Thursday, April 26, 2012

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर बातचीत

हाल ही में सम्पन्न हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के बारे में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल से डॉ रजनीश भारद्वाज की बातचीत आप हिंदी के वरिष्ठ लेखक हैं, सजग आलोचक हैं, वस्तुपरक विश्लेषक हैं, देश-विदेश घूमने का आपको समृद्ध अनुभव है, अभिव्यक्ति की वर्तमान तकनीकों को अच्छी तरह समझते हैं तथा उनका उपयोग भी करते हैं. इसी दृष्टि से मैं आपके समक्ष ऐसे कुछ प्रश्न रख रहा हूं जिनका उत्तर आप ही दे सकते हैं. आप जयपुर में आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के हर आयोजन को देखते आ रहे है. अब तक हुए उत्सवों की साहित्यिक उपलब्धियों को आप किस प्रकार रेखांकित करेंगे? जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की शुरुआत 2006 में हुई थी, और उस बरस इसमें मात्र 18 लेखकों और 14 अन्य लोगों ने भाग लिया था. इन्हें सुनने वालों की संख्या बमुश्क़िल 100 रही होगी. इस बरस यानि 2012 के फेस्टिवल में लगभग 250 लेखकों ने शिरकत की और उन्हें देखने-सुनने वालों की संख्या एक लाख के लगभग बताई जाती है. यानि बहुत कम समय में यह उत्सव बहुत बड़ा हो गया है. इन बरसों में इस आयोजन में देश विदेश के अनेक बड़े और बहुत बड़े लेखकों ने शिरकत की है. इस बरस बेन ओकरी, रिचर्ड डॉकिंस, स्टीवन पिंकर, एमी चुआ जैसे विदेशी और गिरीश कर्नाड, के. सच्चिदानंदन, प्रतिभा रे, कुलदीप नैयर, एम. जे. अकबर, अशोक वाजपेयी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, नीलाभ अश्क़ जैसे अनेक भारतीय लेखक इसमें आए. मुझे लगता है कि किसी भी साहित्यिक आयोजन की उपलब्धि यही हो सकती है कि वह लेखक-पाठक को नज़दीक लाए. इस लिहाज़ से तो मैं इस आयोजन को उपलब्धिमूलक ही कहना चाहूंगा.  इस फेस्टिवल से साहित्य और समाज को क्या लाभ हुआ? इस सवाल का जवाब देना तो बहुत मुश्क़िल है. क्या किसी भी साहित्यिक आयोजन के बारे में यह सवाल करके कोई सीधा उत्तर पाया जा सकता है? एक बड़ा लेखक शहर में आता है, कोई संस्था उनके व्याख्यान का आयोजन करती है, या किसी विषय पर कोई चर्चा आयोजित की जाती है, किसी पुस्तक पर कोई चर्चा होती है. इन सबके सन्दर्भ में अगर कोई यह पूछे कि इनसे साहित्य और समाज को क्या लाभ हुआ, तो क्या उत्तर देंगे? मेरा यह मानना है कि किसी भी साहित्यिक आयोजन का मक़सद होता है विमर्श का मंच प्रदान करना और वृहत्तर समुदाय तक पहुंचना. तो इस लिहाज़ से यही कहा जाएगा कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल ने साहित्य और समाज दोनों को लाभान्वित किया है. साहित्यकारों को पाठक मिले और पाठकों को साहित्य और साहित्यकार. अगर हम यह भी मान लें कि यह कोई गम्भीर आयोजन नहीं था, एक फेस्टिवल था, एक उत्सव था, तो भी इस बात के महत्व को कम करके आंकना उचित नहीं होगा कि पूरे पाँच दिन हर दिन एक साथ चलने वाले सात गुणा पाँच यानि पैंतीस सत्रों में से हरेक में लगभग हाउसफुल की स्थिति रही. लोगों ने हर तरह के लेखकों को न केवल दत्तचित्त होकर सुना, उनसे गम्भीर सवाल भी किए. समाज को यह लाभ हुआ कि उसे इतने सारे लेखकों, विचारकों, पत्रकारों और अन्य बहुत सारे अनुशासनों के शीर्षस्थ लोगों से रूबरू होने का और उनके विचारों से अवगत होने का मौका मिला, और साहित्य का लाभ यह हुआ कि उसका प्रसार हुआ. प्रसंगवश, यह भी कहूं कि इस फेस्टिवल में किताबों की जो दुकानें थीं, और जिन पर इस फेस्टिवल में शिरकत करने वाले लेखकों की किताबें उपलब्ध थीं, अंतिम दिन उनमें से अधिकांश खाली हो चुकी थीं. यानि लोगों ने न सिर्फ चर्चाओं को सुना, चर्चा करने वाले लेखकों की किताबों को खरीदा भी सही. किताबों पर लेखकों के ऑटोग्राफ लेने वालों की भी बहुत लम्बी कतारें देखने को मिलीं.  इस उत्सव को आयोजित करने वालों की मूल प्रतिज्ञा शायद बड़े-बड़े लेखकों को एक मंच पर इकट्ठा करना और उनके माध्यम से दर्शकों को चमत्कृत करना है जिसकी परिणति मनोरंजन में होती है. क्या साहित्य की मूल प्रतिज्ञा से इस आयोजन की मूल प्रतिज्ञा मेल खाती है? इस बात में कोई शक़ नहीं है कि इस आयोजन में बहुत सारे बड़े लेखकों की सहभागिता रहती है. यह सहभागिता हर बरस बढ़ती जा रही है. बड़े नामों के प्रति आकर्षण हम सबमें होता है. अगर हम कोई बहुत छोटा आयोजन करते हैं तब भी हमारी यह कोशिश तो होती ही है कि अपने संसाधनों के हिसाब से किसी ‘बड़े’ लेखक को उसमें बुलाएं. हम जयपुर में कोई आयोजन करते हैं तो और नहीं तो यही कोशिश करते हैं कि दिल्ली का कोई लेखक आ जाए. ऐसे में अगर इतने बड़े पैमाने का कोई आयोजन है तो यह बहुत स्वाभाविक है कि उसमें बड़े-बड़े लेखक बुलाए जाएंगे. अगर आप बड़े लेखकों को नहीं बुलाएंगे तो इस पैमाने का आयोजन हो ही नहीं सकता. लेकिन आपने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी यह की है कि आयोजक बड़े-बड़े लेखकों को एक मंच पर इकट्ठा करके दर्शकों को चमत्कृत करना चाहते हैं. आपने अपनी टिप्पणी के साथ ‘शायद’ जोड़कर यह आशंका व्यक्त की है. मैं एक उदाहरण देकर फिर अपनी बात कहूंगा. इस बार के स्टार लेखकों में से एक थे बेन ओकरी. 23 जनवरी की शाम जिस समय उनका सत्र था उसी समय के चार दूसरे सत्रों में से एक सत्र उतने ही महत्वपूर्ण लेखक रिचर्ड डॉकिंस का था, और एक अन्य सत्र कविता समय शीर्षक से था जिसमें अशोक वाजपेयी, नन्द किशोर आचार्य, नन्द भारद्वाज, पीयूष दईया और लता शर्मा थे. इसी तरह आयोजन के पहले दिन एक सत्र में हैरी कुंजुरू थे, दूसरे में (यह बात अलग है कि उन्हें लेखक मानें भी या न मानें, लेकिन ‘बड़े’ तो वे हैं ही) कपिल सिब्बल थे, एक अन्य सत्र में के. सच्चिदानंदन थे और एक और अन्य सत्र कथा कोश में नवतेज सरना और दीप्ति नवल के साथ हमारे अपने चरण सिंह पथिक, और लक्ष्मी शर्मा थे. जो बात मैं रेखांकित करना चाहता हूं वह यह कि किसी एक सत्र में स्टार लेखक के होने के बावज़ूद शेष सभी सत्रों में भी दर्शकों-श्रोताओं की भरपूर उपस्थिति थी. अब बताइये, कि चमत्कार का क्या असर रहा? जिस वक़्त गुलज़ार और जावेद अख्तर जैसे स्टार एक सत्र में मौज़ूद हों उसी वक़्त अगर लोग रोसामुण्ड बार्टलेट, पवन वर्मा, पुरुषोत्तम अग्रवाल और जेम्स शैपिरो को दत्त चित्त होकर सुनें तो बताइये कि चमत्कार का क्या असर रहा? मुझे नहीं लगता है कि आयोजकों का मक़सद चमत्कार पैदा करना रहा है. अलबत्ता बड़े लेखकों को उन्होंने ज़रूर जुटाना चाहा और इसमें वे कामयाब भी रहे हैं. लेकिन, आयोजन में सिर्फ बहुत बड़े लेखक ही हों, ऐसा भी नहीं है. ऐसे बहुत सारे लेखक भी इसमें आते रहे हैं जिनकी अभी पहली ही किताब आई है और जो साहित्य की दुनिया में अपनी पहचान बना रहे हैं. यानि, कुल मिलाकर एक समन्वय की स्थिति मुझे तो नज़र आई. वैसे, आपने यह सवाल नहीं पूछा है, लेकिन मैं बता दूं कि इस आयोजन में हर दफा कुछ फिल्मी सितारे भी शिरकत करते रहे हैं. कभी अमिताभ बच्चन, कभी आमिर खान, कभी देव आनंद तो कभी ओम पुरी, आदि. आम तौर पर हुआ यह है कि किसी सितारे की कोई किताब उस दौरान प्रकाशित हुई तो उसके प्रोमोशन के लिए उस सितारे को भी बुला लिया गया. बेशक ऐसा करने के पीछे व्यावसायिक नज़रिया होता है. लेकिन एक बात तो यह कि इस आयोजन के कर्ताधर्ताओं ने साहित्य की एक व्यापक परिभाषा ली है. हम लोग आम तौर पर जिसे साहित्य कहते हैं, ये उससे काफी दूर तक जाते हैं और राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सिनेमा, मनोरंजन, पत्रकारिता सभी को साहित्य की परिधि में लेते हैं. यही वजह है कि इनके आयोजनों में तरुण तेजपाल भी होते हैं, एम. जे. अकबर भी, कुलदीप नैयर भी, मार्क टुली भी, बरखा दत्त भी और ओप्रा विनफ्रे भी. मुझे तो लगता है कि ज्ञान की विविध शाखाओं के बीच पारस्परिक सम्वाद का यह खयाल बुरा नहीं है. मैं आयोजन में आने वाले लोगों की तारीफ करूंगा कि वे महज़ ग्लैमर के पीछे नहीं भागते हैं और जब किसी ग्लैमर वाले स्टार का सत्र चल रहा होता है उस वक़्त भी वे किसी गम्भीर लेखक के सत्र को अपनी पसंद बनाते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद मुझे इस बात को लेकर चिंता होती है कि इस आयोजन में ग्लैमर का अनुपात बढ़ता जा है. मैं चाहूंगा कि आयोजक इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाएं.  इस उत्सव के दर्शक कौन हैं? क्या इनमें में वे लोग शामिल हैं जिनकी पीड़ाओं की बात हम अपनी बहसों में करते हैं? इस उत्सव के दरवाज़े सबके लिए खुले रहते हैं. आपको भी स्मरण होगा कि शुरुआती बरसों में तो आयोजकगण निमंत्रणों की बाकायदा बाढ़ ही ला दिया करते थे. धीरे-धीरे कागज़ की उस बर्बादी में कमी करने की सद्बुद्धि इन्हें आई और संचार माध्यमों के ज़रिये लोगों को आमंत्रित किया जाने लगा. इस वर्ष पहली बार आयोजकों ने आगंतुकों के लिए पंजीकरण का प्रावधान किया, और उसके पीछे सुरक्षा सम्बन्धी कारण थे, लेकिन पंजीकरण निशुल्क था. अलबत्ता शाम के मनोरंजन कार्यक्रमों के लिए टिकिट लगाया गया, लेकिन वह अलग बात है. तो, इस उत्सव में कोई भी आ सकता है. स्वाभाविक है कि जब इतना बड़ा आयोजन होगा तो आने वालों का स्तर एक समान तो हो नहीं सकता. जैसा आपने कहा, ‘जिनकी पीड़ाओं की बात हम अपनी बहसों में करते हैं’ वे अगर इस आयोजन में आते हैं तो वे भी आते हैं जो (शायद) उन पीड़ाओं को जन्म देते हैं. और इसमें मुझे कोई हर्ज़ भी नहीं लगता. महत्व तो इस बात का है कि इस आयोजन के दरवाज़े सबके लिए खुले हैं. बल्कि, मैं तो आगे बढ़कर यह भी कहना चाहूंगा कि यहां जो प्रजातांत्रिक व्यवस्था होती है उसका विस्तार और अनुकरण होना चाहिए. कोई भी कहीं भी बैठ सकता है. एक सत्र में मैंने देखा कि पवन के. वर्मा (वे भूटान में भारत के राजदूत हैं) आए और उन्हें कोई कुर्सी खाली नज़र नहीं आई तो वे गुलज़ार के पास ज़मीन पर ही बैठ गए. उनके लिए कुर्सी खाली करने के वास्ते किसी आम श्रोता को उठाया नहीं गया. कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जिस समानता की बात जोर-शोर से करते हैं, वो क्रिया रूप में परिणत होती तो यहां नज़र आती है. लेकिन आपने बात पीड़ाओं की की थी. इस आयोजन में लगातार जाकर मैंने पाया है कि यहां सिर्फ उस साहित्य की बात नहीं होती है जो आम जन की पीड़ाओं से ताल्लुक रखता है. जैसा मैंने अभी कहा, यहां साहित्य को व्यापक अर्थ में लिया जाता है, इसलिए यहां जो दर्शक श्रोता समुदाय आता है वह भी वैविध्यपूर्ण होता है.  इस उत्सव में आने वाले दर्शकों की स्थिति से क्या इस उत्सव का मूल्यांकन नहीं होना चाहिए? आपका इशारा शायद इस तरफ है कि इस आयोजन में जो दर्शक आते हैं वे सम्पन्न वर्ग के होते हैं. आपके इस प्रश्न का उत्तर पिछले उत्तर में आ गया है.  क्या अपको नहीं लगता है कि एक प्रायोजित एलीट वर्ग यहां आ रहा है जो देश और समाज की समस्याओं के प्रति गम्भीर नहीं है? इसकी जड़ें भी हमारी देशजता में नहीं हैं शायद? इस प्रश्न का उत्तर हां में भी है और ना में भी. पहले हां की बात करूं. यह एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का आयोजन है. पूरी दुनिया से इसमें लोग आते हैं. न सिर्फ लेखक, वे भी जिनकी लेखन में रुचि है. अब अगर कोई अमरीका से, जर्मनी से, जापान से, या कहिये चेन्नई से, अहमदाबाद से एक साहित्यिक आयोजन में आ रहा है तो ज़ाहिर है कि उसका सामाजिक-आर्थिक-बौद्धिक स्तर उस तरफ झुका होगा जिसे आप एलीट वर्ग कह रहे हैं. यह मेरी अपनी जानकारी है कि हर बरस इस आयोजन में दुनिया भर से लोग अपने खर्चे पर (भी) आते हैं. यह स्वाभाविक बात है कि उन सबकी जड़ें ‘हमारी देशजता’ में नहीं है. लेकिन इस आयोजन में जो स्थानीय लोग आते हैं, उनके बारे में तो ऐसा नहीं है. वे उस वर्ग से इतर के भी हैं जिनकी अभी मैं बात कर रहा था. बहुत साधारण किस्म के लोगों को मैंने इस आयोजन में देखा है. न केवल देखा है, सम्मान और अधिकार से अगली पंक्ति में ठाठ से बैठकर चर्चाओं को सुनते देखा है. तो दोनों ही तरह के लोग इस आयोजन में आते हैं. और रही बात समस्याओं की, तो मैंने यह महसूस किया है कि आयोजकों का नज़रिया साहित्य के प्रति व्यापक है और वे केवल उसी को साहित्य नहीं मानते हैं जो समस्याओं की फिक्र करता हो. इससे मेरी व्यक्तिगत असहमति भी हो सकती है, लेकिन इसके बावज़ूद मैं यह मानता हूं कि आयोजन का फॉर्मेट तै करने का हक़ तो आयोजकों को ही है.  क्या इस उत्सव का प्रारूप आपको उपयुक्त लगता है जिसमें सब जल्दी में हैं, भागमभाग में हैं? बस, हैलो, हाय, बाय तक ही रिश्ते बन पा रहे हैं? आपका यह प्रश्न मुझे बहुत सार्थक लगा. इस आयोजन में हर दिन एक-एक घण्टे के सात सत्र होते हैं. ये सत्र एक साथ पाँच जगहों पर चलते हैं. मोटे तौर पर लगभग 175 सत्र. ज़ाहिर है कि कोई भी व्यक्ति एक वक़्त में एक ही सत्र में उपस्थित रहेगा, अंत: वह अधिक से अधिक 35 सत्र देख सुन सकता है. लेकिन वह कौन-से 35 सत्र देखे सुने, यह चयन उसका अपना होगा. यानि 175 में से 35 (या कम) चुनने की आज़ादी उसे आयोजक देते हैं. यह विविधता तो प्रशंसनीय है. अगर आपका प्रश्न यह है कि एक सत्र के लिए एक घण्टे का वक़्त कम है, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि अगर लेखक व्यवस्थित और सुविचारित रूप से अपनी बात कहे तो यह समय कम नहीं है. हां, अगर कोई पन्द्रह मिनिट की बात कहने के लिए दो घण्टे की भूमिका बांधना ज़रूरी समझता हो तो बात अलग है. दूसरे यहां बहुत सारे सत्र तो रचना पाठ के होते हैं. उस लिहाज़ से तो यह समय वैसे भी कम नहीं है. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जो बात मुझे सबसे महत्वपूर्ण लगी वह है समय के प्रति उनका आदर भाव. अगर कोई सत्र दस बजे शुरू और ग्यारह बजे खत्म होना है तो वह दस बजे ही शुरू होगा और ग्यारह बजे ही खत्म होगा. किसी का इंतज़ार नहीं, किसी को अपनी बात पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय नहीं. हम लोग, विशेष रूप से हिंदी वाले इस बात के अभ्यस्त नहीं हैं. हमारा कार्यक्रम अगर तीन बजे घोषित है तो बड़े लोगों को तो वैसे ही साढे तीन का वक़्त बताया जाएगा, और अगर चार बजे वो कार्यक्रम शुरू हो जाए तो गनीमत मानिए. फिर माल्यार्पण, स्वागत, वक्ताओं का परिचय और उसके बाद खुद वक्ता, जिसे अनंतकाल तक बोलने का विशेषाधिकार मिला होता है. कार्यक्रम खत्म होने का तो कोई समय होता ही नहीं. कोई वक्ता जब एक बार बोलना शुरू कर दे, चाहे वह आभार प्रदर्शन ही क्यों न कर रहा हो, तो समझिये गया कम से कम आधा घण्टा. तो, हमारे इस अभ्यास की नज़र से देखें तो बेशक यह आयोजन भागमभाग और जल्दबाजी का आयोजन है. लेकिन, इस बार सवाल मुझे पूछने दें, कि क्या हमें भी अपने आयोजनों में समय की कद्र नहीं करनी चाहिए? क्या समयबद्धता कोई अपराध है? क्या अपनी बात सलीके से और सुगठित रूप से, पूरी तैयारी करके नहीं कही जानी चाहिए? क्या एक निश्चित समय में अपनी बात कहने का अनुशासन हममें नहीं आना चाहिए?  हम जल्दी-जल्दी में, अधिकाधिक लोगों की शिरकत के चक्कर में समाज और व्यक्ति की मूलभूत समस्याओं से टकराने के बजाय उनसे बचने का प्रयास नहीं कर रहे हैं? मेरे खयाल से ये दो अलग-अलग बातें हैं. जल्दी-जल्दी और अधिकाधिक लोगों की शिरकत की बात अभी अपन ने की. हो सकता है कि यह देखने का एक भिन्न नज़रिया भी हो. जिसे मैं समयबद्धता कह कर सराह रहा हूं वही किसी और को जल्दबाजी भी लग सकती है. सोच का यह फर्क़ तो रहेगा ही. लेकिन इसे समाज की और व्यक्ति की मूलभूत समस्याओं से टकराने की बजाय उनसे कतराने का नाम देना मुझे उचित नहीं लगता. समस्याओं से टकराने के लिए समय की बरबादी और बात को बेवजह विस्तार देना ज़रूरी नहीं है. अगर वक्ता की तैयारी है और वह सलीके से अपनी बात कह सकता है तो उसके लिए तीस मिनिट भी काफी हैं, अन्यथा.... . अगर मैं कहूंगा तो छोटे मुंह बड़ी बात हो जाएगी, इसलिए मैं श्रीलाल शुक्ल से शब्द उधार ले रहा हूं. उन्होंने कहीं कहा था कि हिंदी लेखक संक्षेप में अपनी बात कह ही नहीं सकता. बात को फैलाना उसके स्वभाव में ही है. अगर यह बात सही है, तो क्या आपको नहीं लगता कि हिंदी लेखक को भी अपना स्वभाव बदलना चाहिए? आपका जो दूसरा सवाल है उसका ताल्लुक आयोजन के फॉर्मेट से है. और जैसा मैंने पहले भी कहा है, किसी आयोजन का फॉर्मेट क्या हो यह तो आयोजक ही तै करेगा. इस साहित्य उत्सव का फॉर्मेट अगर हमारी अपेक्षाओं से अलग है, तो है.  क्या आपने देखा है कि डिग्गी पैलेस के बाहर यातायात व्यवस्था, पार्किंग आदि को लेकर कितनी मारामारी है? इस उत्सव के कारण रिक्शावालों, टैक्सी वालों तथा आम जन को कितनी तक़लीफें हो रही हैं? क्या इन बातों का एहसास आयोजकों को है? क्या वे अपनी बनावटी दुनिया में मस्त हैं और इस तथ्य से बेखबर हैं कि उनके आयोजन से जयपुर के आम जीवन में कितनी तक़लीफें आम जन को सहनी पड़ रही हैं? जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल बहुत बड़ा आयोजन बन गया है और किसी भी बड़े आयोजन के कारण कुछ असुविधाओं का होना अपरिहार्य है. लेकिन मेरा ऐसा खयाल है कि आयोजक भी और स्थानीय प्रशासन भी लगातार यह कोशिश करते हैं कि आम लोगों को कम से कम असुविधा हो.  डिग्गी पैलेस को जैसे किले में तबदील कर दिया गया है. चारों ओर पुलिस है, चारों ओर पहरा है, आम आदमी के लिए आम रास्ते तक बंद हैं जबकि पास ही प्रदेश का सबसे बड़ा अस्पताल है, अजमेरी गेट है, महाराजा-महारानी कॉलेज हैं, कुल मिलाकर यह बहुत व्यस्त इलाका है. क्या इस ओर आयोजकों को ध्यान नहीं देना चाहिए? क्या इस बाबत रचनाकारों का कुछ संवेदनात्मक दायित्व नहीं बनता है? ऐसा इसी बार हुआ है. कारण आप भी जानते हैं. सलमान रुश्दी प्रकरण. यह कानून-व्यवस्था का मामला था और अगर प्रशासन को एहतियाद बरतना ज़रूरी लगा, तो उसने वैसा किया. अगर हम आयोजकों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं, तो मेरे जेह्न में यह सवाल उठता है कि क्या उन्होंने जान-बूझकर सलमान रुश्दी को बुलाकर ‘आ बैल मुझे मार’ को चरितार्थ किया होगा? भला कौन अपना इतना बड़ा आयोजन दांव पर लगाना चाहेगा? हो सकता है कि उन्होंने इस बात का पूर्वानुमान न किया हो कि समाज का एक हिस्सा रुश्दी को बुलाये जाने के विरोध में उठ खड़ा होगा और सरकार भी ज़रूरत से ज़्यादा संवेदनशील हो जाएगी! मुझे लगता है कि इस मामले को सरकार ने तो ग़लत तरह से हैंडल किया ही, मीडिया ने भी ज़रूरत से ज़्यादा अहमियत दी. जो लोग आयोजन में शरीक नहीं थे उन्हें (मीडिया की वजह से) यह एहसास हुआ कि सारा आयोजन रुश्दी के इर्द-गिर्द ही सिमटा हुआ है. जबकि यथार्थ इससे बहुत भिन्न था. लेकिन यह तो विषयांतर हो गया. आपने रचनाकारों के संवेदनात्मक दायित्व का सवाल उठाया था. इस मामले में हम रचनाकार से किस तरह के संवेदनात्मक व्यवहार की उम्मीद करते हैं?  क्या यह आयोजकों की आत्ममुग्धता नहीं है कि वे जयपुर की आम ज़िन्दगी की तक़लीफों से बेखबर मानसिक विलास में डूबे हैं? बेहतर हो, यह सवाल आयोजकों से ही पूछा जाए. मैं भला उनकी तरफ से कोई सफाई देने वाला कौन होता हूं?  क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि इसके आयोजन के लिए किसी एकांत की जगह को चुना जाए जहां लेखकों को भौतिक तक़लीफों का भी एहसास हो? यह सवाल तो बहुत मज़ेदार है. ऐसी जगह चुनी जाए जहां लेखकों को भौतिक तक़लीफों का एहसास हो. बात सुनने में तो प्रभावशाली लगती है. लेकिन क्या असल ज़िन्दगी में हमेशा ऐसा ही होता और किया जाता है? अपने मेहमानों को हम सुविधा देना चाहते हैं या तक़लीफ का एहसास कराना चाहते हैं? आप मुझे बताएं कि कौन-सी साहित्यिक संस्था अपने लेखकों को भौतिक तक़लीफों का एहसास कराने के लिए स्लम्स में या कच्ची बस्तियों में ठहराती है?  बाहर से आने वाले लेखकों को पाँच सितारा या अच्छे होटलों में ठहराया जा रहा है. क्या आने वालों के लिए नए प्रकार के रैन बसेरों की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए? हम नेताओं की अय्याशी की तो बात करते हैं, पर हम भी दुःख पाने के लिए तैयार कहां हैं? एक लेखक का एक दिन एक सत्र में प्रेजेण्टेशन और वह पाँच दिन यहां होटल में मज़े कर रहा है इसे अय्याशी नहीं कहेंगे? क्या ऐसे लेखकों पर बंदिश नहीं लगनी चाहिए? क्या यह सर्वेक्षण नहीं होना चाहिए कि कितने लेखक अपने खर्चे पर इस उत्सव में बाहर से आते हैं? हां, ये लोग अपने अतिथि लेखकों वगैरह को पाँच सितारा या उसी तरह के बेहतर होटलों में ठहराते हैं. मुझे नहीं पता कि अब तक किसी आगत लेखक ने इस बात का विरोध किया या नहीं. किया होता तो कहीं पढ़ने को भी मिला होता. मुझे नहीं पता कि ऐसे कौन से साहित्यिक संगठन हैं जो अपने लेखकों को रैन बसेरों में ठहराते हैं? आदर्श के लिहाज़ से तो बात भली लगती है कि लेखक भी फुटपाथ पर सोये, पैदल चले, पसीना बहाए, रूखी-सूखी खाकर ठण्डा पानी पी ले. लेकिन यथार्थ यह है कि हम सब सुविधाओं के आदी होते जा रहे हैं. अब यह बात आयोजक की क्षमता पर है कि वह कितनी सुविधा दे पाता है. लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई भी लेखक इस बात पर आपत्ति करेगा कि उसे अमुक-अमुक सुविधा क्यों दी जा रही है. और जहां तक एक सत्र में प्रस्तुति और पाँच दिन के मज़े की बात है, इस सवाल के पीछे मुझे एक खास तरह की मानसिकता का आभास मिल रहा है, जो कम से कम मुझे तो कभी नहीं रुचि. हमारे प्रांत के एक बड़े लेखक ने एक बार किसी सन्दर्भ में चिढ़ कर कहा था, कि हम क्या ताली बजाने जाएंगे? यानि, अगर लेखक बड़ा है तो वह सिर्फ मंच पर बिराजेगा. श्रोता समूह में तो वह बैठ ही नहीं सकता. वह सिर्फ बोल सकता है, किसी को सुन नहीं सकता. जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मैंने ऐसा नहीं पाया. अगर कोई लेखक एक सत्र में अपनी बात कह रहा है तो बाकी सत्र में वह औरों की बात सुनता भी है, उनके सत्रों में बतौर श्रोता भी उपस्थित रहता है. मैंने बहुत बड़े और नामी लेखकों को दूसरों के सत्र में बैठे और बातें सुनते देखा है. किसी का आग्रह यह नहीं रहता कि वह सिर्फ मंचासीन ही होगा. तो यह तो प्रशंसनीय बात है कि एक लेखक एक सत्र में अपनी बात कहता है और बाकी सत्रों में औरों की बात सुनता है. इसे भला अय्याशी कैसे और क्यों कहा जाए?  क्या आयोजकों को उत्सव के आय-व्यय का हिसाब जनता के सामने नहीं रखना चाहिए? वे प्रायोजकों के नाम तो घोषित कर देते हैं, आभार व्यक्त करने के साथ, पर यह नहीं बताते कि किसने कितने पैसे दिए, कितने पैसे किस मद पर खर्च हुए. क्या कुछ राशि बची और अगर बची तो वह कहां गई. क्या यह पारदर्शिता आवश्यक नहीं है? पारदर्शिता होनी चाहिए, ज़रूर होनी चाहिए. लेकिन क्या जीवन के अन्य किसी क्षेत्र में हमें इस आदर्श पारदर्शिता के दर्शन होते हैं? विभिन्न लेखक संगठन या संस्थान जो आयोजन करते हैं क्या वे उसका लेखा-जोखा सार्वजनिक करते हैं? आप कह सकते हैं कि उनके आयोजन इतने बड़े नहीं होते हैं और उसमें इतने अधिक वित्तीय संसाधन प्रयुक्त नहीं होते हैं. ठीक है. लेकिन सिद्धांत तो सिद्धांत है. छोटे और बड़े का भेद क्यों किया जाना चाहिए? और एक बात. हो सकता है कि यह कहना ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ न हो लेकिन हम जब बात कर ही रहे हैं तो जो बात मेरे मन में है मुझे उसे कहने में संकोच नहीं करना चाहिए. मुझे यह भी लगता है कि एक ऐसे आयोजन जिसमें मेरा कोई आर्थिक योगदान नहीं है, के आयोजकों से मैं उनके आय व्यय के बारे में पूछने का क्या हक़ रखता हूं? यह हक़ तो उनका बनता है जिन्होंने उसमें कोई अंशदान किया है.  यह उत्सव किन मूल्यों की स्थापना कर रहा है तथा इसका वास्तविक प्रभाव क्या है इसका आकलन किस प्रकार होना चाहिए? मेरे खयाल से तो कोई भी उत्सव उत्सव होता है, वह मूल्यों की स्थापना के निमित्त नहीं होता है. हां, इतना ज़रूर देखा जाना चाहिए कि उसके कारण कोई विकृतियां समाज में न आएं. जहां तक प्रभाव की बात है, मुझे लगता है कि यह उत्सव समाज की साहित्य में दिलचस्पी बढ़ाने में काफी हद तक कामयाब रहा है. इसका आकलन कैसे हो, यह तो मैं भी नहीं जानता.  एक और बात. क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इस आयोजन का बहुत अधिक झुकाव अंग्रेज़ी की तरफ है और इसमें हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाओं की गहन उपेक्षा होती है? जी, मुझे क़तई ऐसा नहीं लगता है. इसकी वजह यह है कि मेरे मन में यह बात बहुत स्पष्ट है कि यह साहित्य उत्सव है, भारतीय या हिंदी साहित्य का उत्सव नहीं. अगर आप सारी दुनिया के सन्दर्भ में देखेंगे तो पाएंगे कि हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को जो प्रतिनिधित्व मिल रहा है वह संतोषप्रद है. थोड़ा असंतुलन हमें इसलिए भी लगता है कि दुनिया के दूसरे देशों के साहित्य में से ज़्यादातर का प्रतिनिधित्व यहां अंग्रेज़ी के माध्यम से होता है (और यह स्वाभाविक भी है. अगर कल को कोई फ्रेंच साहित्यकार फ्रेंच भाषा में अपनी बात कहेगा तो उसे सुनने-समझने वाले कितने कम होंगे! यह एक सच्चाई है कि अन्य भाषाओं की तुलना में अंग्रेज़ी बोलने समझने वाले अधिक हैं.). फिर भी, अगर इसमें भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व और बढेगा तो मुझे भी प्रसन्नता ही होगी.  हमारी अब तक की बातचीत से लग रहा है कि आप इस आयोजन से पूरी तरह संतुष्ट हैं. क्या आपको इस आयोजन में कुछ भी अप्रिय नहीं लगा? देखिए, सुधार की गुंजाइश तो हर जगह होती है. मेरा स्वभाव है कि मैं चीज़ों को उनके खास सन्दर्भ में देखता हूं और मूल्यांकन करते वक़्त सामने वाले पक्ष की सीमाओं को भी ध्यान में रखने की कोशिश करता हूं. वरना आम तौर पर होता यह है कि हम दूसरों से हद दर्ज़े के आदर्श की उम्मीद करने लगते हैं और फिर निराश होते हैं. यह बात मेरे स्वभाव में नहीं है. अब मुझे यह लगता है कि यह आयोजन कुल मिलाकर साहित्य और जन को नज़दीक लाने का एक उम्दा प्रयास है और इसी रूप में मैं इसका प्रशंसक हूं. बेशक यहां कोई गम्भीर विमर्श नहीं होता है, आम तौर पर. लेकिन इतने बड़े मेले से आपको गम्भीर विमर्श की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए. दूसरे, क्योंकि यह बहुत बड़ा आयोजन है, ज़ाहिर है कि आयोजकों पर बहुत सारे व्यावसायिक दबाव भी होते होंगे. वे नज़र भी आते हैं. मुझे नहीं लगता कि उनसे बचा जा सकता है. बचने की एक ही राह हो सकती है और वह यह कि आयोजन किया ही न जाए. अगर कोई मुझे छूट दे तो मैं तो इस विकल्प को नहीं चुनूंगा. मुझे लगता है कि नहीं करने से तो यह बेहतर है. अब आप कह सकते हैं कि इतना बड़ा आयोजन किया ही क्यों जाए! अगर आप यह कहें तो इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं होगा. फिर भी, अगर आदर्श की बात करूं तो कहना चाहूंगा कि आयोजकों को व्यावसायिक पक्ष, ग्लैमर और तड़क भड़क से बचना चाहिए. एक बात और कहना चाहूंगा और वह यह कि अब यह आयोजन इतना बड़ा हो गया है कि डिग्गी पैलेस इसके लिए उपयुक्त नहीं रह गया है. मैं जानता हूं कि डिग्गी पैलेस के मालिकान यह स्थान आयोजकों को निशुल्क उपलब्ध कराते हैं और आयोजकों को अपने आयोजन की मार्केटिंग के लिहाज़ से एक ‘पैलेस’ रास भी आता है, लेकिन अब उन्हें कोई दूसरी जगह तलाश करनी ही चाहिए. और एक बात. मैं भी इस आयोजन की खूब सारी आलोचनाएं पढ़ता रहा हूं. वैसे तो मुझे यह बात दिलचस्प लगी कि अधिकांश आलोचनाएं लोगों ने बगैर इस आयोजन में आए, और बिना इसे समझे ही की है. सुनी-सुनाई, पढी-पढाई बातों के आधार पर. जो लोग कभी इस आयोजन में शरीक हुए उनमें से बहुत ही कम ने इसके बारे में प्रतिकूल कुछ कहा-लिखा है. फिर भी, एक बात मेरे मन में अवश्य आती है. थोड़ी देर के लिए मैं मान लेता हूं कि यह आयोजन बहुत खराब है, बहुत निकृष्ट है. तो, क्यों नहीं हम एक आदर्श और उत्कृष्ट आयोजन करके दिखाते हैं? हमें किसने रोका है? मैं जानता हूं कि हमारे यहां यानि इस फेस्टिवल से बाहर भी काफी कुछ होता है, अच्छा होता है. हाल ही में कविता समय का आयोजन हुआ. ऐसे और आयोजन हों तो कुछ बात बने. ◙◙◙ सम्पर्क सूत्र: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, ई-2/211, चित्रकूट, जयपुर- 302021. डॉ रजनीश भारद्वाज, ए-243, त्रिवेणी नगर, गोपालपुरा बाय पास, जयपुर. 'एक और अंतरीप' के जनवरी-मार्च 2012 अंक में प्रकाशित. Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

Thursday, January 26, 2012

मीडिया: कल, आज और कल

मीडिया की आज़ादी की बात अभिव्यक्ति की आज़ादी के समानांतर है. जितनी ज़रूरी अभिव्यक्ति की आज़ादी है उतनी ही ज़रूरी मीडिया की आज़ादी भी है. और मुझे यह कहने में गर्व का अनुभव हो रहा है कि भारत में कुछ छुट-पुट अपवादों को छोड़कर ये दोनों ही आज़ादियां विद्यमान हैं. इन छुट-पुट अपवादों का भी समुचित विरोध होता है और इसलिए उन्हें नज़रन्दाज़ कर दिया जाना चाहिए. लेकिन जब हम बदलते परिवेश में मीडिया की आज़ादी की बात करना चाहते हैं तो पहला सवाल तो यही उठता है कि यह बदलता परिवेश क्या है. वैसे तो इसके अनेक सन्दर्भ हो सकते हैं लेकिन मैं फिलहाल बाज़ार और पूंजी के सन्दर्भ में इस परिवर्तित परिवेश को देखते हुए कुछ कहना चाहूंगा. पिछले कुछ बरसों में, मुक्त अर्थव्यवस्था और उदारीकरण के प्रसार से देश में काफी कुछ बदला है, और उस काफी कुछ में मीडिया भी शामिल है. एक समय था जब इस मीडिया को पत्रकारिता के नाम से जाना जाता था और उसे एक मिशन माना जाता था. लेकिन अब सिर्फ उसके नाम में ही नहीं चरित्र में भी बदलाव हुआ है और वह मिशन न रहकर एक व्यवसाय में तब्दील हो गया है. और जब वह व्यवसाय बन गया है तो ज़ाहिर है कि उसका लक्ष्य भी लाभ अर्जित करना हो गया है. अब इसी बदले हुए परिवेश में हम मीडिया की भूमिका पर विचार कर सकते हैं. मेरा ऐसा मानना है कि लाभ के बावज़ूद एक आधारभूत नैतिकता और आदर्श का भाव तो बना ही रहना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य से कई दफा ऐसा नज़र नहीं आता है. चाक्षुष मीडिया में, खास तौर पर निजी चैनलों में, जहां टीआरपी ही सर्वोपरि हो गई है, और मुद्रण माध्यमों में भी, कई बार लगता है कि मुनाफा ही सब कुछ हो गया है. समाचारों पर विज्ञापन हावी दिखाई देते हैं और पेड न्यूज़ वाली बात भी इतनी पुरानी नहीं हुई है कि हमारी स्मृति से विलुप्त हो जाए. समाचारों के चयन में लाभ-हानि का नज़रिया साफ लक्षित होता है. मुद्रण माध्यमों में हमारी भाषा के साथ जो सुलूक हो रहा है उसके मूल में भी यही लाभ की प्रवृत्ति काम करती दिखाई देती है. लगता है कि अखबारों के मालिकों को भाषा की शुचिता की नहीं कोई चिंता नहीं है. बल्कि वे तो यह सोचकर कि इससे उनको ज़्यादा लाभ होगा, भाषा को और भी विकृत करने ज़रा भी संकोच नहीं कर रहे हैं. कोई भी माध्यम जड़ होकर नहीं जी सकता, लेकिन यह देखा जाना चाहिए कि वह किस तरह बदल रहा है. इधर अधिकांश अखबारों में गम्भीर, विचारोत्तेजक और सकारात्मक सामग्री का अनुपात निरंतर घट और हल्की-फुल्की, चटपटी, अश्लीलता की तरफ झुकी हुई और एक हद तक विकृत रुझान वाली सामग्री का अनुपात बढ रहा है. बहुत बार लगता है कि मीडिया को जिन चीज़ों के प्रतिपक्ष में होना चाहिए वह उन्हीं के समर्थन और सेवा में खड़ा है. निश्चय ही यह स्थिति चिंताजनक है. दृश्य माध्यमों में तो अर्थशास्त्र का वह नियम बहुत स्पष्ट नज़र आता है कि जब अच्छी और बुरी मुद्रा एक साथ चलती है तो बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से हटा देती है. निजी चैनलों ने दूरदर्शन को लगभग अदृश्य ही कर दिया है. निजी चैनल मतलब केवल और केवल फिल्मी सामग्री. यहां भी जैसे नीचे गिरने की एक होड़ लगी है. रियलिटी शोज़ के नाम पर न जाने क्या-क्या दिखाया जा रहा है. अब सवाल यह रह जाता है कि ऐसे में मीडिया से हमारी अपेक्षाएं क्या हों? मैं जानता हूं कि बेशर्म पूंजी के इस दौर में मुनाफे की बात को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन फिर भी मैं यह उम्मीद करना चाहता हूं कि मीडिया अपने सामाजिक दायित्व को विस्मृत न करे. वह लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही उन्हें शिक्षित और संस्कृत करने के अपने दायित्व का भी निर्वहन करे. मनोरंजन का अर्थ केवल फूहड़ नाच ही नहीं है, मनोरंजन सुरुचिपूर्ण भी हो सकता है. लाभ खबरों के विवेकपूर्ण चयन और संतुलित प्रस्तुतिकरण से भी कमाया जा सकता है. मैं उदास तो हूं, लेकिन निराश नहीं हूं. मुझे विश्वास है कि मीडिया अपने भटकाव के इस दौर से जल्दी ही उबरेगा और फिर से वह भूमिका अदा करने लगेगा जो उससे अपेक्षित है. ◙◙◙ जयपुर के समाचार पत्र डेली न्यूज़ में 26 जनवरी, 2012 को प्रकाशित. Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

Sunday, December 25, 2011

वर्ष 2011 में हिंदी भाषा और साहित्य

बीतते जा रहे साल के आखिरी दिनों में पूरे साल का लेखा जोखा करने बैठा हूं तो सबसे पहले इस बात पर ध्यान जाता है कि हमारे समाज की भाषा की ज़रूरतों में तेज़ी से बदलाव आ रहा है. अब तक हम जिस तरह से भाषा को बरतते रहे हैं, बरताव का वह तरीका अब प्रचलन से बाहर होता जा रहा है. हमारे समय में विभिन्न कारणों से, जिनमें डम्बिंग डाउन सिण्ड्रोम भी एक है, भाषा की पारम्परिक महत्ता का तेज़ी से क्षरण हुआ है. स्वाभाविक है कि मेरी अपनी भाषा हिंदी भी इस से अछूती नहीं रही है. बढ़ते वैश्वीकरण ने अंग्रेज़ी को और भी अधिक ताकतवर बनाया है और उसके ताकतवर होने का खामियाज़ा तमाम भारतीय भाषाओं को, जिनमें हिंदी भी एक है, भुगतना पड़ा है. रोजी-रोटी के लिहाज़ से हिंदी की महता में कमी आई है और इसका असर हिंदी के पारंपरिक पठन-पाठन पर भी पड़ा है. नए खुल रहे निजी विश्वविद्यालयों में तो भाषा के अध्ययन-अध्यापन की सम्भावनाएं लगभग खत्म ही हो गई है. जहां हिंदी का अध्यापन हो रहा है वहां भी स्थिति बेहतर और उत्साहपूर्ण नहीं है. लेकिन वैसे हिंदी में रोज़गार के नए अवसर भी खूब पैदा हुए हैं. अनुवाद का बाज़ार खूब फला फूला है लेकिन उस बाज़ार के लिए हमारी तैयारी अभी कम ही है. इधर भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा प्रभाग ने एक विज्ञप्ति जारी कर हिंदी के तथाकथित कठिन शब्दों की बजाय अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग करने की सलाह देकर हिंदी को ठेस पहुंचाई है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सब कुछ नकारात्मक ही है. इंटरनेट, मोबाइल आदि पर हमारी भाषा का प्रयोग बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन इस वजह से भाषा के स्वरूप में बहुत तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं. आने वाले बरसों में हमें नए सांचे में ढली हिंदी को देखने का और उसे बरतने का अभ्यस्त होना होगा. जहां तक साहित्य का सवाल है, हम चाहें तो इस बात पर खुशी मना सकते हैं कि खूब लिखा जा रहा है और छप भी खूब रहा है. लेकिन दुख की बात यह है कि इसी अनुपात में पाठक संख्या में वृद्धि नहीं हुई है. कम से कम किताबों की बिक्री से तो यही लगता है. किताबों की वैयक्तिक खरीद का ग्राफ जस का तस है और अधिकतर प्रकाशक सरकारी और सांस्थानिक खरीद पर ही आश्रित हैं. हां, इतना ज़रूर हुआ है कि राजस्थान के एक प्रकाशक बोधि प्रकाशन ने मात्र एक-एक सौ रुपये में दस पुस्तकों के दो सेट प्रकाशित कर और उन्हें ठीक से बेच कर इस ठहरे पानी में हलचल पैदा करने की एक कोशिश की. लेकिन शेष प्रकाशन जगत पर इस प्रयास की कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली. हिंदी साहित्य की दुनिया में एक बड़ी बात यह हुई है कि नई तकनीक ने लेखक को उसकी रचनाशीलता के प्रसार के लिए अनेक वैकल्पिक माध्यम सुलभ करा दिए हैं. पिछले बरस हिंदी के नए लेखकों के अलावा अनेक प्रतिष्ठित लेखकों ने भी ब्लॉग, फेसबुक वगैरह का खूब प्रयोग कर इन नए माध्यमों को अपनी स्वीकृति प्रदान की. फेसबुक पर बहुत सारे मुद्दों पर जीवंत बहसें चलीं. ब्लॉग्स पर भी काफी कुछ बेहतरीन देखने को मिला. एक और खास बात यह हुई कि विधाओं की जकड़बन्दी में बहुत कमी आई और उनमें पारस्परिक अंत:क्रिया बढी. मुझे यह बात भी महत्वपूर्ण लगती है कि अंग्रेज़ी सहित अनेक विदेशी भाषाओं की नव प्रकाशित पुस्तकें अब तुरंत हिंदी में भी सुलभ होने लगी हैं. निश्चय ही इससे भी हिंदी की दुनिया समृद्ध हो रही है. तो कुल मिलाकर भाषा और साहित्य दोनों ही दृष्टियों से बीता साल मिला-जुला रहा है. ◙◙◙ दिनांक 25 दिसम्बर 2011 को दैनिक डेली न्यूज़ में प्रकाशित आलेख का किंचित परिवर्तित रूप. Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा

Saturday, December 10, 2011

सरकार अपना बचकाना इरादा छोड़े

भारत के टेलीकॉम और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल इन दिनों अनगिनत आलोचनाओं और उपहासों के पात्र बन रहे हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार कोई छह सप्ताह पहले उन्होंने कुछ सोशल मीडिया साइट्स के एक्ज़ीक्यूटिव्स के साथ मुलाकात करके उन्हें आपत्तिजनक सामग्री हटाने का निर्देश दिया. अब सिब्बल ने यह भी कहा है कि उन्हें देश के लोगों की भावनाओं का खयाल है और अगर सोशल नेटवर्क सरकार के अनुरोध पर ध्यान नहीं देंगे तो सरकार उनके खिलाफ कदम उठाने पर विचार कर सकती है. ज़ाहिर है कि इन माध्यमों का प्रयोग करने वाले करीब बीस करोड़ लोगों में से अधिकांश ने और अन्यों ने भी सिब्बल के इस कदम को बुरी तरह नापसन्द किया है.

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों का उपयोग करने वाले इन माध्यमों की आज़ादी और त्वरिततता के कायल हैं और वे अपनी बात कहने या दूसरों की बात पर अपनी प्रतिक्रिया -चाहे वह अनुकूल हो या प्रतिकूल– देने के लिए खुल कर इन माध्यमों यथा फेसबुक, ट्विट्टर, यू ट्यूब वगैरह का निर्बाध उपयोग कर रहे हैं और करते रहना चाहते हैं. यह बहुत स्वाभाविक है कि इन माध्यमों पर सरकार की और उसके कामों की खुलकर आलोचना होती है. इतनी खुलकर कि मुद्रण माध्यमों में तो उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. लेकिन इससे यह न समझ लिया जाए कि आलोचना केवल पक्ष की ही होती है. बख्शा प्रतिपक्ष को भी नहीं जाता है. इसका बहुत अच्छा उदाहरण हैं नरेन्द्र मोदी. इन माध्यमों पर बात केवल राजनीति पर ही नहीं होती है. जीवन के तमाम पक्षों पर खुली और बेबाक बातचीत यहां होती है. कभी-कभी तो यह बातचीत ज़्यादा ही खुली हो जाती है, लेकिन इस अनियंत्रित बेबाकी की आलोचना भी इन्हीं माध्यमों पर होती है.

कपिल सिब्बल ने कहा है कि इन मंचों पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली सामग्री से वे चिंतित हैं. एक मंत्री के नाते उनका यह दायित्व समझ में आता है कि उन्हें अगर कहीं ऐसा कुछ नज़र आए जो देश की कानून व्यवस्था को आहत करने वाला हो तो वे उसके बारे में फिक्रमंद हों. लेकिन क्या बात वाकई यही है? या यह भी है कि पिछले कुछ समय से इन माध्यमों पर सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार गिरता नज़र आ रहा है और वे इससे चिंतित हैं. ऊपर मैंने न्यूयॉर्क टाइम्स की जिस रिपोर्ट का हवाला दिया है उसमें तो यह भी कहा गया है कि सिब्बल ने फेसबुक के अधिकारियों को एक ऐसा पृष्ठ दिखाया था जिसमें श्रीमती सोनिया गांधी के बारे में कुछ अप्रिय था. कॉग्रेस की जो कल्चर है उसमें यह बात तुरंत स्वीकार्य लगती है. सत्तारूढ़ दल भला देश के इस अति विशिष्ट परिवार के बारे में कुछ भी अप्रिय कैसे सहन कर सकता है? और अगर उस अप्रिय के बहाने इस दल के किन्हीं सदस्यों को परिवार के प्रति अपनी वफादारी प्रदर्शित करने का मौका मिलता है तो भला वे इस मौके को हाथ से कैसे जाने दे सकते हैं?

लेकिन आम जनता को तो इन सबसे कोई लेना-देना नहीं है. हमें तो अपनी आज़ादी प्यारी है. हम तो खुलकर अपनी बात कहना चाहते हैं! हम क्यों किसी को इस आज़ादी को छीनने की छूट दें? कपिल सिब्बल और सरकार के इरादों के तीव्र विरोध के पीछे यही बात है.

अगर इस विरोध की बात को थोड़ी देर के लिए अलग रखें तो सरकार के इस इरादे की हास्यास्पदता भी सामने आए बगैर नहीं रहती है. आप मुद्रित शब्द को तो जैसे-तैसे सेंसर कर सकते हैं, हालांकि वो भी इतना आसान नहीं होगा, इन नए माध्यमों को आप कैसे सेंसर करेंगे? यू ट्यूब पर हर रोज़ करीब 25 करोड़ तस्वीरें अपलोड होती हैं. माना जाता है कि भारत में 8 करोड़ लोग फेसबुक और ट्विट्टर का इस्तेमाल करते हैं. क्या कर लेंगे आप इन सबका? ज़्यादा से ज्यादा यही करेंगे ना कि अगर आपके ध्यान में ऐसा कुछ आया जो आपको पसंद नहीं है तो इन कम्पनियों से उसे हटाने का अनुरोध करेंगे. वैसे में, एक तो यह ज़रूरी नहीं कि आपका अनुरोध मान ही लिया जाए, और दूसरे यह कि उस तरह की सामग्री को आप एक जगह से हटवा भी देंगे तो वो चार और जगहों पर चस्पां हो जाएगी. यानि कुल मिलाकर आप अपनी खिसियाहट ज़ाहिर करने से ज़्यादा कुछ खास नहीं कर सकेंगे. मैं तो चाहूंगा कि हमारी सरकार अपना यह बचकाना इरादा छोड़ दे और जनता को अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का खुलकर इस्तेमाल करने दे. एक स्वस्थ और विकासशील प्रजातंत्र में यही अपेक्षित है. अगर वाकई कहीं कुछ अवांछनीय आता भी है तो इन माध्यमों पर नियंत्रण करके अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को बाधित करने की कोशिश करने की बजाय उसे नज़रन्दाज़ करना बेहतर होगा. और, अगर सरकार को कुछ कहना है तो वो भी इन मंचों का इस्तेमाल करे. इससे शायद उसकी विश्वसनीयता में भी कुछ वृद्धि होगी.

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जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ में दिनांक 10 दिसम्बर 2011 को प्रकाशित टिप्पणी.

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Sunday, July 24, 2011

बाज़ार: क्या यही है सारी बुराइयों की जड़?

हाल ही में मेरे एक सुधी अति संवेदनशील और बहु पठित मित्र ने अपना एक नया लेख मुझे मेरी प्रतिक्रिया जानने के लिए भेजा. हम मित्रों के बीच यह एक सामान्य बात है कि अपने लिखे को प्रकाशनपूर्व अपने मित्रों को पढ़वा कर उनकी प्रतिक्रिया जान लें और यदि आवश्यक हो अपने लिखे में सुधार भी कर लें. मैं भी अक्सर ऐसा ही करता हूं. उस लेख का लब्बो-लुआब यह था कि आज बाज़ार का बहुत अधिक विस्तार हो गया है और वर्तमान की अधिकांश सामाजिक तथा नैतिक विकृतियों के मूल में बाज़ार का यह विस्तार ही है. बाज़ार के विस्तार को उन्होंने बहुत सारे उदाहरण देकर स्थापित किया था.

