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Tuesday, June 5, 2018

इस तरह दिया तमिलनाडु ने अपने साहित्य को संरक्षण


मार्च 1949 में दक्षिणी भारत के राज्य तमिलनाडु में एक विलक्षण काम हुआ. इस काम का सम्बंध साहित्य को राजकीय संरक्षण प्रदान करने से है. राज्य की तत्कालीन सरकार ने विख्यात दिवंगत कवि सुब्रह्मण्यम भारती के परिजनों (उनकी पत्नी, बेटियों और सौतेले भाई) में से प्रत्येक को पांच-पांच  हज़ार रुपये देकर इस महान रचनाकार की सभी रचनाओं का कॉपीराइट प्राप्त कर लिया. कदाचित पूरी दुनिया में यह पहला मौका था जब किसी राज्य सरकार ने किसी रचनाकार के सृजन का कॉपीराइट खरीद कर उसकी रचनाओं को सार्वजनिक रूप से सुलभ कराया हो. भारत में जो कॉपीराइट नियम चलन में हैं उनके अनुसार किसी लेखक की मृत्यु के साठ बरस बाद उसकी रचनाएं कॉपीराइट मुक्त हो जाती हैं. मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में सुब्रह्मण्यम भारती का निधन 1921 में हुआ था और इस तरह उनका सृजन जनवरी 1972 में कॉपीराइट मुक्त होता. लेकिन सरकार ने इससे बहुत  पहले ही उनकी रचनाओं को आम जन को सुलभ करा दिया. सरकार के इस प्रयास का सुपरिणाम यह है कि तमिलनाडु  में आज भी इस महाकवि की कविताओं का  लगभग पांच सौ पन्नों का संग्रह  सौ रुपये से भी कम में मिल जाता  है. तमिलनाडु में और अन्यत्र भी उनकी किताबों की लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं और तमिल फिल्मों में उनके गीत खूब प्रयुक्त हुए हैं.

सुब्रह्मण्यम भारती के काव्य पर रोमाण्टिक कवियों का गहरा असर था और शायद यही वजह है कि उन्होंने अपना उपनाम विख्यात अंग्रेज़ी कवि शैली के नाम पर शैली दासन रखा था. भारती ने सभी तरह के शिल्प में काव्य सृजन किया – छंदबद्ध भी और छंद मुक्त भी. कविताओं के अलावा कहानियां भी उन्होंने लिखीं और पत्रकारी लेखन भी खूब किया. लेकिन इतना सब करने और उत्कृष्ट करने के बावज़ूद उन्हें गरीबी में ही जीवन बिताना पड़ा. उनके निधन के बाद उनकी निरक्षर पत्नी और दो बेटियों को भी अभावों से जूझना पड़ा, और इसी दौरान उनकी पत्नी ने मज़बूर होकर बहुत कम मूल्य पर महाकवि की रचनाएं उनके सौतेले भाई को बेच दी. वह समय ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स और फिल्मों के उत्थान का भी था. महाकवि के कुछ गीत खूब लोकप्रिय हो गए थे और यही देख एक बड़े फिल्म निर्माता ने उस भाई से कवि के कृतित्व का कॉपीराइट खरीद लिया. अब हुआ यह कि उसी दौरान एक अन्य फिल्म निर्माता ने भारती का एक गीत अपनी फिल्म में इस्तेमाल कर लिया और इस पर उक्त खरीददार निर्माता ने उस पर कानूनी कार्यवाही कर दी. और यहीं से घटनाक्रम में एक ज़ोरदार  मोड़ आ गया. राज्य में इस मांग के लिए एक बड़ा आंदोलन शुरु हो गया कि राज्य सरकार इस महाकवि की रचनाओं का कॉपीराइट प्राप्त करे. शायद साहित्य के इतिहास की यह अपने तरह की इकलौती घटना है. तमिल लेखक भी इस मांग के समर्थन में मुखर हुए कि भारती के सृजन को निजी स्वामित्व की कैद  से आज़ादी दिलाई जाए. लगभग पांच बरस की जद्दोजहद के बाद अंतत: 1949 में राज्य सरकार ने इस तमिल महाकवि की रचनाओं का कॉपीराइट खरीद कर उसे सार्वजनिक रूप से सुलभ कराने का अभूतपूर्व कदम उठाया. और इसके बाद तो तमिलनाडु में ऐसा होना आम ही हो गया. सुब्रह्मण्यम भारती की मृत्यु के चालीस बरस बाद उनके शिष्य-कवि भारती दासन के कृतित्व का कॉपीराइट भी तमिलनाडु सरकार ने खरीद लिया. इसी सरकार ने 1992 में तमिलनाडु के भूतपूर्व मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुराई के कृतित्व का कॉपीराइट सत्तर लाख से भी ज़्यादा रुपयों में खरीदा. और उसके बाद से अब तक यह सरकार करीब सौ लेखकों के कृतित्व का कॉपीराइट खरीद कर उस सृजन को सार्वजनिक रूप से सुलभ करा चुकी है.

