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Tuesday, October 3, 2017

सपनों का राही चला जाए सपनों के आगे कहां

1971 में बनी और बाद में राष्ट्रीय एवम एकाधिक फिल्मफेयर पुरस्कारों से नवाज़ी गई फ़िल्म आनंदमें गीतकार योगेश का लिखा एक अदभुत गीत था:  “ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय/ कभी तो हंसाये, कभी ये रुलाये”. गीतकार ने इसी गीत में आगे लिखा था, “कभी देखो मन नही जागे/ पीछे पीछे सपनों के भागे/ एक दिन सपनों का राही/ चला जाए सपनों  के आगे कहां” और इसी भाव का विस्तार हुआ था आगे के बंद में: “जिन्होंने सजाये यहां  मेले/ सुख दुख संग संग झेले/ वही चुनकर खामोशी/ यूँ चले जाये अकेले कहां”. अच्छे कवि की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह बड़े सरल शब्दों में ऐसी बात कह जाता है जो देश-काल की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाती है. अब देखिये ना, हाल में सात समुद्र पार अमरीका में एक साधारण परिवार पर जो बीती उसे यह गीत किस कुशलता से घटना के करीब पांच दशक पहले व्यक्त कर गया था!

पश्चिमी  मिशिगन राज्य के  एक सामान्य  परिवार की असामान्य कथा है यह. बात मार्च माह की है. निक डेक्लेन की सैंतीस वर्षीया पत्नी केरी डेक्लेन की तबीयत कुछ ख़राब रहने लगी थी. डॉक्टर की सलाह पर कुछ परीक्षण करवाए गए तो एक बहुत बड़ा आघात उनकी प्रतीक्षा में था. केरी को ग्लियोब्लास्टोमा नामक एक भयंकर आक्रामक किस्म का दिमाग़ी कैंसर था. भयंकर इसलिए कि इसे करीब-करीब लाइलाज़ माना जाता है और अगर समुचित इलाज़ किया जा सके तो भी मरीज़ औसतन एक से डेढ़ साल जीवित रह पाता  है. लेकिन इलाज़ तो करवाना ही था. एक शल्य क्रिया द्वारा अप्रेल में केरी के दिमाग का ट्यूमर निकाल दिया गया. मुश्क़िल से दो माह बीते थे कि इस युगल को दो और ख़बरें मिलीं! पहली तो यह कि केरी का ट्यूमर फिर उभर आया था, और दूसरी यह कि उसे आठ सप्ताह का गर्भ था! स्वाभाविक है कि ट्यूमर के उपचार के लिए कीमोथैरेपी का सहारा लिया जाता. लेकिन इसमें एक पेंच था. कीमोथैरेपी से गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुंचता है इसलिए इस उपचार से पहले गर्भपात करवाने का फैसला करना था.  इस युगल के सामने एक दोराहा था:  या तो मां केरी के हित में अजन्मे शिशु की बलि दी जाए, या अजन्मे शिशु के पक्ष में केरी अपने मृत्यु पत्र पर हस्ताक्षर करे! जैसे ही यह ख़बर समाचार माध्यमों में आई, पूरे अमरीका में इस पर बहसें होने लगीं. लेकिन फैसला तो इस युगल को ही करना था! क्योंकि केरी अपनी धार्मिक आस्थाओं की वजह से गर्भपात विरोधी विचार रखती थी, यही तै किया गया कि अजन्मे शिशु को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाए! यह भी जान लें कि डेक्लेन  दम्पती के पांच संतानें पहले से हैं जिनकी आयु क्रमश: 18, 16, 11, 4 और 2 बरस है.

