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Monday, September 15, 2014

पराए तेल से अपना दीपक क्यों जलाना?

वसंत देव ने क्या खूबसूरत गीत लिखा था ‘उत्सव’  फिल्म में – मन क्यूं बहका रे बहका.... जितना सुरीला गायन उतने ही अर्थपूर्ण शब्द और भाव भी. लेकिन मेरा ध्यान तो फिलहाल मन के बहकने पर अटका हुआ है. यह मन भी अजीब शै है! कहां से कहां पहुंच जाता है, और वो भी बेवजह! कोई तर्क काम नहीं करता और कोई रुकावट बीच में नहीं आती. आप चाहें तो भी इसके भटकने पर विराम नहीं लगा सकते. मैं अपनी ही बात करूं. कल एक साहित्यिक आयोजन में भाग लेने का मौका मिला. वहां एक वक्ता ने, जो मेरी भाषा के एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं, एक बहुत ही अच्छी बात कही.  जिस आयोजन की बात मैं कर रहा हूं वो एक नई शुरुआत थी और उसके समापन समारोह में हम सब उपस्थित थे. आयोजक गण इस आयोजन में सहयोग देने वालों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित  कर रहे थे. तब, उन वक्ता महोदय ने मंच से कहा कि लेखकों में भी ऐसे बहुत सारे लोग होंगे जो  इस तरह के आयोजनों में आर्थिक  सहयोग दे सकें. मुझे यह बात बहुत महत्वपूर्ण लगी. तब से अब तक मैं यही सोच रहा हूं कि हम इतने सारे साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता करते हैं, और जानते हैं कि करीब-करीब सारे आयोजन दूसरों के आर्थिक सहयोग से ही सम्भव होते हैं, लेकिन क्यों हमारे मन में यह बात नहीं आती कि हम भी इन आयोजनों में कोई सहयोग दें! हम यानि हममें से वे लोग जिनके लिए ऐसा करना सम्भव है. उन वरिष्ठ साहित्यकार महोदय  ने तो कल भी यह बात स्पष्ट कर दी थी. उन्होंने कहा था कि हममें से बहुत सारे ऐसे हैं जिनके बच्चे उनके आर्थिक संसाधनों के मुखापेक्षी नहीं हैं. यानि जब हमारी ज़रूरतें ठीक से पूरी हो रही हैं तब  क्या अपनी रुचि के उपक्रमों के लिए हमें सहयोगी नहीं बनना चाहिए? इसे उलट कर कहूं तो यह कि क्या हमें ही हमेशा दूसरों का  मुखापेक्षी बना रहना चाहिए?
 
कल से यह बात मेरे जेह्न में घूम रही है. और इससे जुड़ी बहुत सारी बातें आ-जा रही हैं. अनायास मुझे बहुत बरस पहले का एक प्रसंग याद आ गया. मैं एक छोटे कस्बे में कार्यरत था जहां किसी तरह की कोई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं होती थी. तब उसी कस्बे में मेरे एक मित्र थे जो एक ऐसे महकमे  में ऊंचे  पद पर कार्यरत थे जहां किसी को एक संकेत भर कर देना उसकी जेब से खासी बड़ी रकम निकलवाने के लिए पर्याप्त था. संगीत प्रेम उन मित्र और मेरे बीच के रिश्ते का आधार था. एक दिन गपशप के दौरान मैंने उन मित्र से कहा कि उनका तो इतना प्रभाव है, क्यों नहीं वे उसका उपयोग करके शहर में एक संगीत संध्या आयोजित करवा देते? उनका जवाब करीब चार दशक बाद भी मेरे मन पर ज्यों का त्यों अंकित है. वे बोले, “अग्रवाल साहब, संगीत का शौक तो आपको और मुझे है. उसके लिए हमें दूसरों पर बोझ क्यों बनना चाहिए? जब मन होगा, अहमदाबाद पास ही है, जाकर किसी को सुन आएंगे!” पता नहीं वे मित्र अब कहां हैं, और कैसे हैं! लेकिन उनकी बात कल से दिमाग में उमड़ घुमड़ रही है.

सोच रहा हूं कि हमारी जो भी रुचियां  हों,  चाहे वो साहित्य की हों, संगीत की हों, या किसी और विधा की हों, आखिर क्यों हमें किसी और की तरफ ताकना चाहिए कि वो दान करेगा और हम लाभान्वित होंगे! वो दान करना चाहें, ज़रूर करें, लेकिन हम उनके दान के आकांक्षी क्यों हों? लेकिन हकीकत तो यही है. मेरा ज्यादा लगाव जिस साहित्य की दुनिया से है उसमें मैं देखता हूं कि हम लोग अपने प्रिय रचनाकार की किताब तक खरीदकर नहीं पढ़ना चाहते! हमारी आकांक्षा यही होती है कि लेखक खुद हमें अपनी किताब भेंट करे तो हम पढ़ें! यह स्थिति हिन्दी समाज में अधिक है. यही वजह है कि आज किताब का संस्करण तीन सौ प्रतियों तक सिमट आया है.  अनायास मुझे यह बात याद आ रही है कि एक बार जब किसी ने बहुत उत्साह पूर्वक कहा कि वो हिन्दी के लिए अपनी जान  भी दे  सकता है,   तो रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत गम्भीरता से कहा था कि हिन्दी को  आपकी जान की ज़रूरत नहीं है, आप तो बस थोड़े-से पैसे खर्च दिया करें हिन्दी की किताबों के लिए! आज भी अगर हम इस बात को याद कर लें तो हालात बदलते देर नहीं लगेगी.

और इसीसे मन भटकते-भटकते कहीं और निकल जाता है! हमारे पास अपने हर कृत्य के लिए बहुत सारे तर्क होते हैं. अपना पैसा खर्च न करने के लिए, अपना समय न देने के लिए, नियम-कानून-व्यवस्था का निर्वहन न करने के लिए... क्या हम इन तर्कों के इस्तेमाल में थोड़ी कृपणता नहीं बरत सकते? 

कृपणता हमेशा ही निन्दनीय नहीं होती है!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 सितम्बर, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.                 

Tuesday, May 6, 2014

जब ज़िंदगी इतनी इंस्टैण्ट नहीं थी!

कुछ सुविधाओं और चीज़ों के हम इतने अधिक अभ्यस्त हो जाते  हैं कि यह खयाल तक नहीं आता कि जब ये हमें सुलभ नहीं थी तब हमारी ज़िंदगी कैसे चलती थी, और वो ज़िंदगी बेहतर थी या बदतर थी!  अब दूर संचार को ही लीजिए. अब मोबाइल हमारी ज़िंदगी से इतना एकाकार हो चुका है कि इसके बिना हम अपने आप को अधूरा समझने  लगे हैं. अगर आप किसी बस या ट्रेन में सफ़र कर रहे हों और कोई स्टेशन आने वाला हो, तब का मंज़र याद कीजिए. मोबाइल की घण्टियां (बल्कि किसम किस्म की रिंग टोन्स) आपको चेता देती हैं कि अब कोई स्टेशन आने वाला है. या तो आपका हम सफर अपने किसी मित्र-परिजन को बता रहा होता है कि उसकी मंज़िल आने ही वाली है या फिर वो प्रतीक्षारत अपने किसी परिजन को अपने जल्दी ही पहुंचने का सुसमाचार दे रहा होता है.

लेकिन बहुत पुरानी बात नहीं है जब हम सब इस सुविधा के बिना भी जी रहे थे. और न सिर्फ जी रहे थे, मज़ेदार अनुभव भी कर रहे थे. मैं एक कस्बाई  कॉलेज में हिंदी पढ़ाता था.  मेरे कॉलेज का हिंदी विभाग बहुत सक्रिय था. हम लोग अक्सर कोई न कोई आयोजन करते रहते थे. प्रांत का हिंदी का शायद ही कोई बड़ा लेखक हो जिसका सान्निध्य उन दिनों हमारे विभाग को न मिला हो. तो हुआ यह कि हमने पास के एक बड़े शहर के एक नामी रचनाकार को अपने यहां काव्य पाठ और व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया. वो चिट्ठियों के आदान-प्रदान वाला ज़माना था. टेलीफोन धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था और मोबाइल की तो कोई पदचाप भी सुनाई नहीं दे रही थी. चिट्ठियों के आदान प्रदान से उनका कार्यक्रम तै हो गया. कस्बा छोटा था, होटल संस्कृति तब चलन में नहीं थी. तय किया गया कि उन्हें बस से उतार कर साथियों में से किसी के घर ले जाएंगे ताकि वे फ्रेशहोना चाहें तो हो लें, फिर कॉलेज ले जाकर उनका कार्यक्रम करा लेंगे और उसके बाद किसी के घर पर सब लोग एक साथ भोजन करेंगे और उसके बाद उन्हें उनकी सुविधानुसार किसी बस में बिठा कर विदा कर देंगे.

बस स्टैण्ड दूर था, उससे पहले एक चौराहा था जहां ज़्यादातर सवारियां उतरती थी, और वो चौराहा हमारे उस साथी के घर (और कॉलेज)  के भी निकट था, जहां उन्हें पहले ले जाना तै हुआ था. हम चार साथी उस चौराहे पर खड़े हो गए कि बस आएगी तब अपने अतिथि को वहीं उतार लेंगे. एक-एक करके तीन बसें वहां से गुज़र गईं, लेकिन हमारे अतिथि नज़र नहीं आए. उनके पहुंचने का सम्भावित समय भी बीत चुका  था. सोचा किसी मज़बूरी के चलते वे नहीं आ पाए हैं. निराश मन कॉलेज गए, कार्यक्रम स्थगित किया और अपने इतर कामों में व्यस्त हो गए.

तीसरे दिन डाक से उन साहित्यकार महोदय का पत्र आया. बहुत संयत भाषा में, लेकिन शब्दों के पीछे से उनकी नाराज़गी झांक रही थी. पत्र उन्होंने शायद लिखा भी अपनी नाराज़गी के इज़हार के लिए ही था. जो कुछ उन्होंने लिखा उसका सार यह था कि जिस बस से उन्होंने आने की सूचना दी थी, उस बस से वे हमारे कस्बे में पहुंचे, बस स्टैण्ड पर जब बस रुकी तो खिड़की में से झांक कर देखा कि वहां हममें से कोई है या नहीं! उन्हें हममें से कोई वहां दिखाई नहीं दिया. वे बस से उतरे, और क्योंकि उसी वक़्त एक बस वापस उनके बड़े शहर जाने को तैयार खड़ी थी, उसमें बैठ कर वे अपने शहर लौट गए. उन्होंने हमसे कोई शिकायत नहीं की. यह उनका बड़प्पन था.

आज पीछे मुड़कर इस घटना को याद करता हूं तो उनकी खुद्दारी के प्रति माथा झुक जाता है. उन्हें लगा होगा कि जिन लोगों में इतनी भी तमीज़ नहीं है कि अपने मेहमान के स्वागत के लिए पहुंचें, उनके यहां क्या जाना! बेशक, इसमें हमारी कोई ग़लती नहीं थी. बसों की भीड़भाड़ में और लोगों के चढ़ने-उतरने की आपाधापी में न उन्होंने हमें देखा और न हमने उन्हें! लेकिन उन्होंने अपने पत्र में एक भी कठोर शब्द नहीं लिखा. यह कोई मामूली बात नहीं है. लेकिन अगर आज की तरह  मोबाइल चलन में होता तो निश्चय ही यह घटना घटित नहीं हुई होती. थोड़ी-सी देर उनका इंतज़ार  करने के बाद हम लोग जाने कितनी दफ़ा उनके मोबाइल को ज़हमत दे चुके होते! और इसके बावज़ूद भी अगर कोई चूक हो गई होती, और उसके बाद उनसे बात हुई होती तो शायद उन्होंने भी हमसे अपनी नाराज़गी व्यक्त की होती, और हमने भी कुछ न कुछ ज़रूर कहा होता  जिससे बदमज़गी पैदा हुई होती.  सोच-समझकर अपने आप को व्यक्त करने की जो सुविधा चिट्ठी में है वो भला मोबाइल की तात्कालिकता में कहां? अपनी तात्कालिकता में मोबाइल पर तो हम उनसे नाराज़ हुए होते और वे हमसे! लेकिन अपने घर पहुंच कर चिट्ठी लिखते हुए वे अपनी नाराज़गी पर काबू पा चुके होंगे.
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में दिनांक 06 मई, 2014 को मेरे साप्ताहिक  कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत 'तब ज़िंदगी इतनी इंस्टैण्ट नहीं थी' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.