मूलत: इस काम के पीछे लेखकों को आर्थिक मदद पहुंचाने का पवित्र भाव था. लेकिन जैसा सर्वत्र होता है, अब इसमें और बहुत सारी बातें शुमार हो गई हैं और इस कारण  खुद तमिल लेखक कहने लगे हैं कि इस तरह का संरक्षण साहित्य के हित में नहीं है. यहीं यह बात भी याद कर लेना प्रासंगिक होगा कि खुद महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती साहित्य को राजकीय संरक्षण देने के खिलाफ थे. उन्होंने 1916 में अपने एक लेख में लिखा था कि “अब कलाओं को आम जन से ही समर्थन और सहायता प्राप्त होगी. यह कलाकारों का दायित्व  है कि वे आम जन में सुरुचि जगाएं. इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे.” तमिल साहित्यकार जो भी कहें और वहां का यथार्थ चाहे जो भी हो,  इतना तो स्वीकार करना ही होगा कि किसी महाकवि का पांच  सौ पृष्ठों का कविता संग्रह मात्र सौ रुपये में मिलना हम हिंदी वालों के लिए अकल्पनीय बात है. कॉपीराइट मुक्त हो जाने के बाद भी हम तो प्रेमचंद और रवींद्र नाथ टैगोर की किताबों के महंगे संस्करण ही खरीदने को विवश हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 24, 2016

क्या पुलिस को भी संरक्षण मिलना चाहिए?

अपने देश में आए दिन कभी यहां से तो कभी वहां से पुलिस कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार,  मारपीट और  यहां तक कि कभी-कभी उनकी हत्याओं तक की खबरें आती रहती हैं. पुलिस के साथ बदसुलूकी तो आम बात है और अच्छी खासी समझ रखने वाले भी उनके प्रति अपशब्दों और अपमानजनक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते रहते हैं. ऐसे में मुझे सुदूर अमरीका से आया एक समाचार विशेष रूप से ध्यानाकर्षक लगा. उस समाचार की चर्चा और विश्लेषण से पहले उसकी पृष्ठभूमि बता दूं.    