फैसला हो गया तो बेहतर का इंतज़ार करना था. लेकिन जुलाई मध्य में केरी की तबीयत फिर खराब हुई और उसे अस्पताल ले जाना पड़ा. वो दर्द से तड़प रही थी. बताया गया कि उसे एक ज़ोरदार दौरा पड़ा है. तब उसका गर्भ उन्नीस सप्ताह का हो चुका था. केरी अस्पताल के पलंग पर लेटी थी और एक नली और सांस लेने में मददगार मशीन की सहायता से बेहोशी के बावज़ूद ज़िंदा रखी जा रही थी. उसके दिमाग को गम्भीर क्षति पहुंच चुकी थी और इस बात की उम्मीद बहुत कम थी कि ठीक होकर भी वह किसी को पहचान  सकेगी. कुछ समय बाद उसे एक और दौरा पड़ा. तब उसका गर्भ 22 सप्ताह का हो चुका था और चिंता की बात यह थी की शिशु का वज़न मात्र 378 ग्राम था जबकि उसे कम से कम 500 ग्राम होना चाहिए था. डॉक्टर अपना प्रयास ज़ारी रखे थे. दो सप्ताह और बीते, और एक अच्छी ख़बर आई कि शिशु  का वज़न बढ़कर 625 ग्राम हो गया है. लेकिन इसी के साथ एक चिंता पैदा करने वाली खबर भी थी, कि शिशु तनिक भी हिल-डुल नहीं रहा है. डॉक्टरों के पास एक ही विकल्प था कि सिज़ेरियन ऑपरेशन से शिशु को दुनिया में लाया जाए! यही किया गया और छह सितम्बर को इस दुनिया में एक और बेटी अवतरित हुई, जिसका नाम उसके  मां-बाप की इच्छानुसार रखा गया: लाइफ़. मात्र छह दिन बाद केरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया!

लेकिन जीवन की असल विडम्बना तो सामने तब आई जब मात्र 14 दिन यह दुनिया देखकर लाइफ़ ने भी आंखें मूंद लीं! इन आघातों से टूटे-बिखरे पिता निक ने अपनी प्यारी पत्नी केरी की कब्र खुदवाई ताकि बेटी को भी मां के पास ही आश्रय मिल सके. निक का कहना है कि उसे समझ में नहीं आता कि ईश्वर ऐसे अजीबो-ग़रीब काम क्यों करता है! वह कहता है कि जब भी उसे मौका मिलेगा, वो ईश्वर से इस सवाल का जवाब मांगेगा. और तब तक वो अपने बच्चों को पालता पोसता  रहेगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 अक्टोबर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 20, 2015

तुमने एयरब्रश के कमाल से मेरी पत्नी को गायब कर दिया

हाल में अमरीका में एक ऐसी घटना घटी जो ऊपर से देखने में सामान्य लगती है लेकिन जिसके निहितार्थ गम्भीर हैं. वैसे इस घटना का सुदूर अमरीका में घटित होना मात्र एक संयोगात्मक तथ्य है, अन्यथा ऐसा कहीं भी हो सकता है. अपने देश में भी.

हुआ यह  कि वहां की एक महिला को लगा कि विवाह के दो दशक बीत जाने और इस बीच उसकी देह में आए उम्र जनित और अन्य बहुत सारे स्वाभाविक बदलावों के कारण वो अपने पति की निगाहों में पहले जितनी दिलकश नहीं रह गई है. उसने सोचा कि क्यों न पतिदेव को विवाह की वर्षगांठ पर एक अनोखा उपहार दिया जाए! जब पति के पास उस  उपहार का बक्सा पहुंचा तो उसने बड़ी उत्सुकता से साथ उस बक्से को खोला, और पत्नी के भेजे प्रेमिल उपहार को अपने हाथों में लिया. जैसे ही उसने एक नज़र उस उपहार पर डाली, उसका दिल बैठ गया.

उपहार के रूप में उसके हाथों में थी खूबसूरत तस्वीरों  की एक एलबम. ज़ाहिर है कि ये  तस्वीरें  उसकी पत्नी की थी थी. लेकिन वो कोई साधारण तस्वीरें  नहीं थीं. वो उसकी पत्नी की फोटोशॉप की हुई, बेहतर बनाई हुई तस्वीरें थीं. उम्र के उन दो दशकों ने उसकी पत्नी के चेहरे-मोहरे  को जो कुछ भी दिया था, उसे एयरब्रश की सहायता से हटा दिया गया था, और इसी बात ने पति देव को उदास कर दिया था.

उन्होंने उस फोटोग्राफर विक्टोरिया हाल्टन को एक ख़त लिखा.  विक्टोरिया ने हाल ही में उस ख़त को अपने फेसबुक पेज पर साझा किया है. यह पत्र पढ़ने और ग़ौर करने काबिल है. पति ने लिखा है: “नमस्ते विक्टोरिया. मैं  (नाम) का पति हूं. मैं आपको यह ख़त इसलिए लिख रहा हूं कि हाल ही में मुझे एक एलबम मिला है जिसमें मेरी पत्नी की वे तस्वीरें हैं जो आपने ली हैं. मैं यह क़तई  नहीं चाहता हूं कि आपको ऐसा लगे कि  मैं उन तस्वीरों से अपसेट हूं.... लेकिन हां, मेरे पास सोचने के लिए कुछ मुद्दे हैं जिन्हें मैं आप तक पहुंचाना चाहता हूं. मैं अपनी पत्नी के साथ तब से हूं जब वे अठारह बरस की थीं और हमारे दो खूबसूरत बच्चे हैं. इन बरसों में हमारी ज़िन्दगी में कई उतार-चढ़ाव आए हैं, और मेरा खयाल है कि खुद मेरी पत्नी ने ही आपसे इस तरह की परिष्कृत तस्वीरें तैयार करने को कहा है. असल में वे कभी-कभी यह शिकायत करती भी हैं कि अब मेरी निगाहों में वे उतनी आकर्षक नहीं रही हैं और अगर मेरी ज़िन्दगी में कोई और आई जो उनसे युवा हों तो क्या पता मैं उसकी तरफ खिंच जाऊं. तो मैंने जब इस एलबम को खोला तो मेरा दिल बैठ गया. ये  तस्वीरें बहुत खूबसूरत हैं और आपने अपना काम बखूबी किया है. आप बहुत टेलेण्टेड फोटोग्राफर हैं...लेकिन इन तस्वीरों में मेरी पत्नी नहीं है. आपने तो उसके हर नुक्स को गायब कर दिया है. शायद उसी ने आपको ऐसा करने को कहा था.  लेकिन आपके ऐसा करने से वो हर चीज़ गायब हो गई है जिसने  हमारी ज़िन्दगी का निर्माण किया था. जब आपने उसके स्ट्रेच मार्क्स हटाए तो आपने हमारे बच्चों के जन्म का इतिहास भी मिटा डाला, जब आपने उसकी झुर्रियां हटाईं  तो आपने हमारे संग-साथ के इन बरसों की तमाम मुस्कानें और हमारी चिन्ताएं भी मिटा दीं. जब आपने उसकी चर्बी हटाई तो आपने उसकी पाक कला निपुणता और उन सारी स्वादिष्ट चीज़ों की यादें भी मिटा डालीं जो इन बरसों में हमने साथ-साथ खाई थीं. मैं जानता हूं कि आपने अपना काम किया है. लेकिन मैं आपको सिर्फ यह बताने के लिए यह पत्र लिख रहा हूं कि इन तस्वीरों को देखकर मुझे यह बात महसूस हुई है कि शायद मैं अपनी पत्नी को ठीक से यह बात नहीं कह सका हूं कि मैं उससे कितना ज़्यादा  प्यार करता हूं और जैसी भी वो है उसी रूप में उसे कितना अधिक चाहता हूं. इस तरह की बातें उसे कभी-कभार ही सुनने को मिलती हैं इसलिए उसने शायद यही सोचा होगा कि मैं उसे इन फोटोशॉप की हुई तस्वीरों जैसी देखना चाहता हूं. मुझे और बेहतर करना होगा और अपनी ज़िन्दगी के शेष बचे दिनों में मैं उसकी अपूर्णता के साथ ही उल्लसित रहूंगा. मुझे यह याद  दिलाने के लिए आपका आभार.”

आज हो यह रहा है कि विज्ञापनों आदि के द्वारा हमारे  सामने बहुत सारी आकर्षक और काम्य छवियां लहरा कर हमें लुभाया जा रहा है और उस सबके बीच हम अपने असल को विस्मृत करते जा रहे हैं. यह प्रसंग हमें एक बार फिर उसी असल की तरफ लौटा ले जाता है. मुझे अनायास ही याद आ रहा है 1984 की फिल्म ‘सारांश’ के आख़िर में अनुपम खेर अपनी वृद्धा पत्नी से कहते हैं, “तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों में मेरे जीवन का सारांश है.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 20 अक्टोबर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 18, 2014

तुम क्या जानो क्या हाल कर दिया था तुमने हमारा

हम सबको इस तरह के अनुभव होते ही रहते हैं. किसी की तनिक-सी उदासीनता, या लापरवाही, या ग़ैर ज़िम्मेदारी – आप जो भी चाहे नाम दे लें उसे, दूसरों के लिए बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन जाती है. ऐसा नहीं है कि ऐसी  ग़लती सिर्फ दूसरों से ही होती है, मुझसे  कभी हुई ही नहीं. मुझसे भी शायद अनेक दफ़ा ऐसी चूक हुई होगी, और मेरे अनजाने में उसे दूसरों ने भुगता होगा. इसीलिए आज  किसी और की एक चूक की चर्चा आपसे कर रहा  हूं.

