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Tuesday, February 13, 2018

अब कनाडा के राष्ट्रगान में केवल बेटे नहीं बेटियां भी शामिल!

आखिर सन 2018 की जनवरी में कनाडा की सीनेट ने वह बिल पास कर ही दिया जिसके लिए लिए वहां के समझदार लोग करीब चार दशकों से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे. इस बिल के पास हो जाने से अब कनाडा का राष्ट्रगान केवल पुरुष पक्षी न रहकर उभयपक्षी या जेंडर न्यूट्रल हो जाएगा. कनाडा का राष्ट्रगान मूलत: 1880 में रचा गया था, लेकिन राष्ट्रगान का दर्ज़ा पाने में इसे एक शताब्दी का सफर तै करना पड़ा था. तब तक गॉड सेव द किंग ही कनाडा का भी राष्ट्रगान बना रहा. इस नए गीत की शुरुआती पंक्तियां हैं: ओ कनाडा!अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड! / ट्रु पैट्रियट लव इन आल दाई  सन्स  कमाण्ड. सन 1997 में पचास वर्षीया फ्रांसिस राइट का ध्यान इन पंक्तियों पर गया और उन्हें यह बात अखरी कि इस गान में केवल बेटों का ही ज़िक्र क्यों है, बेटियों का क्यों नहीं? कुछ अन्य की शिकायत अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड से भी थी, विशेष रूप से उनकी जो कहीं अन्यत्र से आकर कनाडा वासी हो गए थे. लेकिन ज़्यादा ज़ोर इसके केवल बेटों को याद करने वाले  शब्दों पर ही था. 1998 में जब विवियन पॉय नामक एक पूर्व फैशन डिज़ाइनर सीनेट में पहुंची तब सीनेट की करीब आधी सदस्य स्त्रियां थीं. स्वभावत: उनमें से बहुतों को भी गीत के इन शब्दों पर गम्भीर आपत्ति थी. पॉय ने एक हस्ताक्षर अभियान शुरु किया जिसमें उनका सक्रिय साथ दिया उक्त फ्रांसिस राइट ने.

उन दिनों की याद करते हुए राइट ने कहा कि वो ज़माना सोशल मीडिया का तो था नहीं. उनका अभियान हिचकोले खाता हुआ ही चला. एक एक हस्ताक्षर जुटाने के लिए उनें कड़ी मेहनत करनी पड़ी, फिर भी बमुश्क़िल चार पांच सौ हस्ताक्षर ही जुट सके. कुछ परम्परा प्रेमी लोग उनसे यह कहते हुए ख़फ़ा भी हुए कि “अरे भाई, यह गान ठीक ही तो है. इसमें बदलाव की ज़रूरत ही क्या है?” लेकिन क्योंकि पॉय और राइट को इस तरह की प्रतिक्रियाओं की पहले से उम्मीद थी, वे हताश  नहीं हुईं. वे यह बात समझती थीं  कि आखिर जिस गान को 3.6 करोड़ लोग इतने समय से गा रहे हैं, उसमें किसी भी बदलाव के लिए उन्हें तैयार करना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं. पॉय ने जब इसमें बदलाव के वास्ते प्राइवेट मेम्बर्स बिल पेश किया तो उन्हें तो यहां तक सुनना पड़ा कि अगर गान के शब्दों में बदलाव करना ही है तो इसमें सिर्फ औरतों को क्यों जोड़ा जाए, समाज के अन्य तबकों जैसे मछुआरों, बैंक कर्मियों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों वगैरह को भी क्यों न जोड़ दिया जाए! ज़ाहिर है कि बहुत सारे लोग बदलाव की मांग को तर्क संगत नहीं  मानते थे. इसके बावज़ूद दिसम्बर 2003 में यह आस बंधी कि शायद यह बिल पास हो जाए, लेकिन तब एक पुरुष सीनेटर ने अपने अहं के चलते इसे पास होने से रुकवा दिया.

लेकिन पॉय ने हार नहीं मानी. उन्हें 63 वर्षीया नैंसी रुथ का साथ मिला, जो कुछ मानों में कनाडा की राजनीति में एक विवादास्पद नेता भी मानी जाती हैं. वे एक जानी-मानी सीनेटर हैं, स्त्रीवादी हैं  और खुलकर स्त्री समलैंगिक सम्बंधों का समर्थन करती हैं. नैंसी को यह अभियान अपने स्त्रीवादी सोच के अनुरूप लगा और उन्होंने  इसका उन्मुक्त समर्थन  किया. उन्होंने बाद में कहा कि “मैं भी चाहती थी  कि इस मुल्क की स्त्रियों को अपने राष्ट्रगान में जगह मिले. मैं चाहती  थी कि मेरे जीते जी ही ऐसा हो जाए.” अपने प्रयासों को और तेज़ करते हुए उन्होंने इसके लिए एक संगठन भी बनाया. लेकिन उनका  मनचीता हो पाता उससे पूर्व ही उनका कार्यकाल पूरा हो गया. उनके बाद भी प्रयास ज़ारी रहे और आखिरकार पिछले बरस जून में हाउस ऑफ कॉमन्स ने इस बदलाव  को लाने वाले बिल  को परित कर ही दिया. नैंसी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया एक अन्य स्त्रीवादी सीनेटर फ्रांसिस लैंकिन ने. उनका कहना था कि “मैं एक ऐसी दुनिया में जीना कहती हूं जिसमें पहले ही दिन से सभी  के लिए समान अवसर हों. क्या इस बिल से ऐसा हो जाएगा? नहीं. लेकिन कम से कम यह तो होगा कि मेरी पोती मुझसे यह सवाल नहीं करेगी कि इस गान में केवल बेटे ही क्यों हैं? इसमें बेटियों का ज़िक्र क्यों नहीं है? अब ऐसा नहीं होगा.” और आखिर यह बिल पास हो ही गया. अब इस गान में ऑल दाई सन्स कमाण्ड की जगह इन ऑल ऑफ अस कमाण्ड गाया जाएगा.

इस बिल पर सबसे खूबसूरत प्रतिक्रिया ज़ाहिर की कनाडा की विख्यात लेखिका मार्गरेट एटवुड ने. उन्होंने नैंसी को सम्बोधित एक पत्र में लिखा, “एक कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से तुम्हारा शुक्रिया. सिर्फ वो ही व्यक्ति तुम्हारा आभार नहीं मानेगा जो यह चाहता है कि मैं जिस चट्टान के नीचे से निकल कर आई हूं, फिर से जाकर उसी के नीचे घुस जाऊं.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 8, 2016

ताकि स्कूल कल किसी और की बेटी का अपमान न करे!

अमरीका के मेरीलेण्ड राज्य के वाल्डोर्फ शहर के एक मिडिल स्कूल में जैसे ही श्रीमती एबॉनी बैंक्स की ग्यारह वर्षीया बेटी पहुंची, स्कूल प्रशासन ने उसे क्लास में बैठने की अनुमति देने से मना कर दिया, उसे एक अलग कमरे में बिठाया और कहा कि वो अपनी मां को फोन करे. बिटिया  ने मां से कहा कि वो उसके लिए एक जीन्स  लेकर फौरन स्कूल आ जाए. स्कूल प्रशासन का कहना  था कि वो लड़की जिस वेशभूषा में स्कूल आई थी उससे उनके ड्रेस कोड का उल्लंघन हो रहा था. लड़की ने काले रंग की लेगिंग्स पहनी थी और उस पर कमर तक पहुंच रहा काले रंग का छोटी आस्तीन वाला शर्ट और गुलाबी रंग का स्वेटर जैकेट पहना था. स्कूल की अपेक्षा थी कि जो लड़कियां लेगिंग्स पहनें वे पाँव की उंगलियों तक पहुंचने वाले शर्ट भी पहनें ताकि वे अपनी देह की तरफ़ अनावश्यक ध्यान आकृष्ट न कर सकें.

मेरीलेण्ड के ही विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर और जेण्डर एक्सप्रेशन की विशेषज्ञ  ड्रेस इतिहासकार जो पाओलेत्ती ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही है. उन्होंने कहा है कि इस बात की परिभाषा सदा बदलती रहती है कि क्या अनुपयुक्त या सेक्सी है. अपनी बात को और खोलते हुए वे कहती हैं कि फैशन निरंतर नए आविष्कार करता रहता है और उन्हीं के पीछे चलते हुए ड्रेस कोड लेखकों को यह तै करना होता है कि क्या अनुपयुक्त है और किसे बैन किया जाना है. ड्रेस कोड का मसला स्कूलों  में विशेष अहमियत रखता है और वहां भी इसके घेरे में लड़कों की बजाय लड़कियां ज़्यादा आती हैं. अमरीका के विभिन्न राज्यों में, और अपने भारत में भी, स्कूलों में कौन क्या पहने और क्या न पहने इस पर प्राय: विवाद होते रहे हैं. बहुत सारे स्कूलों ने तो इस विवाद से निजात पाने का आसान तरीका यह तलाश किया है कि उन्होंने अपने यहां यूनीफॉर्म निर्धारित कर दी है. लेकिन जहां ऐसा नहीं हुआ है वहां विवाद भी अधिक हुए हैं.