संयुक्त राज्य अमरीका के बहुत सारे राज्यों में उन लोगों को अतिरिक्त दण्ड देने के प्रावधान हैं जो नस्ल या धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध किसी भी तरह का अपराध करते हैं. यानि वहां अगर कोई किसी खास समूह से संलग्नता  के आधार पर किसी से  घृणा  करते हुए कोई अपराध करता है तो उस अपराध की गम्भीरता को बढ़ा कर देखा जाता है. सामान्यत: इस घृणा  में जातीयता, लैंगिकता या शारीरिक अक्षमता को शामिल किया जाता रहा है. लेकिन अब वहीं के एक राज्य लुइज़ियाना में बहुत जल्दी एक नया विधेयक पारित होकर लागू होने वाला है जिससे इस घृणा-अपराध कानून के तहत जन-सुरक्षा कार्मिकों (पुलिस और अग्नि रक्षक) को भी एक संरक्षक प्रजाति माना जाने लगेगा. इस विधेयक के लागू हो जाने के बाद इन सुरक्षा कार्मिकों के विरुद्ध किसी भी तरह का गम्भीर अपराध करने वालों पर पाँच हज़ार डॉलर तक का आर्थिक दण्ड या उन्हें पाँच साल के कारावास की सज़ा दी जा सकेगी. उल्लेखनीय है कि लुइज़ियाना ऐसा करने वाला अमरीका का पहला राज्य होगा. लुइज़ियाना में इस विधेयक को ‘ब्ल्यू लाइव्ज़  मैटर’  (नीली वर्दी वालों की भी जान कीमती होती है) के नाम से जाना जा रहा है. इस नामकरण का इतिहास यह है कि फर्ग्युसन  में  सन 2014 में माइकल ब्राउन नामक एक निहत्था अश्वेत किशोर पुलिस की गोलीबारी में मारा गया था और तब पुलिस की इस तथाकथित  ज़्यादती के खिलाव एक बड़ा अभियान  शुरु हुआ था जिसे ‘ब्लैक  लाइव्ज़ मैटर’ कहा गया था. अब इस ब्ल्यू लाइव्ज़  वाले नए अभियान के समर्थकों का कहना है कि ज़्यादा हमले तो पुलिस पर ही होते हैं, जबकि असल   में तो वह  कानून व्यवस्था स्थापित करने के अपने दायित्व का ही निर्वहन कर रही होती है.
इस बात की पुष्टि  नेशनल लॉ एन्फोर्समेण्ट मेमोरियल फंड के इस दावे से भी होती है कि सन 2015 में कम से कम 124  पुलिस अधिकारी अपना कर्तव्य निर्वहन करते हुए मारे गए थे. एफबीआई ने भी पिछले सप्ताह जो आंकड़े ज़ारी किए हैं उनके अनुसार सन 2015 में 41 कानून और व्यवस्था अधिकारी अपना कर्तव्य पालन करते हुए दुर्भावनापूर्वक मार डाले गए थे.

स्वाभाविक ही है कि इस तरह के हमलों ने प्रभावितों को और सरकार को विचलित किया है. लेकिन लुइज़ियाना राज्य जो कदम करीब-करीब उठा चुका है उससे सभी सहमत हों, ऐसा फिर भी नहीं है. न्यू ऑर्लियंस स्थित ब्लैक यूथ प्रोजेक्ट 100 ऐसा ही एक एक्टिविस्ट समूह है जो इस कदम से तीव्र असहमति रखता है. अपने तीव्र प्रतिवाद में उसने  कहा है कि घृणा-अपराध विधेयक में पुलिस को भी एक संरक्षित वर्ग के रूप में शामिल कर लेने से एक ऐसी संस्था को और अधिक संरक्षण मिलने लगेगा जो पहले से ही अपने कर्म, नीति और प्रभाव में आंकड़ों द्वारा नस्लीय साबित हो चुकी है. इस संगठन का यह भी कहना है कि हम तो इसे पुलिस की नृशंसता के विरुद्ध लोगों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के खिलाफ एक विधायी आक्रमण और राजनीतिक प्रतिकार के रूप में देखते हैं.  इसी तरह एण्टी डिफेमेशन लीग के क्षेत्रीय निदेशक ने भी इस कदम को अविवेकपूर्ण बताया है. इस विधेयक के आलोचकों को आशंका यह है कि अगर यह लागू हो गया तो इसका दुरुपयोग पुलिस के खिलाफ होने वाले प्रतिरोध को कुचलने में किया जाने लगेगा. बोस्टन स्थित नॉर्थ ईस्टर्न यूनिवर्सिटी के  अपराध शास्त्री  जैक लेविन ने तो और भी मार्के की बात कही है. उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि हो सकता है संरक्षित समूहों की इस सूची में बाद में और कुछ समूह जोड़ दिये जाएं. लेकिन पुलिस को इस सूची में शामिल करने की सबसे बड़ी बुराई यह है कि वह उन बहुत सारे संगठनों में से एक है जो पहले ही काफी खतरनाक हैं. लेविन ने एक और गौर तलब बात यह कही है कि जिन खतरों की बात कहते हुए पुलिस को यह संरक्षण प्रदान किया जाने वाला है वे तो उसके कर्तव्य का हिस्सा हैं.

यानि सरकार का सोच एक तरफ और बहुत सारे संगठनों का सोच उसके विपरीत. और दोनों के अपने-अपने सशक्त तर्क. सोचें कि अगर हमारे देश में भी ऐसा ही कुछ हो तो हमारी प्रतिक्रिया  क्या होगी!   

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 24 मई, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकशित आलेख का मूल पाठ.