उस दिन अस्पताल गया तो किसी और ही काम से था, लेकिन लगा कि अपना बीपी भी लगे हाथों चैक करवा लूं. डॉक्टर साहब से दुआ-सलाम थी. उन्होंने बीपी चैक करके  कहा कि बेहतर होगा मैं अपना ईसीजी करवा लूं. न सिर्फ कहा, ईसीजी करने वाले टैक्नीशियन को बुला मुझे उनके हवाले भी कर दिया. तब मैं जयपुर के नज़दीक, कोटपुतली  के स्नातकोत्तर  कॉलेज में उपाचार्य था. कुछ ही दिनों  पहले सिरोही से पदोन्नति पर वहां पहुंचा था. संयोगवश टैक्नीशियन महोदय उसी कॉलोनी में रहते थे जिसमें मैं रहता था, और मुझे पहचानते थे. उन्होंने तसल्ली से मेरा ईसीजी किया और उसका प्रिण्ट आउट मुझे देकर डॉक्टर साहब के पास भेज दिया.

ईसीजी की उस रपट को देखते ही डॉक्टर साहब की मुख मुद्रा गम्भीर हो गई. उन्होंने सलाह दी कि मुझे फौरन जयपुर जाकर एस एम एस अस्पताल में खुद को दिखाना चाहिए. मैंने पूछा कि क्या कोई ख़ास चिंता की बात है, तो वे मेरे सवाल  को टाल गए. मुझे कुछ ही देर बाद एक शादी में शमिल होने के लिए सिरोही जाने के लिए कोटपुतली से निकलना  था. घर आया. मुंह ज़रूर ही लटका हुआ होगा. पत्नी ने पूछा कि क्या बात है, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने भी  स्थिति की गम्भीरता समझ ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया. अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हम लोग कोटपुतली से निकल कर अगली सुबह सिरोही पहुंच गए. मैं रास्ते भर अनमना बना रहा. स्वाभाविक ही है कि मेरे अनमनेपन का असर पत्नी पर भी पड़ा. शादी में जाने का उत्साह और उल्लास हवा हो चुका था.

नहा धोकर सिरोही के सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां मेरे एक अत्यंत आत्मीय डॉक्टर सामने ही मिल गए. उदासी शायद मेरे चेहरे पर चिपकी हुई थी. उन्होंने वजह पूछी तो मैंने ईसीजी की रपट आगे कर दी. उन्होंने एक नज़र उस पर डालते ही पूछा कि “अग्रवाल साहब, यह किसकी रिपोर्ट उठा लाए?”  जब मैंने कहा कि यह तो मेरी ही रिपोर्ट है, तो उन्होंने अविश्वास  भरी नज़र से मुझे देखा, जैसे कह रहे हों, क्यों मज़ाक करते हो? मैंने फिर से उन्हें कहा कि यह मेरी ही रिपोर्ट  है, कल ही मैंने अपना ईसीजी करवाया है और इसी के  आधार पर डॉक्टर साहब ने मुझे राज्य के सबसे बड़े अस्पताल चले जाने की अर्जेण्ट सलाह दी है.