यहां हमने जिन श्रीमती एबॉनी बैंक्स के ज़िक्र से अपनी बात शुरु की, वे अपनी बेटी के स्कूल के इस फैसले से बेहद नाराज़ हैं. इतनी कि उन्होंने स्कूल के सर्वोच्च  प्रशासन से शिकायत  करने के साथ-साथ संघीय अधिकारियों का दरवाज़ा भी खटखटाया है और सिविल राइट्स में भी शिकायत दर्ज़ कराई है. उनका कहना है कि उनकी बेटी स्कूल की ऑनर रोल विद्यार्थी है और वो डॉक्टर बनने का ख्वाब देखती है. ऐसी ज़हीन लड़की को महज़ चन्द इंच कपड़ों की खातिर पूरे बीस मिनिट कक्षा से वंचित कर देना नाइंसाफी  है. उनका यह भी कहना है कि स्कूल का यह कृत्य उस बच्ची के मन पर नकारात्मक असर डालेगा, उसके स्व-देह-बोध और स्वाभिमान को ठेस पहुंचाएगा. एबॉनी बैंक्स ने कहा कि स्कूल का यह कृत्य निहायत ही सेक्सिस्ट है और इसने मेरा  खून खौला दिया है. इस विवाद का एक पहलू यह भी सामने  आया कि यह बच्ची जिस अफ्रीकी अमरीकन समूह से ताल्लुक रखती है उनकी देह औरों की तुलना में अधिक मांसल होती हैं, और कदाचित इसी वजह से स्कूल प्रशासन ने उसकी ड्रेस को आपत्तिजनक माना हो. हालांकि स्कूल प्रशासन ने इस सम्भावना को सिरे से नकारा है और कहा है कि वे लड़कों से भी उम्मीद करते हैं कि अपनी पतलूनों को नितम्बों से नीचे न बांधा करें. स्कूल ने अपने कृत्य को उचित ठहराते हुए एक तर्क यह भी दिया कि जैसे चौराहे का सिपाही बहुत सारे वाहन चालकों में से कुछ का ही चालान कर पाता है वैसे ही वे भी सबमें से कुछ ही विद्यार्थियों की वेशभूषा पर आपत्ति कर सके हैं. स्कूल की इस बात से शायद ही कोई असहमत हो कि स्कूल का एकमात्र उद्देश्य यह होता है कि विद्यार्थी अपनी पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान दें और साथ ही यह भी  समझें कि जीवन में अलग-अलग अवसरों पर अलग-अलग  वेशभूषा की ज़रूरत होती है. 

लेकिन स्वाभाविक है कि सभी लोग स्कूल के इस कृत्य से सहमत नहीं हैं. तेरह वर्षीया सोला   बियर्स ने स्कूल के इस कृत्य के विरुद्ध अपनी आवाज़  बुलन्द करते हुए कहा कि स्कूल का यह ड्रेस कोड वाकई सेक्सिस्ट है. इसमें लड़कियों के लिए तो बहुत सारे नियम-कायदे हैं, लेकिन लड़कों के लिए एक भी प्रतिबन्ध नहीं है. सबसे उम्दा बात तो कही खुद एबॉनी बैंक्स ने. उन्होंने कहा कि उनकी बेटी घटना वाले दिन से ही विचलित रही लेकिन उसने इस बात को जल्दी ही भुला भी दिया. लेकिन खुद उन्होंने इस मामले को किसी परिणति तक पहुंचाने के लिए अपने प्रयास ज़ारी रखे हैं. वे यह महसूस करती हैं कि यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर व्यापक विमर्श की ज़रूरत है. “मैं नहीं चाहती कि किसी और लड़की को भी मेरी बेटी की तरह अपमानित करके कक्षा से बाहर निकाला जाए!. यह बेहद अपमानजनक  है.”      

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 08 नवम्बर, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, February 23, 2016

जाओ, पहले अपने पवित्र होने का प्रमाण पत्र लेकर आओ!

अपने देश में जारी होने वाले कुछ अजीबो गरीब फतवों और खापों के फरमानों से अगर आप पर्याप्त दुःखी न हो चुके हों तो ज़रा दूर देश के इस फैसले के बारे में भी जान लीजिए. आज मैं बात कर रहा हूं सुदूर दक्षिण अफ्रीका की जहां के क्वाज़ुलु नैटाल इलाके के एक ज़िले उथुकेले की मेयर दुदु माज़िबुको ने एक ऐसा आदेश ज़ारी किया है जो आपको सोचने को मज़बूर करेगा कि अभी इक्कीसवीं सदी चल रही है या दसवीं-बारहवीं सदी. जिस नगरपालिका की ये मेयर हैं उसने इस साल से अपने यहां के युवाओं को उच्च शिक्षा के लिए वार्षिक छात्रवृत्तियां प्रदान करने की घोषणा की थी. बताया गया कि वैसे तो यह नगरपालिका अपने इलाके के सौ से ज़्यादा विद्यार्थियों को उच्च अध्ययन के लिए यह छात्रवृत्ति प्रदान करती है लेकिन इस बरस इसमें एक और प्रावधान जोड़ कर  इसे केवल उन छात्राओं तक सीमित कर दिया गया  है जो इस आशय का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेंगी कि वे उस तिथि विशेष तक कुंवारी (वर्जिन) हैं. और क्योंकि इस योजना का लाभ छात्रा के शिक्षण संस्थान में अध्ययन के तमाम वर्षों तक देय है, इसे प्राप्त करने की इच्छुक  छात्रा को अपनी छात्रवृत्ति का नवीनीकरण कराने के लिए हर बरस इस आशय का  प्रमाण पत्र देना होगा.  बताया गया है कि इस बरस सोलह छात्राओं ने इस आशय का प्रमाण पत्र देकर यह छात्रवृत्ति प्राप्त कर ली है.

बहुत स्वाभाविक है कि इस आदेश पर तीव्र प्रतिक्रियाएं हुई हैं. मानव अधिकार समूहों और लैंगिक समानता के पक्षधरों ने उचित ही यह सवाल उठाया है कि कौमार्य की जांच की शर्त केवल युवतियों पर ही क्यों लागू  की जा रही है?  उन्होंने इसे व्यक्ति की निजता का हनन भी माना है. एक एक्टिविस्ट जेसिका थॉर्प ने इस भेदभाव  को भी रेखांकित किया है कि छात्रों को तो उनके कौमार्य या उसकी  अनुपस्थिति के लिए पुरस्कृत या दंडित नहीं किया जाता है जबकि छात्राओं पर यह मापदण्ड लागू किया जा रहा है. वहां के अनेक जाने-माने शिक्षाविदों ने खुलकर यह बात कही है कि सेक्सुअली  सक्रिय होने का शिक्षा ग्रहण करने से कोई सम्बन्ध नहीं है और इस कारण सेक्स को शिक्षा प्राप्त करने के अवसरों के साथ जोड़ना अनुपयुक्त है. मेयर महोदया ने अपने निर्णय को उचित ठहराते हुए कहा था  कि कौमार्य का प्रमाण देने का यह प्रावधान लड़कियों को पवित्र और सेक्सुअल गतिविधियों से दूर रखकर उन्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित करने में मददगार साबित होगा. एक स्थानीय रेडियो स्टेशन से अपने प्रसारण में उन्होंने फरमाया, “हमारे वास्ते तो यह एक तरीका है आपको इस बात के लिए धन्यवाद देने का कि आपने अभी तक अपने आप को खुद के लिए बचाए रखा है और तब तक बचाए रखेंगी जब तक कि  आप डिग्री या प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं कर लेतीं.”

