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Wednesday, July 22, 2020

जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे


मैं सन 1968 से 1974 तक राजकीय महाविद्यालय, चितौड़गढ़ में हिंदी प्राध्यापक रहा. वहीं की एक स्मृति आज साझा कर रहा हूं. 

चित्तौड़ कॉलेज में हमारे साथियों में एक युगल भी था जिसकी चर्चा का संकेत मैंने ऊपर किया था. ये थे विक्रम सिंह और निर्मला कुमारी शक्तावत. विक्रम सिंह जी कदाचित सोशल स्टडीज़ के और निर्मला जी समाज  शास्त्र की व्याख्याता थीं. विक्रम सिंह जी चित्तौड़ के पास के ओछड़ी गांव के ठिकानेदार थे और बहुत बार हम लोगों को अपने फार्म पर ले जाकर दावतें किया करते थे. ऑमलेट का स्वाद मैंने उन्हीं के यहां चखा. एक दौर ऐसा आया जब विक्रम सिंह जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने ज़ोर मारा और वे विधायक पद के लिए कॉंग्रेस का टिकिट पाने के लिए जी-जान से जुट गए. हुआ कुछ ऐसा कि उन्हें टिकिट नहीं मिला लेकिन महिला कोटे के नाम पर हमारी भाभीजी यानी निर्मला जी को टिकिट मिल गया. निर्मला जी शुद्ध  गृहस्थिन किस्म की महिला थीं और इस तरह का सार्वजनिक जीवन उनके स्वभाव के अनुरूप नहीं था, लेकिन अपने पति की महत्वाकांक्षा के दबाव में वे राजनीति में कूद पड़ीं. उनके शुरुआती दौर में मैंने न केवल उनके लिए बहुत सारे भाषण लिखे, उन्हें भाषण देने के तौर तरीके भी सिखाए. एक समय ऐसा था जब किसी सार्वजनिक सभा में जाने से पहले वे मेरा लिखा भाषण कई कई बार मुझे सुनातीं, और फिर यह चाहतीं कि जब वे वाकई भाषण दें  तो मैं वहां मौज़ूद रहूं और फिर घर आकर उस भाषण का ईमानदार विश्लेषण कर उन्हें आगे के लिए मार्ग दर्शन दूं. उनकी राजनीति के शुरुआती दौर में कई बार मैंने सहर्ष यह दायित्व निर्वहन किया भी. उन्होंने शायद अपना पहला भाषण चित्तौड़ के गांधी चौक में दिया था और उसे सुनकर घर लौटने पर मैंने उन्हें उस मेडन स्पीच की कमियों से अवगत कराया था. वो दौर इंदिरा गांधी की लहर का था और उस लहर में निर्मला जी विधायक चुन भी ली गईं. 


इससे आगे का किस्सा बड़ा रोचक है. उनके विधायक चुन लिये जाने के कुछ ही समय बाद मेरा तबादला चित्तौड़ से सिरोही हो गया. मैं चित्तौड़ में बड़ा सुखी और आश्वस्त था. तबादला मेरे लिए बहुत गहरा आघात था. स्वाभाविक रूप से इस तबादले से बचने के लिए मैं उन्हीं भाभीजी के पास गया. विक्रम सिंह जी और भाभीजी ने मुझे मदद का आश्वासन दिया, और साथ ही यह भी कहा कि अमुक दिन उनके यहां खेत सिंह जी (उस समय के एक प्रतापी मंत्री) खाने पर आने वाले हैं, तो मैं भी ‘सहयोग’ करने आ जाऊं. इसी बीच कॉलेज शिक्षा निदेशक उदयपुर से जयपुर जा रहे थे तो वडैहरा साहब मुझे उनसे मिलवाने (और मेरी सिफारिश करने) स्टेशन पर ले गए. वडैहरा साहब ने जब निदेशक जी से कहा कि स्थानीय विधायक भी इनके पक्ष में हैं,  तो वे बहुत ज़ोर से हंसे. बोले,  “ उनके कहने पर ही तो मैंने यह ट्रांसफर किया है.” तस्वीर साफ़ हो चुकी थी. अगले दिन मैंने कॉलेज से ही भाभीजी को फोन किया. कहा, “आपके अब तक के सहयोग और सद्भाव के लिए कृतज्ञ हूं. अनुरोध है कि आप मेरे ट्रांसफर को कैंसल करवाने के लिए कोई प्रयत्न न करें. मैं यहां से रिलीव हो रहा हूं.” वैसे उस समय तबादलों की एक लम्बी श्रंखला बनी थी और कदाचित सारे ही तबादले इसी तरह राजनीतिक दबाव में हुए थे. मेरी जगह नीम का थाना से हेतु भारद्वाज चित्तौड़ आए थे, और मैं जब सिरोही गया तो वहां से इसी तरह जीवन सिंह को अन्यत्र जाना पड़ा था. बाद में मेरे इस प्रसंग का मज़ा लेते हुए हेतु जी ने बारहा साक़िब लखनवी का यह शे’र गुनगुनाया: बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे/ जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे. 

