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Wednesday, November 13, 2024

अजीबोगरीब बूढ़ा

 जब ऑस्ट्रेलिया के एक छोटे कस्बे के एक नर्सिंग होम के बूढ़ों के वार्ड में एक वृद्ध ने आखिरी सांस ली तो यह मान लिया गया कि उसके पास कीमती कुछ भी नहीं है.

बाद में, जब नर्सें उसके बचे खुचे  सामान को खांगाल रही थीं तो उन्हें यह कविता मिली. कविता की विषय वस्तु और शैली से वे इतनी ज़्यादा प्रभावित हुईं कि उन्होंने इसकी फोटो प्रतियां करके अस्पताल की सारी नर्सों को भेजी.

उनमें से एक नर्स यह कविता मेलबोर्न ले गई. उस बूढ़े की अगली पीढ़ी के नाम यह वसीयत अब तक वहां की पत्रिकाओं के क्रिसमस विशेषांकों में और मानसिक स्वास्थ्य विषयक पत्रिकाओं में कई दफा प्रकाशित हो चुकी है. इस कविता पर एक स्लाइड प्रस्तुति भी तैयार की जा चुकी है.

और इस तरह यह बूढ़ा, जिसके पास दुनिया को देने के लिए कुछ भी नहीं था, इण्टरनेट पर बहु पठित इस इस अनाम कविता के रचियता  के रूप में जाना जा रहा है. 

 

 

क्या देख रही हो नर्स?  क्या देख रही हो?

जब मेरी तरफ़ देखती हो तो क्या सोचती हो तुम?

एक अजीबोगरीब बूढ़ा ...कोई ख़ास अक्लमंद भी नहीं,

जो नहीं जानता कि क्या करे और क्या न करे...कहीं दूर ताकता.

जो बिखेर  देता है खाने-पीने की चीज़ें और नहीं देता है कोई जवाब

जब तुम ज़ोर से कहती  हो उसे...’कोशिश  तो करके देखो!’

और लगता है जैसे उसका ध्यान ही नहीं जाता कि क्या कर रही  हो तुम.

हमेशा ही खोता रहता है वो अपनी चीज़ें – कभी मोजा तो कभी जूता.

वो जो कभी तुम्हें रोकता है और कभी नहीं,  करने देता है तुम्हें अपनी मनमानी-  

उसे नहलाने में या खिलाने  में. कितना लम्बा तो होता है उसका दिन?

यही तो सोच रही  हो ना तुम! यही तो नज़र आता है ना तुम्हें!

अपनी आंखें खोलो नर्स!  नहीं देख रही हो तुम मुझे.

यहां शांत बैठा मैं,

तुम्हारी आवाज़ पर हिलता-डुलता और तुम्हारे इशारों  पर खाता-पीता,

 

बताता हूं तुम्हें कि कौन हूं मैं.

मैं हूं दस साल का एक बच्चा.. मेरे भी हैं मां-बाप,

भाई-बहन – जो करते हैं प्यार एक दूसरे से.

सोलह साल का एक लड़का  - लगे हैं पंख जिसके पैरों में

देखते हुए ख़्वाब कि जल्दी ही मिलेगा उसे उसका प्रेम

और फिर  बीस में आकर वो बना दूल्हा.......मेरा दिल धड़क रहा है बहुत ज़ोर से.

याद आ रही हैं वो कसमें जो खाई थी मैंने.

और अब मैं हूं पच्चीस का और है मेरा भी एक बेटा

जो चाहता है कि मैं उसकी उंगली पकड़ कर दिखाऊं उसे राह और दूं एक सुरक्षित सुखी घर.

मैं हुआ अब तीस का और तेज़ी  से बड़ा हुआ मेरा बेटा,   

बन्धे हुए रिश्तों के मज़बूत बन्धन में.

मैं हुआ चालीस का और और मेरे बच्चे बड़े होकर  चले गए हैं मुझसे दूर

लेकिन पास है मेरी पत्नी... करती फिक्र इस बात की कि न छाए उदासी मुझ पर.

पचास में एक बार फिर बच्चे खेल रहे हैं मेरे इर्द गिर्द

फिर हम घिरे हैं बच्चों से, अपने प्यारे बच्चों से.

अंधियारे दिन आए हैं... छोड़ गई है  मेरी पत्नी.

मैं ताकता हूं भविष्य को और थरथराता हूं डर से. 

मेरे बच्चे पाल पोस  रहे हैं अपने छोटे बच्चों को

और मुझे याद आ रहे हैं वे बरस और वो प्यार जो मैंने था जिया.

अब हो गया हूं मैं बूढ़ा और निर्दयी है प्रकृति!

बेवक़ूफी है उड़ाना मज़ाक बुढ़ापे का.

खण्ड खण्ड होती है देह और अलविदा कहते हैं लावण्य़ और ऊर्जा.

पहले जहां था दिल अब वहां है एक पत्थर.

लेकिन उस पुराने खण्डहर में अब भी रहता है एक युवक

और अक्सर मेरा टूटा-फूटा दिल खिल उठता है

याद करके वो खुशियां.........और वो ग़म.

मैं फिर से कर रह हूं मुहब्बत और फिर से जी रहा हूं ज़िन्दगी.

बीत गई ज़िन्दगी बहुत जल्दी....

मान लिया है मैंने इस सच को कि कुछ भी तो नहीं होता है अजर अमर.

तो खोलो अपनी आंखें  लोगों...खोलो  और देखो.

नहीं हूं मैं एक अजीबोगरीब बूढ़ा.

ध्यान से देखो.... यह हूं मैं!  

 

अगली दफ़ा जब भी किसी बूढ़े से आपकी मुलाक़ात हो, हो सकता है कि उसके बूढ़े शरीर के भीतर छिपे बैठे युवा मन  को आप अनदेखा कर जाएं. तब  इस कविता को  ज़रूर याद करें. एक दिन हम सबका भी यही हश्र  होना है!

 

(मूल कविता: फिलिस मैककॉर्माक, रूपांतरण – डेव ग्रिफिथ).

हिन्दी अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल 

Sunday, September 29, 2013

राजनीति पर मूर्ति का आवरण

28 सितम्बर 2013 की टाइम्स ऑफ  इण्डिया में लेखक और पूर्व राजनयिक श्री पवन के वर्मा का एक लेख छपा है 'व्हेन आर्ट मास्क्स पॉलिटिक्स'. मुझे यह लेख इतना ज़्यादा अच्छा लगा कि तुरंत इसका अनुवाद करने बैठ गया. तो प्रस्तुत है इस लेख का मेरा किया अनुवाद:  


नरेन्द्र मोदी एक उम्दा वक्ता हैं और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने जाने के बाद  हरियाणा के रेवाड़ी में उनके पहले सार्वजनिक भाषण ने इस बात के पर्याप्त  प्रमाण भी दे दिए हैं. लेकिन सरदार पटेल की उनकी भरपूर  तारीफ से मुझे आश्चर्य हुआ है. मोदी ने घोषणा की है कि वे भारत के हर गांव से लोहा इकट्ठा  करके गुजरात में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊँचाई की सरदार पटेल की एक मूर्ति लगवाएंगे जो दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति होगी.

मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ  कि सरदार पटेल ही वे व्यक्ति थे जिन्होंने उस आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया था जिसके सदस्य नरेन्द्र मोदी 15 बरस की कच्ची उम्र में बने थे और खुद उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार जिसका उनके जीवन और चिंतन प्रक्रिया को ढालने में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रहा है. जब 2 फरवरी, 1948 को “देश में काम कर रही आज़ादी को ख़तरे में डालने वाली और देश के नाम को कलंकित करने वाली नफरत और हिंसा की शक्तियों को उखाड़ फेंकने के”  अपने इरादे  के तहत भारत सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया तब पटेल ही भारत के गृह मंत्री थे.

आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु माधव सदाशिव गोलवलकर के नाम लिखे अपने 11 सितम्बर, 1948 के एक पत्र में सरदार आरएसएस के नेताओं की बेबाक भर्त्सना करते हैं: “उनके सारे भाषण साम्प्रदायिक विष से भरे हुए हैं. हिन्दुओं में जोश का संचार करने और उनके संरक्षण के लिए संगठित करने के लिए ज़हर फैलाना ज़रूरी नहीं था. इस ज़हर के अंतिम परिणाम के रूप में देश को गांधीजी के मूल्यवान जीवन से हाथ धोना पड़ा.”