जब मेयर महोदया के इस फैसले की ज़्यादा ही आलोचना  हुई तो उन्होंने कहा कि यह योजना तो उस इलाके में एच आई वी, एड्स और अवांछित गर्भधारण के मामलों को नियंत्रित  करने के लिए लाई गई है. वैसे, यह बात सही है कि दुनिया में एच आई वी का फैलाव दक्षिण अफ्रीका में बहुत ज़्यादा है. 2013 के आंकड़ों  के अनुसार उस देश में 63 लाख लोग इससे ग्रस्त थे. वहां के अपराध के आंकड़े बताते हैं कि साल 2014-2015 के मध्य सेक्सुअल अपराधों के 53, 617  मामले  दर्ज़  हुए थे, हालांकि जानकारों का कहना है कि असली तस्वीर तो इससे भी बुरी है.

लेकिन इन  आंकड़ों  के बावज़ूद इस बात से कोई सहमत नहीं हो पा रहा है कि मेयर महोदया का यह फरमान उचित है और इससे हालात सुधर जाएंगे.   देश के जेण्डर समानता के अध्यक्ष तक ने कह दिया है कि भले ही मेयर के इरादे नेक हों,  हम कौमार्य के आधार  पर छात्रवृत्ति देने के उनके निर्णय  से सहमत नहीं हैं. यह तो गर्भधारण और कौमार्य के आधार पर लैंगिक भेदभाव का मामला है और लड़कों के भी खिलाफ़ है.” यहीं यह बात भी ग़ौर तलब है कि दक्षिण अफ्रीका में सहमति से यौन सम्बध कायम करने की उम्र 16 बरस है और कुछ अपवादों में इसे घटाकर 12 से 16 बरस तक भी लाया जा सकता है. बल्कि इस जानकारी के सन्दर्भ में तो छात्रवृत्ति के लिए कौमार्य परीक्षण की शर्त और अधिक असंगत प्रतीत होने लगती है. यह शर्त और अधिक  हास्यास्पद इस जानकारी से भी लगने लगती है कि कौमार्य परीक्षण जुलु परम्पराओं के आधार पर किए जाने की बात कही गई है. जुलु परम्परा में यह परीक्षण वृद्धाएं करती हैं जो आम तौर पर किसी लड़की की आंखों और  उसके चलने के ढंग को देखकर ही फैसला सुना देती हैं कि वो कुमारी है या नहीं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 23 फरवरी, 2016 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Thursday, May 15, 2008

जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी

पति पत्नी कार में कहीं जा रहे हैं. पत्नी पूछती है, “आप कॉफी के लिए कहीं रुकना चाहेंगे?” ”नहीं, धन्यवाद!” पति ईमानदारी से जवाब देता है और यात्रा जारी रहती है.
परिणाम? दरअसल पत्नी जो खुद कॉफी के लिए रुकना चाहती थी, यह सोच कर नाराज़ हो जाती है कि पति ने उसकी इच्छा का मान नहीं रखा. उधर, पत्नी को नाराज़ देख पति भी परेशान हो जाता है और समझ नहीं पाता कि पत्नी कॉफी पीना ही चाहती थी तो साफ-साफ क्यों नहीं बोली?

इस प्रकरण में पति तो यह नहीं समझ सका कि पत्नी ने जो पूछा था, उसका असल मक़सद पूछना नहीं, संवाद शुरू करना था, और पत्नी यह नहीं महसूस कर सकी कि पति ने जब कॉफी के लिए मना किया तो उसने महज़ अपनी पसन्द ज़ाहिर की थी, कोई हुक्म नहीं दिया था.
हम सब की ज़िन्दगी में अक्सर ऐसा होता है. जब स्त्री और पुरुष अपनी-अपनी तरह से भाषा को बरतते हैं तो उसकी परिणति एक दूसरे पर स्वार्थी और ज़िद्दी होने का इलज़ाम लगाने में होती है.