आहिस्ता-आहिस्ता तस्वीर पर से धुंध भी हटी. हुआ यह था कि चित्तौड़ में मुझे एक बहुत अच्छा परिवार मिला – ब्रज रतन भार्गव और उनकी पत्नी लक्ष्मी भार्गव का. भार्गव साहब एस.बी.बी.जे के मैनेजर थे और तीन छोटे बच्चों की युवा मां लक्ष्मी भाभीजी कुछ नया और सार्थक करने को लालायित गृहिणी. बहुत जल्दी हम लोगों का तालमेल बैठा और हमने बहुत सारे नए और सार्थक काम वहां किये. मसलन, हमने एक मैगज़ीन क्लब शुरु किया जिसमें हम सदस्यों से नियमित मासिक शुल्क (उस समय पांच रुपया) लेते और हम उनके घर पत्रिकाओं का एक बड़ा बस्ता भेजते जिसमें से कोई दो पत्रिकाएं वे दो दिन के लिए ले सकते थे. दूसरे दिन फिर हमारा बंदा जाता और उनसे वे पत्रिकाएं लेकर उन्हें नई पत्रिकाएं दे आता. यह व्यवस्था खासी लोकप्रिय हुई और एक समय इसकी सदस्य संख्या सौ तक जा पहुंची. कई पत्रिकाओं की तो हम पांच-पांच प्रतियां मंगवाने लगे थे. कहना अनावश्यक है कि इस मैगज़ीन क्लब का केंद्रीय कार्यालय मेरा घर था. इसी तरह भार्गव भाभीजी के मन में विचार आया कि चित्तौड़ में कोई अच्छा प्री-स्कूल नहीं है, तो क्यों न हम शुरु कर दें? और इस तरह शुरु हुआ एक स्कूल बाल भारती. कुछ समय हमने इसे इधर उधर चलाया और फिर ज़िला प्रशासन के सहयोग के कारण हम इसे डिस्ट्रिक्ट क्लब के भवन में चलाने  लगे. इस स्कूल के लिए मुझे अपनी बहन इंदु (कोचर) का भी बड़ा सहयोग मिला. बल्कि वह इस स्कूल की सर्वाधिक लोकप्रिय शिक्षिका बनी रहीं. अब इस स्कूल की सफलता और लोकप्रियता के कारण जो थोड़ी बहुत प्रशंसा मेरी भी हुई वह विधायक भाभीजी और उनके पति देव को नागवार गुज़री, और इसी वजह से उन्होंने मेरे स्थानांतरण की सिफारिश कर दी. 

बहुत बरसों बाद एक दिन अचानक जयपुर के सर्किट हाउस में निर्मला भाभीजी (तब तक वे सांसद भी रह चुकी थीं) से मेरा आमना-सामना हो गया. मैं क्योंकि सिरोही में था, चित्तौड़ की हलचलों से पूरी तरह अनभिज्ञ था. यह सोचकर कि शायद निर्मला जी ने मुझे देखा नहीं है, मैंने पूर्ववत आत्मीयता से उन्हें कहा- “भाभीजी, नमस्कार.”  और जैसे एक विस्फोट हुआ. वे फट पड़ी. “कौन भाभीजी? किसकी भाभीजी? मैं आपकी भाभीजी नहीं हूं.” मैं तो हतप्रभ था. भाभीजी कहकर मैंने क्या ग़लती कर दी? तभी वे फूट फूटकर रोने लगीं. जैसे तैसे मैं उन्हें अपने कमरे में ले गया, बिठाया, पानी पिलाया. तब जाकर वे कुछ स्वस्थ हुईं. और तब कहीं जाकर मुझे उनके इस तरह फट पड़ने का रहस्य समझ में आया. असल में वे आहिस्ता-आहिस्ता राजनीति में व्यस्त होती गईं, और इसी बीच उनके पति देव अपनी एक युवा  भानजी के मोह पाश में ऐसे फंसे कि उसे अपनी पत्नी की हैसियत ही दे बैठे. यह बात चित्तौड़ के अखबारों में तो खूब उछली थी लेकिन मैं इससे एकदम अनजान था. भाभीजी का कहना यह था कि जिस व्यक्ति (विक्रम सिंह) के रिश्ते से आप मुझे भाभीजी कह कर सम्बोधित कर रहे हैं, जब उसने ही इस रिश्ते को तोड़ दिया तो मैं आपकी भाभीजी कैसे रही? अब तो ख़ैर  वे दोनों ही तस्वीरों और स्मृतियों में रह गए हैं.  
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Tuesday, February 3, 2015

