत्मविश्वास से कही कि बाद वाले किसी भी वक्ता ने न केवल उसकी  बात का खण्डन नहीं किया, पच्चीस सूत्री कार्यक्रम की ही आरती गाई. बाद में तो संयोजक ने भी उस गोष्ठी को प्रधानमंत्री के पच्चीस सूत्री कार्यक्रम के नाम कर दिया और प्राचार्य जी ने भी पच्चीस सूत्री कार्यक्रम की शान में ही कसीदे पढ़े.  आज की बात होती तो जब वह विद्यार्थी बोल रहा था तभी किसी ने अपने मोबाइल पर गूगल करके उसके कथन की सत्यता को जांच भी लिया होता. लेकिन याद रखें, वो ज़माना, इण्टरनेट का तो दूर,  टीवी का भी नहीं था. ख़बरों का एक मात्र माध्यम था सरकारी रेडियो या फिर 24 घण्टों में एक बार आने वाला अख़बार. यानि विद्यार्थी के कथन को तत्काल जांचने का कोई तरीका उपलब्ध ही नहीं था.  

गोष्ठी बहुत बढ़िया तरह से सम्पन्न हो गई. लेकिन कुछेक लोगों के मन में यह बात ज़रूर खटकती रही कि प्रधानमंत्री जी ने अपने बीस सूत्री कार्यक्रम को बढ़ाकर पच्चीस सूत्री कर दिया, और उन्हें ख़बर तक नहीं हुई! ऐसा कैसे हो गया? घर जाकर रेडियो सुना, तो पाया कि वहां तो बीस सूत्री कार्यक्रम का ही कीर्तन जारी था. किसी भी बुलेटिन में पच्चीस सूत्र नहीं थे. अगले दिन स्टाफ रूम में यही चर्चा थी. हरेक यही ताज्जुब कर रहा था कि जिन पच्चीस सूत्रों की बात उस विद्यार्थी ने कल की थी, वे तो कहीं थे ही नहीं.

ज़ाहिर है कि उस विद्यार्थी ने हम सबको मामू बना दिया था. आज भी वो घटना याद आती है तो उस विद्यार्थी के आत्मविश्वास भरे कौतुक और हम सबके अपनी जानकारी पर भरोसे की कमी को याद करते हुए एक मुस्कान उभर आती है.
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 24 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Monday, July 16, 2012

राजस्थान में उच्च शिक्षा: कुछ असुविधापूर्ण सवाल



पिछले दिनों अखबारों में पढ़ा कि राजस्थान सरकार अपने कॉलेजों में पाँच हज़ार  सीटों की वृद्धि करने का इरादा रखती है. इस बात से खुश हुआ जाना चाहिये कि अपनी सरकार अपनी युवा पीढ़ी के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए चिंतित और कृत संकल्प है. मैं भी खुश हूं. आखिर जिन्होंने ठीक-ठाक, बल्कि अच्छे अंकों से सीनियर सैकण्ड्री परीक्षा उत्तीर्ण की है उन्हें उच्च शिक्षा का अवसर मिलना ही चाहिए. 


लेकिन क्या बात इतनी सीधी-सरल है? पहली बात तो मेरे मन में यह आती है कि  हर बरस महाविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या घटाने-बढ़ाने का यह प्रहसन क्यों मंचित किया जाता है? इस बार भी पहले एक ख़बर संख्या घटाने की आई थी, फिर दूसरे-तीसरे दिन पूर्ववत कर देने की, और अब वृद्धि की यह खबर. क्या कोई सुनिश्चित नीति नहीं बनाई जानी चाहिए? क्या सीधे-सीधे यह नहीं किया जा सकता कि एक निश्चित प्रतिशत से अधिक अंक लाने वाले सारे विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा! हर बार सेक्शन में संख्या बढ़ाने और नए सेक्शन के लिए हड़ताल-आन्दोलन वगैरह की ज़रूरत को ख़त्म क्यों नहीं किया जाना चाहिए? आखिर हर बार यह क्यों ज़रूरी हो कि पहले विद्यार्थी आन्दोलन करें और उसके बाद सरकार ‘कृपा पूर्वक’ हर सेक्शन में साठ की बजाय सत्तर या अस्सी विद्यार्थी प्रविष्ट करने की घोषणा कर अपनी उदारता प्रदर्शित करे?

लेकिन चिंता की बात यही नहीं है. सरकार यह जो पाँच हज़ार  विद्यार्थियों की वृद्धि अपने कॉलेजों में करने जा रही है, क्य उनके  लिए समुचित सुविधाएं पहले से विद्यमान थीं और अब तक उनका उपयोग नहीं हो रहा था? या अब प्रवेश के बाद इनके लिए सुविधाओं का सृजन होगा, और या यह कि बिना किसी सुविधा विस्तार के इन विद्यार्थियों को प्रवेश दे दिया जाएगा?  अपनी बात  को और स्पष्ट करूं. क्या हमारे महाविद्यालयों में इन पाँच हज़ार  अतिरिक्त विद्यार्थियों के बैठने के लिए कमरे हैं, इनके लिए फर्नीचर आदि है, इनके लिए प्रयोगशाला उपकरण हैं, इनके लिए पुस्तकालय  में किताबें हैं, इनके अभिलेख आदि संधारित करने के लिए लिपिकीय संसाधन हैं, आदि.  हमने हर सेक्शन में जितने छात्रों  को प्रवेश देने का निर्णय किया है क्या हमारे कॉलेजों में उनके वास्ते उतने बड़े कमरे हैं, और क्या उन कॉलेजों के पास उतने विद्यार्थियों को बिठाने के लिए आवश्यक फर्नीचर है? हक़ीक़त यह है कि हमारे अधिकांश  महाविद्यालयों में जो कक्षा कक्ष हैं उनमें साठ विद्यार्थियों को बिठाना भी मुश्क़िल होता है. तो फिर ये बढ़े हुए विद्यार्थी कहां बैठेंगे? हमारे ज़्यादातर महाविद्यालय फर्नीचर के अभाव से ग्रस्त हैं. अब उसी कम पड़ते फर्नीचर का इस्तेमाल ये पाँच हज़ार नए विद्यार्थी और करेंगे तो क्या हाल होगा! और यह तो बहुत स्पष्ट है कि तुरंत न तो इन कमरों का आकार बढने वाला है, न नए कमरे बनने वाले हैं. फर्नीचर के लिए भी बजट स्वीकृत होगा, आवंटित होगा, कॉलेजों तक पहुंचेगा और फिर क्रय प्रक्रिया शुरू होगी, निविदा सूचनाएं जारी होंगी, क्रयादेश जारी होंगे, सामान की आपूर्ति होगी, भण्डार पंजिकाओं  में उनका इन्द्राज होगा – इस सबमें, अगर यह प्रक्रिया आज ही शुरू हो जाए तब भी कम से कम छह आठ महीने तो लग ही जाएंगे. और मुझे पूरा विश्वास है कि अभी इस  प्रक्रिया को शुरू करने की कोई सुगबुगाहट तक नहीं होगी. यानि कम से कम इस बरस तो ये नए पाँच  हज़ार विद्यार्थी बगैर कमरों और बगैर फर्नीचर के (पता नहीं कहां और कैसे) पढ़ेंगे. 
    
