Tuesday, May 21, 2019

फ़ैशन की दुनिया को 'दुनिया' की फ़िक्र कहां?


फ़ैशन की दुनिया सदा से अपारम्परिक, बल्कि कहें परम्परा भंजक रही है. हममें से बहुत सारे लोग जब किसी चैनल पर फैशन परेड में मॉडल्स को अजीब-ओ-गरीब वेशभूषाओं में देखते हैं तो हमारी प्रतिक्रिया अस्वीकार और उपहास की ही होती है. हमें लगता है कि अगर हममें से कोई इस तरह की वेशभूषा धारण कर सड़क पर निकल जाए तो गली के कुत्ते उसकी दुर्गति किये बिना नहीं छोड़ने वाले. लेकिन इस बात से फैशन की  दुनिया के कर्ता धर्ताओं को कोई फर्क़ नहीं पड़ता है. वे अपना काम बदस्तूर ज़ारी रखते हैं. हां, इतना ज़रूर है कि हमें चौंकाने का कोई अवसर वे नहीं छोड़ना चाहते हैं. बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’ – इस बात में सबसे ज़्यादा विश्वास शायद ये ही लोग करते हैं! अब देखिये ना, इधर हाल में अमरीका के एक फैशन ब्राण्ड ने इंस्टाग्राम पर एक मॉडल की एक तस्वीर पोस्ट की है जिसमें उसने गुलाबी रंग की बहुत बुरी तरह से फटी हुई जीन्स पहन रखी है. पोस्ट होते ही इस तस्वीर पर लाइक्स की और प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई. ज़ाहिर है कि सारी प्रतिक्रियाएं प्रशंसात्मक नहीं थीं. मज़े की बात यह कि फैशन ब्राण्ड जितना प्रसन्न प्रशंसात्मक प्रतिक्रियाओं से था, उससे कम खुश उन प्रतिक्रियाओं से नहीं था जिनमें इस जीन्स को खूब बुरा बताया गया था.

दरअसल, लगातार ऐसा कुछ करते रहना जिस से लोग उत्तेजित हों, भड़कें और नाराज़गी भरी प्रतिक्रियाएं करें, फैशन की दुनिया की एक सुपरिचित रणनीति है.  उन्हें इस बात से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है कि लोग उनके डिज़ाइन किये गए वस्त्रों को ना पहनने काबिल, भद्दे, बेतुके, बेहूदा या हास्यास्पद बता रहे हैं. वे न केवल इस बात से आनंदित होते हैं कोशिश करते हैं कि अगली दफा जो डिज़ाइन वे रैम्प पर उतारें वे पहले से भी ज़्यादा अजीब और लोगों को उकसाने वाले हों. शायद इसी सोच के चलते अमरीका की अलग अलग  फैशन कम्पनियों  ने पुरुषों के लिए पीवीसी निर्मित पारदर्शी  जीन्स, उन्हीं  के लिए ऐसे टॉप जिनमें उनके स्तनाग्र दर्शाने के लिए छेद बने हों, और महिलाओं के लिए अब तक काफी कुख्याति अर्जित कर चुकी डेनिम की पैण्टी जिसे जेण्टीज़  कहा जाता है, बाज़ार में उतारी हैं. जब इस तरह के विचित्र वस्त्र चर्चा में आते हैं तो स्वभावत: सोशल मीडिया पर भी उनकी खूब चर्चा होती है. और इस तरह फैशन उद्योग सोशल मीडिया को भी खाद-पानी सुलभ करा देता है.

लेकिन सोशल मीडिया पर होने वाली तमाम चर्चाएं, चाहे वो सकारात्मक हों, या नकारात्मक अंतत: फैशन उद्योग के लिए लाभदायक ही साबित  होती हैं. अब यही बात लें कि मात्र दो माह पहले जेण्टीज़ पर खूब छींटाकशी की जा रही थी, लेकिन दो महीने बाद ही वैश्विक फैशन खोज प्लेटफॉर्म पर उसकी खोज  में 2250 प्रतिशत उछाल देखा गया. फैशन उद्योग में माना जाता है कि अगर कोई उत्पाद वायरल हो जाए तो उसकी सर्च  में कम से कम  एक हज़ार प्रतिशत का उछाल तो अवश्यम्भावी है. जो लोग इस तरह के फैशन उत्पादों की आलोचना करते हैं, फायदा उनको भी कम नहीं होता है. इन मामलों में दिलचस्पी रखने वाले समुदाय में उनको पहचाना जाने लगता है और अगर वे व्यंग्यपूर्ण प्रतिक्रिया करते हैं तो  उनके अभिव्यक्ति कौशल को सराहा जाता है. उनके फैशन बोध को सम्मान भरी नज़रों से देखा जाता है और फैशन की दुनिया उनकी बातों को गम्भीरता से लेने लगती है.

बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. जिन उत्पादों की बहुत ज़्यादा आलोचना होती है, उनके लिए भी आहिस्ता-आहिस्ता एक विशेष खरीददार वर्ग तैयार होता जाता है. ये वे लोग होते हैं जो अपने पहनावे के मामले में अत्यधिक प्रयोगशील हैं. इनकी तो तमन्ना ही यह रहती है कि ये जो पहनें वह लोगों की कल्पना से भी परे का हो. ऐसे ही लोगों ने पारदर्शी जींस तक को सोल्ड आउट बना  दिया. ऐसे लोगों ने उसे पहना और फिर उनके पहनावे की खूब चर्चा हुई. पहनावे  की भी और पहनने वालों की भी. ज़ाहिर है कि ऐसा होने से फैशन डिज़ाइनर और निर्माताओं को अपनी मनचाही मुराद मिली. भले ही समाज में इस तरह के प्रयोगशील लोग बहुत ज़्यादा न  हों, यह बात भी सच है कि ये साहसी लोग ही बदलाव की राह का निर्माण करते हैं. अगर ऐसे साहसी लोग न हों तो सोचिये कि आज भी हम वही पहन रहे होते  तो हमारी पिछली पीढ़ियां पहनती थीं. हां, इतना ज़रूर है कि आज प्रयोगशीलता और  साहस का बहुत विस्तार हो गया है.

और हां,यह कहां ज़रूरी है कि हर नया बदलाव आपको पसंद आए ही! क्या पता जो आपको नापसंद हो, और लोग उसी को बहुत अधिक पसंद कर रहे  हों!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, May 14, 2019

एक अमरीकी की नज़र में भारतीय शिक्षा व्यवस्था

हाल में एक अमरीकी महिला लीसल श्वाबे एक शोध परियोजना के सिलसिले में भारत आईं और क्योंकि उन्हें यहां लम्बे समय तक रहना था, वे अपनी सात वर्षीया बेटी को भी साथ ले आईं. अमरीका में उनकी बेटी ब्रुकलिन के एक सरकारी स्कूल में पढ़ रही थी. यहां कोलकाता में उन्होंने उसे एक अंग्रेज़ी माध्यम के ग़ैर सरकारी स्कूल में प्रवेश  दिलवाया. अपने एक लेख में लीसल ने अमरीकी और भारतीय स्कूलों के अंतर को स्पष्ट करने के बाद जिस बात पर संतोष व्यक्त किया है, उस पर आम तौर पर हमारी नज़र नहीं जाती है. 

लीसल ने अपनी बात बेटी के लिए स्कूल द्वारा तै किये गए जूते खरीदने के अनुभव से शुरु की है. अब तक उनकी बेटी अपने स्कूल में भी फैशनेबल जूते पहन कर जाती थी लेकिन यहां उसे बड़ी नीरस किस्म के जूते खरीदने पड़े, क्योंकि स्कूल ने वे ही निर्धारित कर रखे थे. और यहीं उन्हें महसूस होने लगता  है कि अमरीका में उपभोक्तावाद लोगों को विकल्प देता है जबकि भारत में विकल्पों का अभाव है. विकल्पों के अभाव की यह बात मां-बेटी को बाद में भी बार-बार महसूस होती है. अमरीका में उसे स्कूल सोमवार को जो होमवर्क देता था उसे शुक्रवार तक कभी भी कर लेने की छूट थी. वहां वर्तनी पर अधिक ज़ोर नहीं दिया जाता था यानि शब्दों को मनचाहे तरीके से लिखे  जाने की छूट थी. साल में कुछ दफा थोड़ा  कुछ लिख कर बताना होता था लेकिन क्या और कैसे लिखना है यह विद्यार्थी को ही तै करना होता था. कला की कक्षा में शिक्षक प्रयोगशीलता को प्रोत्साहित करते थे और अभिभावक भी मौलिकता की सराहना करते थे. कक्षाओं में बच्चों को इधर उधर घूमने की और मनचाहे सवाल पूछने की पूरी स्वतन्त्रता  थी.  

लेकिन उसी बच्ची को जब कोलकाता में कक्षा दूसरी डी में भर्ती करवाया गया तो इन लोगों को काफी कुछ बदला हुआ लगा. बच्चों के पास बहुत ही कम विकल्प थे. कक्षाओं में उन्हें आपस में बात करने की छूट नहीं थी. उन्हें हर विषय के लिए अलग-अलग नोटबुक रखनी होती थी और नोटबुकों के लिए भी यूनीफॉर्म जैसी व्यवस्था थी. इन नोटबुकों में सारे बच्चे एक जैसे जवाब लिखा करते थे. सप्ताह में दो बार आर्ट क्लास भी होती थी, लेकिन सारे बच्चे लगभग एक जैसी चीज़ों का निर्माण करते थे. कुछ समय बाद इसी बच्ची ने भारत और अमरीका के स्कूलों के फर्क़ को इन शब्दों में बयान किया: “भारत में हमें अपने दोस्तों के साथ खेलने  के लिए कोई समय नहीं मिलता है जबकि अमरीका में अपने स्कूल में हम सिर्फ अपने दोस्तों के साथ खेलते ही थे.” 
इन बच्ची को यहां गणित समझने में बहुत दिक्कत महसूस हो रही थी. उसे लम्बे लम्बे हिंदी और फ्रेंच शब्दों की वर्तनी भी याद करना बहुत कठिन लग रहा था. कभी वह घर पर इस बात से घबराती कि कल स्कूल में ग़लत नोटबुक ले जाने पर उसे कितनी डांट  सहनी पड़ेगी और एक बार तो किसी शब्द की मुश्क़िल वर्तनी को याद न कर पाने से आतंकित होकर वह अपना सूटकेस पैक कर अमरीका लौटने के लिए ही उतारू हो गई थी. लेकिन सब कुछ ऐसा ही नहीं था. वो बच्ची आहिस्ता आहिस्ता अपने स्कूल को पसंद भी करने लगी थी. उसने खूब दोस्त बना लिये थे और स्कूल की छुट्टी के वक़्त दोस्तों के साथ उछलते कूदते हुए उसका बाहर आना या शनिवार की शाम स्कूल लाइब्रेरी से अपने दोस्तों के साथ प्रसन्न मुद्रा में बाहर निकलना उसकी मां को भी आश्वस्त करने लगा था. पढ़ाई का बोझ था और विकल्प भी बहुत कम थे, लेकिन इस सबके बीच भी उसकी मां बहुत सारी अच्छाइयां देख पा रही थी. 