वो कहते हैं ना कि हर चीज़ को देखने के दो नज़रिये होते हैं -   गिलास आधा खाली है, या गिलास आधा भरा हुआ है, तो जहां बहुत सारे मित्र इस बात से बहुत व्यथित हैं कि आज राजनीति में अभिव्यक्ति का स्तर बहुत गिर गया है और बड़े नेता भी बहुत छोटी बातें करने लगे हैं, मैं इस बात को इस तरह देख कर प्रसन्न हूं कि आज राजनीति के हवाले से भाषा और शब्दों पर भी गम्भीर विमर्श होने लगा है. लोग बहुत भावुकता के साथ उन दिनों को याद करते हैं जब बड़े नेता बड़े रचनाकार भी होते थे, गांधी, नेहरु राजेन्द्रप्रसाद आदि ने न केवल आत्मकथाएं लिखीं, साहित्यिक समुदाय ने भी उन आत्मकथाओं को हाथों-हाथ लिया. उस ज़माने के बहुत सारे राजनेता ऐसे थे जिनके साहित्य की दुनिया के बड़े हस्ताक्षरों से आत्मीय और अंतरंग रिश्ते थे. इनमें राममनोहर लोहिया का नाम बहुत ज़्यादा स्मरण किया जाता है. बहुत सारे राजनेताओं ने अपनी-अपनी तरह से साहित्य सृजन भी किया और साहित्यिक बिरादरी ने अगर लम्बा समय बीत जाने के बाद भी उन्हें याद रखा हुआ है तो माना जाना चाहिए कि उस सृजन में साहित्य भी रहा होगा, वर्ना जब आप कुर्सी पर होते हैं तो आपकी यशोगाथा गाने वाले आपको शून्य से शिखर पर पहुंचा कर भी दम नहीं लेते हैं, लेकिन आपके भूतपूर्व होते ही सारा मजमा उखड़ जाया करता है.


लेकिन मैं बात कुछ और कर रहा था. इधर हममें से बहुतों को लगता है कि हमारे बड़े (और छोटे भी) राजनेताओं को शायद अपनी तर्क क्षमता पर कम भरोसा रह गया है इसलिए वे फूहड़, अभद्र और अस्वीकार्य भाषिक अभिव्यक्ति का सहारा लेने को मज़बूर हो गए हैं. हममें से जो थोड़े बहुत भी पढ़े लिखे हैं वे अपने दैनिक जीवन में बहुत गुस्से की स्थिति में भी शायद कभी उस तरह की बातें नहीं करते हैं. आखिर शिक्षा आपको संस्कार तो देती ही है ना! वो आपको सलीके से बात कहने का कौशल भी सिखाती है. अगर आपको कभी भाषिक कौशल की बेहतरीन बानगियां देखने का मन करे तो मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ को कहीं से भी पढ़ना शुरु कर दें. लेकिन इधर हमारे माननीय गण जिस तरह की  भाषा में अपनी बात कह रहे हैं वो एक तरफ़ और हममें से बहुत सारे उनकी कही बातों को जिस तरह समझ कर लाठियां या तलवारें भांजने में जुटे हैं वो दूसरी तरफ. बहुत बार तो वह हो जाता है जिसे फिल्म ‘प्यासा’  के उस गाने में मरहूम साहिर लुधियानवी साहब ने बखूबी  कह दिया था – जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी! असल में हो यह रहा है कि कहने वाला चाहे जो कहे, हम वही सुन रहे हैं जो हम सुनना चाहते हैं. फिर बेचारा वो लाख कहे कि ‘मैंने ऐसा तो नहीं कहा था’, हम अपने कानों में रुई डाल लेते हैं. और इधर जब से हमारे समाज में सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ा है स्थितियां और विकट होती जा रही हैं. अखबार तो चौबीस घण्टे में एक बार ही निकलता है, रेडियो दूरदर्शन पर बहुत संयम बरता जाता है, लेकिन यह जो नया औज़ार हमारे हाथों में आ गया है, बहुत बार लगता है जैसे वो  कहावत सही सबित हो गई है! कौन-सी? अरे भाई वही...आप समझ लीजिए ना. अगर मैं लिखूंगा तो पता नहीं किस-किस की भावनाएं आहत हो जाएं! इशारा कर देता हूं. वो कहावत जिसमें   किसी प्राणी के हाथ में दाढ़ी बनाने का औज़ार आ जाने वाली बात कही गई है. बेसब्री इतनी अधिक है कि पूरी बात पढ़े-सुने या समझे बिना ही वीर जन मैदान में कूद पड़ते हैं.

