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Tuesday, January 17, 2017

उनके भीतर छिपी हुई थी दुर्वासा और परशुराम की टू-इन-वन आत्मा

हाल में राजस्थान की राजधानी में आयोजित हुए रुक्टा (राजस्थान यूनिवर्सिटी एण्ड कॉलेज टीचर्स असोसिएशन) राष्ट्रीय के अधिवेशन में प्रांत की मुख्य मंत्री जी ने कॉलेज शिक्षकों को भी विश्वविद्यालय शिक्षकों के समान पदनाम देने की घोषणा कर लम्बे समय से की जा रही मांग को पूरा कर दिया. विश्वविद्यालय में जहां असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर, असोसिएट प्रोफ़ेसर और प्रोफ़ेसर पदनाम होते हैं वहीं कॉलेज शिक्षकों के लिए मात्र एक पदनाम हुआ करता था – लेक्चरर यानि व्याख्याता. जब मैंने अपनी नौकरी की शुरुआत की तब राज्य में कॉलेज शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय शिक्षकों से भिन्न और उनसे न्यून वेतनमान हुआ करते थे. फिर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की  अनुशंसानुसार हमें भी उनके समान वेतनमान तो मिलने लग गए लेकिन पदनाम उनसे भिन्न बना रहा, और यह बात सबको चुभती भी रही. सरकार के दरवाज़े पर बार-बार गुहार लगाई जाती  रही, और सरकार भी सैद्धांतिक रूप से सहमत होती  रही. लेकिन बात उससे आगे नहीं बढ़ सकी. कोई चार दशकों की लम्बी प्रतीक्षा के बाद मुख्य मंत्री जी की घोषणा से यह आस बंधी है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों के बीच का यह पदनाम गत भेद-भाव अब ख़त्म हो जाएगा.

यह तो हुई औपचारिक और आधिकारिक बात! लेकिन इसी के साथ एक मज़ेदार हक़ीक़त यह भी है कि हममें से बहुत सारे कॉलेज शिक्षक अपनी नौकरी के पहले दिन से ही स्वयं को प्रोफ़ेसर कहते और कहलाते रहे हैं. इतना ही नहीं, राज्य और केंद्र के अब भूतपूर्व हो चुके एक मंत्री जी और राज्य के एक वर्तमान मंत्री जी को सरकारी लिखत-पढ़त में भी  प्रोफ़ेसर ही सम्बोधित किया जाता है, भले ही उन्होंने किसी विश्वविद्यालय में कभी नहीं पढ़ाया. एक समय था जब शिक्षक संगठन  ने भी अपने सदस्यों को सलाह दी थी कि सरकार की घोषणा का इंतज़ार किये बिना वे खुद को विश्वविद्यालय वाले पदनामों से विभूषित कर लें. इन तमाम बातों का ज़िक्र करते हुए मुझे अनायास अपनी नौकरी के पहले कुछ  महीनों में मिले एक ऐसे अनूठे व्यक्तित्व की याद आ गई है जिन्हें विस्मृत कर पाना नामुमकिन है. वे संस्कृत के व्याख्याता थे और हम लोगों की तुलना में ख़ासे वरिष्ठ थे. कोढ़ में खाज यह कि वे पी-एच.डी भी थे. वे हम सबको प्रो. साहब कहकर सम्बोधित करते थे और अपनी वरिष्ठता के रुतबे का पूरा प्रयोग करते हुए यह अपेक्षा करते थे कि हम सब भी एक दूसरे को प्रो. साहब कहकर ही सम्बोधित करें. अगर हममें से कोई किसी को नाम लेकर सम्बोधित कर देता या अपना परिचय व्याख्याता (जो हमारा वैध पदनाम था) के रूप में दे देता तो उनके कोप का भाजन बने बगैर नहीं रहता. उनके कोप की बात एक और चर्चा के बिना अधूरी रहेगी. वे पी-एच.डी. थे और हमेशा चाहते थे कि हम उनको न तो उनके जाति सूचक नाम से सम्बोधित करें, प्रथम नाम से सम्बोधन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था, न प्रोफ़ेसर साहब कह कर सम्बोधित करें. उन्हें केवल और केवल डॉ साहब सम्बोधन स्वीकार्य था. कई बार असावधानीवश इससे इतर सम्बोधन कर उनके कोप भाजन  बन चुके हम लोगों को धीरे-धीरे इसमें एक दुष्टतापूर्ण आनंद मिलने लगा था और आए दिन हममें से कोई न कोई उन्हें उनके जाति सूचक उपनाम से सम्बोधित कर देता. इधर हममें से किसी के भी मुंह से यह सम्बोधन निकलता और उधर उनके भीतर बिराजमान दुर्वासा और परशुराम की  टू-इन-वन आत्मा हुंकार भर कर उठ खड़ी होती. अब यह बात तो याद नहीं कि अपने विषय में उनकी पैठ कितनी गहरी थी, लेकिन यह बात अच्छी तरह याद है कि हिंदी और अंग्रेज़ी इन दोनों भाषाओं में उनकी लेखन क्षमता अद्भुत थी. उनके भीतर अवस्थित दुर्वासा और परशुराम उनकी कलम की नोक से कागज़ों पर उतरते और पापियों-अपराधियों को क्षत-विक्षत करने में  जुट जाते. उनके सारे प्रहार लिखित रूप में होते. अपना सारा गुस्सा वे पत्रों में व्यक्त करते. जिस किसी ने भी उन्हें डॉ साहब से भिन्न सम्बोधन से अपमानित किया होता उसके  नाम वे पोस्टकार्ड लिखते और जितनी अप्रिय बातें वे लिख सकते उसमें लिख डालते. ज़ाहिर है कि अगले दिन वो पोस्टकार्ड कॉलेज के स्टाफ रूम में रखे डाक के डिब्बे में प्रकट  होता और  जिसके नाम वह प्रेषित किया गया होता उससे पहले अन्य सारे लोग उसे पढ़ चुके होते. यही तो वे डॉ साहब चाहते भी थे. लेकिन ख़ास बात यह कि जितनी जल्दी वे नाराज़ होते उतनी ही जल्दी प्रसन्न भी हो जाते. नाराज़ करने वाला विनम्रतापूर्वक उनसे क्षमा मांगता, उनकी विद्वत्ता की प्रशंसा करता और तीन मिनिट की वार्ता में पाँच दफ़ा उन्हें डॉ साहब कहकर सम्बोधित करता तो वे पिघलने में भी  देर नहीं करते. लेकिन क्योंकि हम लोगों के लिए तो यह एक कौतुक मात्र था, कुछ ही देर बाद हममें से कोई और उन्हें डॉ साहब से इतर कोई और सम्बोधन देकर फिर उनके दुर्वासा-सह-परशुराम को काम पर लगा देता. पता नहीं अब वे डॉ साहब कहां हैं!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 17 जनवरी, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.


Tuesday, November 26, 2013

चुनावी ड्यूटियों के मज़ेदार अनुभव

राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और आम जनता के लिए चुनाव का चाहे जो मतलब हो, अधिकांश  सरकारी कर्मचारियों के लिए तो चुनावी ड्यूटी एक बहुत बड़े संकट का पर्याय होती है. तीन-चार दिन घर से बाहर, किसी अजनबी और सुविधा विहीन जगह पर रहना और एक ऐसे महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वहन करना जिसमें किसी छोटी  से छोटी चूक की बहुत बड़ी सज़ा अवश्यम्भावी हो,  भला किसको रास आ सकता है? शायद यही वजह है कि हर चुनाव के समय सरकारी कर्मचारी इन ड्यूटियों से मुक्ति पाने के लिए तमाम तरह के जुगाड़ करते देखे जाते हैं. लेकिन फिर भी ड्यूटी तो करनी ही  होती  है, लोग करते भी हैं, और उसके मज़े भी लेते हैं.

अपनी तीन दशक लम्बी  नौकरी में मैंने नगरपालिका से लगाकर लोक सभा तक के तमाम चुनाव करवाए हैं. कॉलेज के चुनाव तो खैर करवाए ही हैं और अब बिना किसी संकोच के कह सकता हूं कि जिसने कॉलेज के चुनाव करवा लिए वो कहीं के भी चुनाव को दांये-बांये हाथ का नहीं, हाथ की एक उँगली का खेल समझ सकता है. हमने भी इसी भाव से तमाम चुनाव करवाए और खूब मज़े लेकर करवाए. अब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो याद आता है कि हमें चुनाव का सबसे रोचक हिस्सा उसका प्रशिक्षण लगता था. प्रशिक्षण का दायित्व आम तौर पर प्रशासन वाले लोगों का होता था और हम कॉलेज शिक्षा  वालों और प्रशासन के बीच छत्तीस  का रिश्ता  जग जाहिर है. यह प्रशिक्षण कार्यक्रम हमें उन लोगों की खिंचाई का अवसर देता था.

पढ़ाने लिखाने वालों में किताबों को चाट जाने का शौक तो होता ही है. हमारे कुछ साथी भी चुनाव की मार्ग दर्शिका को लगभग घोट कर पी जाया करते थे. और उसके बाद वे प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षण देने वालों से वो वो बारीक सवाल करते कि  उनसे जवाब देने नहीं बनता. एक बार हुआ यह कि जो सज्जन प्रशिक्षण दे रहे थे, उनके पास हमारी शंका का कोई तर्कपूर्ण समाधान नहीं था. लेकिन वे अपनी कमी तो भला कैसे स्वीकार करते! तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ हमारे प्रश्नकर्ता साथी को कहा कि अगर वैसी स्थिति आए तो आपको अपना कॉमन सेंस इस्तेमाल करना चाहिए. उनका उत्तर अपनी जगह सही था,  और हम सब करते भी यही हैं. लेकिन यहां तो बात मज़े लेने की थी ना! सवाल करने वाले हमारे साथी अपनी जगह से उठे, दो कदम आगे बढ़े, इधर-उधर देखा और बोले, “वो तो हम कर ही लेंगे, लेकिन आप तो यह बताइये कि इस बारे में ऑफिशियल प्रावधान क्या है?” और जैसे ही उन्होंने अपनी बात पूरी की, हममें से भी बहुत सारे लोग उनकी हां में हां मिलाते हुए उठ खड़े हुए. कलक्टर महोदय ने जैसे-तैसे बात को सम्भाल कर मामले का पटाक्षेप किया. 

अपनी नौकरी के उत्तर काल में जब अपनी वरिष्ठता के चलते मुझे ज़ोनल मजिस्ट्रेट के रूप में चुनाव ड्यूटी करने का मौका मिलने लगा  तो एक साथी ने एक मज़ेदार पाठ पढ़ाया. ड्यूटी के बाद हमको एक प्रतिवेदन भरना होता है जिसमें यह बताना होता है कि अपने दायित्व निर्वहन के दौरान हमें किन-किन परेशानियों से रू- ब- रू होना पड़ा और हमने उन स्थितियों में क्या किया. हम लोग आम तौर पर ‘कोई परेशानी नहीं आई’ लिखकर काम चलाते रहे. लेकिन एक मित्र ने, शायद अपने अर्जित अनुभव के आधार पर हमें सलाह दी कि हम ऐसा कभी नहीं लिखें. उन्होंने कहा कि हम ऐसा कुछ लिखें कि  वहां दो या अधिक गुटों के बीच पारस्परिक तनाव की वजह से स्थिति काफी विकट हो गई थी, लेकिन ‘अधोहस्ताक्षरकर्ता’ ने अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल कर स्थिति को  सम्हाल लिया. ज़ाहिर है कि ऐसी  इबारत बिना किसी प्रमाण के लिखी जा सकती है. और इससे सम्बद्ध अधिकारी अप्रत्यक्ष रूप से बहुत दक्ष भी घोषित हो जाता है.   

एक और प्रसंग याद आता है. चुनाव करवा कर जब लौटते हैं तो स्वाभाविक है कि सारे लोग बहुत हैरान-परेशान और थके-मांदे होते हैं. चुनाव की सामग्री  और मत पेटियां वगैरह जमा करवाना शायद सबसे कठिन काम होता है. भीड़भाड़, धक्का-मुक्की और हरेक को ‘पहले मैं’ की जल्दी. प्रशासनिक अमले की अपनी दिक्कतें होती हैं. हम लोग भी रात नौ-साढ़े नौ बजे चुनाव करवा कर लौटे थे और अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे. तभी हमारे एक वरिष्ठ साथी भी मतदान सम्पन्न करवा कर लौटे. देखा कि सामान जमा करवाने में काफी देर लगने वाली है, तो सीधे उच्चाधिकारियों के पास पहुंचे  और बोले कि देखिये, मुझे रात को दिखाई नहीं देता है, इसलिए मैं तो घर जा रहा हूं. जब आपको सुविधा हो अपनी सामग्री मेरे घर से मंगवा लेना. उनका इतना कहना था कि जैसे पूरे अमले में बिजली दौड़ गई. सभी जानते हैं कि अगर एक भी मत  पेटी जमा होने से रह जाए तो कैसा हड़कम्प मचता है! अफसरों ने अतिरिक्त व्यवस्था  करके सबसे पहला उनका सामान जमा किया, और वे हम सबको हिकारत की नज़रों से देखते हुए विजयी  भाव से प्रस्थान कर गए.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक 'न्यूज़ टुडै' में आज दिनांक 26 नवम्बर, 2013 को प्रकाशित हुए मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.