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Tuesday, June 4, 2019

किस्सा तस्वीरें बनाकर गांव को बचा लेने वाले रेनबो ग्रैण्डपा का


उस गांव को अब सारी दुनिया रेनबो विलेज यानि इंद्रधनुषी गांव के नाम से जानने लगी है. ज़्यादा बड़ा नहीं है यह गांव, लेकिन आप इसकी किसी भी गली में निकल जाएं, वहां की हर दीवार पर कोई न कोई आकृति अंकित है. कहीं किसी दीवार से शेर झांक रहे हैं तो किसी और दीवाल पर बिल्लियां चुहल करती नज़र आ रही हैं. कहीं बड़ी-बड़ी आंखों वाले पाण्डा खिलवाड़ कर रहे हैं  तो तो कहीं मोर नाच रहे हैं. किसी दरवाज़े से कोई वृद्ध पुरुष (यानि उसकी तस्वीर) झांक रहा होगा तो कहीं सामुराई नृत्य मुद्रा में होंगे. कहीं अंतरिक्ष यात्री हवा में तैरते नज़र आएंगे तो कहीं एक दूसरे की आंखों की गहराई में डूबे प्रेमीजन आपको लुभा रहे होंगे. और यह सब किया-धरा है उस बूढ़े बाबा का जिसे अब ग्रैण्डपा रेनबो यानि इंद्रधनुष वाले दादाजी के नाम से जाना जाता है. इस अजीबो ग़रीब गांव को देखने हर बरस पूरी दुनिया से कोई दसेक लाख लोग आते हैं. ‌

इन इंद्रधनुष वाले दादा जी का असल नाम है ह्युआंग युंग फू और अभी इनकी उम्र मात्र 86 बरस है.  अभी  भी, जब सारा गांव नींद के आगोश में बेसुध पड़ा होता है, बाबाजी अपना पेण्टिंग का साजो सामान लेकर गली में निकल पड़ते हैं और जो भी जगह खाली नज़र आती है उसे अपनी सतरंगी कलाकृति से सजा डालते हैं. इन बाबाजी की कथा बड़ी अजीब है. अजीब भी और प्रेरक भी.  इनका जन्म हुआ था चीन में, और चीन-जापान युद्ध तथा द्वितीय विश्व युद्ध में में सहभागिता करने के अलावा इन्होंने चीन के राष्ट्रवादी दल की गतिविधियों में भी हिस्सा लिया था. लेकिन जब इस दल को पराजय का सामना करना पड़ा तो चीन से भाग कर ताइवान आए बीस लाख लोगों में से एक ये ह्युआंग युंग फू भी थे. इन लोगों को बसाने के लिए ताइवान की तत्कालीन सरकार ने तुरत फुरत कुछ  काम चलाऊ गांव बना डाले, और आहिस्ता आहिस्ता ऐसा ही एक गांव हमारे ह्युआंग युंग फू का स्थायी निवास बन गया.

काल का पहिया घूमता रहा, उनके बहुत सारे साथी विभिन्न कारणों से गांव छोड़ कर अन्यत्र जा बसे और अनेक इस लोक को छोड़  कर उस लोक में चले गए, जहां से कोई वापस नहीं आता है. और आखिर में हुआ यह कि 1200 परिवारों वाले केंद्रीय ताइवान  के उस गांव में जिसे अब रेनबो विलेज के नाम से जाना जाता है, अकेले ह्युआंग युंग बच रहे. सरकार ने गांव की उस ज़मीन पर एक आधुनिक सर्व सुविधा सम्पन्न अपार्टमेण्ट कॉम्प्लेक्स बनाने की महत्वाकांक्षी योजना तैयार की और गांव में बचे इकलौते निवासी ह्युआंग युंग फू के सामने प्रस्ताव रखा कि वो सरकार से मुआवज़ा राशि लेकर कहीं और चला जाए. जो प्रस्ताव सरकार के लिए उसकी उदारता का परिचायक था वही इस बूढ़े के लिए हृदय विदारक और स्तब्ध कर देने वाला था. उसने तो अपनी पूरी ज़िंदगी में इस गांव और अपने दो कमरों के इस मामूली-से घर को ही अपना जाना-समझा था. भला अब इस पकी उम्र में वह कहां जाकर नया घर बसाये, और क्यों?  और उसकी हताशा अभिव्यक्त हुई उसकी कला में. जब कुछ न सूझा तो उसने अपने घर की दीवारों पर तस्वीरें बनाने में अपने को डुबो कर जैसे इस आसन्न खतरे की अनदेखी करने की चेष्टा  की. सबसे पहले उसने बनाई एक चिड़िया, फिर आई कुछ बिल्लियां और इस तरह उसने अपने कला कर्म में खुद को भुलावा देना ज़ारी रखा. अपने घर की दीवारों  को आकृतियों से सजा डालने के बाद उसने गांव के अन्य खाली पड़े घरों की दीवारों पर तस्वीरें बनाना शुरु कर दिया. संयोग यह बना कि जिन दिनों वह  यह काम करने लगा था, उन्हीं दिनों निकटवर्ती लिंग तुंग  विश्वविद्यालय का एक  छात्र उस गांव में आया और जब उसने ह्युआंग युंग फू की व्यथा-कथा जानी तो उसे लगा कि इस आदमी की तो मदद करनी चाहिए. उसने गांव में बनी पेण्टिंग्स की कुछ तस्वीरें खींची और उनको लेकर इस अनाम कलाकार के रंगों वगैरह के लिए पैसे जुटाने और गांव के मूल स्वरूप को बचाने का एक अभियान शुरु कर दिया.

बहुत जल्दी यह अभियान वायरल हो गया और यह मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया. कुछ ही माह में मेयर के पास अस्सी  हज़ार ई मेल पहुंच गई जिनमें  यह अनुरोध था कि गांव के मूल स्वरूप को नष्ट न किया जाए. अंतत: सरकार को भी  अपना इरादा बदलना पड़ा. गांव में बची हुई ग्यारह इमारतों, गलियों और आस पास के क्षेत्र को एक सार्वजनिक पार्क के रूप में संरक्षित कर लिया गया.  हालांकि अब उसकी सेहत ठीक  नहीं रहती  है फिर भी बूढ़ा ह्युआंग युंग फू हर सुबह अपना साजो सामान लेकर पेण्टिंग्स बनाने निकल पड़ता है. उसने अपने घर के बाहर एक डॉनेशन बॉक्स रख रखा है जिसमें लोग स्वेच्छा से पैसे डाल जाते हैं और उनसे वह रंग वगैरह खरीद लाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, January 9, 2018

आत्मीय रिश्तों के बीच क्या काम कोर्ट कचहरी का?

हिंदी की अनेक कहानियों  में वृद्धजन की उपेक्षा और बदहाली बयां हुई है. उषा प्रियम्वदा की वापसीमें गजाधर बाबू लम्बी नौकरी के दौरान घर से दूर रहने के बाद यह अभिलाषा लिए घर लौटते हैं कि अब उन्हें परिवार  का संग-साथ मयस्सर होगा, लेकिन वे पाते हैं कि घर और परिवार में अब उनके लिए कोई जगह नहीं है. भीष्म साहनी की कहानी चीफ़ की दावतमें मिस्टर शामनाथ और उनकी पत्नी के लिए बूढ़ी मां एक ऐसी अनावश्यक वस्तु है जिसे मेहमानों की नज़र से बचाने के लिए कमरे में बंद करना ज़रूरी होता है. लेकिन उसी मां की फुलकारी जब अतिथि चीफ़ साहब को भा जाती है तो मां के प्रति उनका बर्ताव तुरंत बदल जाता है. गौरतलब यह बात है कि इन कहानियों में वृद्धों के प्रति उपेक्षा तो है,  अमानवीयता अधिक नहीं है और हिंसा तो कतई नहीं. लेकिन तब यानि सत्तर के दशक से  अब तक आते-आते हालात बहुत बदल चुके हैं.