मेरे मित्र डॉक्टर साहब को शायद उस रिपोर्ट पर क़तई विश्वास नहीं हो रहा था. असल में कोतपुतली जाने से पहले मैं उनके नियमित सम्पर्क में था और मेरे स्वास्थ्य की स्थिति  से वे भली-भांति परिचित थे. उन्होंने पहले मेरा बीपी चैक किया और फिर मुझे एक बार और ईसीजी करवा लेने के लिए कहा. मैं बड़ी उलझन में था कि मामला आखिर क्या है! लेकिन अपने यहां इस बात का कोई रिवाज़ नहीं है डॉक्टर, चाहे वो आपका कितना ही नज़दीकी क्यों न हो, आपके मर्ज़ के बारे में आपसे खुलकर  बात करे. बहरहाल, मैंने एक बार फिर अपना ईसीजी करवाया और उसकी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर साहब के पास पहुंचा. एक नज़र उस पर डालते ही वे मुझसे बोले, “देखो, मैंने कहा था ना कि वो रिपोर्ट आपकी हो ही नहीं सकती! आप एकदम ठीक हैं!” उन्होंने मुझे एक बार फिर आश्वस्त किया कि मैं तनिक भी चिंता न करूं, सब कुछ ठीक है, और फिर मुझे चाय पिला कर  विदा किया.

माहौल बदल चुका था. खुशी-खुशी घर  आया, पत्नी को सारा किस्सा बताया राहत की खूब लम्बी सांस ली, बहुत मज़े से शादी का लुत्फ लिया, और फिर हम दोनों कोटपुतली लौट गए.
यह संयोग ही था, कि अगले दिन जैसे ही मैं घर से कॉलेज जाने के लिए निकला, सामने वे तकनीशियन महोदय मिल  गए. मैंने शिकायत भरे लहज़े में उनसे कहा कि आपने मेरा कैसा ईसीजी किया.......मेरी तो जान ही निकाल दी! पहले तो उन्होंने मुझसे पूरा वाकया सुना, और फिर बड़े बेपरवाह लहज़े में बोले, “हां, सर, हमारी वो मशीन थोड़ी खराब है. कई बार वो ग़लत रिपोर्ट  दे देती है.” यानि उन्हें अपनी मशीन के चाल चलन की जानकारी थी.

मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उनसे क्या कहूं? उनकी मासूमियत लाजवाब थी. होती भी क्यों नहीं? उन्हें क्या पता कि मैं इस बीच कितने विकट मानसिक तनाव से गुज़र चुका था!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 मार्च 2014 को 'खराब मशीन की ईसीजी ने बढ़ा दी धड़कन' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ 

Tuesday, December 17, 2013

घर से बाहर घर जैसा खाना

भारतीय मध्यवर्ग के जीवन में बहुत तेज़ी से जो बदलाव आ रहे हैं उनमें से एक खान-पान को लेकर है. कहा जाता रहा है कि यह वर्ग अपने खान-पान की रुचियों को लेकर बहुत प्रयोगशील नहीं है, लेकिन यह स्थिति अब धीरे-धीरे बदल रही है. मध्यवर्ग भी अपने खान-पान को लेकर खासा प्रयोगशील  होता जा रहा है, जिसका प्रमाण  हैं हर शहर-कस्बे में नए नए खुलते जा रहे किसम-किसम के और देश-देश के  व्यंजनों के आउटलेट्स.

मध्यवर्ग में बाहर खाने का प्रचलन भी बहुत तेज़ी से बढ़ा है. बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता है जब इस वर्ग  में बाहर खाने-पीने को लेकर संकोच ही नहीं, अस्वीकार का भी भाव हुआ करता था. लेकिन अब हालत यह हो गई है कि अगर आप सप्ताहांत में बाहर खाना खाना चाहें तो आपको एक से ज़्यादा जगहों पर घूमना पड़ सकता है या काफी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है. न केवल सप्ताहांतों में, तीज-त्यौहारों पर भी बाहर खाने का चलन बढ़ता जा रहा है. छोटे-मोटे पारिवारिक आयोजन रेस्तराओं में होने लगे हैं और अब तो भाई-दूज जैसे मौकों पर भी बहन-भाई घर की बजाय रेस्तरां को पसन्द करने लगे हैं. करवा चौथ जैसे अवसरों पर तो यह बात और जुड़ जाती है कि पति व्रत  रखने वाली प्रेमिल पत्नी को चूल्हे-चौके के झंझट से बचा रहा है.  बाहर खाने को स्त्री मुक्ति के साथ भी जोड़ कर देखा जाने लगा है. वही बात कि कम से कम एक दिन तो स्त्री को घर के इस तरह के कामों से मुक्ति मिले.

