Tuesday, September 16, 2014

नहले पर दहला

मिर्ज़ा ग़ालिब भी क्या खूब कह गए हैं – होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे. हमारी दुनिया में जाने क्या-क्या होता रहता है!  कभी ऐसा जिसे देखकर मुंह से बरबस आह निकल पड़ती है तो कभी ऐसा कि वाह! निकल पड़ती है. और आह और वाह  के बीच की अनगिनत अभिव्यक्तियों की तो बात ही मत कीजिए. अब यही देखिये ना कि आम तौर पर तो हमारे फिल्मी सितारे मीडिया का मुंह ताकते हैं कि वो इन्हें भाव दे और इनको चर्चा में बनाए रखे, लेकिन कभी-कभी मीडिया भी अपनी और शालीनता की हदों को पार कर जाता है! अक्सर तो यह होता है कि अपना लाभ-हानि सोच कर सितारे चुप रह जाते हैं, लेकिन कभी-कभार यूं भी होता है कि मीडिया का दांव उलटा पड़ जाता है!

पिछले दिनों ऐसा ही एक वाकया हुआ. देश के एक नामी और पुराने अंग्रेज़ी अखबार ने अपने मनोरंजन पृष्ठ
पर ओ एम जी (ऑह माय गॉड) शीर्षक से वीडियो लिंक्स की एक श्रंखला चला रखी है. वैसे तो यह श्रंखला शालीनता की हदें पार करती ही रहती है. मसलन इसी श्रंखला में एक शीर्षक था – ओह माय गॉड: मीका सिंह डिमाण्डस अ किस फ्रॉम  सनी लियोनी. और इसी श्रंखला के अंतर्गत इस अखबार ने  एक वीडियो लिंक दिया- ओ एम जी! दीपिका पादुकोण’स क्लीवेज शो,  और जैसे इतना ही काफी न हो, एक कदम और आगे बढ़कर इस अखबार ने यह लिंक अपने ट्विट्टर हैंडल पर भी पोस्ट कर दिया.  अब इसे   अखबार का दुर्भाग्य ही कहें कि  दीपिका की  नज़र इस पोस्ट पर पड़ गई. फिर क्या था! वैसे तो दीपिका की ख्याति  इस बात के लिए है कि वे पत्रकारों के असहज करने वाले सवालों से भी विचलित नहीं होती हैं और बहुत सहज-स्वाभाविक लहज़े में उनका जवाब दे देती है, लेकिन इस पोस्ट ने उन्हें कुछ अधिक ही विचलित कर दिया. विचलित होने की बात भी थी.  अपनी देह को सनसनी का  विषय बनाना भला कौन स्त्री पसन्द करेगी? ट्वीट का जवाब ट्वीट से देते हुए दीपिका ने एक के बाद एक दो ट्वीट किए. और उनका असर यह हुआ कि उस बड़े अखबार को न केवल अपनी अशालीनता के लिए दीपिका से माफी मांगने के लिए मज़बूर होना पड़ा, अपनी सफाई देनी पड़ी और उस आपत्तिजनक और अपमानजनक ट्वीट को हटाने के लिए भी मज़बूर होना पड़ा.  

क्या कहा दीपिका ने अपने ट्वीट में? अपने पहले ट्वीट में उन्होंने बेलौस अन्दाज़ में कहा, “यस!  आइ एम अ वुमन. आई हैव ब्रेस्ट्स एण्ड अ क्लीवेज. यू गॉट अ प्रॉब्लम??” अपने स्त्रीत्व की इतनी मुखर घोषणा और अपनी देह संरचना की ऐसी बेबाक स्वीकृति! और सामने वाले की आंखों में अपनी तीखी उंगलियां डालकर सवाल कि आपको इसमें क्या आपत्ति है? शायद ऐसे ही अवसर होते हैं जब बरबस हमारे मुंह से निकल पड़ता है – वाह! जवाब भला किसके पास हो सकता है?  उस बदतमीज़ अखबार को बैकफुट पर तो आना ही था. लेकिन दीपिका इतने भर पर नहीं रुकीं. उन्होंने तुरंत ही एक और ट्वीट किया – “डोण्ट टॉक अबाउट विमंस एम्पावरमेण्ट व्हेन यू डोण्ट नो हाउ तू रेस्पेक्ट विमन.”   जब आपको यह भी मालूम नहीं कि स्त्रियों का सम्मान  कैसे किया जाए, तो मेहरबानी करके स्त्री सशक्तिकरण की बात मत कीजिए. ज़ाहिर है कि इशारा उन बहुत सारे प्रयासों की तरफ था जो यह अखबार अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी का प्रदर्शन करने के लिए करता रहता  हैं.

यह ट्वीट करके दीपिका ने भले ही एक अखबार को आड़े हाथों लिया है, और उसे अपने कृत्य के लिए माफी मांगने को मज़बूर किया है, इस घटना के निहितार्थ और व्यापक हैं. हमें लगता है कि दीपिका की यह  आवाज़ पूरे देश में, बल्कि पूरी दुनिया में सुनी जानी चाहिए. स्त्री देह के प्रति हमारा जो रवैया और नज़रिया है उस पर पुनर्विचार की ज़रूरत है. उसे देखकर कामुक-लोलुप अभिव्यक्तियां करने वालों को सीधा किया जाना बहुत ज़रूरी है. देह देह है, चाहे वो पुरुष की हो या स्त्री की. उसके लिए एक सम्मानपूर्ण स्वाभाविक सोच जब तक हम सबमें नहीं आएगा, समाज विकृतियों से मुक्त नहीं हो पाएगा. दीपिका का यह साहसपूर्ण कृत्य हमारे सोच की विकृतियों को दूर करने  वाला बने – यह हम सबकी आकांक्षा होनी चाहिए.

खुशी की  बात यह है कि दीपिका के इन दोनों ट्वीट्स को अपेक्षित समर्थन मिला. देखते ही देखते #स्टैण्ड विद दीपिका पादुकोण ट्वीटर का शीर्ष ट्रैण्ड बन गया. हज़ारों लोगों ने दीपिका के इन ट्वीट्स को रीट्वीट किया या इनका समर्थन किया. इतना ही नहीं, उक्त अखबार  ने जो सफाई दी उसे पूरी तरह अस्वीकार करते हुए लोगों ने उसके खिलाफ अपनी नाराज़गी का भी इज़हार किया.

क्या इसी को कहेंगे – अखबार के नहले पर दीपिका का दहला?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगल्वार, 16 सितम्बर, 2014 को गंदी मानसिकता पर दीपिका का दहला शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Monday, September 15, 2014

पराए तेल से अपना दीपक क्यों जलाना?

वसंत देव ने क्या खूबसूरत गीत लिखा था ‘उत्सव’  फिल्म में – मन क्यूं बहका रे बहका.... जितना सुरीला गायन उतने ही अर्थपूर्ण शब्द और भाव भी. लेकिन मेरा ध्यान तो फिलहाल मन के बहकने पर अटका हुआ है. यह मन भी अजीब शै है! कहां से कहां पहुंच जाता है, और वो भी बेवजह! कोई तर्क काम नहीं करता और कोई रुकावट बीच में नहीं आती. आप चाहें तो भी इसके भटकने पर विराम नहीं लगा सकते. मैं अपनी ही बात करूं. कल एक साहित्यिक आयोजन में भाग लेने का मौका मिला. वहां एक वक्ता ने, जो मेरी भाषा के एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं, एक बहुत ही अच्छी बात कही.  जिस आयोजन की बात मैं कर रहा हूं वो एक नई शुरुआत थी और उसके समापन समारोह में हम सब उपस्थित थे. आयोजक गण इस आयोजन में सहयोग देने वालों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित  कर रहे थे. तब, उन वक्ता महोदय ने मंच से कहा कि लेखकों में भी ऐसे बहुत सारे लोग होंगे जो  इस तरह के आयोजनों में आर्थिक  सहयोग दे सकें. मुझे यह बात बहुत महत्वपूर्ण लगी. तब से अब तक मैं यही सोच रहा हूं कि हम इतने सारे साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता करते हैं, और जानते हैं कि करीब-करीब सारे आयोजन दूसरों के आर्थिक सहयोग से ही सम्भव होते हैं, लेकिन क्यों हमारे मन में यह बात नहीं आती कि हम भी इन आयोजनों में कोई सहयोग दें! हम यानि हममें से वे लोग जिनके लिए ऐसा करना सम्भव है. उन वरिष्ठ साहित्यकार महोदय  ने तो कल भी यह बात स्पष्ट कर दी थी. उन्होंने कहा था कि हममें से बहुत सारे ऐसे हैं जिनके बच्चे उनके आर्थिक संसाधनों के मुखापेक्षी नहीं हैं. यानि जब हमारी ज़रूरतें ठीक से पूरी हो रही हैं तब  क्या अपनी रुचि के उपक्रमों के लिए हमें सहयोगी नहीं बनना चाहिए? इसे उलट कर कहूं तो यह कि क्या हमें ही हमेशा दूसरों का  मुखापेक्षी बना रहना चाहिए?
 
कल से यह बात मेरे जेह्न में घूम रही है. और इससे जुड़ी बहुत सारी बातें आ-जा रही हैं. अनायास मुझे बहुत बरस पहले का एक प्रसंग याद आ गया. मैं एक छोटे कस्बे में कार्यरत था जहां किसी तरह की कोई साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं होती थी. तब उसी कस्बे में मेरे एक मित्र थे जो एक ऐसे महकमे  में ऊंचे  पद पर कार्यरत थे जहां किसी को एक संकेत भर कर देना उसकी जेब से खासी बड़ी रकम निकलवाने के लिए पर्याप्त था. संगीत प्रेम उन मित्र और मेरे बीच के रिश्ते का आधार था. एक दिन गपशप के दौरान मैंने उन मित्र से कहा कि उनका तो इतना प्रभाव है, क्यों नहीं वे उसका उपयोग करके शहर में एक संगीत संध्या आयोजित करवा देते? उनका जवाब करीब चार दशक बाद भी मेरे मन पर ज्यों का त्यों अंकित है. वे बोले, “अग्रवाल साहब, संगीत का शौक तो आपको और मुझे है. उसके लिए हमें दूसरों पर बोझ क्यों बनना चाहिए? जब मन होगा, अहमदाबाद पास ही है, जाकर किसी को सुन आएंगे!” पता नहीं वे मित्र अब कहां हैं, और कैसे हैं! लेकिन उनकी बात कल से दिमाग में उमड़ घुमड़ रही है.

सोच रहा हूं कि हमारी जो भी रुचियां  हों,  चाहे वो साहित्य की हों, संगीत की हों, या किसी और विधा की हों, आखिर क्यों हमें किसी और की तरफ ताकना चाहिए कि वो दान करेगा और हम लाभान्वित होंगे! वो दान करना चाहें, ज़रूर करें, लेकिन हम उनके दान के आकांक्षी क्यों हों? लेकिन हकीकत तो यही है. मेरा ज्यादा लगाव जिस साहित्य की दुनिया से है उसमें मैं देखता हूं कि हम लोग अपने प्रिय रचनाकार की किताब तक खरीदकर नहीं पढ़ना चाहते! हमारी आकांक्षा यही होती है कि लेखक खुद हमें अपनी किताब भेंट करे तो हम पढ़ें! यह स्थिति हिन्दी समाज में अधिक है. यही वजह है कि आज किताब का संस्करण तीन सौ प्रतियों तक सिमट आया है.  अनायास मुझे यह बात याद आ रही है कि एक बार जब किसी ने बहुत उत्साह पूर्वक कहा कि वो हिन्दी के लिए अपनी जान  भी दे  सकता है,   तो रामधारी सिंह दिनकर ने बहुत गम्भीरता से कहा था कि हिन्दी को  आपकी जान की ज़रूरत नहीं है, आप तो बस थोड़े-से पैसे खर्च दिया करें हिन्दी की किताबों के लिए! आज भी अगर हम इस बात को याद कर लें तो हालात बदलते देर नहीं लगेगी.

और इसीसे मन भटकते-भटकते कहीं और निकल जाता है! हमारे पास अपने हर कृत्य के लिए बहुत सारे तर्क होते हैं. अपना पैसा खर्च न करने के लिए, अपना समय न देने के लिए, नियम-कानून-व्यवस्था का निर्वहन न करने के लिए... क्या हम इन तर्कों के इस्तेमाल में थोड़ी कृपणता नहीं बरत सकते? 

कृपणता हमेशा ही निन्दनीय नहीं होती है!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 सितम्बर, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.                 

Tuesday, September 2, 2014

दो मिनिट की देरी भी कोई देरी होती है?

हर देश की अपनी जीवन शैली होती है, अपने तौर-तरीके होते हैं. मैं इसे बहुत स्वाभाविक मानता हूं और हंसी-मज़ाक की बात अलग है, इस बात को लेकर कोई ख़ास आलोचनात्मक नज़रिया भी नहीं रखता हूं. हम जैसे हैं, हैं. न तो यह ज़रूरी है कि दूसरे हम जैसे बनें और न ही यह ज़रूरी है कि हम उन जैसे बनें!

न जाने कितनी चीज़ें हैं जो हममें और सिर्फ हममें ही हैं. किसी अजनबी से मिलते ही हम कितनी जल्दी उसकी निजी चीज़ों के बारे में पड़ताल करने लगते हैं? इसकी लज्जत वो ठण्डे अंग्रेज़ क्या जानें? हम न सिर्फ जानते बल्कि मानते भी हैं कि अतिथि देवता होता है, इसलिए चाहे जब किसी के घर जा धमकते हैं. सूचना देकर और सुविधा पूछकर तै शुदा  कार्यक्रमानुसार किसी के यहां जाने में भला यह सुख कहां है? जब कोई हमारे यहां आता है और हम उससे चाय-पानी के लिए  पूछते हैं तो उसका जवाब हम पहले से जानते हैं कि वो घर से करके ही आया है, लेकिन फिर भी हम उसका आतिथ्य सत्कार करते हैं. वो  उसकी कर्टसी थी और यह हमारी कर्टसी होती है.

ऐसी अनगिनत बातें हैं जो चाहे अनचाहे हमारी जीवन–शैली का हिस्सा बन चुकी हैं और हमें उनसे कोई ख़ास असुविधा भी नहीं होती है. लेकिन जब हमसे भिन्न जीवन-शैली वाला कोई व्यक्ति हमसे टकराता  है तो कई बार बड़ी अजीब स्थितियां पैदा  हो जाती हैं. अब समय की पाबन्दी को ही लीजिए. घड़ी हम चाहे कितनी ही महंगी क्यों न पहन लें, उसकी सुइयों को अपनी ज़िन्दगी पर हावी हम नहीं होने देते. समय को लेकर हम इतने आज़ाद खयाल हैं कि हमने एक नया पद ही गढ़ लिया है – इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम. निर्धारित समय से डेढ़ दो घण्टे विलम्ब से पहुंच कर हम बिना शर्मिन्दा हुए इस पद को आगे कर सकते हैं! लेकिन कभी-कभी बड़ी गड़बड़ भी हो जाती है. जैसी भारतीय  विज्ञापन दुनिया की बहुत बड़ी हस्ती अलीक पदमसी के साथ हुई. 

अलीक ने, आपको याद ही होगा कि सर रिचर्ड एटनबरो की महान फिल्म ‘गांधी’ में जिन्ना की भूमिका निबाही थी. और अभी हाल ही में जब एटनबरो का निधन हुआ तो अलीक ने अपने श्रद्धांजलि लेख में यह बात लिखी है. अलीक बताते हैं कि वे ‘गांधी’  फिल्म के लिए अपनी पहली शूटिंग के लिए दिल्ली पहुंचे और एक बड़े होटल में ठहरा दिए गए. जैसे ही वे अपने कमरे  में पहुंचे, उनके पास एक पेज की कॉल शीट पहुंचा दी गई जिसमें अगले दिन के कार्यक्रम की सूचना थी. यथा कार्यक्रम उन्हें सुबह साढ़े पांच बजे उठा दिया गया, छह बजे नाश्ता दे दिया गया और साढे छह बजे वे मेक अप रूम में जा पहुंचे. वहां मुद्दत के बाद सईद जाफरी से उनकी मुलाक़ात हुई और वे दोनों गपशप करने लगे. अचानक अलीक का ध्यान अपनी घड़ी की तरफ गया और वे भाग कर होटल की लॉबी में कार शिड्यूलर, जो एक अंग्रेज था, के पास पहुंचे, और उससे पूछा कि क्या उनकी कार तैयार है? शिड्यूलर जॉनसन ने उनकी तरफ देखा और पूछा, क्या आप मिस्टर जिन्ना हैं? हां में जवाब पाने पर उसने फिर पूछा, आपकी कार  कब पहुंचनी थी? अलीक ने कहा, सात बजे! तो,  जॉनसन  ने शांत  भाव से कहा, वो जा चुकी है! अलीक के पूछने पर उसने बताया कि क्योंकि कार का समय सात बजे का था, इसलिए वो दो मिनिट पहले दूसरे कलाकारों को लेकर जा चुकी है. अलीक ने पूछा कि अब क्या करें, तो जॉंनसन ने कहा कि अब आप आइन्दा से समय पर आया करें! आगे की बात संक्षेप में यह कि अलीक को सवा सात बजे जाने वाली दूसरी कार में भेजा गया. जब वे लोकेशन पर पहुंचे तो उनकी मुलाकात सर रिचर्ड से हुई, और रिचर्ड ने छूटते ही उनसे  कहा, अलीक  आप बहुत देर से आए हो!  अलीक  ने माफी मांगते हुए कहा कि वे महज़ दो ही मिनिट तो लेट हुए हैं!, सोचिये, इस पर रिचर्ड ने उनसे क्या कहा होगा? रिचर्ड ने कहा कि ‘अलीक, तुम जानते हो कि मेरी फिल्म पर प्रति मिनिट एक हज़ार पाउण्ड का खर्चा हो रहा है, यानि दो मिनिट लेट होने का मतलब है दो हज़ार पाउण्ड की बर्बादी!’ अलीक के लिए उनका इतना कह देना  काफी था, क्योंकि उन्हें अपने पूरे रोल के लिए जो राशि मिलनी थी वो दो हज़ार पाउण्ड से कम थी.

अब आप ही बताइये, क्या दो मिनिट की देरी भी कोई देरी होती है? अच्छा हुआ अंग्रेज़ हमारे देश से चले गए!
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार 02 सितम्बर, 2014 को दो मिनट लेट हुए तो दो हज़ार पाउण्ड बर्बाद शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, August 26, 2014

क्या वाकई समय इस तरह बदला है?

इधर एक नई हिन्दी फिल्म का राजस्थानी गीत चर्चा में है. सोनम कपूर की आनेवाली फिल्म ‘खूबसूरत’  में म्यूज़िक कम्पोज़र स्नेहा खानवलकर ने सुनिधी  चौहान और  रेसमी सतीश से एक गाना गवाया है – अंजन की सीटी में.  यह गाना राजस्थान में पहले से काफी लोकप्रिय है. अस्सी के दशक में इसे दो मिर्ज़ा बहनें रेहाना और परवीन अलग-अलग गाकर लगभग अमर कर चुकी हैं. इस गाने की लोकप्रियता का यह आलम है कि आम तौर पर इसे लोकगीत माना जाता है, जबकि मूलत: यह जाने माने शायर इक़राम राजस्थानी की रचना है. इक़राम साहब का कहना है कि उन्होंने इसे अपने पिता की एक रचना से प्रेरित होकर लिखा था.

इक़राम राजस्थानी  के मूल गाने में एक ग्रामीण युवती का चित्रण है जो शायद पहली दफा रेल में बैठी है और उस अनुभव से अभिभूत है. गाने के पहले अंतरे में रेल के डिब्बे में चल रहे बिजली के पंखे का, दूसरे में चलती रेल के डिब्बे की खिड़की से दिखाई देने वाले बाहर के दृश्य का, और तीसरे में टोपी वाले टीटी का चित्रण है. गाने का चौथा और आखिरी अंतरा रेल के डिब्बे के ज़ोर के धचके से नायिका के औंधी होकर गिर जाने के वर्णन से हास्य का सृजन कर गाने को पूर्णता प्रदान करता है. कहना अनावश्यक है कि यह राजस्थान की एक ग्राम्य बाला के  रेल-अनुभव का  रोचक और रंजक चित्रण है, और यही शायद इसकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह भी है. 

लेकिन  अब नई फिल्म ‘खूबसूरत’  में जो गाना आया है,  स्वाभाविक ही है कि उसकी भाव-भूमि अलग है. लगभग साढ़े तीन दशकों में परिवर्तन तो हुए ही हैं. और अगर गाने को फिल्म में इस्तेमाल किया जाना है तो उन परिवर्तनों पर नज़र रखना भी ज़रूरी है.  तो, यह लोकप्रिय गाना फिल्म में आकर बदल गया  है. मूल गाने की पंक्ति ‘अंजन की सीटी में म्हारो मन डोलै’ अब ‘अंजन की सीटी में म्हारो बम डोलै’ के रूप में सुनाई देती है! मन की जगह बम. बी यू एम. शुद्ध हिन्दी में कहूं तो नितम्ब! पहले मन डोलता था, अब नितम्ब कम्पायमान होते हैं. मन में फौरन यह सवाल उठता है कि क्या पैंतीस सालों में हममें यह  बदलाव हुआ है कि गाने में मन की जगह बम आ जाए? और इसे यों भी कह सकता हूं कि क्या हमारा वो पाठक-श्रोता  जो साढ़े  तीन दशक पहले मन को समझ लेता था, अब उसकी समझ बदल कर बम तक जा पहुंची है? इसे समझ का उत्थान कहें या पतन? और सवाल यह भी कि बदलाव श्रोता की संवेदना में हुआ है  या फिल्मकार की संवेदना में?  

और बदलाव की यह बात सिर्फ मुखड़े पर ही  खत्म  नहीं हो जाती है. मैंने मूल गाने के चार अंतरों का जो परिचय दिया उसे ध्यान में रखते हुए  अब ज़रा इस नए गाने का पहला अंतरा देखिये: “फक-फक इंजन  बोल रहा है,  पटरी थर-थर कांपै/ कहां रुकेगी गाड़ी आकर मन ये मेरा पूछै/ इंजन आकर जुड़ जाए मुझसे खाऊं हिचकोलै...”   सुनिधी ने इसे किस तरह गाया है और सोनम ने कैसे इस पर नृत्य किया है, इन बातों को  अगर नज़र अन्दाज़ भी कर दें तो ये शब्द ही काफी कुछ कह देते हैं. मूल गाने की मासूमियत की जगह अब एक मांसल, बल्कि लगभग अश्लील सांकेतिकता ने ले ली है.  बहुत सम्भव है कि इस गाने का प्रयोग एक आइटम नम्बर के तौर पर हुआ हो और फिल्म बनाने वालों की निगाह टिकिट खिड़की पर रही हो, इसलिए मूल गाने को इस तरह से बदल दिया गया हो! और हां, यह तो कहना मैं भूल ही गया था कि मूल गाने का यह रूपांतर भी किसी और का नहीं, उन्हीं शायर का किया हुआ है.

यह गाना एक बार फिर हमें शिद्दत से अपने बदले वक़्त का एहसास कराता है. इस बात का एहसास कराता है कि ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे ओ चन्दा’ , ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’ ‘छिपा लो यूं दिल में प्यार मेरा कि जैसे मन्दिर में लौ दिये की’ जैसे गानों और अभिव्यक्तियों का समय बीत चुका है. लेकिन क्या वाकई कोमलता का और सुरुचि का समय बीत चुका है? क्या वाकई इश्क़ कमीना हो गया है?  क्या वाकई  हम ‘पापा कहते थे बड़ा  नाम करेगा’ से चलकर ‘डैडी मुझसे बोला तू गलती है मेरी/ तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी/ साबुन की शक्ल में बेटा तू तो निकला केवल झाग/ झाग झाग….भाग डीके बोस भाग…….!’ तक आ पहुंचे हैं?  क्या सच्ची ‘अच्छी बातें कर ली बहुत,  अब करूंगा तेरे साथ गन्दी बात..गन्दी बात!’ वाला समय आ गया है?

मन की जगह बम सुनकर तो ऐसा ही लगता है!  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 26 अगस्त, 2014 को  वक़्त के साथ बदलते इंजन की सीटी के मायने शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 19, 2014

एक अनूठा बिज़नेस मॉडल और सरकारें

आज सुबह फेसबुक पर किसी ने मात्र एक मिनिट ग्यारह  सेकण्ड के  एक वीडियो का लिंक भेजा तो सहज जिज्ञासा वश उसे देख ही लिया. बहुत मज़ेदार,  लेकिन विचारोत्तेजक भी. कहा गया कि यह वीडियो मुम्बई की एक औरत की कहानी है. उसके अनूठे व्यवसाय की कहानी. रोज़ सुबह वो औरत अपनी चार गायों और थोड़ी-सी घास को लेकर उस जगह पर आती है. पुण्य करने के इच्छुक  लोग उस औरत से घास खरीदते हैं और पास ही बंधी हुई गायों के आगे डाल देते हैं. शाम होते-होते उस औरत की सारी घास  बिक जाती है, और उसी के साथ उसकी गायों का पेट भी भर जाता है. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. वे गायें जो दूध देती हैं, उसे  भी वो औरत बेच लेती है. तो यह है व्यापार का एक अनूठा मॉडल. अगर आप ध्यान से देखें तो इसमें ग़लत कुछ भी नहीं है. मुम्बई जैसे महानगर में वो औरत चन्द लोगों को पुण्य करने का अवसर प्रदान कर रही है. उन्हें पुण्य करने के लिए घास खरीदने दूर नहीं जाना पड़ रहा. गाय और घास दोनों पास-पास. वह औरत कोई छल नहीं कर रही. किसी को धोखा नहीं  दे रही. दानियों को इस बात से क्या फर्क़ पड़ता है कि वे गायें किसकी हैं? और इस तरह वो औरत अपने बहुत साधारण लेकिन अनूठे बिज़नेस सेंस से अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी चला रही है. हो सकता है आपको भी अपने आस-पास ऐसी ही कोई अनूठी कहानी मिल जाए!  

लेकिन इस वीडियो को देखते-देखते मेरा ध्यान एक और बात की तरफ चला गया. इस वीडियो को देखते-देखते मुझे खयाल आया कि सारी दुनिया की सरकारें भी तो इसी मॉडल पर चलती हैं! ज़रा सोचिये. सारा का सारा टैक्स हम देते हैं, और सरकारें इस बात का श्रेय लेती हैं कि उन्होंने हमारे लिए ये किया और वो किया. सड़कें बनवाई और अस्पताल चलाए! वेलफेयर स्टेट यानि कल्याणकारी राज्य! जब चाहा टैक्स लगा दिया और जितना चाहा उसे बढ़ा दिया. तर्क यह कि बिना टैक्स कोई भी योजना कैसे पूरी की जा सकती है! और आपने-हमने जो टैक्स दिया उससे सिर्फ हमारा-आपका ही भला नहीं हुआ! खुद सरकार का भी कम भला नहीं हुआ. सरकार यानि मंत्री, सांसद, विधायक और पूरा का पूरा सरकारी अमला. जो टैक्स आप हम देते हैं उसी में से वे खुद पर भी खर्च करते हैं और अच्छी खासी दरियादिली से खर्च करते हैं. उनके वेतन भत्ते, उनकी सारी सुख सुविधाएं, उनकी सुरक्षा, उनके घर-बार, उनकी हारी-बीमारी, उनकी देश-विदेश की यात्राएं, उनकी पेंशन सब कुछ उसी पैसे से तो होता है जो हम लोग बतौर टैक्स सरकार को देते हैं. है ना वही का वही मॉडल.

और जैसे इतना भी पर्याप्त नहीं है. हम पैसा देते हैं, और अगर हम प्रजातांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हों तो हम ही उन्हें चुनते हैं (चुनने का सारा खर्च भी हम ही उठाते हैं!), और अगर दूसरी व्यवस्था हो तो वे खुद को हम पर थोप लेते हैं, लेकिन हर व्यवस्था में यह दावा ज़रूर किया जाता है कि यह सब हमारी ही बेहतरी के लिए है. प्रजातंत्र में अपनी सरकार चुनने का अधिकार हमारे हाथों में सौंपना भी एक तरह से हम पर किया गया एक उपकार बताया जाता है. और अगर यह व्यवस्था न हो तो किसी महान परम्परा का निर्वाह बता कर उस भिन्न  व्यवस्था को  भी महिमा मण्डित किया जाता है. लेकिन ज़रा खुले मन से सोचिये कि क्या कोई भी सरकार अपनी जनता पर किया हुआ उपकार होती है? अगर वो किसी और स्रोत से वित्त पोषित होती तो मैं उसे उपकार मानने के बारे में सोचता. लेकिन जब वो मेरे ही संसाधनों से चलती है तो उसे उपकार के रूप में स्वीकार करने में मुझे तो संकोच होगा.  

असल में सरकारों ने, शायद यही बात उनके हित में हो, लम्बे समय से एक ऐसा माहौल बना रखा है कि सभी देशों की जनता उन्हें अपने हित में और अपरिहार्य मानने लगी  है. मुझे याद आता है कि कुछ समय पहले एक भारतीय साप्ताहिक पत्रिका ने एक कवर स्टोरी की थी  ‘डू वी रियली नीड अ गवर्नमेण्ट?’  क्या हमें वाकई  किसी सरकार की ज़रूरत है? यह सवाल आज फिर मेरे जेह्न में उठ रहा है.  इसलिए भी उठ रहा है दुनिया के बहुत सारे देशों में सरकारें अपने बहुत सारे काम निजी क्षेत्र को सौंपती जा रही हैं. ग्लोबल विलेज की अवधारणा का मूर्त होना विदेश नीति की ज़रूरत भी कम करता जा रहा है. और अगर सरकारें न हों तो शायद रक्षा महकमे की भी ज़रूरत न रहे! सभी जानते हैं कि लड़ती सरकारें हैं, जनता नहीं. तो  ऐसे में क्या उस औरत से कहा जा सकता है कि हमें तुमसे घास नहीं खरीदनी है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 19 अगस्त, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, August 12, 2014

चौंको, जल्दी चौंको!

इधर राजकुमार हिरानी की नई फिल्म ‘पीके’  के लिए आमिर खान के एक पोस्टर को लेकर जो घमासान मचा हुआ है वह बड़ा दिलचस्प है. वैसे यह बात सभी जानते हैं कि आमिर खान हर बार कुछ ऐसा कर जाते हैं कि लोग चौंक पड़ते हैं, इसलिए नई फिल्म ‘पीके’  के इस पोस्टर को भी उसी  तरह लिया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अपनी प्रतिक्रिया देने से भला कैसे रोका जा सकता है? वैसे यह पोस्टर है सीधा सादा. इसमें मिस्टर परफेक्ट एक रेल की पटरी के बीचों बीच अपनी आकर्षक देह को दिखाते हुए खड़े हैं. देह पर, जैसा मुहावरे की भाषा में कहा जाता है, एक धागा तक नहीं है. उन्होंने अधोवस्त्र धारण कर रखा है या नहीं, इस बारे में निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है. इसलिए नहीं कहा जा सकता है कि आमिर खान ने पुराने ज़माने वाला एक  कैसेट प्लेयर अपने दोनों हाथों में थाम रखा है. अब वे उसे हटायें तो पता चले कि उन्होंने किस ब्राण्ड का अण्डरवियर पहन रखा है, या वे अपनी बर्थडे पोशाक में ही हैं. ज़ाहिर है कि इस तस्वीर का कोई न कोई सम्बन्ध उस ‘पीके’  नामक फिल्म से ज़रूर होगा. क्या है यह जानने की उत्सुकता इस पोस्टर ने बढ़ा दी है.

वैसे, इस पोस्टर को देखकर सबसे पहले तो मुझे उस भले और भोले आदमी की याद आ गई जिसके बारे में हम अपने बचपन में खूब सुना करते थे. अरे वही भला और भोला आदमी जो एक ही फिल्म को बारहवीं या तेरहवीं दफा देखते हुए पकड़ा गया था और जिसने पूछने पर बताया था कि इस फिल्म में एक दृश्य है जिसमें नायिका नदी पर स्नान करने जाती है और वह जैसे ही अपने कपड़े उतारने लगती है, कम्बख़्त ट्रेन बीच में आ जाती है. वह भला और भोला इंसान इस उम्मीद में उस फिल्म को बार-बार देखने जाता रहा कि कभी तो ट्रेन लेट होगी. लेकिन अब समय बहुत बदल गया है. भोलापन बीते ज़माने की बात  हो गया है. अब कोई इस  बात का इंतज़ार नहीं करने वाला कि कभी तो आमिर का हाथ दुखेगा और वो अपने कैसेट प्लेयर को नीचे रखेगा, या और कुछ नहीं तो उसकी बैट्री ही बदलने की ज़रूरत पड़ जाएगी, और तब अपने आप पता चल जाएगा कि कैसेट प्लेयर के पीछे क्या है!

इस पोस्टर पर जो शोर-शराबा  है, मुझे लगता है कि उसके मूल में यही मासूमियत का खो जाना है, वरना तो इसमें आपत्तिजनक जैसा कुछ भी नहीं है. इसमें कोई आपत्तिजनक नग्नता नहीं है. हां, हो सकता है कि रेल की पटरियों के बीच खड़ा रहना आपत्तिजनक और शायद ग़ैर कानूनी हो, लेकिन मेरे खयाल से इस एंगल से किसी ने भी इस  पोस्टर को नहीं देखा है. हुआ यह है कि शोर  करने वालों ने कल्पना कर ली है कि आमिर खान ने इस कैसेट प्लेयर को अपनी नग्नता के आवरण  के तौर पर इस्तेमाल किया है, यानि उन्होंने कल्पना कर ली है कि कैसेट प्लेयर के पीछे क्या है! इस बात पर क्या आपको जाकी रहनी भावना जैसी वाली बात याद नहीं आती? या याद तो आती है, लेकिन इस सन्दर्भ में नहीं आती. वो तो तभी याद आती है ना जब हमें लगता है कि किसी भले इंसान को बेवजह आरोपित किया जा रहा है. यहां मामला दूसरा है. हमने मान लिया है कि कोई फिल्मी शख़्स इस तरह खड़ा है तो ज़रूर कहीं पीछे से गुरदास मान की आवाज़ भी आ ही रही होगी – मामला गड़बड़ है!

मैं बात मासूमियत के खो जाने की कर रहा था. कभी आप इस पोस्टर  को किसी बहुत छोटे बच्चे को दिखा कर देखें. क्या उसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होगी जैसी हममें से बहुतों की है? क्या वह भी इस पोस्टर को देखकर पूछेगा कि ये अंकल नंगू फंगू क्यों खड़े हैं? पक्की बात है कि वो ये सवाल नही पूछेगा क्योंकि उसकी मासूमियत अभी बरक़रार है. उसके मन में यह बात जमी हुई है कि इतने बड़े  अंकल ने कुछ न कुछ तो पहन ही रखा होगा, लेकिन वो कैसेट प्लेयर के पीछे  छिप गया है. एक और बात है. असल में जब हम किसी तस्वीर को देखते हैं तो सिर्फ उसी को नहीं देखते हैं. उसके साथ पूरा एक सन्दर्भ  हमारे मन में नेपथ्य में चलता है. यहां वही हो रहा है. देख तो हम तस्वीर को रहे हैं, लेकिन साथ में हमारा दिमाग हमें यह फीडबैक भी देता चल रहा है कि देखो ऐसी तस्वीर तुम्हें चौंकाने के लिए दिखाई जा रही है, इसलिए चौंको, जल्दी चौंको! (रघुवीर सहाय मुझे माफ़ करेंगे!) और हम चौंक जाते हैं! और यही उनकी कामयाबी है जिन्होंने हमें यह तस्वीर दिखाई है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 अगस्त, 2014 को मिस्टर परफेक्ट का अनोखा अंदाज़, चौंको जल्दी चौंको शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 5, 2014

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी

हर आदमी में होते हैं    दस-बीस आदमी
 जिसको भी देखना  हो  कई बार देखना |
आज जाने क्यों निदा फाज़ली साहब का यह शे’र बहुत याद आ रहा है. क्या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है कि बिना किसी बात के कोई बात याद आ जाए? और जब यह शे’र याद आ गया तो मुझे बहुत सारे ऐसे लोकप्रिय गायक याद आने लगे जिनकी लोकप्रियता उनके गाये बड़े हल्के, बल्कि चालू गानों की वजह से है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता पता चला कि असल में तो वे बड़े संज़ीदा और गुणी गायक हैं. जब गुणी होने से  रोजी रोटी का जुगाड़ नहीं बैठा तो अपनी गाड़ी को दूसरी दिशा में ले जाने को विवश  हुए. कुछ ऐसा ही हाल हमारे  बहुत सारे कवियों का भी है. आज उनकी जो छिछोरी और लगभग अस्वीकार्य छवि बन गई है, वह कदाचित उनकी विवशता की देन है. अब इस बात पर तो बहस हो सकती है कि क्या वह विवशता वाकई विवशता थी, या अधिक वैभव पूर्ण जीवन की ललक उन्हें उस तरफ़  ले गई, लेकिन उनकी समझ, उनकी संवेदनशीलता और उनकी काबिलियत असंदिग्ध है. यह बात करते हुए मुझे अनायास काफी पुराना एक प्रसंग याद आ रहा है. अपनी नौकरी के शुरुआती बरसों में, सन सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध  तक  मैं चित्तौड़ में पदस्थापित रहा. उस ज़माने में चित्तौड़-भीलवाड़ा में कवि सम्मेलन खूब ही हुआ करते थे.  बहुत बड़े-बड़े कवि सम्मेलन. दस-पन्द्रह हज़ार की उपस्थिति और सारी-सारी रात चलने वाले. नीरज, काका हाथरसी, बालकवि बैरागी,  सोम ठाकुर, संतोषानंद  आदि उन दिनों कवि सम्मेलनों के सुपर  स्टार हुआ करते थे. अगर कोई कवि लालकिले पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में काव्य पाठ कर आता था तो जैसे उसके सुर्खाब के पर लग जाया करते थे.

तो हुआ यह कि किसी कवि सम्मेलन में नीरज हमारे शहर में आए. तब तक फिल्मों में भी वे काफी कामयाब हो चुके थे और हर कवि सम्मेलन में उनसे मेरा नाम जोकर, शर्मीली, प्रेम पुजारी, छुपा रुस्तम वगैरह के उनके लिखे लोकप्रिय गीतों को सुनाने की फरमाइश की जाती थी और वे भी खुशी-खुशी उन फरमाइशों को पूरा करते थे. ज़ाहिर है कि इस तरह की रचनाओं और कुछ और लोकप्रिय गीतों जैसे कारवां गुज़र गया वगैरह में ही सारा समय बीत जाता और वे  नया कुछ तो कभी सुना ही नहीं पाते. मैं उनसे मिलने गया और बातों का सिलसिला कुछ ऐसा  चला कि मैं उनसे यह कह बैठा कि कवि सम्मेलनों में उनसे  फिल्मी गाने सुन कर मुझे बहुत निराशा होती है. और भी काफी कुछ कह दिया मैंने उनसे. उन्होंने बहुत धैर्य से मेरी बातें सुनी और फिर बड़ी शालीनता से मुझसे दो बातें कही. एक तो यह कि इन सब बातों से वे भी परिचित हैं, लेकिन यह उनकी मज़बूरी है कि जिन लोगों ने अच्छे  खासे पैसे देकर उन्हें बुलाया है, उन्हें वे खुश करें. और दूसरी यह कि उनके पास भी अच्छी और नई कविताएं हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाले कहां हैं? इसके जवाब में मैंने उनसे कहा कि सुनने वाले तो हैं लेकिन उनके पास आपको देने के लिए  बड़ी धन राशि  नहीं है. नीरज जी ने कहा कि अगर सच्चे कविता सुनने वाले मिलें तो वे बिना पैसे लिये भी उन्हें अपनी कविताएं सुनाने को तैयार हैं. उनके इस प्रस्ताव को मैंने तुरंत लपक  लिया और उन्हें अपने कॉलेज में काव्य पाठ के लिए ले गया. विद्यार्थियों से मैंने कहा कि नीरज जी बिना एक भी पैसा लिए हमारे यहां केवल इसलिए आए हैं कि हम उनसे सिर्फ और सिर्फ कविताएं सुनना चाहते हैं,  इसलिए आप उनसे कोई फरमाइश न करें. जो वे सुनाना चाहें वह सब उन्हें सुनाने दें. और आज मैं इस बात को याद करके चमत्कृत होता हूं कि नीरज जी ने लगभग दो घण्टे अपनी बेहतरीन  कविताएं सुनाईं, और मेरे विद्यार्थियों ने पूरी तल्लीनता और मुग्ध भाव से उन्हें सुना. इसके बाद मैंने ही नीरज जी  से अनुरोध किया कि हमारे विद्यार्थियों ने इतने मन से आपको सुना है, अब अगर आप इनकी पसन्द के दो एक गीत भी सुना दें तो बहुत मेहरबानी होगी. और नीरज जी की उदारता कि उन्होंने विद्यार्थियों की फरमाइश पर अपने सारे लोकप्रिय फिल्मी गीत भी एक-एक करके सुना दिए !  लेकिन उस दिन मुझे महसूस हुआ कि ‘छुपे रुस्तम हैं हम क़यामत की नज़र रखते हैं’ और ‘ओ मेरी शर्मीली’  जैसे गाने लिखने और सुनाने वाले नीरज के भीतर एक कवि उदास और इस इंतज़ार में बैठा है कि कोई आए और उससे कुछ सुनने की इच्छा ज़ाहिर करे! शायद यही हाल आज के बहुत सारे लोकप्रिय कलाकारों का भी है. लेकिन उनकी सुनता कौन है?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 05 अगस्त 2014 को हर आदमी में  छिपे होते हैं दस-बीस आदमी शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 29, 2014

बड़ा बुरा समय आ गया है?

एक जाने-माने नर्तक के टॉक शो में जाने का अवसर मिला तो मेरा ध्यान इस बात पर गए बिना नहीं रह सका कि उनके बोलने के लहज़े में भी नृत्य समाहित था. बोल वे हिन्दी में रहे थे और आप-हम जैसा गद्य ही बोल रहे थे लेकिन मुझे लगा कि उस गद्य में भी लय-ताल सब मौज़ूद  है. अपने बहुत सारे अनुभवों की चर्चा करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि आज के विद्यार्थियों में कला के प्रति वैसा समर्पण भाव नहीं है  जैसा उनमें और उनकी पीढ़ी के शिष्यों में हुआ करता था. उनसे सहमत या असहमत कुछ भी न होते हुए भी मैं यह कहने की अनुमति चाहता हूं कि सारे बदलावों के बीच जो चीज़ नहीं बदली है वो यही है. यानि यह सोच कि अब ज़माना बहुत खराब आ गया है, और हमारा ज़माना बहुत अच्छा था. मैं हालांकि उनकी तरह कला का विद्यार्थी नहीं रहा लेकिन मैंने भी अपने शिक्षक मित्रों को यही कहते सुना है. शायद कई बार खुद मैंने भी ऐसा ही कहा हो.

लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो याद आता है कि मेरे गुरुजन भी यही बात कहा करते थे. उन्हें लगता था कि जितने अच्छे विद्यार्थी वे रहे थे, उतने अच्छे हम नहीं हैं. उनसे पूछा तो नहीं -क्योंकि तब गुरुजन  और शिष्यों के बीच रिश्ते इतने अनौपचारिक नहीं हुआ करते थे-  लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरे उन गुरुजन के गुरुजन भी यही कहते रहे होंगे. तो क्या इससे हम इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि वर्तमान हमें सदा ही अतीत की तुलना में कम अच्छा लगता है? या यह कहना हमारे स्वभाव का एक अंतर्निर्मित अंग है? स्वभाव की बात तो इस विषय के विशेषज्ञ ही बेहतर बता सकेंगे, मैं तो फिलहाल यह पड़ताल करने की कोशिश  कर सकता हूं क्या समय वाकई पहले की तुलना में खराब है.

मुझे याद आती है कोई पचास पचपन बरस पहले राष्ट्रकवि दिनकर से हुई एक छोटी-सी मुलाक़ात. तब पूरे देश में बहुत उग्र छात्र आन्दोलन चल रहे थे, और उसी सन्दर्भ में मैंने उनसे पूछ लिया था कि क्या ये छात्र अपने आन्दोलन  के ज़रिये देश को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं? दिनकर जी का दो-टूक जवाब आज भी मुझे ज्यों का त्यों याद है. उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा था कि उनकी पीढ़ी ने देश का जितना नुकसान किया है, उसकी तुलना में तो यह कुछ भी नहीं है. दिनकर जी की इस बात से सूत्र लेते हुए अगर मैं आज के हालात पर विचार करता हूं तो  पाता हूं कि कल और आज में कोई बड़ा फर्क़  नहीं है. न तो कल बहुत अच्छा था और न आज बहुत बुरा है.

अब आप महंगाई की बात ही लीजिए. हम जिस समय में रह रहे हैं वो सूचना माध्यमों का समय भी है. इन माध्यमों पर आए दिन कभी एक पदार्थ तो कभी दूसरे पदार्थ के महंगे और पहुंच से बाहर हो जाने की ख़बरें छाई रहती हैं. और बेशक चीज़ें महंगी होती भी जा रही हैं. जितने रुपयों में कोई सब्ज़ी एक किलो मिलती थी उतने ही रुपयों में कुछ ही समय बाद वो ढाई सौ ग्राम मिलने लगती है. लेकिन क्या कीमतों का यह बढ़ना कोई नई बात है? मुझे याद है कि आज से कोई साठ पैंसठ साल पहले मेरे मां-बाप भी यही कहते थे कि महंगाई  बहुत बढ़ गई है,  घर का खर्च चलाना मुश्क़िल होता जा रहा है. चार आने की एक सेर (तब किलो नहीं होता था) शक्कर उन्हें बहुत महंगी लगती थी.

बात चाहे महंगाई की हो, अनुशासन की हो, समर्पण की हो, अवसरों की सुलभता की हो, जीवन संघर्षों की हो, अपराधों की हो – मुझे लगता है कि बुरे वक़्त की बात करना हमारी आदत का एक हिस्सा बन चुका है, अन्यथा वक़्त इतना भी बुरा नहीं है. हम चीज़ों के बढ़े हुए दामों को देखते हैं लेकिन अपनी बढ़ी हुई आमदनी को अनदेखा कर देना चाहते हैं. हम नई पीढ़ी में समर्पण की कमी का रोना रोते हैं लेकिन उन लोगों  के सामने आने  वाली नित नई चुनौतियों और उनसे जूझने में उनके जज़्बे को अनदेखा कर जाते हैं. हम जीवन के बढ़ते संघर्षों की बात करते हैं लेकिन बहुत सारी वजहों से जीवन के सुगम हो जाने की बात को अनदेखा कर जाते हैं. हम नित नई बीमारियों की बात करते हैं लेकिन इस बात को नहीं देखना चाहते कि औसत उम्र काफी बढ़ी है और सेहत के हालात भी बेहतर हुए हैं. 

मैं यह नहीं कह रहा कि समय बदला नहीं है. शायद कुछ चीज़ें बदतर भी हुई हैं. लेकिन उनकी चर्चा और शिकायत करते हुए जो बेहतर हुई हैं उनकी अनदेखी करना अपने ही प्रति अन्याय है – इसे भी समझना होगा.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 29 जुलाई 2014 को न कल समय अच्छा था, न आज बहुत बुरा  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.           

Tuesday, July 22, 2014

जहां जाइयेगा, हमें पाइयेगा!

नाटककार कथाकार मोहन राकेश का एक मज़ेदार लेख कभी पढ़ा और पढ़ाया था – ‘विज्ञापन युग’. लेखक ने बहुत मज़े लेकर और तत्कालीन विज्ञापनों के अनेक उदाहरण देकर हमारे जीवन में अनचाहे घुस आए विज्ञापनों की रोचक चर्चा की थी. जाने क्यों आज वो लेख बहुत याद आ रहा है. सोचता हूं अगर आज कोई उसी तरह का लेख लिखना चाहे तो वो क्या-क्या लिखेगा? तब से अब तक गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है.  एक कला, एक व्यवसाय और एक विज्ञान के रूप में विज्ञापन में आमूल-चूल बदलाव आ चुके हैं. पहले विज्ञापन का प्रयोग वस्तुओं को बेचने के लिए किया जाता था, आज उसका क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि सेवा, विचार, छवि  और यहां तक कि सरकारों को बेचने के लिए भी उसका इस्तेमाल होने लग गया है.

विज्ञापनों की माया अपरम्पार है. यह विज्ञापनों की ही कृपा है कि बहुत सारे उत्पाद, जैसे समाचार पत्र,  अपनी लागत से भी कम कीमत पर हमें  मिल जाते हैं. लेकिन इसी बात का दूसरा पहलू यह भी है और यह कम दिलचस्प भी नहीं है कि जिन विज्ञापनों से हम  आम तौर पर चिढ़ते हैं उन्हीं को देखने-पढ़ने के लिए हमें  पैसा, चाहे वो कितना भी कम क्यों ना हो, खर्च करना पड़ता है. और इससे भी अधिक रोचक बात तो यह है कि तमाम  निर्माता या विक्रेता हमारी  जेब से पैसे निकलवा  कर  हमें   ही  अपनी वस्तु या सेवा के गुणों से परिचित करवाते हैं. हम सब जानते हैं कि विज्ञापनों पर होने वाला सारा खर्चा उत्पाद या सेवा की लागत में जोड़ा जाकर उपभोक्ता से ही वसूला जाता है.  सईद राही की ग़ज़ल का मिसरा याद आता है- उस शोख ने मुझी को सुनाई मेरी ग़ज़ल. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर चीज़ों का विज्ञापन न किया जाए तो वे कितने सस्ते  में हमें मिलने लगें! या उलट  कर इस बात को सोचें कि अगर हरी मिर्च, धनिया, प्याज और टमाटर  के भी विज्ञापन होने लग जाएं तो इनके भाव कहां तक जा पहुंचेंगे!

अगर आप यह सोच रहे हैं कि अमुक अगरबत्त्ती सबसे अच्छी है या कुछ दिन तो गुज़ारो हमारे राज्य में जैसी बातें ही विज्ञापन की श्रेणी में आती हैं तो आप इसके फैलाव को बहुत कम देख पा रहे हैं. असल में समय, स्थितियों और समझ के बदलाव के साथ विज्ञापन के रूपों और तौर-तरीकों में इतना ज़्यादा बदलाव आ गया है कि कई बार तो अपको पता ही नहीं चलता है और विज्ञापन आप पर अपना असर  डाल चुका होता है. यह बात तो पुरानी हो गई है कि आप जिसे ख़बर समझ कर पढ़ते हैं असल में वो विज्ञापन होती है. और यह बात भी पुरानी है कि कोई धर्मात्मा अस्पताल या धर्मशाला या मन्दिर बनवाकर अपनी दानशीलता का विज्ञापन ही करता है. मुझे यह बात बहुत रोचक लगती है कि हमारे देश में बहुत सारे मन्दिर एक बड़े उद्योगपति के नाम से जाने जाते हैं. खुद दानदाता का भगवान हो जाना तो विज्ञापन की कामयाबी का बेहतरीन उदाहरण है.  

इधर मैं यह बात देख रहा हूं कि बहुत निजी माने जाने वाले पारिवारिक आयोजन भी विज्ञापन का माध्यम बनते जा रहे हैं. और ऐसा अनायास नहीं सायास हो रहा है. किसी धनपति के घर-परिवार के किसी मांगलिक समारोह का भव्य आयोजन उसकी सामर्थ्यानुसार उसके आनंद की अभिव्यक्ति हो सकता है लेकिन उस आयोजन का बाकायदा प्रचार छवि निर्माण का प्रयास ही कहा जाएगा. और ऐसा भव्यता में ही नहीं होता है, सादगी में भी होता है. देश के एक नामी चित्रकार का जूते न पहनने का बहु प्रचारित निर्णय अंतत: उनकी विशिष्ठ छवि बनाकर उन्हें लाभान्वित करता था. बिना दहेज शादी की बहुत सारी ख़बरें इसी बात को ध्यान में रखकर प्रसारित करवाई जाती हैं कि इससे उन लोगों की एक बेहतर छवि आपकी स्मृति में स्थापित हो सके.

लेकिन जैसा मैंने कहा, समय के साथ विज्ञापन अप्रत्यक्ष और घुमावदार होते जा रहे हैं. कभी एक टीवी के विज्ञापन में दैत्य की छवि को अजूबा माना गया था और नकारात्मक विज्ञापन को एक बड़ी परिघटना के रूप में जाना गया था लेकिन आज तो विज्ञापन की दुनिया में इतना कुछ नया घटित हो रहा है कि अब उस तरफ हमारा ध्यान भी नहीं  जाता है. फिर भी, तमाम बदलावों के बावज़ूद विज्ञापनों की यह खासियत अभी भी बरक़रार है कि अपनी तमाम अनिच्छाओं  के बावज़ूद आप न सिर्फ इन्हें झेलने के लिए अभिशप्त हैं, आपको  आम तौर पर इनके लिए अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ती है. क्या पता कि वो गाना विज्ञापनों को ध्यान में रखकर ही लिखा गया हो – अजी रूठ कर कहां जाइयेगा, जहां जाइयेगा, हमें पाइयेगा!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में दिनांक 22 जुलाई, 2014 को ज़रा सोचिए, विज्ञापन न होते तो क्या होता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.