जॉर्ज़ टाउन विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान की प्रोफेसर और विख्यात समाज-भाषा वैज्ञानिक डेबोराह तान्नेन ने अपनी नई किताब यू जस्ट डॉण्ट अण्डर स्टैण्ड : वुमन एण्ड मेन इन कन्वर्सेशन में स्त्री और पुरुष द्वारा भाषा के इसी भिन्न व्यवहार पर गहन किंतु रोचक विमर्श किया है. उनका स्पष्ट मत है कि ज़्यादातर स्त्रियां बातचीत को सम्पर्क और संवाद के लिए प्रयोग करती हैं जबकि पुरुष इसका प्रयोग सामाजिक हैसियत अर्जित करने या बनाए रखने के लिए और ज्ञान देने के लिए करते हैं. डेबोराह ने स्त्रियों की बातचीत को निजी बातचीत (रैपो टॉक) और पुरुषों की बातचीत को सार्वजनिक बातचीत (रिपोर्ट टॉक) की संज्ञा दी है.
लेखिका ने अनेक उदाहरणों से यह समझाया है कि स्त्रियां सहेलियों और प्रेमियों से बात करके निकटता स्थापित करती हैं. वे अपनी समस्याओं का साझा भी करती हैं. लेकिन पुरुष प्राय: ऐसा नहीं करते. अगर स्त्री उनके सामने कोई समस्या रखती है तो वे तुरंत उसका समाधान पेश करते हैं. तब, स्त्री को लगता है कि पुरुष उसकी समस्या में रुचि नहीं ले रहा है. स्त्री को सुनने वाले की चाहना थी, न कि समाधान देने वाले की. तब, पुरुष शिकायत करता है कि स्त्री तो अपना ही रोना रोती रहती है, और समाधान में उसकी कोई रुचि नहीं है. पुरुष की इस शिकायत के मूल में है स्त्री की आधारभूत प्रकृति से उसका अपरिचय. खुद पुरुष किसी से अपनी समस्या की चर्चा तब तक नहीं करता जब तक कि उसे समाधान की ज़रूरत न हो.
इस बात के उदाहरण के रूप में डेबोराह लिखती हैं, “जब मेरी मां मेरे पिता से कहती हैं कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो मेरे पिता उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास चलने को कहते हैं. उनकी यह प्रतिक्रिया मेरी मां को अच्छी नहीं लगती. पिता समस्या का समाधान पेश करते हैं जबकि मां केवल उनकी सहानुभूति चाहती हैं.”

स्त्री और पुरुष भाषा की भिन्नता की खोज करते हुए डेबोराह ने लडके और लडकियों के खेलने के तौर-तरीकों का भी विश्लेषण किया है. वे बताती हैं कि लडके बडे समूहों में और प्राय: बाहर खेलने में रुचि रखते हैं. उनके समूह में एक पदानुक्रम भी होता है, यानि एक ग्रुप लीडर होता है जो सबको हुक्म देता है. लडकों के खेल-में हार-जीत भी होती है. इसके विपरीत, लडकियां अक्सर छोटे समूह में या जोडियों में ही खेलना पसन्द करती हैं और हरेक की कोई न कोई बेस्ट फ्रेंण्ड होती है. उनके यहां कोई आदेश नहीं दिए जाते. लडकियों के लिए निकटता महत्वपूर्ण होती है. उनके खेलों में हार-जीत भी नहीं होती. उनकी प्रकृति का यह अंतर उनकी संवाद शैली का भी निर्माण करता है.

लेखिका ने स्त्री और पुरुष संवादों की तह में जाकर खोजा है कि हर स्त्री अंतत: एक ही बात पूछती है: क्या तुम मुझे पसन्द करते हो? और इसी तरह हर पुरुष भी एक ही बात पूछता है: क्या तुम मेरा सम्मान करते/करती हो?

निष्कर्ष के रूप में डेबोराह सलाह देती हैं कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही एक-दूसरे की संवाद शैली की मूलभूत भिन्नताओं को समझना चाहिए. जैसे, स्त्रियां जैसी बातें अपनी सहेलियों से करती हैं वैसी ही बातें अगर अपने पुरुष मित्रों से भी करेंगी तो यह उन्हें अपनी सहेली में तब्दील करने जैसा होगा. और इसी तरह, पुरुष को भी यह समझना चाहिए कि जब कोई स्त्री उससे मुखातिब है तो वह दर असल कुछ कह नहीं रही बल्कि अपने रिश्ते को मज़बूत करने की चेष्टा कर रही है. वे कहती हैं कि दोनों को किसी मध्य बिन्दु तक आने का प्रयास भी करना चाहिए. कुल मिलाकर, अगर स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दूसरे से यह उम्मीद करना बन्द कर दें कि वे उन्हीं की तरह संवाद करेंगे तो ज़िन्दगी ज़्यादा खूबसूरत हो सकती है.
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Discussed book:
You Just Don’t Understand: Women and Men in Conversation
By Deborah Tannen
Published by Harper Collins Publishers
352 pp
US $ 13.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 15 मई 2008 को प्रकाशित.








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