और शायद इसी बेसब्री का एक परिणाम यह भी हो रहा है कि जो बात एक बार कह दी जाती है, वही बार-बार गूंजती रहती है. जैसे किसी ने एक बार कह दिया कि पत्रकारों को तटस्थ होना चाहिए, तो बस जिसकी बात हमें पसन्द न आई उसपर हमने फौरन तटस्थ न होने का इल्ज़ाम मढ़ दिया. कोई यह सुनना या सोचना नहीं चाहता कि अखिर इस तटस्थ शब्द का सही अर्थ क्या है! तट पर स्थित. यानि जो धार में न हो, किनारे पर हो. यानि जो किसी एक का पक्ष न ले! अब, ज़रा एक बात सोचिये! क्या आप एक अपराधी और उसे दण्डित करने वाले में से किसी एक को नहीं चुनेंगे और तटस्थ रहेंगे? और यह भी याद रखिये कि ज़िन्दगी हमेशा स्याह और सफेद ही नहीं होती है. उसके और भी अनेक रंग होते हैं. तब आप अपने विवेक से ही चुनाव करते हैं. राष्ट्रकवि दिनकर ने क्या  खूब कहा है:

समर शेष है,  नहीं पाप का  भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

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लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 फरवरी, 2015 को असम्बद्ध  भाषा, राजनीति और हम लोग शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, December 23, 2014

तालाब गन्दा है या मछली?

अपने लगभग पौने चार दशकों में फैले सेवा काल में मुझे बहुत सारे जन प्रतिनिधियों के सम्पर्क में आने का अवसर मिला. 1967 से शुरु हुए मेरे सेवाकाल के प्रारम्भ में न तो मेरे काम की प्रकृति इस बात की ज़रूरत पैदा करती थी कि किसी जन प्रतिनिधि से सम्पर्क करना पड़े और न राज्य कर्मचारियों की आचार संहिता इस बात की अनुमति देती थी कि हम उनसे सम्पर्क साधें. बहुत लम्बे समय तक तबादलों वगैरह के लिए जन प्रतिनिधियों या राजनीतिक दलों से सम्पर्क करना निषिद्ध था. लेकिन धीरे-धीरे हालात बदले और आज स्थिति यह है कि बिना जन प्रतिनिधिगण की ‘डिज़ायर’ के किसी तबादले की कल्पना ही नहीं की जा सकती.

अपनी नौकरी के उत्तर काल में, जब मैं शिक्षक से पदोन्नत होकर अधिकारी बना तो जन प्रतिनिधिगण से सम्पर्क के अवसर भी बढ़े. लेकिन इनके साथ सम्पर्क के मेरे अनुभव बहुत अच्छे रहे. मैं अब भी कृतज्ञतापूर्वक इस बात को स्मरण करता हूं कि जब मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था तो स्थानीय विधायक प्राय: मुझे किसी न किसी के प्रवेश की अनुशंसा में फोन करती थीं. लेकिन उनकी भाषा आदेशात्मक न होकर अनुरोधात्मक होती थी:  ‘देखिये, अगर ऐसा हो सके...’. एक दिन जब किसी सामाजिक आयोजन में उनसे मुलाकात हुई तो मैंने उनसे कहा कि हमारे यहां प्रवेश के नियम इतने सख़्त हैं कि प्राचार्य अपने स्तर पर कुछ भी नहीं कर सकता है. वे बोलीं, “मैं इस बात को जानती हूं. लेकिन क्या करें! हम जन प्रतिनिधियों को भी तो अपने समर्थकों के सामने अपनी छवि बनाये रखनी पड़ती है. इसीलिए मैं आपको फोन करती हूं. लेकिन आप तनिक भी फिक्र न करें, और जो आपके नियमानुसार सम्भव हो वो ही करें.” 

