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Tuesday, January 1, 2019

क्या इंसानी जीवन का कोई मूल्य नहीं है?

नाइजीरिया का वो सरकारी अस्पताल हमारे देश के आम सरकारी अस्पतालों जैसा ही है. कहीं टाइल उखड़ा हुआ है तो कहीं प्लास्टर. गद्दे मैले हैं और हर तरफ़ बदइंतज़ामी का आलम है.  मरीज़ों की भीड़ है. तभी जाने कहां से एक चुस्त-दुरुस्त, चालीसेक बरस का अमीर-सा लगने वाला शख़्स अपनी काले रंग  की शानदार मर्सीडीज़ से निकल कर अस्पताल के वार्ड में दाखिल होता है. उसके साथ चल रहे अमले में से एक आदमी उसके हाथ में कुछ कागज़ थमा देता है और उन कागज़ों पर सरसरी  नज़र डालते हुए वो अपने साथियों से कुछ पूछताछ करता है. उस आदमी का नाम है ज़ील अकाराइवाय और उसके साथियों ने उसे जो  कागज़ थमाये हैं उनमें अस्पताल के उन रोगियों का विवरण है जो ठीक हो चुके हैं और घर जा सकते हैं लेकिन क्योंकि वे अस्पताल का बिल चुकाने में असमर्थ हैं, मज़बूरन वहां पड़े हुए हैं. वैसे नाइजीरिया के कुछ अस्पताल अपने रोगियों को यह सुविधा भी प्रदान करते हैं कि वे अपने बिल का भुगतान किश्तों में कर दें, लेकिन बहुत सारे रोगियों के लिए ऐसा भी करना सम्भव नहीं होता है. ज़ील अकाराइवाय  ऐसे ही एक मरीज़ के पास जाता है, उससे उसके रोग के बारे में पूछता है और  फिर यह जानना चाहता है कि वो अपने अस्पताल के बिल का भुगतान कैसे  करेगा? रोगी हताशा भरी आवाज़ में बस यह कह पाता है:  “मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा हूं!” ज़ील उसे कुछ नहीं कहता है, लेकिन आगे बढ़ते  हुए अपने साथियों में से एक को कुछ इशारा करता है, जिसका आशय यह है कि उसके बिल का भुगतान कर दिया जाए. और इस तरह वह पूरे वार्ड का चक्कर लगाता है, कई रोगियों के बिल का भुगतान करने के निर्देश देता है और अस्पताल से बाहर निकल जाता है. 

ज़ील ने, जो एक फाइनेंसियल कंसलटेण्ट है अपने साथियों को स्पष्ट निर्देश दे रखे हैं कि किसी भी रोगी को यह पता नहीं चलना चाहिए कि उसके अस्पताल के बिल का भुगतान किसने किया है. वह यह भी नहीं चाहता कि जिन लोगों की उसने मदद की है उनमें से कोई उसके प्रति कृतज्ञ हो. लेकिन हां, वह यह ज़रूर चाहता है कि बाद में कभी कोई इस बात का ज़िक्र ज़रूर करे कि जब वो अस्पताल में भर्ती  था और ज़रूरतमंद था तो कोई आसमानी फरिश्ता आया था और उसने आकर उसके बिल का भुगतान कर दिया था. फरिश्ते वाली बात को ध्यान में रखकर ही ज़ील ने अपने प्रोजेक्ट को नाम दिया है – ‘एंजल प्रोजेक्ट’  यानि फरिश्ता परियोजना. ज़ील ईसाई धर्मावलम्बी है और उसका कहना है कि उसके  धर्म ने ही उसे यह सिखाया है कि हममें से हरेक किसी न किसी की मदद कर सकता है. उसका सोच यह है कि आप जिस आसमानी फरिश्ते का तसव्वुर करते हैं वह तो आपमें ही मौज़ूद होता है. इस एंजल  प्रोजेक्ट के लिए ज़ील के दोस्त और परिवार जन भी उसे आर्थिक सहयोग देते हैं और वह पाई पाई का हिसाब रखता है और उन्हें बताता है कि उनकी दी हुई राशि से उसने किस-किसके कितने बिल का भुगतान किया है. 

ज़ील ने अपने इस प्रोजेक्ट के लिए एक नियम यह बना रखा है कि वह केवल उन रोगियों के बिलों का भुगतान करेगा जो ठीक हो चुके हैं और बिल का भुगतान न कर सकने की वजह से अस्पताल में फंसे हुए हैं. यानि एंजल प्रोजेक्ट रोगियों के इलाज़ के लिए पैसा नहीं देता है. लेकिन बहुत बार ऐसा भी होता है वार्ड का दौरा करते हुए उसे किसी रोगी की करुण कथा कुछ इस तरह मज़बूर कर देती है कि वो खुद अपने बनाये नियम को तोड़कर उसकी मदद करने को विवश  हो उठता है. लेकिन अपनी हर मदद के बाद, चाहे वो ठीक हो चुके रोगी के अस्पताल का बिल चुकाना हो या किसी गम्भीर रोगी के उपचार का खर्चा उठाना हो, ज़ील पहले से ज़्यादा उदास हो जाता है. उदास भी और अपनी सरकार से नाराज़ भी. वो कहता है कि “मात्र यह बात कि मुझ जैसे किसी शख़्स को अस्पताल में बिल का भुगतान न कर पाने की वजह से फंसे पड़े रोगी  की मदद के लिए आगे आना पड़ता है, इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि हमारी व्यवस्था में कितनी नाइंसाफ़ी है. आखिर हम एक मुकम्मिल  स्वास्थ्य बीमा योजना क्यों नहीं लागू कर सकते हैं?” यहीं यह भी जान लेना उपयुक्त होगा  कि नाइजीरिया में मात्र पांच प्रतिशत लोगों को स्वास्थ्य बीमा सुलभ है. कुछ गुस्से और क्षोभ के मिले-जुले स्वरों में ज़ील पूछता है: “हर सप्ताह मैं अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा योजना लागू न होने की वजह  से लोगों को कष्ट  पाते और अपनी जान गंवाते देखता हूं. क्या इंसानी जीवन का कोई मूल्य नहीं है?”   
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 01 जनवरी, 2019 को इसी  शीर्षक से प्रकाशित आलेेेख का मूल पाठ.    

Friday, June 1, 2018

भारतवंशी सुषमा ने दिया पूरी मानवता को एक संदेश


यह घटना सुदूर अमरीका में घटी, लेकिन जब इसके बारे में पढ़ा तो बरबस आंखें नम हो आईं और माथा सराहना में झुक गया. क्या ही अच्छा हो कि सारी दुनिया ऐसे ही अच्छे और संवेदनशील लोगों से भर जाए! घटना न्यूयॉर्क के एक जनाना अस्पताल की है जहां भारतीय मूल की कनाडा वासिनी और फिलहाल सपरिवार अमरीका में रह रहीं सुषमा द्विवेदी जिंदल भर्ती थीं. वे गर्भवती थीं और डॉक्टर की सलाह पर उनकी रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले वाले जोड़ के पास प्रसव पीड़ा को कम करने वाला इंजेक्शन लगाया गया था. चिकित्सकीय भाषा में इसे एपीड्यूरल एनेस्थीसिया कहा जाता है. इंजेक्शन का असर शुरु होने लगता उससे पहले ही सुषमा को पता चला कि उसी अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती एक स्त्री और उसके साथी  को सहायता की ज़रूरत है. असल में ब्रायना डॉयेल और उनके साथी केसी वॉको इस बात के लिए बहुत आकुल व्याकुल थे कि ब्रायना शिशु को जन्म दे उससे पहले उनका धार्मिक विधि विधान पूर्वक बाकायदा विवाह हो जाए. वैसे वे लोग एक दिन पहले अदालत में जाकर कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर चुके थे और विवाह का कानूनी प्रमाण  पत्र भी हासिल कर चुके थे. वे धार्मिक रीति से विवाह की रस्में भी पूरी कर लेते लेकिन गर्भस्थ शिशु को शायद इस दुनिया में आने की बहुत ज़्यादा जल्दी थी, सो उन्हें बजाय चर्च जाने के भागकर अस्पताल आना पड़ गया. वैसे डॉक्टरों ने बच्चे की जन्म की जो सम्भावित तिथि बताई थी वो अभी काफी दूर थी, और अगर सब कुछ योजनानुसार चलता तो तब तक वे धार्मिक रीति से भी पति पत्नी बन चुके होते, लेकिन सब कुछ योजनानुसार हो जाता तो यह प्रसंग ही क्यों बनता? ब्रायना और वॉको की व्याकुलता को समझ संवेदनशील अस्पताल कर्मियों (वो कोई भारत का सरकारी अस्पताल थोड़े ही था!) ने अस्पताल के पादरी की तलाश की, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए तो उन्होंने भी अपने हाथ खड़े कर दिए.

जब इस पूरे मामले की भनक सुषमा को लगी तो उन्होंने अस्पताल वालों से कहा कि यह पवित्र कार्य तो वे भी सम्पन्न कर सकती हैं. उन्होंने अस्पताल वालों को बताया कि कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने इस कार्य का बाकायदा ऑनलाइन  प्रशिक्षण प्राप्त किया है और वे तब से पर्पल प्रोजेक्ट नामक एक सेवा का संचालन कर रही हैं जो एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) समुदाय के लोगों और उन हिंदू धर्मावलम्बियों के विवाह सम्पन्न करवाती हैं जिन्हें उपयुक्त पण्डित नहीं मिल पाते हैं. अस्पताल प्रशासन तेज़ी से हरकत  में आया और उसने इस अजीबोगरीब विवाह के लिए तुरत फुरत सारी सुविधाएं जुटा दीं. लेकिन तब तक सुषमा पर उस इंजेक्शन का असर होना शुरु हो गया था और उन्हें लगा कि वे चलना तो दूर शायद खड़ी भी न रह सकें. वो कहते हैं ना कि जहां चाह वहां राह. तो इस समस्या का भी हल निकाल लिया गया. बजाय इसके कि सुषमा उस युगल के पास जाकर विवाह सम्पन्न करातीं, ब्रायना और वॉको को ही उनके अस्पताली पलंग के पास ले आया गया. अस्पताल की नर्सों ने ब्रायना के केश संवार कर उसे दुल्हन बनाया तो अन्य चिकित्सा कर्मियों ने अस्पताल में उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल करते हुए दुल्हे मियां की समुचित साज सज्जा कर दी. कोई भाग कर फूल भी ले आया और एक बंदे ने तो अवसरानुकूल कविता भी रच डाली. और फिर नर्सों के मंगल गान के बीच यह युगल अस्पताल के गलियारों से होता हुआ बिस्तर पर लेटी पण्डितानी यानि सुषमा के सामने जा पहुंचा. सुषमा ने विवाह की रस्में पूरी कीं और बुधवार की उस आधी रात को वो अस्पताल जैसे प्रेम के जीते जागते मंदिर में तब्दील हो गया.

इसके चार घण्टे बाद इस खूबसूरत दुनिया में एक शिशु अवतरित  हुआ जिसे अब नयन जिंदल नाम से जाना जाएगा और नयन महाशय के इस दुनिया में पदार्पण के चंद घण्टों बाद ब्रायना ने जन्म दिया रिले को. और इस तरह न्यूयॉर्क के उस अस्पताल में लिखी गई  दो शिशुओं के जन्म की वो विलक्षण कथा जिसे कम से कम इन दो परिवारों में तो बार-बार सुनाया ही जाएगा. मेरे दिल को तो उस बात ने छुआ जो सुषमा ने बाद में पत्रकारों से कही. अश्विन और उनसे दो बरस छोटे नयन की मां सुषमा ने कहा कि “हमें खुशी है कि हम अपने बच्चों को यह पाठ पढ़ा पा रहे हैं. हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे सदा इस बात को याद रखें कि अगर आपको अपनी ज़िंदगी में कभी भी दयालुता दिखाने और किसी और के लिए कुछ भी अच्छा करने का मौका  मिले तो उसे हाथ से न जाने  दें. जान लें कि ऐसा करना तनिक भी मुश्क़िल नहीं है.” मुझे लगता है कि यह संदेश अश्विन और नयन के लिए ही नहीं, हम सबके लिए भी है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत (इस बार मंगलवार की बजाय) शुक्रवार, 01 जून, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 6, 2015

पड़िये ग़र बीमार तो....

अगर आप बीमार हो जाएं तो क्या करेंगे?
अजीब सवाल है!  डॉक्टर के पास जाएंगे, और क्या करेंगे?
सही भी है. जिन लोगों में मेरा उठना बैठना है वे किसी पीर-ओझा-बाबा के पास तो जाने से रहे. बेशक समाज का एक वर्ग है जो बीमार होने पर जादू-टोने-टोटकों वगैरह की शरण लेता है, लेकिन बहुत बड़ा वर्ग वह है जो बीमार होने पर अस्पताल भागता है और रोग की गम्भीरता तथा अपनी हैसियत के अनुरूप छोटे या बड़े डॉक्टर की सलाह लेता है. इसी वर्ग में वे लोग भी शामिल हैं जो अपने-अपने विश्वासों के अनुरूप एलोपैथिक से इतर किसी चिकित्सा पद्धति की शरण में जाते हैं.  वैसे यह बात आम तौर पर मान ली गई है कि किसी को तुरंत राहत चाहिये तो उसे एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति की शरण में ही जाना होगा.

एलोपैथिक चिकित्सक आपकी बात सुनेगा, अगर उसे ज़रूरी लगा तो कुछ परीक्षण करवाएगा और फिर कुछ दवाइयां  लिख देगा. सरकार लाख कहे कि जेनेरिक दवाइयां लिखी जाएं, डॉक्टर आम तौर पर आपको ब्राण्डेड दवाइयां ही देगा. लेकिन अगर आपका रोग गम्भीर हुआ तो बहुत मुमकिन है कि डॉक्टर आपको शल्य चिकित्सा की सलाह दे. तब आप क्या करेंगे? डॉक्टर भगवान है, उसकी सलाह मानेंगे. ठीक  है ना?

लेकिन अभी हाल में नवी मुम्बई के एक सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर की जो रिपोर्ट सामने आई है, उसे पढ़ने के बाद शायद आप भी अपने इस जवाब पर पुनर्विचार करना चाहें! यह सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर दरअसल एक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान है जो अपने आप को ई-  हॉस्पिटल कहता है और आप द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट्स आदि के आधार पर कुछ शुल्क लेकर आपको दुनिया भर में अवस्थित अपने विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह उपलब्ध कराता है. इस सेण्टर ने हाल में साढे बारह हज़ार ऐसे रोगियों का विश्लेषण कर एक रिपोर्ट जारी की है जिन्हें शल्य चिकित्सा की सलाह दी गई थी. सेण्टर का कहना है कि इनमें से 44% को असल में शल्य चिकित्सा की ज़रूरत थी ही नहीं. अब ज़रा इसी बात को अगर अलग-अलग रोगों के सन्दर्भ में देखिये. जिन हृदय रोगियों को सलाह दी गई उनमें से पचपन प्रतिशत को स्टेण्ट  लगवाने की, सैंतालिस प्रतिशत कैंसर रोगियों को शल्य क्रिया की, और अड़तालीस प्रतिशत को घुटनों के प्रत्यारोपण की ज़रूरत नहीं थी. सोचिये, अगर आपकी जेब और आपकी देह दोनों ने ग़ैर ज़रूरी शल्य चिकित्सा का अत्याचार सहन किया होता तो?

वैसे यह जानकर आपको थोड़ी राहत महसूस हो सकती है कि सिर्फ अपने देश में ही ऐसा नहीं होता है. पिछले  दिनों हम लोग यह भी पढ़ चुके हैं कि अमरीका में किए गए घुटना प्रत्यारोपण के ऑपरेशनों में भी एक तिहाई अनावश्यक थे. अपने देश में भी, और अन्य देशों में भी, प्रसव के लिए सिज़ेरियन ऑपरेशनों की अधिकता और अनावश्यकता पर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं.

जानकार लोग अनावश्यक शल्य चिकित्सा के मूल में यह बात  देखते हैं कि निजी अस्पतालों में डॉक्टरों को मिलने वाली तनख्वाह का सीधा सम्बन्ध इस बात से होता है कि वे अपने अस्पताल को कितना ‘बिज़नेस’ देते हैं.  और कमोबेश यही बात हमें दी जाने वाली ग़ैर ज़रूरी दवाइयों के बारे में भी सच है. फर्क बस इतना है कि यहां डॉक्टर और अस्पताल की बजाय डॉक्टर और दवा कम्पनी का समीकरण काम करता है. दवा कम्पनियों द्वारा डॉक्टरों को उनके लिखे प्रेस्क्रिपशंस के अनुरूप ‘उपहार’ प्रदान करने की चर्चाओं से शायद ही कोई नावाक़िफ हो.