अब इससे आगे की बात!  क्या इन  विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए अतिरिक्त शिक्षकों भी भी ज़रूरत होगी, या हमारे पास पहले से ही इतने ज़्यादा शिक्षक हैं और अब तक वे फालतू बैठे तनख्वाह ले रहे थे, वे इनको पढ़ा लेंगे.  जहां तक मेरी जानकारी है, अभी जितने विद्यार्थी हमारे  पास हैं उनके लिए भी समुचित संख्या में  प्राध्यापक नहीं हैं. यह बात और भी अलग है कि जो शिक्षक हमारे पास हैं उनका न तो समान और संतुलित वितरण हमारे कॉलेजों में है और न उनके पदस्थापन में कोई तर्क संगतता नज़र आती है. एक तरफ बड़े शहरों (जैसे अजमेर, बीकानेर, भरतपुर, कोटा वगैरह)  या उनके पास के कस्बों (जैसे किशनगढ़, नसीराबाद, दौसा वगैरह)  वाले कॉलेजों में लगभग शत प्रतिशत पद भरे हुए हैं (बल्कि कहीं-कहीं तो उससे भी ज़्यादा लोग कार्यरत हैं) तो वहीं दूसरी तरफ दूरस्थ और ग्रामीण इलाकों के महाविद्यालयों में शिक्षकों का भयंकर अभाव है. जो लोग प्रभावशाली हैं वे किसी न किसी तरह प्रतिनियुक्ति आदि का जुगाड़ करके कॉलेजों में जाने से भी बच जाते हैं. यह विषयांतर होगा, लेकिन मेरी निजी जानकारी है कि बहुत सारे महापुरुषों और महामहिषियों ने बरसों से कॉलेजों का मुंह ही नहीं देखा है. कुछेक तो इतने महान हैं कि अपने दामन पर पढ़ाने का एक भी कलंक लगाए बगैर रिटायर तक हो गए. सरकार किसी की भी आई, वे पढ़ाने नहीं गए तो नहीं ही गए. तो ऐसे में ये जो नए पाँच हज़ार  विद्यार्थी हम अपनी संस्थाओं में लाने जा रहे हैं, उन्हें कौन पढ़ाएगा? क्या इनको पढ़ाने वालों के लिए नए पद मांग लिए गए हैं, उन पदों को प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति मिल गई है, उन पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई ? अगर इन सारे सवालों के जवाब हां में हो तो भी हम सब जानते हैं कि इस सारी प्रक्रिया से गुज़र कर नए प्राध्यापकों को आने में एक साल से अधिक ही लग जाता है. यानि अगले शैक्षिक सत्र से पहले तो उम्मीद ही मत कीजिये. लेकिन यह सब तो तब की बात है, जब वो प्रक्रिया शुरू कर दी गई हो. असल में तो ऐसा हुआ नहीं है. यानि हमारे  पास इन नवागंतुक विद्यार्थियों के लिए न अध्यापक हैं, न कमरे, न फर्नीचर न कोई और संसाधन और हम इन्हें प्रवेश देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रहे हैं.  क्या यह बात किसी को भी नज़र नहीं आती है? क्या यह विद्यार्थियों के साथ छल नहीं है? हम उनसे फीस लेंगे, लेकिन उनको पढ़ाएंगे नहीं. हमारे पास न पढ़ाने वाले हैं और न उन्हें बिठाने की जगह! हम क्यों प्रवेश दे रहे हैं इनको?

लेकिन दुखद बात यह कि इस पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है. न विद्यार्थी, न उनके संगठन, न जन प्रतिनिधि, न शिक्षक और न शिक्षक संगठन. जैसे पाँच हज़ार विद्यर्थियों को प्रवेश देते ही सारी समस्याएं हल होने जा रही हैं. संकट प्रवेश का था, पढ़ाई का नहीं! विद्यार्थी संगठनों की  जीत हो गई, पाँच हज़ार नए वोटर मिल गए. और क्या चाहिये? पढाई की कहां और किसे ज़रूरत है? पढ़ाई हो यह तो किसी की भी चिंता में दूर-दूर तक नहीं है.
  