महत्वपूर्ण बात यह है कि महात्मा गांधी की हत्या में आरएसएस और हिन्दू महासभा की भूमिका को लेकर सरदार  के मन में कभी कोई संशय नहीं था. पण्डित नेहरु को लिखे 27 फरवरी, 1948 के पत्र में वे यह बात बहुत स्पष्टता के साथ कहते हैं: “हिंदू महासभा की कट्टर शाखा ने सीधे सावरकर के निर्देशन में इस षड़यंत्र की योजना  तैयार की और इसे क्रियान्वित  किया.... निस्संदेह आरएसएस और हिन्दू महासभा के जो लोग गांधी के सोचने के तरीकों और उनकी नीतियों के विरोधी थे उन्होंने उनकी हत्या का स्वागत किया.”  

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक अन्य पत्र (18 जुलाई, 1948) में वे इसी स्थिति  को  दुहराते हैं: “जहां तक आरएसएस और हिन्दू महासभा का सवाल है...हमारी रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संगठनों और ख़ास तौर पर पहले वाले संगठन की वजह से देश में एक ऐसा वातावरण बनाया गया जिसमें यह भयंकर त्रासदी सम्भव  हो सकी.”

प्रसंगवश, हालांकि अपने मुकदमे के समय नाथू राम गोडसे ने आरएसएस के साथ अपने किसी स्पष्ट सम्बन्ध से इंकार किया था, कई वर्षों के बाद जनवरी, 1994 में फ्रण्टलाइन पत्रिका को दिए गए एक इण्टरव्यू में उनके भाई गोपाल सच्चाई को लेकर एकदम स्पष्ट थे: “सभी भाई आरएसएस में थे, नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविंद. बल्कि आप कह सकते हैं कि हम लोग अपने घर की बजाय आरएसएस में ही बड़े हुए. हमारे लिए वह एक परिवार की तरह था. नाथूराम आरएसएस में एक बौद्धिक कार्यवाह बन गए.  उन्होंने भी यह कहा है और इसे कभी छोड़ा  नहीं.” 

सरदार पटेल गांधीजी और उनके समावेशी नज़रिये के पक्के अनुयायी  थे. जिस संगठन आरएसएस ने मोदी का मार्गदर्शन  किया और उनके दुनियावी नज़रिये को गढ़ा उसके प्रति उनका प्रबल विरोध एक दस्तावेज़ी सच्चाई है. तो फिर पटेल को अपना कर और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनकी दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनाकर मोदी क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं?

एक विचार तो यह हो सकता है कि आरएसएस के बारे में सरदार की राय से मोदी सहमत हों. आखिर इतने बड़े मुद्दे पर एक उत्साही प्रशंसक और उसके नव प्राप्त नायक के बीच इतना घोर मतभेद तो नहीं हो सकता है. अगर हो तो मोदी को स्पष्ट ऐसा कहना चाहिए. और अगर नहीं तो उन्हें  इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि वे चुने हुए विस्मरण और स्वार्थपूर्ण छल के एक सोच-समझे  प्रयास के द्वारा पटेल को सिंहत्व प्रदान कर रहे हैं, यानि देश के एकीकरण के लिए पटेल के प्रयास का गुणगान और जिन लोगों ने साम्प्रदायिक उन्माद और हिंसा की राजनीति के द्वारा देश को तोड़ने की कोशिश की उनके बारे में उनके कठोर विचारों की जानबूझकर अवहेलना.  

इस बात के  सुनिश्चित प्रमाण उपलब्ध  हैं कि मोदी को बीजेपी का नेतृत्व प्रदान करने के राजनीतिक चयन के बारे में आरएसएस ने एक महत्वपूर्ण  भूमिका निबाही है. ये प्रमाण इस बारे में भी बहुत स्पष्ट हैं कि मोदी आरएसएस की विचारधारा से बेहद प्रभावित हैं. जब सबसे ज्यादा समय तक और सर्वाधिक ‘सफल’ आरएसएस मुखिया गोलवलकर सरसंघचालक थे (1940-73) तब मोदी एक प्रचारक थे.

कहा जाता है कि मोदी ने उनकी तारीफ में एक किताब भी लिखी थी. तो क्या वे गोलवलकर के बहुत स्पष्टता से कहे गए इन विचारों से भी सहमत हैं कि भारत अनन्य रूप से एक हिन्दू राष्ट्र है, जिसमें अन्य विश्वासों वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं  है यहां तक कि उन्हें नागरिक अधिकर भी प्राप्त नहीं हैं? क्या वे, यहूदियों को समूल नष्ट कर देने के कृत्य को देश के लिए सबसे बड़े गर्व की बात मानने के लिए नाज़ी जर्मनी की गोलवलकर की तारीफ का भी समर्थन करते हैं? क्या वे भी गोलवलकर की ही तरह यह मानते हैं कि मनुस्मृति ही, जो कि शूद्रों  को ब्राह्मणों की सतत सेवा में लगाना चाहती है और स्त्रियों की अधीनता की बात करती है, देश के लिए एकमात्र वैध कानून है? मेरा खयाल है कि बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इस प्रतिगामी सोच का महत्व कम करने और अपनी  राजनीतिक अपील का विस्तार करने का एक साहसिक प्रयास किया था.  लेकिन मोदी के उत्थान के साथ बीजेपी की निर्देशक विचारधारा के रूप में आरएसएस के  मूल दर्शन की वापसी हुई है.

अगर सरदार पटेल इस घटनाक्रम को देख रहे होंगे तो निस्संदेह वे बहुत दुःखी और साथ ही बहुत नाराज़ भी होंगे. नाराज़ इस बात के लिए कि जिनका  उन्होंने खुले तौर पर विरोध किया  वे ही चालाकी के साथ उन्हें अपना रहे हैं. और दुःखी इस बात के लिए कि उनके ये नए भक्त भारत  का जो प्रारूप पेश कर रहे हैं वह  उस प्रारूप से कितना अलहदा है जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था.
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Sunday, December 25, 2011

