Tuesday, June 9, 2015

कबीर कह गए हैं: हम न मरैं मरिहैं संसारा

इधर कुछ दिनों से मेरा ध्यान रह-रहकर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ की तरफ जा रहा है. इस बेहद रोचक, बहु प्रशंसित  और चर्चित उपन्यास को खोलते ही पहले पन्ने पर आप पढ़ते हैं:

सड़क  के एक ओर पेट्रोल-स्टेशन था; दूसरी ओर छप्परों, लकड़ी और टीन के सड़े टुकड़ों और स्थानीय क्षमता के अनुसार निकलने वाले कबाड़ की मदद से खड़ी की हुई दुकानें थीं. पहली निगाह में ही मालूम हो जाता था कि दुकानों की गिनती नहीं हो सकती. प्राय: सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहां गर्द, चीकट, चाय की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे  बनाया जाता था. उनमें  मिठाइयां भी थीं जो दिन-रात आंधी-पानी और मक्खी मच्छरों के हमलों का बहादुरी से मुकाबला करती थीं. वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल का और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं. वे बताती थीं कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही मालूम न हो, हर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरक़ीब सारी दुनिया में अकेले  हमीं को आती है.

लगता है लेखक स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी को मिठाइयों से कुछ ज़्यादा ही मोह  था. हो सकता है इसकी एक वजह उनका पण्डित होना भी हो. अब देखिये ना, आगे भी एक जगह वे लिखते हैं:

मिठाई और चाट की दुकानों के आगे काफ़ी भीड़ थी. भारतीय मिठाइयों की सौन्दर्य-साम्राज्ञी बर्फ़ी ढेर-की-ढेर लगी थी  और हर लड़का जानता था कि मारपीट में इसका इस्तेमाल पत्थर के टुकड़े-जैसा किया जा सकता है. इन मिठाइयों के बनाने में हलवाइयों और फूड इंस्पेक्टरों को बड़े-बड़े वैज्ञानिक अनुसंधान करने पड़े थे, उन्होंने बड़े परिश्रम  से मालूम किया  था कि खोये की जगह घुइयां, आलू-चावल का आटा, मिट्टी या गोबर तक का प्रयोग किया जा सकता है. वे सब समन्वयवाद के अनुयायी थे और उन्होंने क़सम खा ली थी कि वे बिना मिलावट के न तो कोई चीज़ बनायेंगे और न बेचेंगे.

आप समझ ही गये होंगे कि मुझे इस महान उपन्यास की याद इन दिनों क्यों आ रही है! वैसे, इस उपन्यास पर बहुत सारे आलोचकों ने भारतीय जीवन के यथार्थ के प्रति असंवेदनशील होने के आरोप भी लगाए हैं, लेकिन कम से कम इन पंक्तियों को पढ़ते  हुए तो लगता है कि वे यथार्थ को जस-का तस रख रहे हैं. कभी-कभी मुझे लगता है कि जैसे सफाई हमारे जीवन का मूल्य है ही नहीं. सफाई भी और शुद्धता भी. सफाई अगर मूल्य होता और हमारे जीवन में शामिल होता तो देश के नए बने प्रधानमंत्री को भी उसके लिए अलग से एक अभियान चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. सफाई और शुद्धता जैसे एक सिक्के के ही दो पहलू हैं. पेयजल जैसी आधारभूत वस्तु जहां शुद्ध रूप में सुलभ न हो, और आम जन की  तो छोड़िये, जहां सितारे वाले होटल भी आपको खाना परोसने से पहले यह पूछते हों कि आप पानी सादा लेंगे या बॉटल्ड, तो यह केवल व्यावसायिक तकाज़ा कहकर टाल देने वाली बात नहीं रह जाती है, इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि खुद उन्हें अपने यहां सुलभ पेय जल की गुणवत्ता पर संदेह है. स्ट्रीट फूड के निर्माण और जिस स्थितियों में उसे  बेचा और खाया जाता है, उसकी बात न भी करें, तो विवाह जैसे सार्वजनिक और बड़े आयोजनों में अगर आप खाना बनते हुए देख लें तो शायद उसे खाने की हिम्मत न कर पायें, और यह जानते हुए भी आप उसे बिना किसी झिझक के खाते हैं. होली दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर मावे और मिठाई में मिलावट की खबरों ने अब हमें चौंकाना भी बन्द कर दिया है.  नाले के पानी में उगी और ज़रूरत से ज़्यादा रसायनों वाली सब्ज़ियां, हानिकारक रसायनों द्वारा पकाये गये फल, मिलावटी और अवधिपर की दवाइयां - क्या है हमारे आस-पास जो शुद्ध और विश्वसनीय है?

ऐसे में कल रात व्हाट्सएप पर जब यह संदेश मिला तो लगा कि दास कबीर बहुत पहले सही ही कह गए थे. क्या कह गए थे, यह जानने से पहले कल रात मिला संदेश पढ़ लीजिए:

सड़े तेल में डूबे भटूरे और समोसे, सल्फर के तेज़ाब वाले पानी के गोलगप्पे, बर्ड फ्लू वाले जख्मी मुर्गे की चांप, एक ही पत्ती से कई बार बनी चाय, डिटर्जेण्ट पाउडर वाला दूध, धूल वाली सड़क पे खुले कटे फलों  की चाट, नाली किनारे  बिकती सब्ज़ियां, कभी ना साफ हुई टंकी की प्याऊ का पानी, खुजलाते हाथों की ढाबे की रोटियां, मरे मच्छरों  की चाशनी में डूबी जलेबियां, और सूखे दूध के नकली मेवे की मिठाई जिसका बाल भी बांका नहीं कर सके, उसका मैगी की लीड  क्या बिगाड़ लेगी?

कबीर बहुत पहले कह गए थे: हम न मरैं मरिहैं संसारा.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज मंगलवार, 09 जून, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 2, 2015

आपसे ज्यादा महत्व है आपके डेटा का

आप किसी स्टोर में खरीददारी करने जाते हैं और जब बिलिंग की बारी आती है तो आपसे नाम पूछने के बाद प्राय: आपका मोबाइल नम्बर भी पूछा जाता है. आप सहज रूप से बता देते हैं. आप इण्टरनेट पर किसी सेवा, चाहे वो ई मेल खाता हो, कोई सोशल नेटवर्किंग साइट हो या कुछ और, के लिए साइन इन करते हैं तब आपके सामने एक बॉक्स आता है, जिसके आगे छपा होता है – आई एक्सेप्ट यानि मैं स्वीकार करता हूं. आप उस पर टिक कर देते हैं. हममें से शायद ही कोई इतना जागरूक या धैर्यवान हो कि वह उस पूरी इबारत को पढ़े जिसे उसने स्वीकार किया है.

ये और इस तरह की बहुत सारी निरापद लगने वाली हरकतें करते समय हम शायद ही इस बात से वाक़िफ हों कि ऐसा करते हुए हम न केवल दूसरों को अपनी निजता में ताका झांकी करने का अधिकार सौंप रहे हैं, अनजाने में ही उस परिघटना का शिकार भी हो रहे हैं जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के ज्ञान और प्रबंधन के निदेशक नजीब अल शोराबजी ने अपने एक भाषण में ‘डेटा कोलोनियलिज़्म’ का नाम दिया था. कोलोनियलिज़्म यानि उपनिवेशवाद का नाम आते ही हमारे कान खड़े हो जाते हैं. क्या है यह डेटा कोलोनियलिज़्म? इन नजीब अल शोराबजी ने तो डेटा कोलोनियलिज़्म संज्ञा का प्रयोग उस स्थिति के लिए किया था जिसमें पश्चिमी  देश अफ्रीकी राष्ट्रों के स्वास्थ्य विषयक डेटा का दोहन कर रहे हैं, बिना अफ्रीकी देशों को इसका तनिक भी लाभ दिये. लेकिन यह तस्वीर का बहुत छोटा हिस्सा  है. इस डेटा कोलोनियलिज़्म का आकार कितना बड़ा हो चुका है इसका अन्दाज़ आप सिर्फ इस जानकारी से लगा लीजिए कि इस बरस यानि 2015 में अकेले भारत में इसका मूल्य एक बिलियन डॉलर यानि करीब सात हज़ार करोड़ रुपये  आंका गया है.

असल में आज की दुनिया में डेटा एक कमोडिटी बन गया है, एक ऐसी वस्तु  जिसका मोल सोने से भी ज़्यादा है. यह जो उन तमाम वेबसाइट्स का मायाजाल है जो आपके सामने आकर गिड़गिड़ाती हैं कि आप अपने स्मार्ट फोन पर उनकी एप डाउनलोड कर लें – क्या यह बेवजह है? मुझे बहुत खुशी होती है जब किसी एप की वजह से तुरंत मेरी गैस बुक हो जाती है या बिना यह बताए कि मैं कहां खड़ा हूं, मेरी बुलाई हुई कैब आकर मेरे सामने खड़ी हो जाती है. लेकिन यह सब तस्वीर का एक पहलू ही है. दूसरा पहलू जो ज्यादा चौंकाने और विचलित करने वाला है वह यह है कि इस तरह मेरे पूरे बर्ताव पर नजर रखी जा रही है. क्या आपने कभी नोट किया है कि जब आप अपने किसी ई मेल में किसी हिल स्टेशन पर जाने की बात लिखते हैं, तो उसी समय उस पेज के दाहिनी तरफ  उसी हिल स्टेशन के होटलों के विज्ञापन क्यों दिखाई देने  लगते हैं? जब आप किसी पुस्तक विक्रेता की साइट पर किसी किताब को तलाश करते हैं तो उससे मिलती जुलती किताबों के सुझाव कैसे आने लगते हैं? जब आप कोई पोर्न साइट विज़िट करते हैं तो क्यों और कैसे उसी समय आपके शहर का नाम लेते हुए आपको यह सूचनाएं मिलने लगती हैं कि वहां  रास रचाने की सुविधाएं आपके इंतज़ार में हैं. ये चन्द उदाहरण हैं जिनसे  आप अनुमान लगा सकते हैं कि आपके अनजाने में आपके क्रिया कलाप पर नज़र रखी जा रही है.

और इसी ताका-झांकी के खेल, बल्कि बड़े कारोबार की तरफ मैं आपका ध्यान खींचना चाह रहा हूं.  दरअसल इस तरह डेटा संग्रहण करते हुए भविष्य की एक ऐसी संरचना की कल्पना की जा रही है जिसमें मानवीय विवेक को इन सूचनाओं के संसाधन द्वारा प्राप्त निष्कर्षों पर कुर्बान कर दिया जाएगा. जन्म से मृत्यु तक आपकी हर गतिविधि को लगातार रिकॉर्ड और संसाधित किया जाएगा और उसी के अनुसार तमाम गतिविधियों जिनमें व्यावसायिक और प्रशासनिक सभी तरह की गतिविधियां शामिल हैं, संचालित किया जाएगा. ऊपर से यह बात भले ही आकर्षक लगे, इसमें जो ख़तरे निहित हैं उनकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती. मसलन यह कि सोच और अनुभव को डेटा विस्थापित कर डाले और यह भी कि अगर इन डेटा को तोड़ मरोड़ कर मनचाहे निष्कर्ष निकाल लिये जाएं तो? वायर्ड  पत्रिका के पूर्व मुख्य सम्पादक क्रिस एण्डरसन ने जब अपने एक चर्चित लेख में यह कहा था कि इस तरह आंकड़ों   पर अत्यधिक निर्भरता कार्य कारण पद्धति को अप्रासंगिक कर देगी, तो  को दुनिया का चौंक जाना स्वाभाविक ही था. चिंता की बात यह है कि हम अपने अनजाने में आहिस्ता-आहिस्ता उसी व्यवस्था की तरफ बढ़ते जा रहे हैं जिसमें डेटा निर्माण के कच्चे माल यानि ‘लोगों’ की आवाज़ को न सुनकर सिर्फ डेटा की आवाज़ को ही सुना जाएगा. हताशा की बात यह है कि इस चिंताजनक स्थिति में हम अपने आपको बेबस पा रहे हैं.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जून, 2015 को डेटा कोलोनियलिज़्म: आज़ादी का दुश्मन शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 26, 2015

क्या ज़रूरत है खेलों में स्त्री देह की

बहुत मुमकिन है कि आपने भी मेरा यह आलेख पढ़ने से पहले ग्रिड गर्ल्स का नाम न सुना हो! यह खबर पढ़ने से पहले कि दुनिया भर की स्पोर्ट्स कारों की श्रंखला एफआईए वर्ल्ड एण्ड्यूरेंस चैम्पियनशिप, जिसे संक्षेप में डब्ल्यूईसी नाम से जाना जाता है, ने यह घोषणा की है कि वह अपनी रेसों के दौरान ग्रिड गर्ल्स को इस्तेमाल नहीं करेगी, मैं भी इनके बारे में कुछ नहीं जानता था. लेकिन अब आपको बता सकता हूं कि रोमांचक कार रेसों की दुनिया में ग्रिड गर्ल्स वे खूबसूरत बालाएं होती हैं जो रेस शुरु होने से पहले अत्यल्प और बदन से चिपके वस्त्रों में रेसिंग कारों के साथ खड़ी नज़र आती हैं. आम तौर पर इनके हाथों में कार के स्थान के नम्बर का प्ले कार्ड भी होता है. चाहें तो मान सकते हैं कि कार रेसिंग में इनका वही स्थान है जो आईपीएल जैसी क्रिकेट श्रंखलाओं  में चीयर लीडर्स का होता है.

डब्ल्यूईसी की इस घोषणा को दुनिया भर में प्रचलित स्त्रियों को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में देखने और प्रयोग करने की अनुचित प्रवृत्ति से मुक्ति के एक कदम के रूप में देखा जा रहा है. हम पाते हैं कि दुनिया भर में ऐसे तमाम उत्पादों को बेचने के लिए भी स्त्री देह का प्रयोग किया जाता है जिनसे स्त्री का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है. हमारा अपना देश भी इसका अपवाद नहीं है. ऐसे में अगर मोटर स्पोर्ट्स को और क्रिकेट जैसे खेल को बेचने के लिए स्त्री देह का प्रयोग किया जाता है तो इस पर कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. बेचने वाले का तो पूरा ध्यान मुनाफे पर ही होता है. अगर ऐसा न होता तो दुनिया भर में बहुत सारे नुकसानदेह पदार्थों के कारोबार भी इस कदर फलते-फूलते नहीं. लेकिन हम तो अपनी मूल बात पर लौटते हैं.

डब्ल्यूईसी के इस फैसले का जिन महत्वपूर्ण लोगों ने स्वागत किया है उनमें से एक हैं 22 साल की केटी मेक जो अमरीका के फ्लोरिडा राज्य  में रहती हैं. केटी का मानना है कि बिना बात किए  आप किसी सोच में बदलाव नहीं ला सकते या फिर बुरे हालात को बदल नहीं सकते. केटी ने अपने इसी सोच के तहत डब्ल्यूईसी के इस फैसले का अपने ट्वीट्स के माध्यम से पुरज़ोर समर्थन किया है और उन्हें भी खूब समर्थन  मिला है, उनके ट्वीट्स को खूब दुहराया गया है. 2013 में केटी को जब थायरॉयड  कैंसर हुआ तो उनका इलाज जिस डॉक्टर ने किया वो खुद भी स्पोर्ट्स कार की ड्रावर रह चुकी और ग्रैण्ड एम सिरीज़ की रेस में हिस्सा ले चुकी थीं. इस डॉक्टर से केटी की मुलाकात भी एक रेसिंग प्रतियोगिता के दौरान ही हुई थी. केटी का विचार है कि रेस एक उम्दा खेल है लेकिन इसे और विकसित करने की जरूरत है. वे इसी उम्मीद से इस खेल  के दौरान लाइव ट्वीट्स करती हैं कि हो सकता है कि जो इस रेस को पसन्द नहीं करता है वो भी इसे पसन्द करने लग जाए. केटी मानती हैं कि रेसिंग भी दुनिया के अन्य खेलों जैसा ही है. बेहतरीन मशीन का ट्रैक पर भागने का रोमांच आपको अपने आप इसका दीवाना बना देता है. केटी यह बात अच्छी तरह से जानती हैं कि मोटरस्पोर्ट्स  में ज़्यादातर रेसर पुरुष हैं लेकिन वे इसे कोई समस्या नहीं मानती हैं.  समस्या दूसरी है. उनके ट्वीट्स को पढ़कर कई महिलाओं ने उनसे सम्पर्क  किया और बताया कि उन्हें ट्रैक पर सेक्सिज़्म  का शिकार बनना पड़ा. बकौल केटी, उनके वृत्तांत दिल दहला देने वाले थे.  लेकिन इसके बावज़ूद केटी सच्चे मन से चाहती हैं कि मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में महिलाओं को लेकर जो सोच है वह बदलना चाहिए. और उन्हें लगता है कि बदलाव आ भी रहा है. बहुत सारी महिलाएं अब इस स्पोर्ट्स को पसन्द करने लगी हैं और युवा लड़कियां भी रेसिंग के प्रति उत्साहित नज़र आने लगी हैं.

असल में सभी जगह हो यह रहा है, चाहे वो खेल हो या कुछ और,  कि  मूल की बजाय या उसके साथ-साथ उसकी पैकेजिंग पर खासा ज़ोर दिया जा रहा है ताकि जिनकी उसमें कोई रुचि नहीं है वे भी इतर कारणों से उसकी तरफ खिंचे चले आएं. सीधे-सीधे कहूं तो यह कि आपकी इस खेल विशेष में रुचि नहीं है, तो कोई बात नहीं, आप तो हमारी ग्रिड गर्ल्स या चीयर लीडर्स को देखने के लिए ही टिकिट खरीद लीजिए. हमें आपकी रुचि में नहीं आपके पर्स में दिलचस्पी है. लेकिन, खुशी की बात यह है कि आयोजक भी अब गतिविधि विशेष के प्रति गम्भीर होने लगे हैं और उससे जोड़ी जाने वाली अवांछित हरकतों के विरोध में उठ खड़े होने लगे हैं. आशा की जानी चाहिए कि इस मुहिम का और विस्तार होगा.

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जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 मई, 2015 को क्या ज़रूरत है खेलों में स्त्री देह की नुमाइश शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, May 19, 2015

सहमति कपड़े उतारने की

समाचार है कि किसी जनजागृति समिति नामक संगठन ने मुम्बई के डॉम्बिवली (थाणे) के अंतर्गत आने वाले रामनगर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज़ करवा कर यह मांग की है कि फिल्म अदाकारा सनी लियोनी को देश निकाला दिया जाए और भविष्य में उनके भारत प्रवेश पर रोक लगाई जाए. समिति का कहना है कि सनी लियोनी अपनी वेबसाइट पर वल्गरिटी का प्रदर्शन करतीं और स्त्रियों की गरिमा को आहत करती हैं. इस संगठन का यह भी कहना है कि उसने पिछले एक सप्ताह में महाराष्ट्र और गोवा के विभिन्न थानों में एक दर्ज़न से ज्यादा ऐसी ही शिकायतें और दर्ज़ करवाई हैं. हमारे पाठक यह तो जानते ही हैं कि 34 वर्षीया सनी लियोनी भारत मूल की कनाडाई नागरिक हैं और उनके पास अमरीका तथा कनाडा की दोहरी नागरिकता है. वे पूर्व पोर्न अदाकारा हैं और उनकी सबसे अधिक कुख्याति भी इसी वजह से है. सन 2012 में उन्होंने पूजा भट्ट की फिल्म ‘जिस्म 2’ से बॉलीवुड में प्रवेश  किया और उसके बाद कई और फिल्मों में भी काम किया. बॉलीवुड में उनका प्रवेश ‘बिग बॉस’ की मार्फत हुआ था. देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अखबार ने  उन्हें साल 2014 की ‘मोस्ट डिज़ायरेबल वुमन’ भी घोषित किया था.

अब ज़रा दूसरी खबर की तरफ मुड़ें. टीवी धारावाहिकों की महारानी और अब अनेक लोकप्रिय फिल्मों की भी निर्मात्री एकता कपूर ने इन्हीं सनी लियोनी के साथ एक ‘बोल्ड’ फिल्म बनाने की घोषणा की. शीर्षक था – ‘एक्सएक्सएक्स’. ‘डर्टी पिक्चर’, ‘लव सेक्स और धोखा’   और ‘रागिनी एमएमएस’  जैसी फिल्में बना चुकीं एकता ने जब सनी लियोनी को अपनी इस बोल्ड फिल्म के लिए साइन किया तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि वे क्या चाहती होंगी. लेकिन ना जाने एकता की अपेक्षाएं क्या थीं कि जिस सनी लियोनी से उपरोक्त  जनजागृति समिति आतंकित है उसने भी एकता की इस फिल्म में ऐसे कुछ सीन करने से मना कर दिया जो उसे निर्वस्त्र होकर करने थे. ज़ाहिर है कि एकता ने तो उन्हें साइन ही इस आस पर किया होगा. लेकिन एकता और सनी के बीच तनानतनी इतनी ज्यादा बढ़ी कि अंतत: एकता के पास उन्हें अपनी इस फिल्म से बाहर करना ही एकमात्र विकल्प बचा, और उसका इस्तेमाल उन्होंने किया भी. लेकिन इस अप्रिय प्रसंग से उन्होंने एक सबक भी सीखा. सबक  यह कि अब उन्होंने तै कर लिया है कि वे अपनी  फिल्म  के लिए किसी भी कलाकार को साइन करने से पहले उससे ‘न्यूडिटी क्लॉज़’  पर साइन करवाएंगी. एकता ने इसकी शुरुआत बालाजी मोशन पिक्चर्स के केन घोष के निर्देशन में बनने वाले इसी इरॉटिक थ्रिलर ‘एक्सएक्सएक्स’ से कर दी है. इससे भी आगे  यह बात और कि एक नई अभिनेत्री  कायरा दत्त ने इस अनुबन्ध पर हस्ताक्षर कर भी दिये हैं. ‘नच बलिये’  सीज़न 6 की डांसर रह चुकीं  कायरा का कहना है, “मैं अपने शरीर को लेकर कम्फर्टेबल हूं और मुझे इसे कैरी करना आता है. मैंने बोल्ड दृश्य देने पर हां किया है  क्योंकि मुझे खुद पर और अपने निर्देशक पर पूरा विश्वास है.” बहुत स्वाभाविक है कि कायरा का यह वक्तव्य पढ़ते हुए हमें दीपिका पादुकोण के उस चर्चित वीडियो की भी याद आ जाए जिसका शीर्षक था ‘माय चॉइस’.
                                                                                                        
यहीं यह बता दिया जाना भी उपयुक्त होगा कि ‘न्यूडिटी क्लॉज़’  का सीधा-सादा मतलब  यह है कि इसे स्वीकार करने वाला कलाकार जितने की उससे मांग की जाएगी उतना एक्सपोज़ करने को कानूनी रूप से सहमत है. क्लॉज़ में एक्सपोज़र को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह भी शामिल किया जा सकता है कि देह के किन भागों को अनावृत चित्रित किया जाएगा. इस क्लॉज़ में अन्य कलाकारों के साथ अंतरंग दृश्य करने की सहमति भी शामिल की जा सकती है. हॉलीवुड में तो यह क्लॉज़ काफी पहले से चलन में है और वहां विभिन्न यूनियनों ने भी अपनी गाइडलाइंस बना रखी हैं जो कलाकार और निर्माता दोनों के अधिकारों की रक्षा करती हैं. अपने देश में फिल्मों में काफी पहले से मौज़ूद न्यूडिटी के बावज़ूद कायरा दत्त इस तरह के अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करने वाली पहली अदाकारा बन गई हैं.

अब देखने की बात यह है कि एक तरफ भारतीय सेंसर बोर्ड हमारी फिल्मों में सेक्स, हिंसा और अभद्र भाषा के प्रति कड़ा रुख अपनाने की बात कर रहा है और दूसरी तरफ फिल्म निर्माता अपने कलाकारों से अधिक मुक्त होने की अनुबन्ध शुदा  अपेक्षा कर रहे हैं. इस सन्दर्भ में श्याम बेनेगल का यह कथन भी विचारणीय है कि “आजकल जिस तरह की कहानियां बन रही हैं, इस तरह के दृश्य कहानी की मांग हैं.” लेकिन इस मामले में कलाकार की मर्जी वाली बात की अनदेखी नहीं की जा सकती. सिद्धांतत: तो लगता है कि ऐसे किसी क्लॉज़ पर दस्तखत करना न करना कलाकार की मर्जी की बात है, लेकिन क्या व्यवहार में भी ऐसा  ही होगा?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 19 मई, 2015 को न्यूडिटी क्लॉज़ से फिल्मी परदे  पर कपड़े उतारने की सहमति शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 12, 2015

परिवर्तन लाने वाली औरतों को सलाम

‘मिल्क एण्ड हनी’ पुस्तक के बारे में भले ही आप कुछ न जानते हों, इसकी लेखिका का नाम आपने ज़रूर सुन रखा होगा. रूपी कौर. वही रूपी कौर  जिनकी पोस्ट की हुई तस्वीर को इंस्टाग्राम ने अपनी कम्युनिटी गाइडलान का उल्लंघन करने वाली मान कर एक नहीं दो बार  हटा दिया था लेकिन जब रूपी कौर ने इस निर्णय को चुनौती दी तो इंस्टाग्राम ने यह स्वीकार करते हुए कि उनकी तस्वीर से किसी गाइडलाइन का उल्लंघन नहीं होता है, उनसे माफी मांगी. तस्वीर आपने भी देखी होगी. जीन्स और टी शर्ट पहने एक लड़की आपकी तरफ पीठ किये सो रही है. जीन्स और बिस्तर पर लाल रंग के धब्बे हैं जो ‘उन’ दिनों के सूचक हैं.

और जिन दिनों रूपी कौर की पोस्ट की  हुई इस तस्वीर पर उत्तेजक चर्चाएं हुईं लगभग उन्हीं दिनों दीपिका पादुकोण का ‘माय चॉइस’  नामक वीडियो भी खासा चर्चित हुआ. असल में ये दोनों प्रसंग एक ही  बात कहते हैं और वह यह कि स्त्रियां पुरज़ोर तरीके से अपनी देह पर अपना हक ज़ाहिर करने लगी हैं और उसे लेकर किसी भी तरह की लज्जा या संकोच का भाव वे मन में नहीं रखना चाहती हैं. अगर व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह उस भेदभाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है जो स्त्री को लगातार सहन करना पड़ता है. तमाम कला माध्यमों में, जिनमें फिल्मों जैसा लोकप्रिय माध्यम भी शामिल है, पुरुष देह के वस्त्रहीन प्रदर्शन को निस्संकोच भाव से न केवल स्वीकार किया जाता है, माचो जैसे शब्दों से सराहा भी जाता है. हमारे अपने देश में कई अभिनेताओं के लिए तो उनकी करीब-करीब हर फिल्म में कमीज़ उतारना ज़रूरी ही मान लिया गया है. उसे कभी कोई अश्लील नहीं कहता है. लेकिन इससे मिलता-जुलता कृत्य अगर कोई अभिनेत्री करती है, और वह भी किसी फिल्म में, तो उसे बदनाम होते देर नहीं लगती. सवाल वही कि स्त्री और पुरुष की देह को लेकर यह भिन्न नज़रिया क्यों?

और शायद इसी सवाल ने प्रेरित किया उस सिलसिले को भी जो दिल्ली के जामिया मिलिया विश्वविद्यालय से शुरु हुआ और कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय तक जा पहुंचा. यह सिलसिला अधिक तीक्ष्ण और स्वभावत: अधिक चौंकाने वाला है, हालांकि इसका मकसद चौंकाना नहीं, अपना प्रतिवाद दर्ज़ करना है. मैं यहां जिस सिलसिले का ज़िक्र कर रहा हूं – सेनेटरी पैड्स पर लिखकर  विरोध करने के सिलसिले का, उसके पीछे एक परम्परा  है. असल में पिछले साल चार्ली नाम की एक लड़की ने एक ट्वीट किया था जिसमें उसने लिखा था – “पुरुष जिस तरह लड़कियों के ऋतुस्राव  से घृणा करते हैं, अगर उसी तरह वे बलात्कार से भी घृणा करते तो!” चार्ली के इस ट्वीट ने एलोने कास्त्रतिया नामक एक जर्मन कलाकार को इतना अधिक प्रेरित किया कि उसने इस इबारत को चालीस सेनेटरी पैड्स पर लिखकर शहर की दीवारों पर चस्पां कर डाला. इस कृत्य के लिए एलोने की खूब तारीफ हुई हालांकि  उसकी आलोचना भी कम नहीं हुई. लेकिन इस तरह एलोने लोगों की चेतना को झकझोरने में कामयाब रही. वैसे सेनेटरी नैपकिन्स को  शिल्प का सम्मान देने के एलोना के इस कृत्य से पहले भी अनेक महिलाएं इस तरह के उद्देश्यपूर्ण प्रयोग कर चुकी थीं. मसलन, ट्रेसी एमिन ने प्रेग्नैंसी किट के साथ एक जार में पुराना इस्तेमाल किया हुआ टेम्पून रखकर उसे ‘पेण्टिंग का इतिहास-1’ नाम दिया तो चिली की एक कलाकार ने पांच साल से जमा  किए  हुए मासिक धर्म के रक्त की एक प्रदर्शनी की जिस पर किसी ने एक बहुत अर्थपूर्ण टिप्पणी की थी कि “पुरुष के खून को वीरता कहा जाता है और हम लड़कियों के रक्त को हमेशा से शर्म की चीज़ कहकर चिह्नित किया जाता है.”

असल में ये सारे कृत्य जिन्हें देखकर या जिनके बारे में पढ़ सुनकर हम विचलित होते हैं, क्षुब्ध होते हैं और जिन्हें हम सुरुचिपूर्ण नहीं मानते हैं, चीख-चीखकर यही पूछते  हैं कि अगर यौन शोषण, बलात्कार, घरेलू हिंसा वगैरह सुरुचिपूर्ण नहीं हैं तो इनके  विरोध में किए गए आंदोलन भला कैसे सुरुचिपूर्ण हो सकते हैं? इस पूरे परिदृश्य पर तसलीमा नसरीन की टिप्पणी मुझे बहुत सार्थक लगती है. वे कहती हैं, “अगर औरतें पुरुषों की सिखाई भाषा में न लिखें, कितना कहना है, कहां तक कहना है, कहां त्तक सीमा खींचनी है – ये रूल्स न मानें, तो पुरुषतांत्रिक लोगों को बड़ा गुस्सा आता है. इस समाज में जो महिलाएं नारी विरोधी लोगों को नाराज़ नहीं कर पातीं, उन महिलाओं को नारी विरोधियों से खराब, स्लट, वेश्या इत्यादि का तमगा नहीं मिलता है – ऐसी औरतों को लेकर ज़्यादा कुछ उम्मीद भी नहीं की जा सकती है. जो नारी विरोधी समाज के साथ समझौता नहीं करतीं, जो ज़िद्दी हैं, नियम तोड़ती हैं, वे ही समाज बदलती हैं. वे ही परिवर्तन  लाती हैं. मैं उन्हें सैल्यूट करती हूं.”  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 मई, 2015 को दुनिया में परिवर्तन लाने वाली औरतों को सलाम शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, May 5, 2015

तू डाल-डाल मैं पात-पात

फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर हमारे बहुत सारे मित्रों को यह शिकायत रहती है कि वहां उनकी तुलना में महिलाओं को अधिक अहमियत  मिलती है. कई लोगों ने तो बाकायदा आंकड़े देकर यह बात साबित करने की कोशिश की है.  उनका कहना है अगर वे कोई रचना या टिप्पणी पोस्ट करते हैं तो  उसे जितना सराहा जाता है उससे कई गुना वैसी ही या उससे बहुत हल्की उस टिप्पणी को सराहा जाता है जिसे किसी महिला ने पोस्ट किया होता है. प्रोफाइल पिक्चर्स के मामले में तो ऐसा और भी अधिक होता है. आप किसी भी महिला के नए  प्रोफाइल पिक्चर पर आई हुई टिप्पणियों को देखकर इस बात की पुष्टि  कर सकते हैं.  लेकिन  इस तरह ‘लाइक्स’ और प्रशांसात्मक टिप्पणियों की गिनती कर महिलाओं से ईर्ष्या  करने वाले लोग इस बात को नज़र अन्दाज़ कर जाते हैं कि घर परिवार बाज़ार गली मोहल्ले की ही तरह सायबर स्पेस में भी महिलाओं को बहुत सारी बदतमीजियों का और बदसुलूकियों का सामना करना पड़ता है. शालीन सराहना की शब्दावली कब अश्लील हो जाती है, और प्रशंसा कब अनचाहे प्रणय प्रस्ताव में तब्दील हो जाती है और महिला का एक नकार कब उसके प्रताड़न का प्रस्थान बिन्दु बन जाता है, पता ही नहीं चलता है. हम आये दिन अश्लील संदेशों, अभद्र छवियों और किसम किसम के अवांछित बर्तावों के बारे में पढ़ते रहते हैं. हमारी बहुत सारी साहित्यिक मित्र भी इस बात की पुष्टि कर सकती हैं कि ऐसा करने वाले कम पढ़े लिखे और संस्कार विहीन लोग ही नहीं हैं, वे भी हैं जो अपने पद, वय और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक हैसियत की वजह से समाज में सम्मानजनक बने हुए हैं.

और दुर्भाग्य की बात यह कि ऐसा केवल हमारे देश में ही नहीं होता है. अभी हाल ही में मैं एक प्रतिष्ठित विदेशी अखबार का ऑनलाइन संस्करण देख रहा था तो मुझे यह जानकर खासा आश्चर्य हुआ कि अमरीका जैसे  देश में भी, जहां स्त्री-पुरुष के मिलने-जुलने पर हमारे देश जैसे सांस्कृतिक अवरोध चलन में नहीं हैं, यह  सब कुछ होना आम है. वहां मैंने पढ़ा कि इकत्तीस साला एशले ब्राइन्सफील्ड नामक एक कस्टम इंस्पेक्टर ने जैसे ही एक डेटिंग साइट टिण्डर पर अपना खाता बनाया, उन्हें न सिर्फ अभद्र  संदेश मिलने लगे, विवाहित पुरुषों तक ने उनसे यौन सम्बन्ध बनाने की पेशकश कर डाली. कई पुरुषों ने तो उन्हें अपनी निर्वसन सेल्फियां भी भेज दीं. एशले ने वही किया जो कोई भी अन्य स्त्री करती. उन्होंने ऐसे लोगों को ब्लॉक किया, या उनकी  शिकायत टिण्डर प्रशासन से  की. लेकिन इससे भी उनकी समस्या हल नहीं हुई. जैसे ही वे कोई कदम उठातीं, ये लफंगे किसी और स्क्रीन नाम से उन्हें तंग करने लग जाते. तंग आकर उन्होंने एक और रास्ता अख्तियार किया. उन्होंने अपने नाम आए आपत्तिजनक संदेशों के  स्क्रीन शॉट्स लिये और उन पर ‘टिण्डर आपकी वैवाहिक समस्याओं का हल नहीं है’ या इसी तरह के अन्य संदेश सुपर इम्पोज करके उन्हें अपने प्रोफाइल पन्ने पर पोस्ट कर उन बदमाशों को लज्जित करना शुरु किया. एशले का कहना है कि अगर वे उन्हें ऐसे ही तंग करते रहेंगे तो वे भी उन्हें लज्जित करती रहेंगी.

लॉस एंजिलस की अलेक्ज़ेण्ड्रा ट्वेटन के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ. इस 27 वर्षीय महिला को ओके क्युपिड और दूसरी अनेक साइट्स पर जब पुरुषों की तरफ से मिलने वाले अश्लील संदेशों का सिलसिला उनके सारे प्रयत्नों से भी नहीं रुका, तो उन्होंने इंस्टाग्राम पर बाय फेलिपे जैसे अवमाननासूचक नाम वाले अपने खाते पर ये सारे संदेश पोस्ट कर दिये. बाय फेलिपे को आप ‘चल फूट’ का पर्याय  मान सकते हैं. लेकिन वे इतना करके ही नहीं रुक गईं. उन्होंने अन्य महिलाओं को भी आमंत्रित किया कि वे भी उन्हें मिले इस तरह के सन्देश इस खाते में पोस्ट कर दें. और आज हालत यह है कि इस खाते पर चार हज़ार प्रविष्ठियां आ चुकी हैं और इसके तीन लाख अठारह हज़ार फॉलोअर्स हैं.  यहां कई सन्देश तो इतने उग्र हैं कि उनका भाव करीब-करीब यह है कि तुम्हें तो मौत से भी कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए. और जो काम अलेक्ज़ेण्ड्रा ने इस बाय फेलिपे से किया वही काम पच्चीस साला एना जेंसलर ने अपनी साइट इंस्टाग्रेनीपेण्ट्स पर किया. वे ओके क्युपिड पर प्राप्त अभद्र संदेशों को अपनी साइट पर कार्टून के रूप में तब्दील कर पोस्ट करती हैं. 

असल में सोशल नेटवर्किंग और डेटिंग साइट्स पर महिलाओं को परेशान किया जाना आम बात है, हालांकि वहां उनसे थोड़ी कम परेशानी पुरुषों को भी भुगतनी पड़ती है. इन  साइट्स के प्रबन्धक भी अपनी तरफ से इन परेशानियों के लिए आई शिकायतों पर समुचित ध्यान देते और इन्हें रोकने का प्रयास करते हैं, लेकिन शरारती तत्वों और इनके बीच तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है. देखना है कि यह सिलसिला कभी खत्म होता भी है या नहीं!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 मई, 2015 को इण्टरनेट का मायाजाल: तू डाल-डाल मैं पात-पात शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 28, 2015

वायरल की उलझनें

आजकल वायरल का मौसम है. इस वाक्य में ‘आजकल’  और ‘वायरल’  दोनों ही ध्यान देने योग्य हैं. आजकल को आप काफी लम्बा खींच लीजिए. और वायरल की परिभाषा का भी वह कर लीजिए जिसे भाषा शास्त्री अर्थ  विस्तार कहते हैं. अर्थ विस्तार यानि किसी शब्द का अर्थ पहले सीमित हो लेकिन धीरे-धीरे विस्तृत होकर काफी फैल जाए. एक अच्छा उदाहरण है स्याही. जैसा कि शब्द से ही  स्पष्ट है, जो स्याह हो वही स्याही. और आपको याद होगा कि पुराने  ज़माने में लिखाई के लिए काली स्याही का ही इस्तेमाल होता था. लेकिन इस शब्द का अर्थ विस्तार हुआ और लिखने के लिए काम आने वाला सारा लिक्विड, उसका रंग भले ही नीला-काला-पीला-हरा-लाल-बैंगनी  कोई भी  हो, स्याही नाम से ही जाना जाने लगा. और ऐसा ही मज़ेदार मामला वायरल का भी है. कुछ समय पहले तक वायरल का एक ही अर्थ, जिसका सम्बन्ध मौसमी बुखार से हुआ करता था,  हमें मालूम था. लेकिन इधर इस वायरल का प्रयोग बुखार के सन्दर्भ  में कम वीडियो के सन्दर्भ में अधिक होने लगा है. आए दिन कोई न कोई वीडियो वायरल हो जाता है. कभी-कभी ऑडियो भी हो जाता है. कार्टूंस भी हो जाते हैं! यानि कुछ भी वायरल हो सकता है.

अब देखिये ना, बहुत पुरानी बात नहीं है जब हॉलीवुड की एक एक्ट्रेस डकोटा जॉनसन  का एक वीडियो वायरल हुआ था. अंग्रेज़ी के एक कुख्यात-विख्यात उपन्यास ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’ पर बनी और सैम टेलर जॉनसन द्वारा निर्देशित इसी नाम की फिल्म में एबे टेसफाय के गाये गाने ‘अर्नण्ड इट’ में इस बाला ने एक रस्सी के जाल में लटक कर हमारे अपने देश की पारो से भी आगे बढ़कर जो अदाएं और जलवे दिखाये उन्होंने इस वीडियो को वायरल होने में बड़ी मदद की. वैसे तो जिन्होंने यह उपन्यास पढ़ रखा है वे सहज ही कल्पना कर सकते हैं कि डकोटा जॉनसन ने इस गाने में कैसा  कमाल दिखाया होगा, फिर भी अज्ञानियों के लिए  इतना संकेत काफी होगा कि सेमी न्यूड नर्तकों के बीच ‘सेमी’ के बिना ही उन्होंने अपना देह-दर्शन कराया है.

और बात जब वायरल की है तो क्या परदेश और क्या देश! इधर  अपने देश में भी एक एक्ट्रेस की कुछ तस्वीरों का वीडियो वायरल हो गया है. इस ताज़ा वीडियो के वायरल होने की बात करूं उससे पहले यह भी याद दिलाता चलूं कि हमारे अभिनेता-अभिनेत्रियों और वायरल का संग साथ कोई आज की बात नहीं है. करीना कपूर-शाहिद कपूर और अस्मिता पटेल-रिया सेन के लिपलॉक की तस्वीरों और वसुन्धरा कश्यप और उनके बॉयफ्रैण्ड की अंतरंग तस्वीरों तथा एक फिल्म के सेट पर ली गई श्रुति हसन की तस्वीर  के वायरल होने की  यादें आपके जेह्न में अभी भी सुरक्षित पड़ी होंगी.  अब इसी कड़ी में एक और एक्ट्रेस की तस्वीरें जुड़ गई हैं.

बॉलीवुड की फिल्म ‘शोर इन द सिटी’ में तुषार कपूर के साथ और सुपरहिट मराठी फिल्म ‘लय भारी’ में रितेश देशमुख के साथ दिखाई दीं  राधिका आप्टे की कुछ निर्वसन छवियां हाल ही में वॉट्सएप और सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं. ये राधिका आप्टे वही हैं जिन्होंने ‘वाह लाइफ हो तो ऐसी’ फिल्म में शाहिद कपूर के साथ डेब्यू किया था. कहा  जा रहा है कि राधिका का जो क्लिप वायरल हुआ है वह असल में अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित एक लघु फिल्म का महज़ कुछ सेकण्ड का अंश है और इस अंश में वे सामने से निर्वसन नज़र आ रही हैं. अनुराग  कश्यप  को यह कहते हुए उद्धृत किया  गया है कि यह फिल्म एक सत्य घटना से प्रेरित है और उनके लिए इस दृश्य को शूट करना बेहद चुनौतीपूर्ण था. अनुराग ने कहा है कि उन्होंने केवल महिला क्रू के साथ ही इस दृश्य को निहायत ही नॉन सेक्सुअल तरीके से शूट किया था.

इस पूरे प्रकरण में दो-तीन बातें गौर तलब हैं. अनुराग कश्यप का यह कहना है कि उन्होंने यह फिल्म इण्टरनेशनल मार्केट के लिए बनाई है और जो क्लिप लीक होकर वायरल हुई है वह उनके शूट किये गए फुटेज को न्यू यॉर्क में डिलीवर कर देने के बाद हुई है. अनुराग ने सन्देह ज़ाहिर  किया है कि इस लीक में कदाचित किसी भारतीय का हाथ है. अपने इस सन्देह को वज़नदार बनाने के लिए उन्होंने तर्क यह दिया है कि पश्चिम में तो इससे काफी ज़्यादा सेक्सुअल सामग्री उपलब्ध  रहती है इसलिए भला वे लोग क्यों इस बात को कोई तूल देंगे. अब आइये दूसरी बात पर. जानकारों का कहना है कि जो तस्वीरें वायरल  हुई हैं वे निजी तौर पर ली गई सेल्फी की हैं. और तीसरी बात यह कि खुद राधिका आप्टे ने अपने ट्विटर हैंडल पर इन तस्वीरों के खुद की होने से इंकार किया है.

यानि इस वायरल में तो बड़ी उलझनें  है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 अप्रेल, 2015 को वायरल की गुत्थी उलझाता सोशल वायरस शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    

Tuesday, April 21, 2015

सुन्दर होने के फायदे और नुकसान

पिछले दिनों हमारे देश के नेताओं की ज़बान फिसलने के जो बहुत सारे मामले सामने आए उनमें से कई का सम्बन्ध रंग और रूप से भी था. हमारे देश में सामान्यत: गोरे रंग को सौन्दर्य  का  एक ज़रूरी घटक मान लिया जाता है, हालांकि दुनिया के और देशों में इसका उलट भी है. पश्चिमी देशों में जहां गोरा रंग आम है, सौन्दर्य में वृद्धि के लिए सूरज की तेज़ धूप की मदद से टैनिंग कर त्वचा को ताम्बई बना कर सुन्दरता की तरफ क़दम बढ़ाये जाते हैं. यही बात शरीर के दुबले और मोटे होने को लेकर भी है. दुनिया में अगर कहीं खाया पीया होना सुन्दरता का पर्याय माना जाता है और दुनिया के और बहुत सारे देशों के अनुकरण पर पिछले दिनों हमारे देश में भी साइज़ ज़ीरो के प्रति गहरे आकर्षण के भी हम सब गवाह रहे हैं.

सुन्दरता के घटक चाहे जो हों, इतना तै है कि आपका सौन्दर्य आपको बिना मांगे ही बहुत सारे फ़ायदे सुलभ करा देता है. अमरीका की उत्तर कैरोलिना विश्वविद्यालय की दो समाज मनोवैज्ञानिकों लिसा स्लैटरी वॉकर और टोन्या फ्रेवर्ट ने हाल ही में एक अध्ययन कर यह जाना कि व्यक्ति की सुन्दरता उसे बहुत सारे फायदे स्वत: दिला देती है. आप जिनके सम्पर्क में आते हैं वे अनजाने में ही यह मान लेते हैं कि अगर आप सुन्दर हैं तो आपमें कुछ अतिरिक्त प्रतिभा भी होगी ही.  इसे हमारे देश में प्रचलित सत्यं शिवम सुन्दरम  उक्ति के साथ भी मिलाकर देखा जा सकता है. वॉकर और फ्रेवर्ट ने अपने अध्ययन में पाया कि शिक्षण संस्थाओं में भी विद्यार्थियों  की सुन्दरता  उनके शिक्षकों पर सकारात्मक प्रभाव डालती है और अपने विद्यार्थियों का मूल्यांकन करते हुए वे सुदर्शन विद्यार्थियों के प्रति अधिक उदार रहते हैं.

और जब ये विद्यार्थी शिक्षण संस्थाओं से निकल कर रोज़गार के क्षेत्र में जाते हैं तो उनकी खूबसूरती वहां भी उनके लिए फायदेमन्द साबित होती है.  अधिक आकर्षक लोग कॉर्पोरेट जगत की सीढ़ियां ज़्यादा तेज़ी  से चढ़ते हैं और अधिक पैसा कमाते हैं. अमरीका में एमबीए स्नातकों पर किए गए एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि एक ही समूह में कम और ज़्यादा आकर्षक कार्मिकों के वेतन आदि में दस से पन्द्रह प्रतिशत का फर्क़ था, और इस तरह अधिक आकर्षक कार्मिक अपने पूरे सेवा काल में करीब डेढ करोड़ रुपये ज़्यादा कमाता है.

ज़्यादा और कम सुन्दर के बीच यह भेदभाव और भी बहुत सारी जगहों पर पाया गया. मसलन अदालतों में भी पाया गया कि सुन्दर व्यक्ति को अपेक्षाकृत  मुलायम दण्ड मिला और अगर वकील सुदर्शन था तो वह न्यायालय से अधिक अनुकूल फैसले  करवाने में कामयाब रहा. इन उदाहरणों से, जिनकी पुष्टि हमारे अपने अनुभवों से भी होती है यह माना जा सकता है कि अगर जीवन की अन्य बातें, मसलन आपकी अकादमिक योग्यता आदि समान हो तो आपके व्यक्तित्व का सौन्दर्य आपको कुछ अतिरिक्त फायदे पहुंचाने में सफल रहता है.

लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसकी तरफ  सामन्यत: किसी का ध्यान नहीं जाता है. वॉकर और फ्रेवर्ट का अध्ययन ऐसे भी कुछ प्रकरण सामने लाता है जहां सुन्दरता फायदे की बजाय नुकसान का सौदा साबित होती है. इन प्रकरणों में कुछ में लिंग भेद है और कुछ सबके लिए एक जैसे हैं. ये मनोवैज्ञानिक बताती हैं कि कई बार जब किसी उच्च पद के लिए अधिकारी का चयन किया जाना होता है तो  अधिक सुन्दर प्रत्याशी को यह सोचकर छोड़ दिया जाता है कि वो शायद कठोर निर्णय ले पाने में कम सक्षम साबित हो. एक बहुत मनोरंजक बात इस अध्ययन में यह भी सामने आई कि जब चनयकर्ता और प्रत्याशी समान लिंग वाले यानि स्त्री-स्त्री या पुरुष-पुरुष होते हैं तो वहां चयनकर्ता का ईर्ष्या भाव अधिक आकर्षक प्रत्याशी के प्रतिकूल चला  जाता है. हमारे  यहां भी तो बाबा तुलसीदास कुछ ऐसी ही बात कह गए हैं कि मोहे न नारी नारी के रूपा. पश्चिम की एक ऑनलाइन डेटिंग साइट ओके क्यूपिड का अनुभव भी कुछ-कुछ इसी तर्ज़ पर है. इस साइट ने पाया कि जिन लोगों के प्रोफाइल पिक्चर्स एकदम बेदाग थे उनकी तुलना में उन्हें डेटिंग पार्टनर ज़्यादा आसानी से मिले जिनकी पिक्चर्स ऐसी बेदाग नहीं थी. बताया गया गया कि प्रत्याशियों की एकदम मुकम्मिल छवि से दूसरा पक्ष आतंकित हो जाता है और पहल करने में सकुचाने लगता है. 
इस अध्ययन की  सबसे मज़ेदार किंतु त्रासद बात तो यह है कि ज़्यादा सुन्दर लोगों को  इसलिए कम उम्दा चिकित्सा सुविधा मिल पाती है कि चिकित्सकगण भी उनके रोग को कम गम्भीरता से लेते हैं. शायद वे सुन्दरता को स्वास्थ्य का पर्याय मान बैठते हैं. इस तरह जब सुन्दरता के फायदे और नुकसान दोनों हमारे सामने हैं तो बहुत स्वाभाविक है कि हम यह सोचें कि हमें मदद किससे मिलती है सुन्दरता से, या उसके अभाव से? लेकिन यह सोचने से पहले यह भी तो जानना होगा कि सुन्दरता क्या है!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 अप्रेल 2015 को सुन्दर हैं तो जितने फायदे उतने नुकसान शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 14, 2015

समाज की दीवारों से टकराता सोशल मीडिया

समाज और इसके मीडिया यानी सोशल मीडिया में इन दिनों एक और  उफान आया हुआ है। हालांकि यह उफान अभी सोशल मीडिया की दीवारों से टकरा कर अपने जोर की आजमाइश ही कर रहा है, पर नई पीढ़ी की मानसिकता के बदलाव की तेज़ गति को देखते हुए लगता नहीं कि यह उफान उन दीवारों को तोड़ कर वास्तविक सोशल लाइफ तक पहुंचने में बहुत देर लगाएगा। दरअसल यह उफान बहुत सारे मुद्दों से बन कर अपनी गति पकड़ रहा है। अगर आप यह अनुमान लगा रहे हैं कि इन में पहला मुद्दा माई चॉइस वीडियो के जरिए दिए जा रहे संदेश का है, तो आपका अनुमान सही है। यह संदेश कई मायनों में आजादी की बात कर रहा है। वैसे हमारे समाज के कुछ विद्रोही लोग अर्से से इस आजादी का उपभोग करते और इसे सम्मान देते रहे हैं। देह को आधार बना कर बनाए गए इस वीडियो पर मिली-जुली  प्रतिक्रियाएं आई हैं, पर एक तथ्य यह भी है कि आधुनिकतम समाज का तमगा हासिल किए पश्चिम में भी अभी विवाहेतर संबधों को स्वीकृति का सम्मान नहीं दिया गया है। 


माई चॉइस को फाइनली माई चॉइस ही रहने दिया जाए तो बेहतर है। इसके बाद एक और मुद्दा है जिसे संसार भर की आधी आबादी  अपनी आधी उम्र तक झेलती है और जिसके बारे में लगभग सभी वयस्कों को पता होता है पर सार्वजनिक रूप से जिसकी चर्चा करना लगभग शर्मिंदगी वाला मामला माना जाता है। यह मुद्दा भी आजकल सोशल मीडिया की दीवारों से टकरा रहा है। महिलाओं के ‘उन दिनों’ का। हालांकि फेसबुक पर पिछले काफी समय से इस दौरान महिलाओं को होने वाली तकलीफों  और इसके प्रति सामाजिक नजरिए को कई महिलाओं ने अपनी कविताओं और अन्य पोस्ट्स के माध्यम से उठाया है। पर हाल ही में भारतीय मूल की एक कनाडाई लेखिका रूपी कौर  ने इस अनुभव से संबंधित एक फोटो इन्स्टाग्राम पर शेयर किया  लेकिन  इस साइट ने इस फोटो को  पॉलिसी विरुद्ध बता कर दो बार हटा दिया। इस पर रुपी कौर ने बहुत जायज सवाल उठाया कि आखिर इसमें शर्मिन्दगी की क्या बात है? और अंतत: साइट को भी रूपी कौर से क्षमा याचना करने और इस फोटो को फिर से स्वीकृति देने को विवश  होना पड़ा.


और इन बातों के बाद एक समाचार जिसने बरबस ही हमारे चेहरों पर एक मुस्कुराहट ला  दी। दरअसल समाचार ही कुछ ऐसा था कि यादों के कोठार से काफी कुछ निकल पड़ा। बात सत्तर के दशक के मध्य की है जब मैं नया-नया प्राध्यापक बन कर राज्य के एक मझोले कस्बे में पहुंचा था और अपने एक वरिष्ठ साथी की मेज़बानी का लुत्फ ले रहा था। एक दिन हम दोनों बाज़ार गए तो उन्होंने अन्य सारी खरीददारी कर चुकने के बाद उस दुकानदार से रहस्यपूर्ण अन्दाज़ में ‘चीज़’  भी देने का अनुरोध किया। सामान लेकर लौटते हुए मैंने अपनी बेवक़ूफी में उनसे पूछ लिया कि ‘चीज़’  जैसी चीज़ को उन्होंने इस तरह रहस्य भरे अन्दाज़ में क्यों मांगा? और तब उन्होंने घुमा फिराकर मुझे बताया कि चीज़ शब्द का प्रयोग असल में उन्होंने किस वस्तु के लिये किया था। उसके कुछ बरस बाद भी, जब सरकार की ‘हम दो हमारे दो’ नीति के उत्साहपूर्ण क्रियान्वयन के तहत विभिन्न सरकारी विभागों में वह चीज़ निशुल्क वितरण के लिए उपलब्ध कराई जाती थी तो हम अपने कॉलेज के बाबू से बिना संज्ञा का प्रयोग किए, सर्वनाम या संकेत की मदद से वह चीज़ मांगा करते थे। हममें से शायद ही कभी किसी ने नाम लेकर कहा हो कि मुझे यह चाहिये। अब इसे आप संस्कार कहें, संकोच कहें, शालीनता कहें, गोपनीयता कहें या और कुछ भी कहें. वस्तु स्थिति यही थी।


अब तक तो आप समझ ही गए  होंगे कि मैं किस ‘चीज़’  की बात कर रहा हूं। और यह प्रसंग मुझे याद आया इस बात से कि सरकार ने सरकारी उपक्रम से बन कर बिक रहे कंडोम की पैकेजिंग को सुधारने का निर्णय लिया है। वह भी उस दौर में जब उनके प्रतिद्वंद्वी पैकेजिंग और विज्ञापन में उससे कई गुना आगे निकल चुके हैं।  बहरहाल उदारीकरण से पहले के सरकारी सक्रियता के दौर में भी भारत की जनसंख्या को थामे रखने वाले उस ब्रांड को बचाने के लिए भी यदि अब सरकार कुछ करती है तो उसके लिए हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं। पर क्या एक सरकारी उत्पाद विज्ञापन और पैकेजिंग के मामले में अपने व्यावसायिक प्रतिद्वन्दियों को टक्कर दे सकेगा?  मर्यादा के बन्धन आड़े नहीं आएंगे? लेकिन आप भी सोचिये कि  जिस देश में कामसूत्र लिखा गया, जहां खजुराहो तराशा गया और इन सबसे ऊपर जहां काम को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया जितना धर्म, अर्थ और मोक्ष को माना गया, क्या वहां ऐसी कोई मज़बूरी होनी चाहिए
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 14 अप्रेल, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, March 24, 2015

हमारे परिवेश की देन है नकल

बिहार में मैट्रिक की परीक्षा में अपने परिजनों को नकल करवाने के लिए दीवार पर चढ़े अभिभावकों और शुभ चिंतकों की तस्वीर इण्टरनेट पर और अन्य समाचार माध्यमों में आने के बाद एक बार फिर से परीक्षाओं में नकल को लेकर गम्भीर चर्चाएं शुरु हो गई हैं. बात किसी एक राज्य की या अन्य राज्यों की तुलना में उसके बदतर होने या न होने की नहीं है. शिक्षा से जुड़े लोग इस बात  से भली भांति अवगत हैं कि आम तौर पर जो शिक्षा एवम परीक्षा प्रणाली हमारे यहां प्रचलन में है  उसमें नकल को रोक पाना लगभग असम्भव है. हर परीक्षार्थी नकल नहीं करता है और हर जगह नकल करने वालों की संख्या भी समान नहीं होती है, लेकिन अगर कोई यह कहता है कि सिर्फ अमुक जगह ही नकल होती है तो स्पष्ट ही वह उस जगह विशेष के साथ अन्याय कर रहा है.
अपने लगभग साढ़े तीन दशकों लम्बे अध्यापन काल में मैंने नकल के अनेक रूप देखे हैं. कुछ विद्यार्थी नकल के लिए अपने कौशल का, छल का इस्तेमाल करते हैं तो कुछ बाहु बल का. और ऐसा भी नहीं है कि सारा दोष विद्यार्थियों का ही है. बहुत बार शिक्षक या संस्था प्रमुख, और विशेष रूप से निजी संस्थाओं वाले अपने विद्यार्थियों को नकल करने की सुविधा उपलब्ध करते हैं या नकल करने में उनकी सहायता करते हैं. हम सब अंतत: एक ही समाज और एक ही परिवेश की उपज हैं इसलिए इसे बहुत अस्वाभाविक भी नहीं माना जाना चाहिए. जब कोई रिश्वत लेकर या देकर काम करवा सकता है तो भला उसे नकल से क्यों गुरेज़ होगा?

यह लिखते हुए मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है. मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था और इसलिए स्वभावत:  अपने कॉलेज के परीक्षा केन्द्र का अधीक्षक भी था. सरकार ने नकल रोकने के लिए जो बहुत सारे कदम उठाये थे उनमें से एक यह भी था कि जो भी परीक्षार्थी नकल करते हुए पकड़ा जाए उसके खिलाफ पुलिस में एफ आई आर भी अनिवार्यत: दर्ज़ करवाई जाए. इस वजह से स्थानीय पुलिस प्रशासन से कई कई दफा सम्पर्क भी होता रहता था. एक दिन स्थानीय पुलिस के एक अधिकारी जी का फोन आया और उनके स्वर में जो अतिरिक्त मिठास थी, उसने मुझे अनायास ही चौकन्ना कर दिया. पहले तो वे इधर उधर की बातें करते रहे, फिर बड़े सहज भाव से बोले कि उनका साला भी मेरे केन्द्र से परीक्षा दे रहा है और उसकी परीक्षा अभी शुरु होने ही वाली है. मैंने अपनी मासूमियत को बरक़रार रखते हुए साले साहब  के लिए उन्हें बेस्ट ऑफ लक कहा, और बात को दूसरी तरफ मोड़ना  चाहा, लेकिन वे वहीं रुके रहे, और फिर बोले कि मैं उसका ध्यान रखूं. अब मैं समझ गया था कि वे क्या चाहते थे! लेकिन उस वक़्त  नासमझ बना रहना ही सुविधाजनक था, इसलिए मैंने उनसे कहा कि वे आश्वस्त रहें, हमारे यहां उसे कोई असुविधा नहीं होगी. सारे कमरों में पंखे हैं, और पानी भी ठण्डा ही पिलाया जाता है. अब उन्हें भी सीधे ही अपनी बात कहना ज़रूरी लगा, सो बोले: “नहीं सर, वो ऐसा है कि इस साल वो ठीक से पढ़ाई नहीं कर सका है, इसलिए आप उसका ज़रा ध्यान रख लें तो.....”  बात बिल्कुल साफ थी. अब मैं भी कुछ मज़े लेने के मूड में आ चुका था. तुरंत बोला, “अरे हां, मुझे भी एक काम याद आ गया है.”  पुलिस अधिकारी जी तो ऑब्लाइज़ करने के लिये जैसे तैयार ही बैठे थे. “‘सर हुक्म कीजिए”. “वो ऐसा है कि मेरा  भी एक साला है. ज़्यादा पढ़ लिख नहीं सका, और घर की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. अगर आप आज रात उसे कहीं सेंध लगा लेने दें तो...”  और मैं अपना  वाक्य पूरा करता उससे पहले ही उन्होंने फोन काट दिया. मेरा मकसद तो पूरा हो ही गया था.

और नकल की बात करते हुए मुझे अपने स्कूली जीवन के एक सहपाठी  की और याद आ रही है. बहुत ही कुशल नकलची था वो. तेज़ से तेज़ वीक्षक की आंखों में धूल झोंककर नकल कर लेने में माहिर. लेकिन फिर भी नकल का कोई लाभ उसके परिणाम में देखने को नहीं मिलता. आखिर हमने अपने एक शिक्षक से इस बात का राज़ पूछ ही लिया. उन्होंने बताया कि वह बन्दा अपने आगे-पीछे वाले किसी अन्य परीक्षार्थी से पूछता कि किताब में कहां से कहां तक टीपना है और फिर यथावत कॉपी में उतार डालता. परिणाम यह कि ‘बच्चों, तुम पिछले अध्याय में पढ़ चुके हो’ और ‘देखो चित्र संख्या  7’ जैसे वाक्य भी उसकी उत्तर पुस्तिका में पाए जाते. अब ऐसे अतुलनीय विद्यार्थी को तो कोई असाधारण परीक्षक ही पुरस्कृत कर सकता था.

तो अनंत है यह नकल पुराण. मुझे तो इसका समाधान परीक्षा प्रणाली में बदलाव में ही नज़र आता है, और उसकी फिलहाल कोई सम्भावना नज़र नहीं आती.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 24 मार्च, 2015 को 'नकल करवानी है तो लगवाने दो सेंध' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.      

Tuesday, March 17, 2015

दही बड़ा, कटोरी और पार्किंग

इधर  लगातार तीन शादियों में, मतलब शादी की दावतों में, जाने का मौका मिला और तीनों जगह एक जैसे अनुभव हुए. उन अनुभवों के बारे में मैं इस कॉलम में नहीं लिखता, अगर एक और अनुभव ने मुझे यह बात कह डालने को विवश न कर दिया होता. पहले शादी की दावतों का अनुभव. अपनी प्लेट में सलाद सब्ज़ियां वगैरह लेकर जब दही बड़े के काउण्टर तक पहुंचा तो इधर उधर नज़र दौड़ाई कि कहीं कटोरियां रखी हुई मिल जाएं. जब मुझे नज़र न आई तो वहां खड़े बैरे से पूछा, और उसने जवाब दिया कि कटोरियां दाल की काउण्टर पर है, सब लोग वहां से ला रहे हैं. अगर चाहूं तो मैं भी वहां जाकर ले आऊं. और ठीक यही अनुभव जब बाद की दो दावतों में भी हुआ तो मैं सोचने को मज़बूर हुआ कि आखिर केटरर्स को यह बात समझ में क्यों नहीं आती कि जहां दही बड़े रखे हैं वहीं उनके लिए कटोरियां भी रख दी जाएं! आखिर दही बड़ा तो कोई प्लेट में रखकर खाएगा नहीं.

और इस बात की तरफ मेरा ज़्यादा ध्यान जिस अनुभव से गया, वह यह है. इधर तीन दिन में दो बार जयपुर हवाई अड्डे पर जाने का अवसर आया. जिन्हें नहीं मालूम है उनकी जानकारी के लिए यह बात बताता चलूं कि जयपुर हवाई अड्डे पर निजी वाहनों के लिए एक ख़ास व्यवस्था है. जैसे ही आप हवाई अड्डा परिसर में प्रवेश करते हैं आपको एक पार्किंग टिकिट दिया जाता है जिस पर आपके प्रवेश करने का समय अंकित होता  है. अगर आपको सिर्फ किसी को हवाई अड्डे पर छोड़ना या वहां से लेकर  आना है  तो जल्दी से जल्दी से जल्दी यह काम कर लौट आएं, निकास पर अपनी वह पर्ची दें और अगर आपको आठ मिनिट से कम का समय लगा है तो बिना कोई शुल्क चुकाए चले आएं. इस तरह के सामान्य काम के लिए यह अवधि पर्याप्त है.  लेकिन अगर आप किसी के विदा होने तक वहां रुकना चाहते हैं, या वहां पहले पहुंच कर अपने अतिथि के आने की प्रतीक्षा करना और उन्हें लेकर आना चाहते हैं तो ज़ाहिर है कि आपको आठ मिनिट से ज्यादा का वक़्त लगेगा और तब आपको साठ रुपया पार्किंग शुल्क देना होगा. प्रीमियम पार्किंग के लिए तो यह शुल्क और अधिक है. तो अपनी इन दोनों हवाई अड्डा यात्राओं में मैंने पाया कि जवाहर सर्कल से थोड़ा आगे बढ़ते ही और ख़ास तौर पर टर्मिनल 2 वाली सीधी सड़क पर एक पूरी लेन एक के पीछे एक खड़ी हुए कारों से भरी हुई रहती है. होता यह है कि अपने मेहमानों को लेने आने वाले लोग बजाय साठ रुपया पार्किंग शुल्क खर्च करने के सड़क किनारे अपनी गाड़ी खड़ी कर उसी में बैठे रहते हैं और जैसे ही उनका अतिथि हवाई अड्डे से मय लगेज बाहर निकल कर उन्हें फोन करता है वे अन्दर  जाकर उसे लिवा लाते हैं. कहना अनावश्यक है कि इस काम के लिए जितने समय गाड़ी हवाई अड्डे के भीतर रहती है उसके लिए पार्किंग शुल्क देय नहीं होता है. यानि सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों की यह कतार पार्किंग शुल्क बचाने वालों की होती है. उस सड़क पर यह नज़ारा आम है.

इस मंज़र को देखते हुए मुझे कुछ बरस पहले की अपनी अमरीका यात्रा की याद हो आई. वहां के सिएटल-टकोमा हवाई अड्डे पर मैंने पाया कि सामान्य सशुल्क पार्किंग एरिया के अतिरिक्त एक सेल पार्किंग एरिया और है जहां वही सुविधा बाकायदा सुलभ है जिसको जयपुर के नागरिकों ने अवैध तरह से हासिल कर रखा है. यानि आप गाड़ी खड़ी कीजिए, उसमें बैठे रहिये (यह ज़रूरी है) और जैसे ही आपके अतिथि का कॉल आए, जाकर उन्हें लिवा लाइये. वहां गाड़ी खड़ी रखने के लिए आपको कोई पार्किंग शुल्क  नहीं देना होता है. इतना ज़रूर है कि  उस सेल पार्किंग एरिया में आप अधिकतम तीस मिनिट तक अपनी गाड़ी खड़ी रख सकते हैं. लेकिन वहां के प्रशासन को इस तीस मिनिट की अवधि का निर्वाह करवाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं करनी पड़ती है. लोग स्वत: इस समय सीमा का पालन  कर लेते हैं.

अब अमरीका के इस अनुभव को याद करते हुए मैं सोचता हूं कि आखिर क्यों हम लोगों की ज़रूरत को देख समझ तदनुसार व्यवस्था नहीं करते हैं? जब लोग जयपुर हवाई अड्डे पर पार्किंग शुल्क से बचने के लिए उस तेज़ यातायात वाली सड़क की एक लेन रोकने की अवांछित हरकत करने को मज़बूर हैं तो क्या प्रशासन को उनकी ज़रूरत को समझ तदनुसार व्यवस्था नहीं कर देनी चाहिए? और चलिये प्रशासन से तो संवेदनशीलता और सूझ-बूझ की  उम्मीद करना बहुत व्यावहारिक नहीं होगा, हमारे केटरर और शादियों पर इतना ज़्यादा खर्च  करने वालों को भी अगर यह नहीं सूझता कि दही बड़ों के पास कटोरियां भी रख दी जाएं,  तो मान लेना चाहिए कि गड़बड़ हमारी मानसिक बनावट में ही है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 17 मार्च, 2015  को दही बड़े की कटोरियों जैसा पार्किंग का सवाल शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, March 10, 2015

क्या अतीत एक शरणगाह है?

ऐसे अनुभव बहुत बार होते हैं. कल फिर हुआ. कल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस था ना! एक  आयोजन में शामिल होने का मौका अपन को भी मिला. मैं जब भी किसी आयोजन में जाता हूं मुझे शादी की दावत याद आए बिना नहीं रहती है. मुझे शादी की सारी दावतें एक जैसी लगती हैं. एक जैसा मेन्यू और एक जैसा माहौल. फर्क़ होता है तो बस अंकों का. कहीं तीन मिठाइयां तो कहीं पांच. और ऐसा ही अनुभव वैचारिक अथवा अकादमिक आयोजनों में जाकर  भी होता है. वही स्वागत, वही माल्यार्पण, वही लम्बे-लम्बे भाषण, वही आभार प्रदर्शन, वही स्मृति चिह्न समर्पण, वही समय की कमी की शिकायत और वही पारस्परिक तारीफें. अंतर  सिर्फ इस बात का कि इस आयोजन में मंच पर तीन विशिष्ट जन और उसमें सात.  फिर भी इसे शिकायत न माना जाए! असल में हमने अपने कार्यक्रमों का एक सांचा गढ़ लिया है और हर सम्भव कोशिश करते हैं कि जो भी करें वो उसी सांचे के अनुरूप हो. अंग्रेज़ी में जिसे आउट ऑफ द बॉक्स कहते हैं उस तरह से सोचने या करने का साहस हम कर  नहीं पाते हैं, इसलिए जैसा चलता आ रहा है वैसा ही चलता चला जाता है. और इस सबके बावज़ूद मैं इन कार्यक्रमों में जाता हूं, सोत्साह जाता हूं, शिरकत करता हूं और हर बार कुछ न कुछ नया जान-सीख-ले कर लौटता हूं. प्राय: यह भी सोचता हूं कि अगर मुझे कोई कार्यक्रम करना होगा तो मैं कौन नौ की तेरह कर लूंगा! वो सांचा तो मेरे भी सामने रहेगा.

तो मैं बात कल के कार्यक्रम की कर रहा था. कार्यक्रम के दो भाग थे. कुछ विशिष्ट महिलाओं का सम्मान और एक विचार गोष्ठी. उस विचार गोष्ठी में इन सम्मानित महिलाओं में से कुछ और कुछ अन्य स्त्री-पुरुष वक्ता  थे. अवसर के अनुरूप विचार गोष्ठी का विषय महिला सशक्तिकरण के आकलन से सम्बद्ध था. संयोग से इस गोष्ठी का पहला वक्ता मैं था और मैंने बहुत बेबाकी से यह बात कही कि यह विषय ऐसा नहीं है कि आप अधिकार पूर्वक कोई एक पक्ष चुन सकें. आप न तो यह कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण के मामले में हालात जस के तस हैं, और न यह कह सकते हैं कि आज की महिला पूरी  तरह से सशक्त और समर्थ हो चुकी है. मेरे बाद बोलने वाले वक्ताओं ने अपनी अपनी दृष्टि से स्थिति का आकलन प्रस्तुत किया और मुझे स्वीकार करना चाहिए कि हरेक की बातों में कुछ न कुछ नया और  विचारोत्तेजक था. और इसी नए के लिए तो हम इस तरह के आयोजनों में जाते हैं!

लेकिन एक वक्ता का वक्तव्य इन सबसे हटकर था. वे ‘देवभाषा’  के विद्वान थे और उन्होंने अपनी बात शास्त्रों में गाई गई स्त्री महिमा से शुरु की. एक वक्ता के रूप में हममें से बहुतों को बहुत बार वर्तमान तक आने के लिए अतीत का सीढ़ी की मानिंद प्रयोग करना पड़ता है. लेकिन थोड़ी देर में लग गया कि वे अतीत के स्वर्णकाल में ही विचरण करना चाहते हैं. अतीत से उनका मोह  इतना प्रगाढ़ और तृप्त कर डालने वाला था कि वर्तमान तक आने की उन्हें कोई आवश्यकता ही महसूस नहीं हो रही थी. और अतीत भी तथ्य कथन या सजीव चरित्रों के माध्यम से नहीं, सुभाषितों के माध्यम से. यानि कुछ कुछ इस तरह कि जब हमारे शास्त्रों में लिख दिया गया है कि स्त्रीदेवी है, शक्ति  स्वरूपा है, तो बस है! अब और सोच विचार की ज़रूरत ही क्या है?

जैसा कल इस वक्तव्य के रूप में सामने आया, वैसा उन बहुत सारी गोष्ठियों में सामने आता है जिनमें समकाल की किसी अवस्था पर विचार किया जा रहा होता है. और गोष्ठियों में ही क्यों? हमारे रोज़मर्रा के जीवन में भी बहुत बार ऐसा होता है कि जब बात हमारी हो रही होती है तो हम उसे खींच कर अपने पुरखों तक ले जाते हैं. हमारे टू बी एच के के फ्लैट में कोई आता है तो हम बलपूर्वक यह बताए बिना नहीं रहते हैं कि हमारे पुरखे तो हवेलियों के स्वामी थे. मेरे पड़ोस में एक बच्चा था, कोई ढाई तीन साल का. अक्सर मेरे पास आ जाता था. मैं जब भी उससे उसके बारे में कुछ पूछता, जैसे यह कि तेरे पास कितनी पेंसिलें हैं, तो उसका जवाब हमेशा अपने बड़े भाई के बारे में होता, कि गौरव के पास सात पेंसिलें हैं. उस बच्चे के मन में कोई चालाकी नहीं थी, लेकिन फिर भी वो अपने सहज बोध से अपनी हीनता को छिपाने के लिए अपने भाई की आड़ लेता था. लेकिन हम जो पढ़े लिखे हैं, और बहुत सोच-विचार के बाद कुछ कहते हैं, वे भी जब वर्तमान की बात करने के लिए अतीत की आड़ लेते हैं तो इसे क्या कहा जाए?

शुतुरमुर्ग के बारे में तो सुना है ना आपने!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 10 मार्च, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Tuesday, March 3, 2015

किताबें अब झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से

गुलज़ार साहब की एक बहुत मशहूर नज़्म है – किताबें झांकती हैं बन्द अलमारी के शीशों से/ बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं.  किताबों के परिदृश्य में पिछले चन्द  बरसों में जो बदलाव आया है उसे देखते हुए मुझे यह नज़्म पुरानी लगने लगी है. बहुत पुरानी बात नहीं है जब मेरी भाषा हिन्दी में सामान्यत: किताब का एक संस्करण ग्यारह सौ प्रतियों का होता था. तब जो मुद्रण तकनीक प्रचलित थी उसके लिहाज़ से भी शायद इतनी प्रतियों से कम छापना व्यावहारिक नहीं होता था. बहुत सारी किताबों की, जिनमें पाठ्य पुस्तकें और लुगदी साहित्य का ज़िक्र ख़ास तौर पर किया जा सकता है, इससे काफी ज़्यादा प्रतियां भी छपती  थीं. लोकप्रिय उपन्यासकार गुलशन नन्दा के एक उपन्यास ‘झील के उस पार’  की पांच लाख प्रतियों के छपने और बिकने की चर्चा काफी समय तक होती रही थी. और बात ऐसी भी नहीं है  कि सिर्फ लुगदी साहित्य ही बिकता रहा है. हिन्दी में ही तुलसी और प्रेमचन्द की बात तो छोड़िये, धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’, भगवतीचरण वर्मा का ‘चित्रलेखा’, श्रीलाल शुक्ल का ‘राग दरबारी’, शिवानी और नरेन्द्र कोहली के अनेक उपन्यास, दुष्यंत कुमार का ग़ज़ल  संग्रह ‘साये में धूप’  उन बहुत सारी किताबों में से कुछ हैं जो खूब बिकी हैं और अब भी बिकती हैं. संस्करण, और पुनर्मुद्रण की इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले इस बात का ज़िक्र भी करता चलूं कि विदेशी हैरी पॉटर वगैरह को तो छोड़िये, हमारे अपने मुल्क के लोकप्रिय कथाकार चेतन भगत के हालिया प्रकाशित उपन्यास ‘हाफ़ गर्लफ्रैण्ड’ की बीस लाख प्रतियों के पहली खेप में और एक  साल में इससे दस लाख और प्रतियों के बिकने की चर्चाएं खूब हो चुकी हैं. और यह बात तब जब हम यह कहते नहीं थकते हैं कि अंग्रेज़ी इस देश के मात्र दो प्रतिशत की भाषा है. 

लेकिन इन्हीं तमाम बातों  के बरक्स यह एक त्रासद सच्चाई है कि हिन्दी की आम किताब  का संस्करण अब ग्यारह सौ प्रतियों से सिकुड़ते-सिकुड़ते तीन सौ, बल्कि उससे भी कम तक आन पहुंचा है. और यह कहते हुए मैं उस नए प्रिण्ट ऑन डिमाण्ड नामक फिनोमिना की बात नहीं कर रहा हूं जिसमें संख्या की कोई बात रह ही नहीं गई है:  अगर आपको एक प्रति चाहिये तो एक छाप कर दे दी जाती है. बेशक यह बात मुमकिन हुई  है नई मुद्रण तकनीकी की वजह से जहां पुस्तक के पाठ को कम्पोज़ करके कम्प्यूटर में सेव करना और यथावश्यकता प्रतियां मुद्रित कर लेना सम्भव हो गया है. अब भला क्यों कोई प्रकाशक ज़्यादा प्रतियां छापने में अपने कागज़, लागत तथा गोदाम की स्पेस को ब्लॉक करे? और इसी स्थिति ने हिन्दी में एक नई प्रजाति को पनपाया है. उस नई प्रजाति ने अपना नाम तो अभी पुराने वाला  ही रखा है – प्रकाशक, लेकिन असल में काम वह मुद्रक का करता है. जैसे पहले आप किसी प्रिण्टर के पास जाकर अपनी बिल बुक, शादी या मौत मरण का कार्ड छपवा लाते थे, वैसे ही अब इस नए प्रकाशक के पास जायें, और पैसे देकर अपने लिखे को छपवा लें. उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि आप कैसा, क्या और क्यों छपवा रहे हैं? आपने पैसे दिये, उसने छाप दिया. बेचने की परवाह भी उसे नहीं करनी है. इसलिए वो ज़्यादा प्रतियां भी नहीं छापता  है. उतनी ही  छापता  है जितनी छापने  के आपने पैसे दिये हैं. दस-बीस प्रतियां अपने पास रखकर शेष सारी वो आपको दे देता है. और आपके पास भी  उन्हें बेचने का कोई तंत्र तो है नहीं, सो कुछ प्रतियां आप दोस्तों, रिश्तेदारों को सप्रेम  भेंट करते हैं, कुछ माननीय समीक्षकों को सादर ‘समीक्षार्थ’ प्रेषित करते हैं और बस हो जाते हैं साहिबे दीवान! अरे, यह सब कहते हुए मैं एक ख़ास बात तो भूल ही गया. किताब छपवा लेने के बाद दो ज़रूरी काम आप सबसे पहले करते हैं. पहला तो यह कि फेसबुक और ट्विट्टर जैसे सोशल मीडिया पर उस किताब की खबर प्रसारित  कर ‘सबको मालूम है सबको खबर हो गई’ का माहौल बनाते हैं और फिर उसके लोकार्पण का जुगाड़ बिठाते हैं. लोकार्पण चाहे जैसा और चाहे जिस स्तर का हो, उसकी सचित्र खबर भी इन माध्यमों पर एकाधिक बार प्रसारित करना आप नहीं भूलते. अनेक लोकार्पण तो इतने हास्यास्पद होते हैं कि कुछ पूछिये मत. लेकिन वह ज़िक्र फिर कभी.  आपकी किताब चाहे किसी लाइब्रेरी और किसी पाठक तक न भी पहुंचे, फेसबुक आदि की दीवार से उसकी छवि ज़रूर नुमायां होती रहती है, और इसीलिए मुझे लगता है कि मैं गुलज़ार साहब की इस  नज़्म को संशोधित करके कहूं – किताबें झांकती हैं फेसबुक की दीवारों से.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 मार्च, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.