तो क्या सबने यह मान लिया है कि उच्च शिक्षा की गाड़ी तो ऐसे ही चलेगी? विद्यार्थी प्रवेश ले ले, जिसको स्कॉलरशिप मिलनी है वो स्कॉलरशिप ले ले, और घर  जाए, मज़े करे. अध्यापक भी बहुत सहज  निर्लिप्त भाव से कॉलेज जाए, अपना रजिस्टर उठाए, कक्षा तक जाए और यह कहता हुआ लौट आए कि क्या करें, विद्यार्थी आते ही नहीं हैं. प्रिंसिपल साहब भी डेढ़ दो बजे के बाद चैन की सांस लें कि चलो आज  का दिन तो बीता. डेढ़ दो बजे के  बाद ज़्यादातर कॉलेजों का माहौल कैसा होता है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. विश्वास न हो तो कभी जाकर देख लें. टाइमटेबल में भले ही कक्षाएं पाँच बजे तक दिखाई जाती हों, दो बजे के बाद ज़्यादातर कॉलेजों में सन्नाटा पसरा होता है.

यानि सब,  मंत्री जी से लेकर चपरासी तक इस झूठ-फरेब में शामिल हैं. क्या यह स्थिति क्षोभ जनक नहीं है? न कोई पढ़ाना चाहता है न कोई पढ़ना. बस आंकड़े पूरे हो जाएं. क्या  मतलब है उपस्थिति की अनिवार्यता का? हर साल कितने विद्यार्थियों को उपस्थिति की कमी की वजह से नियमित विद्यार्थी के रूप में परीक्षा देने से रोका जाता है? न्यायालय का आदेश है कि कक्षाओं में पिचहत्तर प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य  होनी चाहिए. अगर हर बरस अधिकांश विद्यार्थी नियमित परीक्षा देते हैं तो इसका मतलब यह है कि वे अपनी 75% कक्षाओं में हाज़िर रहते हैं. अब जो नए विद्यार्थी आएंगे वे भी हाज़िर रहेंगे, भले ही कॉलेजों में न कमरे हों, न फर्नीचर और न अध्यापक. है ना कमाल की बात!  यही बात विभिन्न छात्रवृत्तियों के सम्बन्ध में भी है. विद्यार्थी छात्रवृत्ति पाने का हक़दार तभी होता है जब कक्षा में उसकी उपस्थिति पूरी हो. यह हक़ीक़त है कि जो भी छात्रवृत्ति का पात्र है उसे छात्रवृत्ति मिलती ही है, यानि वह कक्षा में यथानियम उपस्थित रहता है. अगर इस नज़र से देखें तो एक चमत्कार का सामना करना होगा. चमत्कार यह कि दूर दराज़ के कॉलेजों में जहां न फर्नीचर है न कमरे  और न अध्यापक, वहां भी  हमारे अध्ययनशील विद्यार्थी नियमित रूप से उपस्थित होकर अध्ययन करते हैं! बहुत मुमकिन है कि वे पेड़ों के नेचे अपने-अपने रुमल बिछाकर बैठ जाते होंगे और स्वाध्याय करते होंगे. जय हो! 

क्या कोई यह बताएगा कि यह सारा नाटक क्यों हो रहा है और कब तक होगा? इस तरह किसको बेवक़ूफ बनाया जा रहा है? और बेवक़ूफ  बनाने के इस धत्कर्म पर कितना पैसा फूंका जा रहा है? क्यों आधे-अधूरे मन से उच्च शिक्षा के प्रसार का यह  भ्रमजाल फैलाया जा रहा है? क्यों इस तरह निर्ममता से पैसा फूंक कर अधकचरे स्नातकों की फौज तैयार की जा रही है जो कोई योग्यता न रखने पर भी (योग्य तो हम उन्हें बना ही कहां रहे हैं?) डिग्री धारी हो जाएगी और फिर यह रोना रोया जाएगा कि इतने सारे उच्च शिक्षा प्राप्त युवा बेरोज़गार हैं!

सोचिये, आखिर कब तक यह बेहूदा प्रहसन चलता रहेगा और आपकी हमारी ग़ाढ़ी कमाई का पैसा फूंका जाता रहेगा, युवाओं के हाथ में उच्च शिक्षा का झुनझुना पकड़ा कर उनको मूर्ख बनाया जाता और देश के भविष्य को धूमिल किया जाता रहेगा? कब तक?

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जयपुर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र 'मॉर्निंग न्यूज़' में 16 जुलाई, 2012 को प्रकाशित.