उस लेख को पढ़कर मैं गहरे सोच में पड़ गया हूं. सोच रहा हूं क्या बाज़ार का विस्तार हमारे अपने ही समय में हुआ है? क्या पहले बाज़ार नहीं था? या अगर था तो तब उसका कोई फैलाव नहीं हो रहा था? और अगर हो रहा था तो क्या बीते हुए कल में उस फैलाव की वजह से कोई संकट नहीं आ रहे थे, और अगर आ रहे थे तो क्या अब वे संकट बहुत ज्यादा गहरा गए हैं? मुझे अनायास ही याद आया कि हमारे कबीरदास भी बाज़ार में ही लुकाठी हाथ में लिए खड़े थे. ग़ालिब भी आश्वस्त थे कि बाज़ार खुला हुआ है और अगर ज़रूरत पड़ी तो वे जाकर दिलो-जां और ले आएंगे. के एल सहगल ने अगर यह गाया था कि ‘बाज़ार से गुज़रा हूं ख़रीददार नहीं हूं’ तो जिस शायर ने यह लिखा था वह अगर उनसे पहले का नहीं तो उनका समकालीन तो रहा ही होगा. जैनेंद्र कुमार का एक बहुत बेहतरीन लेख ‘बाज़ार दर्शन’ मैं अपने अध्यापन काल के शुरुआती दिनों में पढ़ाता रहा हूं. अब तो मैं रिटायर भी हो चुका हूं. यानि वह लेख भी पचासेक बरस पुराना तो होगा ही. आप कोई नाराज़ प्रतिक्रिया दें उससे पहले ही मैं स्वयं यह कह दूं कि मैं भी इस बात से भली-भांति परिचित हूं कि कबीर या गालिब जिस बाज़ार की बात कर रहे थे वह बाज़ार निश्चय ही आज के बाज़ार का सटीक पर्याय नहीं था. लेकिन फिर भी, यह आप भी स्वीकार करेंगे कबीर अगर बाज़ार में लुकाठी हाथ में लिए खड़े होने की घोषणा कर रहे थे तो वह बाज़ार कोई ऐसी जगह ही होगी जहां खरीद फरोख्त होती होगी. ग़ालिब के बाज़ार को लेकर तो कोई संशय हो ही नहीं सकता. कहने का अभिप्राय यह बाज़ार कोई हाल ही में आई मुसीबत नहीं है, अगर वो मुसीबत है भी तो. चीज़ें पहले भी बेची खरीदी जाती रही हैं. हमारी जो वर्ण व्यवस्था है उसमें वैश्य समुदाय अंतत: व्यापार ही तो करता था, और व्यापार निश्चय ही बाज़ार में होता होगा. हां, कभी उस बाज़ार में मुद्रा का चलन नहीं रहा होगा, चीज़ों का आदान-प्रदान होता रहा होगा. लेकिन चीज़ें बनती भी होंगी, और प्रयोग में भी आती होंगी – इस बात को लेकर कोई संशय नहीं हो सकता.

लेकिन इधर हाल ही में लेखकों में और वो भी खास तौर पर हिंदी के लेखकों में बाज़ार को लेकर रोना-धोना करने का एक खास प्रचलन हुआ है. बाज़ार की इतनी बुराइयां की गई हैं और बाज़ारवाद को इतनी बार कोसा गया है कि अब किसी के मन में इनके प्रति कोई सद्भावना रह ही नहीं गई है. हमने मान लिया है कि बाज़ार नाम की यह मुसीबत जो हाल ही में आई है, असल में सारी बुराइयों की जड़ है. यानि अगर बाज़ार खत्म हो जाए तो सब कुछ भला-भला और साफ सुथरा हो जाएगा. कहना अनावश्यक है कि मेरे उक्त मित्र का लहज़ा भी कुछ इसी तरह का था और है.

अगर मैं पिछले पचास साठ बरसों में आए बदलाव पर एक नज़र डालूं और कुछ अपने अनुभवों को स्मरण करूं तो शायद कोई तस्वीर बने. मैं 1967 में कॉलेज लेक्चरर बना था. उस ज़माने में सारे लेक्चरर, और करीब-करीब सारे ही प्रिंसिपल, एकाध अपवाद को छोड़कर साइकिलों पर कॉलेज आते थे. किसी के पास कार या टेलीफोन का होना बहुत बड़ी बात थी. मुझे अब भी याद है कि उस ज़माने में भारतीय बाज़ार में शेविंग के लिए कोई ठीक-ठाक सी ब्लेड भी नहीं मिलती थी. धीरे-धीरे समय बदला. और आज, उस समय के लगभग 45 बरस बाद, कॉलेजों में, एकाध अपवाद को छोड़कर अधिकांश प्राध्यापक कार में आते हैं. और प्राध्यापक ही क्यों बहुत सारे विद्यार्थी भी चमचमाती कारों में आते हैं. हमारे बाज़ार हर तरह के सामान से पटे पड़े हैं. दुनिया के तमाम ब्राण्डों का सामान भारतीय बाज़ारों में सुलभ है. अब किसी विदेश जाने वाले को वहां से कुछ लाने की जरूरत नहीं रह गई है. सब कुछ भारतीय बाज़ारों में आसानी से उपलब्ध है. न केवल सामान उपलब्ध है, सेवाओं की सुलभता में भी अद्भुत विस्तार और विकास हुआ है. पिछले दिनों मुझे दो दफा अस्पताल का मुंह देखना पड़ा और मैंने पाया कि हमारे निजी अस्पतालों में सही मानों में विश्व स्तरीय सेवाएं उपलब्ध हैं. यही हाल शिक्षण संस्थाओं का भी है. यही हाल आतिथ्य उद्योग का भी है. यही हाल मनोरंजन की दुनिया का भी है. और इन सबके साथ-साथ सरकारी सेवाएं भी हैं जो अपेक्षाकृत सस्ती हैं, लेकिन स्वाभाविक रूप से इतनी उत्कृष्ट और विश्वसनीय नहीं हैं. तो स्वाभाविक ही है कि जिनके पास साधन और सुविधा है वे इन महंगी निजी सेवाओं की तरफ बढ रहे हैं.

बाज़ार में यह सब हो रहा है. और इसके प्रोत्साहन तथा संवर्धन के लिए विज्ञापन भी खूब हो रहे हैं. मीडिया का विस्तार हुआ है और वह विस्तृत मीडिया इस बाज़ार की भी सेवा जम कर कर रहा है. मीडिया हमें न केवल नए उत्पादों और सेवाओं का परिचय देता है, वह हमारे मन में उनके प्रति लालसा भी जगाता है. यह काम प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरहों से होता है. बाज़ार और मीडिया मिलकर बहुत सारे लोगों को रोज़गार दे रहे है. आखिर जब सामान बनता और बिकता है तो लोगों को काम तो मिलता ही है. इतना ज़रूर है कि मीडिया अपने हितों की साधना करते हुए कृत्रिम आवश्यकता भी पैदा करता है और लोगों को वस्तु प्रेमी भी बनाता है. आपको जिस चीज़ की ज़रूरत नहीं है, विज्ञापन आपको उस चीज़ के लिए भी लालायित करते हैं. मीडिया आज सामान ही नहीं जीवन-शैली भी बेच रहा है. जो कच्चे मन के हैं वे इससे अधिक प्रभावित होते हैं और जिनके मन दृढ़ हैं उन पर इन चीज़ों का बहुत कम या शून्य असर होता है. लेकिन इस बुराई को अगर थोड़ी देर के लिए एक तरफ कर दें तो बाज़ार का विकास देश की अर्थ व्यवस्था के लिए सहायक दिखाई देता है. आज अगर देश में पहले से बेहतर आर्थिक हालात दिखाई दे रहे हैं तो उनका काफी श्रेय बाज़ार के इस विकास को भी दिया जाना चाहिए.

यह सही है कि देश में जो आर्थिक विकास हो रहा है वह संतुलित नहीं है. एक बहुत बड़ा तबका है जो अभी भी गरीबी की रेखा के नीचे जीवन बसर करने को विवश है. लेकिन उस तबके की बदहाली के लिए बाज़ार नहीं, दोषपूर्ण सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं, यह बात भी समझी जानी चाहिए. सरकारी सेवाओं का निम्न स्तरीय होना इस तबके के जीवन त्रासों को और सघन करता है. और यहीं एक बात और कहना चाहूंगा. पिछले कुछ बरसों में हमारे देश में सरकारी नौकरियों में बहुत कमी हुई है. जैसे-जैसे विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण बढ़ा है, यह होना स्वाभाविक भी था. लेकिन सरकारी नौकरियों में आई कमी को प्राय: बढती बेरोजगारी के रूप में प्रक्षेपित कर दिया जाता है. कहा जाता है कि देखो इतने सारे लोग बी ए, एम ए पास हैं लेकिन सरकार इन्हें नौकरी नहीं दे पा रही है. निश्चय ही अब उस आसानी से सरकारी नौकरियां नहीं मिलती हैं जिस आसानी से कुछ बरसों पहले मिल जाती थीं. लेकिन सरकारी नौकरियां न मिलने का अर्थ बेरोजगारी का बढ़ जाना मान लेना भी उचित नहीं है. हमारे यहां अनेक कारणों से लोगों के मन में सरकारी नौकरी के प्रति एक खास तरह का मोह रहा है. और उसी मोह के चलते वे कम वेतन पर भी सरकारी नौकरी करने को प्राथमिकता देते हैं. सरकारी नौकरी एक निश्चित उम्र तक रोज़गार की गारण्टी दे देती है. आप काम करें न करें, आपको कोई निकाल नहीं सकता. सरकारी नौकरी में, जो चाहें उनके लिए, भ्रष्टाचार की भी काफी गुंजाइश होती है, सरकारी नौकरी, चाहे वह चपरासी की ही क्यों न हो आपको एक अधिकार बोध देती है, वगैरह. इनके विपरीत निजी क्षेत्र आपसे जी तोड़ काम करवाता है और जैसा प्राय: कहा जाता है, आपका तथाकथित शोषण भी करता है. वहां अगर आपकी ड्यूटी सुबह से शाम तक की है तो आपको ड्यूटी बजानी ही है. जो काम करते हैं वे ही वहां टिक पाते हैं, शेष को दरवाज़ा दिखाने में कोई संकोच नहीं किया जाता. हमारी अब तक बनी हुई मानसिकता को यह बात ज़रा कम ही रास आती है. इसलिए हम निजी क्षेत्र के रोज़गार को तो रोज़गार ही नहीं मानते, और सरकारी नौकरियों के कम होते जाने का ही रोना रोते रहते हैं.

एक और बात यह है कि हमारी मुख्यधारा की जो शिक्षा है, वह नाममात्र की शिक्षा है. आप बी ए, एम ए कर लेते हैं लेकिन आप में किसी भी किस्म की दक्षता नहीं होती है. आप एक सामान्य अर्जी नहीं लिख सकते, आप पोस्ट ऑफिस में जाकर मनी ऑर्डर फॉर्म नहीं भर सकते, आप बिजली का फ्यूज नहीं बदल सकते, आप किसी विषय पर दो मिनिट सलीके से अपनी बात नहीं कह सकते, लेकिन इसके बावज़ूद आप एम ए पास होते हैं. अब सोचिये कि इस तरह के एम ए पास को कोई क्यों अपने यहां काम पर रखे? असल में पास बुक्स पढ़कर, पांच सवालों के जवाब रट कर और उन्हें जैसे तैसे उत्तर पुस्तिका के पन्नों पर उगल कर जो बहुत बड़ी फौज स्नातक या अधिस्नातक बन रही है, उसकी दारुण हकीकत यही है. इस फौज के विपरीत ऐसे भी युवा हैं जिनके पास बी ए, एम ए की डिग्री तो नहीं है लेकिन उनके पास कोई न कोई दक्षता है. वह दक्षता कपड़ों पर प्रैस करने की हो सकती है, कम्प्यूटर पर टंकण की हो सकती है, इंजेक्शन लगाने की हो सकती है, गाड़ी चलाने की हो सकती है, खाना बनाने की हो सकती है, या ऐसी ही कोई और दक्षता हो सकती है. इनके लिए रोज़गार की कमी नहीं है. ये लोग बड़े मज़े में काम करते हैं और पैसा कमाते हैं. हम पाते हैं कि तमाम शिक्षा के बावज़ूद ऐसे युवा बहुत कम हैं जो कम्प्यूटर पर ठीक से टाइप कर सकें. जो कर सकते हैं उनके पास काम का अम्बार लगा रहता है. और यही हालत और तमाम क्षेत्रों की भी है.

चलिये, फिर बाज़ार की तरफ लौटें. कभी-कभी मैं सोचता हूं कि जो मित्र बाज़ार को कोसते हैं, उन्हीं से पूछूं कि अगर किसी चमत्कार से बाज़ार को खत्म कर दिया जाए तो क्या होगा? उनसे पूछने का मन करता है कि वे अतीत के किस काल खण्ड में लौटना चाहेंगे? पाषाण युग में? या उसके थोड़ा बाद वाले कृषि युग में, या और भी बाद के किसी काल खण्ड में? चलिए हम बहुत पीछे नहीं लौटते हैं और दो-एक सौ साल पहले के ज़माने में लौट जाते हैं. बाज़ार में बहुत कम उत्पाद हैं और हमारी जरूरतें भी बहुत सीमित हैं. न कार है न स्कूटर, न फोन हैं न मोबाइल, न टीवी है न सिनेमा. न फ्रिज हैं न ए सी. सादा जीवन उच्च विचार! पहली बात तो यह कि क्या इस तरह घड़ी की सुइयों को पीछे लौटा ले जाना मुमकिन होगा? क्या दुनिया के किसी भी देश में आज यह स्थिति है? और दूसरी बात, क्या ऐसा करना उचित होगा? आप कहेंगे कि यह तो अतिवादी नज़रिया है. जी हां. मैं भी इस बात को मानता हूं. और यह भी मानता हूं कि इस तरह का अतिवादी नज़रिया उचित नहीं होता.

और इसीलिए, अपनी बात को समेटता हुआ यही कहना चाहूंगा कि बाज़ार को दोष देना उचित नहीं है. बाज़ार है और रहेगा, बल्कि रहना चाहिए. यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस हद तक उसके बुरे प्रभावों से खुद को बचाए रख सकते हैं.
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दैनिक नवज्योति में दिनांक 24 जुलाई को प्रकाशित आलेख.



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Wednesday, July 13, 2011

क्या यात्रा भीरु है हमारा हिंदी समाज?

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल से डॉ पल्लव की बातचीत


पल्ल्व: हिंदी में शुरुआत में ही घुमक्कड़ शास्त्र (राहुल सांकृत्यायन) जैसी किताब, और उससे भी पहले हमारी परंपरा की जड़ में रामायण (राम का अयन. अयन का अर्थ भ्रमण भी है) होने के बावज़ूद क्या कारण हैं कि हिंदी में यात्राओं पर लिखने की कोई बड़ी परंपरा नहीं मिलती.
दुर्गाप्रसाद: तुमने तो शुरू में ही मुझे उलझन में डाल दिया है. आम तौर पर कहा-माना जाता है कि हमारे देश में पर्यटन, देशाटन -चाहे जो भी नाम उसे दे लो- की बड़ी अच्छी परंपरा रही है. चार धाम वाली परिकल्पना को इस संदर्भ में अक्सर स्मरण किया जाता है. लेकिन मुझे यह लगता है कि हमारा समाज एक यात्रा-भीरु समाज रहा है. अब यही बात देख लो ना कि दूर-दूर के देशों से न जाने कितने विदेशी भारत आए और उन्होंने यहां की अनजानी जगहों को देखा और उनके बारे में लिखा. फाह्यान, ह्वेनसांग, इब्न बतूता, अल बरूनी, बर्नियर, मार्कोपोलो – ये नाम तो तुरंत ही याद आ रहे हैं. लेकिन मुझे एक भी ऐसा भारतीय याद नहीं आता है जो किसी पराये देश में गया हो, उसने वहां की पड़ताल की हो और उसके बारे में कोई वृत्तांत लिखा हो. पराये देश में भी, और अपने देश में भी. ऐसा बिना किसी वजह के तो नहीं रहा होगा ना. तो, इस बात के कारण भी हैं. मसलन हमारी खान-पान की आदतें और संस्कार. हरेक का खान-पान दूसरे से इतना अलग कि पूछिये मत, और अनेकानेक वर्जनाएं. यह भी कि मैं उसके हाथ का खाना नहीं खाता, और अगर मैं उसके हाथ का बना खाना खा भी लेता हूं तो वह मेरे हाथ का बना खाना नहीं खाता. शुद्धता और पवित्रता को लेकर अलग ही किस्म के आग्रह.

अब तुम्हारे प्रश्न पर आता हूं. देखो, एक तो मुझे लगता है कि हमारा साहित्य परिदृश्य कविता से अत्यधिक आतंकित रहा है. साहित्य का मतलब ही एक तरह से कविता रहा. जिसे साहित्य में दिलचस्पी होती है, वह फौरन कविता लिखना शुरू कर देता है. अगर कविता नहीं तो कहानी, और उससे थोड़ा आगे बढे तो उपन्यास. बहुत हुआ तो नाटक. बात खत्म. अन्य विधाओं को तो हाशिये तक भी नहीं पहुंचने दिया गया. ऐसा किसने किया? तो मैं कहूंगा कि साहित्य के अध्यापकों ने यह गड़बड़झाला किया. साहित्य के संस्कार तो वे ही बनाते हैं ना. तो उन्होंने यह स्थापित कर दिया (चाहे अनचाहे ही सही) कि साहित्य का मतलब कविता कहानी उपन्यास नाटक है, बस. तो जिन्हें लिखना था वे इसी तरफ चल पड़े.

दूसरी बात यह हुई कि हमारी आलोचना भी मुख्यत: इन्हीं विधाओं के इर्द- गिर्द घूमती रही. परिणाम यह हुआ कि इतर विधाओं में जो कुछ भी, जितना भी और जैसा भी लिखा गया, उस पर लोगों का ध्यान ही नहीं गया. आलोचना का एक काम ‘प्रकाश डालना’ भी तो है. इतर विधाएं आलोचना के इस प्रकाश से वंचित ही रहीं. अब यात्रा साहित्य की ही बात लो. अभी कुछ समय पहले समकालीन सृजन का यात्राओं का ज़िक्र शीर्षक से जो विशेषांक आया था, उसमें परिशिष्ट के रूप में हिंदी में प्रकाशित यात्रा विषयक पुस्तकों की एक सूची भी दी गई थी. हममें से शायद ही किसी को पता हो कि हिंदी में इतनी पुस्तकें इस विधा में आ चुकी हैं. और स्वाभाविक ही है कि कोई भी सूची पूर्ण नहीं हो सकती. तो, जितनी बड़ी वह सूची है, वास्तव में तो पुस्तकों की संख्या उससे अधिक ही है. तो, मैं कहना यह चाहता हूं कि हिंदी में यात्रा साहित्य की स्थिति उतनी दयनीय नहीं है, जितनी का रोना रोया जाता है. असल में पल्लव मैं हिंदी में एक खास बीमारी यह देखता हूं कि अगर एक बार कोई एक बयान जारी कर देता है तो फिर शेष लोग उसी बयान को दुहराते तिहराते रहते हैं, बिना उसकी सत्यता की पड़ताल किए. ऐसे अनेक उदाहरण तुम्हें भी ज्ञात हैं ही.

पल्लव: मैं तो अगला सवाल आपसे यही पूछना चाहता था कि क्या हिंदी समाज यात्रा भीरु है? आपने जिन बातों की तरफ संकेत किया उनमें से अधिकतर गुज़रे ज़माने की बातें हैं. अब जबकि काफी कुछ बदल चुका है तब भी यात्राओं का न होना और यात्रा लेखन का कम होना किस तरफ इंगित करता है?
दुर्गाप्रसाद: देखो पल्लव, जैसा मैंने अभी कहा, यह सही है कि हिंदी समाज यात्रा भीरु समाज है और इसके अपने कारण हैं, जिनकी तरफ थोड़ा-सा संकेत मैंने अभी किया है. अगर हम अपने एक दूसरे के हाथ का छुआ न खाने की और खान-पान विषयक वर्जनाओं की बात करें तो निश्चय ही काफी कुछ बदला है. लोगों के आपसी संपर्क बढे हैं और उनके व्यवहार में पहले की तुलना में अधिक उदारता का समावेश हुआ है. इसके बहुत सारे कारण हैं, जिन पर अलग से कभी बात हो सकती है, अभी करने लगेंगे तो विषयांतर हो जाएगा. लेकिन एक और बात, जिसका ताल्लुक हमारे वर्तमान से है, अभी की जानी ज़रूरी है. मुझे लगता है कि हिंदी का हमारा जो आम लेखक है (अपवादों की बात छोड़ दो) वह जिस मध्यवर्ग, बल्कि निम्न मध्यवर्ग से ताल्लुक रखता है, उस वर्ग के लिए यात्रा अब भी एक बड़ी और लगभग अलभ्य विलासिता है. उसके अपने रोजी-रोटी के संकट ही उसे सांस लेने की फुरसत नहीं देते. बेचारा यात्रा की कहां से सोचेगा? हम-तुम जो थोड़ी ठीक-ठाक और सुरक्षित स्थिति में हैं, हमीं कितनी यात्राएं कर पाते हैं? यात्राएं शायद हमारी प्राथमिकता में भी नहीं हैं. अगर होतीं तो हम जैसे-तैसे उनके लिए समय और साधन भी निकालते. यह लगभग उसी तरह की बात है जिस तरह की यह कि हिंदी पट्टी में किताब लोगों की प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे है. दूसरी बात यह कि सारी बातों के बावज़ूद हमारे यहां यात्रा आनंद का नहीं असुविधा का पर्याय है. वह हिंदी-उर्दूका सफ़र न होकर अंग्रेज़ी का सफर (Suffer) है. हां, अगर आप पंच सितारा यात्री हों या उच्च सरकारी अफसर हों तो बात अलग है. लेकिन वे लोग भला लिखेंगे क्यों? यात्रा के साधनों की अस्त व्यस्तता, बसों रेलों की भीड़-भाड़, आरक्षण का नहीं मिलना, और मध्यवर्ग अफोर्ड कर सके ऐसी दरों पर रहने खाने की साफ सुथरी सुविधाओं का अभाव, ये भी हिंदी समाज के लिए यात्राओं को बाधित करने वाले तत्व हैं. लेकिन, इसके विरुद्ध तुम यह भी कह सकते हो कि यात्रा का अर्थ किसी पर्वतीय पर्यटन स्थल या दूरस्थ प्रदेश की यात्रा ही तो नहीं होता. घर से पांच मील दूर की किसी जगह का भी तो यात्रा वृत्तांत हो सकता है. तो यहां बीच में आता है हमारा प्रकाशन तंत्र. अगर आप अपने घर से पांच मील दूर की किसी जगह की यात्रा पर जाकर वहां का वृत्तांत लिखें तो उसे छापेगा कौन? न कोई पत्रिका छापेगी न कोई प्रकाशक छापेगा. हरेक ही अमृत लाल वेगड़ तो नहीं होता ना. तो बताइये, लेखक किसके लिए लिखेगा? हमारे यहां तो धारणा ही बन गई है कि जहां का वृत्तांत हो वह जगह बड़े नाम वाली होनी चाहिए. शिमला, हिमालय, पेरिस कुछ तो हो. यह क्या बात हुई कि आप साइकिल उठा कर घूम आये. और इसी क्रम में एक और बात यह कि भारतीय मन इतिहास और आत्म प्रक्षेपण में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रखता. इसलिए अगर एक भारतीय यात्रा कर भी लेता है तो उसका वृत्तांत लिखने में उसकी कोई खास रुचि नहीं होती.

तो, बहुत सारी बातें मिलाकर एक परिदृश्य रचती हैं. लेकिन इसके बावज़ूद काफी लिखा गया है, यह बात मैं ज़ोर देकर कहना चाहूंगा. और इसके लिए हमें उन तमाम लेखकों का आभारी होना चाहिए जिन्होंने न केवल सारी असुविधाएं उठाकर यात्राएं कीं, उनके बारे में लिखा भी, बावज़ूद इस बात के कि यह विधा मुख्यधारा की विधा नहीं थी.

पल्लव: यात्रा संस्मरणों के कई नाम हैं... यात्रा आख्यान, यात्रा चित्र, यात्रा वर्णन, यात्रा संस्मरण इत्यादि. अरुण प्रकाश लिखते हैं कि यात्रा आख्यान कहने से आत्मपरकता और वस्तुपरकता का मेल हो जाता है. आप क्या ठीक समझते हैं?
दुर्गाप्रसाद: देखो पल्लव, मैं तो पुरानी पीढ़ी से ताल्लुक रखता हूं, इसलिए नाम भी मुझे पुराना ही पसंद आएगा. यात्रा संस्मरण - इस नाम से मुझे तो कोई दिक्कत नहीं है. इतने वर्षों में यह नाम प्रचलित हो चला है, तो इसे चलते रहने देना चाहिए. वैसे, हर लेखन की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं. कभी कोई अपनी यात्रा को लेकर आख्यान रचता है, तो कभी कोई चित्र उकेरने की कोशिश करता है. कभी कोई संस्मरणात्मक होता है तो कोई मात्र वर्णन करने में रुचि रखता है. इस तरह हर रचना का अपना एक नाम हो जाएगा. लेकिन जहां तक विधा के नामकरण का प्रश्न है, मुझे तो अभी भी यात्रा संस्मरण नाम ही उपयुक्त लगता है. मुझे नहीं लगता कि हर यात्रा वर्णन को यात्रा आख्यान कहना उचित होगा, जबकि यात्रा आख्यान को भी यात्रा वर्णन कह देने में कोई असंगति नहीं होगी.

पल्लव: आपने योजना बनाकर लिखा या आकस्मिक ही रहा यह लेखन?
दुर्गाप्रसाद: पूरी तरह से आकस्मिक था यह लेखन. तुम जानते ही हो कि मेरी ये यात्राएं पारिवारिक थीं. बेटी चारु के पास जाते रहे हैं हम लोग. और इन यात्राओं के साथ ऐसी कोई योजना दूर-दूर तक नहीं थी कि कुछ लिखना भी है. वैसे भी मैं बेहद आलसी हूं. रोज़ या योजना बनाकर नियमित रूप से लिखने वालों में से मैं नहीं हूं. लेकिन हो सकता है कि कहीं कोई छोटा-सा कीड़ा दिमाग में कुलबुला भी रहा हो. मुझे अपने जीवन में बहुत अधिक यात्राएं करने का अवसर नहीं मिला. ऐसे में जब अमरीका जाने का मौका मिला तो शायद लगा हो कि अपने अनुभवों को साझा करना चाहिए. कहीं मन में सतह के नीचे बहुत सारी यात्रा पुस्तकों की स्मृतियां भी रही होंगी. जब आप किसी को पढते हैं तो साथ ही साथ यह विचार भी चलता रहता है ना कि अगर मुझे ऐसा मौका मिलता तो मैं यह करता. तुम्हें याद होगा हमारे यहां बहुत सारे ऐसे लेख आदि हैं कि अगर मैं कामायनी लिखता, अगर मैं गोदान लिखता... तो हो सकता है कि कहीं मेरे मन में भी रहा हो कि अगर मुझे यात्रा करने का मौका मिलता तो मैं इस नज़र से देखता और यह भी लिखता. एक रोचक बात बताऊं. जब हम लोग पहली बार अमरीका जा रहे थे, तो उससे कुछ दिन पहले यहां जयपुर में एक मुद्रणालय में किसी काम से काफी देर बैठना पड़ा. वहां अमरीका यात्रा पर लिखी एक किताब पड़ी थी. शीर्षक था क्षितिज के उस पार. लेखिका थीं डॉ सुदेश बत्रा. राजस्थान विश्वविद्यालय की तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्षा. उनसे वैसे भी आत्मीयता है. वक्त काटने के लिए उस किताब को पढना शुरू किया तो खत्म करके ही दम लिया. बल्कि कहूं कि किताब ने ही अपने आप को पढ़वा लिया. बात खत्म हो गई. जब अमरीका पहुंच गए, तो वह किताब जैसे स्वत: उभर आई. यानि कहीं उस किताब ने भी प्रेरित किया कि मुझे भी कुछ लिखना चाहिए. यह तो हुई एक बात.

पल्लव: मेरी रुचि यह जानने में है कि ‘आंखन देखी’ ने कैसे आकार ग्रहण किया.
दुर्गाप्रसाद: हां, मैं उसी तरफ बढ़ रहा हूं. अब बताता हूं कि वास्तव में क्या हुआ. तुम्हें पता ही है कि हम लोग चारु की डिलीवरी के लिए अमरीका गए थे. यह जो अनुभव था, डिलीवरी से संबद्ध, अस्पताल का, चिकित्सा सुविधाओं का, अस्पताल कर्मियों के व्यवहार का, वहां रह रहे भारतीयों के पारस्परिक संबंधों का – इन सबने मुझे बहुत प्रभावित किया. और जाने कब ऐसा हुआ कि वह सारा अनुभव शब्द बद्ध हो गया. कोई योजना नहीं थी. चारु ने पूछा कि पापा क्या लिख रहे हो, तो उसे बताया, और उसने इसका ज़िक्र अपनी कुछ मित्रों से कर दिया. फिर एक दिन यह संयोग हुआ कि कुछेक परिवार इकट्ठे हुए तो मुझसे कहा गया कि मैं वह लेख पढ कर सुनाऊं. वाचन किया तो जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं वे बहुत उत्साहवर्धक थीं. एक मित्र ने कहा कि आपने जो लिखा है उसका एक पहलू यह भी है कि इसमें इस समाज के सकारात्मक पहलू को देखने-दिखाने की कोशिश की गई है, जबकि आम तौर पर भारत से जो आता है वह इस समाज की लानत-मलामत ही करता है. तो यह लेख अमरीकी समाज का दूसरा पहलू सामने लाता है. यह टिप्पणी मुझे महत्वपूर्ण लगी. महत्वपूर्ण इसलिए लगी कि क्या मैं वाकई अमरीकी समाज की तारीफ करना चाहता था? क्या मैं अमरीका का पक्षधर बन गया था? क्या मेरा राजनीतिक सोच बदल गया था? और यही वह बिंदु था जिसने मुझे प्रेरित किया कि मुझे इस समाज को खुले मन से देखना परखना चाहिए. लिखने की बात तब भी मन में कुछ ख़ास नहीं थी. लेकिन जब इस तरह चीज़ों को देखने लगा, तो लिखता भी गया. और इस तरह एक पूरी किताब बन गई. लेकिन अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि पारंपरिक अर्थ में तो मेरी किताब यात्रा संस्मरण, यात्रा आख्यान या यात्रा वृत्तांत नहीं है. लेकिन क्योंकि इसका संबंध यात्रा से है, इसलिए मैंने भी इसे यात्रा वर्णन मान लिया है.

पल्लव: मूलत: आलोचक होने के कारण क्या किस्सागोई में असुविधा नहीं रही? क्या यही कारण मानना चाहिए कि आपने छोटे-छोटे प्रसंग लिखे, न कि लंबे और धारावाहिक.
दुर्गाप्रसाद: मैंने जो लिखा उसमें विस्तार नहीं है, इस बात को मैं स्वीकार करता हूं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि मेरे आलोचक होने से इस बात का कोई सम्बन्ध है. असल में बात यह है कि विस्तार मेरे स्वभाव में ही नहीं है. जो कहना है सीधे-सीधे कह दो. क्यों व्यर्थ में लंबी भूमिका बनाई जाए? जो लोग बात को विस्तार देते हैं, उनसे मुझे ईर्ष्या नहीं चिढ़ होती है. मन ही मन कहता हूं कि इसे इतना लंबा खींचने की कहां ज़रूरत थी? आप मुझे बोलने को कहेंगे तो बिना किसी भूमिका के अपनी बात कहकर बैठ जाऊंगा. कहने को नहीं होगा तो खड़ा ही नहीं होऊंगा. लिखते वक़्त भी ऐसा ही होता है. मैं कोशिश करूं तो भी अनावश्यक विस्तार नहीं ला पाता. और यह इस बात के बावज़ूद कि मैं पूरी ज़िन्दगी अध्यापक रहा हूं जो इस बात के लिए कुख्यात हैं कि अगर उनके पास कहने को कुछ भी न हो तो भी वे 45 मिनिट तो बोलेंगे ही. तो, एक बात तो यह है.
दूसरी बात यह कि जहां तक इस किताब (शीघ्र प्रकाश्य ‘देस परदेश’ – पल्लव) का सवाल है, यहां संक्षेप के कारण दूसरे भी हैं.

पल्लव: वे दूसरे कारण क्या हैं?
दुर्गाप्रसाद: असल में अपनी दो यात्राओं के समय मैंने क्रमश: राजस्थान पत्रिका और डेली न्यूज़ के लिए लगभग नियमितता से वहां से स्तंभ लेखन किया था. राजस्थान पत्रिका में देस में निकला होगा चांद शीर्षक से और डेली न्यूज़ में हम तो हैं परदेस में शीर्षक से. जब आप कोई कॉलम लिखते हैं तो शब्द सीमा पहले से तै होती है. आपको उसके भीतर ही रहना होता है. अब इधर हमारी पत्रकारिता में एक और प्रवृत्ति तुम भी लक्षित कर रहे होगे. वहां चीज़ों का, मतलब पाठ्य सामग्री का, आकार निरंतर छोटा होता जा रहा है. अखबार चलाने वालों ने मान लिया है कि उनके पाठक अब लंबी चीज़ें नहीं पढते. तुम देखोगे कि संपादकीय टिप्पणियां भी छोटी होती जा रही हैं. सब कुछ छोटा, बहुत छोटा. तो शायद यही वजह रही होगी कि अपनी बाद वाली यात्राओं में जब मैं कॉलम लिख रहा था तो मुझसे कहा गया कि मैं एक ही कॉलम में दो-तीन मुद्दे उठाऊं. स्वाभाविक है कि मुझे बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहनी थी. मज़ाक में कहूं तो यह कि मुझे अपनी बात को कम शब्दों में कहने का एक और बहाना मिल गया. संक्षेप मेरे स्वभाव में है, लेकिन इतना अधिक संक्षेप बाह्य कारणों से ही हुआ.

पल्लव: अमरीका जैसे देश पर लिखते हुए आपके मन में संशय रहे, यह बात आपने आंखन देखी की भूमिका में लिखी है, और अभी भी कही. संशय इसलिए कि आप अमरीका के उजले पक्ष को देख-दिखा रहे थे. मेरा प्रश्न यह है कि आप वहां के अंधेरे पक्ष को भी तो देख सकते थे.
दुर्गाप्रसाद: तुम जानते ही हो, कि पिछले बरस मैं चौथी बार अमरीका जाकर आया हूं. पहली और दूसरी बार जब वहां गया था तो मुझे अच्छाई ज़्यादा नज़र आई थी, और वैसा ही मैंने लिखा भी. आंखन देखी की भूमिका में मैंने अपने एक विद्यार्थी की टिप्पणी का उल्लेख किया है, जिसने मुझ पर यह आरोप लगाया था कि आप तो चीज़ों के उजले पक्ष को ही देखते हैं, वह तुम्हें स्मरण होगा. इसे मेरी कमज़ोरी भी कह सकते हो. लेकिन, अगर मैं वहां के अंधेरे पक्ष को देखता और लिखता तो भी तुम या कोई और पूछ सकता था कि आप अमरीका का उजला पक्ष भी तो देख सकते थे? असल में वहां के बारे में लिखते समय हर वक़्त मेरे मन में अपना देश रहा है. वहां जो भी मुझे अच्छा लगा उसे मैंने कुछ इस विचार से लिख दिया कि काश हमारे यहां भी ऐसा ही हो. कुछ-कुछ प्रेरणा लेने जैसी बात. और मुझे यह देखकर खुशी हुई भी कि मैंने जो लिखा उसका कुछ असर भी हुआ. लेकिन अपनी तीसरी और चौथी यात्राओं में ऐसा नहीं हुआ है. इस किताब की कई टिप्पणियों में तुम वहां के जीवन के अंधेरे पक्षों को भी देखोगे.

तुम्हारे इस सवाल ने मुझे एक बार फिर से अपने लिखे के बारे में सोचने को प्रेरित किया है. और मैं पाता हूं कि लिखने से पहले मैंने यह तै नहीं किया था कि मुझे अच्छाइयों के बारे में लिखना है या बुराइयों के बारे में. मैं नहीं जानता कि वैसा करना, यानि पहले से तै करके लिखना, कितना उचित होता. लेकिन मैंने जो किया, उसके लिए लज्जित होने की, क्षमा प्रार्थी होने की कोई ज़रूरत मुझे अब भी नहीं लगती है. अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को बरक़रार रखते हुए, पूंजीवाद से पूरी तरह असहमत होते हुए और जहां भी प्रसंग आया इसे अभिव्यक्त करते हुए जैसा मुझे लगा, मैंने लिख दिया. वैसे, मुझे यह भी लगता है कि मैं ही नहीं, कोई भी अगर पहली बार वह सब देखेगा जो मैंने देखा, तो वह भी प्रशंसा ही करेगा.

पल्लव: आपको वहां के जीवन में ऐसा सबसे बड़ा क्या गुण नज़र आया जिसका हम भारतीयों में सर्वथा अभाव है?
दुर्गाप्रसाद: अगर मुझे एक ही गुण बताना हो तो मैं कहूंगा, दूसरों का खयाल रखने का भाव. वहां के आम नागरिक में भी मैंने यह बात लक्ष्य की कि वह हमेशा यह ध्यान रखता है कि उसके कारण किसी अन्य को कोई असुविधा न हो. अगर उसे ज़रा भी ऐसा लगता है कि उसके कारण आपको असुविधा हुई होगी तो वह आपसे अनिवार्यत: क्षमा याचना करेगा. मुझे एक प्रसंग याद आता है. सिएटल में जहां चारु का घर है, वह खासा सुनसान इलाका है. एक बात बताऊं. अमरीका में सुनसान इलाकों में रहना अधिक प्रतिष्ठा पूर्ण माना जाता है. तो एक दिन हमारे पड़ोस के घर में गैस लीकेज जैसा कुछ हो गया. एक अमरीकी परिवार रहता है उसमें. परिवार मतलब पति पत्नी, दो छोटे बच्चे और तीन कुत्ते. तो गैस लीकेज हुई तो स्मोक अलार्म बज गया और आनन-फानन में फायर ब्रिगेड की गाड़ियां आ गईं. कुछ ऐसा माहौल बन गया मानो कोई बहुत भयंकर दुर्घटना घट गई हो. यह व्यवहार वहां की व्यवस्था का अंग है. आपको मदद मांगनी, या उसकी याचना नहीं करनी पड़ती है, वह स्वत: और तुरंत सुलभ होती है. शोर सुनकर हम लोग भी घर से बाहर निकल आए. जैसे ही हम लोग बाहर आए, वे दोनों पति पत्नी आकर हमसे क्षमा याचना करने लगे कि उनके कारण हमें असुविधा हो रही है. अब यह बात मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगती है. वे और उनका घर संकट में है, लेकिन वे पहले हमसे क्षमा याचना आवश्यक समझते हैं. क्या आप अपने देश में इस तरह के व्यवहार की कोई कल्पना भी कर सकते हैं? कोई सार्वजनिक स्थान पर या अन्यत्र भी अपने मोबाइल पर उच्च स्वर में बात नहीं करता है, कोई आपका मार्ग अवरुद्ध नहीं करता है, कोई सफाई करके अपने घर का कचरा आपके घर के सामने नहीं खिसकाता है. अगर आप क्यू में खड़े हैं और बाद में आने वाले को संशय है तो बजाय बीच में घुस जाने के वह आपसे पूछता है कि क्या आप क्यू में हैं? आपकी निजता का हर व्यक्ति पूरा सम्मान करता है. अगर आप पैदल सड़क पार कर रहे हैं तो हर वाहन आपके सड़क पार कर लेने तक रुका रहता है. कहां तक गिनाऊं. और याद रखिये, ये सारे उदाहरण एक ही गुण के हैं, क्योंकि आपने मुझसे एक गुण के ही बारे में पूछा था. इसी सिलसिले में, जब बात निकल ही गई है तो एक ज़िक्र और कर दूं. सिएटल शहर में, जहां हमने अपने प्रवास का अधिकांश वक़्त बिताया, सार्वजनिक पुस्तकालयों की एक बहुत बड़ी चेन है. मेरे वहां के पुस्तकालय अनुभव पर आंखन देखी में एक पूरा लेख तुमने पढा ही है. जिन्होंने वह लेख नहीं पढ़ा है उन्हें यह बताता चलूं कि अमरीका में सार्वजनिक पुस्तकालय व्यवस्था बहुत उम्दा है. पुस्तकालय में न केवल पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं, बल्कि कैसेट, रिकॉर्ड्स, वीडियो कैसेट्स, सीडी, डीवीडी, सीडी रोम वगैरह भी होती हैं और इन सबको आप इश्यू करवा के घर ले जा सकते हैं. यह भी कि हमारे देश की तरह प्रति व्यक्ति एक या दो पुस्तकों की सीमा भी वहां नहीं है. आप चाहें तो एक साथ पचास चीज़ें इश्यू करवा कर ले जाएं. तो जिस शहर में हम लोग थे, वहां की लाइब्रेरी का मैं भी नियमित उपयोग करता था. उसमें हिंदी पुस्तकें, हिंदी पत्र पत्रिकाएं, हिंदी फिल्में और भारतीय संगीत भी विपुल मात्रा में था. एक बात जो मैंने लक्षित की, और जिसे बताने के लिए मैंने यह सब बताया, वह बहुत त्रासद है. मैंने पाया कि वहां सबसे ज्यादा बुरी हालत में हिंदी की किताबें, हिंदी की पत्रिकाएं और हिंदी फिल्मों की सीडी, डीवीडी वगैरह थीं. इसलिए कि जो लोग इन्हें ले जाते वे शायद इनकी कतई परवाह नहीं करते. किताब का पन्ना फट रहा है, पत्रिका पर सब्ज़ी के दाग लग रहे हैं और सीडी पर खरोंच पड़ रही है, तो हमारी बला से. कौन हमारे घर की संपत्ति है – इस भाव का जीता-जागता नमूना थी वह सारी सामग्री जिसका उपयोग हम भारतीय करते हैं. होने को तो यह भी हो सकता है कि कोई किताब या पत्रिका हमें थोड़ी फटी हुई मिले तो हम उसे दुरुस्त करके लौटायें. लेकिन नहीं. यह बात तो हमारे संस्कार में ही नहीं है ना. अब एक और गुण की चर्चा मैं अपनी तरफ से कर रहा हूं. मैंने पाया कि वहां हर नागरिक हर व्यवस्था का अक्षरश: पालन करता है. चाहे कोई देख रहा हो या न देख रहा हो. किसी क्रॉसिंग पर अगर ब्लिंक करती हुई लाल बत्ती है तो हर वाहन वहां रुक कर ही आगे बढ़ेगा. हो सकता है हमारे यहां तो अधिकतर ड्राइव करने वालों को ब्लिंक करती हुई लाल बत्ती का अर्थ ही पता न हो. मैंने कभी किसी को रेड लाइट जंप करते हुए, गलत तरफ से ओवरटेक करते हुए, गलत दिशा में ड्राइव करते हुए, सड़क पर कचरा फेंकते हुए नहीं देखा. सफाई के एक प्रसंग का तो मैंने ज़िक्र किया भी है. एक रात जब हम लोग किसी पार्टी में थे, मैंने देखा कि एक वृद्ध दंपती अपने कुत्ते को घुमाने निकले हैं. कुत्ते ने एक जगह, सड़क पर अपनी हाजत रफा की. उन लोगों ने अपने हाथ से वह गंदगी एक पोलीथिन में समेटी और उसको इसी निमित्त विशेष रूप से निर्धारित जगह पर डाला. क्या आप इस बात की भी कल्पना अपने देश में करेंगे? बहुत छोटे बच्चे अगर अपनी गली में भी साइकिल चलायेंगे तो हेलमेट लगा कर ही चलायेंगे. अब आप चाहें तो इन बातों के लिए बहुत कुछ कह सकते हैं, मसलन यह कि वहां दंड के प्रावधान बहुत कड़े हैं, या कि उन्हें आज़ाद हुए दो सौ बरस हो गए हैं और यह सब उनकी आदत में शुमार हो गया है वगैरह. जब भी मैंने अपने मित्रों से यहां इन मुद्दों पर बात की, मुझे ऐसे ही तर्क सुनने को मिले. लेकिन अभी तो मेरा कहना यह है कि हम इस विस्तार में नहीं जा रहे हैं कि वहां ऐसा क्यों है, और यहां क्यों नहीं है.

पल्लव: आपकी दृष्टि से इनके पीछे मूल बात क्या है?
दुर्गाप्रसाद: अगर कारण के मूल में जाना चाहें तो? क्या केवल दंड प्रावधान होने से ही इतना अंतर पड़ जाता है? दंड प्रावधान तो हमारे यहां भी हैं. लेकिन हमारा व्यवहार तो इस बात से तै होता है कि कोई देख रहा है या नहीं देख रहा है. अगर चौराहे पर ट्रैफिक का सिपाही न हो तो आप बतायें कितने लोग रेड लाइट होने पर अपनी गाड़ी रोकेंगे? आप कभी किसी चौराहे पर खड़े होकर देख लीजिये. किसी भी गंभीर से गंभीर गोष्ठी या कंसर्ट में लोग अपना मोबाइल स्विच ऑफ नहीं करेंगे. विधान सभाओं तक में तो हमारे माननीय विधायक गण अपने मोबाइल ऑफ नहीं करते और आए दिन आसन की अवमानना के लिए दंडित होते हैं. सिनेमा हॉल में लोग बिना दूसरों के रस भंग की फ़िक्र किए फुल वॉल्यूम में बतियाते मिल जायेंगे. गलत साइड से ओवरटेक करते हुए किसी को संकोच नहीं होगा. ड्राइव करते हुए मोबाइल बात करने में लोग शान समझते हैं. एक प्रसंग याद आता है. एक दिन हम कुछ मित्र गपशप कर रहे थे. एक पुलिस अधिकारी, एक प्रोफेसर और मैं. प्रोफेसर साहब बहुत गर्व से बोले कि जब तक इस शहर में वे पुलिस अधिकारी मित्र पदस्थापित हैं, वे कार ड्राइव करते हुए सीट बैल्ट नहीं लगाने वाले. “आखिर पुलिस अधिकारी मित्र होने का कुछ तो लाभ हो!” और इसी से मुझे यह बात भी याद हो आती है कि जब मैं एक कॉलेज में विश्वविद्यालय परीक्षा करवा रहा था को एक परिचित पुलिस अधिकारी का फोन आया कि उनकी साली परीक्षा दे रही है, मैं ‘ज़रा ध्यान रख लूं.’ ध्यान रख लेने का आशय समझाने की ज़रूरत नहीं है. मैंने बहुत मुश्क़िल से खुद को उन्हें यह अनुरोध करने से रोका कि मेरा साला आज रात एक घर में चोरी करेगा, वे भी ज़रा उसका ध्यान रख लें. आप देखते ही हैं कि सरकारी तंत्र कोई कार्यवाही करता है तो तुरंत ही उसके विरुद्ध सिफारिशें होती हैं और किए कराये पर पानी फिर जाता है. कहां तक गिनाऊं? चौराहे पर खड़ा सिपाही ट्रैफिक नियम के उल्लंघन के लिए आपका चालान करता है, आप अपने परिचित किसी पुलिस अधिकारी को फोन करते हैं, पुलिस अधिकारी उस सिपाही को फोन करता है, और उस बेचारे को आपको छोड़ देना पड़ता है. अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हम सब ये तमाशे रोज़ देखते हैं. होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे. अमरीका में ऐसा नहीं होता. अगर कोई व्यवस्था है तो हरेक उसका पालन करता है. यह मामूली बात नहीं है.

पल्लव: हिंदी में आपके पसंदीदा यात्रा आख्यान लेखक कौन हैं?
दुर्गाप्रसाद: यह तुम भी जानते हो कि मेरा उत्तर क्या होगा. शायद सभी का उत्तर एक-सा ही होगा. अज्ञेय, निर्मल वर्मा, कृष्णनाथ, मंगलेश डबराल और अमृत लाल वेगड़. ये नाम मैंने किसी क्रम में नहीं लिए हैं. वैसे यह सूची थोड़ी और लंबी हो सकती है. मैं राहुल सांकृत्यायन से शुरू कर सकता हूं, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, हरिवंश राय बच्चन, कुमुद, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी, मुज़्तबा हुसैन आदि के नाम ले सकता हूं. लेकिन हम यहां सूची तो बना नहीं रहे हैं ना, इसलिए यह मोह तो छोड़ना होगा. अगर मुझे मन से किसी एक किताब का नाम लेना हो तो मैं निर्मल वर्मा की ‘चीड़ों पर चांदनी’ का नाम लेना चाहूंगा. शायद मैं कॉलेज का विद्यार्थी था जब मैंने पहली बार यह किताब पढ़ी थी. देखो, एक तो उस समय तक हम दुनिया के देशों के बारे में अधिक नहीं जानते थे, दूसरे निर्मल जी की भाषा, जो आप पर जादू करती है. लेकिन महत्व इन दोनों बातों का नहीं है. यह बात मुझे काफी बाद में समझ आयी. असल में निर्मल जहां जाते हैं उन जगहों की आत्मा से साक्षात्कार करते और करवाते हैं. आप उन स्थानों को केवल देखते जानते नहीं, उन्हें महसूस करने लगते हैं. निर्मल जी की बाद में एक और किताब आई धुंध से उठती धुन . इस किताब में उन्होंने यात्रा वृत्तांत तो दिए ही, उसी के साथ भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नई तरह से देखने-दिखाने की चेष्टा भी की. निर्मल जी के नज़रिए की काफी आलोचना हुई है. लेकिन मुझे लगता है कि तमाम असहमतियों के बावज़ूद उनके दाय को खारिज तो नहीं किया जा सकता. यह माद्दा बहुत कम लेखकों में होता है. जितना मुझे इन किताबों ने प्रभावित किया, उतना ही प्रभावित मुझे एक दूसरी तरह के यात्रा वृत्तांत ने भी किया. मेरा इशारा अमृत लाल वेगड़ की किताब सौंदर्य की नदी नर्मदा की तरफ है. इस किताब के एक-एक शब्द से नर्मदा के प्रति वेगड़ जी का प्यार टपकता है. अद्भुत है यह किताब. और जब मैं वेगड़ जी के लेखन की बात करूं तो मुझे कृष्णनाथ जी याद न आ जाएं ऐसा कैसे हो सकता है. स्फीति में बरिश, लद्दाख राग विराग उनकी ऐसी किताबें हैं जो हिम प्रदेश की धार्मिक सांस्कृतिक विरासत को समझने में भी हमारी सहायता करती हैं. वैसे बहुत सारे लेखकों ने अपने-अपने वृत्तांतों में अपने कमाल दिखाये हैं. लेकिन उन सबकी बात फिर कभी.

पल्लव: आपकी इस किताब (आंखन देखी) पर राजस्थान साहित्य अकादमी का कन्हैया लाल सहल पुरस्कार मिलने पर कैसा लगा?
दुर्गाप्रसाद: बेझिझक कहूंगा, अच्छा लगा. मैं इतना महान नहीं हूं कि कहूं कि पुरस्कार का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है. मुझे लगता है कि मैंने जो लिखा वह किसी को पसंद आया, इस पर तो मुझे खुश होना ही चाहिए. लेकिन जितनी खुशी मुझे इस पुरस्कार से हुई, उतनी ही खुशी, बल्कि उससे भी ज़्यादा, मुझे पाठकों की प्रतिक्रियाओं से हुई. पाठकों की यानि ऐसे पाठकों की प्रतिक्रियाएं जिनका मुझसे कोई परिचय नहीं है. असल में इस किताब को मैंने नेट पर डाल दिया था. वहां से पूरी दुनिया में इसे डाउनलोड करके लोगों ने पढ़ा. दुनिया भर से लोगों ने मुझे अपनी प्रतिक्रियाएं भेजीं. जिनसे आपका कोई परिचय ही न हो, जब वे आपको अपनी प्रतिक्रिया भेजने का, सराहना करने का कष्ट करें तो खुशी होना स्वाभाविक ही है. लेकिन इसी स्वर में यह भी कहूंगा कि मुझे लगा कि मेरी मुद्रित किताब उतने पाठकों तक नहीं पहुंची जितनों तक इसे पहुंचना चाहिए था. हो सकता है इसमें मेरे प्रकाशक की भी सीमा हो.

पल्लव: क्या आप यात्रा वृत्तांत के शिल्प पर भी कुछ कहना चाहेंगे?
दुर्गाप्रसाद: हिंदी के दो अध्यापक (भले ही उनमें से एक भूतपूर्व ही क्यों न हो) बात करें और उसमें शास्त्रीय, बल्कि अध्यापकीय शैली का समावेश न हो तो फिर बात करने का मतलब ही क्या है? अगर अध्यापक की अब कुख्यात हो चली शैली में मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देना चाहूं तो मुझे भी काफी ज़ोर लगाना पड़ेगा, क्योंकि वह शैली मेरी भी है नहीं. लेकिन मैं वैसा उत्तर नहीं दूंगा. असल में बात यह है कि मुझे लगता है कि किसी भी विधा के लिए कोई एक शिल्प हो ही नहीं सकता. क्या गोदान, बाणभट्ट की आत्मकथा, राग दरबारी, मैला आंचल और कलिकथा का शिल्प एक है? इसी तरह कौन यह कहेगा कि रामचरितमानस, प्रियप्रवास और कामायनी का शिल्प एक है? मुझे तो हमेशा लगता है कि हर समर्थ रचना शिल्प के पुराने ढांचे को तोड़ कर अपने लिए एक नए शिल्प को गढ़ती है. ऐसे में यात्रा वृत्तांत के लिए किसी सामान्य शिल्प की बात करने का कोई अर्थ मुझे नहीं लगता.

पल्लव: बहुत बहुत धन्यवाद!
दुर्गाप्रसाद: धन्यवाद मेरी तरफ से भी. इसलिए कि इस बातचीत के बहाने मुझे भी काफी कुछ सोचने का अवसर मिला. एक बार फिर धन्यवाद.
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Monday, June 20, 2011

दान सिंह जी: स्मृति उस दोपहर की



कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई एक रचना रचनाकार के समस्त कृतित्व पर छा जाती है. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी से पहले ‘उसने कहा था’ याद आने लगती है और भगवतीचरण वर्मा से पहले ‘चित्रलेखा’. हरिवंश राय बच्चन से पहले ‘मधुशाला’ कानों में गूंजने लगती हैं तो भीमसेन जोशी से पहले ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ का ध्यान आने लगता है. और यह क़तई ज़रूरी नहीं कि जो एक रचना हमें बेसाख्ता याद आती है वह उस कृतिकार की श्रेष्ठतम रचना ही हो. लेकिन तमाम समझ के बावज़ूद ऐसा होता है. और ऐसा ही हुआ दान सिंह के साथ भी. अपनी तरह के अनूठे और खुद्दार इस संगीतकार ने बहुत सारी उम्दा धुनें बनाईं लेकिन फिल्म माई लव का मुकेश का गाया गाना ‘ज़िक्र होता है जब कयामत का/तेरे जलवों की बात होती है’ उनके नाम का पर्याय ही बन बैठा. निस्संदेह यह एक बेहतरीन कम्पोजीशन है लेकिन संगीत के पारखियों का ऐसा मानना है कि दान सिंह जी ने इससे बेहतर बहुत सारी धुनें बनाई हैं.

मेरे मन में भी दान सिंह ‘ज़िक्र होता है’ के अप्रतिम संगीतकार के रूप में ही स्थापित थे. जब जयपुर आ बसा और यह पता चला कि वे भी जयपुर में ही रहते हैं तो स्वाभाविक है कि उनसे मिलने और बतियाने की इच्छा मन में अंगड़ाई लेने लगी. लेकिन न तो कभी किसी आयोजन में उनके दर्शन हुए और न ही कभी किसी से यह पता चला कि वे कहां रहते हैं. ज़ाहिर है कि दान सिंह जी आज के बहुत सारे हाई प्रोफाइल और कुशल मीडिया प्रबंधक लोगों में से नहीं थे. यह बताने की ज़रूरत नहीं कि आजकल तो लोग बहुत सामान्य प्रतिभा के धनी होते हुए भी कुशल मीडिया प्रबंधन के दम पर अपनी महान छवि निर्मित करवा लेते हैं. उनसे मिलने का कोई जुगाड़ बैठा नहीं.

फिर यकायक एक दिन यह पता चला कि हमारे पत्रकार मित्र ईश मधु तलवार की उनसे गहरी आत्मीयता है, तो मैं बिना संकोच उनसे यह अनुरोध कर बैठा कि वे कभी मुझे भी दान सिंह जी से मिलवाएं. और फिर जल्दी ही यह संयोग बन भी गया. यह तै हुआ कि 1 नवंबर 2009 को दोपहर में मैं श्रमजीवी पत्रकार संघ के कार्यालय में पहुंच जाऊं वहीं से तलवार जी मुझे दान सिंह जी यहां ले जाएंगे. और तै कार्यक्रम के अनुसार उस दोपहर तलवार जी के साथ भाई फारूक आफरीदी, कवि ओमेंद्र और मैं दान सिंह जी के घर पहुंचे. फारूक़ साहब हमेशा की तरह अपने साजो-सामान से लैस थे. कुछ तैयारी मैं भी करके गया था उन विरल क्षणों को संजो लेने की. मेरे अलावा बाकी सभी मित्रों से दान सिंह जी पूर्व परिचित थे. तलवार जी के प्रति उनके मन में कितनी गहरी आत्मीयता थी, यह कुछ ही क्षणों में ज़ाहिर हो गया था.

हम लोग कोई योजनाब्द्ध इंटरव्यू का इरादा लेकर नहीं गए थे. बल्कि मेरे मन में तो बस इतनी-सी बात थी कि इस महान संगीतकार के सान्निध्य में कुछ क्षण बिताने का जो सौभाग्य मिला है उसका छक कर पान करना है. और आज जब दान सिंह जी स्मृति शेष हैं, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अपने सान्निध्य का रस-पान कराने में उन्होंने तनिक भी कृपणता नहीं बरती. आज जब उन क्षणों को मन में रिवाइण्ड करता हूं तो पाता हूं कि उनकी सबसे बड़ी महानता तो यही थी कि उन्होंने किसी भी तरह की महानता नहीं दर्शाई. अपने जीवन में बहुत सारे लेखकों-कलाकारों के साथ वक़्त गुज़ारने के जो अगणित मौके मुझे मिले हैं जब उन पर एक नज़र दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि बहुत ही कम लोग ऐसे थे जो अपनी तमाम उपलब्धियों के बावज़ूद इतने सहज थे जैसे कि उनकी कोई उपलब्धि ही ना हो. प्रसंगांतर के बावज़ूद कहना चाहूंगा कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब से मिलकर भी ऐसी ही प्रतीति हुई थी. कोई दो-एक घण्टे उनसे बातचीत करके जब विदा लेने लगा तो जाने क्यों खान साहब ने पूछ लिया कि ‘तुम सिगरेट पीते हो?’ उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि मुझसे झूठ नहीं बोला गया. खान साहब ने अपना विल्स का पैकेट मेरी तरफ बढ़ाते हुए आग्रह किया कि मैं भी एक सिगरेट पी लूं, और मैंने उनसे कहा कि मेरे संस्कार मुझे इस बात की अनुमति नहीं देते हैं कि अपने पिता तुल्य के सामने धूम्रपान करूं! खान साहब ने जो कहा, वह मेरे मन पर जैसे खुद चुका है. बोले, “बेटा! ले लो! हमारा हुक्म है. हम फिर कभी ऐसा नहीं कर पाएंगे.’ आज भी उनका वह बड़प्पन याद आता है तो मन ही मन नतशिर हो जाता हूं. लेकिन यहां तो बात मैं दान सिंह जी की कर रहा था. दान सिंह जी उस दोपहर हम चारों से ऐसी सहजता से बतिया रहे थे जैसे हमारी बरसों की पहचान हो. बातों के बीच उन्होंने अपना हारमोनियम भी मंगवा लिया था और बातें करते हुए मौज में आकर वे हमें अपने सृजन का प्रसाद भी देते जाते थे. उनकी जीवन संगिनी डॉ उमा याग़्निक जी भी इस गपशप में शरीक थीं. उस दोपहर हमने न जाने कितनी बातें कीं. संगीत की, संगीत की दुनिया के छल-प्रपंचों की, गायक-गायिकाओं की, फिल्मों की, मुंबई की और भी न जाने कहां-कहां की. उस दोपहर की वो लगभग पूरी बातचीत मैंने रिकॉर्ड कर रखी है. मुझे जो बात सबसे ज्यादा रेखांकनीय लगी वो यह कि दान सिंह जी में कहीं किसी के प्रति लेशमात्र भी नाराज़गी या कटुता का भाव नहीं था. जब उन्होंने यह प्रसंग सुनाया कि कैसे उनकी बनाई धुन पर किसी और ने गाना बनाकर मुकेश से गवा लिया, तो मुझे लगा कि जैसे वे अपनी बनाई हुई नहीं किसी और की बनाई धुन की बात कर रहे हैं. यह बहुत गैर मामूली बात है. मुझे आज भी इस बात को यादकर आश्चर्य होता है कि इतने प्रतिभाशाली होने के बावज़ूद संगीत की दुनिया की राजनीति की वजह से हाशिये पर डाल दिए गए दानसिंह जी के मन में इस बात को लेकर ज़रा भी मलाल नहीं था. वे अपने हाल में परम सुखी-संतुष्ट थे. अगर उस दोपहर उनके सान्निध्य में कुछ वक़्त न गुज़ारा होता और किसी और ने मुझसे उनके बारे में यह बात कही होती तो मैं विश्वास नहीं करता.

आज जब दान सिंह जी इस दुनिया में नहीं हैं, उनसे हुई सिर्फ इस एक मुलाक़ात के कारण मुझे लग रहा है कि मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा मुझसे ज़ुदा हो गया है और मैं अधूरा रह गया हूं. मन में बहुत सारी बातें घुमड़ रही हैं लेकिन अस्त-व्यस्त मन:स्थिति में उन्हें शब्द बद्ध नहीं कर पा रहा हूं. लेकिन बार-बार वह एक दोपहर मुझे याद आ रही है जो हमने दान सिंह जी के सान्निध्य में बिताई थी और उसी के साथ याद आ रहा है फिराक़ गोरखपुरी का यह मशहूर शे’र:

आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों
जब ये ध्यान आयेगा उनको तुमने फ़िराक़ को देखा था!
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Monday, December 27, 2010

मारियो वर्गास लोसा


वर्ष 20101 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मारियो वर्गास लोसा की गणना एक अति महत्वपूर्ण लातीन अमरीकी लेखक के रूप में की जाती है तथा उनका नाम ऑक्टावियो पाज़ और गैब्रियल गार्सिया मार्खेज़ जैसे लेखकों के साथ लिया जाता है. साहित्यालोचक गेराल्ड मार्टिन ने उचित ही लिखा है कि लोसा कदाचित “पिछले 25 वर्षों के सर्वाधिक सफल और निश्चय ही सर्वाधिक विवादास्पद लातिनी अमरीकी उपन्यासकारों में से हैं.”

मारियो वर्गास लोसा का जन्म 28 मार्च 1936 को पेरु के एक कस्बे अरेक्विपा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके पिता एक पूर्व बस-ड्राइवर थे. लोसा के मां-बाप उनके जन्म से ठीक पहले अलग हो गए थे. अपने संघर्षपूर्ण जीवन के मध्य लोसा ने 1957 में अपनी कहानियों ‘द लीडर्स’ और ‘द ग्राण्डफादर’ के प्रकाशन के साथ अपना लेखकीय जीवन प्रारंभ किया. उनका पहल उपन्यास ‘द टाइम ऑफ द हीरो’ 1963 में प्रकाशित हुआ. प्रादो मिलिट्री अकादमी के लेखक के निजी अनुभवों पर आधारित इस उपयास को बहुत सराहा गया लेकिन इस उपन्यास में पेरु के मिलिट्री संस्थानों की जो आलोचना थी उसकी वजह से इस पर विवाद भी खूब हुआ. पेरु के सैन्य अधिकारियों ने तो यहां तक कह दिया कि यह उपन्यास एक बीमार दिमाग की रचना है और वर्गास को यह पेरु के सैन्य प्रतिष्ठान की छवि बिगाड़ने वाला यह उपन्यास लिखने के लिए इक्वाडोर से धन मिला है. विवाद और आलोचना से अप्रभावित वर्गास ने अपना लेखन जारी रखा और 1965 में ग्रीन हाउस नामक एक चकलाघर पर आधारित उनका नया उपन्यास ‘द ग्रीन हाउस’ प्रकाशित हुआ. इस उपन्यास को भी भरपूर आलोचकीय सराहना मिली और वर्गास को लातीन अमरीकी कथाकारों की पहली कतर में जगह मिल गई. इस उपन्यास को पुरस्कार भी खूब मिले. कुछ आलोचक ‘द ग्रीन हाउस’ को ही वर्गास का श्रेष्ठतम और सबसे महत्वपूर्ण कृतित्व मानते हैं. वर्गास का तीसरा उपन्यास ‘कन्वरसेशन इन द कैथेड्रल’ 1969 में आया. इस उपन्यास में उन्होंने ऑड्रिया की तनाशाह सरकार पर कड़े प्रहार किए थे.

‘कैथेड्रल’ की अपार सफलता के बाद वर्गास के लेखन में एक नया मोड़ आया. लातीन अमरीकी विद्वान रेमण्ड एल. विलियम्स ने उनके रचनाकर्म के इस काल को ‘द डिस्कवरी ऑफ ह्युमर’ कहा है. इस काल में 1973 में उनका एक लघु हास्य उपन्यास ‘कैप्टेन पाण्टोजा एण्ड द स्पेशल सर्विस’ आया जिसे उनके ‘द ग्रीन हाउस’ की एक पैरोडी की तरह देखा गया. लोसा का अगला महत्वपूर्ण उपन्यास ‘द वार ऑफ द एंड ऑफ द वर्ल्ड’ 1981 में प्रकाशित हुआ. यहां लोसा ने अपने लेखन की दिशा को ऐतिहासिक उपन्यास की तरफ मोड़ा. इसमें 19 वीं सदी के ब्राज़ील की एक घटना को आधार बनाया गया था. ब्राज़ील में इस उपन्यास को सराहा गया लेकिन अन्यत्र इसे कभी क्रांतिकारी तो कभी असामाजिक तक कहा गया. खुद लोसा इसे अपनी प्रिय किताब मानते हैं और कहते हैं कि इसे लिखना उनके लिए बेहद मुश्क़िल था. इस उपन्यास के बाद लोसा अपेक्षाकृत छोटे उपन्यासों की तरफ मुड़े. 1984 में उनका उपन्यास ‘द रियल लाइफ ऑफ अलेजाण्ड्रो’ प्रकाशित हुआ जो 1962 के एक वामपंथी विप्लव पर आधारित था. इसके बाद सन 2000 में उनका एक और महत्वपूर्ण उपन्यास, एक पॉलिटिकल थ्रिलर ‘द फीस्ट ऑफ द गोट’ प्रकाशित हुआ. विलियम्स ने इसे ‘द वार ऑफ द एण्ड ऑफ द वर्ल्ड’ के बाद का लोसा का सबसे ज़्यादा मुकम्मल और महत्वाकांक्षी काम माना है. वर्ष 2006 में लोसा ने ‘द बेड गर्ल’ की रचना की, जो कुछ लोगों के अनुसार गुस्ताव फ्लाबेयर के मदाम बॉवेरी का पुनर्सृजन था.

लोसा के उपन्यासों में ऐतिहासिक घटनाओं, तथ्यों और उनके निजी जीवनानुभवों का सुंदर सम्मिश्रण देखने को मिलता है. इस सामग्री का उपयोग प्राय: लेखक समाज की न्यूनताओं को उजागर करने के लिए करता है. अपने उपन्यासों में वे बार-बार एक दमनकारी व्यवस्था से अपनी स्वतंत्रता के लिए जूझते-टकराते व्यक्ति को सामने लाते हैं. उनके शुरुआती उपन्यास जहां पेरु में अवस्थित हैं वहीं बाद के कई उपन्यास लातीन अमरीका के अन्य क्षेत्रों जैसे ब्राज़ील और डॉमिनिकन रिपब्लिक तक भी पहुंचते हैं. उनका एक ताज़ा उपन्यास ‘द वे टू पैरेडाइस’ तो फ्रांस और ताहिती में अवस्थित है.

आलोचकों ने लोसा के उपन्यासों को मॉडर्निस्ट और पोस्ट मॉडर्निस्ट की श्रेणी में रखा है. यह कहा गया है कि उनके शुरुआती उपन्यासों की जटिलता और तकनीकी सघनता उन्हें मॉडर्निस्ट ठहराती है जबकि बाद के उपन्यासों का खिलंदड़ापन उन्हें उत्तर आधुनिक शैली के नज़दीक ले जाता है. लोसा पर उनके अनेक पूर्ववर्ती और समकालीन कथाकारों-रचनाकारों का प्रभाव भी लक्षित किया गया है. शुरू में तो वे अपने ही देश के कुछ कथाकारों से प्रभावित पाए जाते हैं लेकिन बाद में उन पर ज्यां पाल सार्त्र, गुस्ताव फ्लाबेयर, और विलियम फॉकनर का प्रभाव भी चीन्हा गया.

कथा लेखन के साथ-साथ लोसा ने पत्रकारी लेखन भी खूब किया. इसे उनकी राजनीतिक-सामाजिक सक्रियता के एक अंग के रूप में देखा जा सकता है. इसके अतिरिक्त उन्होंने 1975 में अपने ही उपन्यास के फिल्मी रूपांतरण के सह निर्देशक का दायित्व भी वहन किया. वे अंतर्राष्त्रीय लेखक संगठन पेन के प्रेसिडेण्ट भी निर्वाचित हुए.

अधिकांश लातीन अमरीकी बुद्धिजीवियों की तरह लोसा भी प्रारंभ में तो फिडेल कास्त्रो की क्यूबाई क्रांतिकारी सरकार के समर्थक थे. मार्क्सवाद क उन्होंने गहन अध्ययन किया था और क्यूबाई क्रांति की कामयाबी के बाद इसमें उनका विश्वास और सघन हुआ था. लेकिन बाद में उन्हें लगने लगा कि क्यूबाई समाजवाद और वैयक्तिक स्वाधीनता में टकराव है. जब 1971 में कास्त्रो की सरकार ने कवि हरबर्टो पाडिल्ला को कैद किया तो लोसा ने अपने कई मित्र बुद्धिजीवियों के साथ कास्त्रो को एक पत्र भी लिखा जिसमें क्यूबाई राजनीतिक व्यवस्था और कवि की गिरफ्तारी की निंदा की गई. उसके बाद से उनका झुकाव उदारवाद की तरफ होता गया. बाद में तो उन्हें प्रखर नव उदारवादी माना जाने लगा. लोसा ने 1990 में पेरु के राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ा.

1990 के बाद से लोसा आम तौर पर लंदन में रहते हैं, लेकिन हर साल वे कम से कम तीन महीने पेरु में भी बिताते हैं. 1993 में उन्होंने स्पेन की नागरिकता ले ली थी अत: वे प्राय: स्पेन भी जाते रहते हैं और वहां छुट्टियां बिताना उन्हें अच्छा भी लगता है. 1994 में उन्हें स्पैनिश रॉयल अकादमी का सदस्य चुना गया था अत: वे इसके माध्यम से वहां की राजनीति में भी सक्रिय हैं. उनके राजनीतिक विचार इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन पर अनेक किताबों में चर्चा की गई है.

अज्ञेय ने अपने एक साक्षात्कार में महान कवि की जो कसौटियां निर्धारित की हैं वे हैं: 1. उसे बहुत लिखने वाला होना चाहिए, 2. उसमें निरंतर विकास दीखना चाहिए, और 3. अपने समय के समाज पर उसका काफी प्रभाव होना चाहिए. वर्गास के जीवन और रचनाकर्म के बारे में पढ़ते हुए मुझे अज्ञेय की ये तीनों कसौटियां याद आती रहीं और मुझे लगा कि अगर इन कसौटियों पर विश्वास करें तो बेशक वर्गास एक बड़े लेखक हैं. उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद स्वाभाविक ही है कि उनकी रचनाओं का और गहराई से अध्ययन-विश्लेषण होगा.
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Thursday, September 23, 2010

इधर की कविताओं को लेकर टिप्पणी जैसा कुछ !


इंटरनेट पर अपनी एक टिप्पणी में अमरीका में रह रहे मेरे मित्र श्री अनूप भार्गव ने  हिंदी  कवि सम्मेलनों की स्तरहीनता पर अपना क्षोभ व्यक्त किया है. उन्होंने महाकवि निराला के एक अति प्रसिद्ध कथन, गिर कर कोई चीज़ मत उठाओ, चाहे वह कविता ही क्यों न हो’ को भी स्मरण किया है.  उनकी बात का समर्थन जाने माने कोशकार श्री अरविंद कुमार जी ने भी किया है और इस बात की तरफ भी इशारा किया है कि कवि सम्मेलनों के स्तर में गिरावट की शुरुआत कब से हुई. 

इस बात से कोई असहमति हो ही नहीं सकती कि आज कवि सम्मेलन फूहड़ता के पर्याय बन चुके हैं. वहां फूहड़ हास्य होता है, चुटकुलेबाजी होती है, लटके-झटके होते हैं, गायकी होती है, अदायगी होती है, नाटक  होता है, एक दूसरे की टांग  खिंचाई होती है, नूरा कुश्ती होती है, अगर कोई महिला भी मंच पर हो (जो कि होती ही है) तो उसे लेकर अशालीन टिप्पणियां  होती हैं.  और भी बहुत कुछ होता है. नहीं होती है तो बस, कविता नहीं होती है. और जो लोग यह सब कुकर्म करते हैं, उन्हें इसके लिए काफी अच्छा पैसा मिलता है. ज़ाहिर है यह पैसा जनता  देती है. कभी-कभार सरकार भी देती है. खास तौर पर हिंदी सप्ताह या पखवाड़े  के दौरान. हमारे ये कवि सम्मेलनी परफॉर्मर गिर कर काफी कुछ उठाते हैं. पैसा भी, नाम भी, यश भी, और यदा-कदा सरकार भी इन्हें नवाज़ देती है–संस्थानों के शीर्ष पर आसीन करके, जैसे कि ऐसे ही एक मंचीय विदूषक को देश की राजधानी में नवाज़ा गया. अब ऐसा करते–करते अगर कविता गिरती भी है तो गिरे. तथाकथित कवि जी का स्तर तो उठ रहा है. 

अनूप जी और अरविंद जी की चिंता  बहुत वाज़िब है कि यह सब कविता के नाम पर हो रहा है. लेकिन मेरी चिंता यहीं खत्म नहीं हो रही है. बल्कि यहीं से आगे बढ़ रही है. आज कवि सम्मेलन में  कविता नहीं रह गई है, ठीक बात है. लेकिन, क्या हमारी पत्र पत्रिकाओं में  कविता के नाम पर जो छप रहा है, उसमें से अधिकांश  को  कविता कहा जाना ठीक होगा? मैं जानता हूं कि मेरा यह सवाल अति सामान्यीकरण का शिकार है.  वहां काफी कुछ अच्छा भी छप रहा है. लेकिन, जो भी अच्छा छप रहा है क्या वह भूसे के ढेर  में खोया-सा नहीं लगता आपको? और चलिये यह भी मान लेते हैं कि उत्कृष्ट  और सामान्य के बीच  असंतुलन तो रहेगा ही. फिर भी. 

आज हिंदी में सबसे ज्यादा कविताएं ही लिखी जाती हैं. लिखने की शुरुआत करने वाले कविता से ही श्रीगणेश करते हैं. कुछ दिलजलों का कहना है कि ऐसा इसलिए होता  है कि कविता लिखना अपेक्षाकृत आसान है. मुझे नहीं पता, क्योंकि मैंने तो कभी लिखी नहीं. लेकिन हां, इधर पत्र-पत्रिकाओं में छपी ज़्यादातर कविताओं को देखता हूं तो दिलजलों की इस बात से असहमत होने का भी मन नहीं करता. उदाहरण देने की कोई ज़रूरत नहीं है. आप किसी भी  पत्रिका के पन्ने पलट लीजिए. एक ढूंढो, हज़ार मिल जायेंगे. आज कविता की दुनिया में कुछ ऐसी अराजकता है कि आप चाहे जो लिख दीजिए, और कह दीजिए कि यह कविता है. किसी माई के लाल में यह दम नहीं है कि कहे, राजा नंगा है. पिछले दिनों, मैंने कुछ ऐसा ही करने का दुस्साहस किया. हिंदी के एक प्रतिष्ठित (कहूं कि एकमात्र) साहित्यिक रुझान वाले समाचार पत्र के रविवारीय परिशिष्ट में छपी एक जाने-माने और समादृत कवि की तथाकथित कविता को स्कैन किया (हां, उनका नाम मैंने हटा दिया) और उसे फेसबुक पर पोस्ट करके पूछा कि क्या इसे कविता कहा जा सकता है? मेरा आशय  कवि की अवमानना करना क़तई नहीं था. इसीलिए मैंने उनका नाम हटा दिया था. मुझे वह रचना सीधे-सीधे एक वृत्तांत लग रही थी, कविता कहीं से भी नहीं लग रही थी, जबकि वह एक बहुत प्रतिष्ठित कवि की कलम से उपजी थी और एक ऐसे अखबार में छपी थी जिसके संपादक के साहित्य विवेक पर कोई  संदेह  नहीं किया  जा सकता. फेसबुक पर जो टिप्पणियां आईं, उनमें से अधिकांश  में उस रचना के कविता  होने को नकारा गया था.  दो-एक टिप्पणियों में ज़रूर उसे महान बताया  गया.  यह तो एक उदाहरण है. और इस तरह की चीज़ें आये दिन छपती ही रहती हैं. 

आप किसी भी पत्रिका, साहित्यिक पत्रिका,  के पन्ने पलट लें. वहां  आप कविता  के नाम पर जो छपा देखते हैं, क्या वह वाकई कविता कहने योग्य होता है? क्या कविता करना इतना आसान होता है कि उठाई कलम और लिख दी! कोई तैयारी नहीं. कोई अभ्यास नहीं. कुछ भी नहीं. लेकिन एक छद्म, एक पाखण्ड  चल रहा है. मैं तेरी तारीफ करूं, तू मेरी तारीफ कर. कविताओं की किताब छप जाती है, उसका लोकार्पण हो जाता है, कसीदे पढ़ दिये जाते हैं, दो-चार समीक्षाएं छप जाती हैं जिनमें उस किताब को न भूतो न भविष्यति बताया गया होता है, और बस. इस सबके पीछे जो प्रहसन घटित होता है, क्या उसे बताने की ज़रूरत है? मैं कुछ पंक्तियां लिखता हूं, उन्हें इकट्ठा करके, अपने पैसों से एक किताब छपवाता हूं. फिर अपने किसी मित्र से कहता हूं कि वह अपनी संस्था के बैनर तले मेरी किताब का लोकार्पण  समारोह आयोजित कर दे. सारा खर्चा  मैं वहन करूंगा, यह कहना अनावश्यक है. फिर मैं ही अपने कुछ मित्रों  से कहता हूं कि उन्हें मेरी किताब पर पत्रवाचन करना है, या वक्तव्य देना है. या तो मैं ऐसा उनके लिए पहले कर चुका हूं, या भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर कर दूंगा. उन मित्रों के पास कविता को लेकर जितनी भी अच्छी बातें हैं वे उन्हें मेरी  तथाकथित कविता पर लाद देते हैं. अगर आप उन वक्तव्यों  को सुनें तो आपको लगेगा कि न कालिदास कुछ थे, न मुक्तिबोध, न निराला. सब दो कौड़ी के थे. असल कवि तो यही है. जैसे-तैसे इस गोष्ठी की रपट भी कहीं न कहीं छप ही जाती है. जैसे-तैसे इसलिए कि आजकल समाचार पत्रों में साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के लिए जगह ज़रा कम ही होती है.  और इसके बाद, जैसे गोष्ठी में वक्तव्य दिलवाये गए थे, वैसे ही समीक्षा भी लिखवा ली जाती है. बेचारे संपादक को भी तो अपनी पत्रिका के समीक्षा खण्ड में दो-एक किताबों की समीक्षा छापनी होती है ना.  अगर आप ही उन्हें किताब और समीक्षा दोनों उपलब्ध करा दें तो फिर नेकी और पूछ-पूछ.  और समीक्षा जब फरमाइश पर ही लिखी जानी है तो फिर उसमें वचनों की दरिद्रता क्यों? जितनी तारीफ मुमकिन हो उतनी हो जाए. आप पढ लीजिए इधर छपने वाली ज्यादातर समीक्षाएं. उनमें समीक्षित कविता या  कविता संग्रह की वो-वो खूबियां आपको नज़र आएंगी कि आपको  लगेगा कि आप तो अब तक भाड़ ही झोंकते रहे थे. क्या खाक समझ है आपको कविता की! 

यह पाखण्ड यहीं खत्म नहीं होता. छोटे लोग पत्रिकाओं में कविता छपवा कर वाहवाही लूटते है, उनसे बड़े संकलन छपवा कर, और जो उनसे  भी बड़े हैं वे संपादक बन कर ऐसा करते हैं. अगर विश्वास न हो तो मैं बताता हूं.  कविता और तद्विषयक चिंतन की  एक पत्रिका  है. लघु पत्रिका. नाम लेना उचित नहीं होगा. संपादक बहुत वरिष्ठ और आदरणीय  कवि हैं. बल्कि थे. कोई ग़लतफहमी पैदा हो उससे पहले ही स्पष्ट  कर दूं कि  यह भूतकालिक प्रयोग उनके संपादक के लिए है, कवि के लिए नहीं. अब उन्होंने संपादन का यह दायित्व एक   अपेक्षाकृत युवा कवि आलोचक को सौंप दिया है. पहले भी, जब वे खुद संपादन करते थे, और अब भी, जब संपादन कोई अन्य कर रहा है, उस पत्रिका में छपने वाला हर समीक्षा लेख उन कवि जी की  प्रशस्ति के बिना पूरा नहीं होता.  जब भी किसी नए कवि की प्रशंसा की जाती है यह बताना ज़रूरी होता है कि वह उस परंपरा का कवि है जिस परंपरा के शीर्ष पर उस पत्रिका के संस्थापक कवि बिराजते हैं. लिहाज़ के लिए दो-तीन नाम साथ में और ले लिए जाते हैं.  ऐसा करने में (यानि आत्मप्रशंसा  में) जब खुद उन कवि जी को कोई संकोच नहीं होता था तो फिर जिन्हें उन्होंने संपादक बनाया है वे भला क्यों कोई संकोच बरतने लगे. आजकल उस पत्रिका में नए  कवियों के काव्यकर्म पर एक श्रंखला चल रही है. मज़ाल है कि कोई कवि उन वरिष्ठ कवि जी के आई एस आई ठप्पे के बिना निकल जाए. और यह सारा कारोबार एकतरफा हो, ऐसा भी नहीं है. आखिर बदला तो चुकाना ही होता है ना. तो वे संस्थापक  संपादक जी भी, जब भी मौका मिलता है, उन आलोचकों के नाम ले  लेते हैं जिन्होंने उनकी प्रशंसा  की है. न इन्हें और कवि नज़र आते हैं और न उन्हें और आलोचक. तुझे ठौर नहीं, मुझे और नहीं. एक बहुत मज़े की बात यह कि इस पत्रिका के वर्तमान संपादक जब इस पत्रिका से बाहर कुछ  लिखते हैं तो वे  महान कवियों की रेडीमेड सूची चस्पां करने वाली आचार संहिता से मुक्त होते हैं. मुझे न उन कवि जी की महानता में कोई संदेह है और न वर्तमान संपादक जी के संपादकीय विवेक में.  लेकिन मन में एक ही सवाल है. अगर वे कवि इतने ही  महान हैं तो सिर्फ अपनी ही पत्रिका में इतने महान क्यों हैं? और अगर उनकी पत्रिका के वर्तमान संपादक उन्हें इतना ही अपरिहार्य मानते हैं कि उनके नाम  के बिना कोई समीक्षा कर्म पूरा नहीं होता तो फिर ऐसा उस पत्रिका में छपने वाले लेखों में ही क्यों होता है? यह तो एक उदाहरण  है. ज़्यादातर पत्रिकाओं की हालत ऐसी ही है. हर पत्रिका में छपने की पहली और ज़रूरी शर्त उसके संपादक का यशोगान होता है. हर, यानि अधिकांश पत्रिकाओं में. तो कवि (और आलोचक भी) के रूप में प्रतिष्ठित होने का एक और तरीका यह है कि आप संपादक बन जाएं.

अब जब यह सब कारोबार चलता है तो फिर बेचारे पाठक की क्या गति होती है? लेखक तो इस तंत्र को समझ और तदनुसार समझौते कर अपना काम  चला लेता है. लेकिन पाठक? वह रचना पढ़ता है तो उसे दो कौड़ी की लगती है. समीक्षा पढ़ता है तो पाता है कि जो रचना उसने पढ़कर यों ही छोड़ दी थी वह तो ऐसी थी जैसी सदियों में कभी-कभार  ही लिखी  जाती है.  बेचारा  अपने अज्ञान पर दुखी होता  है.  हैरां हूं,  दिल को रोऊं, कि  पीटूं जिगर को मैं.  कभी-कभी उसे लगता है कि साहित्य कहां से कहां पहुंच गया है और मैं ही हूं कि पीछे छूट गया हूं. मेरी समझ में ही कोई कमी   जब राधेश्याम जी कह रहे हैं कि सीताराम जी की कविता महान है, तो फिर होगी ही. लेकिन जब उस बेचारे पाठक को यह पता चलता है कि राधेश्याम  जी तो हर उस कवि को महान घोषित करने के असाध्य रोग से ग्रस्त हैं जो उन्हें ऐसा करने का अवसर देता है, तो सोचिये कि उस बेचारे पाठक के दिल पर क्या बीतती होगी. क्या वह खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं करता होगा? क्या यह अनुभूति उसे साहित्य से थोड़ा दूर नहीं कर देती होगी?

इतना सब लिखते हुए मेरे मन में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर मैं कविता किसे मानता हूं? आसान नहीं है इस सवाल का जवाब. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का प्रसिद्ध निबंध ‘कविता क्या है’  खूब पढ़ा है.  लेकिन रस, छंद, लय, अलंकार, लक्षणा, व्यंजना ये सब बीते ज़माने की चीज़ें हैं.  साहित्य का विद्यार्थी हूं तो इतना तो जानता ही हूं. काफी कुछ बदल चुका है. यह भी जानता हूं कि केवल छंद  से ही कविता नहीं हो जाती. रस भी उतना ज़रूरी नहीं है. छंद की मुक्ति और सपाट बयानी के बारे में भी थोड़ा-बहुत जानता हूं. अर्थ की लय के बारे में भी पढ़-सुन रखा है. बिंब, प्रतीक के बारे में भी जाना-सुना है....  साहित्य की सभी विधाओं के स्वरूप में बहुत बदलाव आया है. कविता को लेकर जो प्रचलित धारणाएं और मान्यताएं थीं वे एकदम बदल चुकी हैं. फिर भी, शायद सीधे-सीधे कहीं उंगली रख कर भले ही न कहा जा सके कि कविता यहां है, महसूस तो हो ही जाता है कि कविता यहां है, या नहीं है.  अगर ऐसा न होता तो हम कवि सम्मेलनों के कविता न होने को लेकर भी दुखी नहीं होते. दुख केवल फूहड़ता को लेकर ही नहीं है. जब हम छंदोबद्ध कविता को कविता मानने से मना करते हैं तब भी हमारे मन में कोई अवधारणा  तो कविता की होती  ही है.

परिदृश्य बहुत साफ नहीं है. कहां ईमानदारी है और कहां बे ईमानी, कहना बहुत मुश्क़िल है. लेकिन बातें साफ तो होनी ही चाहिये. लिहाज़ में प्रशंसा बहुत हो गई. अब खरी बातें भी की जानी चाहिए. अगर कहीं  अधकचरापन है, कविता नहीं है, तो उसे भी इंगित किया जाना  चाहिए.  कविता लिखने वालों और उनके पेशेवर सराहना करने वालों का जो गिरोह बन गया है, कविता को उससे बाहर निकाला  जाना बेहद ज़रूरी है. पत्र पत्रिकाओं में कविता के नाम पर जो भी ऊल जुलूल छप रहा है उस पर कोई तो नियंत्रण  हो. अगर आपको लगे कि आपने कविता लिखने में नई ज़मीन तोड़ी है, तो बताइये ना पाठक को  उसके बारे में. पाठक अगर ना समझ  है तो उसकी समझ को विकसित कीजिए. पाठक से संवाद कायम कीजिए. एक जीवंत रिश्ता बनाइये. अपनी कहिये, तो उसकी भी सुनिये. अगर समय रहते ऐसा न किया गया तो आज जो बात कवि सम्मेलनी कविता के लिए कही जा रही है, कल वही बात पत्रिकाओं और किताबों में   छपने वाली कविताओं के बारे में भी कही जाने लगेगी.
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अक्सर त्रैमासिक के अंक-13  (जुलाई-सितंबर, 2010) में प्रकाशित आलेख!