Tuesday, September 30, 2014

तबादलों की दुनिया का अंतरंग

राजस्थान में पिछले चौदह महीनों से तबादलों पर लगी रोक को हटा लिया गया है और अपने वर्तमान पदस्थापन से असंतुष्ट सरकारी कर्मचारियों को एक बार फिर आस बंध गई है. राज्य के ज़्यादातर सरकारी विभागों में औपचारिक रूप से कोई तबादला नीति नहीं है और बावज़ूद इस बात के कि राज्य कर्मचारियों को राजनीतिक संलग्नता की अनुमति नहीं है,  करीब-करीब सारे ही तबादले राजनीतिक आकाओं की मनमर्जी और कृपा से ही होते हैं.

अपनी लम्बी सरकारी नौकरी के आखिरी तीन सालों में मुझे सरकार के तबादला तंत्र को न केवल भीतर से देखने, उसका एक हिस्सा बनने का भी मौका मिला, और अब क्योंकि उस बात को समय बीत चुका है, कुछ अनुभव साझा करना अनुपयुक्त नहीं होगा. अपने इस कार्यकाल में मुझे दो मंत्रियों के साथ काम करने का मौका मिला, जो समान सरनेम के बावज़ूद अपने आचरण में एक दूसरे से एकदम अलहदा थे. जिन पहले वरिष्ठ मंत्री के साथ मैंने काम किया वे तबादलों में बहुत कम रुचि रखते थे और सारा दायित्व हम प्रशासनिक अधिकारियों पर छोड़ कर आश्वस्त रहते थे. अलबत्ता वे किसी भी तबादला या पदस्थापन प्रस्ताव के औचित्य के बारे में पूछ कर हमारी सदाशयता की जांच ज़रूर कर लेते थे. कम से कम तबादले हों इस बात की उनकी इच्छा का एक ही उदाहरण देना चाहूंगा. मेरे पास मुख्य मंत्री कार्यालय से कुछ तबादलों के लिए बार-बार सन्देश आ रहे थे. मैंने जब अपने मंत्री जी को इस बाबत बताया तो उन्होंने बेलौस अन्दाज़ में कहा कि अबके जब वहां से कोई सन्देश आए तो आप साफ कह दें कि मंत्री जी ने मना कर रखा है.

इनके बाद जिन दूसरे मंत्री जी के साथ काम करने का मौका मुझे मिला, उनकी रुचि सिर्फ तबादलों में थी. मंत्री जी के यहां ही सारी सूचियां बनती, बाकायदा फाइल पर हमें आदेश मिलता और यथानियम अनुपालना कर दी जाती. हमें कुछ भी सोचने की ज़रूरत नहीं थी. यथाप्रस्तावित – सरकारी शब्दावली का यह शब्द हमारे लिए पर्याप्त था. ज़ाहिर है कि इतने सारे तबादले अपने साथ बहुत सारा अपयश भी लाते हैं. लेकिन उन दिनों अपने सुलझे हुए उच्चाधिकारी के मार्गदर्शन और निर्देशानुसार हम लोग इन तबादलों से एकदम निस्पृह थे. हमारे पास अगर कोई अनुरोध या परिवेदना लेकर आता भी तो हम स्पष्ट कह देते कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है, जो भी करना है मंत्री जी ही करेंगे. इस तटस्थता का लाभ यह रहा कि हम अपयश से बचे रहे.   

लेकिन इन ताबड़तोड़ होने वालों तबादलों का एक मज़ेदार पहलू यह रहा कि मेरे हस्ताक्षर से किनके तबादले हो रहे हैं, कई बार यह भी देखना सम्भव नहीं हुआ. इस बात का एहसास मुझे तब हुआ जब मेरे एक बेहद करीबी मित्र ने फोन किया कि उसका तबादला हो गया है.  निश्चय ही यह बात बेहद कष्टप्रद थी. मैंने अपने उच्चाधिकारी से इस बारे में बात की और उनसे अनुमति चाही कि मैं मंत्री जी से कहकर इस तबादले को निरस्त करा दूं. उन्होंने बहुत साफ शब्दों में अपनी यह इच्छा दुहरा दी कि हमें तबादलों के इस जंजाल से दूर रहना चाहिए. जब मैंने ज़्यादा इसरार किया तो वे बोले कि जो मैं उचित समझूं  कर लूं, उनसे न पूछूं! मुझे उनकी बात समझ में तो आ रही थी लेकिन जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो आपको तर्क के खिलाफ जाने को विवश कर देते हैं. मैंने मंत्री जी को पूरी स्थिति बताई और उन्होंने बिना एक पल की भी देर किए जो करणीय था वो कर दिया. यह इकलौता उदाहरण है जब उस दौर में मैंने किसी तबादले में व्यक्तिगत रुचि ली.  