वर्ष 2011 में हिंदी भाषा और साहित्य

बीतते जा रहे साल के आखिरी दिनों में पूरे साल का लेखा जोखा करने बैठा हूं तो सबसे पहले इस बात पर ध्यान जाता है कि हमारे समाज की भाषा की ज़रूरतों में तेज़ी से बदलाव आ रहा है. अब तक हम जिस तरह से भाषा को बरतते रहे हैं, बरताव का वह तरीका अब प्रचलन से बाहर होता जा रहा है. हमारे समय में विभिन्न कारणों से, जिनमें डम्बिंग डाउन सिण्ड्रोम भी एक है, भाषा की पारम्परिक महत्ता का तेज़ी से क्षरण हुआ है. स्वाभाविक है कि मेरी अपनी भाषा हिंदी भी इस से अछूती नहीं रही है. बढ़ते वैश्वीकरण ने अंग्रेज़ी को और भी अधिक ताकतवर बनाया है और उसके ताकतवर होने का खामियाज़ा तमाम भारतीय भाषाओं को, जिनमें हिंदी भी एक है, भुगतना पड़ा है. रोजी-रोटी के लिहाज़ से हिंदी की महता में कमी आई है और इसका असर हिंदी के पारंपरिक पठन-पाठन पर भी पड़ा है. नए खुल रहे निजी विश्वविद्यालयों में तो भाषा के अध्ययन-अध्यापन की सम्भावनाएं लगभग खत्म ही हो गई है. जहां हिंदी का अध्यापन हो रहा है वहां भी स्थिति बेहतर और उत्साहपूर्ण नहीं है. लेकिन वैसे हिंदी में रोज़गार के नए अवसर भी खूब पैदा हुए हैं. अनुवाद का बाज़ार खूब फला फूला है लेकिन उस बाज़ार के लिए हमारी तैयारी अभी कम ही है. इधर भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा प्रभाग ने एक विज्ञप्ति जारी कर हिंदी के तथाकथित कठिन शब्दों की बजाय अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग करने की सलाह देकर हिंदी को ठेस पहुंचाई है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ नकारात्मक ही है. इंटरनेट, मोबाइल आदि पर हमारी भाषा का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन इस वजह से भाषा के स्वरूप में बहुत तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं. आने वाले बरसों में हमें नए सांचे में ढली हिंदी को देखने का और उसे बरतने का अभ्यस्त होना होगा. जहां तक साहित्य का सवाल है, हम चाहें तो इस बात पर खुशी मना सकते हैं कि खूब लिखा जा रहा है और छप भी खूब रहा है. लेकिन दुख की बात यह है कि इसी अनुपात में पाठक संख्या में वृद्धि नहीं हुई है. कम से कम किताबों की बिक्री से तो यही लगता है. किताबों की वैयक्तिक खरीद का ग्राफ जस का तस है और अधिकतर प्रकाशक सरकारी और सांस्थानिक खरीद पर ही आश्रित हैं. हां, इतना ज़रूर हुआ है कि राजस्थान के एक प्रकाशक बोधि प्रकाशन ने मात्र एक-एक सौ रुपये में दस पुस्तकों के दो सेट प्रकाशित कर और उन्हें ठीक से बेच कर इस ठहरे पानी में हलचल पैदा करने की एक कोशिश की. लेकिन शेष प्रकाशन जगत पर इस प्रयास की कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली. हिंदी साहित्य की दुनिया में एक बड़ी बात यह हुई है कि नई तकनीक ने लेखक को उसकी रचनाशीलता के प्रसार के लिए अनेक वैकल्पिक माध्यम सुलभ करा दिए हैं. पिछले बरस हिंदी के नए लेखकों के अलावा अनेक प्रतिष्ठित लेखकों ने भी ब्लॉग, फेसबुक वगैरह का खूब प्रयोग कर इन नए माध्यमों को अपनी स्वीकृति प्रदान की. फेसबुक पर बहुत सारे मुद्दों पर जीवंत बहसें चलीं. ब्लॉग्स पर भी काफी कुछ बेहतरीन देखने को मिला. एक और खास बात यह हुई कि विधाओं की जकड़बन्दी में बहुत कमी आई और उनमें पारस्परिक अंत:क्रिया बढी. मुझे यह बात भी महत्वपूर्ण लगती है कि अंग्रेज़ी सहित अनेक विदेशी भाषाओं की नव प्रकाशित पुस्तकें अब तुरंत हिंदी में भी सुलभ होने लगी हैं. निश्चय ही इससे भी हिंदी की दुनिया समृद्ध हो रही है. तो कुल मिलाकर भाषा और साहित्य दोनों ही दृष्टियों से बीता साल मिला-जुला रहा है. ◙◙◙ दिनांक 25 दिसम्बर 2011 को दैनिक डेली न्यूज़ में प्रकाशित आलेख का किंचित परिवर्तित रूप. Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

Sunday, August 22, 2010

दो कविताएं : नारायण सुर्वे


मेरी मां

हर सुबह
जब तारे हो जाते अस्त
ऊंची-ऊंची चिमनियों के सायरनों से निकलती आवाज़ के बीच
मिल की तरफ़ जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते
कौन पीछे मुड़कर हमें देखती
और कहती इतने प्यार से
“लड़ना मत किसी से”
और थमा देती दो पैसे

दशहरे के एक दिन पहले
वो गई थी हम पांचों के साथ
मेले में
हम गलियों में कर रहे थे मस्ती
कितना मज़ा आया क्या कहें
लौटे तो हमारे हाथों में थे गुब्बारे
सीटियां और पीपनियां
हम बन गए थे परिंदे

एक दिन हुआ ऐसा
वे उसे गाड़ी में डालकर लाए
उसकी आंखें खुली थीं
और मुंह से बह रहा था खून
उसके साथी ने प्रणाम किया नज़दीक आया,
हमें बाहों में भरा और कहा ‘बालू’
हमने देखा सब कुछ चुपचाप
और ढूंढा अपनी छतरी को
अपनी छत को, और अपनी मां को.

उस रात हम पांचों
अपनी गुदड़ी में
चिपटे एक दूसरे से और भी ज़्यादा
जैसे गुदड़ी ही हो मां का दुलार
वैसे तो पहले से कुछ नहीं था हमारे पास
अब तो रही नहीं मां भी
हम जागते रहे सारी रात बहते रहे आंसू
अब हम हो गए थे पूरी तरह निस्संग.

◙◙◙



यह उस दिन की कहानी है जिस दिन नेहरु नहीं रहे

जो घर देते थे उनकी पीठों को गर्माहट, अचानक चरमराने लगे
शहर अचानक कैसे हो गया इतना क्रूर!
और फिर अंधेरे ने निगल लिया मणि को.

पत्थरों के परिधानों वाली फैक्ट्रियां
डूब गई गहन विचारों में, जलाए हुए अपने सिगार
और फिर वे लौटे
अपने-अपने दड़बों में
डाले हुए अपने-अपने कंधों पर अपनी गीली कमीज़ें.

“क्या हुआ सुंदरी?” पूछा एक वेश्या ने
”आज मत जलाना अगरबत्ती. नेहरु जी चले गए!”
दिया जवाब दूसरी ने.
“सच्ची? ठीक. चलो फिर आज रात हमारी भी छुट्टी!!”

भारी बोझ उठाने वाली दुनिया कर रही है आराम, मौन.

एक हाथ में कागज़ की लालटेन थामे दूसरे से हाथगाड़ी धकेलते
आदमी को रोककर मैं पूछता हूं, ”अब यह रोशनी क्यों, साथी?”
“किसलिए!”
आगे है घोर अंधेरा” उसने कहा.


यह उस दिन की कहानी है जिस दिन नेहरु नहीं रहे
यह उस दिन की कहानी है जिस दिन नेहरु नहीं रहे.
◙◙◙

अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल


जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ के रविवारीय परिशिष्ट हम लोग में 22 अगस्त , 2010 को प्रकाशित.


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Saturday, December 6, 2008

थोड़ी-सी लिपस्टिक आपके लिए भी

पिछले दिनों हमारे कुछ राजनीतिज्ञ अपने बयानों के कारण चर्चा में रहे. एक बयान दिया भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नक़वी ने. उनके बयान पर जानी-मानी लेखिका शोभा डे ने एक तल्ख टिप्पणी की हिन्दुस्तान टाइम्स में. मुझे उनकी ज़्यादातर बातें सही लगीं. शोभा डे की टिप्पणी वे लोग भी पढ़ें जो हिन्दुस्तान टाइम्स नहीं पढ़ते, इसी खयाल से मैं उस टिप्पणी का अनुवाद यहां दे रहा हूं:

दुर्गाप्रसाद



थोड़ी-सी लिपस्टिक आपके लिए भी
शोभा डे

हां, मुख्तार नक़वी जी, मैं लिपस्टिक लगाती हूं. लेकिन, पाउडर नहीं लगाती. और हां, मैं उस दक्षिण मुम्बई में रहती हूं जिसे एक अभिजात रिहायश माना जाता है (हालांकि उसे एक अभिजात स्लम कहना ज़्यादा सही होगा). मैं अक्सर पांच सितारा होटलों में जाती हूं, खास तौर पर भव्य ताज महल होटल में. मैं बिना किसी संकोच के उसे अपना दूसरा घर कहती हूं, क्योंकि वो मेरा दूसरा घर है.

ज़्यादातर मानदण्डों के अनुसार मेरी जीवन शैली को विशिष्ट कहा जा सकता है.

तो?

इन सुख सुविधाओं के लिए मैंने लम्बे समय तक कठिन श्रम किया है. इन सबको मैंने ईमानदार साधनों से जुटाया है. मुझे अमीरी विरासत में नहीं मिली और मेरा पालन-पोषण एक मध्यम वर्गीय घर-परिवार में हुआ. सभी भारतीय अभिभावकों की तरह मेरे मां-बाप ने भी शिक्षा के माध्यम से अपने बच्चों को एक बेहतर ज़िन्दगी देने का ख्वाब देखा. हमने उनके सपनों को, और कुछ अपने सपनों को भी, साकार किया. क्या यह कोई ज़ुर्म है?

