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Tuesday, January 16, 2018

अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों से काम लेना भी आसान नहीं है!

भारत जैसे देश में जहां बेरोज़गारी की समस्या बहुत विकट है, समस्या का  एक आयाम यह भी है कि बहुत सारे ऐसे लोगों को जिनके पास खूब सारी डिग्रियां या योग्यताएं हैं, मज़बूरी के चलते ऐसी नौकरियां स्वीकार कर लेनी पड़ती हैं जिनमें उतनी योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं होती है. इस बात के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा. अभी हाल में राजस्थान विधान सभा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के मात्र बारह पदों के लिए जिन अठारह हज़ार आशार्थियों ने आवेदन किया उनमें से सात हज़ार से अधिक स्नातक उपाधि धारी थे और लगभग साढ़े नौ सौ आशार्थी ऐसे थे जिनके पास स्नातकोत्तर या बी. टेक, एम. टेक अथवा एमबीए जैसी डिग्रियां थीं. वैसे, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के इस पद के लिए न्यूनतम निर्धारित योग्यता थी पांचवीं पास होना. कल्पना की जा सकती है कि अगर किसी एम. टेक या एमबीए को इस पद के लिए चुन लिया जाता तो अपनी नौकरी करते हुए उसकी  मानसिक दशा क्या और कैसी होगी.

मैं इस बात पर विचार कर ही रहा था कि मुझे दुनिया के कुछ तथाकथित उन्नत और समृद्ध देशों में भी मौज़ूद ऐसी ही समस्या के बारे में पढ़ने को मिला. शायद आपके लिए भी यह बात चौंकाने वाली हो कि संयुक्त राज्य अमरीका में भी हर चार स्नातक उपधि धारी कर्मचारियों में से कम से कम एक तो ऐसा होता है जिसकी नौकरी के लिए उतनी योग्यता की ज़रूरत नहीं होती है.  उधर ब्रिटेन में हर छह स्नातक कर्मचारियों में से कम से कम एक ऐसा होता  है जो अपने काम की ज़रूरत के हिसाब से अधिक योग्यता धारी होता है. यही नहीं, वहां करीब अट्ठावन प्रतिशत स्नातक कर्मचारी ऐसे हैं जिनके काम के लिए इतनी योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं है. बहुत सारे युवा कम योग्यता चाहने वाली ऐसी नौकरियां इस कारण भी स्वीकार कर लेते हैं कि या तो उन्हें अच्छा वेतन मिलता है या फिर किसी बड़ी कम्पनी से जुड़ने का मोह उन्हें अपनी तरफ खींच लेता है. इन देशों में ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि यहां के रोज़गार देने वालों ने  करीब-करीब उन सारी नौकरियों के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक की उपाधि तै कर दी है जिन पर पहले ग़ैर-स्नातकों  को रख लिया जाता था. शायद रोज़गार देने वाले यह सोचते हैं कि जिन कामों के लिए कम योग्यता से काम चल सकता है उन कामों को करने के लिए अधिक योग्यता धारी कार्मिकों को भर्ती कर वे अपने संस्थान का भला कर रहे हैं.

लेकिन हाल में जो अध्ययन हुए हैं वे परिणामों की एक दूसरी ही छवि प्रस्तुत करते हैं. जिन कामों के लिए कम योग्यता की ज़रूरत होती है उनको करते हुए ऐसे अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों में कुण्ठा जड़ें जमाने लगती है और उन्हें लगने लगता है कि उनका काम चुनौतीपूर्ण नहीं है, बोरिंग है और वे व्यर्थ में अपनी प्रतिभा नष्ट  कर रहे हैं. आहिस्ता-आहिस्ता इस तरह के कर्मचारियों में एक नकारात्मक रवैया घर करने लगता है और उनका बर्ताव विद्रोही होने लगता है. वे देर से आने और जल्दी जाने लग जाते हैं और अपने साथी कर्मचारियों को बिना वजह परेशान करने लग जाते हैं. इस तरह की प्रवृत्तियां युवतर कर्मचारियों और उनमें ज़्यादा देखने को मिलती हैं जो किसी टीम के सदस्य के रूप में काम कर रहे होते हैं. उन्हें बार-बार यह बात सालती है कि वे औरों से अधिक काबिल हैं और उन्हें कम योग्यता वालों के साथ काम करना पड़ रहा है. 

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सभी अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारी अपने संस्थानों के लिए हानिप्रद ही साबित होते हों. ऐसे कर्मचारियों में से वे जिनमें अधिक संवेदनशीलता होती है और जो अंतर्वैयक्तिक दक्षता सम्पन्न होते हैं वे अपने सहकर्मियों के साथ न केवल उपयुक्त बर्ताव करते हैं और  उनके साथ सहजता से  घुल मिल जाते हैं, अपनी दक्षता के दम पर उन्हें बेहतर कार्य निष्पादन के लिए भी प्रेरित कर देते  हैं.  अपनी शिक्षा की वजह से उनका व्यवहार संतुलित होता है और वे दूसरों के साथ आत्मीयता कायम कर बेहतर कार्य माहौल तैयार करने में मददगार साबित होते हैं. यहीं टीम के नेतृत्व की भूमिका भी  बहुत महत्वपूर्ण साबित होती है. अगर टीम लीडर समझदार होता है तो वो इस तरह के अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों का प्रयोग टीम में अच्छा माहौल बनाये रखने और उसकी उत्पादकता बढ़ाने में कर लेता है. टीम लीडर इस तरह के कर्मचारियों को उनकी योग्यता के अनुरूप काम देकर और अनेक प्रकार से पुरस्कृत व प्रोत्साहित कर उनकी कार्यक्षमता से अपने संस्थान को लाभान्वित करवा पाने में भी कामयाब रहता है. 


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत मंगलवार, 16 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 3, 2014

परीक्षा परिणामों के मौसम में

परीक्षा  परिणामों के इस मौसम में दो बातें ख़ास तौर पर याद आ रही हैं. बहुत वक़्त नहीं बीता है जब परीक्षा परिणाम जानने के लिए अख़बार का इंतज़ार करना होता था, और आप अख़बार के प्रकाशन वाले शहर से जितनी  दूर होते यह इंतज़ार भी उतना ही लम्बा होता जाता था. मुझे याद है कि उदयपुर में मेरे भाई साहब बड़े यत्नपूर्वक किसी को रेल्वे स्टेशन भेजकर ब्लैक में बोर्ड के रिज़ल्ट वाला  अख़बार मंगवाया करते और फिर अपनी दुकान पर लोगों से पर्चियों पर उनके रोल नम्बर लिखवा कर लाउड स्पीकर पर परिणाम बताया करते थे. उस ज़माने में उनकी यह जन सेवा बेहद लोकप्रिय थी. अब कोई इस बात की कल्पना भी नहीं करेगा.  दूसरी बात यह कि आज जब बच्चों को 97-98 प्रतिशत लाते देखता हूं तो यह बात याद आती है कि हमें जिन प्रोफेसरों ने पढ़ाया उनमें शायद ही कोई प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण रहा हो!

निश्चय ही आज की पीढ़ी पहले वाली पीढ़ियों की तुलना में  ज़्यादा सजग, ज़्यादा मेहनती, ज़्यादा सुविधा सम्पन्न, ज़्यादा प्रतिभाशाली  और ज़्यादा प्रखर है. इस बात की पुष्टि के लिए किसी शोध की ज़रूरत नहीं है. आप किसी चार पाँच बरस के बच्चे से थोड़ी देर बात कीजिए, ख़ुद जान जाएंगे. लेकिन इस ‘ज़्यादा’  ने इस पीढ़ी के सामने संकट भी कम खड़े  नहीं किए हैं. आज रोज़गार देने वाले के सामने एक से बढ़कर एक रोज़गाराकांक्षी खड़े हैं, और जो औसत दर्ज़े का है उसे कोई पूछने को तैयार नहीं है. संकट वाकई बड़ा और गहरा है, लेकिन अपने आस पास नज़र दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि इसी संकट में लोग नई राहें भी निकाल रहे हैं.