लेकिन तबादलों की इस सारी गाथा को याद करते हुए मैं एक प्रसंग को कभी नहीं भूल सकूंगा. एक दिन एक युवती एक बहुत अजीब अनुरोध लेकर मेरे पास आई. वो चाहती थी कि उसका तबादला जहां वो वर्तमान में पद स्थापित है उस जगह से जितना दूर सम्भव हो, किसी भी जगह कर दिया जाए. जब मैंने इस अजीब अनुरोध के बारे में जानना चाहा तो उसने बताया कि उसके ससुराल वालों ने उसके दाम्पत्य जीवन को नरक बना रखा है और वो चाहती है कि उनसे दूर जाकर अपने पारिवारिक जीवन के बिखरे सूत्रों को सम्हाले. व्यावहारिक रूप से मुझे इस अनुरोध को मानने में कोई दिक्कत नहीं लगी,  दिक्कत तो तब होती है जब कोई यह चाहे कि मेरा तबादला इसी जगह हो जाए और वहां पद रिक्त न हो. लेकिन अगर हर व्यावहारिक काम आसानी से हो जाए तो फिर सरकार ही क्या! इतना ही कहूं कि अपनी तमाम कोशिशों के बावज़ूद उस युवती को कोई राहत न दिला पाने का मलाल अब भी मेरे मन में है. 

•••  

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 सितम्बर, 2014 को तबादला महापुराण: मांगे मिलै न 'पोस्टिंग' शीर्षक से किंचित परिवर्तित रूप में प्रकाशित मेरे आलेख का मूल पाठ.         

Tuesday, September 23, 2014

कनेक्टेड या तनहा?

यूपीए सरकार के पराभव के बाद अनकही कहानियां सुनाने वाली किताबों का एक सिलसिला ही चल निकला है. इन किताबों में से एक पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह की किताब ‘वन लाइफ इज़ नोट इनफ़’  की चर्चा उसके एक कथन की वजह से इतनी ज़्यादा हुई और सारी बहस उसी कथन पर इस हद तक अटक कर रह गई  कि किताब की बाकी बातें, लेखक का व्यक्तित्व और उसकी लेखन शैली वगैरह सब नेपथ्य में चले गए. उनकी राजनीति से हटकर जब सोचता हूं तो मैं पाता हूं कि नटवर सिंह हमारे समकालीन राजनेताओं में अपने विद्या व्यसन की वजह से विलक्षण हैं. अपने समय के साहित्यकारों, कलाकारों और दुनिया भर के राजनेताओं से भी उनका जैसा घरोपा और अपनापा है उसकी तुलना शायद ही किसी और से करना मुमकिन हो. और उनका अंग्रेज़ी गद्य – उसका तो कहना ही क्या! मज़ाल है कि उनके लिखे में से एक भी शब्द को आप किसी दूसरे शब्द से बदलना मुनासिब समझें! इस बात का बहुत शिद्द्त से एहसास तब हुआ जब कुछ बरस पहले उनकी लिखी एक किताब ‘प्रोफाइल्स एण्ड लैटर्स’ का हिन्दी अनुवाद करने का अवसर मुझे मिला. नटवर सिंह जी ने अपने मित्र, प्रांत के एक अत्यंत वरिष्ठ और समादृत साहित्यकार से अपनी इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने के लिए किसी का नाम सुझाने को कहा, और उन्होंने मुझ पर अपने अनुराग के चलते मेरा नाम सुझा दिया. सच कहूं तो अपनी इतर व्यस्तताओं के चलते उनके स्नेह के दबाव में ही यह प्रस्ताव मैंने स्वीकार किया था, लेकिन जब अनुवाद करना शुरु किया तो मुझे समझ में आया कि मैंने खुद को किस मुश्किल में डाल लिया है!


बेशक यह किताब बहुत रोचक थी. अपने सुदीर्घ और विविधवर्णी  दायित्वों के दौरान नटवर सिंह जी जिन शख्सियतों के नज़दीकी सम्पर्क में आए उनके सजीव व्यक्तिचित्र और बेहद रोचक संस्मरण इस किताब में हैं. एक सूची पर नज़र डालते ही आप अनुमान लगा सकेंगे कि नटवर सिंह के ये अनुभव किस मैयार के होंगे. सी. राजगोपालाचारी, ई एम फॉर्स्टर, नीरद  सी चौधुरी, लॉर्ड लुई माउण्टबेटन, विजयलक्ष्मी पण्डित, आर के नारायण, हान सुयिन, इन्दिरा गांधी, ज़िया उल हक़ और नरगिस दत्त जैसे शीर्षस्थ राजनेता, लेखक, विचारक, और कलाकारों की यादों से सजी इस किताब का हर शब्द जैसे पाठक को अनुभव-समृद्ध करने वाला है. और जैसा मैंने कहा, अंग्रेज़ी गद्य को नटवर सिंह जिस कौशल से बरतते हैं वैसा इधर विरल है. किसी अनुवादक के लिए ऐसे गद्य का अनुवाद बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करता है. बहरहाल, मैंने इस किताब का अनुवाद किया और हिन्दी के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन गृह से वह अनुवाद ‘चेहरे और चिट्ठियां’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ.


आज मुझे इस किताब की याद फेसबुक पर एक संदेश देखते हुए आई. जो लोग नटवर सिंह के बारे में ज़रा भी जानते हैं वे अंग्रेज़ी के महान कथाकार और सुपरिचित भारत मित्र (‘अ पैसेज टू इण्डिया’ वाले) ई एम फॉर्स्टर से उनके नज़दीकी रिश्तों के बारे में भी ज़रूर जानते हैं. स्वाभाविक ही है कि इस किताब में नटवर सिंह ने फॉर्स्टर को बेहद आत्मीयता के साथ याद किया है. वैसे फॉर्स्टर उम्र में नटवर सिंह से पचास बरस बड़े थे. कद तो खैर उनका बहुत बड़ा था ही. नटवर सिंह और फॉर्स्टर की दोस्ती चिट्ठियों और टेलीग्राम्स के ज़माने की थी इसलिए स्वभावत: इस लेख में चिट्ठियों के खूब सारे अंश हैं. प्रसंगवश यह बात भी कि फॉर्स्टर के 90 वें जन्म दिन पर लन्दन में उनके सम्मान में जो किताब प्रकाशित हुई नटवर सिंह उसमें एक मात्र भारतीय लेखक थे, और उनके लेख का शीर्षक था – ‘ओनली कनेक्ट!’  

मुझे लगता है कि आज का समय भी ओनली कनेक्ट का ही तो है. आप अपने चारों तरफ नज़र दौड़ाइये तो पाएंगे हरेक किसी न किसी से कनेक्टेड है – अपने मोबाइल पर. और इसी बात  की चर्चा  उस सन्देश में है जिसका ज़िक्र अभी मैंने किया है. इस मज़ेदार और साथ ही चिंतित करने वाले सन्देश में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन को यह कहते उद्धृत किया गया है कि “मुझे भय है कि एक दिन तकनीक मानवता पर हावी हो जाएगी. इस दुनिया में सिर्फ बेवकूफों की पीढ़ी बच रहेगी.” और इसके बाद आठ तस्वीरें देकर यह टिप्पणी की गई है कि आइन्स्टाइन की आशंका कुछ जल्दी ही साकार हो गई है. तस्वीरें बड़ी रोचक हैं. मसलन एक तस्वीर में चार युवतियां एक कार में बैठी हैं और चारों ने अपनी गर्दनें अपने मोबाइलों में घुसा  रखी हैं, तीन युवतियां एक शानदार म्यूज़ियम में भव्य पेण्टिंग्स के नीचे बैठी हैं लेकिन देख वे अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन्स को ही रही हैं, चार दोस्त एक रेस्तरां में हैं, सामने भोजन सजा है लेकिन वे चारों अपने-अपने मोबाइल्स को देख रहे हैं... और ऐसी ही दूसरी तस्वीरें हैं! यानि ‘ओनली कनेक्ट!’ और कनेक्ट होकर भी तनहा!   

•••  

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 23 सितम्बर, 2014 को नटवर की चेहरे और चिट्ठियों की दुनिया शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, September 16, 2014

नहले पर दहला

मिर्ज़ा ग़ालिब भी क्या खूब कह गए हैं – होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे. हमारी दुनिया में जाने क्या-क्या होता रहता है!  कभी ऐसा जिसे देखकर मुंह से बरबस आह निकल पड़ती है तो कभी ऐसा कि वाह! निकल पड़ती है. और आह और वाह  के बीच की अनगिनत अभिव्यक्तियों की तो बात ही मत कीजिए. अब यही देखिये ना कि आम तौर पर तो हमारे फिल्मी सितारे मीडिया का मुंह ताकते हैं कि वो इन्हें भाव दे और इनको चर्चा में बनाए रखे, लेकिन कभी-कभी मीडिया भी अपनी और शालीनता की हदों को पार कर जाता है! अक्सर तो यह होता है कि अपना लाभ-हानि सोच कर सितारे चुप रह जाते हैं, लेकिन कभी-कभार यूं भी होता है कि मीडिया का दांव उलटा पड़ जाता है!

पिछले दिनों ऐसा ही एक वाकया हुआ. देश के एक नामी और पुराने अंग्रेज़ी अखबार ने अपने मनोरंजन पृष्ठ
पर एम जी (ऑह माय गॉड) शीर्षक से वीडियो लिंक्स की एक श्रंखला चला रखी है. वैसे तो यह श्रंखला शालीनता की हदें पार करती ही रहती है. मसलन इसी श्रंखला में एक शीर्षक था – ओह माय गॉड: मीका सिंह डिमाण्डस अ किस फ्रॉम  सनी लियोनी. और इसी श्रंखला के अंतर्गत इस अखबार ने  एक वीडियो लिंक दिया- एम जी! दीपिका पादुकोण’स क्लीवेज शो,  और जैसे इतना ही काफी हो, एक कदम और आगे बढ़कर इस अखबार ने यह लिंक अपने ट्विट्टर हैंडल पर भी पोस्ट कर दिया.  अब इसे   अखबार का दुर्भाग्य ही कहें कि  दीपिका की  नज़र इस पोस्ट पर पड़ गई. फिर क्या था! वैसे तो दीपिका की ख्याति  इस बात के लिए है कि वे पत्रकारों के असहज करने वाले सवालों से भी विचलित नहीं होती हैं और बहुत सहज-स्वाभाविक लहज़े में उनका जवाब दे देती है, लेकिन इस पोस्ट ने उन्हें कुछ अधिक ही विचलित कर दिया. विचलित होने की बात भी थी.  अपनी देह को सनसनी का  विषय बनाना भला कौन स्त्री पसन्द करेगी? ट्वीट का जवाब ट्वीट से देते हुए दीपिका ने एक के बाद एक दो ट्वीट किए. और उनका असर यह हुआ कि उस बड़े अखबार को केवल अपनी अशालीनता के लिए दीपिका से माफी मांगने के लिए मज़बूर होना पड़ा, अपनी सफाई देनी पड़ी और उस आपत्तिजनक और अपमानजनक ट्वीट को हटाने के लिए भी मज़बूर होना पड़ा.  

क्या कहा दीपिका ने अपने ट्वीट में? अपने पहले ट्वीट में उन्होंने बेलौस अन्दाज़ में कहा, “यस!  आइ एम अ वुमन. आई हैव ब्रेस्ट्स एण्ड अ क्लीवेज. यू गॉट अ प्रॉब्लम??” अपने स्त्रीत्व की इतनी मुखर घोषणा और अपनी देह संरचना की ऐसी बेबाक स्वीकृति! और सामने वाले की आंखों में अपनी तीखी उंगलियां डालकर सवाल कि आपको इसमें क्या आपत्ति है? शायद ऐसे ही अवसर होते हैं जब बरबस हमारे मुंह से निकल पड़ता है – वाह! जवाब भला किसके पास हो सकता है?  उस बदतमीज़ अखबार को बैकफुट पर तो आना ही था. लेकिन दीपिका इतने भर पर नहीं रुकीं. उन्होंने तुरंत ही एक और ट्वीट किया – “डोण्ट टॉक अबाउट विमंस एम्पावरमेण्ट व्हेन यू डोण्ट नो हाउ तू रेस्पेक्ट विमन.”   जब आपको यह भी मालूम नहीं कि स्त्रियों का सम्मान  कैसे किया जाए, तो मेहरबानी करके स्त्री सशक्तिकरण की बात मत कीजिए. ज़ाहिर है कि इशारा उन बहुत सारे प्रयासों की तरफ था जो यह अखबार अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी का प्रदर्शन करने के लिए करता रहता  हैं.

यह ट्वीट करके दीपिका ने भले ही एक अखबार को आड़े हाथों लिया है, और उसे अपने कृत्य के लिए माफी मांगने को मज़बूर किया है, इस घटना के निहितार्थ और व्यापक हैं. हमें लगता है कि दीपिका की यह  आवाज़ पूरे देश में, बल्कि पूरी दुनिया में सुनी जानी चाहिए. स्त्री देह के प्रति हमारा जो रवैया और नज़रिया है उस पर पुनर्विचार की ज़रूरत है. उसे देखकर कामुक-लोलुप अभिव्यक्तियां करने वालों को सीधा किया जाना बहुत ज़रूरी है. देह देह है, चाहे वो पुरुष की हो या स्त्री की. उसके लिए एक सम्मानपूर्ण स्वाभाविक सोच जब तक हम सबमें नहीं आएगा, समाज विकृतियों से मुक्त नहीं हो पाएगा. दीपिका का यह साहसपूर्ण कृत्य हमारे सोच की विकृतियों को दूर करने  वाला बने – यह हम सबकी आकांक्षा होनी चाहिए.

खुशी की  बात यह है कि दीपिका के इन दोनों ट्वीट्स को अपेक्षित समर्थन मिला. देखते ही देखते #स्टैण्ड विद दीपिका पादुकोण ट्वीटर का शीर्ष ट्रैण्ड बन गया. हज़ारों लोगों ने दीपिका के इन ट्वीट्स को रीट्वीट किया या इनका समर्थन किया. इतना ही नहीं, उक्त अखबार  ने जो सफाई दी उसे पूरी तरह अस्वीकार करते हुए लोगों ने उसके खिलाफ अपनी नाराज़गी का भी इज़हार किया.

क्या इसी को कहेंगे – अखबार के नहले पर दीपिका का दहला?

••• 

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 16 सितम्बर, 2014 को गंदी मानसिकता पर दीपिका का दहला शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Monday, September 15, 2014

पराए तेल से अपना दीपक क्यों जलाना?

वसंत देव ने क्या खूबसूरत गीत लिखा था ‘उत्सव’  फिल्म में – मन क्यूं बहका रे बहका.... जितना सुरीला गायन उतने ही अर्थपूर्ण शब्द और भाव भी. लेकिन मेरा ध्यान तो फिलहाल मन के बहकने पर अटका हुआ है. यह मन भी अजीब शै है! कहां से कहां पहुंच जाता है, और वो भी बेवजह! कोई तर्क काम नहीं करता और कोई रुकावट बीच में नहीं आती. आप चाहें तो भी इसके भटकने पर विराम नहीं लगा सकते. मैं अपनी ही बात करूं. कल एक साहित्यिक आयोजन में भाग लेने का मौका मिला. वहां एक वक्ता ने, जो मेरी भाषा के एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं, एक बहुत ही अच्छी बात कही.  जिस आयोजन की बात मैं कर रहा हूं वो एक नई शुरुआत थी और उसके समापन समारोह में हम सब उपस्थित थे. आयोजक गण इस आयोजन में सहयोग देने वालों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित  कर रहे थे. तब, उन वक्ता महोदय ने मंच से कहा कि लेखकों में भी ऐसे बहुत सारे लोग होंगे जो  इस तरह के आयोजनों में आर्थिक  सहयोग दे सकें. मुझे यह बात बहुत महत्वपूर्ण लगी. तब से अब तक मैं यही सोच रहा हूं कि हम इतने सारे साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता करते हैं, और जानते हैं कि करीब-करीब सारे आयोजन दूसरों के आर्थिक सहयोग से ही सम्भव होते हैं, लेकिन क्यों हमारे मन में यह बात नहीं आती कि हम भी इन आयोजनों में कोई सहयोग दें! हम यानि हममें से वे लोग जिनके लिए ऐसा करना सम्भव है. उन वरिष्ठ साहित्यकार महोदय  ने तो कल भी यह बात स्पष्ट कर दी थी. उन्होंने कहा था कि हममें से बहुत सारे ऐसे हैं जिनके बच्चे उनके आर्थिक संसाधनों के मुखापेक्षी नहीं हैं. यानि जब हमारी ज़रूरतें ठीक से पूरी हो रही हैं तब  क्या अपनी रुचि के उपक्रमों के लिए हमें सहयोगी नहीं बनना चाहिए? इसे उलट कर कहूं तो यह कि क्या हमें ही हमेशा दूसरों का  मुखापेक्षी बना रहना चाहिए?
 
कल से यह बात मेरे जेह्न में घूम रही है. और इससे जुड़ी बहुत सारी बातें आ-जा रही हैं. अनायास मुझे बहुत बरस पहले का एक प्रसंग याद आ गया. मैं एक छोटे कस्बे में कार्यरत था जहां किसी तरह की कोई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं होती थी. तब उसी कस्बे में मेरे एक मित्र थे जो एक ऐसे महकमे  में ऊंचे  पद पर कार्यरत थे जहां किसी को एक संकेत भर कर देना उसकी जेब से खासी बड़ी रकम निकलवाने के लिए पर्याप्त था. संगीत प्रेम उन मित्र और मेरे बीच के रिश्ते का आधार था. एक दिन गपशप के दौरान मैंने उन मित्र से कहा कि उनका तो इतना प्रभाव है, क्यों नहीं वे उसका उपयोग करके शहर में एक संगीत संध्या आयोजित करवा देते? उनका जवाब करीब चार दशक बाद भी मेरे मन पर ज्यों का त्यों अंकित है. वे बोले, “अग्रवाल साहब, संगीत का शौक तो आपको और मुझे है. उसके लिए हमें दूसरों पर बोझ क्यों बनना चाहिए? जब मन होगा, अहमदाबाद पास ही है, जाकर किसी को सुन आएंगे!” पता नहीं वे मित्र अब कहां हैं, और कैसे हैं! लेकिन उनकी बात कल से दिमाग में उमड़ घुमड़ रही है.

सोच रहा हूं कि हमारी जो भी रुचियां  हों,  चाहे वो साहित्य की हों, संगीत की हों, या किसी और विधा की हों, आखिर क्यों हमें किसी और की तरफ ताकना चाहिए कि वो दान करेगा और हम लाभान्वित होंगे! वो दान करना चाहें, ज़रूर करें, लेकिन हम उनके दान के आकांक्षी क्यों हों? लेकिन हकीकत तो यही है. मेरा ज्यादा लगाव जिस साहित्य की दुनिया से है उसमें मैं देखता हूं कि हम लोग अपने प्रिय रचनाकार की किताब तक खरीदकर नहीं पढ़ना चाहते! हमारी आकांक्षा यही होती है कि लेखक खुद हमें अपनी किताब भेंट करे तो हम पढ़ें! यह स्थिति हिन्दी समाज में अधिक है. यही वजह है कि आज किताब का संस्करण तीन सौ प्रतियों तक सिमट आया है.  अनायास मुझे यह बात याद आ रही है कि एक बार जब किसी ने बहुत उत्साह पूर्वक कहा कि वो हिन्दी के लिए अपनी जान  भी दे  सकता है,   तो रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत गम्भीरता से कहा था कि हिन्दी को  आपकी जान की ज़रूरत नहीं है, आप तो बस थोड़े-से पैसे खर्च दिया करें हिन्दी की किताबों के लिए! आज भी अगर हम इस बात को याद कर लें तो हालात बदलते देर नहीं लगेगी.

और इसीसे मन भटकते-भटकते कहीं और निकल जाता है! हमारे पास अपने हर कृत्य के लिए बहुत सारे तर्क होते हैं. अपना पैसा खर्च न करने के लिए, अपना समय न देने के लिए, नियम-कानून-व्यवस्था का निर्वहन न करने के लिए... क्या हम इन तर्कों के इस्तेमाल में थोड़ी कृपणता नहीं बरत सकते? 

कृपणता हमेशा ही निन्दनीय नहीं होती है!

••• 

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 सितम्बर, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.                 

Tuesday, September 2, 2014

दो मिनिट की देरी भी कोई देरी होती है?

हर देश की अपनी जीवन शैली होती है, अपने तौर-तरीके होते हैं. मैं इसे बहुत स्वाभाविक मानता हूं और हंसी-मज़ाक की बात अलग है, इस बात को लेकर कोई ख़ास आलोचनात्मक नज़रिया भी नहीं रखता हूं. हम जैसे हैं, हैं. न तो यह ज़रूरी है कि दूसरे हम जैसे बनें और न ही यह ज़रूरी है कि हम उन जैसे बनें!

न जाने कितनी चीज़ें हैं जो हममें और सिर्फ हममें ही हैं. किसी अजनबी से मिलते ही हम कितनी जल्दी उसकी निजी चीज़ों के बारे में पड़ताल करने लगते हैं? इसकी लज्जत वो ठण्डे अंग्रेज़ क्या जानें? हम न सिर्फ जानते बल्कि मानते भी हैं कि अतिथि देवता होता है, इसलिए चाहे जब किसी के घर जा धमकते हैं. सूचना देकर और सुविधा पूछकर तै शुदा  कार्यक्रमानुसार किसी के यहां जाने में भला यह सुख कहां है? जब कोई हमारे यहां आता है और हम उससे चाय-पानी के लिए  पूछते हैं तो उसका जवाब हम पहले से जानते हैं कि वो घर से करके ही आया है, लेकिन फिर भी हम उसका आतिथ्य सत्कार करते हैं. वो  उसकी कर्टसी थी और यह हमारी कर्टसी होती है.

ऐसी अनगिनत बातें हैं जो चाहे अनचाहे हमारी जीवन–शैली का हिस्सा बन चुकी हैं और हमें उनसे कोई ख़ास असुविधा भी नहीं होती है. लेकिन जब हमसे भिन्न जीवन-शैली वाला कोई व्यक्ति हमसे टकराता  है तो कई बार बड़ी अजीब स्थितियां पैदा  हो जाती हैं. अब समय की पाबन्दी को ही लीजिए. घड़ी हम चाहे कितनी ही महंगी क्यों न पहन लें, उसकी सुइयों को अपनी ज़िन्दगी पर हावी हम नहीं होने देते. समय को लेकर हम इतने आज़ाद खयाल हैं कि हमने एक नया पद ही गढ़ लिया है – इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम. निर्धारित समय से डेढ़ दो घण्टे विलम्ब से पहुंच कर हम बिना शर्मिन्दा हुए इस पद को आगे कर सकते हैं! लेकिन कभी-कभी बड़ी गड़बड़ भी हो जाती है. जैसी भारतीय  विज्ञापन दुनिया की बहुत बड़ी हस्ती अलीक पदमसी के साथ हुई. 

अलीक ने, आपको याद ही होगा कि सर रिचर्ड एटनबरो की महान फिल्म ‘गांधी’ में जिन्ना की भूमिका निबाही थी. और अभी हाल ही में जब एटनबरो का निधन हुआ तो अलीक ने अपने श्रद्धांजलि लेख में यह बात लिखी है. अलीक बताते हैं कि वे ‘गांधी’  फिल्म के लिए अपनी पहली शूटिंग के लिए दिल्ली पहुंचे और एक बड़े होटल में ठहरा दिए गए. जैसे ही वे अपने कमरे  में पहुंचे, उनके पास एक पेज की कॉल शीट पहुंचा दी गई जिसमें अगले दिन के कार्यक्रम की सूचना थी. यथा कार्यक्रम उन्हें सुबह साढ़े पांच बजे उठा दिया गया, छह बजे नाश्ता दे दिया गया और साढे छह बजे वे मेक अप रूम में जा पहुंचे. वहां मुद्दत के बाद सईद जाफरी से उनकी मुलाक़ात हुई और वे दोनों गपशप करने लगे. अचानक अलीक का ध्यान अपनी घड़ी की तरफ गया और वे भाग कर होटल की लॉबी में कार शिड्यूलर, जो एक अंग्रेज था, के पास पहुंचे, और उससे पूछा कि क्या उनकी कार तैयार है? शिड्यूलर जॉनसन ने उनकी तरफ देखा और पूछा, क्या आप मिस्टर जिन्ना हैं? हां में जवाब पाने पर उसने फिर पूछा, आपकी कार  कब पहुंचनी थी? अलीक ने कहा, सात बजे! तो,  जॉनसन  ने शांत  भाव से कहा, वो जा चुकी है! अलीक के पूछने पर उसने बताया कि क्योंकि कार का समय सात बजे का था, इसलिए वो दो मिनिट पहले दूसरे कलाकारों को लेकर जा चुकी है. अलीक ने पूछा कि अब क्या करें, तो जॉंनसन ने कहा कि अब आप आइन्दा से समय पर आया करें! आगे की बात संक्षेप में यह कि अलीक को सवा सात बजे जाने वाली दूसरी कार में भेजा गया. जब वे लोकेशन पर पहुंचे तो उनकी मुलाकात सर रिचर्ड से हुई, और रिचर्ड ने छूटते ही उनसे  कहा, अलीक  आप बहुत देर से आए हो!  अलीक  ने माफी मांगते हुए कहा कि वे महज़ दो ही मिनिट तो लेट हुए हैं!, सोचिये, इस पर रिचर्ड ने उनसे क्या कहा होगा? रिचर्ड ने कहा कि ‘अलीक, तुम जानते हो कि मेरी फिल्म पर प्रति मिनिट एक हज़ार पाउण्ड का खर्चा हो रहा है, यानि दो मिनिट लेट होने का मतलब है दो हज़ार पाउण्ड की बर्बादी!’ अलीक के लिए उनका इतना कह देना  काफी था, क्योंकि उन्हें अपने पूरे रोल के लिए जो राशि मिलनी थी वो दो हज़ार पाउण्ड से कम थी.

अब आप ही बताइये, क्या दो मिनिट की देरी भी कोई देरी होती है? अच्छा हुआ अंग्रेज़ हमारे देश से चले गए!
•••  

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार 02 सितम्बर, 2014 को दो मिनट लेट हुए तो दो हज़ार पाउण्ड बर्बाद शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, August 26, 2014

क्या वाकई समय इस तरह बदला है?

इधर एक नई हिन्दी फिल्म का राजस्थानी गीत चर्चा में है. सोनम कपूर की आनेवाली फिल्म ‘खूबसूरत’  में म्यूज़िक कम्पोज़र स्नेहा खानवलकर ने सुनिधी  चौहान और  रेसमी सतीश से एक गाना गवाया है – अंजन की सीटी में.  यह गाना राजस्थान में पहले से काफी लोकप्रिय है. अस्सी के दशक में इसे दो मिर्ज़ा बहनें रेहाना और परवीन अलग-अलग गाकर लगभग अमर कर चुकी हैं. इस गाने की लोकप्रियता का यह आलम है कि आम तौर पर इसे लोकगीत माना जाता है, जबकि मूलत: यह जाने माने शायर इक़राम राजस्थानी की रचना है. इक़राम साहब का कहना है कि उन्होंने इसे अपने पिता की एक रचना से प्रेरित होकर लिखा था.

इक़राम राजस्थानी  के मूल गाने में एक ग्रामीण युवती का चित्रण है जो शायद पहली दफा रेल में बैठी है और उस अनुभव से अभिभूत है. गाने के पहले अंतरे में रेल के डिब्बे में चल रहे बिजली के पंखे का, दूसरे में चलती रेल के डिब्बे की खिड़की से दिखाई देने वाले बाहर के दृश्य का, और तीसरे में टोपी वाले टीटी का चित्रण है. गाने का चौथा और आखिरी अंतरा रेल के डिब्बे के ज़ोर के धचके से नायिका के औंधी होकर गिर जाने के वर्णन से हास्य का सृजन कर गाने को पूर्णता प्रदान करता है. कहना अनावश्यक है कि यह राजस्थान की एक ग्राम्य बाला के  रेल-अनुभव का  रोचक और रंजक चित्रण है, और यही शायद इसकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह भी है. 

लेकिन  अब नई फिल्म ‘खूबसूरत’  में जो गाना आया है,  स्वाभाविक ही है कि उसकी भाव-भूमि अलग है. लगभग साढ़े तीन दशकों में परिवर्तन तो हुए ही हैं. और अगर गाने को फिल्म में इस्तेमाल किया जाना है तो उन परिवर्तनों पर नज़र रखना भी ज़रूरी है.  तो, यह लोकप्रिय गाना फिल्म में आकर बदल गया  है. मूल गाने की पंक्ति ‘अंजन की सीटी में म्हारो मन डोलै’ अब ‘अंजन की सीटी में म्हारो बम डोलै’ के रूप में सुनाई देती है! मन की जगह बम. बी यू एम. शुद्ध हिन्दी में कहूं तो नितम्ब! पहले मन डोलता था, अब नितम्ब कम्पायमान होते हैं. मन में फौरन यह सवाल उठता है कि क्या पैंतीस सालों में हममें यह  बदलाव हुआ है कि गाने में मन की जगह बम आ जाए? और इसे यों भी कह सकता हूं कि क्या हमारा वो पाठक-श्रोता  जो साढ़े  तीन दशक पहले मन को समझ लेता था, अब उसकी समझ बदल कर बम तक जा पहुंची है? इसे समझ का उत्थान कहें या पतन? और सवाल यह भी कि बदलाव श्रोता की संवेदना में हुआ है  या फिल्मकार की संवेदना में?  

और बदलाव की यह बात सिर्फ मुखड़े पर ही  खत्म  नहीं हो जाती है. मैंने मूल गाने के चार अंतरों का जो परिचय दिया उसे ध्यान में रखते हुए  अब ज़रा इस नए गाने का पहला अंतरा देखिये: “फक-फक इंजन  बोल रहा है,  पटरी थर-थर कांपै/ कहां रुकेगी गाड़ी आकर मन ये मेरा पूछै/ इंजन आकर जुड़ जाए मुझसे खाऊं हिचकोलै...”   सुनिधी ने इसे किस तरह गाया है और सोनम ने कैसे इस पर नृत्य किया है, इन बातों को  अगर नज़र अन्दाज़ भी कर दें तो ये शब्द ही काफी कुछ कह देते हैं. मूल गाने की मासूमियत की जगह अब एक मांसल, बल्कि लगभग अश्लील सांकेतिकता ने ले ली है.  बहुत सम्भव है कि इस गाने का प्रयोग एक आइटम नम्बर के तौर पर हुआ हो और फिल्म बनाने वालों की निगाह टिकिट खिड़की पर रही हो, इसलिए मूल गाने को इस तरह से बदल दिया गया हो! और हां, यह तो कहना मैं भूल ही गया था कि मूल गाने का यह रूपांतर भी किसी और का नहीं, उन्हीं शायर का किया हुआ है.

यह गाना एक बार फिर हमें शिद्दत से अपने बदले वक़्त का एहसास कराता है. इस बात का एहसास कराता है कि ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे ओ चन्दा’ , ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’ ‘छिपा लो यूं दिल में प्यार मेरा कि जैसे मन्दिर में लौ दिये की’ जैसे गानों और अभिव्यक्तियों का समय बीत चुका है. लेकिन क्या वाकई कोमलता का और सुरुचि का समय बीत चुका है? क्या वाकई इश्क़ कमीना हो गया है?  क्या वाकई  हम ‘पापा कहते थे बड़ा  नाम करेगा’ से चलकर डैडी मुझसे बोला तू गलती है मेरी/ तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी/ साबुन की शक्ल में बेटा तू तो निकला केवल झाग/ झाग झाग….भाग डीके बोस भाग…….!’ तक आ पहुंचे हैं?  क्या सच्ची ‘अच्छी बातें कर ली बहुत,  अब करूंगा तेरे साथ गन्दी बात..गन्दी बात!’ वाला समय आ गया है?

मन की जगह बम सुनकर तो ऐसा ही लगता है!  

•••  

लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 26 अगस्त, 2014 को  वक़्त के साथ बदलते इंजन की सीटी के मायने शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.