जिस कॉलेज का यह प्रसंग है, उसी नगर के एक अन्य कॉलेज में पदोन्नत होकर जब मैं प्राचार्य के रूप में पहुंचा तो दूसरे तीसरे दिन किसी काम से स्थानीय विधायक को फोन करना पड़ा. वे छूटते ही बोले कि “देखिये आप मेरी इच्छा के विरुद्ध इस कॉलेज में आ तो गए हैं, लेकिन मैं आपको यहां रहने नहीं दूंगा.” उनके इस कोप की पृष्ठभूमि यह थी कि जब मैंने उनसे उस कॉलेज में पदस्थापित होने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी तो उन्होंने यह कहते हुए अपनी असमर्थता व्यक्त की थी कि वे पहले से किसी और से वचनबद्ध हो चुके हैं. लेकिन मैंने फिर भी प्रयास किये और संयोग से मैं अपने प्रयासों में कामयाब भी हो गया. अपने कोप को उन्होंने बहुत जल्दी साकार भी कर  दिया, लेकिन हम दोनों की पारस्परिक सद्भावना को कोई आंच नहीं आई और इस प्रसंग के लगभग पन्द्रह बरस बाद भी हमारे रिश्ते जस के तस हैं.

राज्य की राजधानी में उच्च प्रशासनिक पद पर रहते हुए तीन बरसों में तो शायद ही कोई  दिन ऐसा बीता हो जब किसी जन प्रतिनिधि से भेंट न हुई हो. विभागीय मंत्रीगण से तो खैर दिन में एकाधिक बार भी सम्पर्क होता रहा, और कभी कोई बदमज़गी नहीं हुई, हालांकि बहुत बार उनकी इच्छा के अनुरूप काम न करने की विवशता भी रही. जन प्रतिनिधिगण मेरे ऑफिस में आते या फोन करते, सामान्य शिष्टाचार का निर्वाह होता, और बस. वे अपना काम लेकर आते और हम यथानियम काम करते या नहीं भी कर पाते.  बल्कि सच तो यह है कि सामान्य और हो जाने वाले काम के लिए तो शायद ही कोई आता. वे आते ही ऐसे कामों के लिए जो किसी न किसी वजह से नहीं हो पाते, और उनके आने या कहने के बाद भी नहीं ही होते. लेकिन  मज़ाल है जो  किसी ने कभी ऊंची आवाज़ में भी बात की हो. हां, इतना ज़रूर कि अगर उनका काम न होने योग्य होता तो मैं स्पष्ट रूप से अपनी मज़बूरी बता देने में कोई संकोच नहीं करता.

पीछे मुड़ कर देखता हूं तो बस एक प्रसंग याद आता है जब किसी जन प्रतिनिधि ने मेरे साथ नाराज़गी भरा बर्ताव किया. इतना लम्बा अर्सा बीत गया है लेकिन वो मंज़र अभी भी मेरी यादों में सजीव है. मैं अपने ट्रांसफर के लिए स्थानीय विधायक के पास जयपुर आया था. हम लोग सचिवालय में मिले, जो करणीय था वह किया गया और मैं उनके साथ ऑटो में सर्किट  हाउस –जहां वे ठहरे थे-  लौटा. जैसे ही हम उतरने को हुए, मैंने ऑटोवाले को पैसे देने के लिए जेब में हाथ डाला. विधायक जी ने फौरन मेरा हाथ पकड़ा और गुस्से से बोले, “उतर जाइये आप. चले जाइये.” मुझे समझ में नहीं आया कि क्या ग़लती हो गई? बोले, “आप पैसे क्यों देंगे?” ओह! तो यह बात थी!  मैंने क्षमा याचना की. उन्होंने पैसे चुकाये, अपने कमरे में मुझे लेकर गये, चाय पिलाई और प्यार से विदा किया.

क्या इतनी जल्दी हालात इतने बिगड़ गये हैं? या फिर कुछ मछलियों की वजह से पूरा तालाब बदनाम हो  रहा है?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 23 दिसम्बर, 2014 को हालात बिगड़े या कुछ की वजह से माहौल खराब हुआ शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ.