Tuesday, August 26, 2014

क्या वाकई समय इस तरह बदला है?

इधर एक नई हिन्दी फिल्म का राजस्थानी गीत चर्चा में है. सोनम कपूर की आनेवाली फिल्म ‘खूबसूरत’  में म्यूज़िक कम्पोज़र स्नेहा खानवलकर ने सुनिधी  चौहान और  रेसमी सतीश से एक गाना गवाया है – अंजन की सीटी में.  यह गाना राजस्थान में पहले से काफी लोकप्रिय है. अस्सी के दशक में इसे दो मिर्ज़ा बहनें रेहाना और परवीन अलग-अलग गाकर लगभग अमर कर चुकी हैं. इस गाने की लोकप्रियता का यह आलम है कि आम तौर पर इसे लोकगीत माना जाता है, जबकि मूलत: यह जाने माने शायर इक़राम राजस्थानी की रचना है. इक़राम साहब का कहना है कि उन्होंने इसे अपने पिता की एक रचना से प्रेरित होकर लिखा था.

इक़राम राजस्थानी  के मूल गाने में एक ग्रामीण युवती का चित्रण है जो शायद पहली दफा रेल में बैठी है और उस अनुभव से अभिभूत है. गाने के पहले अंतरे में रेल के डिब्बे में चल रहे बिजली के पंखे का, दूसरे में चलती रेल के डिब्बे की खिड़की से दिखाई देने वाले बाहर के दृश्य का, और तीसरे में टोपी वाले टीटी का चित्रण है. गाने का चौथा और आखिरी अंतरा रेल के डिब्बे के ज़ोर के धचके से नायिका के औंधी होकर गिर जाने के वर्णन से हास्य का सृजन कर गाने को पूर्णता प्रदान करता है. कहना अनावश्यक है कि यह राजस्थान की एक ग्राम्य बाला के  रेल-अनुभव का  रोचक और रंजक चित्रण है, और यही शायद इसकी लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह भी है. 

लेकिन  अब नई फिल्म ‘खूबसूरत’  में जो गाना आया है,  स्वाभाविक ही है कि उसकी भाव-भूमि अलग है. लगभग साढ़े तीन दशकों में परिवर्तन तो हुए ही हैं. और अगर गाने को फिल्म में इस्तेमाल किया जाना है तो उन परिवर्तनों पर नज़र रखना भी ज़रूरी है.  तो, यह लोकप्रिय गाना फिल्म में आकर बदल गया  है. मूल गाने की पंक्ति ‘अंजन की सीटी में म्हारो मन डोलै’ अब ‘अंजन की सीटी में म्हारो बम डोलै’ के रूप में सुनाई देती है! मन की जगह बम. बी यू एम. शुद्ध हिन्दी में कहूं तो नितम्ब! पहले मन डोलता था, अब नितम्ब कम्पायमान होते हैं. मन में फौरन यह सवाल उठता है कि क्या पैंतीस सालों में हममें यह  बदलाव हुआ है कि गाने में मन की जगह बम आ जाए? और इसे यों भी कह सकता हूं कि क्या हमारा वो पाठक-श्रोता  जो साढ़े  तीन दशक पहले मन को समझ लेता था, अब उसकी समझ बदल कर बम तक जा पहुंची है? इसे समझ का उत्थान कहें या पतन? और सवाल यह भी कि बदलाव श्रोता की संवेदना में हुआ है  या फिल्मकार की संवेदना में?  

और बदलाव की यह बात सिर्फ मुखड़े पर ही  खत्म  नहीं हो जाती है. मैंने मूल गाने के चार अंतरों का जो परिचय दिया उसे ध्यान में रखते हुए  अब ज़रा इस नए गाने का पहला अंतरा देखिये: “फक-फक इंजन  बोल रहा है,  पटरी थर-थर कांपै/ कहां रुकेगी गाड़ी आकर मन ये मेरा पूछै/ इंजन आकर जुड़ जाए मुझसे खाऊं हिचकोलै...”   सुनिधी ने इसे किस तरह गाया है और सोनम ने कैसे इस पर नृत्य किया है, इन बातों को  अगर नज़र अन्दाज़ भी कर दें तो ये शब्द ही काफी कुछ कह देते हैं. मूल गाने की मासूमियत की जगह अब एक मांसल, बल्कि लगभग अश्लील सांकेतिकता ने ले ली है.  बहुत सम्भव है कि इस गाने का प्रयोग एक आइटम नम्बर के तौर पर हुआ हो और फिल्म बनाने वालों की निगाह टिकिट खिड़की पर रही हो, इसलिए मूल गाने को इस तरह से बदल दिया गया हो! और हां, यह तो कहना मैं भूल ही गया था कि मूल गाने का यह रूपांतर भी किसी और का नहीं, उन्हीं शायर का किया हुआ है.

यह गाना एक बार फिर हमें शिद्दत से अपने बदले वक़्त का एहसास कराता है. इस बात का एहसास कराता है कि ‘दम भर जो उधर मुंह फेरे ओ चन्दा’ , ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में’ ‘छिपा लो यूं दिल में प्यार मेरा कि जैसे मन्दिर में लौ दिये की’ जैसे गानों और अभिव्यक्तियों का समय बीत चुका है. लेकिन क्या वाकई कोमलता का और सुरुचि का समय बीत चुका है? क्या वाकई इश्क़ कमीना हो गया है?  क्या वाकई  हम ‘पापा कहते थे बड़ा  नाम करेगा’ से चलकर डैडी मुझसे बोला तू गलती है मेरी/ तुझपे जिंदगानी गिल्टी है मेरी/ साबुन की शक्ल में बेटा तू तो निकला केवल झाग/ झाग झाग….भाग डीके बोस भाग…….!’ तक आ पहुंचे हैं?  क्या सच्ची ‘अच्छी बातें कर ली बहुत,  अब करूंगा तेरे साथ गन्दी बात..गन्दी बात!’ वाला समय आ गया है?

मन की जगह बम सुनकर तो ऐसा ही लगता है!  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 26 अगस्त, 2014 को  वक़्त के साथ बदलते इंजन की सीटी के मायने शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 19, 2014

एक अनूठा बिज़नेस मॉडल और सरकारें

आज सुबह फेसबुक पर किसी ने मात्र एक मिनिट ग्यारह  सेकण्ड के  एक वीडियो का लिंक भेजा तो सहज जिज्ञासा वश उसे देख ही लिया. बहुत मज़ेदार,  लेकिन विचारोत्तेजक भी. कहा गया कि यह वीडियो मुम्बई की एक औरत की कहानी है. उसके अनूठे व्यवसाय की कहानी. रोज़ सुबह वो औरत अपनी चार गायों और थोड़ी-सी घास को लेकर उस जगह पर आती है. पुण्य करने के इच्छुक  लोग उस औरत से घास खरीदते हैं और पास ही बंधी हुई गायों के आगे डाल देते हैं. शाम होते-होते उस औरत की सारी घास  बिक जाती है, और उसी के साथ उसकी गायों का पेट भी भर जाता है. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती. वे गायें जो दूध देती हैं, उसे  भी वो औरत बेच लेती है. तो यह है व्यापार का एक अनूठा मॉडल. अगर आप ध्यान से देखें तो इसमें ग़लत कुछ भी नहीं है. मुम्बई जैसे महानगर में वो औरत चन्द लोगों को पुण्य करने का अवसर प्रदान कर रही है. उन्हें पुण्य करने के लिए घास खरीदने दूर नहीं जाना पड़ रहा. गाय और घास दोनों पास-पास. वह औरत कोई छल नहीं कर रही. किसी को धोखा नहीं  दे रही. दानियों को इस बात से क्या फर्क़ पड़ता है कि वे गायें किसकी हैं? और इस तरह वो औरत अपने बहुत साधारण लेकिन अनूठे बिज़नेस सेंस से अपनी ज़िन्दगी की गाड़ी चला रही है. हो सकता है आपको भी अपने आस-पास ऐसी ही कोई अनूठी कहानी मिल जाए!  

लेकिन इस वीडियो को देखते-देखते मेरा ध्यान एक और बात की तरफ चला गया. इस वीडियो को देखते-देखते मुझे खयाल आया कि सारी दुनिया की सरकारें भी तो इसी मॉडल पर चलती हैं! ज़रा सोचिये. सारा का सारा टैक्स हम देते हैं, और सरकारें इस बात का श्रेय लेती हैं कि उन्होंने हमारे लिए ये किया और वो किया. सड़कें बनवाई और अस्पताल चलाए! वेलफेयर स्टेट यानि कल्याणकारी राज्य! जब चाहा टैक्स लगा दिया और जितना चाहा उसे बढ़ा दिया. तर्क यह कि बिना टैक्स कोई भी योजना कैसे पूरी की जा सकती है! और आपने-हमने जो टैक्स दिया उससे सिर्फ हमारा-आपका ही भला नहीं हुआ! खुद सरकार का भी कम भला नहीं हुआ. सरकार यानि मंत्री, सांसद, विधायक और पूरा का पूरा सरकारी अमला. जो टैक्स आप हम देते हैं उसी में से वे खुद पर भी खर्च करते हैं और अच्छी खासी दरियादिली से खर्च करते हैं. उनके वेतन भत्ते, उनकी सारी सुख सुविधाएं, उनकी सुरक्षा, उनके घर-बार, उनकी हारी-बीमारी, उनकी देश-विदेश की यात्राएं, उनकी पेंशन सब कुछ उसी पैसे से तो होता है जो हम लोग बतौर टैक्स सरकार को देते हैं. है ना वही का वही मॉडल.

और जैसे इतना भी पर्याप्त नहीं है. हम पैसा देते हैं, और अगर हम प्रजातांत्रिक व्यवस्था में रह रहे हों तो हम ही उन्हें चुनते हैं (चुनने का सारा खर्च भी हम ही उठाते हैं!), और अगर दूसरी व्यवस्था हो तो वे खुद को हम पर थोप लेते हैं, लेकिन हर व्यवस्था में यह दावा ज़रूर किया जाता है कि यह सब हमारी ही बेहतरी के लिए है. प्रजातंत्र में अपनी सरकार चुनने का अधिकार हमारे हाथों में सौंपना भी एक तरह से हम पर किया गया एक उपकार बताया जाता है. और अगर यह व्यवस्था न हो तो किसी महान परम्परा का निर्वाह बता कर उस भिन्न  व्यवस्था को  भी महिमा मण्डित किया जाता है. लेकिन ज़रा खुले मन से सोचिये कि क्या कोई भी सरकार अपनी जनता पर किया हुआ उपकार होती है? अगर वो किसी और स्रोत से वित्त पोषित होती तो मैं उसे उपकार मानने के बारे में सोचता. लेकिन जब वो मेरे ही संसाधनों से चलती है तो उसे उपकार के रूप में स्वीकार करने में मुझे तो संकोच होगा.  

असल में सरकारों ने, शायद यही बात उनके हित में हो, लम्बे समय से एक ऐसा माहौल बना रखा है कि सभी देशों की जनता उन्हें अपने हित में और अपरिहार्य मानने लगी  है. मुझे याद आता है कि कुछ समय पहले एक भारतीय साप्ताहिक पत्रिका ने एक कवर स्टोरी की थी  ‘डू वी रियली नीड अ गवर्नमेण्ट?’  क्या हमें वाकई  किसी सरकार की ज़रूरत है? यह सवाल आज फिर मेरे जेह्न में उठ रहा है.  इसलिए भी उठ रहा है दुनिया के बहुत सारे देशों में सरकारें अपने बहुत सारे काम निजी क्षेत्र को सौंपती जा रही हैं. ग्लोबल विलेज की अवधारणा का मूर्त होना विदेश नीति की ज़रूरत भी कम करता जा रहा है. और अगर सरकारें न हों तो शायद रक्षा महकमे की भी ज़रूरत न रहे! सभी जानते हैं कि लड़ती सरकारें हैं, जनता नहीं. तो  ऐसे में क्या उस औरत से कहा जा सकता है कि हमें तुमसे घास नहीं खरीदनी है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 19 अगस्त, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.     

Tuesday, August 12, 2014

चौंको, जल्दी चौंको!

इधर राजकुमार हिरानी की नई फिल्म ‘पीके’  के लिए आमिर खान के एक पोस्टर को लेकर जो घमासान मचा हुआ है वह बड़ा दिलचस्प है. वैसे यह बात सभी जानते हैं कि आमिर खान हर बार कुछ ऐसा कर जाते हैं कि लोग चौंक पड़ते हैं, इसलिए नई फिल्म ‘पीके’  के इस पोस्टर को भी उसी  तरह लिया जाना चाहिए, लेकिन किसी को भी अपनी प्रतिक्रिया देने से भला कैसे रोका जा सकता है? वैसे यह पोस्टर है सीधा सादा. इसमें मिस्टर परफेक्ट एक रेल की पटरी के बीचों बीच अपनी आकर्षक देह को दिखाते हुए खड़े हैं. देह पर, जैसा मुहावरे की भाषा में कहा जाता है, एक धागा तक नहीं है. उन्होंने अधोवस्त्र धारण कर रखा है या नहीं, इस बारे में निश्चय पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है. इसलिए नहीं कहा जा सकता है कि आमिर खान ने पुराने ज़माने वाला एक  कैसेट प्लेयर अपने दोनों हाथों में थाम रखा है. अब वे उसे हटायें तो पता चले कि उन्होंने किस ब्राण्ड का अण्डरवियर पहन रखा है, या वे अपनी बर्थडे पोशाक में ही हैं. ज़ाहिर है कि इस तस्वीर का कोई न कोई सम्बन्ध उस ‘पीके’  नामक फिल्म से ज़रूर होगा. क्या है यह जानने की उत्सुकता इस पोस्टर ने बढ़ा दी है.

वैसे, इस पोस्टर को देखकर सबसे पहले तो मुझे उस भले और भोले आदमी की याद आ गई जिसके बारे में हम अपने बचपन में खूब सुना करते थे. अरे वही भला और भोला आदमी जो एक ही फिल्म को बारहवीं या तेरहवीं दफा देखते हुए पकड़ा गया था और जिसने पूछने पर बताया था कि इस फिल्म में एक दृश्य है जिसमें नायिका नदी पर स्नान करने जाती है और वह जैसे ही अपने कपड़े उतारने लगती है, कम्बख़्त ट्रेन बीच में आ जाती है. वह भला और भोला इंसान इस उम्मीद में उस फिल्म को बार-बार देखने जाता रहा कि कभी तो ट्रेन लेट होगी. लेकिन अब समय बहुत बदल गया है. भोलापन बीते ज़माने की बात  हो गया है. अब कोई इस  बात का इंतज़ार नहीं करने वाला कि कभी तो आमिर का हाथ दुखेगा और वो अपने कैसेट प्लेयर को नीचे रखेगा, या और कुछ नहीं तो उसकी बैट्री ही बदलने की ज़रूरत पड़ जाएगी, और तब अपने आप पता चल जाएगा कि कैसेट प्लेयर के पीछे क्या है!

इस पोस्टर पर जो शोर-शराबा  है, मुझे लगता है कि उसके मूल में यही मासूमियत का खो जाना है, वरना तो इसमें आपत्तिजनक जैसा कुछ भी नहीं है. इसमें कोई आपत्तिजनक नग्नता नहीं है. हां, हो सकता है कि रेल की पटरियों के बीच खड़ा रहना आपत्तिजनक और शायद ग़ैर कानूनी हो, लेकिन मेरे खयाल से इस एंगल से किसी ने भी इस  पोस्टर को नहीं देखा है. हुआ यह है कि शोर  करने वालों ने कल्पना कर ली है कि आमिर खान ने इस कैसेट प्लेयर को अपनी नग्नता के आवरण  के तौर पर इस्तेमाल किया है, यानि उन्होंने कल्पना कर ली है कि कैसेट प्लेयर के पीछे क्या है! इस बात पर क्या आपको जाकी रहनी भावना जैसी वाली बात याद नहीं आती? या याद तो आती है, लेकिन इस सन्दर्भ में नहीं आती. वो तो तभी याद आती है ना जब हमें लगता है कि किसी भले इंसान को बेवजह आरोपित किया जा रहा है. यहां मामला दूसरा है. हमने मान लिया है कि कोई फिल्मी शख़्स इस तरह खड़ा है तो ज़रूर कहीं पीछे से गुरदास मान की आवाज़ भी आ ही रही होगी – मामला गड़बड़ है!

मैं बात मासूमियत के खो जाने की कर रहा था. कभी आप इस पोस्टर  को किसी बहुत छोटे बच्चे को दिखा कर देखें. क्या उसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होगी जैसी हममें से बहुतों की है? क्या वह भी इस पोस्टर को देखकर पूछेगा कि ये अंकल नंगू फंगू क्यों खड़े हैं? पक्की बात है कि वो ये सवाल नही पूछेगा क्योंकि उसकी मासूमियत अभी बरक़रार है. उसके मन में यह बात जमी हुई है कि इतने बड़े  अंकल ने कुछ न कुछ तो पहन ही रखा होगा, लेकिन वो कैसेट प्लेयर के पीछे  छिप गया है. एक और बात है. असल में जब हम किसी तस्वीर को देखते हैं तो सिर्फ उसी को नहीं देखते हैं. उसके साथ पूरा एक सन्दर्भ  हमारे मन में नेपथ्य में चलता है. यहां वही हो रहा है. देख तो हम तस्वीर को रहे हैं, लेकिन साथ में हमारा दिमाग हमें यह फीडबैक भी देता चल रहा है कि देखो ऐसी तस्वीर तुम्हें चौंकाने के लिए दिखाई जा रही है, इसलिए चौंको, जल्दी चौंको! (रघुवीर सहाय मुझे माफ़ करेंगे!) और हम चौंक जाते हैं! और यही उनकी कामयाबी है जिन्होंने हमें यह तस्वीर दिखाई है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 अगस्त, 2014 को मिस्टर परफेक्ट का अनोखा अंदाज़, चौंको जल्दी चौंको शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 5, 2014

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी

हर आदमी में होते हैं    दस-बीस आदमी
 जिसको भी देखना  हो  कई बार देखना |
आज जाने क्यों निदा फाज़ली साहब का यह शे’र बहुत याद आ रहा है. क्या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है कि बिना किसी बात के कोई बात याद आ जाए? और जब यह शे’र याद आ गया तो मुझे बहुत सारे ऐसे लोकप्रिय गायक याद आने लगे जिनकी लोकप्रियता उनके गाये बड़े हल्के, बल्कि चालू गानों की वजह से है, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता पता चला कि असल में तो वे बड़े संज़ीदा और गुणी गायक हैं. जब गुणी होने से  रोजी रोटी का जुगाड़ नहीं बैठा तो अपनी गाड़ी को दूसरी दिशा में ले जाने को विवश  हुए. कुछ ऐसा ही हाल हमारे  बहुत सारे कवियों का भी है. आज उनकी जो छिछोरी और लगभग अस्वीकार्य छवि बन गई है, वह कदाचित उनकी विवशता की देन है. अब इस बात पर तो बहस हो सकती है कि क्या वह विवशता वाकई विवशता थी, या अधिक वैभव पूर्ण जीवन की ललक उन्हें उस तरफ़  ले गई, लेकिन उनकी समझ, उनकी संवेदनशीलता और उनकी काबिलियत असंदिग्ध है. यह बात करते हुए मुझे अनायास काफी पुराना एक प्रसंग याद आ रहा है. अपनी नौकरी के शुरुआती बरसों में, सन सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध  तक  मैं चित्तौड़ में पदस्थापित रहा. उस ज़माने में चित्तौड़-भीलवाड़ा में कवि सम्मेलन खूब ही हुआ करते थे.  बहुत बड़े-बड़े कवि सम्मेलन. दस-पन्द्रह हज़ार की उपस्थिति और सारी-सारी रात चलने वाले. नीरज, काका हाथरसी, बालकवि बैरागी,  सोम ठाकुर, संतोषानंद  आदि उन दिनों कवि सम्मेलनों के सुपर  स्टार हुआ करते थे. अगर कोई कवि लालकिले पर आयोजित होने वाले कवि सम्मेलन में काव्य पाठ कर आता था तो जैसे उसके सुर्खाब के पर लग जाया करते थे.

तो हुआ यह कि किसी कवि सम्मेलन में नीरज हमारे शहर में आए. तब तक फिल्मों में भी वे काफी कामयाब हो चुके थे और हर कवि सम्मेलन में उनसे मेरा नाम जोकर, शर्मीली, प्रेम पुजारी, छुपा रुस्तम वगैरह के उनके लिखे लोकप्रिय गीतों को सुनाने की फरमाइश की जाती थी और वे भी खुशी-खुशी उन फरमाइशों को पूरा करते थे. ज़ाहिर है कि इस तरह की रचनाओं और कुछ और लोकप्रिय गीतों जैसे कारवां गुज़र गया वगैरह में ही सारा समय बीत जाता और वे  नया कुछ तो कभी सुना ही नहीं पाते. मैं उनसे मिलने गया और बातों का सिलसिला कुछ ऐसा  चला कि मैं उनसे यह कह बैठा कि कवि सम्मेलनों में उनसे  फिल्मी गाने सुन कर मुझे बहुत निराशा होती है. और भी काफी कुछ कह दिया मैंने उनसे. उन्होंने बहुत धैर्य से मेरी बातें सुनी और फिर बड़ी शालीनता से मुझसे दो बातें कही. एक तो यह कि इन सब बातों से वे भी परिचित हैं, लेकिन यह उनकी मज़बूरी है कि जिन लोगों ने अच्छे  खासे पैसे देकर उन्हें बुलाया है, उन्हें वे खुश करें. और दूसरी यह कि उनके पास भी अच्छी और नई कविताएं हैं, लेकिन उन्हें सुनने वाले कहां हैं? इसके जवाब में मैंने उनसे कहा कि सुनने वाले तो हैं लेकिन उनके पास आपको देने के लिए  बड़ी धन राशि  नहीं है. नीरज जी ने कहा कि अगर सच्चे कविता सुनने वाले मिलें तो वे बिना पैसे लिये भी उन्हें अपनी कविताएं सुनाने को तैयार हैं. उनके इस प्रस्ताव को मैंने तुरंत लपक  लिया और उन्हें अपने कॉलेज में काव्य पाठ के लिए ले गया. विद्यार्थियों से मैंने कहा कि नीरज जी बिना एक भी पैसा लिए हमारे यहां केवल इसलिए आए हैं कि हम उनसे सिर्फ और सिर्फ कविताएं सुनना चाहते हैं,  इसलिए आप उनसे कोई फरमाइश न करें. जो वे सुनाना चाहें वह सब उन्हें सुनाने दें. और आज मैं इस बात को याद करके चमत्कृत होता हूं कि नीरज जी ने लगभग दो घण्टे अपनी बेहतरीन  कविताएं सुनाईं, और मेरे विद्यार्थियों ने पूरी तल्लीनता और मुग्ध भाव से उन्हें सुना. इसके बाद मैंने ही नीरज जी  से अनुरोध किया कि हमारे विद्यार्थियों ने इतने मन से आपको सुना है, अब अगर आप इनकी पसन्द के दो एक गीत भी सुना दें तो बहुत मेहरबानी होगी. और नीरज जी की उदारता कि उन्होंने विद्यार्थियों की फरमाइश पर अपने सारे लोकप्रिय फिल्मी गीत भी एक-एक करके सुना दिए !  लेकिन उस दिन मुझे महसूस हुआ कि ‘छुपे रुस्तम हैं हम क़यामत की नज़र रखते हैं’ और ‘ओ मेरी शर्मीली’  जैसे गाने लिखने और सुनाने वाले नीरज के भीतर एक कवि उदास और इस इंतज़ार में बैठा है कि कोई आए और उससे कुछ सुनने की इच्छा ज़ाहिर करे! शायद यही हाल आज के बहुत सारे लोकप्रिय कलाकारों का भी है. लेकिन उनकी सुनता कौन है?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, दिनांक 05 अगस्त 2014 को हर आदमी में  छिपे होते हैं दस-बीस आदमी शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 29, 2014

बड़ा बुरा समय आ गया है?

एक जाने-माने नर्तक के टॉक शो में जाने का अवसर मिला तो मेरा ध्यान इस बात पर गए बिना नहीं रह सका कि उनके बोलने के लहज़े में भी नृत्य समाहित था. बोल वे हिन्दी में रहे थे और आप-हम जैसा गद्य ही बोल रहे थे लेकिन मुझे लगा कि उस गद्य में भी लय-ताल सब मौज़ूद  है. अपने बहुत सारे अनुभवों की चर्चा करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि आज के विद्यार्थियों में कला के प्रति वैसा समर्पण भाव नहीं है  जैसा उनमें और उनकी पीढ़ी के शिष्यों में हुआ करता था. उनसे सहमत या असहमत कुछ भी न होते हुए भी मैं यह कहने की अनुमति चाहता हूं कि सारे बदलावों के बीच जो चीज़ नहीं बदली है वो यही है. यानि यह सोच कि अब ज़माना बहुत खराब आ गया है, और हमारा ज़माना बहुत अच्छा था. मैं हालांकि उनकी तरह कला का विद्यार्थी नहीं रहा लेकिन मैंने भी अपने शिक्षक मित्रों को यही कहते सुना है. शायद कई बार खुद मैंने भी ऐसा ही कहा हो.

लेकिन जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो याद आता है कि मेरे गुरुजन भी यही बात कहा करते थे. उन्हें लगता था कि जितने अच्छे विद्यार्थी वे रहे थे, उतने अच्छे हम नहीं हैं. उनसे पूछा तो नहीं -क्योंकि तब गुरुजन  और शिष्यों के बीच रिश्ते इतने अनौपचारिक नहीं हुआ करते थे-  लेकिन जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरे उन गुरुजन के गुरुजन भी यही कहते रहे होंगे. तो क्या इससे हम इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि वर्तमान हमें सदा ही अतीत की तुलना में कम अच्छा लगता है? या यह कहना हमारे स्वभाव का एक अंतर्निर्मित अंग है? स्वभाव की बात तो इस विषय के विशेषज्ञ ही बेहतर बता सकेंगे, मैं तो फिलहाल यह पड़ताल करने की कोशिश  कर सकता हूं क्या समय वाकई पहले की तुलना में खराब है.

मुझे याद आती है कोई पचास पचपन बरस पहले राष्ट्रकवि दिनकर से हुई एक छोटी-सी मुलाक़ात. तब पूरे देश में बहुत उग्र छात्र आन्दोलन चल रहे थे, और उसी सन्दर्भ में मैंने उनसे पूछ लिया था कि क्या ये छात्र अपने आन्दोलन  के ज़रिये देश को नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं? दिनकर जी का दो-टूक जवाब आज भी मुझे ज्यों का त्यों याद है. उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा था कि उनकी पीढ़ी ने देश का जितना नुकसान किया है, उसकी तुलना में तो यह कुछ भी नहीं है. दिनकर जी की इस बात से सूत्र लेते हुए अगर मैं आज के हालात पर विचार करता हूं तो  पाता हूं कि कल और आज में कोई बड़ा फर्क़  नहीं है. न तो कल बहुत अच्छा था और न आज बहुत बुरा है.

अब आप महंगाई की बात ही लीजिए. हम जिस समय में रह रहे हैं वो सूचना माध्यमों का समय भी है. इन माध्यमों पर आए दिन कभी एक पदार्थ तो कभी दूसरे पदार्थ के महंगे और पहुंच से बाहर हो जाने की ख़बरें छाई रहती हैं. और बेशक चीज़ें महंगी होती भी जा रही हैं. जितने रुपयों में कोई सब्ज़ी एक किलो मिलती थी उतने ही रुपयों में कुछ ही समय बाद वो ढाई सौ ग्राम मिलने लगती है. लेकिन क्या कीमतों का यह बढ़ना कोई नई बात है? मुझे याद है कि आज से कोई साठ पैंसठ साल पहले मेरे मां-बाप भी यही कहते थे कि महंगाई  बहुत बढ़ गई है,  घर का खर्च चलाना मुश्क़िल होता जा रहा है. चार आने की एक सेर (तब किलो नहीं होता था) शक्कर उन्हें बहुत महंगी लगती थी.

बात चाहे महंगाई की हो, अनुशासन की हो, समर्पण की हो, अवसरों की सुलभता की हो, जीवन संघर्षों की हो, अपराधों की हो – मुझे लगता है कि बुरे वक़्त की बात करना हमारी आदत का एक हिस्सा बन चुका है, अन्यथा वक़्त इतना भी बुरा नहीं है. हम चीज़ों के बढ़े हुए दामों को देखते हैं लेकिन अपनी बढ़ी हुई आमदनी को अनदेखा कर देना चाहते हैं. हम नई पीढ़ी में समर्पण की कमी का रोना रोते हैं लेकिन उन लोगों  के सामने आने  वाली नित नई चुनौतियों और उनसे जूझने में उनके जज़्बे को अनदेखा कर जाते हैं. हम जीवन के बढ़ते संघर्षों की बात करते हैं लेकिन बहुत सारी वजहों से जीवन के सुगम हो जाने की बात को अनदेखा कर जाते हैं. हम नित नई बीमारियों की बात करते हैं लेकिन इस बात को नहीं देखना चाहते कि औसत उम्र काफी बढ़ी है और सेहत के हालात भी बेहतर हुए हैं. 

मैं यह नहीं कह रहा कि समय बदला नहीं है. शायद कुछ चीज़ें बदतर भी हुई हैं. लेकिन उनकी चर्चा और शिकायत करते हुए जो बेहतर हुई हैं उनकी अनदेखी करना अपने ही प्रति अन्याय है – इसे भी समझना होगा.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 29 जुलाई 2014 को न कल समय अच्छा था, न आज बहुत बुरा  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.           

Tuesday, July 22, 2014

जहां जाइयेगा, हमें पाइयेगा!

नाटककार कथाकार मोहन राकेश का एक मज़ेदार लेख कभी पढ़ा और पढ़ाया था – ‘विज्ञापन युग’. लेखक ने बहुत मज़े लेकर और तत्कालीन विज्ञापनों के अनेक उदाहरण देकर हमारे जीवन में अनचाहे घुस आए विज्ञापनों की रोचक चर्चा की थी. जाने क्यों आज वो लेख बहुत याद आ रहा है. सोचता हूं अगर आज कोई उसी तरह का लेख लिखना चाहे तो वो क्या-क्या लिखेगा? तब से अब तक गंगा में बहुत सारा पानी बह चुका है.  एक कला, एक व्यवसाय और एक विज्ञान के रूप में विज्ञापन में आमूल-चूल बदलाव आ चुके हैं. पहले विज्ञापन का प्रयोग वस्तुओं को बेचने के लिए किया जाता था, आज उसका क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि सेवा, विचार, छवि  और यहां तक कि सरकारों को बेचने के लिए भी उसका इस्तेमाल होने लग गया है.

विज्ञापनों की माया अपरम्पार है. यह विज्ञापनों की ही कृपा है कि बहुत सारे उत्पाद, जैसे समाचार पत्र,  अपनी लागत से भी कम कीमत पर हमें  मिल जाते हैं. लेकिन इसी बात का दूसरा पहलू यह भी है और यह कम दिलचस्प भी नहीं है कि जिन विज्ञापनों से हम  आम तौर पर चिढ़ते हैं उन्हीं को देखने-पढ़ने के लिए हमें  पैसा, चाहे वो कितना भी कम क्यों ना हो, खर्च करना पड़ता है. और इससे भी अधिक रोचक बात तो यह है कि तमाम  निर्माता या विक्रेता हमारी  जेब से पैसे निकलवा  कर  हमें   ही  अपनी वस्तु या सेवा के गुणों से परिचित करवाते हैं. हम सब जानते हैं कि विज्ञापनों पर होने वाला सारा खर्चा उत्पाद या सेवा की लागत में जोड़ा जाकर उपभोक्ता से ही वसूला जाता है.  सईद राही की ग़ज़ल का मिसरा याद आता है- उस शोख ने मुझी को सुनाई मेरी ग़ज़ल. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि अगर चीज़ों का विज्ञापन न किया जाए तो वे कितने सस्ते  में हमें मिलने लगें! या उलट  कर इस बात को सोचें कि अगर हरी मिर्च, धनिया, प्याज और टमाटर  के भी विज्ञापन होने लग जाएं तो इनके भाव कहां तक जा पहुंचेंगे!

अगर आप यह सोच रहे हैं कि अमुक अगरबत्त्ती सबसे अच्छी है या कुछ दिन तो गुज़ारो हमारे राज्य में जैसी बातें ही विज्ञापन की श्रेणी में आती हैं तो आप इसके फैलाव को बहुत कम देख पा रहे हैं. असल में समय, स्थितियों और समझ के बदलाव के साथ विज्ञापन के रूपों और तौर-तरीकों में इतना ज़्यादा बदलाव आ गया है कि कई बार तो अपको पता ही नहीं चलता है और विज्ञापन आप पर अपना असर  डाल चुका होता है. यह बात तो पुरानी हो गई है कि आप जिसे ख़बर समझ कर पढ़ते हैं असल में वो विज्ञापन होती है. और यह बात भी पुरानी है कि कोई धर्मात्मा अस्पताल या धर्मशाला या मन्दिर बनवाकर अपनी दानशीलता का विज्ञापन ही करता है. मुझे यह बात बहुत रोचक लगती है कि हमारे देश में बहुत सारे मन्दिर एक बड़े उद्योगपति के नाम से जाने जाते हैं. खुद दानदाता का भगवान हो जाना तो विज्ञापन की कामयाबी का बेहतरीन उदाहरण है.  

इधर मैं यह बात देख रहा हूं कि बहुत निजी माने जाने वाले पारिवारिक आयोजन भी विज्ञापन का माध्यम बनते जा रहे हैं. और ऐसा अनायास नहीं सायास हो रहा है. किसी धनपति के घर-परिवार के किसी मांगलिक समारोह का भव्य आयोजन उसकी सामर्थ्यानुसार उसके आनंद की अभिव्यक्ति हो सकता है लेकिन उस आयोजन का बाकायदा प्रचार छवि निर्माण का प्रयास ही कहा जाएगा. और ऐसा भव्यता में ही नहीं होता है, सादगी में भी होता है. देश के एक नामी चित्रकार का जूते न पहनने का बहु प्रचारित निर्णय अंतत: उनकी विशिष्ठ छवि बनाकर उन्हें लाभान्वित करता था. बिना दहेज शादी की बहुत सारी ख़बरें इसी बात को ध्यान में रखकर प्रसारित करवाई जाती हैं कि इससे उन लोगों की एक बेहतर छवि आपकी स्मृति में स्थापित हो सके.

लेकिन जैसा मैंने कहा, समय के साथ विज्ञापन अप्रत्यक्ष और घुमावदार होते जा रहे हैं. कभी एक टीवी के विज्ञापन में दैत्य की छवि को अजूबा माना गया था और नकारात्मक विज्ञापन को एक बड़ी परिघटना के रूप में जाना गया था लेकिन आज तो विज्ञापन की दुनिया में इतना कुछ नया घटित हो रहा है कि अब उस तरफ हमारा ध्यान भी नहीं  जाता है. फिर भी, तमाम बदलावों के बावज़ूद विज्ञापनों की यह खासियत अभी भी बरक़रार है कि अपनी तमाम अनिच्छाओं  के बावज़ूद आप न सिर्फ इन्हें झेलने के लिए अभिशप्त हैं, आपको  आम तौर पर इनके लिए अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ती है. क्या पता कि वो गाना विज्ञापनों को ध्यान में रखकर ही लिखा गया हो – अजी रूठ कर कहां जाइयेगा, जहां जाइयेगा, हमें पाइयेगा!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में दिनांक 22 जुलाई, 2014 को ज़रा सोचिए, विज्ञापन न होते तो क्या होता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 15, 2014

इट्स ऑल पार्ट ऑफ द गेम

साहित्य की दुनिया की अपनी विलक्षणताएं हैं. जो लोग इस दुनिया के तौर-तरीकों से वाक़िफ नहीं हैं उन्हें इस बात से बड़ी उलझन होती है कि कैसे दो विद्वान एक ही कृति के बारे में परस्पर विपरीत राय व्यक्त कर देते हैं! उन्हें यह समझाने में बहुत ज़ोर पड़ता है कि साहित्य में दो और दो का जोड़ सदा चार ही नहीं होता है. एक ही कृति किसी को बहुत अच्छी लग सकती है और किसी दूसरे को बहुत सामान्य! कई बार मानदण्ड भिन्न होते  हैं और कई बार देखने का कोण अलग होता है. और अगर आप भी उस रचना को पढ़ चुके हैं तो एक पाठक  के रूप में आपके पास भी अपना किया हुआ एक मूल्यांकन हो सकता है. स्वाभाविक है कि आप अपने किए मूल्यांकन से दूसरे के मूल्यांकन की तुलना करेंगे और अगर दोनों में बहुत बड़ा फर्क़ पाएंगे तो हो सकता है कि आप दूसरे मूल्यांकन कर्ता, जिसे आलोचक या समीक्षक के नाम से भी जाना जाता है, की नीयत पर शक कर लें.

नीयत वाली यह  बात एक दूसरे स्तर पर भी उभर कर सामने आती है. जब कोई समीक्षक किसी रचना या कृति पर अपनी टिप्पणी करता है और अगर वह टिप्पणी प्रशंसात्मक  होती है तो लेखक कहता है कि यह समीक्षक बहुत  समझदार और ईमानदार है. लेकिन अगर कोई समीक्षा रचनाकार के अनुकूल नहीं होती है तो अक्सर यह होता है कि या तो रचनाकार यह कहता है कि समीक्षक उसकी रचना को समझ नहीं पाया है और या फिर वो उसकी नीयत पर सन्देह करता है. तब गुटबाजी, पक्षपात, बेईमानी, वैचारिक कट्टरता आदि जैसे विशेषण भी बाहर निकल आते हैं. 

मेरा क्षेत्र क्योंकि आलोचना रहा है मुझे इस तरह के अनेक अनुभव हुए हैं और अब तो निस्संकोच यह बात कह सकता हूं कि अपनी आलोचना के लिहाज़ से हिन्दी के अधिकांश रचनाकारों की पाचन शक्ति बहुत कमज़ोर है. यह लिखते हुए मुझे बरसों पहले का एक प्रसंग याद आ रहा है. हुआ यह कि जोधपुर के हमारे एक कथाकार मित्र ने अपनी कथा कृतियों पर एक गोष्ठी का आयोजन किया और उन्होंने मुझसे भी अनुरोध किया कि मैं उस गोष्ठी में पहुंचकर उनके रचनाकर्म पर कुछ कहूं. मैं तब जोधपुर से 200 किलोमीटर दूर सिरोही में कार्यरत था. कुछ युवकोचित उत्साह और कुछ उन रचनाकार मित्र के प्रति आत्मीयता – मैं जोधपुर चला गया. शाम को गोष्ठी थी. उस गोष्ठी में उनके दो और मित्र, नामी रचनाकार – एक दिल्ली से और एक मुम्बई से भी बुलाए गए थे. वैसे तो हम तीनों परस्पर परिचित थे, लेकिन गोष्ठी से पहले न तो हमारी कोई बातचीत हुई और न पत्र व्यवहार. फिर भी संयोग यह रहा कि हम तीनों ने उन रचनाकार मित्र के कृतित्व की विशेषताओं के साथ-साथ कमियों की भी करीब-करीब एक जैसी चर्चा की. वैसे भी वो चर्चा गोष्ठी थी, अत: यह बात अनुचित नहीं थी. गोष्ठी ख़त्म होते-होते मुझे लग गया कि वे रचनाकार मित्र बहुत क्षुब्ध हैं. शायद इसी क्षोभ की वजह से उन्होंने सिरोही से जोधपुर आने के लिए मेरे प्रति आभार व्यक्त करने का सामान्य सौजन्य भी नहीं बरता. आवास की मेरी अपनी परिवारिक व्यवस्था थी. मैं वहां चला आया और अगली सुबह सिरोही लौट आया. बाद में टुकड़ों-टुकड़ों में वहां के अन्य साहित्यकार मित्रों से जो बातें पता चली उन्हें जोड़ने पर तस्वीर यह बनी कि उन दोनों मित्रों को एक होटल में ठहराया गया  था और गोष्ठी के बाद उनके आतिथ्य सत्कार का ‘समुचित’ प्रबन्ध भी था. समुचित का अभिप्राय आप अपने आप समझ लें. उस सत्कार-समागम के दौरान हमारे उन रचनाकार  मित्र ने उन अतिथियों की जमकर ख़बर ली और इस बात पर न केवल शाब्दिक बल्कि शारीरिक नाराज़गी भी व्यक्त की कि इतना पैसा खर्च करके तुम्हें इसलिए थोड़े ही बुलाया था कि तुम यह सब कहो! मेरा तो यह सौभाग्य रहा कि मैंने अपने पर उनका एक पैसा भी खर्चा नहीं कराया और न उनका आतिथ्य ग्रहण किया, उलटे यात्रा व्यय भी अपना ही किया.  लेकिन इसके बावज़ूद उनकी नाराज़गी इस रूप में ज़रूर प्रकट हुई कि उस गोष्ठी से पहले हमारे बीच जो आत्मीयता का सूत्र था, वह टूट गया और ऐसा टूटा कि फिर जुड़ ही नहीं सका. और ऐसा  तो मेरे साथ बहुत बार हुआ है कि किसी रचनाकार की किसी रचना की प्रशंसा की तब उन्होंने कहा कि मुझ जैसा आलोचक कोई और है ही नहीं, लेकिन जब उनकी किसी रचना की किसी कमी पर उंगली  रखी तो पता चला कि उन्हें मेरी साहित्यिक समझ पर गहरा संशय है.

लेकिन वो अंग्रेज़ी  में कहते हैं ना कि इट्स ऑल पार्ट ऑफ द गेम!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार दिनांक 15 जुलाई, 2014 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, July 8, 2014

काश! उसने मुझे न पहचाना होता

बेचारी मारिया शारापोवा! क्या हुआ जो वे टेनिस स्टार हैं और रूसी हैं! वे भगवान को चाहे जानें या न जानें,  लेकिन इस बात को कि वे क्रिकेट के भगवान को नहीं जानती हैं,  हम भारतीय क्रिकेट प्रेमी भला कैसे माफ़ कर सकते हैं? एक से एक विकट और अप्रिय टिप्पणियों के पत्थर उनकी तरफ फेंके जा रहे हैं! हमारी भक्ति एक तरफ़, उनका अज्ञान दूसरी तरफ़ और बीच में दौड़ रहा है मेरा दिमाग़. जगजीत की गाई गुलज़ार साहब की एक ग़ज़ल का शे’र याद आ रहा है: “आईना देखकर तसल्ली हुई/ हमको इस घर में जानता है कोई!” और मन कर रहा है कि क्रिकेट के भगवान के इन भक्तों से कहूं कि यारों अजनबीपन और बेगानेपन के इस विकट समय में बेचारी शारापोवा पर इतना गुस्सा मत करो. और यह अजनबीपन कौन  आज की बात  है?  सन साठ के दशक में हिन्दी में नई कहानी आन्दोलन के तीन तिलंगे और उनके बहुत सारे अनुयायी इसी अजनबीपन को अपनी बहुत सारी कहानियों का विषय बनाकर तारीफ़ पा चुके हैं.  लेकिन यह अजनबीपन और न पहचानने की पीड़ा एक तरफ, कई बार इसका उलट भी तो होता है. किसी का आपको पहचान लेना आपको असहज कर जाता है. मेरे साथ एक बार ऐसा ही हो चुका है.    

अब तक तो मेरे पाठक जान ही चुके हैं कि मेरी ज़िन्दगी का बड़ा हिस्सा छोटी जगहों पर गुज़रा है. राजस्थान के एक अपेक्षाकृत छोटे ज़िले के मुख्यालय पर लगभग पच्चीस साल नौकरी की. ऐसे छोटे कस्बों की ज़िन्दगी कैसी होती है, इसे आप वहां रहे बग़ैर नहीं जान सकते. वैसे, खट्टे और मीठे दोनों तरह के ज़ायके मिलते हैं वहां. सभी सबको जानते हैं, यानि हर व्यक्ति एक सेलेब्रिटी होता है. किसी का कोई काम रुकता नहीं. सब कुछ बहुत आसानी से हो जाता है. जीवन संघर्ष अपेक्षाकृत कम होते हैं. मसलन अपने काम के लिए या सामाजिक सम्बन्धों के निर्वाह के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़ता. बहुत सारी चीज़ें जिन्हें हम ज़रूरी मानते हैं, वे सुलभ नहीं होती हैं. मेरे उस कस्बे में बहुत लम्बे समय तक ब्रेड नहीं मिलती थी, कोई ठीक-ठाक सा रेस्टोरेण्ट नहीं था, और आज भी वहां एक भी सिनेमाघर नहीं है. ज़ाहिर है कि इन वजहों से खर्चे कम होते हैं. बहरहाल. बात जब मैंने रेस्टोरेण्ट न होने की की तो बता दूं कि रेस्टोरेण्ट न सही, सड़क छाप ढाबे दो-तीन हुआ करते थे, और कुछ भोजनालय भी थे. हम लोग उन्हीं ढाबों को रेस्टोरेण्ट का मान देते हुए यदा-कदा अपने नीरस जीवन को सरस कर लिया करते थे. फिर धीरे-धीरे उन ढाबों में से कुछ ने अपना स्तर सुधार लिया और उनकी कीर्ति गाथा दूर-दूर तक फैल गई. 
  
उस कस्बे से निकल कर प्रांत की  राजधानी में आ जाने और अपने विभाग में एक उच्च प्रशासनिक पद पर आसीन हो जाने के बाद एक बार सरकारी दौरे पर उसी कस्बे में जाने का मौका मिला. कस्बे के अधिकारी महोदय ने आग्रह किया कि दोपहर का भोजन मैं उनके साथ करूं, जिसे मैंने सहजता से स्वीकार कर लिया. उन्होंने संकोच के साथ कहा कि चूंकि कस्बे में कोई ठीक-ठाक रेस्टोरेण्ट नहीं है, इसलिए जहां वे मुझे ले जा रहे हैं वहां ले जाना उनकी मज़बूरी है और मैं इसका बुरा न मानूं. वे उस पद पर नए नए आए थे और शायद इस बात से अपरिचित थे कि उस कस्बे को मैं और मुझे वो कस्बा कुछ ज़्यादा ही अच्छी तरह जानता है. हम पांच छह लोग वहां पहुंचे. जगह मेरी तो जानी पहचानी  थी लेकिन  वे अधिकारी महोदय ज़रूर संकोच अनुभव कर रहे थे. थोड़ी देर में उस ढाबे का एक पुराना कर्मचारी आया, उसने शायद मुझे तो देखा नहीं और सीधे उन अधिकारी महोदय से मुखातिब हो बोला, “आपने तो कहा था कि आपके बहुत बड़े साहब आएंगे. क्या वे आये नहीं?”  अधिकारी जी ने मेरी  तरफ इंगित करते हुए कहा – “ये रहे हमारे बड़े साहब! खयाल रखना कि ये यहां से खुश होकर जाएं!”   ढाबे का वो कर्मचारी मुड़ा, उसने एक नज़र मुझे देखा, और बेसाख़्ता बोला  “ये? ये  काहे के बड़े साहब! ये तो अपने अग्रवाल साहब हैं! इनकी पसन्द नापसन्द सब मुझे मालूम है!”  अब आप कल्पना कर सकते हैं कि मेरी क्या हालत हुई होगी! उन अफसर महोदय ने हवा भर-भरकर मेरे अहं के जिस गुब्बारे को खूब फुला दिया था, उसमें इस पुराने कर्मचारी ने अपनी आत्मीयता के कथन की एक महीन सुई चुभा कर सब मटियामेट कर डाला.  अजीब हालत थी मेरी.  मैं सोच रहा था, काश! इसने मुझे न पहचाना होता!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 08 जुलाई 2014 को काश! ढाबे वाले ने मुझे उस दिन न पहचाना होता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.              

Tuesday, July 1, 2014

सरकार तो सर्व शक्तिमान होती है!

आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय के संकट का पटाक्षेप हो गया. चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम जिसे पिछले बरस यू जी सी का अनुमोदन मिला था, इस साल उसी यू जी सी के दबाव से फिर से तीन साल का कर दिया गया.  शिक्षा की दुनिया में, और विशेष रूप से उच्च शिक्षा की दुनिया में ऐसे संकट आते और जाते रहते हैं. कहना अनावश्यक है कि इनके मूल में जो वजहें होती हैं वे सिर्फ अकादमिक ही नहीं होती हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के इस संकट की ख़बरें पढ़ते हुए मुझे उस संकट की बार-बार याद आती रही जिसका एक छोटा-सा किरदार बनने का मौका मेरी ज़िन्दगी में भी आया था. हमारे पाठक जानते हैं कि माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार विद्यार्थियों के लिए कक्षाओं में पिचहत्तर प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है. प्रावधान यह है कि अगर कोई विद्यार्थी न्यूनतम उपस्थिति की यह शर्त पूरी नहीं कर पाता है तो उसे नियमित की बजाय बतौर नॉन कॉलेजिएट छात्र परीक्षा देनी होती है. यहीं यह भी बताता चलूं कि नॉन कॉलेजिएट की मार्केट वैल्यू थोड़ी कम होती है. अब एक बात कान में कह दूं? बावज़ूद इस प्रावधान के, साल के अंत में कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़्यादातर शिक्षण संस्थाओं में ज़्यादातर विद्यार्थियों की हाज़िरी पूरी बताकर रस्म अदाई कर ली जाती है. अगर मेरी बात पर विश्वास न हो यह पड़ताल कर लें कि पिछले बरसों में कितने  विद्यार्थियों को कॉलेजिएट से नॉन कॉलेजिएट किया गया है. और फिर एक नज़र किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज  की कुछ कक्षाओं पर भी डाल लें. आप खुद जान लेंगे. कहने का आशय यह कि लीपापोती का खुला खेल फर्रुखाबादी चलता रहता है. लेकिन कभी-कभी कोई बन्दा जब इस ठहरे पानी में कंकड़ फेंक देता है तो हंगामा बरपा हो जाता है.

ऐसा ही उस बरस हुआ था. प्रांत के एक अग्रणी कॉलेज के प्राचार्य ने उपस्थिति के इस प्रावधान को ईमानदारी से लागू कर दिया. उनके कॉलेज के एल-एल. बी. के बहुत सारे विद्यार्थी नॉन कॉलेजिएट घोषित कर दिए गए. और फिर तो जो होना था वही हुआ. न सिर्फ कॉलेज में, शहर में भी हंगामा हो गया. कॉलेज बन्द, शहर बंद. हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है! बात शहर से निकल कर राजधानी तक पहुंचनी ही थी. मैं उन दिनों प्रांत के उच्च शिक्षा विभाग में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर था, इसलिए इस सारे प्रकरण से भली-भांति परिचित था. एक दिन मुझसे काफी बड़े एक अधिकारी जी ने मुझे सचिवालय में तलब किया और लगभग आदेश दिया कि मैं उन प्राचार्य महोदय से फोन करके कहूं कि वे अपना आदेश वापस ले लें. मैंने अपने उन उच्चाधिकारी जी से निवेदन किया कि वे प्राचार्य तो माननीय उच्च न्यायालय के, राज्य सरकार के और विभाग के आदेश की अनुपालना ही कर रहे हैं, अत: हम  उनसे इस तरह का कोई अनुरोध कैसे कर सकते हैं, लेकिन अफसर तो अफसर होता है. कह दिया सो कह दिया. उन्होंने फिर से अपना आदेश दुहराया. तब मैंने उनसे विनम्र दृढ़ता से कहा कि मैं उन प्राचार्य जी को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं और उनके स्वभाव से वाक़िफ होने के नाते कम से कम मैं तो उनसे ऐसा कोई अनुरोध नहीं कर सकता. स्वभावत: मेरे उन उच्च अधिकारी जी को मेरा यह जवाब रुचा नहीं, लेकिन मज़बूरी उन की ही थी. वे मुझसे जो चाह रहे थे, उसकी असंगतता भी उन्हें मालूम थी. मैं उनके पास से अपने दफ़्तर  चला आया. लेकिन जो कुछ घटित हो रहा था, अपने पद की वजह से उससे अपरिचित तो मैं नहीं था.

कैसी अजीब स्थिति थी!  माननीय उच्च न्यायालय का आदेश, और उसी की अनुपालना में राज्य सरकार का आदेश!  ज़्यादातर लोग उस आदेश की शालीन अनदेखी कर काम चला लें, और सब ज़िन्दा मक्खी निगलते रहें. सब तरफ़ अमन-चैन बना रहे. लेकिन कोई एक बन्दा, वो उस आदेश का बाकायदा पालन कर ले तो सरकार और विभाग ही उस पर यह दबाव बनाने लगे कि वो उस आदेश को वापस ले ले! उसकी मानसिक व्यथा की कल्पना करें कि अपना काम ईमानदारी से करने का पुरस्कार उसे यह दिया जाए कि उसे अपना वाज़िब आदेश वापस लेने की अपमानजनक स्थिति में डाल दिया जाए!  लेकिन होता यही है. दिल्ली का प्रकरण तो चर्चा में आ गया, बाकी सब चुपचाप हो जाता है! यहां इस विस्तार में जाने का कोई अर्थ नहीं होगा कि हमारे प्रांत के उस प्रकरण का निस्तारण कैसे हुआ! इतना बता देना काफी होगा कि जिन विद्यार्थियों को नॉन कॉलेजिएट किया गया था, उन सबने नियमित परीक्षार्थी के रूप में ही परीक्षा दी. सरकार तो सर्व शक्तिमान होती है ना!


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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार, 01 जुलाई, 2014 को नॉन कॉलेजिएट ने दी नियमित छात्रों  के रूप में परीक्षा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Sunday, June 29, 2014

अपना शहर, अपना घर और अपना स्कूल

पिछले डेढ़ दो सालों से मुझे अपना शहर, अपना घर और अपना  स्कूल बहुत याद आ रहे थे.

वैसे, ये तीनों अब अपने नहीं हैं, लेकिन फिर भी मुंह से अपना ही  निकलता है. उदयपुर में जन्म हुआ, बड़ा हुआ, पढ़ा लिखा और 1967 में नौकरी करने उदयपुर से बाहर निकला तो फिर वापस उदयपुर लौट ही नहीं सका. न कभी वहां तबादला हुआ, और सच कहूं तो इसके लिए प्रयत्न भी नहीं किया, और न रिटायर होने के बाद वहां बसने की सोची. इसके लिए मेरे परम मित्र सदाशिव श्रोत्रिय अब भी गाहे-बगाहे मुझसे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते रहते हैं. उदयपुर में अपना घर था. वो घर जहां मेरा जन्म हुआ, जहां रहकर पढ़ाई वगैरह की. जहां मेरे मां-बाप रहे. जिस घर में मेरे गर्दिश के दिन बीते. वो घर भी आहिस्ता-आहिस्ता बेगाना होता गया, और अंतत: इस शताब्दी के शुरुआती बरसों में उसे बेच कर उससे जैसे आखिरी नाता भी तोड़ लिया, या तोड़ना पड़ा. और स्कूल? 1955 में जगदीश रोड़ पर अपने घर के सामने वाली नानी गली में स्थित जिस कंवरपदा स्कूल में दाखिला लिया था, और जहां से 1961 में हायर सैकण्ड्र्री परीक्षा उत्तीर्ण कर निकला, उस स्कूल में फिर कभी जाना हुआ ही नहीं. बावज़ूद इस बात के 1940 के बाद भी चालीस बरस मेरा घर वही रहा और वहां जाना भी होता रहा, लेकिन उस स्कूल में फिर कभी जाना नहीं हुआ. लेकिन इधर डेढ़ दो बरसों से मुझे अपना घर, अपना स्कूल और अपना शहर बहुत याद आ रहे थे. शायद
उम्र का असर हो!

तो मार्च 2014 में उदयपुर जाने का प्रोग्राम बना, और वहां रहते हुए एक सुबह निकल पड़ा मैं अपना घर और अपन स्कूल देखने.

तो ये है जगदीश रोड़, और आई सी आई सी आई बैंक का जो लाल बोर्ड नज़र आ रहा है, उसके ऊपर वाला घर था जिसमें मेरी 1945 से 1967 तक की ज़िन्दगी बीती और जहां से मेरे जीवन ने एक दिशा प्राप्त की. नीचे हमारी दुकान हुआ करती थी, जो 1959 में पिता के निधन के बाद  कुछ बरस घिसटती हुई चली (और जिसने मेरी पढ़ाई के लिए आर्थिक साधन भी दिए) लेकिन फिर मेरे नौकरी कर लेने के कारण बन्द हो गई. मेरी मां को सदा यह मलाल रहा कि मैंने उनके पति का नाम (जो उस दुकान का भी नाम था) मिटा दिया. हां, तब यहां ये घर इतनी ज़्यादा ऊंचाइयों वले नहीं थे और बहुत लम्बे समय तक मेरा यह घर सबसे ज़्यादा ऊंचे घरों में से एक था. धीरे-धीरे और घर ऊंचे उठते गए और हम जहां के तहां रह गए. 

इसी घर के करीब-करीब सामने, जहां गाय खड़ी है उसी के  थोड़ा-सा आगे,  एक गली है जिसका नाम नानी गली है. ये नीचे वाली तीन तस्वीरें उसी गली की है. मेवाड़ी में नानी का अर्थ होता है  छोटी. यानि छोटी गली. और प्रसंगवश बता दूं कि इसी नानी गली के सामने एक गली थी और है जिसका नाम था मूत गली, क्योंकि उसमें एक सार्वजनिक मूत्रालय था. पता नहीं अब है या नहीं! ये तीन छवियां उसी नानी गली की हैं:





इस ठीक ऊपर वाली तस्वीर में जो भारतीय पुस्तक भण्डार दीख रहा है वह उस ज़माने में और बहुत बाद तक पूरे उदयपुर शहर में संस्कृत और प्राच्य विद्या विषयक  पुस्तकें मिलने का एकमात्र ठिकाना था. 

इसी गली में थोड़ा-सा आगे  चलकर  बांये हाथ पर है वो स्कूल जिसमें मैंने कक्षा छह से ग्यारह तक पढ़ाई की. ये रही उस स्कूल के प्रवेश द्वार की छवियां.




                   


हां, जब मैं यहां पढ़ता था तब दरवाज़े पर इतना ताम झाम नहीं था. खुला-खुला-सा हुआ करता था. आज जहां यह आंखों को चुभने वाला  लाल दरवाज़ा है, इसमें से अन्दर जाने पर एक लम्बा-सा खुर्रा हुआ करता था, जिसके बांयी तरफ हमारी क्राफ्ट की कक्षा होती थी (मेरा वैकल्पिक क्राफ्ट विषय पहले सुथारी था और बाद में टेलरिंग हुआ). जैसे ही खुर्रा चढ़ते हैं, आपके सामने होती है स्कूल की भव्य इमारत. अभी वहां कुछ काम चल रहा था, इसलिए वह भव्य इमारत उतनी भव्य नहीं लगी, जितनी वह वास्तव में है, और मेरी स्मृतियों में थी. फिर भी यह देखिए:





असल में यह कंवर (राजकुमार) लोगों के लिए निर्मित भवन था, इसलिए नाम पड़ा कंवरपदा. अब कंवर लोगों के लिए था तो भव्य  तो होगा ही. भवन के सामने जो मैदान-सा नज़र आ रहा है वही हमारे ज़माने में प्ले ग्राउण्ड हुआ करता था. लेकिन अब इसी के पास खेलने के लिए  एक और जगह बना दी गई है:

जैसे ही भवन के अन्दर जाते हैं एक छोटा-सा बरामदा मिलता है यहां सूचनाएं लगाई जाती थीं. शायद अब भी ऐसा ही होता है: 



इससे आगे बढ़ने पर एक काफी बड़ा चौक है, जिसमें बांयी तरफ उस ज़माने में हेड मास्टर का कमरा और स्कूल का ऑफिस हुआ करते थे. ऊपर सगसजी बावज़ी का एक मन्दिर भी है, जिसके पुजारी जी मुझे उस दिन मिल गए और बड़ी आत्मीयता से मुझे ऊपर ले जाकर दर्शन करवाए. एक तस्वीर (पहली तस्वीर में - सीढियां चढ़ते हुए) में वे पुजारी जी भी हैं. यह बात  बहुत आश्चर्य की लगती है कि कैसे हमारे धर्म निरपेक्ष कहे जाने वाले देश के सरकारी स्कूलों में भी बाकायदा पूजा पाठ चलता है. जो लोग इसाई मिशनरी स्कूलों और मदरसों में चलने वाली धार्मिक शिक्षा पर दुखी होते हैं वे इस तरफ से आंखें मूंदे रहते हैं. बहरहाल, देखिये ये तस्वीरें:





इस तत्कालीन हेडमास्टर कक्ष के सामने यानि इस चौक के दांयी तरफ एक छोटा-सा दरवाज़ा है जिसमें से होकर और नीचे उतरकर हम  एक और चौक में पहुंचते हैं. यह है वह छोटा दरवाज़ा(दांयी तरफ, गोलाई लिए हुए): 



और जब इस दरवाज़े को पार कर आप नीचे उतरते हैं तो बांयी तरफ वे कमरे नज़र आते हैं जिनमें बैठकर और गुरुजन से ज्ञान  प्राप्त कर 1961 में मैंने हायर सैकड्री उत्तीर्ण कर इस स्कूल से विदा ली. यहां यह भी  याद  करता चलूं कि 1961 में इस स्कूल से हायर सैकण्ड्री का पहला बैच निकला था और उस बैच में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण  होने वाले तीन विद्यार्थियों में से एक मैं था. कहना अनावश्यक है कि प्रथम श्रेणी किसी को नहीं मिली थी.



जिस दिन मैं अपना स्कूल देखने गया, उस दिन परीक्षा तैयारी के कारण वहां छुट्टी का-सा माहौल था. एक युवा चपरासी वहां मुझे मिला, जिसने  मेरे अनुरोध  पर  इस कमरे के भीतर मेरी एक फोटो ली, लेकिन यह मेरा दुर्भाग्य कि बस वही फोटो बिगड़ी. तस्वीर खिंचवाने के लिए  मैं  उस कमरे में एक कुर्सी पर उसी तरह बैठा था जैसे 1960-61 में बैठता रहा होऊंगा, और जैसे ही मैं बैठा,  मेरी बहुत तेज़ रुलाई फूट पड़ी. जाने क्यों?

और यह तस्वीर  है मेरी कक्षाओं के कमरों के सामने के कमरों की:




क्या पता इस जनम में फिर कभी  उस स्कूल भवन में जाना होगा या नहीं?  

Tuesday, June 24, 2014

अच्छी भी है हमारी दुनिया!

हिंदी के अमर कथाकार प्रेमचंद के सुपुत्र और खुद एक बड़े रचनाकार स्वर्गीय अमृत राय अखबारों को द मॉर्निंग डिप्रेसर कहा करते थे. मुझे नहीं पता कि अगर अमृत राय आज जीवित होते तो आज के अखबारों को वे क्या नाम देना पसंद करतेक्योंकि उनके समय से आज तक आते-आते हालात बदतर हुए हैं. लेकिन कभी-कभी इस बुरे समय में ये अखबार ऐसी कोई ख़बर भी दे देते हैं कि मन एकदम उल्लसित हो उठता है. अभी उस दिन जब चेन्नई की यह ख़बर पढ़ी तो मुझे लगा कि दुनिया उतनी भी ख़राब नहीं है जितनी हम मान लेते हैं. हो सकता है यह ख़बर आपकी निगाहों से न गुज़री हो. मैं बता दूं? चेन्नई के फोर्टिस मलार हॉस्पिटल में मुम्बई की एक 21 वर्षीया कॉलेज छात्रा ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थी. हृदय का प्रत्यारोपण होना था, और डोनर का यह हृदय चेन्नई सेण्ट्रल के नज़दीक के जनरल हॉस्पिटल से उस अस्पताल में पहुंचाने का ज़िम्मा था एक एम्बुलेंस ड्राइवर सी. काथिर का. एक-एक पल कीमती था. एक पल का विलम्ब, और सब बेकार.

और सलाम उस ड्राइवर काथिर को जिसने चेन्नई के भारी ट्रैफिक के बीच महज़ 13 मिनिट में 12 किलोमीटर का यह फासला तै करके उस लड़की की जान बचाने का असम्भव लगने वाला चमत्कार कर दिखाया.  काथिर का मानना है कि किसी की ज़िंदगी बचाने का यह अवसर उसे भगवान की देन है. काथिर पहले भी चार बार ऐसा कर चुके हैं. लेकिन इस बार उन्होंने जो अजूबा कर दिखाया उसमें चेन्नई के प्रशासन का भी बहुत बड़ा योगदान रहा. चेन्नई प्रशासन ने उस मार्ग की सारी लाल बत्तियों को बंद कर एक ग्रीन कॉरिडोर रचा ताकि दान में मिला हृदय निर्बाध और अविलम्ब पहुंचाया जा सके. भारत में ग्रीन कॉरिडोर की अवधारणा भले ही नई लगे, पश्चिमी देशों में एम्बुलेंस को ग्रीन कॉरिडोर ही मिलते हैं. मैंने अमरीका में देखा-जाना था कि एम्बुलेंस में ही इस तरह की तकनीकी व्यवस्था होती है कि उसके आते ही हर लाल  लाइट हरी होती चलती है और एम्बुलेंस को कहीं भी रुकना नहीं पड़ता है. लेकिन बात केवल तकनीकी व्यवस्था की नहीं है. लोग भी एम्बुलेंस को रास्ता देते हैं. हमारे यहां तो यही ड्राइवर काथिर बता रहे थे कि बहुत दफा उन्हें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो एम्बुलेंस को मिले रास्ते का लाभ उठा अपने वाहन को भी निकाल ले जाने की फिराक़ में रहते हैं और इस तरह एम्बुलेंस के लिए मुसीबत पैदा करते हैं. हम रोज़ ही लोगों को एम्बुलेंस की प्राथमिकता की अनदेखी करते देखते हैं. लेकिन मुझे लगता है कि अगर प्रशासन भी एम्बुलेंस के महत्व को समझ उसे प्राथमिकता देने लगे तो लोगों के बर्ताव में भी सुधार हो सकता है. आखिर हम वी आई पीज़  को भी तो प्राथमिकता देते हैं.

यह अच्छी ख़बर इतनी ही नहीं थी. इस ख़बर का दूसरा हिस्सा और भी महत्वपूर्ण है. मुम्बई की इस छात्रा को दान में प्रत्यारोपण के लिए जो हृदय मिला वो एक 27 वर्षीय इलेक्ट्रिकल इंजीनियर  का था जिसका निधन एक सड़क दुर्घटना में हुआ था. उसके हृदय को दान करने का फैसला किया उसकी  मां ने. मां ने इसलिए कि उसके पिता तो बहुत पहले ही उसे छोड़ कर दूसरे लोक में जा चुके थे. मां एक गांव में हेल्थ नर्स का काम करके अपना परिवार चलाती है. अंग दान की बात उनके लिए अनजानी नहीं थी, और वो खुद सोचा करती थी कि अगर उन्हें  कभी कुछ हुआ तो वे ज़रूर अपना अंग दान कर किसी की जान बचाने का पुण्य अर्जित करेंगी. लेकिन यह तो उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हें अपने ही बेटे के अंग का दान करने की अनुमति देनी पड़ेगी. जिस ग्रीफ काउंसलर को उनसे इस बाबत बात करनी थी, खुद उनके लिए यह बहुत मुश्क़िल दायित्व था. आखिर कैसे किसी मां से यह कहा जाए कि वे अपने हाल ही में मृत बेटे के अंग को किसी और के लिए काम में लेने की इजाज़त दे दें? लेकिन  उस ग्रीफ काउंसलर प्रकाश का कहना है कि उस बहादुर मां ने न केवल अपनी स्वीकृति दी, यह भी कहा कि उन्हें अपने उस बेटे पर गर्व है जिसकी वजह  से किसी की जान  बच पा   रही है.

तो ये दो सकारात्मक ख़बरें भी अख़बार ने ही दी हैं. असल में हमारे  चारों तरफ़ काफी कुछ अच्छा भी घटित होता है, लेकिन रिवायत कुछ ऐसी बन गई है कि उसकी चर्चा कम होती है और जो अप्रिय तथा अवांछित  घटित होता है वो तुरंत सुर्खियों में आकर हम तक पहुंच जाता है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार, दिनांक 24 जून, 2014 को अच्छी भी है हमारे आस-पास की दुनिया शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.