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Tuesday, July 9, 2019

यंत्रणा से गुज़रने पर कानूनी लड़ाई, ताकि कोई और न झेले


पिछले बरस न्यूयॉर्क के उत्तरी इलाके ब्रॉन्क्स की एक जेल में बंद कैदी को जब प्रसव वेदना शुरु हुई तो उसे एक नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया. यह सामान्य बात थी, लेकिन इसमें असामान्यता यह थी कि उस महिला को बाकायदा हथकड़ी और बेड़ियों में अस्पताल ले जाया गया. वैसे, न्यूयॉर्क राज्य के कानून के अनुसार  गर्भवती कैदी को प्रसव वेदना और प्रसव के समय जंजीरों में बांध  कर नहीं रखा जा सकता, लेकिन जो पुलिस कर्मी उन्हें अस्पताल  लेकर गए उन्होंने इस निषेध की परवाह नहीं की. बाद में अपने बचाव में उन्होंने कहा कि वे तो गश्त के लिए निर्धारित निर्देशों का पालन करने को विवश थे जिसके अनुसार कैदी की सुरक्षा  सर्वोपरि होती है. और इसीलिए उस महिला को प्रसव वेदना और फिर प्रसव के दौरान भी जंजीर से बांध कर रखा गया और उसके एक हाथ की हथकड़ी को पलंग से बांधे  रखा गया.  इसी अवस्था में उस महिला ने एक बेटी को जन्म दिया.

इस महिला का प्रकरण सामने आने के बाद यह खोजबीन शुरु  हुई कि पूरे अमरीका में कुल कितनी गर्भवती स्त्रियां जेलों में हैं. और तब पता चला कि इस तरह के कोई प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं. लेकिन स्थिति का थोड़ा अनुमान जॉन्स हॉपकिंस मेडिसिन द्वारा किए गए एक सर्वे के आंकड़ों से लगाया जा सकता है जिनके अनुसार सन 2016 व 2017 में संघीय व बाईस राज्य की जेलों में कम से कम चौदह सौ गर्भवती  स्त्रियां कैद थीं.  न्यूयॉर्क राज्य ने इस सर्वे के लिए भी जानकारियां उपलब्ध कराने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि उसके पास इसके लिए समुचित स्टाफ नहीं है. वैसे, अमरीका के ज़्यादातर  राज्यों में गर्भवती महिलाओं को जंजीर से बांधे रखना वैध है. हां, इतना ज़रूर है कि डॉक्टरों और शोधकर्ताओं की इस चेतावनी के बाद कि गर्भावस्था में इस तरह का बर्ताव स्त्री और गर्भस्थ  शिशु के लिए प्राणघातक साबित हो सकता है, बहुत सारे राज्य अपने सम्बद्ध कानूनों में सुधार की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं. पिछले बरस अमरीकी कॉंग्रेस ने संघीय जेलों और संयुक्त राज्य मार्शल सेवाओं की हिरासत में बेड़ियों के इस्तेमाल को प्रतिबंधित कर दिया था. इस बरस कई अन्य राज्यों ने गर्भवती महिलाओं को जंजीरों से जकड़ने पर रोक लगा दी है. कुछ राज्य (जैसे कैरोलिना) अभी भी इस रोक को लागू करने पर विचार  कर रहे हैं और कम से कम एक राज्य (टेनेसी) ऐसा भी है जिसने इस तरह की रोक लगाने का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया है.

जंजीर की मुखालिफत करने वाले कुछ कानूनों में  गर्भवती स्त्रियों को केवल उनकी प्रसव वेदना अथवा  प्रसव के समय जंजीर से मुक्ति देने का प्रावधान है तो  कुछ राज्यों जैसे न्यूयॉर्क में यह व्यवस्था है कि गर्भवती होने के किसी भी समय में तथा प्रसव के बाद कुछ समय तक अगर उस कैदी महिला को एक से दूसरी जगह ले जाया जाता है तो उसे जंजीर में जकड़ कर न ले जाया जाय. लेकिन करीब करीब सारे कानून यह कहते हैं कि अगर उस महिला के कारण हवाई यात्रा में किसी खतरे की आशंका हो अथवा खुद उस महिला या अन्यों  की सुरक्षा को कोई खतरा हो तो यह निषेध अप्रभावी होगा.

हम फिर उस महिला के प्रकरण पर लौटते  हैं. अपने साथ हुए व्यवहार को उस महिला ने न्यायालय में चुनौती दी. उस 28 वर्षीया अनाम महिला ने कहा कि वह नहीं चाहती है कि जिस तरह का अमानवीय व्यवहार उसे सहना पड़ा वैसा किसी भी और महिला को सहन करना पड़े. न्यायालय ने उसको सहानुभूतिपूर्वक सुना. महिला का आरोप था कि उसके साथ  किया गया बर्ताव अमानवीय था और उस से राज्य के नियमों का उल्लंघन  हुआ है.  आखिरकार न्यूयॉर्क नगर प्रशासन को उस महिला को छह लाख दस हज़ार डॉलर की मुआवज़ा राशि देकर अपना मान बचाना पड़ा. वैसे न्यूयॉर्क नगर प्रशासन ने अपनी टांग ऊपर रखते हुए यह अवश्य कहा कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है. लेकिन इसी के साथ सबसे ख़ास बात यह कि इस महिला के प्रकरण के बाद वहां का पुलिस प्रशासन अपने गश्त विषयक नियमों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें संशोधित करने की दिशा में सक्रिय हो गया है.

न्यायालय में अपनी विजय पर हर्षित उस महिला की प्रतिक्रिया बड़ी संज़ीदा थी. उसने कहा कि उसे इस बात की खुशी है कि उसकी इस कानूनी लड़ाई के कारण भविष्य में अन्यों को उस तरह के त्रासद अनुभव से गुज़रने की यंत्रणा से मुक्ति मिल सकेगी जिस तरह के अनुभव से उसे गुज़रना पड़ा है. उसने यह भी कहा कि वो अपने परिवार जन को या किसी भी नज़दीकी व्यक्ति को वह सब नहीं बताना चाहेगी जो उसको सहना पड़ा है. वह यह भी नहीं चाहेगी कि उसकी बेटी को कभी भी यह पता चले कि उसका जन्म किन हालात में हुआ. और यही वजह है कि उसने अपना नाम गोपनीय रखने का आग्रह किया है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न  दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 09 जुलाई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.


Tuesday, June 25, 2019

लड़कियां शादी के बाद सरनेम नहीं बदलना चाहती हैं !


दुनिया के ज़्यादातर समाजों और देशों में यह चलन है कि विवाह के बाद लड़की अपना कुलनाम (सरनेम)  बदल कर अपने पति का कुलनाम अपना लेती है. उदाहरण के लिए मेरी पत्नी विवाह पूर्व अपने पिता का कुलनाम गुप्ता प्रयुक्त करती थीं,  विवाहोपरान्त वे गुप्ता नहीं, अग्रवाल कुलनाम काम में लेने लगीं. भारत जैसे परम्परा प्रधान देश में इस बात का अपवाद वे लोग रहे जो कला संस्कृति आदि के ऐसे क्षेत्रों में कार्यरत थे या हैं जहां कुलनाम बदलने से पहचान का संकट पैदा हो सकता था. यही कारण है  कि कथाकार मन्नू भण्डारी (राजेंद्र यादव से विवाह के बाद भी) मन्नू यादव नहीं हुईं या सुधा अरोड़ा सुधा भाटिया नहीं हुईं. वैसे सबने ऐसा नहीं किया. बहुतों ने परम्परा का अनुसरण भी किया. लेकिन जैसे-जैसे नया सोच प्रमुखता पाने लगा, इस बात पर सवाल उठाये जाने लगे कि आखिर लड़की ही क्यों अपना कुलनाम बदले? इस सवाल का  सकारात्मक जवाब देते हुए कुछ पुरुषों ने भी विवाहोपरान्त अपना कुलनाम  बदल पत्नी का कुलनाम अंगीकार किया, और कुछ स्त्रियों ने समझौते का मार्ग अपनाते हुए अपना विवाहपूर्व का कुलनाम बरक़रार रखते हुए उसके साथ पति का कुलनाम भी जोड़ लिया. इस तरह कुछ स्त्रियों ने एक की बजाय दो कुलनाम धारण कर अपने विवाह पूर्व  के कुलनाम को भी अपने साथ जोड़े रखा. इसका एक उदाहरण अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा के नाम में देखा जा सकता है. लेकिन बहुतों के लिए दो कुलनाम  अपना लेना भी स्त्री पुरुष समानता का परिचायक नहीं है. यहां एक सवाल यह भी उठता है कि पुरुष और स्त्री में से किसका कुलनाम पहले प्रयुक्त किया  जाए, और क्यों! एक व्यावहारिक दिक्कत भी इसमें है  और वह यह कि जैसे जैसे वंश आगे बढ़ता जाएगा, नाम के साथ और कुलनाम  जुड़ते जाएंगे और पांच सात पीढ़ियों के बाद तो नाम इतना लम्बा हो जाएगा कि लेख जैसा लगने लगेगा.

