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Tuesday, April 17, 2018

खूब फल फूल रहा है हमारी निजता का कारोबार!


हमारे-आपके जीवन के बारे में न जाने कितनी जानकारियों, जिन्हें आजकल डाटा  कहा जाता है, के दम पर अनगिनत लोगों और कम्पनियों का धंधा फल फूल रहा है. इस तरह का अध्ययन कर रही एक कम्पनी प्राइवेसी इण्टरनेशनल के एक उच्च अधिकारी का कहना है कि आज हज़ारों कम्पनियां आपका डाटा बटोरने और आपके ऑनलाइन बर्ताव की पड़ताल करने के काम में लगी  हुई हैं. यह धंधा सारी दुनिया में फैला हुआ है.   

हाल में एक टैक्नोलॉजी  पत्रकार कश्मीर हिल ने एक अभिनव लेकिन दिलचस्प प्रयोग किया. उन्होंने अपने एक बेडरूम वाले अपार्टमेण्ट को स्मार्ट होम में तब्दील किया और उसके बाद विभिन्न साधनों  की मदद से यह पड़ताल की कि उनके घर में लगे विभिन्न उपकरणों के माध्यम से उनकी निर्माता कम्पनियों ने उनके बारे में कितना डाटा संग्रहित किया है. वे यह जानकर आशचर्यचकित रह गईं कि उनका स्मार्ट टूथ ब्रश अपनी निर्माता  कम्पनी को यह खबर दे रहा था कि उन्होंने कब ब्रश किया और कब नहीं किया, उनका स्मार्ट टीवी अपने निर्माता को हर पल यह बता रहा था कि वे कौन-सा प्रोग्राम देख रही हैं, और उनका स्मार्ट स्पीकर दुनिया के सबसे बड़े ऑनलाइन खुदरा व्यापारी को (जो कि उस स्पीकर का निर्माता भी है) हर तीसरे मिनिट उनके बारे में जानकारियां मुहैया करवा रहा था. पत्रकार कश्मीर हिल ने यह पड़ताल करने के लिए अपनी एक दोस्त सूर्या मट्टू की मदद ली जिन्होंने एक विशेष रूप से बनाए गए वाई फाई राउटर की मदद से इन जासूसों की जासूसी की. इन जानकारियों के बाद कश्मीर हिल यह सोचकर और ज़्यादा चिंतित हुईं कि अगर उनके यहां से भेजी जा रही ज्ञात जानकारियां इतनी ज़्यादा हैं तो वे जानकारियां कितनी अधिक होंगी जिनके बारे में उन्हें भी अभी पता नहीं चल सका है. उन्होंने बहुत व्यथित होकर कहा कि मुझे लगता है कि हम एक निहायत ही व्यावसायिक निज़ाम में रह रहे हैं जिसकी नज़र हमारे हर क्रियाकलाप पर है.

इसी संदर्भ में यह भी याद कर लिया जाना उपयुक्त होगा कि हाल में इस आशय की ख़बरों ने बड़ा हंगामा बरपा किया था कि फ़ेसबुक के लगभग पौने नौ करोड़ उपयोगकर्ताओं की प्रोफ़ाइल सूचनाएं बग़ैर उनकी जानकारी के एक मार्केटिंग कम्पनी कैम्ब्रिज एनेलिटिका तक पहुंचा दी गई हैं. हाल में फ़ेसबुक के सीईओ मार्क ज़ुकरबर्ग ने इस बात पर सार्वाजनिक क्षमा याचना भी की है. लेकिन यह कोई अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं है. एक बरस पहले एक स्मार्ट टीवी निर्माता पर भी इस  आशय के आरोप लगे थे  कि उसने बग़ैर अपने ग्राहकों को सूचित किए या उनसे अनुमति लिए उनके टीवी सेट्स में ऐसा सॉफ्टवेयर लगा दिया था जो उनके टीवी देखने की आदतों के  बारे में जानकारियां एकत्रित कर रहा  था. ये जानकारियां विभिन्न कम्पनियों को उपलब्ध कराई जा रही थीं ताकि इनके आधार पर वे अपने विज्ञापन प्रसारित कर सकें. तब इस टीवी निर्माता कम्पनी ने  इस बारे में अमरीकी फेडरल ट्रेड कमीशन में चल रहे एक मुकदमे में भारी धनराशि चुका कर अदालत के बाहर समझौता किया था.

असल में होता यह है कि हममें से बहुत सारे लोग बिना पैसे खर्च किये बहुत सारी सुविधाओं का इस्तेमाल करने के लालच में न केवल अपने बारे में बहुत सारी जानकारियां खुद परोस देते हैं, उनके निर्बाध इस्तेमाल की अनुमति भी प्रदान कर देते हैं. जब भी हम कोई मुफ्त वाला सॉफ्टवेयर या एप डाउनलोड करते हैं, एक सहमति सूचक बटन –एग्री-  पर भी हमें क्लिक करना होता है और हममें से शायद ही किसी के पास इतना धैर्य  हो कि यह जानने की कोशिश करें कि हम किस बात के लिए अपनी सहमति दे रहे हैं. अमरीका की कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के दो शोधकर्ताओं ने बताया है कि अगर आप हर एप की प्राइवेसी पॉलिसी को स्वीकार करने से पहले ठीक से पढ़ना चाहें तो आपको हर रोज़ आठ घण्टे लगाकर पूरे 76 दिन तक पढ़ते रहना होगा.  लेकिन मामला विस्तार का ही नहीं है. इस सहमति की आड़ में हमारी जानकारियों का जो सौदा होता है वह प्राय: विधि सम्मत नहीं होता है.

शायद यही वजह है कि अब दुनिया के कई देश इस बे‌ईमानी के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं. हाल में यूरोप में जो जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेग्युलेशन (जीडीपीआर) लागू हुआ है वह वहां के उपभोक्ताओं को उनके डाटा पर अधिक नियंत्रण के लिए सक्षमता प्रदान  कर रहा है. लेकिन अमरीका इस मामले में अभी भी पीछे है. वहां के नागरिकों को यह जानने का भी हक़ नहीं है कि किस कम्पनी ने उनके बारे में कौन-सा डाटा संग्रहित किया है. इस बारे में अपने देश की तो बात ही क्या की जाए! आधार को लेकर जो आशंकाएं व्यक्त की गई हैं और जो छिट पुट चिंताजनक ख़बरें आई हैं उन्होंने भी कोई गम्भीर हलचल अपने यहां पैदा नहीं की है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 अप्रैल, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 2, 2015

आपसे ज्यादा महत्व है आपके डेटा का

आप किसी स्टोर में खरीददारी करने जाते हैं और जब बिलिंग की बारी आती है तो आपसे नाम पूछने के बाद प्राय: आपका मोबाइल नम्बर भी पूछा जाता है. आप सहज रूप से बता देते हैं. आप इण्टरनेट पर किसी सेवा, चाहे वो ई मेल खाता हो, कोई सोशल नेटवर्किंग साइट हो या कुछ और, के लिए साइन इन करते हैं तब आपके सामने एक बॉक्स आता है, जिसके आगे छपा होता है – आई एक्सेप्ट यानि मैं स्वीकार करता हूं. आप उस पर टिक कर देते हैं. हममें से शायद ही कोई इतना जागरूक या धैर्यवान हो कि वह उस पूरी इबारत को पढ़े जिसे उसने स्वीकार किया है.

ये और इस तरह की बहुत सारी निरापद लगने वाली हरकतें करते समय हम शायद ही इस बात से वाक़िफ हों कि ऐसा करते हुए हम न केवल दूसरों को अपनी निजता में ताका झांकी करने का अधिकार सौंप रहे हैं, अनजाने में ही उस परिघटना का शिकार भी हो रहे हैं जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के ज्ञान और प्रबंधन के निदेशक नजीब अल शोराबजी ने अपने एक भाषण में ‘डेटा कोलोनियलिज़्म’ का नाम दिया था. कोलोनियलिज़्म यानि उपनिवेशवाद का नाम आते ही हमारे कान खड़े हो जाते हैं. क्या है यह डेटा कोलोनियलिज़्म? इन नजीब अल शोराबजी ने तो डेटा कोलोनियलिज़्म संज्ञा का प्रयोग उस स्थिति के लिए किया था जिसमें पश्चिमी  देश अफ्रीकी राष्ट्रों के स्वास्थ्य विषयक डेटा का दोहन कर रहे हैं, बिना अफ्रीकी देशों को इसका तनिक भी लाभ दिये. लेकिन यह तस्वीर का बहुत छोटा हिस्सा  है. इस डेटा कोलोनियलिज़्म का आकार कितना बड़ा हो चुका है इसका अन्दाज़ आप सिर्फ इस जानकारी से लगा लीजिए कि इस बरस यानि 2015 में अकेले भारत में इसका मूल्य एक बिलियन डॉलर यानि करीब सात हज़ार करोड़ रुपये  आंका गया है.