हाल में भीलवाड़ा से यह खबर आई कि वहां कलक्टर  के यहां होने वाली जन-सुनवाई में छह महीनों में 29 ऐसे मामले दर्ज़ हुए हैं जिनमें बुज़ुर्ग मां-बाप ने यह शिकायत  करते हुए कि उनके बेटे-बहू उनकी समुचित देखभाल नहीं करते हैं, कलक्टर से सहायता की याचना की है. बुज़ुर्गों  की पीड़ा यह है कि उनके वारिसों ने उनसे उनकी पूरी सम्पत्ति ले ली और जब वे भरण पोषण का खर्चा मांगते हैं तो वे उनके साथ मार-पीट करते हैं. वृद्ध मां-बापों  ने ये मामले वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 के तहत दर्ज़ करवाए हैं. बात केवल भीलवाड़ा की ही नहीं है. देश के हर शहर और गांव से आए दिन इस तरह की खबरें आती ही रहती हैं. लेकिन अभी कुछ दिन पहले गुजरात के राजकोट से तो और भी बुरी खबर आई है. इस खबर के अनुसार वहां एक बेटे ने अपनी बीमार वृद्धा मां को छत से फेंककर मार ही डाला. हुआ यह कि राजकोट में रहने वाली एक सेवानिवृत्त शिक्षिका जयश्रीबेन विनोदभाई नाथवानी की मृत्यु जिस बिल्डिंग में वे रहती थीं उसकी  छत से गिरने से हो गई. तफ्तीश के बाद पुलिस ने इसे आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया. लेकिन घटना के दो माह बाद पुलिस को एक गुमनाम चिट्ठी मिली और तब सोसाइटी में लगे सीसीटीवी के फुटेज खंगाले गए तो मामला कुछ और ही निकला. इस फुटेज में बेटा अपनी मां को लिफ्ट से छत की तरफ ले जाता दिखाई दिया. बेटे ने पहले तो इस मृत्यु में अपनी किसी भूमिका से इंकार किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उसने मां को छत से नीचे फेंकने की बात कबूल कर ली. उसने कहा कि वो मां की तीमारदारी से परेशान हो गया था. 

बूढे और असहाय मां-बाप की उपेक्षा और उनके साथ दुर्व्यवहार के मामले दुनिया के और देशों में भी सामने आ रहे हैं. हाल में ताइवान से  भी ऐसा ही एक मामला  सामने आया है. लेकिन यहां किस्सा कुछ और है. वहां की शीर्ष अदालत ने मां की इस गुहार पर कि उसने अपने बेटे को डेंटिस्ट बनाने पर भारी खर्च किया, अत: अब वो तब किये गए कॉण्ट्रेक्ट के अनुसार एक बड़ी रकम की हक़दार है, उस बेटे को आदेश दिया है कि वो अपनी मां को करीब छह करोड़ दस लाख रुपये दे. इस मां का कहना है कि उसने अपने दो बेटों को  डेंटिस्ट बनाने पर बहुत भारी रकम खर्च की, लेकिन उसे पहले ही यह आशंका हो गई इसलिए उसने तभी अपने बेटों से एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करवा लिए थे कि जब वे कमाने लगेंगे तो उन्हें अपनी कमाई का एक हिस्सा देंगे. गौरतलब है कि अपने पति से तलाकशुदा लुओ ने अकेले दम अपने बेटों को पाला-पोसा था. लुओ के बड़े बेटे ने तो कुछ धनराशि  देकर मां से समझौता कर लिया लेकिन छोटे बेटे चू ने यह कहते हुए मां की याचिका का विरोध किया कि जब उन्होंने यह कॉण्ट्रेक्ट साइन किया था तब उनकी उम्र बहुत कम थी, इस कारण अब इस कॉण्ट्रेक्ट को अवैध  मान लिया जाना चाहिए. अदालत ने बेटे की आपत्ति को अस्वीकार कर दिया है.

अब एक और मामले के बारे में जान लें. अपने ही  मुल्क के शहर इटावा का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है जिसमें यह बताया गया है कि अपने पिता के सख़्त रवैये से परेशान हो एक बच्चा सीधे थाने पहुंच गया है और पुलिसवालों से गुज़ारिश कर रहा है कि वे उसके पिता को सबक सिखाएं. इस प्रसंग में अपने मुल्क की बात मैंने जानबूझकर की है. इसलिए कि पश्चिम में तो बच्चों द्वारा अपने मां-बाप की शिकायत बहुत आम है. लेकिन अपने यहां यह बात  नई है. विचारणीय यह है कि क्या रिश्ते अब इस मुकाम तक आ पहुंचे हैं कि उन्हें सुलझाने के लिए कोर्ट कचहरी की मदद लेनी पड़ रही है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.