भारत में भले ही यह सवाल बहुत अहम न हो, पश्चिम में, जहां से स्त्री मुक्ति और स्त्री समानता का वर्तमान  विमर्श सारी दुनिया में फैला है वहां इस समस्या के नए नए समाधान खोजे जा रहे हैं और उन पर चर्चाएं भी खूब हो रही हैं. हाल में वाशिंगटन डी.सी. अमरीका की एक बत्तीस वर्षीया चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव शैरॉन गोल्डबर्ग ने जब योनाथन क्विक से विवाह करने का निर्णय किया तो उन दोनों ने इस मसले पर खूब गहनता से विचार विमर्श किया. उनके इस विमर्श की परिणति  इस बात में हुई कि विवाह के बाद वे दोनों अपने-अपने वर्तमान कुलनाम त्याग कर एक नए कुलनाम गोल्डक्विक का प्रयोग करने लगेंगे. ज़ाहिर है कि यह नया कुलनाम उन दोनों के वर्तमान कुलनामों का मिश्रण है. उनका सोच यह है कि अंतत: विवाह भी तो एक नए परिवार  का सृजन है, तो फिर नया कुलनाम भी क्यों न सृजित कर लिया जाए! वैसे विवाह के बाद स्त्री पति का नाम अपनाये या नहीं, इस बात को लेकर अमरीकी समाज में पर्याप्त खुलापन पहले से विद्यमान रहा है लेकिन यह खुलापन कुलनाम को अपनाने या न अपनाने तक ही सीमित रहा है. दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम रचने का यह सिलसिला अपेक्षाकृत नया है. इस बदलाव को एक और नव विवाहित युगल ने कुछ दूसरे अंदाज़ में अपनाया है. रैचेल एकॉफ ने जब ली लेविटर से विवाह किया तो उन दोनों ने अपने-अपने कुलनाम बरक़रार रखे, लेकिन यह तै किया कि उनके बच्चे एक नए कुलनाम का प्रयोग करेंगे. यह कुलनाम होगा – लेविकॉफ जो ज़ाहिर है कि इन दोनों के कुलनामों को मिलाकर बनाया गया है.

मां-बाप के कुलनाम बाद वाली पीढ़ियां भी काम में लें, यह रिवायत इंगलैण्ड में बारहवीं शताब्दी के आसपास चलन में आई थी. असल में तब वहां बहुत थोड़े से नाम चलन में थे और इस कारण किसी छोटे-से गांव में पंद्रह बीस रॉबर्ट और तीस-चालीस जेम्स मिल जाया करते थे. एक रॉबर्ट को दूसरे से अलग करके पहचानने और सम्पत्ति का सही उत्तराधिकारी निर्धारित करने के लिए कुलनाम की ज़रूरत पड़ी. अब क्योंकि स्त्रियों  को भी सम्पत्ति ही माना जाता था, वे भी पति का कुलनाम धारण करने लगीं.

लेकिन दो कुलनामों को मिलाकर नया कुलनाम बनाने से भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है. इसलिए नहीं हो रहा है कि बहुत सारे पुरुष (और स्त्रियां  भी) अपने वर्तमान कुलनाम से इतना गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं कि वे उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. जो लोग बहुत सम्पन्न या अत्यधिक प्रतिष्ठित हैं वे भी इस बात के लिए तैयार नहीं हैं कि जिस कुलनाम से उनकी प्रतिष्ठा प्रदर्शित  होती है उसे छोड़ दें. भला कोई टाटा-बिड़ला-अम्बानी-बच्चन अपना कुलनाम कैसे छोड़ सकता है? फिर नया कुलनाम अपनाने की एक व्यावहारिक कठिनाई भी नज़र अंदाज़  नहीं की जा सकती है. कठिनाई यह कि अमरीका जैसे देशों में एक कुलनाम को त्याग कर दूसरा कुलनाम अपनाना खासा झंझट का और खर्चीला काम है.

लेकिन इन तमाम उलझनों  और असुविधाओं के बावज़ूद स्त्री समानता के पक्षधर पुरानी रिवायत को ज़ारी रखने को तैयार नहीं हैं. वैसे भी, बदलाव तो आहिस्ता-आहिस्ता ही होता है. क्या पता दो-चार सौ बरसों बाद कुलनाम लुप्त ही हो जाएं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गगत मंगलवार, 25 जून, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 15, 2019

जीत की कोई उम्मीद नहीं फिर भी लड़ रही है वो!


बहुत बार ऐसा कुछ जानने को मिलता है कि मन गहरे अवसाद में डूब जाता है. इण्डोनेशिया की चालीस वर्षीया नूरिल मकनून के बारे में जानकर ऐसा ही हुआ. वे तीन बच्चों की मां है और बाली के पूर्व में अवस्थित द्वीप की रहने वाली हैं. सन 2010 में उन्हें एक स्कूल में लेखा सहायक की अस्थायी नौकरी मिली तो जीवन की गाड़ी कुछ आराम से चलने लगी. लेकिन यह आराम बहुत समय नहीं रहा. तीन बरस बाद उनके स्कूल में एक नया प्रिंसिपल आया और उसने उनका सुख चैन सब छीन लिया. प्रिंसिपल साहब जब चाहते नूरिल को अपने चैम्बर में बुला भेजते और उससे खुलकर अपने अंतरंग जीवन  की बातें करने लगते. स्कूल के समय के बाद वे उसे वक़्त बेवक़्त फोन करके भी यही सब करते. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, एक तरफ तो वे नूरिल से कहते कि वो भी उनके साथ अंतरंगता कायम करे और दूसरी तरफ स्कूल के कर्मचारियों के सामने इस बात की डींग हांकते कि नूरिल से उनका अफेयर चल रहा है. बेचारी नूरिल बहुत भारी मन से उनकी ये फूहड़ और अश्लील हरकतें सहती रहने को विवश थी. इसलिए विवश थी कि उसकी नौकरी अस्थायी थी और वह जानती थी कि शिकायत करने का मतलब होगा अपनी नौकरी से हाथ धो बैठना.

लेकिन परेशानी के इसी दौर में एक दिन उसे न जाने क्या सूझा कि प्रिंसिपल ने जब उसे फोन किया और हमेशा की तरह गंदी बातें करने लगा तो उसने उन बातों को रिकॉर्ड कर लिया. यह रिकॉर्डिंग उसने अपने पति को तो सुनाई ही उसके साथ-साथ अपनी एक सहकर्मी को भी सुनाई, और उसी सहकर्मी ने यह बात स्टाफ के कुछ और लोगों को बता दी. अब हुआ यह कि नूरिल की ग़ैर मौज़ूदगी में उसके स्टाफ के कुछ लोगों ने उसके फोन से इस रिकॉर्डिंग की कॉपी बना ली अपने कुछ साथियों को भी सुना दी. उड़ते उड़ते यह बात प्रिंसिपल तक भी जा पहुंची. उसे तो आग-बबूला होना ही था. प्रिंसिपल ने नूरिल को बुला कर धमकाया और कहा कि जब तक वो उस रिकॉर्डिंग को डिलीट नहीं कर देती, उसके अनुबंध को विस्तार नहीं दिया जाएगा. नूरिल के मना कर देने पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया.

असल दुखदायी प्रकरण इसके बाद शुरु हुआ. नूरिल को नौकरी से निकाल देने के बाद प्रिंसिपल ने पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई कि नूरिल ने उसके विरुद्ध मानहानि का आपराधिक काम किया है. पुलिस ने कोई दस-बारह बार नूरिल को तफ़्तीश के लिए बुलाया और अंतत: उसे गिरफ़्तार  कर लिया. अभियोग पक्ष ने उस पर अश्लील सामग्री के वितरण का, न कि मानहानि का,  आरोप लगाया. नूरिल को दो महीने ज़ेल में गुज़ारने पड़े, हालांकि इस बीच उसके स्कूल की सहकर्मियों ने अपने ये बयान भी दर्ज़ कराए कि उस रिकॉर्डिंग  का वितरण नूरिल ने नहीं किया था अपितु उन्होंने ही उसके फोन से उसे लेकर वितरित किया था. नूरिल के वकील ने भी यह तर्क दिया कि नूरिल ने यह रिकॉर्डिंग अपने बचाव के लिए की थी और इसे अपने ही पास रखा था, उसने इसका वितरण भी नहीं किया था. उधर प्रिंसिपल ने अपने बचाव में यह कहा कि फोन पर सुनाई दे रहे वार्तालाप का नूरिल से कोई सम्बंध नहीं है. इस वार्तालाप में वे तो एक अमरीकी पोर्न अभिनेत्री को सम्बोधित कर ये बातें कह रहे हैं. अंतत:  अदालत ने भी पाया कि इस मामले में नूरिल दोषी नहीं है.

लेकिन किस्सा यहां ख़त्म नहीं हुआ. प्रिंसिपल  के वकील इसके बाद इस मामले को इण्डोनेशिया के कानूनी प्रावधानों के तहत सुप्रीम कोर्ट ले गए और वहां बग़ैर नूरिल को अपनी बात कहने का कोई मौका दिये, निचली अदालत के फैसले को उलटते हुए नूरिल को अश्लील सामग्री के वितरण का दोषी करार दे दिया गया.  उसे छह माह के कारावास और पैंतीस हज़ार डॉलर के जुर्माने की सज़ा सुना दी गई.  अगर वो यह राशि जमा न  करा सके तो उसे तीन माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा. इस सारे मामले का एक दुखद पहलू यह और है कि प्रिंसिपल को वहां के स्थानीय प्रशासन में और बड़े तथा महत्वपूर्ण पद पर भेज दिया गया.

असल में इण्डोनेशिया के कानून अभी भी बहुत हद तक स्त्री विरोधी हैं. किसी स्त्री के विरुद्ध अश्लील बातें करना अपराध नहीं माना जाता है. औरतों से अपेक्षा की जाती है कि वे न केवल पुरुषों की इस तरह की अभद्रताओं  को सहती रहेंगी,  अपनी नौकरी की खातिर उच्चाधिकारियों को ‘खुश’ भी करेंगी.  स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों की पड़ताल के लिए वहां महिला पुलिस की भारी कमी है, और इसके मूल में वहां प्रचलित वर्जिनिटी टेस्ट की शर्मनाक व्यवस्था भी है. इस सबके बावज़ूद नूरिल अपनी लड़ाई ज़ारी रखे है. वह वहां प्रतिरोध की एक प्रतीक बन कर उभरी है, हालांकि इस लड़ाई में उसकी जीत की उम्मीद शायद ही किसी को हो.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 15 जनवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, November 20, 2018

यह देश तो जैसे स्त्रियों का नरक है!


अपने देश में स्त्रियों की स्थिति पर प्राय: चर्चा होती है और जब देश के किसी भी भाग से उनके साथ  हुए किसी दुर्व्यवहार का समाचार आता है,  हम आक्रोश से भर उठते हैं और मन ही मन कामना करते हैं कि भविष्य में ऐसा न हो. हम यह भी जानते हैं कि आज़ादी के बाद से देश में स्त्रियों की स्थिति में बहुत बदलाव आया है और वे सभी क्षेत्रों में अपनी योग्यता का लोहा मनवा रही हैं. देश के सर्वोच्च पदों पर स्त्रियां आसीन रह चुकी हैं और आज जीवन का शायद ही कोई क्षेत्र ऐसा हो जहां उनकी सम्मानजनक पहुंच न हो. लेकिन जब यह जानने को मिलता है कि हमारी इसी दुनिया में बहुत सारे देश ऐसे भी हैं जहां स्त्रियां आज भी नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं, तो हम गहरे संताप में डूब जाते हैं. ऐसा ही एक अभागा  देश है पापुआ न्यूगिनी. दक्षिणी पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र में स्थित द्वीपों के इस समूह की आबादी बहुत कम है. मात्र साठ लाख. 1975 में ऑस्ट्रेलिया से आज़ादी प्राप्त  करने वाले विभिन्न समुदायों, जनजातियों और परिवारों वाले इस राष्ट्रमण्डलीय देश में गज़ब की विविधता है. यह तथ्य किसी को भी चौंका सकता है कि यहां करीब आठ सौ भाषाएं बोली जाती हैं और यह संख्या दुनिया के किसी एक देश में बोली जाने वाली भाषाओं  में सबसे बड़ी है. इस देश की  विविधता का एक और आयाम यह है कि एक गली में जो नियम और परम्पराएं चलन में है, पास वाली दूसरी गली में उससे नितांत भिन्न रीति रिवाज़ चलन में होते हैं. लेकिन विविधताओं भरे देश में एक मामले में ग़ज़ब की एकरूपता  भी  है. और वह एक मामला है स्त्रियों के साथ व्यवहार का. जब इस देश के महिलाओं के एक आश्रय स्थल की काउंसलर शैरॉन साइसोफा यह कहती हैं कि “यहां स्त्री को पीटना उतना ही सहज स्वाभाविक है जितना किसी पेड़ से आम तोड़ लेना, दोनों ही कामों में कोई पैसा  नहीं लगता  है”  तो वे एक कड़वी सच्चाई को शब्द दे रही होती हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट बताती है कि इस देश की दो तिहाई स्त्रियां अपने सहचर के दुर्व्यवहार का शिकार हैं. एक अन्य अध्ययन में इस देश के एक बड़े भू भाग के कम से कम साठ प्रतिशत पुरुष सामूहिक बलात्कार के दुष्कृत्य में शामिल होने की बात स्वीकार कर चुके हैं. इस देश का अधिक जनसंख्या वाला उत्तरी भूभाग स्त्रियों के लिए भी अधिक असुरक्षित है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के  एक सर्वेक्षण में वहां की अस्सी फीसदी महिलाएं यह बात मान चुकी हैं कि वे अपने पतियों की हिंसा का शिकार हुई हैं. इन तथ्यों के बाद इस बात को न मानने की कोई वजह ही नहीं रह जाती है कि पापुआ न्यूगिनी के उत्तरी क्षेत्र  में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा की दर दुनिया में सबसे ज़्यादा है. कोढ़ में खाज यह कि स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार को रोकने के लिए बनाने गए नियम-कानून बहुत अस्पष्ट हैं. अभी हाल तक तो इस देश में स्त्रियों को पति की सम्पत्ति ही माना जाता था और जैसे ही दुल्हन का मूल्य तै होता था, उसका भावी पति कानूनी  रूप से उसे पीटने या उसके साथ बलात्कार करने का हक़दार हो जाता  था. कई बरसों के संघर्ष और प्रतिरोध के बाद 2013 में सरकार ने एक पारिवारिक संरक्षण कानून  पास कर पत्नियों और बच्चों को पीटने पर प्रतिबंध लगाया. इसी कानून की अनुपालना  के लिए पुलिस में भी एक विभाग बनाया गया और सारे देश में पीड़ित महिलाओं के लिए सरकार द्वारा वित्त पोषित संरक्षण गृह बनाए गए. लेकिन इसके बाद सब कुछ गुड़ गोबर हो गया. भयंकर भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन के चलते इन सबको पैसा मिलना बंद हो गया और हालत यह हो गई है कि अगर कोई घरेलू विवाद में बीच बचाव के लिए पुलिस को बुलाता है तो पुलिस कहती है कि हमारे पास इतना बजट ही नहीं है कि वहां आने के लिए गाड़ी में ईंधन डलवा सकें. संरक्षण गृह भी धनाभाव में बदहाल पड़े हैं.

यह जानकर आश्चर्य और क्षोभ होता है कि इस देश की संसद में एक भी महिला नहीं है. तलाक के कानून बेहद जटिल और कठोर हैं और हालत यह है कि तलाक लेने के लिए स्त्रियों को खुद अपना मोल चुकाना पड़ता है. पुरानी और सड़ी गली परम्पराएं अब भी इस देश को जकड़े हुए हैं. लोग जादू टोनों में गहरा विश्वास रखते हैं, और हालत यह है कि अगर किसी परिवार में कोई बच्चा या बड़ा  बीमार हो जाए तो उसका दोषारोपण पास में रहने वाली किसी स्त्री पर कर उसकी हत्या तक कर  दी जाती है. लेकिन इन विकट स्थितियों में भी इस देश के कुछ नागरिक और संगठन हालात को बेहतर बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील हैं.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 20 नवम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, September 19, 2018

इस जापानी इंजीनियर को अपने स्त्री होने पर गर्व है


अगर आप भी यह मानते हैं कि भारत उन देशों में प्रमुख है जहां अंध विश्वास का बोलबाला है और स्त्रियों के प्रति गहरा भेदभाव होता है तो आपको जापान की पचपन वर्षीया सिविल इंजीनियर रीको एबे के बारे में ज़रूर जानना चाहिए. रीको एबे ने हाल में अपनी संघर्ष गाथा उजागर की है. अस्सी के दशक में, जब वे इंजीनियरी की पढ़ाई कर रही थी, जापान में भी महिलाओं  के लिए बहुत अधिक विकल्प मौज़ूद नहीं थे. जब वे यामागुची यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग में स्नातक होने के कगार पर थीं तब वहां की व्यवस्थानुसार उन्हें किसी प्रोफ़ेसर को अपना मेंटर चुनना था जो उन्हें नौकरी तलाश करने में भी सहायक होता. और तब रीको एबे को पहली दफ़ा अपने देश में विद्यमान स्त्री विषयक प्रतिगामी सोच का सामना करना पड़ा. अधिकांश प्रोफ़ेसरों ने उनका मेंटर बनने से ही मना कर दिया, क्योंकि वे जानते थे कि एक स्त्री को इंजीनियरी के क्षेत्र में नौकरी मिलना मुश्क़िल है. हां, अगर वो सिविल सर्वेण्ट बनना चाहती तो नौकरी मिल सकती थी. लेकिन रीको निर्माण के क्षेत्र में जाना चाहती थीं क्योंकि उनकी आकांक्षा  कुछ नया निर्माण करने की थी. आखिर एक प्रोफ़ेसर उनका मेंटर बनने को तैयार हुए. वे एक टनल विशेषज्ञ थे और इस तरह अनायास ही रीको भी टनल इंजीनियरी  के क्षेत्र में धकेल दी गई. अब पीछे मुड़कर देखती हुई रीको कहती हैं कि मेरे पास यह चुनने का मौका था ही नहीं कि मुझे पुल बनाने हैं या बांध. और जब वे नौकरी की तलाश में निकलीं तो एक-एक करके सारी कम्पनियों ने उन्हें बाहर का दरवाज़ा ही दिखाया. अब उनके पास आगे पढ़ाई करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने टनल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल कर ली. लेकिन यह करके भी उनके लिए नौकरी पाने का मार्ग सुगम नहीं हुआ. ज़्यादातर कम्पनियों ने उन्हें इण्टरव्यू के लिए बुलाने काबिल भी नहीं समझा.

लेकिन वे एकदम हताश हो जातीं इससे पहले एक कम्पनी ने उन्हें इण्टरव्यू के लिए बुला भेजा. इस बुलावे के मूल में यह तथ्य था कि रीको के प्रोफेसर ने अपने एक पूर्व छात्र से उनकी सिफारिश की थी, और संयोगवश वो पूर्व छात्र इस कम्पनी का अध्यक्ष था. यहां उन्हें नौकरी तो मिल गई, लेकिन नब्बे के दशक में जापान में टनल इंजीनियरी के क्षेत्र में  स्त्रियों की राह बहुत आसान नहीं थी. जापान में एक अंध विश्वास प्रचलित था और है जिसके अनुसार  स्त्रियों को निर्माण  स्थल से दूर ही रहना चाहिए. इस अंध विश्वास के मूल में यह बात है कि पहाड़ों की देवी एक ईर्ष्यालु औरत है और उसे यह बात पसंद नहीं है कि कोई अन्य औरत किसी टनल के निर्माणाधीन इलाके में प्रवेश करे. जापान में यह मान्यता थी और है कि अगर कोई औरत किसी  निर्माणाधीन टनल के भीतर प्रवेश करेगी तो अवश्य ही कोई दुर्घटना घटित हो जाएगी. उन दिनों को याद करती हुई रीको एबे कहती हैं कि मैंने भी इस मान्यता के बारे में सुना था, लेकिन यह नहीं सोचा था कि इसका सीधा असर मेरे ही कैरियर  पर पड़ जाएगा. जब वे नौकरी करने लगीं तो उन्हें टनल्स के भीतर नहीं जाने दिया जाता था. उनके सहकर्मी भी उनके वहां जाने का विरोध करते. और इस तरह वे एक ऐसी टनल इंजीनियर बन कर रह गईं जिन्हें खुद टनल्स के भीतर जाने की इजाज़त नहीं थी.

नौकरी तो ख़ैर वे करती रहीं लेकिन उनके मन में गहरा असंतोष भी पनपता रहा. वे कुछ अलग और सार्थक करना चाहती थीं लेकिन कर नहीं पा रही थीं. इसी छटपटाहट  के बीच उन्हें नॉर्वे में उच्च अध्ययन के लिए एक स्कॉलरशिप मिल गई. रीको एबे को लगा कि इस अध्ययन के बाद उनके लिए अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में काम के मौके बढ़ जाएंगे और वहां शायद उन्हें स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव का  शिकार भी नहीं होना पड़ेगा. और यही हुआ भी. नॉर्वे में की गई पढ़ाई के बाद वे जापान से बाहर निकल कर यूक्रेन, ताइवान, और इण्डोनेशिया में टनल प्रोजेक्ट्स में उत्साहपूर्वक  काम कर सकीं.

और अब ये रीको एबे हमारे अपने देश यानि भारत में एक जापानी कंसलटेंसी कम्पनी की मुखिया के रूप में कार्यरत हैं. रीको का सपना है कि वे भारत में बुलेट ट्रेन की परियोजना को क्रियान्वित करें. अपने तीन  दशकों के कार्यानुभव को वे अब नई पीढ़ी को उपहार में देना चाहती हैं. नई पीढ़ी को उनका एक ही संदेश है: अगर तुम दिल में ठान लो तो  कुछ भी नामुमकिन नहीं है. अपने अतीत पर एक नज़र डालते हुए वे कहती हैं कि मेरे जीवन में बहुत सारी रुकावटें आईं, लेकिन उन्हें पार कर ही मैं यहां तक पहुंच सकी हूं. मुझे इस बात का भी गर्व है कि मेरा जन्म एक स्त्री के रूप में हुआ. अगर ऐसा न हुआ होता तो मैं यहां तक पहुंच भी न सकी होती.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 सितम्बर, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 3, 2018

वहां के हालात देखते हैं तो ख़ुद पर बहुत गर्व होता है!


भले ही हाल में ज़ारी हुई थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के एक सर्वे के अनुसार  भारत को महिलाओं के लिए सबसे असुक्षित देशों की सूची में पहले स्थान पर रखा गया है, इस बात को तो स्वीकार करना ही होगा कि भारत में स्वाधीनता प्राप्ति के साथ ही स्त्रियों को वे तमाम अधिकार प्रदान कर दिये गए थे जो किसी भी सभ्य समाज में एक मनुष्य को मिलने चाहिएं. लेकिन हम इन अधिकारों के महत्व को तब तक नहीं समझ सकते जब तक कि हम दुनिया के और देशों में स्त्रियों पर ज़ारी प्रतिबंधों के बारे में न जान लें. इसीलिए  हाल  में जब यह ख़बर आई कि कई दशकों के प्रतिबंध के बाद सऊदी अरब की स्त्रियों को भी ड्राइव करने का हक़ मिल गया है तो अपने देश के हालात पर गर्व हुआ. यह गर्व तब और कई गुना बढ़ गया जब यह जाना कि बावज़ूद इस नव अर्जित आज़ादी के, अभी भी सऊदी अरब की स्त्रियां ऐसे अनेक प्रतिबंधों की जंज़ीरों में कैद हैं, जो हमारे लिए कल्पनातीत हैं. सऊदी अरब में स्त्रियों की आज़ादी की यह बयार वहां के शक्तिशाली क्राउन प्रिंस बत्तीस वर्षीय मोहम्मद बिन सलमान के उदारवादी नज़रिये और देश को आधुनिक बनाने की मुहिम की वजह से बहने लगी है, हालांकि वहां की रूढ़िवादी धार्मिक ताकतें अभी भी इन बदलावों को सहजता से नहीं ले पा रही हैं.

यह जानकर आश्चर्य होता है कि इक्कीसवीं सदी में भी सऊदी अरब की स्त्रियों को किसी पुरुष, जिसे वली कहा जाता है, की छत्र-छाया में ही रहना होता है. भले ही उस देश के लिखित कानून में इस बात का उल्लेख नहीं है, व्यवहार में सर्वत्र यह लागू है और इस कारण वहां की स्त्री बग़ैर अपने पुरुष गार्जियन की अनुमति के जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय नहीं कर सकती है. न वह यात्रा कर सकती है, न पासपोर्ट ले सकती है, न बैंक खाता खोल सकती है, न शादी कर सकती है न तलाक ले सकती है और न किसी अनुबंध पर हस्ताक्षर कर सकती हैं. वहाबी पंथ के इस अलिखित प्रावधान के चलते वहां की स्त्रियां घरेलू हिंसा के खिलाफ भी कोई प्रभावी कदम नहीं उठा सकती हैं. राहत की बात बस इतनी है कि मई 2017 में मोहम्मद बिन  सलमान ने थोड़ी-सी राहत देते हुए स्त्रियों को यह हक़ दिया है कि वे बग़ैर गार्जियन की  अनुमति के किसी विश्वविद्यालय में प्रवेश  ले सकती हैं, नौकरी कर सकती हैं और शल्य चिकित्सा करवा सकती हैं.

सऊदी अरब की स्त्रियों को अपनी वेशभूषा के चयन में अभी भी इस्लामी कानून-कायदों का ही पालन करना होता है. अधिकांश स्त्रियों को चोगे जैसा एक ढीले-ढाले किंतु पूरे शरीर को ढक लेने वाले वस्त्र जिसे अबाया कहा जाता है, को पहनना  होता है और अपना सर ढकना होता है. हां, अब उनके लिए मुंह को ढकना ज़रूरी नहीं रह गया है, लेकिन वहां की धार्मिक पुलिस प्राय: अंग प्रदर्शन या ज़्यादा बनाव शृंगार किये होने का आरोप लगाकर औरतों को तंग करती रहती है. पिछले बरस तो वहां के एक प्रमुख धार्मिक नेता ने यह आदेश भी ज़ारी कर दिया था कि स्त्रियां जो अबाया पहनें वह किसी भी तरह से सज्जित न हो. वैसे, वहां ड्रेस कोड को लेकर  ग़ैर  सऊदी अरब महिलाओं के कानून कुछ लचीला है.  

सऊदी अरब में इस बात का  भी ध्यान रखा जाता है कि स्त्रियां ऐसे पुरुषों के साथ जिनसे उनका कोई रिश्ता न हो, कितना समय बिता सकती हैं. वहां की ज़्यादातर सार्वजनिक इमारतों, जैसे कार्यालयों, बैंकों, शिक्षण संस्थाओं वगैरह में स्त्रियों और पुरुषों के लिए अलग-अलग प्रवेश द्वार होते हैं और सार्वजनिक यातायात के साधनों, पार्कों, समुद्र तटों वगैरह पर प्राय:  स्त्रियों और पुरुषों के अलग-अलग स्थान सुनिश्चित होते हैं, अगर कोई स्त्री-पुरुष इन प्रावधानों का उल्लंघन  करते हैं तो उसे आपराधिक कृत्य  मान  कानूनी कार्यवाही की जाती है और विशेष रूप से स्त्रियों को अधिक प्रताड़ित होना पड़ता है. सऊदी अरब में  एक अजीब प्रतिबंध  यह भी है कि स्त्रियां न तो किसी कब्रस्तान में जा सकती हैं और न वे कोई ऐसी फैशन पत्रिका पढ़ सकती हैं जिसे सेंसर न किया गया हो. लेकिन यहीं यह बात भी कह देना ज़रूरी है कि जैसा भारत में और दुनिया में अन्यत्र भी कई जगह होता है, सऊदी अरब में भी प्रतिबंधो की कठोरता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कौन हैं और आपके ताल्लुकात किन-किन से हैं!

सऊदी अरब के ये हालात निश्चय ही हमें अपने देश की स्त्रियों को मिले अधिकारों पर गर्व करने का मौका देते हैं. क्या ही अच्छा हो कि हमारा समाज व्यवहार में भी स्त्रियों के प्रति अधिक संवेदनशील बने और उन्हें गरिमापूर्वक जीने का मौका दे. अगर ऐसा हो जाए तो निश्चय ही हम सारी दुनिया के सामने अपना सर उठा कर जी सकेंगे.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 03 जुलाई, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, December 13, 2017

चुप्पी तोड़ने वाले बने टाइम के पर्सन ऑफ द ईयर

साल के आखिरी माह  में सारी दुनिया बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करती है कि लोकप्रिय पत्रिका टाइम किसे अपना पर्सन ऑफ द ईयर घोषित करती है. इस पत्रिका ने 1927 से इस सिलसिले को शुरु किया था. विचार यह था कि हर बरस किसी ऐसे व्यक्ति नामांकित किया जाए जिसने बीते बरस में सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी तरह से ख़बरों को प्रभावित किया हो. शुरुआती बरसों में ये लोग मैन ऑफ द ईयर घोषित करते थे लेकिन 1999 से इस सम्मान का नाम बदल कर पर्सन ऑफ द ईयर कर दिया गया. ज़ाहिर है कि यह बदलाव सारी दुनिया में लैंगिक समानता की बढ़ती जा रही स्वीकृति की परिणति था. इस बरस एक लम्बी प्रक्रिया के बाद किसी व्यक्ति को नहीं अपितु एक समूह को यह सम्मान प्रदान किया गया है. यहीं यह भी स्मरण कर लेना उपयुक्त होगा  कि इस  पत्रिका ने अतीत में भी व्यक्ति की बजाय समूह का चयन किया है. लेकिन इसकी विस्तृत चर्चा थोड़ी देर बाद. अभी तो यह कि टाइम पत्रिका ने यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली महिलाओं और पुरुषों को साल 2017 के लिए पर्सन ऑफ द ईयर चुना है. टाइम पत्रिका ने इन्हें एक नया नाम दिया है: द साइलेंस ब्रेकर्स यानि चुप्पी तोड़ने वाले. पर्सन ऑफ द ईयर की इस दौड़ में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प दूसरे नम्बर पर रहे हैं.

अक्टोबर माह में न्यूयॉर्क टाइम्स और द न्यूयॉर्कर में एक खोजपरक  रिपोर्ट छपी थी जिसमें कई मशहूर अभिनेत्रियों  ने हॉलीवुड के प्रख्यात निर्माता निर्देशक हार्वी वाइन्सटाइन पर यौन उत्पीड़न के गम्भीर आरोप लगाए थे. इस रिपोर्ट  के बाद तो जैसे अपनी व्यथा-कथा सुनाने वालों की बाढ़ ही आ गई. सारी दुनिया से स्त्रियों ने (और कुछ पुरुषों ने भी) अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न  की घटनाएं उजागर  कीं. टाइम पत्रिका के प्रधान सम्पादक एडवर्ड फेलसेनथाल ने ठीक कहा है कि “यह बहुत तेज़ी से होता हुआ सामाजिक बदलाव है जिसे हमने दशकों में देखा है. इसकी शुरुआत सैंकड़ों महिलाओं और कुछ पुरुषों के व्यक्तिगत साहस से हुई जिन्होंने आगे बढ़कर अपनी कहानियां बयां कीं.”  इस सामाजिक बदलाव को लाने में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की. वहां प्रयुक्त हैशटैग #मी टू दुनिया के 85 देशों में अनगिनत बार इस्तेमाल किया जा चुका है. कुछ लोगों के वैयक्तिक साहस से शुरु हुआ यह अभियान अब जागरण का एक बहुत बड़ा आंदोलन बन चुका है और यह खिताब इस आदोलन की बड़ी स्वीकृति का परिचायक है. लेकिन टाइम की तरफ से यह  भी सही कहा गया है कि अभी यह कहना बहुत कठिन है कि इस आंदोलन का कुल जमा हासिल क्या है. इसका कितना असर  हुआ है और कितना और होगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कुछ लोगों के अपना सच अनावृत करने से शुरु हुए इस आंदोलन ने लोगों के जीवन यथार्थ को बदलने में कितनी सफलता पाई है. लेकिन आम तौर पर इस चयन का बहुत गर्मजोशी से स्वागत हुआ है. एक सामान कामकाजी अमरीकी महिला डाना लुइस ने कहा कि “मैं अपनी ग्यारह वर्षीया बेटी को दिखाना चाहती हूं कि खुद के लिए भी खड़ा होना चाहिए, भले ही तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ़ है. अगर तुम लड़ती  रहोगी तो एक दिन तुम्हें कामयाबी भी ज़रूर हासिल होगी.”  

इस चयन की घोषणा के बाद यही बात बरसों पहले मी टू अभिव्यक्ति  का सृजन करने वाली तराना बर्क और हाल में इसे प्रोत्साहित करने वाली अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने भी अपने अपने साक्षात्कारों में कही है.  तराना बर्क ने कहा कि “मैं तो शुरु से ही यह कह रही हूं कि यह महज़ एक क्षण नहीं, एक आंदोलन है. मेरा खयाल है कि हमारा काम तो अब शुरु हो रहा है. यह हैशटैग एक घोषणा है. लेकिन अब हमें वाकई  उठ खड़ा होना और काम करने लगना है.”  मिलानो ने उनकी हे एबात को जैसे आगे बढ़ाते हुए अपनी रूप्रेखा सामने रखी और कहा, “मैं चाहती हूं कि कम्पनियां अब एक आचार संहिता अपनाएं, कम्पनियां और ज़्यादा औरतों को नौकरियां दें. मैं चाहती हूं कि हम अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दें. हमें इन सब कामों को गति देना है और बतौर स्त्री हम हम सबको एक दूसरी का समर्थन करना है और कहना है कि बहुत हुआ यह सब, अब और नहीं सहेंगी हम.”

अब यह भी जान लें कि टाइम पत्रिका ने सन 1950 में  पहली दफा किसी व्यक्ति की बजाय समूह को यह सम्मान प्रदान किया था. तब यह सम्मान द अमरीकन फाइटिंग मैन  को दिया गया था. इसके बाद 1966 में अमरीकन्स अण्डर 25को, 1975 में अमरीकन वुमननाम से चुनिंदा बारह अमरीकी महिलाओं को,  2002 में द व्हिसलब्लोअर्सको और  2006 में यूयानि हम सबको सामूहिक रूप से यह सम्मान दिया जा चुका है. 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, November 10, 2017

पेरू में सौंदर्य प्रतियोगिता में उठी स्त्री हक़ की आवाज़

लातिन अमरीकी देशों में पेरू का एक विशेष स्थान है. मात्र 31.77 मिलियन की आबादी वाले इस देश ने अपनी आर्थिक नीतियों के सफल क्रियान्वयन से पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है. पिछले एक दशक में इस देश ने अपनी गरीबी की दर को घटा कर आधा कर लिया  है और इससे यहां के सत्तर लाख लोग जो कि आबादी का 22 प्रतिशत हैं, गरीबी से उबर चुके हैं.  लेकिन हाल में इस देश का नाम एक और वजह से सुनने को मिला. यह प्रकरण भी मिसाल पेश करने का ही है. यहां एक सौंदर्य प्रतियोगिता आयोजित होती है जिसमें पेरू सुंदरी (मिस पेरू) का चयन किया जाता है.

दुनिया के और बहुत सारे देशों की ही तरह पेरू में भी सौंदर्य प्रतियोगिताओं का एक सुनिश्चित तौर-तरीका है. अन्य बहुत सारे चयन उपक्रमों से गुज़रने के बाद चुनिंदा सुंदरियों को एक कतार में खड़ा किया जाता है और फिर उनमें से एक-एक करके आगे आती है और अपनी  देह के माप (वक्ष-कटि,नितम्ब) के आंकड़े उपस्थित विशिष्ट दर्शक समुदाय के सामने प्रस्तुत करती हैं. पेरू का यह समारोह वहां के राष्ट्रीय टीवी नेटवर्क पर भी सजीव प्रसारित होता है और इस बार के प्रसारण के लिए कहा जाता है कि वह वहां के सर्वाधिक देखे जाने वाले कार्यक्रमों में से एक था.

सब कुछ बहुत व्यवस्थित तरीके से चल रहा था. दर्शक भी शाम का भरपूर आनंद ले रहे थे. तभी सुंदरियों के माइक पर आने की घोषणा हुई और पहली सुंदरी ने आकर कहा, “मेरा नाम है कैमिला केनिकोबा. मैं लीमा का प्रतिनिधित्व कर रही हूं. मुझे यह बताना है कि मेरे देश में पिछले नौ बरसों में भ्रूण हत्या के 2202 केस दर्ज़ हुए हैं.” जो लोग 32-26-33 जैसे आंकड़े सुनने की  उम्मीद कर रहे थे उन्हें एक झटका तो लगना ही था. वे इस झटके से उबर पाते उससे पहले दूसरी सुंदरी माइक पर आई, और बोली: “मेरा नाम है कारेन क्यूटो और मैं लीमा का प्रतिनिधित्व करती हूं. मुझे यह बताना है कि मेरे देश में इस बरस 82 भ्रूण हत्याएं हुई हैं और 156 भ्रूण हत्याओं के प्रयास हुए हैं.” और इसके बाद तो जैसे एक सिलसिला ही बन गया. “अलमेंन्द्रा मेरोक़ुइन के  अभिवादन स्वीकार कीजिए. मैं कैनेट से हूं और बताना चाहती हूं कि 25 प्रतिशत लड़कियों और किशोरियों के साथ उनके स्कूलों में बदसुलूकी होती है.” बेल्जिका गुएरा ने कहा, “मुझे यह बताना है कि विश्वविद्यालयों की 65 प्रतिशत युवतियों के साथ उनके साथी ही बदसुलूकी करते हैं.”  और फिर आई रोमिना लोज़ानो: “मेरा आंकड़ा यह है कि सन 2014 से अब तक 3114 स्त्रियां अनुचित  बर्ताव की शिकार हुई हैं.” रोमिना को इस प्रतियोगिता की विजेता घोषित किया गया और वे इसी माह लास वेगस में आयोजित होने वाले मिस यूनिवर्स पेजेण्ट में अपने देश की नुमाइंदगी करेंगी.

बेशक प्रतियोगी युवतियों का यह कदम आकस्मिक नहीं, पूर्व नियोजित था. इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि जब ये सुंदरियां अपने आंकड़े प्रस्तुत कर रही थीं तब नेपथ्य में एक स्क्रीन पर अखबारों में छपी इसी तरह की खबरों की कतरनें दिखाई जा रही थीं. ज़ाहिर है कि ऐसा बिना पूर्व तैयारी के मुमकिन नहीं था. बाद में यह बात सामने आ भी गई कि इन युवतियों ने आयोजकों की सहमति से ही यह किया था. वैसे, पेरू में स्त्रियों  के खिलाफ हिंसा एक विकट समस्या मानी जाती है, और पिछले अगस्त में राजधानी लीमा में इसके खिलाफ एक बड़ा प्रदर्शन भी  हो चुका है. असल में तब घरेलू हिंसा का एक हाई प्रोफाइल मामला खूब  चर्चित रहा था जिसमें  एक वकील को उसका पूर्व बॉय फ्रैण्ड होटल के रिसेप्शन पर बालों से खींचता हुआ दर्शाया गया था. यह प्रदर्शन इतना ज़ोरदार था कि टाइम पत्रिका ने इसे अपने चुनिंदा सौ की सूची में शामिल किया था. तब से अनेक बार पेरू में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं.

इस प्रतियोगिता के समापन खण्ड में हर प्रतियोगी के सामने यह सवाल रखा गया कि वे अपने स्तर पर स्त्रियों के खिलाफ़ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए क्या करना चाहेंगी. इस सवाल के जवाबों के दौरान जहां यह बात सामने आई कि हर प्रतियोगी स्त्री के खिलाफ बदसुलूकी को बहुत गम्भीरता से लेती है, अनेक मौलिक और उपयोगी सुझाव भी सामने आए. इस कार्यक्रम के दर्शकों का खयाल है कि भले ही सौंदर्य प्रतियोगिताएं स्त्री को एक वस्तु के रूप में पेश करती हैं और इनका अपना व्यावसायिक एजेण्डा  होता है, इन्हें बहुत बड़ा समुदाय रुचि पूर्वक देखता है और इसलिए इस मंच से स्त्री पर होने वाले अत्याचारों-अनाचारों  का मुखर विरोध जन चेतना जगाने के लिहाज़ से बहुत महत्व रखता है. सौंदर्य प्रतियोगिता में आयोजकों की सहमति से इस तरह का प्रतिरोध कर पेरू की सुंदरियों ने पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की है, और इस मिसाल को  सर्वत्र सराहा जा रहा है.  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 10 नवम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 21, 2017

पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को ज़्यादा होता है तनाव

हाल में हुई  एक  शोध से यह पता चला है कि जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का बुरा असर   पुरुषों की बजाय स्त्रियों पर ज़्यादा पड़ता है. ब्रिटेन की फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी के माध्यम से लगभग दो हज़ार वयस्कों पर करवाई गई इस शोध के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया गया था कि जीवन में घटित होने वाली महत्वपूर्ण घटनाएं पुरुषों को अधिक प्रभावित करती हैं या महिलाओं को. हालांकि उक्त सोसाइटी ने यह शोध एक भिन्न उद्देश्य से कराई थी,  इसके निष्कर्षों को अनेक तरह से समझा जा सकता है. सोसाइटी ने यह शोध लोगों में इस बात की जागरूकता के प्रसार  के लिए कराई थी कि शरीर की कार्यप्रणाली पर   तनावों का बहुत गहरा असर पड़ता है इसलिए लोगों को यथासंभव तनावों से बचना चाहिए. सोसाइटी का मानना है कि तनाव के दौरान उनका सामना करने के लिए हमारी देह जो हॉर्मोन्स  रिलीज़ करती है वे रक्त प्रवाह में घुल मिल जाते हैं, और इसका कुप्रभाव हमारे हृदय, पाचन तंत्र और रोग निरोधक तंत्र पर पड़ता है. यही नहीं, बार-बार पैदा होने वाले और लम्बे समय तक बने रहने  वाले तनावों की वजह से दीर्घकालीन शारीरिक समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं. यही वजह है कि फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी ने एक पूरे साल के कार्यक्रम तनावों को समझने-समझने को समर्पित किये हैं और इस शृंखला  के  अंतर्गत सार्वजनिक व्याख्यान और सेमिनार आयोजित किये जाएंगे. 

जिस रिपोर्ट की हम यहां चर्चा कर रहे हैं उसे ज़ारी करते हुए फिज़ीयोलॉजिकल सोसाइटी की नीति और  संचार समिति की अध्यक्षा ने एक बहुत अर्थपूर्ण बात कही है. उनका कहना है आधुनिक विश्व अपने साथ जिस तरह के तनाव ला रहा है, पचास बरस पहले उनकी कल्पना तक नामुमकिन थी. अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने तनाव उपजाने और बढ़ाने वाली  दो चीज़ों के नाम लिये हैं: सोशल मीडिया और स्मार्ट फोन्स.

सोसाइटी की यह शोध 1967 में की गई बहुत विख्यात होम्स और राहे के  तनाव विषयक अध्ययन की ही अगली कड़ी है. जहां इस 1967 वाले अध्ययन में जीवन की कुल 43 महत्वपूर्ण घटनाओं के आधार पर तनाव का आकलन किया गया था, वर्तमान अध्ययन में घटनाओं की संख्या को घटाकर मात्र अठारह कर दिया गया है. यह माना गया है कि बहुत सारी घटनाएं या तो एक दूसरे में समायोजित हो जाती हैं या अब उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं. इस बार के अध्ययन में जिन अठारह घटनाओं को आधार बनाया गया है वे ये हैं: जीवन साथी का निधन, कारावास, बाढ़ या आग के कारण घर का नुकसान, गम्भीर बीमारी, काम से निकाल दिया जाना, दीर्घकालीन सम्बंध का टूट जाना, पहचान की चोरी, आर्थिक समस्या, नई नौकरी की शुरुआत, शादी की तैयारियां, पहले बच्चे का जन्म, आने जाने में नष्ट होने वाला समय, आतंकवादी ख़तरे, स्मार्टफोन का खो जाना,  छोटे से बड़े घर में जाना, ब्रेक्सिट, छुट्टियां मनाने जाना, अपने काम में कामयाबी या पदोन्नति.

इस अध्ययन में इन अठारह महत्वपूर्ण घटनाओं के संदर्भ में यह पड़ताल की गई है कि इनमें से किन के कारण पुरुषों को और किन के कारण स्त्रियों को ज़्यादा तनाव होता है,  और सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यही है कि सारी की सारी अठारह घटनाओं की वजह से पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को अधिक तनाव होता है. तनाव का आकलन दस के पैमाने पर किया गया है, और उदाहरणार्थ यह पाया गया है कि जीवन साथी की मृत्य की वजह से पुरुषों को 9.13 और स्त्रियों को 9.7 तनाव होता है. इसके बाद पुरुषों और स्त्रियों में होने वाले तनाव का अंतर भी अंकों  में प्रदर्शित किया गया है. इस तालिका के अनुसार स्त्री पुरुष में सर्वाधिक यानि 1.25 का अंतर आतंकवादी खतरे के मामले में पाया गया है. पुरुष इससे 5.19 और स्त्रियां 6.44 तनाव महसूस करती हैं. इससे कुछ कम यानि 0.74 तनाव अंतर गम्भीर रोग के मामले में और उससे कुछ और कम यानि 0.71 अंतर आर्थिक मामलों अथवा बड़े घर में जाने के मामले में पाया गया है. मज़े की बात यह कि स्त्री और पुरुषों के तनावों में सबसे कम यानि 0.19 का अंतर पहली संतान के जन्म को लेकर है. एक रोचक बात यह भी है कि ज़्यादा से कम तनाव का क्रम स्त्री और पुरुष में एक-जैसा है लेकिन अलग-अलग घटनाओं में वह तनाव का अंतर घटता बढ़ता रहता है. इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि जहां बीमारी के मामले में उम्र बढ़ने के साथ तनाव की तीव्रता बढ़ती है वहीं स्मार्टफोन्स न्स  के मामले में इसका उलट होता है, यानि इस वजह से युवा पीढ़ी अधिक तनावग्रस्त होती है. 

अंतर चाहे जितना हो, इस अध्ययन से यह तो पता चल ही गया है कि विभिन्न घटनाओं का असर पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर ज़्यादा होता है.  स्वाभाविक ही है कि यह बात उनके लिए एक चेतावनी भी है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 मार्च, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 25, 2016

कलाकृतियों को नए आलोक में देखना सीखें

संयुक्त राज्य अमरीका के कैलिफोर्निया राज्य के सान लियाण्ड्रो  कस्बे में हाल ही में एक नए तकनीकी ऑफिस कॉम्प्लेक्स में निजी ज़मीन पर स्थापित की गई एक कलाकृति को लेकर घनघोर बहस हो रही है. तेरह हज़ार पाउण्ड वज़न वाली और पचपन फुट ऊंची यह कृति एक निर्वसन  नृत्यांगना  की है. स्टील की जाली से निर्मित  इस कृति में, जो कि आकार में माइकेलएन्जिलो की विख्यात कृति डेविड से तीन गुनी है, एक स्त्री नृत्य की लालित्यपूर्ण मुद्रा में खड़ी है और उसके हाथ ऊपर की तरफ उठे हुए हैं. जिस प्लेटफॉर्म पर यह  मूर्ति स्थापित है उस पर विश्व की दस भषाओं में एक सन्देश अंकित है जिसका भाव कुछ इस तरह है कि “जिस  दुनिया में स्त्रियां सुरक्षित होंगी वो दुनिया कैसी होगी!” इस मूर्ति का शीर्षक है: ट्रुथ इज़ ब्यूटी!

इस कृति का निर्माण सन 2013 में नेवाडा के रेगिस्तान में आयोजित वार्षिक प्रतिसंस्कृति समारोह बर्निंग मैन के दौरान हुआ था. जब सान लियाण्ड्रो में सार्वजनिक स्थलों पर कलाकृतियां लगाने का फैसला किया गया तो यहां के प्रशासनिक अधिकारियों  को उस परियोजना  के लिए यह मूर्ति बहुत उपयुक्त लगी और उन्होंने इसे खरीद लिया. सान लियाण्ड्रो के मेयर अपनी इस उपलब्धि पर इतने प्रसन्न थे कि उन्होंने कहा कि वे इसे पाकर गर्वित हैं. उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि प्रारम्भ में नगर प्रशासन के कुछ अधिकारी इस मूर्ति को लेकर उल्लसित नहीं थे, लेकिन फिर उन्हें भी यह बात जंच गई कि इस मूर्ति के माध्यम से कला को लेकर एक संवाद की शुरुआत मुमकिन है.

और संवाद ही तो शुरु हुआ है इस मूर्ति को लेकर. संवाद भी और विवाद भी. कस्बे की एक सत्तावन वर्षीया नागरिक टॉनेट ने एक दिन अपने काम पर जाते वक़्त इस मूर्ति को देखा और सवाल किया कि अगर यह एक बैलेरिना है तो इसने कपड़े क्यों नहीं पहन रखे हैं? टॉनेट का कहना था कि अगर आपके भी बच्चे हों तो आप नहीं चाहेंगे कि वे ऐसी मूर्तियां देखें. और जैसे उन्हीं के स्वर में स्वर मिलाते हुए वहां की एक और नागरिक कीथ पहले तो बहुत ध्यान से इस मूर्ति को देखती हैं और फिर मासूमियत से पूछती हैं, “यह इतनी विशाल क्यों है? और इसने कपड़े क्यों नहीं पहने हैं?” दुर्भाग्य की बात यह कि जो बहस कला को लेकर होनी चाहिए वह उसकी बजाय कृति के वस्त्रों (के अभाव) पर जाकर अटक गई है. और यहीं यह बात भी याद कर लेना ज़रूरी लगता है कि इस मूर्ति के शिल्पकार मार्को कोचराने ने बताया था कि बचपन में ही उनके मन पर एक पड़ोसी बालिका के साथ हुई बलात्कार की नृशंस घटना की अमिट छाप अंकित हो गई थी और बड़े होकर अपनी कला के माध्यम से वे स्त्रियों पर होने वाले यौनिक आक्रमणों और उनकी आशंकाओं को व्यक्त करते हुए यह बात कहना चाहते रहे हैं कि जब स्त्रियां भयभीत नहीं होती हैं तब वे किस तरह की सशक्तता का अनुभव करती हैं. अगर हम इस मूर्तिकार की व्याख्या के आलोक में इस शिल्प को देखें तो हमारी प्रतिक्रिया निश्चय ही अलहदा और सकारात्मक होगी. उन्होंने कहा है कि इस शिल्प में वह स्त्री खुद को सुरक्षित अनुभव कर रही है और खुद के प्यार में डूबी हुई है. मैं सोचता हूं कि देखने वाले भी इसके इस प्यार को महसूस  कर सकते हैं. मार्को ने यह भी कहा है है कि यह स्त्री बहुत खूबसूरत है, और इस शिल्प का एक मकसद यह भी है कि यह पुरुषों को अपनी तरफ खींचे. जब वे खिंच कर इसकी तरफ आएं और इसे देखें, तो उनका ध्यान इसके नीचे अंकित संदेश पर भी जाए. मैं चाहता हूं कि बार-बार ऐसा हो.

और तमाम विवाद के बावज़ूद ऐसा हो भी रहा है. जैसे-जैसे इस शिल्प पर सहमति-असहमति की चर्चा ज़ोर पकड़ रही है, इसके प्रति लोगों का आकर्षण भी बढ़ता जा रहा है. यह शिल्प वहां का लोकप्रिय सेल्फी स्थल बन गया है. हाई स्कूल की  एक शिक्षिका जो सटन इससे इतनी प्रभावित हुई है कि वह तो अपनी पूरी क्लास को इसके अवलोकन के लिए ला रही है. तिहत्तर वर्षीय एक व्यापारी माइकल फनल ने इसकी  बहुत सारी तस्वीरें ली हैं ताकि वे विदेश में रह रहे अपने बेटे को भेज सकें. फनल ने बहुत सही कहा है कि यह एक विश्व स्तरीय मूर्ति है. फनल ने इस मूर्ति की विलक्षण व्याख्या की है. उनका कहना है: “इस मूर्ति की  स्त्री यह जानते हुए भी कि दुनिया उसके खिलाफ है, खुद को ढक नहीं रही है.  यह औरत पूरे दम-खम से कह रही है कि मैं हूं और ऐसी ही रहूंगी!”

क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम भी कलाकृतियों को नए आलोक में देखना सीखें!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 अक्टोबर, 201 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.