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Tuesday, August 26, 2014

क्या वाकई समय इस तरह बदला है?

इधर एक नई हिन्दी फिल्म का राजस्थानी गीत चर्चा में है. सोनम कपूर की आनेवाली फिल्म ‘खूबसूरत’  में म्यूज़िक कम्पोज़र स्नेहा खानवलकर ने सुनिधी  चौहान और  रेसमी सतीश से एक गाना गवाया है – अंजन की सीटी में.  यह गाना राजस्थान में पहले से काफी लोकप्रिय है. अस्सी के दशक में इसे दो मिर्ज़ा बहनें रेहाना और परवीन अलग-अलग गाकर लगभग अमर कर चुकी हैं. इस गाने की लोकप्रियता का यह आलम है कि आम तौर पर इसे लोकगीत माना जाता है, जबकि मूलत: यह जाने माने शायर इक़राम राजस्थानी की रचना है. इक़राम साहब का कहना है कि उन्होंने इसे अपने पिता की एक रचना से प्रेरित होकर लिखा था.

इक़राम राजस्थानी  के मूल गाने में एक ग्रामीण युवती का चित्रण है जो शायद पहली दफा रेल में बैठी है और उस अनुभव से अभिभूत है. गाने के पहले अंतरे में रेल के डिब्बे में चल रहे बिजली के पंखे का, दूसरे में चलती रेल के डिब्बे की खिड़की से दिखाई देने वाले बाहर के दृश्य का, और तीसरे में टोपी वाले टीटी का चित्रण है. गाने का चौथा और आखिरी अंतरा रेल के डिब्बे के ज़ोर के धचके से नायिका के औंधी होकर गिर जाने के वर्णन से हास्य का सृजन कर गाने को पूर्णता प्रदान करता है. कहना अनावश्यक है कि यह राजस्थान की एक ग्राम्य बाला के  रेल-अनुभव का  रोचक और रंजक चित्रण है, और यही शायद इसकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह भी है. 

लेकिन  अब नई फिल्म ‘खूबसूरत’  में जो गाना आया है,  स्वाभाविक ही है कि उसकी भाव-भूमि अलग है. लगभग साढ़े तीन दशकों में परिवर्तन तो हुए ही हैं. और अगर गाने को फिल्म में इस्तेमाल किया जाना है तो उन परिवर्तनों पर नज़र रखना भी ज़रूरी है.  तो, यह लोकप्रिय गाना फिल्म में आकर बदल गया  है. मूल गाने की पंक्ति ‘अंजन की सीटी में म्हारो मन डोलै’ अब ‘अंजन की सीटी में म्हारो बम डोलै’ के रूप में सुनाई देती है! मन की जगह बम. बी यू एम. शुद्ध हिन्दी में कहूं तो नितम्ब! पहले मन डोलता था, अब नितम्ब कम्पायमान होते हैं. मन में फौरन यह सवाल उठता है कि क्या पैंतीस सालों में हममें यह  बदलाव हुआ है कि गाने में मन की जगह बम आ जाए? और इसे यों भी कह सकता हूं कि क्या हमारा वो पाठक-श्रोता  जो साढ़े  तीन दशक पहले मन को समझ लेता था, अब उसकी समझ बदल कर बम तक जा पहुंची है? इसे समझ का उत्थान कहें या पतन? और सवाल यह भी कि बदलाव श्रोता की संवेदना में हुआ है  या फिल्मकार की संवेदना में?  

और बदलाव की यह बात सिर्फ मुखड़े पर ही  खत्म  नहीं हो जाती है. मैंने मूल गाने के चार अंतरों का जो परिचय दिया उसे ध्यान में रखते हुए  अब ज़रा इस नए गाने का पहला अंतरा देखिये: “फक-फक इंजन  बोल रहा है,  पटरी थर-थर कांपै/ कहां रुकेगी गाड़ी आकर मन ये मेरा पूछै/ इंजन आकर जुड़ जाए मुझसे खाऊं हिचकोलै...”   सुनिधी ने इसे किस तरह गाया है और सोनम ने कैसे इस पर नृत्य किया है, इन बातों को  अगर नज़र अन्दाज़ भी कर दें तो ये शब्द ही काफी कुछ कह देते हैं. मूल गाने की मासूमियत की जगह अब एक मांसल, बल्कि लगभग अश्लील सांकेतिकता ने ले ली है.  बहुत सम्भव है कि इस गाने का प्रयोग एक आइटम नम्बर के तौर पर हुआ हो और फिल्म बनाने वालों की निगाह टिकिट खिड़की पर रही हो, इसलिए मूल गाने को इस तरह से बदल दिया गया हो! और हां, यह तो कहना मैं भूल ही गया था कि मूल गाने का यह रूपांतर भी किसी और का नहीं, उन्हीं शायर का किया हुआ है.

यह गाना एक बार फिर हमें शिद्दत से अपने बदले वक़्त का एहसास कराता है. इस बात का एहसास कराता है कि ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे ओ चन्दा’ , ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’ ‘छिपा लो यूं दिल में प्यार मेरा कि जैसे मन्दिर में लौ दिये की’ जैसे गानों और अभिव्यक्तियों का समय बीत चुका है. लेकिन क्या वाकई कोमलता का और सुरुचि का समय बीत चुका है? क्या वाकई इश्क़ कमीना हो गया है?  क्या वाकई  हम ‘पापा कहते थे बड़ा  नाम करेगा’ से चलकर डैडी मुझसे बोला तू गलती है मेरी/ तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी/ साबुन की शक्ल में बेटा तू तो निकला केवल झाग/ झाग झाग….भाग डीके बोस भाग…….!’ तक आ पहुंचे हैं?  क्या सच्ची ‘अच्छी बातें कर ली बहुत,  अब करूंगा तेरे साथ गन्दी बात..गन्दी बात!’ वाला समय आ गया है?

मन की जगह बम सुनकर तो ऐसा ही लगता है!  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 26 अगस्त, 2014 को  वक़्त के साथ बदलते इंजन की सीटी के मायने शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Thursday, May 1, 2008

वैज्ञानिक प्रयोग भी खूबसूरत होते हैं

महाकवि कीट्स ने कहा था, सौन्दर्य सत्य है, और सत्य ही सौन्दर्य है. विश्व के अनेक बडे वैज्ञानिकों ने भी अपने कार्य द्वारा इस कथन को पुष्ट किया है. ब्रिटेन के सुविख्यात क्वांटम सिद्धांतकार डिराक ने शायद इसीलिए अपने कार्य को ‘खूबसूरत गणित की खोज’ कहा था. अनेकानेक वैज्ञानिक सौन्दर्यशास्त्री समीकरणों और तथ्यों के सुन्दर संयोजन पर मुग्ध होते रहे हैं. कुछ अन्यों ने शोधकर्म में ही सौदर्य के दर्शन किए हैं. ऐसे ही अन्यों की सूची में एक नाम और जुडा है. यह नाम है न्यूयॉर्क टाइम्स के विज्ञान लेखक जॉर्ज जॉनसन का. जॉर्ज की सद्य प्रकाशित किताब ‘द टेन मोस्ट ब्यूटीफुल एक्सपरीमेण्ट्स’ जैसे कीट्स के उपरोक्त कथन का ही विस्तार है. यहां जॉर्ज ने आधुनिक विज्ञान के चार शताब्दियों के इतिहास को खंगाल कर परिकल्पना की साहसिकता, सामग्री के संयोजन, व्याख्या की गहनता और परिणामों की महत्ता की खूबसूरती को चिह्नित किया है.

जॉर्ज ने इस किताब की प्रस्तावना में लिखा है कि उन्होंने जान बूझकर ऐसे प्रयोगों को चुना है जो आज के औद्योगिकृत, विशाल, अरबों-खरबों डॉलर के खर्च, ढेरों-ढेर उपकरणों और किसी कॉर्पोरेशन के आकार वाली वैज्ञानिकों की बडी टीम के द्वारा किए जाने वाले प्रयोगों के काल से पहले के हैं. जॉर्ज अपने पाठक को उस काल में ले जाते हैं जब दुनिया को रहस्यपूर्ण शक्तियों से परिपूर्ण माना जाता था और वैज्ञानिक भी प्रकाश और विद्युत से चमत्कृत हो जाता था. इसके बाद जॉनसन हमें वैज्ञानिकों की उस पुरातन दुनिया में ले जाते हैं जहां कोई अकेला शोधकर्ता घर में ही बनाए गए उपकरण, या उसके भी बगैर, ज्ञान के दरवाज़े पर दस्तक दिया करता था. कुछ उदाहरण देखिए: न्यूटन का इन्द्रधनुष, पावलोव के कुत्ते या फिर एण्टोइन-लॉरेण्ट द’ लेवोइज़ियर की यह खोज कि ऑक्सीजन एक तत्व है. इस तरह के सादगी से किए गए प्रयोगों का बखान कर जॉनसन हमें उस दुनिया से मिलाते हैं जिसमें सारी शोध बेहद व्यावहारिक हुआ करती थी. वे कहते हैं कि ‘विज्ञान की महानतम खोजें अज्ञात से टकराने वाले एकल मस्तिष्कों की देन है.’ जॉनसन की इस किताब का हर वैज्ञानिक किसी न किसी अज्ञात की खोज करता है.

अपनी इस किताब के लिए जॉनसन ने दस ऐसे वैज्ञानिकों और उनके प्रयोगों को चुना है जिन्होंने अपनी तार्किकता, स्पष्टता और साक्षातता के दम पर अपने समय की हठवादिता को धराशायी किया. इस किताब में सुविख्यात और कम ख्यात या अलक्षित रह गए, दोनों तरह के प्रयोग हैं. पहला अध्याय ढाल पर से गेंदों को लुढका कर गति का अध्ययन करने वाले गैलिलियो के उस प्रयोग के बारे में है जिसे आधुनिक विज्ञान का संस्थापक प्रयोग माना जाता है. एक अन्य अध्याय आइज़ैक न्यूटन द्वारा रंगों की प्रकृति का अध्ययन करने के लिए प्रिज़्म का प्रयोग करने के बारे में है. एक अध्याय है विद्युत की व्याख्या करने वाले लुइगी गालवानी के बारे में. एक अन्य अध्याय में एडवर्ड मॉर्ले के साथ मिलकर प्रकाश की सतत गति निर्धारित करने वाले एल्बर्ट मिचेलसन के काम का विवरण है. एक अध्याय है कुत्तों वाले सुविख्यात प्रयोग द्वारा शरीर विज्ञान और स्नायु विज्ञान को गति प्रदान करने वाले इवान पावलोव के बारे में.

किताब इस सवाल पर भी विचार करती है कि वह क्या चीज़ है जो किसी वैज्ञानिक प्रयोग को सुन्दर बनाती है. कहना अनावश्यक है, जॉनसन सादगी के पक्षधर हैं. उन्हें वह प्रयोग सुन्दर लगता है जो सीधा-सादा किंतु कलात्मक हो. लेकिन केवल इतना ही नहीं. यह और कि ऐसा प्रयोग जो साधारण व्याख्याओं के ज़रिए बद्धमूल धारणाओं को ध्वस्त भी करता हो. जैसे, गैलिलियो ने सारे पदार्थों की गति पर समान गणित लागू कर अरस्तू के इस विचार को ध्वस्त किया कि भारी पदार्थ अधिक तीव्र गति से गिरते हैं. इसी तरह विलियम हारवे ने प्रचलित धारणा को तोडते हुए यह स्थापित किया कि पूरे शरीर में एक ही तरह का रक्त संचारित होता है. न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि रंग अपवर्तित प्रकाश किरणें मात्र हैं, जबकि उनसे पहले दकार्ते इन्हें ‘ईथर की घूमती गोलिआओं’ जैसी जटिल चीज़ घोषित कर चुके थे, और इसे आम स्वीकृति हासिल थी.

जॉनसन ने यह स्वीकार किया है कि इस किताब के लिए दस प्रयोगों का उनका चयन मनमाना है, लेकिन अपनी सफाई में उन्होंने यह भी कहा है कि इन सारे प्रयोगों को उन्होंने एक तो इनकी सादगी की वजह से और दूसरे इस वजह से कि ये विज्ञान के आधारभूत क्षेत्रों की पडताल करते हैं, चुना है. जॉनसन यह भी चाहते हैं कि उनके पाठक भी प्रयोगों की इस सूची में अपनी-अपनी पसन्द के प्रयोग जोडें.

जॉनसन का निष्कर्ष है कि वे वैज्ञानिक जिन्होंने दुनिया की जटिलताओं को समझ कर उनकी साफ-सुथरी व्याख्याएं कीं वे प्राचीन यूनान और रोम के उन वैज्ञानिकों के समतुल्य हैं जिन्होंने पत्थरों के ढेरों का अध्ययन कर भवन निर्माण के आधारभूत सिद्धांत बनाए. जॉनसन बहुत कुशलता से विज्ञान की खूबसूरती को रेखांकित करते हैं.

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Discussed book:
The Ten Most Beautiful Experiments
By George Johnson
Knopf Publishing Group
208 pp. Hardcover
US $ 22.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 1 मई 2008 को प्रकाशित.