मैं गर्व पूर्वक अपना टैक्स अदा करती हूं और अपने तमाम बिल भरती हूं. लेकिन क्या ऐसा ही आपकी बिरादरी के अधिकांश लोगों, जो वर्तमान समय के असली अभिजन हैं, के लिए भी कहा जा सकता है? मेरा इशारा राजनीतिज्ञों की तरफ है जिनकी जवाबदेही शून्य है लेकिन जो उन तमाम सुविधाओं का भोग करते हैं जिनके लिए वे अन्यों की आलोचना करते हैं.

अपनी जीवन शैली के लिए लज्जित होने से मैं इंकार करती हूं. कहावत है न कि बदला लेने का सबसे बढिया तरीका है बेहतर ज़िन्दगी जीना.

बहुतेरे तथाकथित नेताओं के विपरीत मेरा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. जब मैं घर से बाहर निकलती हूं तो उम्दा कार में निकलती हूं, लेकिन वह कार कोई चलता फिरता दुर्ग नहीं होती जिसकी रक्षा सरकारी खर्च पर पलने वाले बन्दूक धारियों का समूह किया करता है. जब मैं निकलती हूं तो मेरे कारण ट्रैफिक को दूसरे रास्तों पर मोड़ कर औरों के लिए असुविधा पैदा नहीं की जाती. हवाई अड्डों पर दूसरों की तरह मेरी भी तलाशी ली जाती है.

इसलिए मिस्टर नक़वी, आपकी हिम्मत कैसे हुई इस तरह की अनुपयुक्त और अवांछित टिप्पणी करके मुझे (और अन्य स्त्रियों को) नीचा दिखाने की? हम लोग प्रोफेशनल हैं जो अपनी भरपूर क्षमता का प्रयोग करते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं. क्या आप भी ऐसा ही दावा कर सकते हैं? हम लोग चाहें लिपस्टिक लगायें, अपने चेहरों पर पाउडर पोतें, विग लगायें या कृत्रिम भौंहें लगायें, यह हमारा अपना निजी मामला और विशेषाधिकार है. आपकी यह टिप्पणी सिर्फ महिलाओं और विशेष रूप से उन शहरी कामकाजी महिलाओं के बारे में, जो कि आप जैसों के द्वारा निर्धारित पारम्परिक छवियों की अवहेलना करती हैं, आपके एकांगी और पक्षपातपूर्ण रवैये का दयनीय प्रदर्शन मात्र है.

आपकी और आप जैसे उन स्व-घोषित बुद्धिजीवियों जिन्होंने अभिजात लोगों को गरियाने का एक नया खेल तलाशा है, की यह टिप्पणी ऐसे वक़्त में आई है जब हमारा ध्यान अधिक महत्व के मुद्दों, जैसे घेरेबन्दी के समय में जीवित रहने की चुनौती पर, केन्द्रित होना चाहिए था. समाज के अधिक समृद्ध/शिक्षित लोगों पर इस प्रहार से एक रुग्ण संकीर्ण मानसिकता का पता चलता है.

मेरी आवाज़ की भी वही वैधता है जो एक अनाम सब्ज़ी विक्रेता की आवाज़ की है, क्योंकि हम दोनों भारत के नागरिक हैं. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वे टी वी एंकर जो लिपस्टिक या पाउडर का इस्तेमाल नहीं करतीं, अपने काम में दूसरों से बेहतर हैं? क्या राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाली औरतों को इसलिए सौन्दर्य प्रसाधनों से परहेज़ करना चाहिए ताकि उन्हें (निश्चय ही मर्दों द्वारा) अधिक ‘गम्भीरता’ से लिया जा सके? क्या सार्वजनिक जीवन में काम करने वाली महिलाओं को इसलिए घटिया कपड़े पहनने चाहियें कि उनकी विश्वसनीयता अधिक बढी हुई नज़र आए और समाज द्वारा उन्हें जो भूमिका प्रदान की गई है वे उसके उपयुक्त दिखाई दें? क्या लिपस्टिक उनके योगदान और योग्यता का अपहरण कर लेती है?

सवाल उस महिला कोण्डोलिज़ा राइस से भी पूछा जाना चाहिए जो सालों से दुनिया की मोस्ट स्टाइलिश सूची में जगह पाती रही हैं. पूछा सोनिया गांधी से भी जाना चाहिए जो हर वक़्त त्रुटिहीन वेशभूषा में नज़र आती हैं, और लिपस्टिक भी ज़रूर ही लगाती हैं. और हां, मैं अपनी नई करीबी दोस्त जयंती नटराजन को भला कैसे भूल सकती हूं?

बहुत दुख की बात है कि वर्तमान संकट के दौरान लैंगिक भेद का मुद्दा बीच में लाकर श्री नक़वी ने सारे मुद्दों को इतना छोटा बना दिया. जॉर्ज़ फर्नाण्डीज़ ने अपनी ज़मीन उस वक़्त खो दी थी जब उन्होंने कोका कोला के विरुद्ध लड़ाई शुरू करने का फैसला किया था. नक़वी शायद अपनी लड़ाई लिपस्टिक के खिलाफ लड़ रहे हैं.

अफसोस की बात है कि मुम्बई ने जो यातना झेली उसे एक तरह के ऐसे वर्ग युद्ध तक सिकोड़ दिया गया जिसमें बेचारे अभिजन से यह आशा की जा रही है कि वे यह कहते हुए अपना बचाव करें कि “नहीं, नहीं, इस हमले में जान देने वालों के लिए हमें भी कम अफसोस नहीं है.” अब तो बड़े हो जाइए. यह एक भयावह ट्रेजेडी थी. ट्रेजेडी को भी एक ऐसे चेहरे या छवि की ज़रूरत होती है जो सामूहिक वेदना को व्यक्त कर सके. और इसी कारण ताजमहल होटल ने उस छवि, उस प्रतीक का रूप धारण किया जो पूरे देश के उस त्रास, उस वेदना, उस पीड़ा को अभिव्यक्त करता है. आप क्यों उसे वर्ग में बांट रहे हैं?

क्या हमारे राजनीतिज्ञ पांच सितारा होटलों में सबसे बढ़िया कमरों (और वह भी बिना कोई कीमत अदा किए) की मांग नहीं करते? कम से कम हम शेष लोग उनके लिए भारी कीमत तो चुकाते हैं. क्या भारत के मैले-कुचैले कपड़ों और झोलेवाले बुद्धिजीवी जब भी और जहां भी मिल जाए मुफ्त की स्कॉच पीने से बाज आते हैं? साथियों, पहले अपनी दारू की कीमत अदा कीजिए, फिर दुनिया को बचाना.

कहा जाता है कि नारायण राणे के बेटे बेंटली कारों में घूमते हैं और आठ कमाण्डो उनकी रक्षा के लिए तैनात रहते हैं. उनका खर्चा कौन उठाता है? हम जैसे शोषक! जब हमें अपने देश की छवि का अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन करना होता है तो हम अपने अरबपतियों और बॉलीवुड स्टार्स को आगे कर देते हैं. ये ही वे अभिजन हैं जो संकट के समय राहत-पुनर्वास कार्यों के लिए दिल खोलकर दान देते हैं. मुझे तो नक़वी जैसों की बातों से उबकाई आती है. मैं जैसी हूं और जैसी नज़र आती हूं, उसके लिए अगर कोई मुझे ‘अपराधी’ ठहराने की कोशिश करता है तो मुझे घिन आती है.

माफ़ कीजिए नक़वी जी. मेरे होठों को देखें: लिपस्टिक ज़्यादा तो नहीं है? ज़्यादा गाढी और चमकदार? अगर आप चाहें, मुझ से थोड़ी-सी उधार ले सकते हैं.

◙◙◙

अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हिन्दुस्तान टाइम्स में शनिवार, 6 दिसम्बर को प्रकाशित आलेख ‘लिपस्टिक ऑन हिज़ कॉलर’ का मुक्त अनुवाद.









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Wednesday, September 24, 2008

जावेद अख्तर का एक अद्भुत भाषण

कभी-कभी ऐसा कुछ पढ़ने को मिल जाता है कि मन उसे औरों के साथ साझा करने को व्याकुल हो उठता है. पिछले दिनों मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ. इण्टरनेट पर जो बहुत सारी सामग्री दोस्तों की कृपा से मिलती है, उसमें हालांकि बहुत सारा कचरा होता है, कभी-कभी उस कचरे के ढेर में सोना, बल्कि उससे भी कीमती कुछ मिल जाता है. किसी ने मुझे जावेद अख्तर का एक भाषण भेजा. भाषण उन्होंने इण्डिया टुडे कॉंक्लेव में दिल्ली में कुछ बरस पहले दिया था. इस भाषण ने मुझ पर जादू का-सा असर किया. लगा, जो भी मिल जाए उसे पकड़ कर कहूं कि इस भाषण को पढो. और करीब-करीब यही किया भी. नेट पर जितनों को फॉरवर्ड कर सकता था, किया. जिन्हें डाक से भेज सकता था उन्हें इसकी फोटो कॉपी भेजी. मन फिर भी नहीं भरा. बिना किसी के कहे, इसका हिन्दी अनुवाद कर डाला. अपने मित्र, प्रख्यात कथाकार और प्रतिष्ठित पत्रिका 'अक्सर' के सम्पादक डॉ हेतु भारद्वाज को इसे पढने को दिया तो उन्होंने इसे अपनी पत्रिका में छापने का इरादा कर लिया. मुझे तो भला क्या ऐतराज़ होता. मैं तो चाहता ही यही था कि यह भाषण अधिकाधिक लोगों तक पहुंचे.

मन इस से भी नहीं भरा, तो अपने अनुवाद को इस ब्लॉग पर भी रख रहा हूं ताकि आप भी इसे पढ सकें.

तो प्रस्तुत है, जावेद अख्तर के भाषण का मेरे द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद:


मुझे पूरा विश्वास है देवियों और सज्जनों कि इस भव्य सभा में किसी को भी मेरी स्थिति से ईर्ष्या नहीं हो रही होगी. श्री श्री रविशंकर जैसे जादुई और दुर्जेय व्यक्तित्व के बाद बोलने के लिए खड़ा होना ठीक ऐसा ही है जैसे तेंदुलकर के चमचमाती सेंचुरी बना लेने के बाद किसी को खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़े. लेकिन किन्हीं कमज़ोर क्षणों में मैंने वादा कर लिया था.
कुछ बातें मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूं. आप कृपया मेरे नाम –जावेद अख्तर- से प्रभावित न हों. मैं कोई रहस्य उजागर नहीं कर रहा. मैं तो वह बात कह रहा हूं जो मैं अनेक बार कह चुका हूं, लिखकर, टी वी पर या सार्वजनिक रूप से बोलकर, कि मैं नास्तिक हूं. मेरी कोई धार्मिक आस्थाएं नहीं हैं. निश्चय ही मैं किसी खास किस्म की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता. खास किस्म की!
एक और बात! मैं यहां बैठे इस भद्र पुरुष की आलोचना करने, इनका विश्लेषण करने, या इन पर प्रहार करने खड़ा नहीं हुआ हूं. हमारे रिश्ते बहुत प्रीतिकर और शालीन हैं. मैंने हमेशा इन्हें अत्यधिक शिष्ट पाया है.
मैं तो एक विचार, एक मनोवृत्ति, एक मानसिकता की बात करना चाहता हूं, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं.

मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब राजीव ने इस सत्र की शुरुआत की, एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह पर आ गया हूं. इसलिए कि अगर हम कृष्ण, गौतम और कबीर, या विवेकानन्द के दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं तो मुझे कुछ भी नहीं कहना है. मैं इसी वक़्त बैठ जाता हूं. मैं यहां उस गौरवशाली अतीत पर बहस करने नहीं आया हूं जिस पर मेरे खयाल से हर हिन्दुस्तानी को, और उचित ही, गर्व है. मैं तो यहां एक सन्देहास्पद वर्तमान पर चर्चा करने आया हूं.

इण्डिया टुडे ने मुझे बुलाया है और मैं यहां आज की आध्यात्मिकता पर बात करने आया हूं. कृपया इस आध्यात्मिकता शब्द से भ्रमित न हों. एक ही नाम के दो ऐसे इंसान हो सकते हैं जो एक दूसरे से एकदम अलग हों. तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा. मुझे याद आता है कि जब तुलसी ने रामचरितमानस रची, उन्हें एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. भला कोई अवधी जैसी भाषा में ऐसी पवित्र पुस्तक कैसे लिख सकता है? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसम-किसम के कट्टरपंथियों में, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न हों, कितनी समानता होती है! 1798 में, आपके इसी शहर में, शाह अब्दुल क़ादिर नाम के एक भले मानुस ने पहली बार क़ुरान का तर्ज़ुमा उर्दू में किया. उस वक़्त के सारे उलेमाओं ने उनके खिलाफ एक फतवा ज़ारी कर डाला कि उन्होंने एक म्लेच्छ भाषा में इस पवित्र पुस्तक का अनुवाद करने की हिमाक़त कैसे की! तुलसी ने रामचरितमानस लिखी तो उनका बहिष्कार किया गया. मुझे उनकी एक चौपाई याद आती है :
”धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ जौलाहा कहौ कोऊ.

काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारन सोऊ..
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु कोऊ.
मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो एकू न दैबो को दोऊ..”


रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं.
मैं एक और उदाहरण देता हूं. शायद यह ज़्यादा स्पष्ट और उपयुक्त हो. सत्य की खोज में गौतम महलों से निकले और जंगलों में गए. लेकिन आज हम देखते हैं कि वर्तमान युग के गुरु जंगल से निकलते हैं और महलों में जाकर स्थापित हो जाते हैं. ये विपरीत दिशा में जा रहे हैं. इसलिए हम लोग एक ही प्रवाह में इनकी बात नहीं कर सकते. इसलिए, हमें उन नामों की आड़ नहीं लेनी चाहिए जो हर भारतीय के लिए प्रिय और आदरणीय हैं.

जब मुझे यहां आमंत्रित किया गया तो मैंने महसूस किया कि हां, मैं नास्तिक हूं और किसी भी हालत में बुद्धिपरक रहने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए मुझे बुलाया गया है. लेकिन, उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते. इसलिए, देवियों और सज्जनों मैं एकदम स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यहां उस आध्यात्मिकता के बारे में बात करने आया हूं जो दुनिया के सुपरमार्केट में बिकाऊ है. हथियार, ड्रग्स और आध्यात्मिकता ये ही तो हैं दुनिया के तीन सबसे बड़े धन्धे. लेकिन हथियार और ड्रग्स के मामले में तो आपको कुछ करना पड़ता है, कुछ देना पड़ता है. इसलिए वह अलग है. यहां तो आप कुछ देते भी नहीं.
इस सुपर मार्केट में आपको मिलता है इंस्टैण्ट निर्वाण, मोक्ष बाय मेल, आत्मानुभूति का क्रैश कोर्स – चार सरल पाठों में कॉस्मिक कांशियसनेस. इस सुपर मार्केट की चेनें सारी दुनिया में मौज़ूद हैं, जहां बेचैन आभिजात वर्गीय लोग आध्यात्मिक फास्ट फूड खरीद सकते हैं. मैं इसी आध्यात्मिकता की बात कर रहा हूं.
प्लेटो ने अपने डायलॉग्ज़ में कई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कही हैं. उनमें से एक यह है कि किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू करने से पहले शब्दों के अर्थ निश्चित कर लो. इसलिए, हम भी इस शब्द- ‘आध्यात्मिकता’ का अर्थ निश्चित कर लेने का प्रयत्न करते हैं. अगर इसका अभिप्राय मानव प्रजाति के प्रति ऐसे प्रेम से है जो सभी धर्मों, जतियों, पंथों, नस्लों के पार जाता है, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं उसे मानवता कहता हूं. अगर इसका अभिप्राय पेड़-पौधों, पहाड़ों, समुद्रों, नदियों और पशुओं के प्रति, यानि मानवेत्तर विश्व से प्रेम से है, तो भी मुझे क़तई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं इसे पर्यावरणीय चेतना कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का मतलब विवाह, अभिभावकत्व, ललित कलाओं, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रति हार्दिक सम्मान का नाम है? मुझे भला क्या असहमति हो सकती है श्रीमान? मैं इसे नागरिक ज़िम्मेदारी कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ अपने भीतर उतरकर स्वयं की ज़िन्दगी का अर्थ समझना है? इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मैं इसे आत्मान्वेषण या स्व-मूल्यांकन कहता हूं. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ योग है? पतंजलि की कृपा से, जिन्होंने हमें योग, यम, यतम, आसन, प्राणायाम के मानी समझाए, हम इसे किसी भी नाम से कर सकते हैं. अगर हम प्राणायाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है. मैं इसे हेल्थ केयर कहता हूं. फिजीकल फिटनेस कहता हूं.

तो अब मुद्दा सिर्फ अर्थ विज्ञान का है. अगर यही सब आध्यात्मिकता है तो फिर बहस किस बात पर है? जिन तमाम शब्दों का प्रयोग मैंने किया है वे अत्यधिक सम्मानित और पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए शब्द हैं. इनमें कुछ भी अमूर्त या अस्पष्ट नहीं है. तो फिर इस शब्द- आध्यात्मिकता- पर इतनी ज़िद क्यों? आखिर आध्यात्मिकता शब्द में ऐसा क्या है जो इन शब्दों में नहीं सिमट आया है? वो ऐसा आखिर है क्या?
पलटकर कोई मुझी से पूछ सकता है कि आपको इस शब्द से क्या परेशानी है? क्यों मैं इस शब्द को बदलने, त्यागने, छोड़ देने, बासी मान लेने का आग्रह कर रहा हूं. आखिर क्यों? मैं आपको बताता हूं कि मेरी आपत्ति किस बात पर है. अगर आध्यात्मिकता का अर्थ इन सबसे है तो फिर बहस की कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ और है जो मुझे परेशान करता है. शब्द कोष में आध्यात्मिकता शब्द, -स्पिरिचुअलिटी- की जड़ें आत्मा, स्पिरिट में हैं. उस काल में जब इंसान को यह भी पता नहीं था कि धरती गोल है या चपटी, तब उसने यह मान लिया था कि हमारा अस्तित्व दो चीज़ों के मेल से निर्मित है. शरीर और आत्मा. शरीर अस्थायी है. यह मरणशील है. लेकिन आत्मा, मैं कह सकता हूं, बायो डिग्रेडेबल है. आपके शरीर में लिवर है, हार्ट है, आंतें हैं, दिमाग है. लेकिन क्योंकि दिमाग शरीर का एक हिस्सा है और मन दिमाग के भीतर रहता है, वह घटिया है क्योंकि अंतत: शरीर के साथ दिमाग का भी मरना निश्चित है. लेकिन चिंता न करें, आप फिर भी नहीं मरेंगे, क्योंकि आप तो आत्मा हैं और क्योंकि आत्मा परम चेतस है, वह सदा रहेगी, और आपकी ज़िन्दगी में जो भी समस्याएं आती हैं वे इसलिए आती हैं कि आप अपने मन की बात सुनते हैं. अपने मन की बात सुनना बन्द कर दीजिए.. आत्मा की आवाज़ सुनिए – आत्मा जो कॉस्मिक सत्य को जानने वाली सर्वोच्च चेतना है. ठीक है. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”. और भी गुरु हैं जिन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होता है कि आप जूते बाहर नहीं छोड़ते. लेकिन दिमाग?.....नहीं.

अब, अगर आप अपना दिमाग ही बाहर छोड़ देते हैं तो फिर क्या होगा? आपको ज़रूरत होगी ऐसे गुरु की जो आपको चेतना के अगले मुकाम तक ले जाए. वह मुकाम जो आत्मा में कहीं अवस्थित है. वह सर्वोच्च चेतना तक पहुंच चुका है. उसे परम सत्य ज्ञात है. लेकिन क्या वह आपको बता सकता है? जी नहीं. वह आपको नहीं बता सकता. तो, अपना सत्य आप खुद ढूंढ सकेंगे?. जी नहीं. उसके लिए आपको गुरु की सहायता की ज़रूरत होगी. आपको तो उसकी ज़रूरत होगी लेकिन वह आपको इस बात की गारण्टी नहीं दे सकता कि आपको परम सत्य मिल ही जाएगा... और यह परम सत्य है क्या? कॉस्मिक सत्य क्या है? जिसका सम्बन्ध कॉस्मॉस यानि ब्रह्माण्ड से है? मुझे तो अब तक यह समझ में नहीं आया है. जैसे ही हम अपने सौर मण्डल से बाहर निकलते हैं, पहला नक्षत्र जो हमारे सामने आता है वह है अल्फा सेंचुरी, और वह हमसे केवल चार प्रकाश वर्ष दूर है. उससे मेरा क्या रिश्ता बनता है? क्यों बनता है?
तो, राजा ने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं जो सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखाई देते हैं. और राजा लगातार बड़ा होता जा रहा है. और ऐसे बुद्धिमानों की संख्या भी निरंतर बढती जा रही है जिन्हें राजा के ये कपड़े दिखाई दे रहे हैं और जो उनकी तारीफ करते हैं. मैं सोचता था कि आध्यात्मिकता दरअसल धार्मिक लोगों की दूसरी रक्षा पंक्ति है. जब वे पारम्परिक धर्म से लज्जित अनुभव करने लगते हैं, जब यह बहुत चालू लगने लगता है तो वे कॉस्मॉस या परम चेतना के छद्म की ओट ले लेते हैं. लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है. इसलिए कि पारम्परिक धर्म और आध्यात्मिकता के अनुयायीगण अलग-अलग हैं. आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.
आप देखेंगे कि इनके अनुयायी खासे खाते-पीते लोग है, समृद्ध वर्ग से हैं. ठीक है. गुरु को भी सत्ता मिलती है, ऊंचा कद और पद मिलता है, सम्पत्ति मिलती है..(जिसका अधिक महत्व नहीं है), शक्ति मिलती है और मिलती है अकूत सम्पदा. और भक्तों को क्या मिलता है? जब मैंने ध्यान से इन्हें देखा तो पाया कि इन भक्तों की भी अनेक श्रेणियां हैं. ये सभी एक किस्म के नहीं हैं. अनेक तरह के अनुयायी, अनेक तरह के भक्त. एक वह जो अमीर है, सफल है, ज़िन्दगी में खासा कामयाब है, पैसा कमा रहा है, सम्पदा बटोर रहा है. अब, क्योंकि उसके पास सब कुछ है, वह अपने पापों का शमन भी चाहता है. तो गुरु उससे कहता है कि “तुम जो भी कर रहे हो, वह निष्काम कर्म है. तुम तो बस एक भूमिका अदा कर रहे हो, यह सब माया है, तुम जो यह पैसा कमा रहे हो और सम्पत्ति अर्जित कर रहे हो, तुम इसमें भावनात्मक रूप से थोड़े ही संलग्न हो. तुम तो बस एक भूमिका निबाह रहे हो.. तुम मेरे पास आओ, क्योंकि तुम्हें शाश्वत सत्य की तलाश है. कोई बात नहीं कि तुम्हारे हाथ मैले हैं, तुम्हारा मन और आत्मा तो शुद्ध है”. और इस आदमी को अपने बारे में सब कुछ अच्छा लगने लगता है. सात दिन तक वह दुनिया का शोषण करता है और सातवें दिन के अंत में जब वह गुरु के चरणों में जाकर बैठता है तो महसूस करता है कि मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं.

लोगों का एक और वर्ग है. ये लोग भी धनी वर्ग से हैं. लेकिन ये पहले वर्ग की तरह कामयाब लोग नहीं हैं. आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहता है कि तुम नाकामयाब हो? तुम्हारे पास और भी तो बहुत कुछ है. तुम्हारे पास ज़िन्दगी का एक मक़सद है, तुम्हारे पास ऐसी संवेदना है जो तुम्हारे भाई के पास नहीं है. क्या हुआ जो वह खुद को कामयाब समझता है? वह कामयाब थोड़े ही है. तुम्हें पता है, यह दुनिया बड़ी क्रूर है. दुनिया बड़ी ईमानदारी से तुम्हें कहती है कि तुम्हें दस में से तीन नम्बर मिले हैं. दूसरे को तो सात मिले हैं. ठीक है. वे तुम्हारे साथ ऐसा ही सुलूक करेंगे.” तो इस तरह इसे करुणा मिलती है, सांत्वना मिलती है. यह एक दूसरी तरह का खेल है.
एक और वर्ग. मैं इस वर्ग के बारे में किसी अवमानना या श्रेष्ठता के भाव के साथ बात नहीं कर रहा. और न मेरे मन में इस वर्ग के प्रति कोई कटुता है, बल्कि अत्यधिक सहानुभूति है क्योंकि यह वर्ग आधुनिक युग के गुरु और आज की आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा अनुयायी है. यह है असंतुष्ट अमीर बीबियों का वर्ग.

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सारी निजता, सारी आकांक्षाएं, सारे सपने, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विवाह की वेदी पर कुर्बान कर दिया और बदले में पाया है एक उदासीन पति, जिसने ज़्यादा से ज़्यादा उसे क्या दिया? कुछ बच्चे! वह डूबा है अपने काम धन्धे में, या दूसरी औरतों में. इस औरत को तलाश है एक कन्धे की. इसे पता है कि यह एक अस्तित्ववादी असफलता है. आगे भी कोई उम्मीद नहीं है. उसकी ज़िन्दगी एक विराट शून्य है; एकदम खाली, सुविधाभरी लेकिन उद्देश्यहीन. दुखद किंतु सत्य!
और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकी सम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है. ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है.
आपमें से कोई मुझसे पूछ सकता है कि अगर इन्हें कुछ खुशी मिल रही है, कुछ शांति मिल रही है तो आपको क्या परेशानी है? मुझे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आती है. किसी संत की कही एक पुरानी कहानी है. एक भूखे कुत्ते को एक सूखी हड्डी मिल जाती है. वह उसी को चबाने की कोशिश करने लगता है और इसी कोशिश में अपनी जीभ काट बैठता है. जीभ से खून आने लगता है. कुत्ते को लगता है कि उसे हड्डी से ही यह प्राप्त हो रहा है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मैं नहीं चाहता कि ये समझदार लोग ऐसा बर्ताव करें, क्योंकि मैं इनका आदर करता हूं. मानसिक शांति या थोड़ा सुकून तो ड्रग्स या मदिरा से भी मिल जाता है लेकिन क्या वह आकांक्ष्य है? क्या आप उसकी हिमायत करेंगे? जवाब होगा, नहीं. ऐसी कोई भी मानसिक शांति जिसकी जड़ें तार्किक विचारों में न हो, खुद को धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं हो सकती. कोई भी शांति जो आपको सत्य से दूर ले जाए, एक भ्रम मात्र है, महज़ एक मृग तृष्णा है. मैं जानता हूं कि शांति की इस अनुभूति में एक सुरक्षा-बोध है, ठीक वैसा ही जैसी तीन पहियों की साइकिल में होता है. अगर आप यह साइकिल चलाएं, आप गिरेंगे नहीं. लेकिन बड़े हो गए लोग तीन पहियों की साइकिलें नहीं चलाया करते. वे दो पहियों वाली साइकिलें चलाते हैं, चाहे कभी गिर ही क्यों न जाएं. यही तो ज़िन्दगी है.

एक और वर्ग है. ठीक उसी तरह का जैसा गोल्फ क्लब जाने वालों का हुआ करता है. वहां जाने वाला हर व्यक्ति गोल्फ का शौकीन नहीं हुआ करता. ठीक उसी तरह हर वह इंसान जो आश्रम में नज़र आता है, आध्यात्मिक नहीं होता. एक ऐसे गुरु के, जिनका आश्रम दिल्ली से मात्र दो घण्टे की दूरी पर है, घनघोर भक्त एक फिल्म निर्माता ने एक बार मुझसे कहा था कि मुझे भी उनके गुरु के पास जाना चाहिए. वहां मुझे दिल्ली की हर बड़ी हस्ती के दीदार हो जाएंगे. सच तो यह है कि वे गुरु जी निर्माणाधीन दूसरे चन्द्रास्वामी हैं. तो, यह तो नेटवर्किंग के लिए एक मिलन बिन्दु है. ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध सम्मान है जो आध्यात्मिक या धार्मिक हैं और फिर भी भले इंसान हैं. इसकी वजह है. मैं मानता हूं कि किसी भी भाव या अनुभूति की तरह आपकी भी एक सीमा होती है. आप एक निश्चित दूरी तक ही देख सकते हैं. उससे आगे आप नहीं देख सकते. आप एक खास स्तर तक ही सुन सकते हैं, उससे परे की ध्वनि आपको सुनाई नहीं देगी. आप एक खास मुकाम तक ही शोक मना सकते हैं, दर्द हद से बढ़ता है तो खुद-ब-खुद दवा हो जाता है. एक खास बिन्दु तक आप प्रसन्न हो सकते हैं, उसके बाद वह प्रसन्नता भी प्रभावहीन हो जाती है. इसी तरह, मैं मानता हूं कि आपके भलेपन की भी एक निश्चित सीमा है. आप एक हद तक ही भले हो सकते हैं, उससे आगे नहीं. अब कल्पना कीजिए कि हम किसी औसत इंसान में इस भलमनसाहत की मात्रा दस इकाई मानते हैं. अब हर कोई जो मस्जिद में जाकर पांच वक़्त नमाज़ अदा कर रहा है वह इस दस में से पांच इकाई की भलमनसाहत रखता है, जो किसी मदिर में जाता है या गुरु के चरणों में बैठता है वह तीन इकाई भलमनसाहत रखता है. यह सारी भलमनसाहत निहायत गैर उत्पादक किस्म की है. मैं इबादतगाह में नहीं जाता, मैं प्रार्थना नहीं करता. अगर मैं किसी गुरु के पास, किसी मस्जिद या मंदिर या चर्च में नहीं जाता तो मैं अपने हिस्से की भलमनसाहत का क्या करता हूं? मुझे किसी की मदद करनी होगी, किसी भूखे को खाना खिलाना होगा, किसी को शरण देनी होगी. वे लोग जो अपने हिस्से की भलमनसाहत को पूजा-पाठ में, धर्म या आध्यात्म गुरुओं के मान-सम्मान में खर्च करने के बाद भी अगर कुछ भलमनसाहत बचाए रख पाते हैं, तो मैं उन्हें सलाम करता हूं.
आप मुझसे पूछ सकते हैं कि अगर धार्मिक लोगों के बारे में मेरे विचार इस तरह के हैं तो तो फिर मैं कृष्ण, कबीर या गौतम के प्रति इतना आदर भाव कैसे रखता हूं? आप ज़रूर पूछ सकते हैं. मैं बताता हूं कि क्यों मेरे मन में उनके प्रति आदर है. इन लोगों ने मानव सभ्यता को समृद्ध किया है. इनका जन्म इतिहास के अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. लेकिन एक बात इन सबमें समान थी. ये अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए. ये दलितों के लिए लड़े. चाहे वह रावण हो, कंस हो, कोई बड़ा धर्म गुरु हो या गांधी के समय में ब्रिटिश साम्राज्य या कबीर के वक़्त में फिरोज़ शाह तुग़लक का धर्मान्ध साम्राज्य हो, ये उसके विरुद्ध खड़े हुए.
और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान और सत्ता की स्वीकृति हो. लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं.
मान्यवर, यह काफी नहीं है कि अमीरों को यह सिखाया जाए कि वे सांस कैसे लें. यह तो अमीरों का शगल है. पाखण्डियों की नौटंकी है. यह तो एक दुष्टता पूर्ण छद्म है. और आप जानते हैं कि ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में इस छद्म के लिए एक खास शब्द है, और वह शब्द है: होक्स(HOAX). हिन्दी में इसे कहा जा सकता है, झांसे बाजी!.
धन्यवाद.
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इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिया गया व्याख्यान.

Tuesday, July 8, 2008

साहित्यिक पुरस्कारों पर विवाद

राजस्थान की साहित्यिक दुनिया में इन दिनों बडा उद्वेलन है. कारण है राजस्थान साहित्य अकादमी के तीन ताज़ा निर्णय. राजस्थान साहित्य अकादमी ने हाल ही में अपने दो पुरस्कार बन्द या समाप्त करने की घोषणा की है. एक है साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला प्रकाश जैन पुरस्कार, और दूसरा है अंतरप्रांतीय साहित्य बन्धुत्व अनुवाद पुरस्कार. कारण यह बताया गया कि विगत कुछ वर्षों से इन पुरस्कारों के लिए वांछित प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थीं. प्रांत के साहित्यकारों की नाराज़गी इन कारणों से है. एक तो यह कि ‘लहर’ के यशस्वी सम्पादक प्रकाश जैन के नाम पर दिया जा रहा पुरस्कार बन्द कर अकादमी ने अपनी तरह से उनकी स्मृति के साथ अपमानजनक व्यवहार किया है, और दूसरे यह कि साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद की महत्ता को नकारा गया है. और जहां तक अकादमी के इस विचार का प्रश्न है कि इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थी, तो पहले तो यह देखा जाना चाहिए कि क्या राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में तालाबन्दी हो गई है? न तो कोई साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और न अनुवाद किये जा रहे हैं? ऐसा नहीं है. तो फिर सवाल यह उठना चाहिए कि क्या कारण है कि लोग इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां ही नहीं भेजते? कहीं इस बात का सम्बन्ध अकादमी की प्रतिष्ठा के क्षरण से तो नहीं है? लेकिन इस बात पर भला अकादमी के कर्ता धर्ता तो क्यों विचार करने लगे? लोग लाख कहें कि अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ का स्तर बहुत गिर गया है, इतना कि अब स्तर बचा ही नहीं है, तो भी इस पत्रिका के सम्पादक को क्यों चिंता हो? आखिर आत्ममुग्धता भी कोई चीज़ होती है!
दूसरी बात जिसने लोगों को उद्वेलित किया है वह है जीवित लेखकों द्वारा अपने नाम पर पुरस्कार घोषित करवाना. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल ने अकादमी को कुछ राशि दी और अकादमी ने उनके नाम पर पुरस्कार देने की घोषणा कर दी. साहित्य की दुनिया में अपने नामों पर या अपने निकट के लोगों के नाम पर पुरस्कार का सिलसिला पुराना है, और इसमें कोई बडी आपत्ति भी नज़र नहीं आती. अगर मुझे लगे कि मेरे पास काफी पैसा है और उसका सदुपयोग मैं किसी को पुरस्कृत करके करना चाहता हूं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इस बात से भी कोई फर्क़ नहीं पडता कि यह ‘मैं’ कोई लेखक है या व्यवसायी या राजा या तस्कर. आखिर ऐसे अनेक लोगों के नाम पर शिक्षण संस्थान भी तो हैं! किसी को इनका पुरस्कार ग्रहण करना हो, करे; न करना हो अस्वीकार कर दे. गडबड तब होती है जब निजी और सार्वजनिक का गठबन्धन होता है. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल अपने स्तर पर पुरस्कार देते, किसी को आपत्ति नहीं होती. आपति की बात यह है कि जनता के पैसों से संचालित एक सार्वजनिक संस्थान राजस्थान साहित्य अकादमी ने ये निजी नाम वाले पुरस्कार देने की घोषणा की है. शायद जीवन के अन्य क्षेत्रों में आ रही पी पी पी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) की अवधारणा का यह साहित्य की दुनिया में प्रवेश है. लेकिन, अगर हम इसी तर्क को थोडा आगे तक ले जाएं तो इस व्यवस्था की विसंगति सामने आ जाएगी. मान लीजिए कोई लेखक, या कोई भी अन्य व्यक्ति, जिसके पास बहुत सारा धन है, यह कहे कि मैं पूरी राजस्थान साहित्य अकादमी को ही खरीदना चाहता हूं, या कि अपने नाम पर करवा लेना चाहता हूं तो क्या होगा? कल आप घसीटामल राजस्थान साहित्य अकादमी बना देंगे? हो सकता है कुछ लोगों को इस पर कोई ऐतराज़ न हो, लेकिन अन्य बहुतों को है. जीवन में कुछ चीज़ें तो साफ-सुथरी बची रहें, यह जिनकी आकांक्षा है, उन को ऐतराज़ है.
फिर एक बात और हुई. इसी अकादमी ने दो पुरस्कार और शुरू किए. डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार, और हनुमान प्रसाद पोद्दार के नाम पर राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार. जिन्हें स्मरण न हो उन्हें करा दें कि सिंघवी जी एक सुविख्यात न्यायविद थे और अधिक से अधिक हिन्दी सेवी थे, तथा पोद्दार जी सुपरिचित धार्मिक (साहित्यिक नहीं) पत्रिका ‘कल्याण’ के संस्थापक-संपादक थे. अकादमी प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर देश और दुनिया तक अपने पंख फैला रही है, यह अच्छा है. लेकिन अगर घर की उपेक्षा करके बाहर दिया जलाना चाहती है तो चिंत्य है. एक तरफ तो उसके पास राजस्थान में काम करने केलिए पर्याप्त संसाधन नहीं है, तभी तो लोगों के पैसों से पुरस्कार शुरू करने पड रहे हैं, और दूसरी तरफ वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार देना चाह रही है. यह कितना वाज़िब है? और फिर पुरस्कार किनके नाम पर? इनका साहित्यिक अवदान है ही नहीं, या बहुत अल्प है. और याद कीजिए कि जिनका है,(मेरा इशारा प्रकाश जैन की तरफ है) उनके नाम वाले पुरस्कार को साथ-साथ बन्द भी कर रही है.

तो, कोढ में खाज यह कि ये तीनों चीज़ें एक साथ हो गईं. पता नहीं यह आकस्मिक है या सुचिंतित, लेकिन एक तरफ तो प्रकाश जैन का नाम मिटाने की चेष्टा हुई और दूसरी तरफ दो लेखकों को जैसा-तैसा अमरत्व प्रदान करने की कोशिश हुई. और तीसरी तरफ दो साहित्येतर व्यक्तियों के नाम पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू कर उन्हें साहित्यिक अमरत्व प्रदान करने की चेष्टा की गई. तो इस कॉकटेल ने लोगों को और ज़्यादा परेशान किया है. प्रकाश जैन का साहित्यिक पत्रकारिता में जो अवदान है उसे कोई बे-पढा लिखा ही नकारेगा. उनके नाम से चल रहे पुरस्कार को बन्द करना निश्चय ही उनकी स्मृति का अपमान है. जिन लेखकों के नाम पर पुरस्कार शुरू किए जा रहे हैं, उनके महत्व पर कोई टिप्पणी गैर ज़रूरी है. इसलिए गैर ज़रूरी है ये पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व की वजह से नहीं, उनके धन-बल की वजह से शुरू किए जा रहे हैं, इसलिए टिपणी अनावश्यक होगी. इतना ज़रूर है कि इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की एक कहानी ‘चौथमल पुरस्कार’ बेसाख्ता याद आती है. और जहां तक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की बात है उसमें ये दोनों बातें जुड जाती हैं: जिनके नाम पर पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व पर प्रशन चिह्न और इन पुरस्कारों की ज़रूरत.

राजस्थान साहित्य अकादमी के इन निर्णयों ने एक बार फिर इस संस्थान की रीति-नीति को विमर्श के दायरे में ला खडा किया है. इस संस्थान की और तमाम सार्वजनिक संस्थानों की. जिन्होंने ऐसे निर्णय किए, स्वाभाविक है कि वे इन्हें डिफेण्ड करेंगे, कर रहे हैं. लेकिन बजाय किसी ज़िद के, बेहतर हो, इस तरह के मुद्दों पर खुले मन से विचार हो. आखिर इस तरह के फैसलों के परिणाम दूरगामी हुआ करते हैं. सार्वजनिक और निजी की लक्ष्मण रेखाएं तो तै की ही जानी चाहिए.







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