यहां बैंगलोर में रहते हुए और नई पीढ़ी के बहुत सारे चमकते सितारों से बातें करते हुए समझ में आता है कि  कैसे ये लोग अपनी सूझ-बूझ और नई सोच की मदद से अपने लिए नई राहों का निर्माण कर रहे हैं. रोज़गार और काम के अवसर आपके चारों तरफ मौज़ूद हैं, बस ज़रूरत उनको देखने की और उनका इस्तेमाल करने की है. यहां मुझे पता चला कि एक पूरी स्ट्रीट ही स्टार्ट अप स्ट्रीट के नाम से जानी जाने लगी है. यानि एक ऐसी गली जिसमें तमाम नई शुरु हुई कम्पनियों के दफ्तर हैं. युवा लोग अपने साधनों के अनुरूप नई कम्पनियां बनाते हैं और आहिस्ता आहिस्ता उनका विस्तार करते जाते हैं. उनके काम  भी कम मज़ेदार  नहीं हैं. मसलन कुछ लोगों ने यह देखकर कि अलग-अलग जगहों से आए युवा घर जैसे खाने को तरसते हैं, एक कम्पनी बना दी जो गृहिणियों से सम्पर्क  स्थापित कर उनका बनाया खाना इन लोगों तक पहुंचा देती है. बहुत सारी गृहिणियां खुद अपनी पाक कला के बूते पर काफी अच्छी कमाई कर रही हैं. कोई पार्टियों के लिए खाना सप्लाई करती हैं तो कोई उत्सवों के लिए केक वगैरह बना कर अपने समय का सदुपयोग और अपने संसाधनों का विस्तार करती हैं. इन्हीं नई पहलों के ज़्यादा कामयाब और सुपरिचित रूप हैं फ्लिपकार्ट और ग्रुपऑन जैसी कम्पनियां. 

और ऐसा भी नहीं है कि रोज़गार के ये मौके तकनीकी रूप से समृद्ध या अभिजात वर्ग के लोगों को ही मिल रहे हैं. बल्कि मैं तो अपने चारों तरफ़ देखता हूं कि जिसमें किसी भी तरह की कोई योग्यता है और जो निष्ठा से काम करने को तैयार है उसके पास काम की कोई  कमी नहीं है. घरों में काम करने वाली बाइयां, खाना बनाने वाले, ड्राइवर सभी अपनी-अपनी काबिलियत और मेहनत के बल पर सम्मान और स्वाभिमानपूर्वक अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं. बल्कि अगर कभी आप काम देने वालों की नज़र से देखें तो पाएंगे कि वे अच्छा काम करने वालों की खोज में हमेशा रहते हैं और  ठीक मानदेय देने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती है. लेकिन इसके बावज़ूद अच्छा काम करने वालों की उनकी तलाश पूरी नहीं होती है.

ऐसे में कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या हमारे देश में वाकई बेरोज़गारी है? बात थोड़ी कड़वी  लग सकती है लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं है कि जो लोग बेरोज़गारी का शोर मचाते हैं वे बिना काम किए तनख़्वाह के या कम काम के लिए ज़्यादा तनख़्वाह के  तलबगार हैं? उन्हें सिर्फ और सिर्फ वो सरकारी नौकरी चाहिए जिसमें वेतन की तो गारण्टी हो लेकिन काम करने की कोई ख़ास बंदिश न हो! निश्चय ही यह अति सामान्यीकरण है. सारे लोग ऐसे नहीं हैं. और बेशक कुछ हैं जिनके पास योग्यता है लेकिन कोई उस योग्यता को देख,  सराह और ले नहीं रहा है. लेकिन अपने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाएंगे तो आपको भी लगेगा कि हमारे यहां काम खूब है, काम करने के मौके भी खूब हैं, लेकिन काम करने की इच्छा ज़रा कम है! 
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 03 जून, 2014 को चाह से बन जाते हैं रोज़गार लेने की जगह देने वाले शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल  पाठ.