लोगों के खान-पान की आदतों में आए बदलाव को बाज़ार में आ रहे नए-नए व्यंजनों या उनके सहायक पदार्थों की भारी भीड़ में भी देखा जा सकता है. अनेक तरह के पैकेट आने लगे हैं जिन्हें ‘बस दो मिनिट’ में कम से कम मेहनत में आप टेबल पर लाकर खाने  योग्य बना सकते हैं. रेडीमेड मसाले या तैयार अदरक लहसुन मिर्ची इमली  आदि के पेस्ट भी इसी श्रंखला में हैं. इस सबके बीच जो बात मुझे सबसे मज़ेदार लगती है वो यह है कि चीज़ों को बेचने के लिए क्या-क्या किया जाता है.

आप देखेंगे कि बाज़ार में जो उत्पाद बेचे जाते हैं वे आपको बताते हैं कि उनका उपयोग करके आप घर पर होटल जैसा खाना तैयार कर उसका मज़ा ले सकते हैं. यहां एक साथ अर्थशास्त्र और स्वाद शास्त्र की मदद लेकर आपको आकर्षित किया जाता है. होटल में जाना महंगा होता है, इसलिए आप उस उत्पाद का प्रयोग कर घर पर ही होटल वाले शानदार स्वाद का मज़ा ले लीजिए!  लेकिन आपने यह  भी देखा होगा कि बहुत सारे होटल, और उनमें भी वो जो खासे महंगे होते हैं, आपको ‘घर जैसे खाने’ का लालच देते हैं. उनके विज्ञापनों को देखकर अक्सर मुझे विज्ञापन लिखने वालों की सूझ-बूझ पर सन्देह होने लगता है. फिर सोचता हूं कि हो सकता है यह निमंत्रण उन ‘बेचारों’ के लिए हो जिन्हें नौकरी या टूअर आदि के कारण घर से बाहर रहना पड़ रहा हो और जो घर को बुरी तरह मिस कर रहे हों! मैंने कभी  इस तरह के रेस्तरां के व्यंजनों का स्वाद नहीं चखा है. लेकिन जानने की उत्सुकता ज़रूर है कि क्या वे लोग भी घिया की सब्ज़ी, मूंग की दाल और जली हुई, कड़ी या कल सुबह की बची रोटी सर्व करते हैं?

और इसी से मुझे याद आ रहा है अपने एक मित्र के साथ घटित एक प्रसंग. एक दिन मुलाक़ात हुई तो बातचीत  से पता चला कि उनके सामने के दो दाँत भूतपूर्व हो गए हैं. कारण  पूछा तो उन्होंने बताया कि कल उनकी धर्म पत्नी जी ने जो रोटी  बनाई थी वो बहुत कड़ी थी! मैंने बहुत सहज भाव से कहा, “तो आपको खाने से मना कर देना चाहिए था!” और उन्होंने उससे भी अधिक सहज भाव से जवाब दिया, “वो ही तो किया था!” आशा करता हूं कि घर जैसा खाना खिलाने का वादा करने वाले होटल यह भी ज़रूर करते होंगे.

असल में यह जो बाहर खाने-वाने का चलन बढ़ा है इसमें एक बहुत बड़ी भूमिका इस बात की भी है कि स्त्रियां बहुत बड़ी तादाद में घर से बाहर निकल कर नौकरी वगैरह करने लगी हैं. यह स्वाभाविक ही है कि जब उन्होंने एक अतिरिक्त ज़िम्मेदारी ओढ़ी है तो अपने पहले वाले दायित्वों में से कुछ को वे हल्का करें. अब तो नई पीढ़ी  में बहुत सारे युगल ऐसे भी देखने को मिल जाते हैं जो सुबह आठ बजे नौकरी पर निकलते हैं और रात नौ बजे लौटते हैं. उनके यहां किसी भी पत्नी  से यह उम्मीद करना कि दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद वो अपने पतिदेव के सम्मान में गरमा गरम खाना तैयार कर परोसेगी, न केवल अव्यावहारिक, बल्कि अमानवीय भी होगा. और मुझे लगता है कि अगर हम स्त्रियों का बाहर काम करना स्वीकार कर सकते हैं तो फिर लोगों के बाहर खाना खाने को भी उसी सहज भाव से स्वीकार करना चाहिए.  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय  अपराह्न दैनिक  न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 17 दिसम्बर, 2013 को  होटल में घर का स्वाद...अजब पहेली शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख!