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Sunday, January 11, 2009

निजी भी राजनीतिक भी

तेहरान के एक पूर्व मेयर और शाह के शासन काल में ईरानी संसद की पहली महिला सांसद निज़हत नफीसी की बेटी अज़र नफीसी की संस्मरणात्मक किताब थिंग्ज़ आई हैव बीन साइलेण्ट अबाउट प्रकाशित होते ही चर्चा में आ गई है. इन्हीं अज़र नफीसी की 2003 में आई पिछली किताब रीडिंग लोलिता इन तेहरान की पन्द्रह लाख प्रतियां बिकी थीं और उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समकालीन क्लासिक माना गया था. अपनी इस नई किताब में अज़र ने बदलते हुए ईरान में तनाशाह मां के साथ बड़े होने का मर्मस्पर्शी वर्णन किया है.

किताब का स्वर साहित्य की विमुक्तकारी भूमिका की प्रशस्ति का है. प्रारम्भिक पन्नों से यह आस जगने लगती है कि लेखिका अपने जीवन के बारे में कुछ सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करेगी, लेकिन जैसे-जैसे आगे पढते हैं, हम पाते हैं कि उनकी रुचि सनसनी पैदा करने में नहीं बल्कि अपनी डिफिकल्ट मां के साथ अपने विक्षोभपूर्ण रिश्तों के बयान और उनके विश्लेषण में है. ईरान की सब कुछ को गोपन रखने की संस्कृति का अतिक्रमण करते हुए वे यह कहते हुए सब कुछ खोलती हैं कि “मां के बारे में अब सब कुछ लिखकर और अपनी चुप्पी तोड़कर मैं प्रतिरोध का एक और प्रयास कर रही हूं.” लेखिका यह कहना भी नहीं भूलतीं कि “जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, अब उनके बारे में चुप नहीं रहा जा सकता”.

तानाशाह मां के प्रति अपनी नाखुशी का इज़हार करते हुए अज़र नफीसी निजी इतिहास को राजनीतिक इतिहास के साथ गूंथती चलती है, और यही बात इस किताब को महत्वपूर्ण बनाती है. असल में मां के प्रति उनका क्रुद्ध और उग्र प्रतिरोध उस इस्लामी सर्व सत्तात्मक निज़ाम के प्रति भी प्रतिरोध है जो 1979 में ईरान में स्थापित हुआ था. वे लिखती हैं, “यह समझने से बहुत पहले ही कि एक निर्मम राजनीतिक सत्ता किस तरह अपने नागरिकों पर सवार होती है और उनकी पहचान और निजता छीनती है, मैंने अपने परिवार के भीतर अपने निजी जीवन में यह महसूस कर लिया था.” वे कहती हैं, “इस्लामी क्रांति के बाद मैं तो मज़ाक में यह कहा करती थी कि हमने तो अपनी मां के साथ रहते हुए खुद को पहले ही ऐसे समय के लिए तैयार कर लिया था.”

अज़र नफीसी को बहुत पहले ही यह भनक पड़ गई थी कि एक दम्पती के रूप में उनके मां-बाप सुखी नहीं हैं. मां और बाप दोनों ही अपने जीवन के बारे में गढी हुई बातें बच्चों को बताते रहे. अज़र नफीसी की मां बुद्धिमती किंतु जटिल व्यक्तित्व वाली थी. महत्व भरी और रोमाण्टिक ज़िन्दगी के उनके अपने सपने पूरे नहीं हो पाये तो उन्होंने अपने, अपने परिवार और अपने विगत के बारे में अनेक खुशनुमा वृत्तांत गढ लिए. अज़र इन वृत्तांतों की हक़ीक़त जानती थी. उधर पिता ने एक दूसरी तरह की किस्सगोई में पलायन कर राहत पाने की चेष्टा की. वे अपने बच्चों को शाहनामा जैसे क्लासिक की कथाएं सुन-सुना कर सुकून पाने लगे. पिता का साहित्यिक रुझान बेटी को विरासत में मिला. अज़र की पूरी सहानुभूति अपने पिता के साथ और खुली नाराज़गी अपनी मां के प्रति किताब के हर शब्द से टपकती है.

साठ के दशक में जब उनके पिता को राजनीतिक कारणों से पांच साल जेल में रहना पड़ा तब किशोरी अज़र को मां के दबाव में अनचाही शादी के लिए तैयार होना पड़ा. ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी में पढते हुए उन्होंने इस पति को तलाक दिया और ईरानी छात्र आंदोलन में कूद पड़ीं. वे कहती हैं, “सत्तर के दशक में विदेश में रह रहे किसी भी ईरानी के लिए सरकार विरोधी होना लाजमी था, लेकिन देश के भीतर स्थितियां भिन्न थीं.” 1979 में, क्रांति के बाद वे अपने नए पति के साथ ईरान लौटीं, लेकिन देश का नया शासन भी बेहतर नहीं था. अज़र और उनके दोस्तों को परेशान किया गया और जेल भी भेजा गया. जब वे तेहरान विश्वविद्यालय में पढ़ा रहीं थी तब उन्हें बुर्क़ा न पहनने के ज़ुर्म में नौकरी से हटाया गया. यह अलग बात है कि इसके बावज़ूद उन्होंने निजी अध्ययन समूह बनाकर वैकल्पिक तरीकों से अध्यापन ज़ारी रखा. अंतत: 1997 में उन्होंने देश छोड़ दिया.

अज़र के लिए लेखन प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम है. प्रतिरोध, चाहे दमनकारी शासन के प्रति हो या दमनकारी मां के प्रति.


Discussed book:
Things I’ve Been Silent About
By Azer Nafisi
Published by Random House Publishing Group
368 pages, Hardcover
US $ 27.00

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 11 जनवरी, 2009 को प्रकाशित.








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Thursday, April 10, 2008

प्रयास पूर्व और पश्चिम के संघर्ष को समझने का

पीपुल्स एण्ड एम्पायर्स और यूरोपियन एन्काउण्टर्स विद द न्यू वर्ल्ड जैसी बहु प्रशंसित-चर्चित किताबों के लेखक, ब्रिटिश इतिहासकार एंथनी पग्डेन की ताज़ा किताब वर्ल्ड्स एट वार: द 2500 ईयर स्ट्रगल बिटवीन ईस्ट एण्ड वेस्ट लगभग साढे छह सौ पन्नों में सभ्यताओं के संघर्ष के ढाई हज़ार वर्षों के इतिहास की पडताल का विचारोत्तेजक प्रयास है.

किताब का प्रारम्भ उस प्राचीन विश्व के वर्णन से होता है जहां यूनान फारसी साम्राज्य के विरुद्ध अपने पहले संघर्ष को आज़ादी और गुलामी के, प्रजातंत्र और राजशाही के तथा वैयक्तिकता और ईश्वर के रूप में मनुष्य की पूजा के संघर्ष के रूप में देखता है. इसके बाद पग्डेन की कथा उस रोम में प्रवेश करती है जहां नागरिकता और नियामक कानून की आधुनिक अवधारणाओं ने जन्म लिया. बकौल पग्डेन, रोम के नेता अपने विजितों को स्वाधीन मानते थे, जबकि पूर्व में विजित विजेता की सम्पत्ति माने जाते थे. पग्डेन इसाई धर्म के जन्म और पश्चिम द्वारा उसे शासन का औज़ार बनाने का भी नाटकीय वर्णन करते हैं. दरअसल यहीं से धर्म निरपेक्ष और शेष ताकतों के बीच उस संघर्ष की शुरुआत होती है जो अब भी चल रहा है. इसके बाद आता है इस्लाम. और फिर पूर्व और पश्चिम के धार्मिक विश्वासों में टकराहट बढती जाती है.
और फिर होती है चर्चा प्रथम विश्व युद्ध की. पग्डेन कहते हैं कि इसके अनेक छद्म उद्देश्यों में से एक था ताकत के बल पर मुस्लिम दुनिया को नए रूपाकार में ढालना. और आज तो पश्चिम, पूर्व पर अपनी तरह का प्रजातंत्र और अपनी तरह की धर्म निरपेक्षता थोपने के लिए प्रयत्नरत है. एक चेतावनी के साथ लेखक अपनी बात समेटता है: आतंकवाद और युद्ध तब तक खत्म नहीं होंगे जब तक कि धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणाएं साफ नहीं हो जातीं.
*
1798 में जब नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी सेनाओं के साथ मिश्र में प्रवेश किया तो उसके मन में केवल सैन्य विजय का ही भाव नहीं था. तीस हज़ार सैनिकों के अलावा उसके साथ एक चल विश्वविद्यालय भी था जिसमें अर्थशास्त्री, कवि, वास्तुकार, खगोलशास्त्री यहां तक कि पेरिस ऑपेरा के गायक तक थे. इनके अलावा था हज़ारों किताबों का एक पुस्तकालय जिसमें मांटेस्क्यू, रूसो, मांतेन, वाल्टेयर और पश्चिमी धर्म-विधान के सारे क्लैसिक थे.
इसके लगभग दो शताब्दी बाद, 1971 में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने एक प्राचीन फारसी महल के प्रांगण में विदेशी गणमान्य लोगों के लिए दो हज़ार मिलियन डॉलर खर्च कर एक शानदार जश्न आयोजित किया. मक़सद था शाह को महान डेरियस और ज़ेरेक्स का वंशज सिद्ध करना.
इन दोनों प्रसंग के ज़रिए पग्डेन यह बताना चाहते हैं कि नेपोलियन और शाह, जो क्रमश: पश्चिम और पूर्व के प्रतिनिधि हैं, खुद को अपने-अपनी स्वर्णिम सभ्यताओं का वारिस मानते हैं. लेकिन, पग्डेन यह बताना भी नहीं भूलते कि दोनों में ही कुछ विलक्षणताएं भी हैं. स्विटज़रलैण्ड में शिक्षित शाह आधुनिकीकरण के धर्म निरपेक्ष समर्थक थे. जबकि नेपोलियन ने महज़ स्थानीय मौलवियों को खुश करने के लिए मिश्रियों के समक्ष यह घोषित किया कि वह पैगम्बर मुहम्मद साहब और पवित्र कुरान का आराधक है.
किंवदंतियों, प्रसंगों और प्रभावशाली वृत्तांत के माध्यम से महज़ बारह अध्यायों में ढाई हज़ार वर्ष का इतिहास समेटते हुए पग्डेन नीरस इतिहास को जीवंत बनाने में कोई कसर नहीं छोडते. लेकिन इस रोचकता के बीच भी सजग पाठक यह लक्षित किए बगैर नहीं रहता कि जिसे हेरोडोटस ने स्थायी शत्रुता कहा था, उसे पश्चिम और पूर्व के बीच स्थापित करने के प्रयास में पग्डेन चीन, जापान, सुदूर पूर्व और भारत की करीब-करीब अनदेखी कर जाते हैं. दूसरे शब्दों में उनका पूर्व इस्लामी समाज तक सिमट कर रह गया है.
एक और बात यह महसूस होती है कि यह किताब पूर्व और पश्चिम बीच कम, धर्म और एनलाइटनमेण्ट के बीच टकराव की कथा अधिक है, और उसमें भी लेखक के निशाने पर इस्लाम का वह अंश है जो चर्च और राज्य के बीच दूरी की पश्चिमी सोच से असहमति रखता है. पग्डेन ओसामा बिन लादेन को यह कहते हुए उद्धृत करते हैं कि पश्चिम का सबसे बडा अपराध यही है कि वह धर्म को अपनी राजनीति से अलग रखता है. पग्डेन मानते हैं कि अधिकांश मुस्लिम धर्मशास्त्री और न्यायविद इस बात से सहमत हैं. लगता तो यह भी है कि पग्डेन की इस्लाम की समझ उन मुल्ला-मौलवियों के कहे तक महदूद है जो हिंसा का समर्थन करते हैं.
एक और महत्वपूर्ण बात यह भी कि किताब पूर्व को ‘सभ्य और आधुनिक’ बनाने के पश्चिम के सुदीर्घ और असफल किंतु हास्यास्पद प्रयासों को सामने ले आती है. निश्चय ही यह लेखक के अनचाहे ही हो गया है.
अपनी इन सीमाओं के बावज़ूद किताब खासी रोचक और विचारोत्तेजक है. लेखक से इस बात पर तो सहमत होना ही पडता है कि पूर्व और पश्चिम के बीच बडा अंतर तो मूल्यों और संस्कृति का है, न कि अधिनायकवाद बनाम प्रजातंत्र का, या धार्मिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का, या मुस्लिम बनाम इसाई का.
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Discussed book:
Worlds at War: The 2,500-Year Struggle between East and West
By: Anthony Pagden
Published by: Random House
Hardcover, 656 pages
US $ 35.00

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 10 अप्रेल, 2008 को प्रकाशित.







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