उसकी मां को लगता है कि भारत के स्कूलों में विकल्पों का न होना भी एक अच्छी  बात है. यहां विकल्प भले ही न हों, ज़िम्मेदारियां हैं और यह सराहनीय है. उसकी मां इस बात को समझती हैं कि गणित जैसे विषय के भारी भरकम पाठ्यक्रम ने उनकी बेटी को वह सब सिखाया है जो वह अमरीका में कभी नहीं सीख पाती. यहां आकर ही उसने सही वर्तनी का महत्व समझा है. यहां आकर उसे ज़्यादा पढ़ना पड़ रहा है और उसकी एकाग्रता बढ़ी  है. अब तक वो खुद को जितना कुछ कर पाने में समर्थ समझती थी उससे कहीं ज़्यादा कर पा रही है. मां ने यह बात भी नोट की है कि भारत में स्कूल व्यवस्था  बच्चों में अपने कर्म के प्रति उत्तरदायित्व का भाव बढ़ाती है. लीसल यह तो मानती हैं कि भारत में बच्चों पर पढ़ाई का बहुत ज़्यादा बोझ व दबाव है और इसे आम तौर पर नुकसानदेह  समझा जाता है, लेकिन इसके बावज़ूद उन्हें यह उम्मीद है कि जब वे अपनी बेटी के साथ अमरीका लौटेंगी तो उसमें अपनी उम्र के अन्य अमरीकी बच्चों से अधिक आत्मविश्वास होगा. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, May 7, 2019

बुढ़ापे का उम्र से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है!

इधर दुनिया भर में बुढ़ापे को लेकर अनगिनत अध्ययन और शोध किये जा रहे हैं. भावी आर्थिक  नीतियों के निर्धारण के लिए यह बेहद ज़रूरी है. इन्हीं शोधों और अध्ययनों से अनेक दिलचस्प बातें छन छन कर सामने आ रही हैं. उनमें से कुछ की चर्चा करने बैठा हूं तो अनायास मुझे सन 2001 में बनी अमिताभ बच्चन की एक लोकप्रिय फिल्म का शीर्षक याद आ रहा  है – ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप!’  शीर्षक से ही यह स्पष्ट है कि बुड्ढा कहलाना किसी को पसन्द नहीं आता है. सच तो यह है कि लोग बुढापे में भी ‘अभी तो मैं जवान हूं’ ही गुनगुनाना पसन्द करते हैं. लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि उम्र के लिहाज़ से बुढ़ापा कब शुरु होता है? 

आपको यह बात तो मालूम  ही है  कि अतीत में ब्रिटेन में फ्रेण्डली सोसाइटीज़ एक्ट (1875) के आधार पर पचास की उम्र  से बुढ़ापे की शुरुआत मानी जाती थी. लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जो नई शोध की है उसके अनुसार पैंसठ पार की उम्र से बुढ़ापे की शुरुआत मानना प्रस्तावित है. इस शोध में हमारी आयु के विभिन्न पड़ावों को इस तरह से पहचाना गया है: शून्य से सत्रह बरस तक: अल्पायु या अण्डर एज, अठारह से पैंसठ बरस तक: युवावस्था, छियासठ से उनासी बरस तक: मध्य वय, अस्सी से निन्यानवे बरस तक: वरिष्ठ या बुज़ुर्ग, सौ बरस से अधिक वाले: दीर्घजीवी वरिष्ठ. सत्तर के दशक में जो नृवंशशास्त्रीय अध्ययन हुए उनमें मुख्यत: तीन आधारों पर यह वर्गीकरण किया गया था. आधार थे:  पहला- वर्ष की गणना, दूसरा– सामाजिक भूमिका में आया बदलाव (जैसे सेवा निवृत्ति, बच्चों का बड़ा हो जाना और रजोनिवृत्ति वगैरह), और तीसरा- क्षमताओं में आया बदलाव (जैसे शारीरिक अक्षमता, बुढापा, शारीरिक दक्षताओं में आया बदलाव). इनमें से भी दूसरे आधार को अधिक महत्वपूर्ण  माना गया.  

भारत में हम यह मान लेते हैं कि सरकारी सेवा निवृत्ति की उम्र से बुढ़ापा आ जाता है. सामान्यत: अभी यह उम्र साठ बरस है. कनाडा में सेवा निवृत्ति की आयु पैंसठ तो अमरीका में छियासठ बरस है और आशा की जा रही है कि दोनों ही देश शीघ्र ही इसे बढ़ाकर सड़सठ बरस कर देंगे. लेकिन सेवा निवृत्ति  की उम्र को बुढ़ापे के आगमन की बात मानना भी सबको स्वीकार्य नहीं है. वियना, ऑस्ट्रिया की एक शोध संस्था के विशेषज्ञों का मत है कि बुढ़ापे का फैसला वर्तमान आयु  के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर किया जाना चाहिए कि किसी के पास ज़िन्दगी के और कितने बरस बचे हैं. उनका मानना है कि जब किसी के पास जीने के लिए पन्द्रह या इससे कम बरस बचे हों तो उसे बूढ़ा कहा-माना जाना चाहिए. अब इस  लिहाज़ से देखें तो पचास के दशक में एक सामान्य अंग्रेज़ के पन्द्रह बरस और जीने की उम्मीद की जाती थी, लेकिन आज पश्चिमी  देशों में यह माना जा रहा है कि एक औसत सेवा निवृत्त व्यक्ति कम से कम चौबीस बरस और पेंशन  का लाभ उठा लेगा. यानि मौज़ूदा हालात में चौहत्तर वर्षीय व्यक्ति को बूढ़ा माना जा सकता है. 

लेकिन सोचने की बात यह भी है कि क्या केवल यह चौहत्तर का अंक ही बुढ़ापे के आगमन का निर्धारक हो सकता है ? चौहत्तर बरस की उम्र के हर व्यक्ति की स्थिति एक जैसी नहीं हो सकती है. ग़रीब और अमीर की, ग्रामीण और शहरी की, अनपढ़ और पढ़े लिखे की, अनुकूल और प्रतिकूल  जीवन स्थितियों वाले समान उम्र के व्यक्ति की दशा में बहुत बड़ा फर्क़ हो सकता है. स्त्री पुरुष के मामले में तो यह अंतर प्रमाण पुष्ट भी है. इसके अलावा अपवाद तो होते ही हैं. यह भी अनुमान लगाया गया है कि अभी हाल में रिटायर हुए बारह  में से एक पुरुष और सात में से एक स्त्री कम से कम सौ बरस तक जीवित रहेंगे. तो क्या उन्हें अधिक उम्र से  से बूढ़ा माना जाए? अगर आप अपने घर में भी कोई पुरानी तस्वीर देखें तो पाएंगे कि पिछली पीढ़ी के लोग साठ बरस की उम्र में ही खासे जर्जर दिखाई देते थे जबकि आज उसी उम्र के लोग उनकी तुलना में बहुत सेहमतमन्द और ऊर्जावान दिखाई देते हैं और उन्हें कोई भी बूढ़ा नहीं कहना चाहेगा. सही बात तो यह है कि आज के सत्तर बरस अतीत के पचास बरस के बराबर हो गए हैं. कहना अनावश्यक है कि बेहतर जीवन स्थितियों और अपनी सेहत के  प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण यह बदलाव आया है.

तो, कुल मिलाकर मामला बहुत जटिल है और इस बात का कोई सर्वमान्य और सार्वकालिक उत्तर नहीं हो सकता कि किस उम्र के व्यक्ति को बूढ़ा माना जाए. वैसे, एक उत्तर हो सकता है जिससे शायद ही कोई असहमत हो, और वह यह कि बुढ़ापे का उम्र से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है. यह तो एक मानसिक अवस्था है जो हरेक की भिन्न भिन्न होती है. 

आप क्या सोचते हैं?  
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 मई, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 30, 2019

छोटी छोटी बातों में छिपी हैं बड़ी बड़ी खुशियां




निदा फ़ाज़ली साहब की एक बेहद लोकप्रिय गज़ल का मतला है – दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है/ मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है. जो आपके पास होता है वह आपको बेमानी लगता है लेकिन जो नहीं होता है उसके लिए आप तरसते और तड़पते हैं. आपके पास बेपनाह दौलत हो तो भी ज़रूरी नहीं कि आप उससे संतुष्ट  और खुश हों, लेकिन जो आपके पास नहीं होता है उसका अभाव अनिवार्यत: आपको सालता है. यह बात मेरे जेह्न में आई ओकलेण्ड, कैलिफोर्निया निवासी डॉमिनिक़ अपोलन के बारे में पढ़ते हुए. पैंतालीस वर्षीय अपोलन अमरीका स्थित एक महत्वपूर्ण संगठन में रिसर्च  के वाइस प्रेसिडेण्ट हैं. ज़ाहिर है कि वे खासे सुखी सम्पन्न व्यक्ति हैं. जानते हैं उन्हें हाल में सबसे बड़ी खुशी किस बात से हासिल हुई? इतनी ज़्यादा खुशी कि उनकी आंखों से अश्रु धारा बह निकली! वह खुशी हासिल हुई उन्हें हर कहीं आसानी से और बहुत कम मूल्य पर मिल जाने वाली बैण्ड एड जैसी एक पट्टी से. उनकी उंगली पर चोट लग गई थी और जब वे उस पर चिपकाने के लिए कोई पट्टी खरीदने बाज़ार गए तो उन्हें यह अभूतपूर्व खुशी हासिल  हुई. 

सामान्यत: इस तरह की पट्टियां या तो हल्के भूरे रंग (जिन्हें हम सामान्यत: स्किन कलर कहते हैं) की होती हैं या फिर बच्चों के लिए मिलने वाली पट्टियों पर कोई कार्टून किरदार छपे होते हैं. हल्के भूरे रंग की पट्टियों के हम सब इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि इसमें किसी को कुछ भी असामान्य नहीं लगता है. लेकिन उस दिन ये डॉमिनिक़ अपोलन महाशय अपनी चोटिल उंगली पर चिपकाने के लिए पट्टी खरीदने बाज़ार गए तो चौंक पड़े. उन्हें वहां एक ऐसी पट्टी नज़र आई जो हूबहू उनकी त्वचा के रंग से मेल खाती थी. जान लीजिए कि ये डॉमिनिक़ महाशय अश्वेत हैं. उन्होंने उस पट्टी को अपनी उंगली पर चिपकाया और फिर उंगली को देखा तो लगा जैसे उन्होंने कोई पट्टी चिपका ही नहीं रखी है. पट्टी एकदम  उनकी त्वचा में घुल मिल गई थी. यह पहली दफा हुआ था, अन्यथा उनके पैंतालीस  बरस के जीवन में अनेक ऐसे मौके आए थे जब उन्होंने अपनी अश्वेत देह के किसी अंग पर हल्के भूरे रंग की  पट्टी चिपकाई थी. डॉमिनिक़ को इस बात की खुशी थी कि चलो किसी ने तो यह सोचा कि सारी दुनिया श्वेत  लोगों से ही भरी हुई नहीं है, उसमें अश्वेतों का भी कोई वुज़ूद है. अगर पहले किसी ने सोचा होता तो उसने भी अश्वेतों को ध्यान में रखकर उनकी त्वचा के रंग से मेल खाती पट्टियां बनाई होतीं. उंगली पर चिपकी पट्टी को वे बार-बार देख रहे थे और जैसे उस पट्टी के प्रति आभारी हो रहे थे कि कम से कम वह तो उनके अश्वेत होने का ढिंढोरा नहीं पीट रही है. डोमिनिक़  बेहद खुश थे, इतने खुश थे कि रो रहे थे. बाद में उन्होंने अपने भावों को शब्द बद्ध करते हुए एक ट्वीट किया:  “मैं अब तक सूर्य के पैंतालीस चक्कर लगा चुका हूं लेकिन आज अपनी ज़िन्दगी में मैंने पहली दफा यह महसूस किया है कि मेरी अपनी त्वचा के रंग वाली बैण्ड एड के क्या मानी होते हैं. एक बार  में तो यह आपको दिखाई ही नहीं देगी. मैं बहुत मुश्क़िल से अपने आंसू रोक पा रहा हूं.”  बाद में उन्होंने अपनी बात  को और स्पष्ट करते हुए कहा कि मैंने बहुत बार यह महसूस किया है कि अपनी देह पर एक पट्टी चिपकाने जैसे बेहद मामूली काम में भी आपका अश्वेत होना घोषित होता है. अपनी आज़ तक की ज़िन्दगी में तो मैं अपनी देह पर वे ही पट्टियां चिपकाता रहा हूं जो हल्के रंग की चमड़ी वालों यानि गोरों  के लिए निर्मित की जाती हैं. आज पहली दफा मैं एक ऐसी पट्टी का प्रयोग कर रहा हूं जो मुझ जैसों के लिए बनाई गई है. 

दरसल डॉमिनिक़ की यह खुशी केवल इतनी-सी बात की नहीं है कि उन्हें अपनी त्वचा के रंग से मेल खाती पट्टी मिल गई. इस खुशी के मूल में यह बात है कि आखिर किसी ने तो उन और उन जैसे  लाखों-करोड़ों  लोगों के बारे में सोचा जिन्हें उनकी चमड़ी के रंग  की वजह से उपेक्षित और अपमानित किया जाता रहा है. डॉमिनिक़ अपोलन के उपरोक्त ट्वीट के बाद यह मुद्दा खूब चर्चा में आ गया है. बहुत स्वाभाविक है कि जिस कम्पनी ने पट्टी के रंग में बदलाव कर डोमिनिक़ और उन जैसे अनगिनत अश्वेतों को आह्लादित  किया है वह अपनी इस पहल पर गर्वित है. उसने एक ट्वीट कर कहा है कि अब वह और भी अनेक रंगों की पट्टियों का उत्पादन करने के बारे में विचार कर रही है. कम्पनी ने कहा है कि हमारी चमड़ी के रंगों की विभिन्नता ही हमारा सौन्दर्य है और हमें इस पर गर्व है. बहुत सारे अश्वेतों  ने भी अपोलन का शुक्रिया अदा किया है कि उसने उन सबकी भावनाओं को वाणी दी है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 30 अप्रैल, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 23, 2019

हांग कांग: एक शहर जो सिर्फ़ अमीरों के लिए है

जब भी दुनिया में वैभव, विलासिता और चमक दमक की बात होती है, हांग कांग का नाम ज़रूर आता है. हांग कांग लगभग 200 छोटे-बड़े द्वीपों का समूह है और इसका शाब्दिक अर्थ है सुगंधित बंदरगाह. माना जाता है कि यहीं पूर्व और पश्चिम का मेल होता है. सन 1997 में इंग्लैंड ने हांगकांग की संप्रभुता कई शर्तों के साथ चीन को वापस सौंपी, जिसमे प्रमुख शर्त थी हांगकांग की पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखना.  चीन ने भी रक्षा व विदेश छोड़कर हांग कांग की प्रशासकीय व्यवस्था में हस्तक्षेप न करने का व पूँजीवादी व्यवस्था को आगामी पचास वर्षों तक न छेड़ने का आश्वासन दिया. चीन ने हांग कांग को एक विशिष्ट प्रशासकीय क्षेत्र घोषित कर 'एक देश दो प्रणाली' का फार्मूला अपनाया. देश के मुख्य भाग में साम्यवाद और इस विशिष्ट भाग में पूँजीवाद. अब स्थिति यह  है कि पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा अमीरों का  जमावड़ा यहीं है.  और जब हम अमीरों की बात कर रहे हैं तो आम अमीरों की नहीं, ऐसे अमीरों की बात कर रहे हैं जिनमें से हरेक की औकात तीस मिलियन डॉलर से ज़्यादा की है. यहां हर सात में से एक आदमी करोड़पति (मिलिनेयर) है और 93 व्यक्ति अरबपति (बिलिनेयर) हैं. यह एक ऐसा महानगर है जहां अकूत वैभव है. टैक्स दर बहुत कम है, कॉर्पोरेट टैक्स लगभग नगण्य़ है और नागरिकों को कोई जीएसटी नहीं चुकाना पड़ता है. गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की भरमार है और अपराध न्यूनतम हैं.  हांग कांग में अगर कोई एक बहुत सामान्य तीन बेडरूम वाला अपार्टमेण्ट भी खरीदना चाहे तो उसे कम से कम दस मिलियन डॉलर खर्च करने के लिए तैयार रहना होगा. यह राशि भारतीय मुद्रा में सत्तर करोड़ के आसपास बैठती है. 

लेकिन जहां इतनी अमीरी है वहीं इस चकाचौंध कर देने वाली चमचमाहट  तले गहरा काला घना अन्धेरा भी है जो इस चौंध को अश्लील और असहनीय बनाता है. हांग कांग के खूब चकाचक घरों और दुनिया भर के महंगे से महंगे साजो-सामान से लबालब भरे शॉपिंग डिस्ट्रिक्ट्स से सटा हुआ ही है वह उपनगर जिसकी  संकड़ी गलियां अवैध निर्मित मकानों और टुकड़ा टुकड़ा बंटे फ्लैट्स से भरी पड़ी हैं. इसी वैभवपूर्ण हांग कांग के हर पांच में से एक बच्चा आज भी उस शिक्षा का मोहताज़ है जो उसके लिए बेहतर ज़िन्दगी के दरवाज़े खोल सकती है. हांग कांग सरकार की सदा ही इस बात के लिए आलोचना की जाती है कि उसकी नीतियां अमीरों की तरफ बहुत ज़्यादा झुकी हुई हैं और हालांकि उसके पास साधनों की कोई कमी नहीं है वह ग़रीबों की तरफ देखती भी  नहीं है. 

हालत यह है कि हांग कांग की तीस फीसदी आबादी सार्वजनिक रिहायश में रहती है और जितने लोग वहां रह पा रहे हैं उनसे कई गुना ज़्यादा वहां रहने का सपना ही देखते रह जाते हैं. हर नाम की एक 75 वर्षीया विधवा आण्टी का मामला ही लीजिए. उनका नाम  सार्वजनिक रिहायश के लिए प्रतीक्षा सूची  में है और आठ बरसों से वे बहुत छोटे और अवैध रूप से निर्मित एक उपविभाजित फ्लैट  में आठ अन्य परिवारों के साथ गुज़ारा कर रही हैं. इस सीलन भरे फ्लैट की छतें टपकती रहती हैं और चूहे  धमाचौकड़ी मचाते रहते हैं. फिर भी इसके लिए उन्हें तीन सौ डॉलर प्रतिमाह देना पड़ता है जो उनको मिलने वाली सरकारी पेंशन का एक तिहाई है. आण्टी हर भी चाहती हैं कि इस बोसीदा फ्लैट से बाहर निकल कर गरिमापूर्ण जीवन जी सकें, लेकिन उन्हें इसकी कोई उम्मीद नज़र नहीं आती है. कहना अनावश्यक है कि हांग कांग में ऐसी अनगिनत आण्टियां और अंकल हैं जो वैभव नहीं सिर्फ सामान्य सुखी और गरिमापूर्ण जीवन  जीना चाहते हैं. लेकिन वे किसी की भी प्राथमिकता सूची में नहीं हैं. और ऐसा भी नहीं है कि ऐसी स्थिति बुज़ुर्गों की ही है. इस चमचमाते शहर की युवा पीढ़ी भी आवास समस्या से बुरी तरह पीड़ित है. अगर उनका सम्बन्ध  किसी अमीर परिवार से नहीं है तो उनके लिए  भी अपना मकान एक कभी साकार  न होने वाला सपना है. हांग कांग की आवास समस्या के मूल में यह बात भी है कि उसमें ज़्यादा पूंजी चीन की लगी हुई है और चीन की दिलचस्पी हांग कांग के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की बजाय मुनाफ़ा कमाने में है.   

हांग कांग के बारे में किसी ने बहुत उपयुक्त  टिप्पणी की है कि इस शहर की फितरत ऐसी है कि यह केवल अमीरों का साथी है. अगर आप अमीर हैं तो यह हर पल आपका साथ देता है, जनता से कमाया हुआ सारा टैक्स आप पर खर्च कर देना चाहता है. लेकिन अगर आप अमीर नहीं हैं तो फिर यह समझ लीजिए कि खुद इस शहर को मालूम नहीं कि आपके साथ क्या और कैसा सुलूक किया जाए. असल बात तो यह कि अगर आप अमीर नहीं हैं तो इस शहर के लिए आपका कोई वुज़ूद है ही नहीं.   
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत  इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.   

Friday, April 19, 2019

जापान में चुनौती बनी नागरिकों की बढ़ती उम्र


अगर किसी देश के नागरिकों की औसत आयु में वृद्धि होती है तो उसे वहां की व्यवस्था की कामयाबी माना जाता है,  लेकिन कभी-कभी यही कामयाबी कुछ मुसीबतों का कारण भी बन जाती है. कम से कम जापान में तो ऐसा ही हो रहा है. जापान दुनिया के उन देशों में प्रमुख है जहां वृद्धों की संख्या सबसे ज़्यादा है. वर्तमान  सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जापान में पैंसठ साल या उससे अधिक आयु के काम करने वालों की संख्या अस्सी लाख से अधिक है जो कुल काम करने वालों की संख्या की बारह प्रतिशत है. पैंतीस सदस्यीय आर्थिक  सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के देशों में से जापान में उम्र के लिहाज़ से काम कर सकने  वालों और वृद्धों के बीच का अनुपात सबसे ज़्यादा है. समय के साथ वहां काम न कर सकने वालों की संख्या बढ़ती और काम करने वालों की संख्या घटती जा रही है. अभी वहां वृद्धावस्था निर्भरता पचास प्रतिशत से अधिक है और सन 2050 तक आते-आते यह बढ़कर अस्सी प्रतिशत हो जाएगी. इसका अर्थ यह कि  जापान का संकट यह है कि वहां काम करने वाले लगातार कम होते जा रहे हैं और काम न कर सकने  वालों पर व्यय लगातार बढ़ता जा रहा है. लोगों के ज़्यादा जीने का सीधा असर  अर्थ व्यवस्था  पर यह भी पड़ता है कि पेंशन पर ज़्यादा खर्च करना पड़ता है. जापान का संकट इस बात से और गहरा जाता है कि वहां की सरकार विदेशियों को काम के लिए अपने देश में बुलाने के मामले में बहुत उत्साही नहीं है. इस कारण भी वहां काम करने वालों की कमी अन्य देशों की तुलना में अधिक गम्भीर हो जाती है.  इस समस्या का एक और आयाम यह है कि जो लोग सेवा निवृत्त होते हैं उन्हें मिलने वाली पेंशन उनकी अपेक्षाओं और ज़रूरत से कम होती है, इसलिए उन्हें सेवा निवृत्ति के बाद आर्थिक संकटों का सामना करना पड़ता है. अभी जापान में एक कर्मचारी को औसतन डेढ़ लाख येन की पेंशन मिलती है जो कि उस सरकारी लक्ष्य से काफी कम है जिसके अनुसार किसी भी वेतनभोगी कर्मचारी को सेवा निवृत्ति के बाद उसके सेवा निवृत्ति से ठीक पहले के वेतन का कम से कम साठ प्रतिशत तो मिलना ही चाहिए. यह राशि दो लाख बीस हज़ार येन होती है.

इस तरह जापान में संकट अनेक आयामी है.  एक तरफ कर्मचारी हैं जो कम पेंशन की वजह से सेवा निवृत्ति को सुखद नहीं मानते हैं तो दूसरी तरफ देश में काम करने वालों की घटती  जा रही संख्या के कारण  आने वाली विभिन्न दिक्कतें हैं. इन सबका मिला-जुला असर यह हुआ है कि वहां की शिंज़ो एबे सरकार इस बात पर गम्भीरता से विचार कर रही है कि कर्मचारियों की वर्तमान सेवा निवृत्ति की आयु को पैंसठ वर्ष से बढ़ाकर सत्तर या पिचहत्तर वर्ष कर दिया जाए. वैसे यथार्थ यह है कि भले ही अभी वहां सेवा निवृत्ति की आयु पैंसठ वर्ष है वहां की अधिकांश कम्पनियां  अपने वेतन व्यय को नियंत्रित रखने के लिए कर्मचारियों को साठ वर्ष की उम्र में ही सेवा निवृत्त हो जाने को प्रोत्साहित करती हैं, और अगर वे इसके बाद पांच  बरस और काम करना ज़ारी रखना चाहते हैं तो उन्हें कम वेतन पर काम करने का प्रस्ताव दिया जाता है.

काम करने वालों की कमी की समस्या का मुकाबला  करने के लिए जापान में अन्य अनेक श्रम सुधारों पर भी विचार और अमल किया जा रहा है. ओवरटाइम को हतोत्साहित किया जाने लगा है और काम के समय और शर्तों में अधिक उदारता बरती जाने लगी है. जापान इस बात  के लिए कुख्यात है कि वहां लोगों के काम के घण्टे बहुत ज़्यादा होते हैं. अब वहां काम के घण्टे कम किये जा रहे हैं और घर से काम करने के नियमों को भी अधिक उदार  बनाया जा रहा है. इससे यह उम्मीद बढ़ रही है कि स्त्रियां और सेवा निवृत्त लोग भी काम करने के लिए आगे आएंगे और जापान का काम करने वालों की कमी का संकट कुछ तो कम होगा. इस सबके साथ जापान सरकार पर इस बात के  लिए भी भारी दबाव है कि वह अपने देश में काम के लिए आने वाले विदेशियों  का अधिक गर्मजोशी से स्वागत करे और कम से कम अधिक तकनीकी कौशल और दक्षता की ज़रूरत वाले पदों के लिए विदेशियों को अपने देश में आने दे. ऐसा करने से वहां का दक्ष कर्मचारियों की कमी का संकट भी कुछ कम होगा. कहना अनावश्यक है कि सरकार भी इस बात पर गम्भीरता से विचार कर रही है. अगर ये सारी बातें क्रियान्वित हो जाती हैं तो यह सबके लिए सुखद होगा – काम करने वालों के लिए भी और जापान देश के लिए भी.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत शुक्रवार, 19 अप्रैल, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, April 9, 2019

आइए पानी पर चर्चा कर लें!


इन दिनों हमारे ज्ञान  का सबसे बड़ा स्रोत वॉट्सएप बन गया है. हर विषय पर हर तरह का ज्ञान वहां मौज़ूद है और इस ज्ञान में लगातार इज़ाफा होता जा रहा है. हालत  यह हो गई है कि लोगों ने किताबों वगैरह का दामन  छोड़ इस वॉट्सएप विश्वविद्यालय में दाखिला ले लिया है. न केवल दाखिला ले लिया है, हममें से हरेक इसका प्रोफ़ेसर भी बन बैठा है और यहां प्राप्त ज्ञान को निस्वार्थ भाव से अपने तमाम जान पहचान वालों कों बांटने  के पुण्य कर्म में जुट गया है. आपके पास कोई संदेश आता है और आप उसे पूरा पढ़ने से पहले ही अपने जान पहचान वालों को फॉर्वर्ड  कर डालते हैं. जब आप उसे पूरा पढ़ने तक का धैर्य नहीं बरतते तो इस बात की तो कल्पना ही क्यों की जाए कि आप उस संदेश की प्रामाणिकता पर भी कोई  विचार करेंगे. इस नए माध्यम पर जो संदेश सबसे ज़्यादा इधर-उधर होते हैं उनमें स्वास्थ्य विषयक संदेश भी शामिल हैं. राजनीतिक संदेश तो ख़ैर होते ही हैं. स्वास्थ्य एक बहुत गम्भीर मसला है लेकिन इस माध्यम को बरतने वाले इतने भले हैं कि यहां प्राप्त हर संदेश को वे ब्रह्म वाक्य मान आगे ठेल देते हैं, चाहे वह कितना ही अतार्किक क्यों न हो!

इधर कुछ समय से हमारे देश में भी पानी पीने के फायदे बताने वाले संदेशों की बाढ़ आई हुई है. कितना पानी पिया जाए से लगाकर पानी पीने के तौर तरीकों और पानी पीने के फायदों को लेकर हर रोज़ नहीं तो हर दूसरे-तीसरे दिन कोई न कोई संदेश आ ही जाता है, और मज़े की बात यह कि उनमें से बहुत सारे संदेश परस्पर विरोधी भी होते हैं. लेकिन भेजने वालों को इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता है. वे खुद उन संदेशों को पूरा पढ़ते ही कहां हैं? वैसे, भारत में ही नहीं दुनिया के अन्य देशों में भी इधर पानी की महत्ता खूब स्वीकार की जाने लगी है. हमारा कवि तो बहुत पहले कह ही गया है – रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून. लेकिन अगर मैं यह कहूं कि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक दुनिया के बहुत सारे देशों में प्यास बुझाने के लिए पानी एक असामान्य बात थी, तो आप चौंक जाएंगे.  हाइड्रोपैथी यानि जल चिकित्सा के संस्थापक विंसेण्ट प्रिज़नित्ज़ का कहना है कि केवल वे लोग जो गरीबी की अंतिम अवस्था तक पहुंच चुके होते थे, वे ही अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी पीते थे. बकौल विंसेण्ट, बहुत ही कम लोग ऐसे थे जो एक बार में आधा पिण्ट सादा पानी पी लेते हों. लेकिन अब समय बहुत बदल गया है. ब्रिटेन में लोग पहले से काफी ज़्यादा पानी पीने लगे हैं और अमरीका में तो बोतल बंद पानी  की बिक्री ने सोड़ा की बिक्री को पीछे छोड़ दिया है. हर जगह यह बताया जाता है कि ज़्यादा पानी पीना हमारी सेहत के लिए, हमारी त्वचा के लिए, हमारी ऊर्जा के लिए और हमारे कैंसर से बचाव के लिए फायदेमंद है.

आम तौर पर यह सलाह दी जाती है कि हर व्यक्ति को दिन में कम से कम आठ गिलास पानी ज़रूर पीना चाहिए. लेकिन मज़े की बात यह कि इस सलाह का कोई अभिलेखित वैज्ञानिक आधार नहीं है. ज़्यादा पड़ताल करने पर पता चला कि दशकों पहले की दो सलाहों को तोड़  मरोड़कर आठ गिलास पानी पीने की सलाह गढ़ दी गई है. 1945 में अमरीकी नेशनल रिसर्च कौंसिल के फूड एण्ड न्यूट्रीशन बोर्ड ने यह सलाह दी थी कि हर स्त्री पुरुष को हर रोज़ अपने भोजन में जितनी कैलोरी की ज़रूरत होती है उन्हें उस हर कैलोरी के बदले एक मिलिलीटर द्रव्य पदार्थ भी लेना चाहिए. अब क्योंकि स्त्रियों के लिए दो हज़ार और पुरुषों के लिए ढाई हज़ार कैलोरी ज़रूरी मानी गई, इसके अनुसार दो ढाई लिटर द्रव्य भी ज़रूरी समझा गया. यहां हम जान बूझकर द्रव्य शब्द का प्रयोग कर रहे हैं जिसमें फलों और सब्ज़ियों में शामिल द्रव्य भी आ जाता है, और जिसका अर्थ केवल पानी नहीं है. दूसरी सलाह दो पोषण वैज्ञानिकों मारग्रेट मैक विलियम्स और फ्रेडरिक् स्टेयर ने अपनी किताब न्यूट्रीशन फॉर गुड हेल्थ में दी थी कि एक सामान्य वयस्क को हर रोज़ छह से आठ गिलास पानी पीना चाहिए. लेकिन उनकी सलाह के अनुसार पानी का अर्थ फल सब्ज़ियां चाय कॉफी यहां तक कि बीयर भी था. लेकिन बात चल निकली और आठ गिलास ब्रहम वाक्य बन गई.

इसी तरह त्वचा के लिए पानी के फायदों की जो बात कही जाती है उसका भी कोई  अभिलेखित आधार नहीं है. सारी बात का लब्बेलुआब यह कि बहुत सारी बातें इतनी बार दुहराई गई हैं कि हमें उनकी प्रामाणिकता पर विचार करने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती. फिर भी, यह तो समझा ही जाना चाहिए कि भले ही पानी हमारी सेहत के लिए अच्छा हो, उसकी अति का कोई औचित्य नहीं है.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 अप्रेल 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 2, 2019

चुनाव में होता है तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल


समय बदलने के साथ चुनाव के तौर तरीकों में भी बदलाव आया है और आता जा रहा है. कहा जाता है कि प्रेम और युद्ध में सब कुछ ज़ायज़ होता है. चुनाव भी एक तरह का युद्ध ही तो है, उसे भी लड़ा ही जाता है, और इसलिए यहां भी जायज़-नाजायज़ के बीच की सीमा रेखा बहुत पतली होती है. उसे लांघने का आकर्षण जितना दुर्निवार होता है, लांघ जाना  भी उतना ही आसान होता है. सुरक्षा के नित नए प्रबंध किये जाते हैं और उसी तेज़ी के साथ उनके तोड़ भी निकाल लिये जाते हैं. तू डाल-डाल मैं पात-पात का खेल चलता रहता है. यह समय इण्टरनेट और सोशल मीडिया  का है और आजकल चुनाव जितने ज़मीन पर लड़े जाते हैं उतने ही इन माध्यमों पर भी लड़े जाते हैं. अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में ही नहीं हमारे अपने देश में होने वाले बड़े और छोटे चुनावों में भी हमने इन माध्यमों का उपयोग-दुरुपयोग होते खूब देखा है. अभी हाल में  सम्पन्न हुए यूक्रेन के राष्ट्रपति के चुनाव में एक बार फिर यह मुद्दा ज़ोर-शोर से उठा है कि फ़ेसबुक का प्रयोग चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है. बात केवल प्रभावित करने की होती तो भी ठीक था. पीड़ा की बात यह रही कि इस माध्यम पर मिथ्या एवम दुष्प्रचार के लिए इस्तेमाल हो जाने के आरोप लगे. वैसे 2016 के अमरीकी चुनावों के अनुभवों से सबक लेते हुए फ़ेसबुक ने अपनी सुरक्षा व्यस्था को और ज़्यादा चाक चौबंद कर डालने के प्रयास और दावे किये. जनवरी में इसने एक सौ पचास फर्ज़ी खातों को बंद कर दिया और फिर कुछ समय बाद रूस से सम्बद्धता  रखने वाले ऐसे करीब दो हज़ार पृष्ठों, समूहों और खातों को प्रतिबंधित कर दिया जो यूक्रेन के बारे में मिथ्या सामग्री पोस्ट कर रहे थे. याद दिलाता चलूं कि यूक्रेन के मामले में रूस गहरी दिलचस्पी रखता है और उस पर प्राय: यूक्रेन  की राजनीति को प्रभावित करने के प्रयासों के आरोप लगते रहते हैं.  लेकिन अंतत: यही साबित हुआ कि ताले तो साहूकारों के लिए होते हैं, चोरों के लिए नहीं.

यूक्रेन की घरेलू गुप्तचर  सेवा एसबीयू की पड़ताल से पता चला कि फ़ेसबुक की नई सुरक्षा व्यवस्था को धता बनाने के लिए यूक्रेनी नागरिकों का ही इस्तेमाल किया गया. ऐसे यूक्रेनी नागरिकों को तलाश किया गया जो कुछ धन लेकर कुछ समय के लिए या हमेशा के लिए अपने फ़ेसबुक खातों का प्रयोग अन्यों को करने की छूट दे दें. यह एक तरह से अपने खाते को किराये पर देने की बात हुई. और इस तरह यूक्रेनी नागरिकों के फ़ेसबुक खातों से अन्य निहित स्वार्थ वाले लोग वह सामग्री पोस्ट करने लगे जिससे यूक्रेन के चुनावों पर असर पड़े. इस सामग्री में राजनीतिक विज्ञापन और दलों व प्रत्याशियों के बारे में दुष्प्रचार वाली सामग्री शामिल थी. यूक्रेन की गुप्तचर सेवा ने पता लगा लिया कि इस तरह की ज़्यादा सामग्री रूस से पोस्ट की गई, भले ही जिन खातों वह पोस्ट की गई वे यूक्रेनी नागरिकों के नाम पर थे. फ़ेसबुक की सुरक्षा में सेंध लगाने वालों  ने यूक्रेन के राष्ट्रपति पद के एक अग्रणी  प्रत्याशी ज़ेलेंस्की तक को नहीं बख़्शा. उनके असल फेसबुक खाते से मिलते-जुलते बेहिसाब फर्ज़ी खाते बना डाले गए और उन पर तमाम तरह की मिथ्या और दुर्भावनापूर्ण सामग्री पोस्ट कर दी गई. लोगों के लिए यह जानना मुश्क़िल था कि ज़ेलेंस्की का असली खाता कौन-सा है और फर्ज़ी खाता कौन-सा. शिकायत की जाने पर फ़ेसबुक ने ऐसे बहुत सारे फर्ज़ी खातों  को निष्क्रिय किया और खुद ज़ेलेंस्की की अपनी टीम ने भी इस तरह के फर्ज़ी खातों  के खिलाफ एक ज़ोरदार अभियान चलाकर इन्हें बेअसर  करने का प्रयास किया.

इस मामले पर फ़ेसबुक प्रशासन का कहना है कि जैसे जैसे हम अपनी सुरक्षा को कड़ी करते जाएंगे इसमें सेंध लगाने वाले भी नए नए तरीके इज़ाद करते जाएंगे. लेकिन इसके बावज़ूद यह सच है कि हमारा हर प्रयास इन ताकतों के इरादों को एक हद तक तो नाकामयाब  करता ही है. इस संदर्भ में उनका यह कहना भी तर्क संगत लगता है कि राजनीतिक दल भी अपने प्रतिपक्षियों के खिलाफ झूठी बातें फैलाने के लिए पेशेवर कम्पनियों वगैरह का इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आते हैं. फ़ेसबुक के इन कथनों की पुष्टि खुद यूक्रेन  के कुछ अधिकारियों और राजनीतिज्ञों ने भी की है और कहा है कि खुद उम्मीदवार भी अपने प्रतिपक्षियों के खिलाफ मिथ्या जानकारियां प्रसारित करने में संकोच नहीं करते हैं. इस संदर्भ में यूएनओ में रूस के प्रथम उप स्थायी प्रतिनिधि द्मित्री पोलियांस्की का यह कथन भी अर्थपूर्ण है कि सोशल मीडिया तो एक खुला मंच  है और यह बहुत स्वाभाविक है कि लोग अपने अपने हितों को साधने के लिए इसका इस्तेमाल  करें.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ इधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक चार अप्रैल 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Thursday, March 28, 2019

यूनान में विरासत के लिए चुनौती बन रहा है पर्यटन


यूनान यानि ग्रीस की राजधानी एथेंस इन दिनों दुनिया भर  के पर्यटकों से गुलज़ार है. जिसे देखो वही इस प्राचीन सभ्यता वाले देश की सैर कर अतीत से रू-ब-रू  होने को लालायित है. अनुमान किया जा रहा है कि इस बरस कोई पचास लाख पर्यटक इस एक करोड़ की आबादी वाले देश में पहुंचेंगे. पिछले कुछ समय से आर्थिक संकटों से जूझ रहे देश के लिए यह बहुत अच्छी बात है. पर्यटन किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा सम्बल होता है. लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है. जब किसी भी पर्यटन स्थल पर भारी संख्या  में पर्यटक पहुंचते हैं तो उनके लिए बहुत सारी सुख सुविधाओं की भी ज़रूरत होती है. आज का पर्यटक सितारा सुविधाएं चाहता है और इसके लिए वह अकूत धनराशि खर्च करने में कोताही नहीं करता है. उसकी यह व्यय क्षमता स्थानीय व्यवसाइयों को नई सुविधाओं का सृजन करने के लिए प्रेरित करती है. पर्यटक आते हैं तो उनके लिए नए होटल बनाए जाते हैं, बिजली पानी का प्रबंध किया जाता है, सड़कें चौड़ी की जाती हैं, और जाने क्या-क्या होता है. अपने ही देश की बात कीजिए तो पर्यटकों की सुविधा के लिए  प्राचीन नगरी वाराणसी की बेहद संकड़ी विश्वनाथ परिक्रमा वीथि को चौड़ा किया जा रहा है. स्वाभाविक है कि पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के प्रयासों में प्राचीन स्थलों का मूल स्वरूप बदलने लगता है. बदलाव जब बहुत ज़्यादा हो जाता है तो मूल स्वरूप लुप्त हो जाता है.

समझदार और संवेदनशील लोग एथेंस में आ रहे बदलावों को लेकर इसी कारण व्यथित हैं.  आहिस्ता-आहिस्ता उनकी व्यथा एक आंदोलन का रूप लेती जा रही है. वहां पर्यटकों की भारी आमद की वजह से अनेक नए और बहु मंज़िला होटल बनाए जा रहे हैं. एथेंस का विश्वप्रसिद्ध आकर्षण है एक्रोपोलिस. एक तरह से यह एक विशाल किले के अवशेष हैं. यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल घोषित कर रखा है. पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में निर्मित यह स्थल अपनी भव्यता में अनुपम है. बहुत दूर से भी इसे देखा जा सकता है. लेकिन अब पर्यटकों की सुख सुविधाओं से जुड़ा लालच इसकी भव्यता के लिए चुनौती बनता जा रहा है. हाल में इसके नज़दीक एक दस मंज़िला होटल बना है जिसे इस इलाके की सबसे ऊंची इमारत माना जा रहा है. इस होटल की वजह से एक्रोपोलिस की दृश्यता बाधित होने लगी है. और यह एक शुरुआत है. पुरातत्व प्रेमियों को लग रहा है कि अगर इस प्रवृत्ति को नियंत्रित नहीं किया गया तो न केवल एथेंस का प्राचीन स्वरूप विलुप्त हो जाएगा, अंतत: यह अपना सारा आकर्षण ही खो बैठेगा.

स्विटज़रलैण्ड में प्रशिक्षित एक वास्तुविद और नगर नियोजक फ्रेज़ाडू ने वहां एक अभियान शुरु किया है और बहुत कम समय में उन्होंने अपने अभियान के लिए पच्चीस  हज़ार लोगों के दस्तख़त जुटा लिये हैं. फ्रेज़ाडू का कहना है कि उनका संगठन यह चाहता है कि नए भवनों के निर्माण और शहरी आयोजन के लिए फौरन व्यावहारिक नियम बनाए जाएं. उनके संगठन ने यूनान की सर्वोच्च प्रशासनिक अदालत के दरवाज़े भी खटखटाए हैं और यह अनुरोध किया है अभी निर्माण कार्यों को जो खुली छूट मिली हुई है उसे रोका जाए. यह अभियान चलाने वाले संगठन के वकील ने एक बहुत तर्क संगत बात कही है: “हम बेहूदगी पसंद लोग नहीं हैं. हम भी यह बात महसूस करते हैं कि एथेंस को बेहतर होटलों की सख़्त ज़रूरत है. लेकिन उन होटलों का निर्माण हमारे महानतम स्मारकों की कीमत पर नहीं होना चाहिए. हमारी मांग यह नहीं है कि महान स्मारक के पास जो इमारत बना दी गई है, उसे ध्वस्त कर दिया जाए. हम तो बस इतना चाहते हैं कि उसकी ऊंचाई को नियंत्रित किया जाए.” इसी तरह के अभियान में जुटे एक और संगठन के प्रतिनिधि  का कहना है कि “जब हमने यह जाना कि कुछ इमारतें एक्रोपोलिस की दृश्यता को बाधित कर रही हैं तो हमें यह बात राष्ट्रीय आपातकाल जैसी लगी. एक्रोपोलिस प्रजातंत्र का प्रतीक है और दुनिया में बहुत कम स्मारक ऐसे हैं जो देश विशेष के पर्याय हैं. उन्हें हर कीमत पर बचाया जाना ज़रूरी है.” 

इन अभियानों का सकारात्मक परिणाम भी नज़र आया है. पिछले ही सप्ताह एथेंस की सरकार ने यह घोषणा की है कि एक्रोपोलिस के आसपास के पुरातात्विक बफ़र ज़ोन में निर्माण कार्य की अनुमतियां फिलहाल स्थगित की जा रही हैं. यही नहीं, सरकार ने यह भी घोषणा की है कि साढ़े  सत्रह मीटर से ऊंची इमारतों का निर्माण अगले वर्ष भी प्रतिबंधित रहेगा. यूनान के सांस्कृतिक मंत्री ने भी कहा है कि “इन स्मारकों को देख पाना एक सांस्कृतिक पुण्य है और इसे हम किसी भी  अवस्था में कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक सीमित नहीं कर सकते. हमें सिविल सोसाइटी के प्रतिरोध पर ध्यान देना ही होगा ताकि न्याय और कानून की रक्षा हो सके.” यह बात तो भविष्य ही बताएगा कि ये प्रयास विरासत  को बचाए रखने में किस हद तक कामयाब होते हैं!

वैसे यह संकट अकेले यूनान का नहीं है.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 मार्च, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, March 5, 2019

यह अध्यापिका नामुमकिन को मुमकिन बना रही है!


कहा जाता है कि वर्तमान पीढ़ी के बच्चों में किताबें पढ़ने का शौक ढलान पर है. इसकी एक वजह यह बताई  जाती है कि आज उनके पास अपना वक़्त बिताने के अनेक और विशेष रूप से इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के विकल्प मौज़ूद हैं. यह यथार्थ हमारा ही नहीं सारी दुनिया का है. लेकिन इसी यथार्थ के साथ एक यथार्थ और भी है और वह यह कि लोग अपनी-अपनी तरह से अपने बाद वाली पीढ़ी को किताबों की तरफ आकर्षित करने के लिए प्रयत्नरत हैं. आज मैं ऐसे ही प्रयास में जुटी एक महिला की प्रेरक गाथा आपके साथ साझा कर रहा हूं.

अमरीका के दक्षिणी पूर्वी टेक्सास के होमर ड्राइव एलीमेण्ट्री स्कूल की बयालीस वर्षीया प्रिंसिपल डॉ बेलिण्डा जॉर्ज पिछले कुछ समय से अपने स्कूल के बच्चों को किताबों की तरफ खींचने के लिए एक अनूठा तरीका आज़मा रही हैं. वे करती यह है कि हर मंगलवार शाम को अपने लिंविंग रूम में अपने मोबाइल फोन के कैमरे के सामने बैठकर बच्चों की किसी किताब का वाचन करती हैं और इस वाचन का  वे फ़ेसबुक लाइव पर सजीव प्रसारण करती हैं. उनके स्कूल के फेसबुक पेज पर जाकर कोई भी उनके इस वाचन को देख-सुन सकता है. किताब या उसके अंश को पढ़ते हुए वे अपनी आवाज़ को पात्रानुसार बदलती रहती हैं और ज़रूरत पड़ने पर अपनी तरफ से मनोरंजक टिप्पणियां भी करती चलती हैं. अगर मुमकिन होता है तो वे वाचन वाले अंश से सम्बद्ध वस्तुएं भी अपने प्रसारण में शामिल कर लेती हैं, मसलन अगर वे अंतरिक्ष यात्री से सम्बद्ध कोई अंश सुनाती हैं तो अंतरिक्ष यात्री की आकृति वाला कोई खिलौना भी दिखा देती हैं.   उनका यह प्रयोग इतना लोकप्रिय हो गया है कि उनके स्कूल के बच्चे न केवल बेसब्री से मंगलवार  की शाम का इंतज़ार करते हैं, उनमें से बहुत सारे अगले दिन स्कूल में आकर उनके इस वाचन पर अपनी प्रतिक्रिया भी देते हैं और यह भी कहते हैं कि भविष्य में वे उनसे किस किताब  का वाचन सुनना चाहेंगे. उनके वाचन से प्रभावित बच्चे यह भी पूछते हैं कि क्या वह किताब स्कूल की लाइब्रेरी में उपलब्ध है, और अगर नहीं है तो वो उन्हें कहां मिल सकती है.

डॉ बेलिण्डा  जॉर्ज का यह प्रयोग बमुश्क़िल एक बरस पुराना है. इसकी शुरुआत उन्होंने अपने स्कूल के 680 विद्यार्थियों के लिए की थी. लेकिन उनके कुछ वीडियो तो दो हज़ार से भी ज़्यादा लोगों ने देखे हैं. ऐसा इस कारण सम्भव हुआ है कि स्कूल के बच्चों  और उनके अभिभावकों से इसकी प्रशंसा सुन कर मीडिया वालों ने भी इस  पर ध्यान दिया है और उनके कारण अमरीका के अनेक शहरों के बच्चे और उनके अभिभावक न केवल इस लाइव प्रसारण को देखने-सुनने लगे हैं, वे अपनी प्रतिक्रियाएं भी पोस्ट करने लगे हैं. बेलिण्डा का कहना है कि उन्हें अपने विद्यार्थियों से बहुत प्यार है और वे घर और स्कूल के बीच रिश्ते मज़बूत करने की आकांक्षा  से यह काम करती हैं. वे एक बहुत महत्वपूर्ण बात कहती हैं: “मैं जानती हूं कि अगर मैं उनसे स्कूल के बाहर नहीं जुड़ सकी तो फिर स्कूल के भीतर भी उनके नज़दीक  नहीं आ सकूंगी.” मुझे लगता है कि यह ऐसी बात है जिसे हर शिक्षक को गांठ में बांध लेना चाहिए.  

एक दिलचस्प  बात यह है कि बेलिण्डा प्राय: पाजामा पहन कर ये वाचन करती हैं. जब उनसे इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया कि अपने वाचन के आखिर में वे बच्चों को शुभ रात्रि भी कहती है, “और मैं चाहती हूं कि जो मैं कहती हूं वो करती हुई भी दिखाई दूं.” अपने वाचन के प्रारम्भ में वे उन बच्चों की हाज़िरी भी लेती हैं जिन्होंने उनके इस इस फ़ेसबुक पेज  के लिए साइन अप कर रखा है.  वे इस बात का पूरा ध्यान रखती हैं कि किसी भी बच्चे के नाम का उच्चारण ग़लत न हो जाए. सबसे ख़ास बात तो बेलिण्डा यह बताती हैं कि उनके 94 प्रतिशत विद्यार्थी समाज के निचले तबके से हैं और उनके इस प्रयोग का परिणाम यह हुआ है कि उनकी पढ़ने और समझने की क्षमता का बहुत तेज़ी से विकास हुआ है. अपने विद्यार्थियों के प्रति वे सदैव सकारात्मक रुख अपनाती हैं. वे इस कड़वी सच्चाई से भली भांति परिचित हैं कि उनके बहुत सारे विद्यार्थी बहुत समय तक अपनी पढ़ाई ज़ारी नहीं रख सकेंगे. कॉलेज तक तो शायद बहुत ही कम पहुंच पाएं. लेकिन वे कोशिश करती हैं कि इस बात को लेकर उनके विद्यार्थियों के मन में कोई  हताशा या कुण्ठा न पनपे. वे उन्हें एक ही सीख देती हैं: तुम जो भी करो, उसे सर्वोत्तम तरीके से करना. अगर तुम्हें गड्ढा भी खोदना हो तो ऐसे खोदना कि देखने वालों  के मुंह से बरबस ‘वाह’ निकल पड़े. बेलिण्डा जॉर्ज के इस प्रयास को जान मुझे बेसाख़्ता अपने दुष्यंत कुमार का यह शे’र याद आ गया है: कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारों.   
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 मार्च, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, February 27, 2019

एक आदमी ने बदल डाली देश की छवि


यह कहावत तो आपने ज़रूर सुनी होगी कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, लेकिन यह बात शायद आपके लिए नई हो कि हमारी इसी दुनिया में इस कहावत को मिथ्या साबित करने वाले लोग भी मौज़ूद हैं. आज ऐसे ही एक बहादुर नौजवानसे आपकी मुलाकात करवा रहा हूं. आप उनकी उम्र पर न जाएं. वे मात्र इक्यासी साल के हैं लेकिन जवानी उनमें कूट कूट कर भरी है. बुंगाकू वाटानाबे नामक  इस जापानी युवा ने इकतालीस बरस पहले जापान एक्शन फॉर नॉन स्मोकर्स राइट्स नामक एक संस्था की स्थापना कर जो अभियान चलाया अब उसके परिणाम स्पष्ट नज़र आने लगे हैं. बरस 1966 में जब जापान में धूम्रपान का शौक अपने चरमोत्कर्ष पर था तबके आंकड़ों के अनुसार वहां की जनसंख्या का 49.4 प्रतिशत और पुरुष आबादी का 83.7 प्रतिशत धूम्रपान करता था. लेकिन सन 2018 के आंकड़े बताते हैं कि अब जापान में धूम्रपान करने वालों की संख्या घटकर मात्र 17.9 प्रतिशत रह गई है. लेकिन इस बदलाव के लिए बुंगाकू वाटानाबे ने अपनी ज़िंदगी के बेशकीमती चार दशक खपाये हैं. एक समय था जब जापान को धूम्रपान करने वालों का स्वर्ग कहा जाता था. कहना ग़ैर ज़रूरी है कि इन धूम्रपान करने वालों की वजह से धूम्रपान नहीं करने वालों को  नारकीय जीवन जीना पड़ता था. बुंगाकू के संघर्ष की वजह से अब समाज और सरकार ने धूम्रपान न करने वालों  की फ़िक्र करना शुरु किया है और अधिकांश सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध हुआ है.

चालीस बरस पहले ऐसा  नहीं था. धूम्रपान करने की तलब कहीं भी पूरी जा सकती थी - रेल्वे स्टेशनों पर, अस्पतालों के प्रतीक्षालयों में, थिएटरों में, बेसबॉल स्टेडियमों में और करीब-करीब सभी बारों और रेस्तराओं में. हालत यह थी कि जब किसी स्टेशन से कोई ट्रेन छूटती उसके बाद रेल की पटरियां पी जा चुकीं सिगरेटों के टुड्डों यानि बचे खुचे टुकड़ों के कारण एकदम  सफेद दिखाई दिया करती थीं. लोग धूम्रपान के ख़तरों से अनजान थे. खुद बुग़ाकू वाटानाबे जमकर  धूम्रपान करते थे. एक दिन में साठ सिगरेटें  तो वे फूंक ही डालते थे. लेकिन 6 मई 1977 को उन्होंने सिगरेट  को अलविदा कह दिया. और इसके कुछ ही समय बाद अपनी संस्था, जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है, बनाकर देश को धूम्रपान मुक्त करने के अभियान में जुट गए. लेकिन उनका काम आसान नहीं था. इसलिए आसान नहीं था कि जापान की स्थितियां भिन्न थीं. जापान दुनिया के उन बहुत थोड़े देशों में था जहां तम्बाकू और सिगरेट के कारोबार पर सरकार का करीब-करीब एकाधिकार था. सन 2013 तक तो वहां तम्बाकू उद्योग में सरकार की आधी भागीदारी हुआ करती थी. बुंगाकू वाटानाबे बताते हैं कि “फ्रांसिसी सरकार के पास रेनों (एक कार निर्माता कम्पनी) के मात्र 15 प्रतिशत शेयर हैं, लेकिन जापान में सरकार के पास तम्बाकू कम्पनी के एक तिहाई शेयर हैं. यहां वित्त विभाग तम्बाकू को नियंत्रित करता है. किसी भी अन्य देश में ऐसा नहीं है. दूसरे देशों में तम्बाकू पर जन स्वास्थ्य विभाग  का नियंत्रण होता है.” इस व्यवस्था के कारण खुद सरकार तम्बाकू और धूम्रपान पर नियंत्रण करने में उदासीनता बरतती रही है. राजनेता भी तम्बाकू की ख़िलाफत को अपना खुला समर्थन नहीं देते हैं. यहीं यह जानना भी दिलचस्प होगा कि जापान में सिगरेट  की कीमत दुनिया के अन्य देशों की तुलना में बहुत कम रही  है. 1989 में वहां एक लोकप्रिय ब्राण्ड की बीस सिगरेटों की डिब्बी की कीमत बीस येन थी, जो अब बढ़कर चार सौ अस्सी येन हो गई है. फिर भी यह कीमत अन्य देशों की तुलना में काफी कम है. अगर जापानी मुद्रा में तुलना करें तो वही सिगरेट ब्रिटेन में एक हज़ार चार सौ पंद्रह येन में और ऑस्ट्रेलिया में दो हज़ार दो सौ पैंतालीस येन में मिलेगी.

बुंगाकू वाटानाबे को धूम्रपान के खिलाफ अपने संघर्ष में मीडिया का काफी सहयोग मिला है. लोग अब इसके खतरों के प्रति सजग हुए हैं. सन 2003 में जापान ने भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम पर हस्ताक्षर कर तम्बाकू के हर तरह के विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए अपनी सहमति दे दी. लेकिन वहां के तम्बाकू व्यवसायी एक गली निकालकर धूम्रपान शिष्टाचार के विज्ञापन देकर परोक्ष रूप से अपने उत्पादों का विज्ञापन कर ही लेते हैं. ठीक उसी तरह जैसे हमारे यहां के एक निषिद्ध उत्पाद  के निर्माता-व्यापारी सोड़ा या कांच के गिलास जैसे सम्बद्ध उत्पादों का विज्ञापन करके करते हैं. बुग़ाकू वाटानाबे अपने संघर्ष  की अब तक की प्रगति से संतुष्ट तो हैं लेकिन वे चाहते हैं कि उनका देश भी न्यूज़ीलैण्ड, फिनलैण्ड या भूटान जैसा हो जाए जहां धूम्रपान लगभग ख़त्म हो चुका है.  “हमारा लक्ष्य तो यह है कि धूम्रपान एकदम ही ख़त्म हो जाए. फिर हमारे संघर्ष की भी कोई ज़रूरत नहीं रह जाएगी. हमारा लक्ष्य एक धूम्रपान मुक्त समाज है.”
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 26 फरवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, February 19, 2019

जनसंख्या की कमी से जूझते एक देश की दास्तान


मध्य यूरोप का एक छोटा-सा देश हंगरी इन दिनों एक अजीबो-गरीब संकट से जूझ रहा है. जब मैं अजीबो-गरीब संकट की बात कर रहा हूं तो मेरे मन में अपने देश के हालात भी साथ-साथ चहलकदमी कर रहे हैं. ऑस्ट्रिया, स्लोवेनिया, क्रोएशिया, रोमानिया, सर्बिया और स्लोवाकिया जैसे देशों से चारों तरफ घिरा हुआ यह देश अपने सुदीर्घ इतिहास, उच्च आय वाली मौज़ूदा अर्थ व्यवस्था और बेहद मज़बूत पर्यटन उद्योग के लिए जाना जाता है. हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट की गणना यूरोप के सबसे खूबसूरत शहरों में होती है  और हर बरस कोई 44 लाख लोग यह शहर घूमने आते हैं. इस वजह से इसे यूरोप के छठे सर्वाधिक लोकप्रिय शहर का दर्ज़ा हासिल है.  देश के लोग खूब सुखी हैं. यहां की उन्नत व्यवस्थाओं की वजह से लोगों को बहुत आसानी से स्वच्छ पेयजल सुलभ है और वर्ल्ड हैप्पीनेस  रिपोर्ट में इस देश को 69 वां स्थान प्राप्त है.

आप भी सोच रहे होंगे कि जब सब कुछ इतना अच्छा है तो फिर संकट क्या है? संकट है जनसंख्या का. और इसीलिए मुझे अपना भारत याद आ रहा है. हंगरी का संकट हमसे एकदम उलट है. सन सत्तर से ही यहां की जनसंख्या लगातार घटती जा रही है. कभी इस देश की जनसंख्या एक करोड़ दस लाख थी, वह अब घटकर अट्ठानवे लाख चार हज़ार रह गई है. और यह बात हंगरी की सरकार को बेहद परेशान किए हुए है. प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने तो यहां तक कह दिया है कि अगले पांच बरसों तक उनकी सरकार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य ही इस जनसंख्या की गिरावट को रोकने का रहेगा. असल में हंगरी की सरकार की चिंता केवल घटती जनसंख्या को लेकर ही नहीं है. समस्या यह भी है कि वहां युवाओं की तुलना में वृद्धों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. हंगरी में आयु सम्भाव्यता खासी ऊंची यानि 76.1 वर्ष है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि बहुत जल्दी यह बढ़कर 86.7 वर्ष तक जा पहुंचेगी. इसकी वजह से सन 1990 में जहां इस देश में प्रति एक हज़ार  शिशु (0-14 वर्ष) चौंसठ साल की उम्र वाले पैंसठ लोग हुआ करते थे, अब उनकी संख्या बढ़कर एक सौ अट्ठाइस तक जा पहुंची है. इसके विपरीत हाल के बरसों में चौदह वर्ष तक के बच्चों की संख्या में बहुत ज़्यादा कमी आई है. ज़ाहिर है इन बदलावों का असर यहां की उत्पादकता पर पड़ रहा है. मेहनत करने वाले युवा घटते जा रहे हैं और बहुत कम काम कर सकने वाले वृद्ध बढ़ते जा रहे हैं.

हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व जनसंख्या सम्भावनाओं के संशोधित अनुमान की जो रिपोर्ट प्रकाशित की है उसमें भी इन बदलावों पर चिंता ज़ाहिर करते हुए यह भयावह आशंका व्यक्त की गई है कि अगर कोई बड़ा चमत्कार न हुआ तो इस शताब्दी के आखिर तक केंद्रीय और  मध्य यूरोप की पूरी जनसंख्या ही विलुप्त हो जाएगी. इसी रिपोर्ट में यह डर भी व्यक्त किया गया है कि सन 2100 तक हंगरी की जनसंख्या घटकर मात्र साठ लाख रह जाएगी. और ऐसा तब होगा जब इस शताब्दी के अंत तक धरती की जनसंख्या  बढ़कर 11.2 बिलियन हो जाएगी. इस रिपोर्ट का यह आकलन हमारे लिए विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि सन 2017 से 2050 तक दुनिया की जनसंख्या की कुल वृद्धि सिर्फ नौ देशों में सिमट कर रह जाएगी. ये नौ देश हैं: भारत, नाइजीरिया, कॉंगो गणराज्य, पाकिस्तान, इथोपिया, तंजानिया गणतंत्र, अमरीका, युगाण्डा और इण्डोनेशिया.

हंगरी की जनसंख्या समस्या का एक आयाम यह भी है कि वहां की सरकार इस बात को अधिक पसंद नहीं करती है कि अन्य देशों के लोग वहां आकर बसें. इसलिए फिलहाल तो हंगरी के वैज्ञानिक  जहां इस जुगत में हैं कि कैसे बढ़ी उम्र में भी लोगों की कार्यक्षमता को बनाए रखा जाए, वहां की सरकार अपने विभिन्न प्रयासों के माध्यम से लोगों को अधिक संतानोत्पत्ति के लिए प्रेरित करने में जुटी हुई है. इस बात पर विमर्श ज़ारी है कि क्यों नहीं तीन से अधिक संतानों को जन्म देने वाली माताओं को आजन्म आयकर से मुक्ति प्रदान कर दी जाए. इस बात पर भी विचार चल रहा है कि माताओं को तो मातृत्व अवकाश मिलता ही है, अब  पिताओं को भी पैतृक अवकाश दिया जाने लगे. हंगरी में एक व्यवस्था यह भी है कि सरकार  नियमित रूप से जनता से विचार  विमर्श कर भावी नीतियां तै करती है. इस विमर्श में भी जनसंख्या की कमी से निबटने के विभिन्न उपायों पर चर्चाएं होती रहती हैं और उम्मीद की जा रही है कि अगले विमर्श से जो सुझाव आएंगे वे देश की जनसंख्या विषयक नीतियां निर्धारित करने में प्रयुक्त किए जाएंगे. हो सकता है हंगरी और भारत की स्थितियों की तुलना करते हुए आपको भी निदा फाज़ली साहब का यह शेर याद आ जाए: 
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 फरवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, February 5, 2019

उन्हें अपनी शेष ज़िंदगी जेल में गुज़ारना रास आ रहा है!


आम तौर पर जापान को कानून का पालन करने वालों का देश माना जाता है लेकिन इधर वहां कुछ अजीब ही घटित हो रहा है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले बीस बरसों से वहां अपराध करने वाले बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है. 1997 में जहां पैंसठ पार के अपराधी बीस में से एक हुआ करते थे,  अब वे बीस में से चार होने लगे हैं. ग़ौर तलब है वहां बुज़ुर्गों की संख्या इसी अनुपात में नहीं बढ़ी है. यही नहीं, ये बुज़ुर्ग बार-बार अपराध करने लगे हैं. सन 2016 में पैंसठ पार के जिन ढाई हज़ार बुज़ुर्गों को सज़ा हुई उनमें से कम से कम एक तिहाई ऐसे थे जो पांच  बार पहले भी सज़ा पा चुके थे.

इस चौंकाने वाली हक़ीक़त के पीछे का सच यह है कि जापान में बुज़ुर्गों को जो पेंशन मिलती है उसे वे अपने जीवन यापन के लिए अपर्याप्त पाते हैं  और दूसरी तरफ जापानी कानून व्यवस्था इतनी मज़बूत है कि छोटे-से छोटे अपराध के लिए भी काफी सज़ा देती है. तीसरी बात यह कि जापानी जेलों में कैदियों को न केवल मुफ्त रहने-खाने की सुविधा मिलती है, वहां की सरकार इस बात का भी बराबर ध्यान रखती है कि जेलों में किसी को भी, जिसमें बुज़ुर्ग भी शामिल हैं, कोई असुविधा न हो. ऐसे में अपर्याप्त आर्थिक साधनों वाले बुज़ुर्गों को भूखे मरने की बजाय जेल में जाकर ज़िंदगी बिताना रास आने लगा है. उनसठ वर्षीय तोशियो तकाता का कहना है कि जैसे ही उसके पास के पैसे ख़त्म हुए, उसने सड़क पर पड़ी किसी की साइकिल उठाई और उसे लेकर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा. वहां जाकर उसने कहा कि मैंने यह साइकिल  चुराई है. कानूनी कार्यवाही  के बाद उसे एक साल की कैद की सज़ा सुना दी गई. एक साल बाद जब वह जेल से छूटा तो फिर भूख उसके सामने खड़ी थी. इस बार उसने एक चाकू उठाया और एक पार्क में बैठी कुछ महिलाओं के सामने जाकर उसे लहरा दिया. किसी को नुकसान  पहुंचाने का उसका कोई इरादा नहीं था. एक स्त्री उसे देखकर डर गई, उसने पुलिस को बुला लिया और तोशियो तकाता का मनचाहा हो गया. उसे फिर जेल भेज दिया गया. एक मज़े की बात यह और है कि जापान में कोई जेल चला जाए तो भी उसकी पेंशन ज़ारी रहती है और उसके खाते में जमा होती रहती है. पिछले आठ में से चार बरस इस तरह जेल में बिताकर अब तोशियो कुछ समय के लिए आर्थिक चिंताओं से मुक्त हो गया है.

यहीं यह जानना भी रोचक होगा कि जापान अपने देश को अपराध मुक्त रखने के बारे में इतना अधिक सजग है कि छोटे से छोटे अपराध के लिए पर्याप्त से अधिक सज़ा देता है, भले ही इससे सरकार  पर कितना ही अधिक आर्थिक भार क्यों न पड़े. एक उदाहरण से इस बात को समझा जा सकता है. वहां अगर कोई दो सौ येन (भारतीय मुद्रा में करीब एक सौ तीस रुपये) का सेण्डविच चुराए तो उसे दो साल की जेल होती है और इस पर सरकार लगभग साढे चौपन लाख रुपये का खर्च करती है. जापानी समाज में इस बात पर भी गहन चर्चा होने लगी है कि क्यों न पेंशन राशि को बढ़ाकर इस अपराध वृत्ति और इस पर होने वाले व्यय पर नियंत्रण पाया जाए.

लेकिन इन बुज़ुर्गों के अपराध की राह पर चल निकलने के पीछे केवल आर्थिक कारण ही नहीं हैं. एक अन्य बड़ा कारण वहां की सामाजिक व्यवस्था में आ रहे बदलाव के कारण बुज़ुर्गों का बढ़ता जा रहा अकेलापन भी है. अनेक कारणों से नई पीढ़ी अपने मां-बाप को अपने साथ नहीं रख पा रही है और अगर ढलती  उम्र में कोई बुज़ुर्ग अपने जीवन साथी को भी खो बैठे तो अकेलेपन का त्रास उसके लिए असहनीय हो उठता है. समाज में अन्यथा भी एकाकीपन बढ़ता जा रहा है. सामाजिक सम्बल व्यवस्था लगातार छीजती  जा रही  है. किसी को किसी से कोई मतलब नहीं रह गया है. ऐसे में कई बुज़ुर्गों को जेल में मिलने वाला साहचर्य भी ललचाता है. सुखद बात यह है कि जापान की सरकार जेल व्यवस्था में लगातार सुधार कर और अधिक कर्मचारियों की भर्ती कर यह सुनिश्चित करती जा रही है कि वहां इन बुज़ुर्गों को कोई कष्ट न हो. ये प्रयास भी बहुत ज़ोर शोर से किये जा रहे हैं कि बुज़ुर्ग बग़ैर अपराध की राह पर गए अपने समाज में ही बाकी ज़िंदगी गुज़ारने के बारे में  सोचें.  लेकिन इसके बावज़ूद बहुत सारे बुज़ुर्ग जीवन के कष्टों से हार मान कर आत्महत्या तक कर लेते हैं.

जापान की ये स्थितियां हमें भी बहुत कुछ सोचने को मज़बूर करती हैं. इसलिए कि कमोबेश हमारे यहां भी बुज़ुर्गों की हालत ऐसी ही है. ऊपर से यह बात और कि हमारे पास वैसी मानवीय और संवेदनशील जेल व्यवस्था भी नहीं है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक स्तम्भ कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 05 फरवरी, 2019 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.