असल में आज की दुनिया में डेटा एक कमोडिटी बन गया है, एक ऐसी वस्तु  जिसका मोल सोने से भी ज़्यादा है. यह जो उन तमाम वेबसाइट्स का मायाजाल है जो आपके सामने आकर गिड़गिड़ाती हैं कि आप अपने स्मार्ट फोन पर उनकी एप डाउनलोड कर लें – क्या यह बेवजह है? मुझे बहुत खुशी होती है जब किसी एप की वजह से तुरंत मेरी गैस बुक हो जाती है या बिना यह बताए कि मैं कहां खड़ा हूं, मेरी बुलाई हुई कैब आकर मेरे सामने खड़ी हो जाती है. लेकिन यह सब तस्वीर का एक पहलू ही है. दूसरा पहलू जो ज्यादा चौंकाने और विचलित करने वाला है वह यह है कि इस तरह मेरे पूरे बर्ताव पर नजर रखी जा रही है. क्या आपने कभी नोट किया है कि जब आप अपने किसी ई मेल में किसी हिल स्टेशन पर जाने की बात लिखते हैं, तो उसी समय उस पेज के दाहिनी तरफ  उसी हिल स्टेशन के होटलों के विज्ञापन क्यों दिखाई देने  लगते हैं? जब आप किसी पुस्तक विक्रेता की साइट पर किसी किताब को तलाश करते हैं तो उससे मिलती जुलती किताबों के सुझाव कैसे आने लगते हैं? जब आप कोई पोर्न साइट विज़िट करते हैं तो क्यों और कैसे उसी समय आपके शहर का नाम लेते हुए आपको यह सूचनाएं मिलने लगती हैं कि वहां  रास रचाने की सुविधाएं आपके इंतज़ार में हैं. ये चन्द उदाहरण हैं जिनसे  आप अनुमान लगा सकते हैं कि आपके अनजाने में आपके क्रिया कलाप पर नज़र रखी जा रही है.

और इसी ताका-झांकी के खेल, बल्कि बड़े कारोबार की तरफ मैं आपका ध्यान खींचना चाह रहा हूं.  दरअसल इस तरह डेटा संग्रहण करते हुए भविष्य की एक ऐसी संरचना की कल्पना की जा रही है जिसमें मानवीय विवेक को इन सूचनाओं के संसाधन द्वारा प्राप्त निष्कर्षों पर कुर्बान कर दिया जाएगा. जन्म से मृत्यु तक आपकी हर गतिविधि को लगातार रिकॉर्ड और संसाधित किया जाएगा और उसी के अनुसार तमाम गतिविधियों जिनमें व्यावसायिक और प्रशासनिक सभी तरह की गतिविधियां शामिल हैं, संचालित किया जाएगा. ऊपर से यह बात भले ही आकर्षक लगे, इसमें जो ख़तरे निहित हैं उनकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती. मसलन यह कि सोच और अनुभव को डेटा विस्थापित कर डाले और यह भी कि अगर इन डेटा को तोड़ मरोड़ कर मनचाहे निष्कर्ष निकाल लिये जाएं तो? वायर्ड  पत्रिका के पूर्व मुख्य सम्पादक क्रिस एण्डरसन ने जब अपने एक चर्चित लेख में यह कहा था कि इस तरह आंकड़ों   पर अत्यधिक निर्भरता कार्य कारण पद्धति को अप्रासंगिक कर देगी, तो  को दुनिया का चौंक जाना स्वाभाविक ही था. चिंता की बात यह है कि हम अपने अनजाने में आहिस्ता-आहिस्ता उसी व्यवस्था की तरफ बढ़ते जा रहे हैं जिसमें डेटा निर्माण के कच्चे माल यानि ‘लोगों’ की आवाज़ को न सुनकर सिर्फ डेटा की आवाज़ को ही सुना जाएगा. हताशा की बात यह है कि इस चिंताजनक स्थिति में हम अपने आपको बेबस पा रहे हैं.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जून, 2015 को डेटा कोलोनियलिज़्म: आज़ादी का दुश्मन शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.