इस सारे खेल में एक और पक्ष अब तेज़ी से जुड़ता जा रहा है और वह है बीमा कम्पनियां. भारत में भी सरकारी अस्पतालों की बदहाली से तंग आए लोग निजी अस्पतालों का रुख करने और उन्हें बहुत ज़्यादा महंगा पाकर मेडिकल इंश्योरेंस में अपना संकट मोचक तलाश करने लगे हैं. निजी अस्पतालों और बीमा कम्पनियों की साठ गांठ इलाज का खर्चा दिन दूना रात चौगुना बढ़ाने में कोई कसर नहीं रख रही है. शायद इसी की परिणति इस बात में भी हुई है कि हाल ही में बीमा कम्पनियों ने कुछ महत्वपूर्ण रोगों के लिए शुल्क निर्धारित कर दिया जिसे ये अस्पताल मानने को तैयार नहीं हैं और परिणामत: अस्पतालों ने कैश लैस सुविधा को स्थगित कर रखा है.

लेकिन इस सारी चर्चा से यह न मान लिया जाए सारा दोष डॉक्टरों और अस्पतालों का ही है. इस चर्चा के शुरु में मैंने सेकण्ड ओपिनियन सेण्टर की जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया, उसके सन्दर्भ में यह जान लेना भी ज़रूरी होगा कि दो डॉक्टरों की राय में अंतर सदा सम्भव है. इसलिए यह मान लेना भी उचित नहीं होगा कि हर मामले में पहली राय ग़लत और दूसरी राय ही सही होगी. दूसरी राय से भी असहमत होने की सम्भावनाओं को स्वीकार किया जाना चाहिए. लेकिन ये तमाम बातें  हमारी चिंताओं को घटाते नहीं, बढ़ाते हैं, यह बात निर्विवाद है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 जनवरी, 2015 को आगे कुंआ, पीछे खाई, कोई राह न दे सुझाई शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Tuesday, June 24, 2014

अच्छी भी है हमारी दुनिया!

हिंदी के अमर कथाकार प्रेमचंद के सुपुत्र और खुद एक बड़े रचनाकार स्वर्गीय अमृत राय अखबारों को द मॉर्निंग डिप्रेसर कहा करते थे. मुझे नहीं पता कि अगर अमृत राय आज जीवित होते तो आज के अखबारों को वे क्या नाम देना पसंद करतेक्योंकि उनके समय से आज तक आते-आते हालात बदतर हुए हैं. लेकिन कभी-कभी इस बुरे समय में ये अखबार ऐसी कोई ख़बर भी दे देते हैं कि मन एकदम उल्लसित हो उठता है. अभी उस दिन जब चेन्नई की यह ख़बर पढ़ी तो मुझे लगा कि दुनिया उतनी भी ख़राब नहीं है जितनी हम मान लेते हैं. हो सकता है यह ख़बर आपकी निगाहों से न गुज़री हो. मैं बता दूं? चेन्नई के फोर्टिस मलार हॉस्पिटल में मुम्बई की एक 21 वर्षीया कॉलेज छात्रा ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी. हृदय का प्रत्यारोपण होना था, और डोनर का यह हृदय चेन्नई सेण्ट्रल के नज़दीक के जनरल हॉस्पिटल से उस अस्पताल में पहुंचाने का ज़िम्मा था एक एम्बुलेंस ड्राइवर सी. काथिर का. एक-एक पल कीमती था. एक पल का विलम्ब, और सब बेकार.

और सलाम उस ड्राइवर काथिर को जिसने चेन्नई के भारी ट्रैफिक के बीच महज़ 13 मिनिट में 12 किलोमीटर का यह फासला तै करके उस लड़की की जान बचाने का असम्भव लगने वाला चमत्कार कर दिखाया.  काथिर का मानना है कि किसी की ज़िंदगी बचाने का यह अवसर उसे भगवान की देन है. काथिर पहले भी चार बार ऐसा कर चुके हैं. लेकिन इस बार उन्होंने जो अजूबा कर दिखाया उसमें चेन्नई के प्रशासन का भी बहुत बड़ा योगदान रहा. चेन्नई प्रशासन ने उस मार्ग की सारी लाल बत्तियों को बंद कर एक ग्रीन कॉरिडोर रचा ताकि दान में मिला हृदय निर्बाध और अविलम्ब पहुंचाया जा सके. भारत में ग्रीन कॉरिडोर की अवधारणा भले ही नई लगे, पश्चिमी देशों में एम्बुलेंस को ग्रीन कॉरिडोर ही मिलते हैं. मैंने अमरीका में देखा-जाना था कि एम्बुलेंस में ही इस तरह की तकनीकी व्यवस्था होती है कि उसके आते ही हर लाल  लाइट हरी होती चलती है और एम्बुलेंस को कहीं भी रुकना नहीं पड़ता है. लेकिन बात केवल तकनीकी व्यवस्था की नहीं है. लोग भी एम्बुलेंस को रास्ता देते हैं. हमारे यहां तो यही ड्राइवर काथिर बता रहे थे कि बहुत दफा उन्हें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो एम्बुलेंस को मिले रास्ते का लाभ उठा अपने वाहन को भी निकाल ले जाने की फिराक़ में रहते हैं और इस तरह एम्बुलेंस के लिए मुसीबत पैदा करते हैं. हम रोज़ ही लोगों को एम्बुलेंस की प्राथमिकता की अनदेखी करते देखते हैं. लेकिन मुझे लगता है कि अगर प्रशासन भी एम्बुलेंस के महत्व को समझ उसे प्राथमिकता देने लगे तो लोगों के बर्ताव में भी सुधार हो सकता है. आखिर हम वी आई पीज़  को भी तो प्राथमिकता देते हैं.

यह अच्छी ख़बर इतनी ही नहीं थी. इस ख़बर का दूसरा हिस्सा और भी महत्वपूर्ण है. मुम्बई की इस छात्रा को दान में प्रत्यारोपण के लिए जो हृदय मिला वो एक 27 वर्षीय इलेक्ट्रिकल इंजीनियर  का था जिसका निधन एक सड़क दुर्घटना में हुआ था. उसके हृदय को दान करने का फैसला किया उसकी  मां ने. मां ने इसलिए कि उसके पिता तो बहुत पहले ही उसे छोड़ कर दूसरे लोक में जा चुके थे. मां एक गांव में हेल्थ नर्स का काम करके अपना परिवार चलाती है. अंग दान की बात उनके लिए अनजानी नहीं थी, और वो खुद सोचा करती थी कि अगर उन्हें  कभी कुछ हुआ तो वे ज़रूर अपना अंग दान कर किसी की जान बचाने का पुण्य अर्जित करेंगी. लेकिन यह तो उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें अपने ही बेटे के अंग का दान करने की अनुमति देनी पड़ेगी. जिस ग्रीफ काउंसलर को उनसे इस बाबत बात करनी थी, खुद उनके लिए यह बहुत मुश्क़िल दायित्व था. आखिर कैसे किसी मां से यह कहा जाए कि वे अपने हाल ही में मृत बेटे के अंग को किसी और के लिए काम में लेने की इजाज़त दे दें? लेकिन  उस ग्रीफ काउंसलर प्रकाश का कहना है कि उस बहादुर मां ने न केवल अपनी स्वीकृति दी, यह भी कहा कि उन्हें अपने उस बेटे पर गर्व है जिसकी वजह  से किसी की जान  बच पा   रही है.

तो ये दो सकारात्मक ख़बरें भी अख़बार ने ही दी हैं. असल में हमारे  चारों तरफ़ काफी कुछ अच्छा भी घटित होता है, लेकिन रिवायत कुछ ऐसी बन गई है कि उसकी चर्चा कम होती है और जो अप्रिय तथा अवांछित  घटित होता है वो तुरंत सुर्खियों में आकर हम तक पहुंच जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार, दिनांक 24 जून, 2014 को अच्छी भी है हमारे आस-पास की दुनिया शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 18, 2014

तुम क्या जानो क्या हाल कर दिया था तुमने हमारा

हम सबको इस तरह के अनुभव होते ही रहते हैं. किसी की तनिक-सी उदासीनता, या लापरवाही, या ग़ैर ज़िम्मेदारी – आप जो भी चाहे नाम दे लें उसे, दूसरों के लिए बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन जाती है. ऐसा नहीं है कि ऐसी  ग़लती सिर्फ दूसरों से ही होती है, मुझसे  कभी हुई ही नहीं. मुझसे भी शायद अनेक दफ़ा ऐसी चूक हुई होगी, और मेरे अनजाने में उसे दूसरों ने भुगता होगा. इसीलिए आज  किसी और की एक चूक की चर्चा आपसे कर रहा  हूं.

उस दिन अस्पताल गया तो किसी और ही काम से था, लेकिन लगा कि अपना बीपी भी लगे हाथों चैक करवा लूं. डॉक्टर साहब से दुआ-सलाम थी. उन्होंने बीपी चैक करके  कहा कि बेहतर होगा मैं अपना ईसीजी करवा लूं. न सिर्फ कहा, ईसीजी करने वाले टैक्नीशियन को बुला मुझे उनके हवाले भी कर दिया. तब मैं जयपुर के नज़दीक, कोटपुतली  के स्नातकोत्तर  कॉलेज में उपाचार्य था. कुछ ही दिनों  पहले सिरोही से पदोन्नति पर वहां पहुंचा था. संयोगवश टैक्नीशियन महोदय उसी कॉलोनी में रहते थे जिसमें मैं रहता था, और मुझे पहचानते थे. उन्होंने तसल्ली से मेरा ईसीजी किया और उसका प्रिण्ट आउट मुझे देकर डॉक्टर साहब के पास भेज दिया.

ईसीजी की उस रपट को देखते ही डॉक्टर साहब की मुख मुद्रा गम्भीर हो गई. उन्होंने सलाह दी कि मुझे फौरन जयपुर जाकर एस एम एस अस्पताल में खुद को दिखाना चाहिए. मैंने पूछा कि क्या कोई ख़ास चिंता की बात है, तो वे मेरे सवाल  को टाल गए. मुझे कुछ ही देर बाद एक शादी में शमिल होने के लिए सिरोही जाने के लिए कोटपुतली से निकलना  था. घर आया. मुंह ज़रूर ही लटका हुआ होगा. पत्नी ने पूछा कि क्या बात है, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने भी  स्थिति की गम्भीरता समझ ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया. अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हम लोग कोटपुतली से निकल कर अगली सुबह सिरोही पहुंच गए. मैं रास्ते भर अनमना बना रहा. स्वाभाविक ही है कि मेरे अनमनेपन का असर पत्नी पर भी पड़ा. शादी में जाने का उत्साह और उल्लास हवा हो चुका था.

नहा धोकर सिरोही के सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां मेरे एक अत्यंत आत्मीय डॉक्टर सामने ही मिल गए. उदासी शायद मेरे चेहरे पर चिपकी हुई थी. उन्होंने वजह पूछी तो मैंने ईसीजी की रपट आगे कर दी. उन्होंने एक नज़र उस पर डालते ही पूछा कि “अग्रवाल साहब, यह किसकी रिपोर्ट उठा लाए?”  जब मैंने कहा कि यह तो मेरी ही रिपोर्ट है, तो उन्होंने अविश्वास  भरी नज़र से मुझे देखा, जैसे कह रहे हों, क्यों मज़ाक करते हो? मैंने फिर से उन्हें कहा कि यह मेरी ही रिपोर्ट  है, कल ही मैंने अपना ईसीजी करवाया है और इसी के  आधार पर डॉक्टर साहब ने मुझे राज्य के सबसे बड़े अस्पताल चले जाने की अर्जेण्ट सलाह दी है.

मेरे मित्र डॉक्टर साहब को शायद उस रिपोर्ट पर क़तई विश्वास नहीं हो रहा था. असल में कोतपुतली जाने से पहले मैं उनके नियमित सम्पर्क में था और मेरे स्वास्थ्य की स्थिति  से वे भली-भांति परिचित थे. उन्होंने पहले मेरा बीपी चैक किया और फिर मुझे एक बार और ईसीजी करवा लेने के लिए कहा. मैं बड़ी उलझन में था कि मामला आखिर क्या है! लेकिन अपने यहां इस बात का कोई रिवाज़ नहीं है डॉक्टर, चाहे वो आपका कितना ही नज़दीकी क्यों न हो, आपके मर्ज़ के बारे में आपसे खुलकर  बात करे. बहरहाल, मैंने एक बार फिर अपना ईसीजी करवाया और उसकी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर साहब के पास पहुंचा. एक नज़र उस पर डालते ही वे मुझसे बोले, “देखो, मैंने कहा था ना कि वो रिपोर्ट आपकी हो ही नहीं सकती! आप एकदम ठीक हैं!” उन्होंने मुझे एक बार फिर आश्वस्त किया कि मैं तनिक भी चिंता न करूं, सब कुछ ठीक है, और फिर मुझे चाय पिला कर  विदा किया.

माहौल बदल चुका था. खुशी-खुशी घर  आया, पत्नी को सारा किस्सा बताया राहत की खूब लम्बी सांस ली, बहुत मज़े से शादी का लुत्फ लिया, और फिर हम दोनों कोटपुतली लौट गए.
यह संयोग ही था, कि अगले दिन जैसे ही मैं घर से कॉलेज जाने के लिए निकला, सामने वे तकनीशियन महोदय मिल  गए. मैंने शिकायत भरे लहज़े में उनसे कहा कि आपने मेरा कैसा ईसीजी किया.......मेरी तो जान ही निकाल दी! पहले तो उन्होंने मुझसे पूरा वाकया सुना, और फिर बड़े बेपरवाह लहज़े में बोले, “हां, सर, हमारी वो मशीन थोड़ी खराब है. कई बार वो ग़लत रिपोर्ट  दे देती है.” यानि उन्हें अपनी मशीन के चाल चलन की जानकारी थी.

मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उनसे क्या कहूं? उनकी मासूमियत लाजवाब थी. होती भी क्यों नहीं? उन्हें क्या पता कि मैं इस बीच कितने विकट मानसिक तनाव से गुज़र चुका था!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 मार्च 2014 को 'खराब मशीन की ईसीजी ने बढ़ा दी धड़कन' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ 

Friday, July 2, 2010

हम कितने सभ्य है?

पिछले दिनों पत्नी ने अपने घुटने बदलवाने का ऑपरेशन करवाया तो उनकी देखभाल करते हुए मुझे भारतीय मानसिकता के कुछ खास पहलुओं से रू-बरू होने का अवसर मिला.

पत्नी ऑपरेशन के लिए जिस अस्पताल में भर्ती हुई थीं वहां रोगियों से मिलने वालों की आवाजाही पर कड़ा प्रतिबंध था. प्रत्येक भर्ती रोगी के साथ एक परिचारक सदैव रह सकता था और सुबह दस से ग्यारह बजे तथा शाम पांच से सात बजे के बीच दो मुलाक़ाती उससे मिल सकते थे. कहना अनावश्यक है कि यह व्यवस्था रोगी के हित में की गई थी. रोगी आराम से रह सके, स्वास्थ्य लाभ कर सके, और अनावश्यक संक्रमण से बचा रह सके. लेकिन मैंने पाया कि अधिकांश लोग इस व्यवस्था से नाखुश थे. न केवल नाखुश, इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए भरसक प्रयत्नरत भी. जो गार्ड इस व्यवस्था की अनुपालना करवाने के लिए तैनात थे उनके साथ बदतमीजी और गाली-गलौज अपवाद नहीं सामान्य बात थी. बिना पास के भीतर घुसने या मुलाक़ात के समय के अतिरिक्त भी रोगी के पास जाने की हर मुमकिन चेष्टा करते लोग नज़र आए. इस बात को समझने को जैसे कोई तैयार ही नहीं कि रोगी को आराम भी मिलना चाहिए. जैसे कि अगर मुलाक़ाती ने रोगी से भेंट न की तो आसमान टूट पड़ेगा. कुछ लोग यह कहते मिले कि इतना महंगा अस्पताल फिर भी रोगी से मिलने ही नहीं देते हैं.

मुझे तकलीफ इस बात से हुई कि ज्यादातर लोग यह समझने को तैयार ही नहीं हैं कि यह व्यवस्था रोगी के हित में है. अब भला इस बात में क्या तुक है कि रोगी को आराम की ज़रूरत है और दो चार पांच दस मिलने वाले उसे घेरे हुए बैठे हैं. न केवल बैठे हैं, तमाम बेमतलब और बेहूदा बातें किए जा रहे हैं. उसे उन सब मामलों में सलाह दे रहे हैं जिन्हें देने की कोई योग्यता उनमें नहीं है. रोग और इलाज के बारे में हर किस्म की बेहूदा और बेतुकी बातें किए जा रहे हैं. रोगी अपने जिस कष्ट के निवारण के लिए वहां भर्ती है उसके निवारण के अब तक के तमाम असफल प्रयासों का ब्यौरा देकर उसका मनोबल तोड़ने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं. रोगी सोना चाहता है लेकिन उसके ये शुभ चिंतक हैं कि उसे अकेला छोड़ ही नहीं रहे हैं.

इस अस्पताल में रोगी के पास बारह साल से कम उम्र के बच्चों का आना वर्जित था. यह व्यवस्था भी इस कारण की गई है कि छोटे बच्चे संक्रमण के शिकार जल्दी हो सकते हैं. मेरी पत्नी जिस कमरे में थी, उसी में दूसरी शैया पर एक सद्य प्रसूता युवती थीं. युवती के वीर पतिदेव एक रात साढे नौ बजे अपने चार साल के बेटे को कमरे में ले आए. मैंने कुछ जिज्ञासा और कुछ आपत्ति के भाव से उनसे पूछा कि बच्चे तो आ नहीं सकते हैं, वे अपने बेटे को कैसे ले आए, तो वे बड़े गर्व से बोले कि साहब पैसे के बल पर क्या नहीं हो सकता. यानि उन्होंने गार्ड की मुट्ठी गरम की थी. बच्चा कुछ ज्यादा ही शरारती था. थोड़ी देर में इंचार्ज नर्स आई और उसने उन सज्जन से अनुरोध किया कि वे बच्चे को वहां से ले जाएं तो वे उस नर्स से जिस बद्तमीजी से पेश आए उसका वर्णन न ही किया जाए तो ठीक होगा. बच्चे की शरारत से जब मेरी पत्नी, जिनका पिछले ही दिन ऑपरेशन हुआ था, परेशान होने लगी तो मैंने भी उनसे अनुरोध किया कि वे बच्चे को ले जाएं, तो वे मुझसे भी लगभग वैसी ही बदतमीजी से पेश आए. मेरी इच्छा तो बहुत हुई कि अस्पताल प्रशासन को शिकायत करूं पर यह सोच कर बहुत मुश्क़िल से खुद को रोका कि इससे उस गार्ड की नौकरी पर बन आएगी.

असल में दूसरों की सुविधा असुविधा के बारे में क़तई नहीं सोचना हमारी जीवन पद्धति का एक अविभाज्य अंग बन चुका है. हम चाहे कितनी ही बड़ी-बड़ी बातें क्यों न करें, हमारा सारा ध्यान सिर्फ स्वयं पर ही केन्द्रित होता है. अगर मेरा यह सोचना सही है तो फिर निश्चय ही यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि हम कितने सभ्य हैं? बल्कि सभ्य हैं भी या नहीं. कहना अनावश्यक है कि सभ्य होना, सांस्कृतिक होना, केवल बातों से ही सिद्ध नहीं होता है, हमारे कर्म, हमारा व्यवहार भी तदनुरूप होना चाहिए.



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Sunday, February 7, 2010

सहायता की ज़रूरत विषेषज्ञों को भी होती है


एक बहुत दिलचस्प उक्ति है कि अस्पताल बीमार लोगों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है. इसलिए नहीं है कि यह स्थान ऐसी अनेक बातों और चीज़ों से भरा होता है जो आपकी सेहत के लिए ख़तरनाक होती हैं, जैसे छोटे-बड़े इन्फेक्शन, निदान या दवा देने में होने वाली चूकें और मानवीय भूलों की वजह से पैदा हो सकने वाली अनगिनत जटिलताएं. अस्पताल में मानवीय भूलों के होने को रोकना लगभग नामुमकिन ही है. तो, क्या यह संभव है कि कोई व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का समूह ऐसा कुछ उपक्रम करे कि सब कुछ 100 प्रतिशत सही हो जाए? बाल्टीमोर के जॉन हॉपकिंस मेडिकल सेंटर के क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट डॉ पीटर प्रोनोवोस्ट ने कुछ ऐसा ही प्रयास किया, और उनके प्रयास को बोस्टन के एक जनरल सर्जन और न्यूयॉर्कर के स्टाफ राइटर डॉ अतुल गवाण्डे ने अपनी नई किताब द चेकलिस्ट मेनिफेस्टो: हाऊ टू गेट थिंग्स राइट का आधार बनाया है. गवाण्डे मानवीय भूलों को दो हिस्सों में बांटते हैं: अज्ञान से उपजी भूलें और अकुशलता से उपजी भूलें, यानि वे भूलें जो इस वजह से होती हैं कि हम अपनी जानकारी का सही इस्तेमाल नहीं करते. गवाण्डे मानते हैं कि आज की दुनिया में ज़्यादातर ग़लतियां इस दूसरी वजह से होती हैं. अनेक उदाहरण देकर वे बताते हैं कि आज के शल्य चिकित्सक का काम इतना जटिल हो गया है कि भले ही वह कितना ही कुशल क्यों न हो, ज़रूरी कदमों में से कोई एक क़दम उठाना भूल सकता है, अपने मरीज़ से कोई एक ज़रूरी सवाल पूछना भूल सकता है या काम के दबाव और तनाव की वजह से हर तरह की आकस्मिकता का सामना करने की तैयारियों में कहीं चूक कर सकता है.

डॉ अतुल गवाण्डे बताते हैं कि डॉ पीटर प्रोनोवोस्ट ने अपने प्रयास के लिए उड्डयन इंडस्ट्री से एक अवधारणा ली. पाइलट लोग विमान उड़ाने से पहले एक एक जांच सूची (चेकलिस्ट) में अंकित बिंदुओं के आधार पर जांच किया करते हैं. डॉ प्रोनोवोस्ट ने आई सी यू की केवल एक आम समस्या से निपटने के लिए इस चेकलिस्ट रणनीति को अपनाया. समस्या थी सेण्ट्रल इण्ट्रावीनस लाइन्स वाले रोगियों में संक्रमण हो जाने की. उन दिनों हॉपकिंस आई सी यू में हर नौ में से एक लाइन संक्रमित हो जाती थी जिसकी परिणति रोगी की बीमारी के लंबी होने से लेकर उसकी मौत तक में हुआ करती थी. डॉ प्रोनोवोस्ट ने उन पांच कामों की एक सूची बनाई जो किसी भी डॉक्टर को इण्ट्रावीनस लाइन के इस्तेमाल से पहले करने थे: साबुन से हाथ धोयें, मरीज़ की चमड़ी को एक ख़ास एण्टीसेप्टिक से साफ़ करें, मरीज़ के पूरे शरीर को रोगाणुहीन आवरण से ढकें, मास्क, टोपी रोगाणुहीन गाउन और दस्तानें पहनें, और जहां सुई लगाई गई है वहां रोगाणुहीन ड्रेसिंग करें.

इस प्रयोग पर टिप्पणी करते हुए डॉ गवाण्डे कहते हैं कि ये पांच काम कोई अजूबे नहीं थे. हर डॉक्टर इनके बारे में जानता है, और इसलिए जब ऐसे सामान्य कामों के लिए चेकलिस्ट बनाने की बात की गई तो उस का मखौल उड़ाया गया. लेकिन, डॉ प्रोवोनोस्ट जानते थे कि डॉक्टर लोग कम से कम एक तिहाई दफा तो इनमें से किसी न किसी काम को टाल ही जाते थे. इसलिए उन्होंने यह चेकलिस्ट आई सी यू की नर्सों को दी और अस्पताल प्रशासन के सहयोग से इसकी पालना सुनिश्चित की. नर्सों को कहा गया कि वे अपनी सूची में एक-एक काम को चैक करें और यदि कभी कोई डॉक्टर उनमें से कोई काम न करे तो पहले उनसे करने का अनुरोध करे और यदि वह फिर भी न करे तो अस्पताल प्रशासन को सूचित कर उस काम को करवाये. और ऐसा ही किया गया. परिणाम? हॉपकिंस अस्पताल में इन्फेक्शन दर ग्यारह प्रतिशत से घट कर शून्य प्रतिशत पर आ गई. डॉ प्रोनोवोस्ट ने हिसाब लगाया कि इस व्यवस्था के लागू करने से दो साल में तियालीस इंफेक्शन रोके गए, आई सी यू में होने वाली आठ मौतें रोकी गईं और अस्पताल प्रशासन का बीस लाख डॉलर खर्च कम हुआ. अपने इस प्रयोग की सफलता के बाद डॉ प्रोनोवोस्ट ने आई सी यू की अन्य स्थितियों के बारे में भी चेक लिस्टें तैयार कीं. ज़ाहिर है कि डॉक्टरों ने यह कहते हुए प्रतिरोध भी किया कि उनका काम इतना जटिल है कि उसे ऐसी सरल चेकलिस्टों तक सीमित नहीं किया जा सकता.

डॉ गवाण्डे ने विस्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के साथ काम करते हुए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के अस्पतालों में यही चेकलिस्ट पद्धति लागू करके देखी. जो अस्पताल उन्होंने अपने प्रयोग के लिए चुने उनमें तांजानिया के दूरस्थ इलाकों में स्थित दस लाख लोगों का इलाज करने वाला एक सामान्य–सा अस्पताल था तो सिएटल में स्थित वाशिंगटन विश्वविद्यालय का एक ऐसा हाई टेक अस्पताल भी था जिसका बजट पूरे तांजानिया के बजट से दुगुना था. इन लोगों ने सर्जिकल केयर के लिए एक उन्नीस बिंदुओं वाली चेकलिस्ट का इस्तेमाल किया और पाया कि सिर्फ़ छह ही महीनों में खर्च में एक भी डॉलर की वृद्धि के बगैर इन तमाम अस्पतालों में सर्जरी के बाद वाली जटिलताओं में छत्तीस प्रतिशत की और मृत्यु दर में सैंतालीस प्रतिशत की कमी हुई है.

इस सफलता से उल्लसित होकर डॉ गवाण्डे ने अपनी इस चेकलिस्ट पद्धति को कई अन्य क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया. डॉ गवाण्डे ने वायुयान निर्माता कंपनी बोइंग से काफी कुछ सीखा. अब वे यह कह पाने की स्थिति में हैं कि एक अच्छी चेकलिस्ट छोटी होनी चाहिये, और महत्वपूर्ण स्टेप्स से ही संबद्ध होनी चाहिये. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि चैकिंग शीर्षस्थ व्यक्ति द्वारा नहीं की जानी चाहिये. हवाई जहाज के कॉकपिट में चेकलिस्ट को-पायलट द्वारा पढी जाती है, और इसीलिए, ऑपरेशन रूम में यह काम नर्स द्वारा किया जाना चाहिये.

यह और ऐसे अनेक उदाहरण देकर डॉ गवाण्डे संदेश यह देना चाहते हैं कि इक्कीसवीं शताब्दी की तकनीक की जटिलताओं को सरलतम तरीकों से सुलझाया जा सकता है. गवाण्डे की बहुत महत्वपूर्ण सलाह यह है कि आधुनिक दुनिया में यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम एक बार फिर से उस चीज़ को समझें जिसे दक्षता कहा जाता है, और यह समझें कि सहायता की ज़रूरत विशेषज्ञों को भी हुआ करती है और सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि विशेषज्ञों में भी इतनी विनम्रता हो कि वे यह स्वीकार करें कि सहायता की ज़रूरत उन्हें भी है.
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Discussed book:
The Checklist Manifesto: How to Get Things Right
By Atul Gawande
Published by Metropolitan Books
Hardcover, 224 pages.
US $ 24.50

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत रविवार, दिनांक 07 फरवरी, 2010 को प्रकाशित.








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