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Tuesday, March 5, 2019

यह अध्यापिका नामुमकिन को मुमकिन बना रही है!


कहा जाता है कि वर्तमान पीढ़ी के बच्चों में किताबें पढ़ने का शौक ढलान पर है. इसकी एक वजह यह बताई  जाती है कि आज उनके पास अपना वक़्त बिताने के अनेक और विशेष रूप से इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के विकल्प मौज़ूद हैं. यह यथार्थ हमारा ही नहीं सारी दुनिया का है. लेकिन इसी यथार्थ के साथ एक यथार्थ और भी है और वह यह कि लोग अपनी-अपनी तरह से अपने बाद वाली पीढ़ी को किताबों की तरफ आकर्षित करने के लिए प्रयत्नरत हैं. आज मैं ऐसे ही प्रयास में जुटी एक महिला की प्रेरक गाथा आपके साथ साझा कर रहा हूं.

अमरीका के दक्षिणी पूर्वी टेक्सास के होमर ड्राइव एलीमेण्ट्री स्कूल की बयालीस वर्षीया प्रिंसिपल डॉ बेलिण्डा जॉर्ज पिछले कुछ समय से अपने स्कूल के बच्चों को किताबों की तरफ खींचने के लिए एक अनूठा तरीका आज़मा रही हैं. वे करती यह है कि हर मंगलवार शाम को अपने लिंविंग रूम में अपने मोबाइल फोन के कैमरे के सामने बैठकर बच्चों की किसी किताब का वाचन करती हैं और इस वाचन का  वे फ़ेसबुक लाइव पर सजीव प्रसारण करती हैं. उनके स्कूल के फेसबुक पेज पर जाकर कोई भी उनके इस वाचन को देख-सुन सकता है. किताब या उसके अंश को पढ़ते हुए वे अपनी आवाज़ को पात्रानुसार बदलती रहती हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपनी तरफ से मनोरंजक टिप्पणियां भी करती चलती हैं. अगर मुमकिन होता है तो वे वाचन वाले अंश से सम्बद्ध वस्तुएं भी अपने प्रसारण में शामिल कर लेती हैं, मसलन अगर वे अंतरिक्ष यात्री से सम्बद्ध कोई अंश सुनाती हैं तो अंतरिक्ष यात्री की आकृति वाला कोई खिलौना भी दिखा देती हैं.   उनका यह प्रयोग इतना लोकप्रिय हो गया है कि उनके स्कूल के बच्चे न केवल बेसब्री से मंगलवार  की शाम का इंतज़ार करते हैं, उनमें से बहुत सारे अगले दिन स्कूल में आकर उनके इस वाचन पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं और यह भी कहते हैं कि भविष्य में वे उनसे किस किताब  का वाचन सुनना चाहेंगे. उनके वाचन से प्रभावित बच्चे यह भी पूछते हैं कि क्या वह किताब स्कूल की लाइब्रेरी में उपलब्ध है, और अगर नहीं है तो वो उन्हें कहां मिल सकती है.

डॉ बेलिण्डा  जॉर्ज का यह प्रयोग बमुश्क़िल एक बरस पुराना है. इसकी शुरुआत उन्होंने अपने स्कूल के 680 विद्यार्थियों के लिए की थी. लेकिन उनके कुछ वीडियो तो दो हज़ार से भी ज़्यादा लोगों ने देखे हैं. ऐसा इस कारण सम्भव हुआ है कि स्कूल के बच्चों  और उनके अभिभावकों से इसकी प्रशंसा सुन कर मीडिया वालों ने भी इस  पर ध्यान दिया है और उनके कारण अमरीका के अनेक शहरों के बच्चे और उनके अभिभावक न केवल इस लाइव प्रसारण को देखने-सुनने लगे हैं, वे अपनी प्रतिक्रियाएं भी पोस्ट करने लगे हैं. बेलिण्डा का कहना है कि उन्हें अपने विद्यार्थियों से बहुत प्यार है और वे घर और स्कूल के बीच रिश्ते मज़बूत करने की आकांक्षा  से यह काम करती हैं. वे एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहती हैं: “मैं जानती हूं कि अगर मैं उनसे स्कूल के बाहर नहीं जुड़ सकी तो फिर स्कूल के भीतर भी उनके नज़दीक  नहीं आ सकूंगी.” मुझे लगता है कि यह ऐसी बात है जिसे हर शिक्षक को गांठ में बांध लेना चाहिए.  

एक दिलचस्प  बात यह है कि बेलिण्डा प्राय: पाजामा पहन कर ये वाचन करती हैं. जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि अपने वाचन के आखिर में वे बच्चों को शुभ रात्रि भी कहती है, “और मैं चाहती हूं कि जो मैं कहती हूं वो करती हुई भी दिखाई दूं.” अपने वाचन के प्रारम्भ में वे उन बच्चों की हाज़िरी भी लेती हैं जिन्होंने उनके इस इस फ़ेसबुक पेज  के लिए साइन अप कर रखा है.  वे इस बात का पूरा ध्यान रखती हैं कि किसी भी बच्चे के नाम का उच्चारण ग़लत न हो जाए. सबसे ख़ास बात तो बेलिण्डा यह बताती हैं कि उनके 94 प्रतिशत विद्यार्थी समाज के निचले तबके से हैं और उनके इस प्रयोग का परिणाम यह हुआ है कि उनकी पढ़ने और समझने की क्षमता का बहुत तेज़ी से विकास हुआ है. अपने विद्यार्थियों के प्रति वे सदैव सकारात्मक रुख अपनाती हैं. वे इस कड़वी सच्चाई से भली भांति परिचित हैं कि उनके बहुत सारे विद्यार्थी बहुत समय तक अपनी पढ़ाई ज़ारी नहीं रख सकेंगे. कॉलेज तक तो शायद बहुत ही कम पहुंच पाएं. लेकिन वे कोशिश करती हैं कि इस बात को लेकर उनके विद्यार्थियों के मन में कोई  हताशा या कुण्ठा न पनपे. वे उन्हें एक ही सीख देती हैं: तुम जो भी करो, उसे सर्वोत्तम तरीके से करना. अगर तुम्हें गड्ढा भी खोदना हो तो ऐसे खोदना कि देखने वालों  के मुंह से बरबस ‘वाह’ निकल पड़े. बेलिण्डा जॉर्ज के इस प्रयास को जान मुझे बेसाख़्ता अपने दुष्यंत कुमार का यह शे’र याद आ गया है: कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारों.   
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 मार्च, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 6, 2018

कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिकों ने बना दिया शानदार पुस्तकालय

आपको अपने चण्डीगढ़ वाले नेकचंद का नाम और काम तो ज़रूर याद होगा. हां,  वही रॉक गार्डन के अनूठे सर्जक नेकचंद सैनी. हाल में मुझे उनकी याद आई सुदूर तुर्की की एक ख़बर पढ़ते हुए. फर्क़ बस इतना है कि वहां एक नहीं अनेक नेकचंदों ने मिलकर एक ऐसा करिश्मा कर दिखाया है कि जब आप भी उसके बारे में पढेंगे तो उन्हें शाबासी दिये बग़ैर नहीं रहेंगे. तुर्की के शहर अंकारा के कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिकों ने वहां एक शानदार पुस्तकालय बनाने का विचित्र किंतु सत्य कारनामा कर दिखाया है. इन श्रमिकों का काम यह था कि शहर भर में कचरा पात्रों से कचरा बीनें और उसे ले जाकर भराव क्षेत्र में डाल दें. यह करते हुए इनका ध्यान इस बात पर गया कि बहुत सारे कचरा पात्रों में, और अन्यत्र भी लोग अपनी पढ़ी हुई अथवा अनुपयोगी किताबें भी डाल देते हैं. इनकी ड्यूटी तो यह थी कि और तमाम कचरे-कबाड़ के साथ इन किताबों को भी इकट्ठा करें और भराव क्षेत्र में पटक आएं. लेकिन इनका मन नहीं माना. इन्हें लगा कि भला इतनी कीमती और ज़िंदगी को बदल डालने की क्षमता रखने वाली किताबों को ज़मींदोज़ क्यों हो जाने दें?  और तब इन्होंने सोचा कि क्यों न इन किताबों को इकट्ठा करके एक लाइब्रेरी ही बना दी जाए! बाद में एक कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिक सेरहत बेटेमूर ने कहा भी कि तमन्ना तो यह थी कि घर में मेरी अपनी लाइब्रेरी हो, लेकिन वैसा करना मुमकिन न हो सका और उसकी बजाय हमने यह सार्वजनिक पुस्तकालय बना डाला.

इन लोगों ने सोच विचार किया, अपनी बात को औरों के साथ भी साझा किया तो सबने इनके इरादे का समर्थन किया. लोग आगे बढ़कर भी इन्हें किताबें सौंपने लगे और इस तरह इनका पुस्तकालय बनाने का सपना मूर्त रूप लेने लगा. अब समस्या यह थी कि जो किताबें इकट्ठी हुई हैं उन्हें संजोया कहां जाए? किसी ने ध्यान दिलाया कि खुद इनके सफाई विभाग की एक इमारत बेकार पड़ी है. उसे देखा तो लगा कि अरे, यह तो पुस्तकालय के लिए आदर्श है. उसके लम्बे गलियारे और बड़े कमरे वाकई पुस्तकालय का आभास देते प्रतीत हुए. थोड़ी साफ़ सफाई और रंग रोगन के बाद वह इमारत काम चलाऊ बन गई तो उसमें इन्होंने अपने कई महीनों के श्रम से एकत्रित की गई करीब छह हज़ार किताबों को व्यवस्थित कर अपने विभाग के कर्मचारियों और उनके परिवार जन को सुलभ कराना शुरु कर दिया. लेकिन जैसे-जैसे किताबों का संग्रह बढ़ने लगा, इस पुस्तकालय की ख्याति भी फैलने लगी और शहर वासियों की मांग का सम्मान करते हुए इन लोगों ने अपने पुस्तकालय की सेवाएं विद्यार्थियों  और शहर भर के पुस्तक प्रेमियों को भी सुलभ कराना शुरू कर दिया. नगर के महापौर का भी पूरा समर्थन  इन्हें मिला और अब यह पुस्तकालय एक ऐसा स्थान बन चुका है जिस पर पूरे नगर को गर्व है.

पुस्तकालय अनेक खण्डों में विभक्त है. इसका बच्चों वाला विभाग अपने कॉमिक्स के संग्रह के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय है. वैज्ञानिक शोध विषयक  पुस्तकें भी यहां खूब हैं. पुस्तकालय के कुल सत्रह खण्डों में उपन्यास, अर्थशास्त्र की पाठ्य पुस्तकें, थ्रिलर्स और बाल साहित्य शामिल हैं. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, अंग्रेज़ी और फ्रेंच सहित अनेक विदेशी भाषाओं की पुस्तकों के अपने संग्रह के कारण यह पुस्तकालय शहर में आने वाले  पर्यटकों तक के आकर्षण का केंद्र बन चुका है. तुर्की के श्रेष्ठतम लेखकों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय ख़्याति के अनेक लेखकों का साहित्य यहां सुलभ है. जैसे-जैसे पुस्तकालय की ख्याति फैलती जा रही है, इसकी सेवाओं का भी विस्तार हो रहा है. चौबीसों घण्टे खुला रहने वाला यह पुस्तकालय अब शहर की  शिक्षण संस्थाओं तक को किताबें उधार देने की स्थिति में आ गया है और शहर की जेलों में भी ये लोग अपनी किताबें भेजने लगे हैं. आस-पास के गांवों के स्कूली शिक्षक भी इस पुस्तकालय से किताबें मंगवाने  लगे हैं.

बहुत स्वाभाविक है कि पुस्तकालय के अपने इस सृजन से वे तमाम लोग प्रसन्न हैं जिन्होंने इसे मूर्त  रूप दिया है. खुशी की बात यह है कि उन्होंने जो किया है वे उतने भर से संतुष्ट नहीं हैं और अब और बड़े सपने देखने लगे हैं. पुस्तकालय के साथ वे संगीत सभा और नाट्य प्रदर्शन जैसी गतिविधियों को जोड़कर अपने पाठकों की संख्या में वृद्धि तो कर ही रहे हैं, उनकी योजना यह भी है कि वे एक चल पुस्तकालय भी बना लें जो आस-पास के गांवों के स्कूलों तक जाकर अपनी सेवाएं दे. इस योजना के मूर्त्त रूप लेने में कोई संदेह नहीं है क्योंकि इस पुस्तकालय की ख्याति अब देश की सीमाओं को लांघ कर दुनिया भर तक पहुंच चुकी है और हर तरफ से सहयोग के प्रस्ताव आने लगे हैं.


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जयपुर से प्रकाशित कोलप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 3, 2015

किताबें अब झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से

गुलज़ार साहब की एक बहुत मशहूर नज़्म है – किताबें झांकती हैं बन्द अलमारी के शीशों से/ बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं.  किताबों के परिदृश्य में पिछले चन्द  बरसों में जो बदलाव आया है उसे देखते हुए मुझे यह नज़्म पुरानी लगने लगी है. बहुत पुरानी बात नहीं है जब मेरी भाषा हिन्दी में सामान्यत: किताब का एक संस्करण ग्यारह सौ प्रतियों का होता था. तब जो मुद्रण तकनीक प्रचलित थी उसके लिहाज़ से भी शायद इतनी प्रतियों से कम छापना व्यावहारिक नहीं होता था. बहुत सारी किताबों की, जिनमें पाठ्य पुस्तकें और लुगदी साहित्य का ज़िक्र ख़ास तौर पर किया जा सकता है, इससे काफी ज़्यादा प्रतियां भी छपती  थीं. लोकप्रिय उपन्यासकार गुलशन नन्दा के एक उपन्यास ‘झील के उस पार’  की पांच लाख प्रतियों के छपने और बिकने की चर्चा काफी समय तक होती रही थी. और बात ऐसी भी नहीं है  कि सिर्फ लुगदी साहित्य ही बिकता रहा है. हिन्दी में ही तुलसी और प्रेमचन्द की बात तो छोड़िये, धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’, भगवतीचरण वर्मा का ‘चित्रलेखा’, श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’, शिवानी और नरेन्द्र कोहली के अनेक उपन्यास, दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल  संग्रह ‘साये में धूप’  उन बहुत सारी किताबों में से कुछ हैं जो खूब बिकी हैं और अब भी बिकती हैं. संस्करण, और पुनर्मुद्रण की इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले इस बात का ज़िक्र भी करता चलूं कि विदेशी हैरी पॉटर वगैरह को तो छोड़िये, हमारे अपने मुल्क के लोकप्रिय कथाकार चेतन भगत के हालिया प्रकाशित उपन्यास ‘हाफ़ गर्लफ्रैण्ड’ की बीस लाख प्रतियों के पहली खेप में और एक  साल में इससे दस लाख और प्रतियों के बिकने की चर्चाएं खूब हो चुकी हैं. और यह बात तब जब हम यह कहते नहीं थकते हैं कि अंग्रेज़ी इस देश के मात्र दो प्रतिशत की भाषा है. 

लेकिन इन्हीं तमाम बातों  के बरक्स यह एक त्रासद सच्चाई है कि हिन्दी की आम किताब  का संस्करण अब ग्यारह सौ प्रतियों से सिकुड़ते-सिकुड़ते तीन सौ, बल्कि उससे भी कम तक आन पहुंचा है. और यह कहते हुए मैं उस नए प्रिण्ट ऑन डिमाण्ड नामक फिनोमिना की बात नहीं कर रहा हूं जिसमें संख्या की कोई बात रह ही नहीं गई है:  अगर आपको एक प्रति चाहिये तो एक छाप कर दे दी जाती है. बेशक यह बात मुमकिन हुई  है नई मुद्रण तकनीकी की वजह से जहां पुस्तक के पाठ को कम्पोज़ करके कम्प्यूटर में सेव करना और यथावश्यकता प्रतियां मुद्रित कर लेना सम्भव हो गया है. अब भला क्यों कोई प्रकाशक ज़्यादा प्रतियां छापने में अपने कागज़, लागत तथा गोदाम की स्पेस को ब्लॉक करे? और इसी स्थिति ने हिन्दी में एक नई प्रजाति को पनपाया है. उस नई प्रजाति ने अपना नाम तो अभी पुराने वाला  ही रखा है – प्रकाशक, लेकिन असल में काम वह मुद्रक का करता है. जैसे पहले आप किसी प्रिण्टर के पास जाकर अपनी बिल बुक, शादी या मौत मरण का कार्ड छपवा लाते थे, वैसे ही अब इस नए प्रकाशक के पास जायें, और पैसे देकर अपने लिखे को छपवा लें. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप कैसा, क्या और क्यों छपवा रहे हैं? आपने पैसे दिये, उसने छाप दिया. बेचने की परवाह भी उसे नहीं करनी है. इसलिए वो ज़्यादा प्रतियां भी नहीं छापता  है. उतनी ही  छापता  है जितनी छापने  के आपने पैसे दिये हैं. दस-बीस प्रतियां अपने पास रखकर शेष सारी वो आपको दे देता है. और आपके पास भी  उन्हें बेचने का कोई तंत्र तो है नहीं, सो कुछ प्रतियां आप दोस्तों, रिश्तेदारों को सप्रेम  भेंट करते हैं, कुछ माननीय समीक्षकों को सादर ‘समीक्षार्थ’ प्रेषित करते हैं और बस हो जाते हैं साहिबे दीवान! अरे, यह सब कहते हुए मैं एक ख़ास बात तो भूल ही गया. किताब छपवा लेने के बाद दो ज़रूरी काम आप सबसे पहले करते हैं. पहला तो यह कि फेसबुक और ट्विट्टर जैसे सोशल मीडिया पर उस किताब की खबर प्रसारित  कर ‘सबको मालूम है सबको खबर हो गई’ का माहौल बनाते हैं और फिर उसके लोकार्पण का जुगाड़ बिठाते हैं. लोकार्पण चाहे जैसा और चाहे जिस स्तर का हो, उसकी सचित्र खबर भी इन माध्यमों पर एकाधिक बार प्रसारित करना आप नहीं भूलते. अनेक लोकार्पण तो इतने हास्यास्पद होते हैं कि कुछ पूछिये मत. लेकिन वह ज़िक्र फिर कभी.  आपकी किताब चाहे किसी लाइब्रेरी और किसी पाठक तक न भी पहुंचे, फेसबुक आदि की दीवार से उसकी छवि ज़रूर नुमायां होती रहती है, और इसीलिए मुझे लगता है कि मैं गुलज़ार साहब की इस  नज़्म को संशोधित करके कहूं – किताबें झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 मार्च, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.        

Tuesday, February 18, 2014

किताबें और हम

किताबों के साथ हमारा रिश्ता बहुत अजीब है. चाहते हैं कि हमारे चारों तरफ किताबें ही किताबें हों. बस उन्हें छूते, सूंघते, देखते और पढ़ते हुए ज़िंदगी कट जाए! लेकिन जब किताबें इकट्ठी हो जाती हैं तो दूसरी तरह की बेचैनी घेरने लगती है! अरे! वक़्त इतना कम है और कितना कुछ पढ़ने को शेष है! मुझ जैसे मध्यवर्गीय लोगों का एक संकट और है और वह यह कि किताबें इकट्ठी  करने वाले मन का मकान की सीमित जगह से कोई तालमेल नहीं बैठ पाता है. और अगर पत्नी सुरुचि सम्पन्न हो तो यह कष्ट और कि किताबें उनकी आंखों में रड़कती हैं. ख़ास तौर पर पुरानी और जीर्ण-शीर्ण किताबें! मेरी पीढ़ी के लोगों की एक और बहुत बड़ी चिंता यह भी है कि हमारे बाद इन किताबों का क्या होगा? अपने अनेक दिवंगत आत्मीय साहित्य रसिकों के परिवार जन को उनकी बड़े जतन से संजोई लाइब्रेरियों के लिए फिक्र करते मैंने देखा है.

बहरहाल, आज तो मुझे किताबों से जुड़ी एक मज़ेदार घटना की याद आ रही है, उसी को आपसे साझा कर रहा  हूं. इस घटना को साझा करने से पहले यह कह दूं कि जिन मित्र से इस घटना का ताल्लुक है, उनके प्रति अवज्ञा या अवमानना का लेश मात्र भी भाव मेरे मन में नहीं है और उनकी मज़बूरी को अच्छी तरह समझता हूं.  महज़ अपने पाठकों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए इसे साझा कर रहा  हूं.

दिवाली से पहले के दिन थे. ये दिन कबाड़ियों के लिए ख़ास होते हैं. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, अनुपयोगी सामान निकालते हैं और इस वजह से कबाड़ी लोगों का कारोबार उन दिनों अपने यौवन पर होता है. वो एक छोटा-सा कस्बा था जहां हम रहते थे. कुछेक कबाड़ी जो ठेलों पर अपना धंधा चलाते थे, मुझे भी जानते थे. जानने की वजह यह थी जब भी उनके ठेलों पर किताबें नज़र आतीं, मैं उन्हें रोकता और उनमें से अपने काम की किताबें छांट कर बिना मोलभाव किए खरीद लिया करता था. वे कबाड़ी कोई खास पढ़े लिखे तो थे नहीं, पर उन्हें यह ज़रूर समझ में आता था  कि  यह आदमी वो किताबें खरीदता है जिन्हें कोई दूसरा छूता तक नहीं है. मुझे इन कबाड़ियों से कई दफा बेशकीमती साहित्यिक सामग्री मिल चुकी थी, इसलिए मैं भी उनकी  तलाश में रहता था.

तो उस दिन जब मैं अपने कॉलेज जा रहा था, ऐसे ही एक परिचित कबाड़ी ने मुझे आवाज़ दी, और कहा कि साहब आज तो आपके काम का बहुत सारा माल मेरे पास आया है. मैं रुका, उसने अपना ठेला सड़क के किनारे खड़ा किया और किताबों के एक बड़े ढेर की तरफ इशारा कर मुझे अपने पसंद की किताबें चुन लेने को आमंत्रित किया. वाकई वे उम्दा साहित्यिक किताबें थीं. कविताओं की, कहानियों  की, लेखों की, आलोचना की. शीर्षक देख कर एक किताब हाथ में ली, उसे खोला तो देखा भीतरी पन्ने पर लिखा था – आदरणीय अमुक जी को सादर भेंट! और नीचे लेखक के हस्ताक्षर थे. मेरी दिलचस्पी जागी. दूसरी किताब देखी, वही बात. तीसरी, चौथी, पांचवीं....यानि ये सारी किताबें मेरे मित्र और सहकर्मी के यहां से आई थीं. बात मुझे समझ में आ गई. रचनाकार, विशेष रूप से युवा और उभरते हुए रचनाकार अपनी  नव प्रकाशित किताबें  सम्मति और  आशीर्वाद के लिए अपने वरिष्ठ रचनाकार सथियों को भेंट करते हैं. मेरे उन  मित्र को भी स्वभावत: ऐसी बहुत सारी किताबें  भेंट  में प्राप्त हुई थीं, और उन्होंने दिवाली की सफाई के दौरान उन किताबों से इस तरह निज़ात पाई थी. जैसा मैंने कहा, हम मध्यवर्गीय  लोगों के घरों में इतनी जगह नहीं होती कि जितनी किताबें हम चाहते हैं उन सबको सहेज कर रख सकें, ऐसे में किताबों की छंटनी एक मज़बूरी के रूप में सामने आती है.

ख़ैर! मुझे मज़ाक सूझा. दोस्तों में यह आम बात है. मैंने कोई बीसेक किताबें उस ठेले से खरीदीं. तब वो पचास पैसे में एक किताब देता था. दस रुपये बहुत ज़्यादा नहीं थे मज़ाक के नाम पर. किताबें घर लाया, और जहां-जहां उनके लेखकों ने मेरे परम मित्र का नाम लिखकर अपने दस्तखत कर रखे थे, उनके ठीक नीचे लिखा, आदरणीय अमुक जी को पुन: सादर भेंट! और अपने हस्ताक्षर कर दिए. शाम को उनके घर गया, और पूरी गम्भीरता और विनम्रता से उनसे कहा कि आपके लिए एक छोटी-सी भेंट लेकर हाज़िर हुआ हूं. और यह कहकर उन किताबों का ठीक से बनाया हुआ पैकेट उनके सामने रख दिया. उन्होंने बड़ी उत्सुकता से उस बण्डल को खोला......

और फिर?

बस! फिर क्या हुआ यह मत पूछिये!

इतना कह दूं कि बरसों बीत जाने के बाद अब भी हमारी दोस्ती उतनी ही प्रगाढ़ है! 

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लोकप्रिय दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में 18 फरवरी, 2014 को सप्रेम मिली किताबें कबाड़ी को चढ़ी भेंट शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख.