Tuesday, March 13, 2018

डॉक्टरों ने कहा- हमारी तनख़्वाह मत बढ़ाओ!


कनाडा के क्यूबेक प्रांत के सैंकड़ों डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों ने अपनी सरकार को एक ज्ञापन देकर अपने बढ़े हुए वेतन का विरोध किया है और सरकार से अनुरोध किया है कि वह इस राशि का इस्तेमाल नर्सों के लिए तथा मरीज़ों को बेहतर चिकित्सा सुविधा देने के लिए करे. यह बात सर्वविदित है कि कनाडा में सरकार सभी नागरिकों को निशुल्क चिकित्सा सेवा प्रदान करती है. यह सुविधा मरीज़ की ज़रूरत पर आधारित होती है न कि उसकी खर्च करने की क्षमता पर. इसी फरवरी माह में वहां की सरकार ने अपने इस इलाके के मेडिकल स्पेशलिस्ट्स की तनख़्वाह में 1.4 प्रतिशत की वृद्धि करने की घोषणा की थी.

ऐसा माना जाता है कि क्यूबेक इलाके में डॉक्टरों को देश के अन्य इलाकों की तुलना में पहले ही ज़्यादा वेतन मिलता है. लेकिन इसी इलाके में नर्सों और अन्य चिकित्सा सेवकों की हालत बहुत बुरी है. इसी जनवरी में वहां की एक नर्स एमिली रिकार्ड की एक फेसबुक पोस्ट वायरल हुई थी जिसमें उसने अपनी नम आंखों की एक तस्वीर लगाते हुए बताया था कि उसे पूरी रात जागकर सत्तर मरीज़ों की देखभाल करनी पड़ी है और अब उसके पांव इतना दर्द कर रहे हैं कि वह सो भी नहीं पा रही है. उसने लिखा था कि वह अपने काम के बोझ से टूट चुकी है और उसे इस बात से शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि वो अपने मरीज़ों को कितनी कम सेवा दे पाती है. “हमारा स्वास्थ्य तंत्र बीमार और मरणासन्न है.” कल्पना की जा सकती है कि कितनी पीड़ा के साथ उसने यह लिखा होगा. कनाडा के नर्सिंग संघ ने भी सरकार पर ज़ोर डाला है कि वो यह सुनिश्चित करे कि एक नर्स को अधिकतम कितने मरीज़ों की देखभाल करनी है. क्यूबेक की नर्स यूनियन की अध्यक्ष नैंसी बेडार्ड का कहना था कि डॉक्टरों के लिए तो पैसों की कोई कमी नहीं होती है लेकिन मरीज़ों की देखभाल करने वाले औरों  की कोई परवाह नहीं की जाती है. 

नर्सों की इस व्यथा-कथा ने क्यूबेक के डॉक्टरों की अंतरात्मा को इस कदर झकझोरा कि उन्होंने एक ज्ञापन देकर अपनी सरकार से यह अनुरोध  कर दिया कि वह  उनके बढ़ाये हुए वेतन को निरस्त कर दे और इस तरह जो राशि बचे उसे बगैर स्वास्थ्य कर्मियों के कार्यभार को असह्य बनाए, क्यूबेक क्षेत्र के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में खर्च कर दे. अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि हमारी तनख़्वाहों में यह वृद्धि इसलिए और भी ज़्यादा आहत करने वाली है कि हमारी नर्सों, क्लर्कों और अन्य पेशेवरों को बहुत कठिन हालात में काम करना पड़ रहा है और हमारे मरीज़ों को हाल के वर्षों में की गई भीषण कटौतियों और सारी सत्ता के स्वास्थ्य मंत्रालय में केंद्रीकृत हो जाने की वजह से ज़रूरी सुविधाओं तक से वंचित रहना पड़ रहा है. इन तमाम कटौतियों का जिस एक बात पर कोई असर नहीं पड़ा है वो है हमारी तनख़्वाहें. और इसलिए इस वृद्धि को ‘अभद्र’ बताते हुए उन्होंने लिखा, “हम क्यूबेक डॉक्टर यह अनुरोध कर रहे हैं कि चिकित्सकों को दी गई वेतन वृद्धि वापस ले ली जाए और इस तंत्र  के संसाधनों का बेहतर वितरण स्वास्थ्य कर्मियों की बेहतरी के लिए और क्यूबेक के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ कराने के लिए किया जाए.”

यह प्रकरण हमारी आंखें खोल देने वाला है. इससे पता चलता है कि एक ज़िम्मेदार और सभ्य समाज का चेहरा कैसा होता है. क्यूबेक के डॉक्टर चाहते तो बिना कोई ना-नुकर किये अपनी बढ़ी हुई तनख़्वाहें स्वीकार कर सकते थे. लेकिन उनके इंसान होने के एहसास ने उन्हें यह न करने दिया. अपने से ज़्यादा फिक्र उन्हें अपने सहकर्मियों की थी कि उन्हें कम तनख़्वाह में ज़्यादा समय खटना पड़ता है. उन्होंने इस बात की भी फिक्र की कि उनके प्रांत के नागरिकों को सरकारी कटौती की वजह से उस ज़रूरी स्वास्थ्य सेवा से वंचित रहना पड़ रहा है जिसके वे हक़दार हैं.

लेकिन सब जगह सब कुछ अच्छा  ही नहीं होता है. डॉक्टरों की इस संवेदनशीलता पर झाड़ू फेरते हुए  कनाडा के चिकित्सा मंत्री ने अपने बयान में कहा कि अगर डॉक्टरों को लगता है कि उन्हें ज़्यादा तनख़्वाहें दी जा रही हैं तो वे उसे  टेबल पर ही छोड़ जाएं.  मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूं कि हम उस रकम का बेहतर इस्तेमाल कर लेंगे. डॉक्टरों की इस व्यथा पर टिप्पणी करते हुए कि नर्सों को बहुत कम वेतन मिल रहा है और रोगियों पर होने वाले खर्च में कटौतियां की जा रही हैं, मंत्री जी ने फरमाया कि हमारे पास तमाम ज़रूरतों के लिए पैसा है और हम समय पर सारी समस्याएं हल कर लेंगे.

यानि मंत्री तो कनाडा में भी वैसे ही हैं जैसे अपने देश में हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ डुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 मार्च, 2018 को 'कनाडा के डॉक्टरों ने लौटाया बढ़ा हुआ वेतन' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Friday, March 9, 2018

सवाल मानवीय सम्बंधों में तकनीक की घुसपैठ का

अनिरुद्ध रॉय चौधरी द्वारा निर्देशित 2016 की हिन्दी फिल्म पिंक में अमिताभ बच्चन का एक बेहद प्रभावशाली डायलॉग है: “नो मीन्स नो. ना सिर्फ़ एक शब्द नहीं, अपने आप में एक पूरा वाक्य है. इसे  किसी तर्क, स्पष्टीकरण, एक्स्प्लेनेशन या व्याख्या की ज़रूरत नहीं होती. ना का  मतलब ना ही होता है. माय क्लाएंट सेड नो युअर ऑनर!”  कहना  अनावश्यक है कि यहां चर्चा का संदर्भ स्त्री पुरुष के बीच का दैहिक सम्बंध है. इस  सम्बंध  को लेकर जितनी चर्चाएं और बहसें अपने देश में हुई हैं उनसे कम चर्चाएं परदेश में नहीं हुई हैं. इसी संदर्भ में यह जानना रोचक हो सकता है कि जहां भारत में ‘ना’ कहने के अधिकार को रेखांकित करना ज़रूरी समझा गया है, पश्चिम के कुछ देशों में इससे उलट ‘हां’ कहने के अधिकार को मान्यता प्रदान करने की भी ज़रूरत महसूस की जाने लगी थी. कई देशों के शैक्षिक संस्थानों में 1990 से ही यह नीति बनाई जाने लगी थी कि वहां के विद्यार्थी अंतरंग क्षणों के  इन सम्बंधों  की स्थापना के लिए बाकायदा मौखिक अनुमति प्रदान करें. एक अपेक्षाकृत उन्मुक्त और उदार देश स्वीडन में तो पिछली दिसम्बर में एक  ऐसा कानून बनाने का भी प्रस्ताव किया गया है जिसके तहत मौखिक स्वीकृति प्रदान करने के बाद ही कोई युगल दैहिक सम्पर्क स्थापित कर सकेगा. 

इसी प्रस्तावित कानून से प्रेरित होकर लीगल फ्लिंग नामक एक वेबसाइट ने एक ऐसा एप बनाकर उसका बीटा वर्ज़न  बाज़ार में उतारा है जो नज़दीक आने के इच्छुक दो व्यक्तियों को उनकी निकटता की सीमाएं निर्धारित करने के अनेक विकल्प प्रदान करता है. यह कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे आप किसी रेस्तरां में जाएं और मेन्यू देखकर यह चयन करें कि आपको क्या-क्या खाना-पीना है. फर्क इतना है कि यहां विकल्पों का चुनाव मेन्यू की बजाय एप में से किया जाना है. इस एप में किया गया चयन उन दो व्यक्तियों के बीच किये जाने वाले एक अनुबंध के समतुल्य होगा और उम्मीद की जाती है कि इस अनुबंध को वैधानिक मान्यता भी प्राप्त होती. एप यह भी सुविधा देगा कि इसे इस्तेमाल करने वाले पार्टनर्स किसी भी समय अपने चयन को संशोधित कर सकें या बदल सकें. 

इस एप की उपादेयता को लेकर बहसें शुरु हो गई हैं. लोग पूछने लगे हैं कि क्या वाकई कोई एप इतना कारगर हो सकता है कि वो दो मनुष्यों के बीच के अंतरंग क्षणों के क्रियाकलाप को प्रभावी  तौर पर नियंत्रित कर सके? इस सवाल का जवाब तकनीक और मानवीय सम्बंधों के मामलों के कुछ विशेषज्ञों ने देने  का प्रयास भी किया है. उनका कहना है कि यह एप सहमति को अंकित करने के मामले में तो कारगर साबित हो सकता है लेकिन क्षण भर में बदल जाने वाले मानवीय भावों के साथ तालमेल नहीं रख सकता. वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि किसी भी एप का प्रयोग पूर्व नियोजन की मांग करता है जबकि मनुष्य केवल अपने उस क्षण के मनोभाव ही अंकित कर सकेगा, वह खुद इस बात से अनभिज्ञ होगा कि अगले क्षण उसके मनोभाव क्या होंगे. इस एप के कुछ आलोचकों का तो यहां तक कहना है कि दैहिक  सम्पर्क के मामले में सहमति-असहमति का मामला एक मानवीय मुद्दा है और इसका समाधान किसी मशीनी  एप में तलाश करना पूरी तरह अव्यावहारिक है. एप का मज़ाक उड़ाते हुए ऐसे लोगों का कहना है कि ज़रा इस बेहूदगी की कल्पना कीजिए को एक दूसरे के निकट आने को तत्पर दो में से कोई एक यह कहे  कि  “ज़रा एक सेकण्ड रुकना, पहले मैं एप को अपडेट कर दूं!” 

लेकिन एप बनाने वाली कम्पनी लीगल फ्लिंग इन तमाम आलोचनाओं से तनिक भी विचलित नहीं है. उसे अपने एप की सीमाओं का भली भांति पता है, लेकिन वह इसे भविष्य की एक सशक्त सम्भावना के रूप में विकसित करने को तत्पर है. उसका सोच यह है कि चाहे एप पर ही सही, अगर कोई अपने मनोभाव व्यक्त करता या करती है बाद में किसी भी वजह से दूसरा पक्ष उन मनोभावों की अवहेलना करता या करती है तो आहत पक्ष अपनी शिकायत तो अंकित कर ही सकता है, और उस शिकायत पर यथा कानून कोई कार्यवाही होने की सम्भावना को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. कम्पनी का यह भी कहना है कि नशे जैसी किसी असामान्य स्थिति में भी अगर कोई ग़लती से अपनी सहमति दे दे तो यह एप उसके बाद  अपनी सहमति को तुरंत वापस लेने का विकल्प प्रदान करता है. 

यह देखना बहुत रोचक होगा कि नाज़ुक मानवीय सम्बंधों के मामले में तकनीक आधारित एप कितना प्रभावी  और कितना निर्णायक साबित होता है. 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न   दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत गुरुवार, 08 मार्च,  2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Thursday, March 1, 2018

चीन में शवयात्राओं में होता है स्ट्रिपर्स का उत्तेजक डांस


तेज़ आवाज़ में बजता मादक-उत्तेजक संगीत, उस संगीत की धुन पर नाचतीं स्ट्रिपर्स और इनसे आनंदित सीटियां बजाते लोग. यह मंज़र कहां का हो सकता है?  आप कुछ सोच कर जवाब दें उससे पहले ही मैं बता दूं कि अगर यह दृश्य चीन का है तो ज़रूर किसी शव यात्रा है. जी हां, चीन के बाहरी हिस्सो और गांवों में शव यात्राओं में  स्ट्रिपर्स का अश्लील नाच आम बात है. अलबत्ता, यह भी बता देना उपयुक्त होगा कि वहां का प्रशासन एक बार फिर से इस परम्परा को रोकने के लिए तत्पर हुआ है, लेकिन लोगों का खयाल है कि उसे कामयाबी शायद ही मिले. मामला परम्पराओं का जो ठहरा. चीन के देहाती इलाकों में शोक जताने आए लोगों के मनोरंजन के लिए कलाकारों, गायकों, मसखरों और स्ट्रिपर्स को पैसे देकर बुलाने का रिवाज़ काफी समय से चला आ रहा है. वहां के एक विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर का कहना है कि चीन की कुछ स्थानीय परम्पराओं में उत्तेजक नृत्य को मृतक की उस आकांक्षा से जोड़कर देखा जाता है जिसके अनुसार वह वंश बढ़ाने का आशीर्वाद चाहता या चाहती है. लेकिन आम राय यही है कि अपने देश की ही तरह चीन में भी अंतिम संस्कार के समय ज़्यादा लोगों की उपस्थिति को मरने वाले के प्रति सम्मान का पैमाना माना जाता है  इस लिए उसके परिजन पैसे देकर इन लोगों को बुलाते हैं ताकि इनके आकर्षण में ही सही शवयात्रा में लोगों की भीड़ बढ़ जाए. ज़ाहिर है कि इस तरह के कलाकारों को बुलाने में खासा खर्चा होता है और यह खर्चा कर शोक ग्रस्त परिवार समाज में अपने वैभव का दिखावा करने में भी गर्व का अनुभव करता है. वैसे यह माना जाता है कि इस परम्परा की शुरुआत ताइवान से हुई है और वहां यह परम्परा आम है. वैसे ताइवान में भी बड़े शहरों में इसका चलन बहुत कम है लेकिन  शहरों के दूरस्थ तथा बाहरी हिस्सों में अभी भी इसे देखा जा सकता है. पिछले ही बरस ताइवान के दक्षिणी शहर  जियाजी में हुए एक अंतिम संस्कार में जीपों की छतों पर सवार करीब पचास पोल डांसर्स ने शिरकत की थी. यह जानना रोचक होगा कि वह एक नेता का अंतिम संस्कार था और उनके परिवार के अनुसार नेताजी की तमन्ना थी कि उनका अंतिम संस्कार रंगारंग हो!

अब चीन के संस्कृति मंत्रालय ने इस परम्परा को ‘असभ्य’ बताते हुए घोषणा की है कि अगर कोई किसी के अंतिम संस्कार के समय लोगों के मनोरंजन के लिए किराए पर स्ट्रिपर्स को बुलाएगा  तो उसे कठोर दण्ड दिया जाएगा. वहां की सरकार विगत में भी ऐसा करती रही है. मसलन सन 2006 में जियांगसू प्रांत में एक किसान के अंतिम संस्कार के समय स्ट्रिपर्स की प्रस्तुति के बाद सरकार ने पांच लोगों को हिरासत में लिया था और सन 2015 में भी ऐसा ही होने की खबर सामने आने के बाद सरकार ने आयोजकों और कलाकारों को दण्ड दिया था. अब सरकार का ध्यान हेनन, एनख्वे, जियांगसू और खबे जैसे उन प्रांतों पर ख़ास तौर पर केंद्रित है जहां यह रस्म अधिक प्रचलित है.

सरकार के अलावा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी अपने आठ करोड़ अस्सी लाख सदस्यों के लिए कुछ दिशा निर्देश ज़ारी किये हैं, हालांकि पार्टी के अनुसार ये निर्देश  भ्रष्टाचार उन्मूलन अभियान का हिस्सा है. चीन में शादी और मौत के मौकों पर सम्बद्ध परिवारों को कुछ नकद राशि देने का रिवाज़ है और अंतिम  संस्कार के समय जो धन राशि दी जाती है वह सांत्वना और शोक सम्बंधी खर्चों में मदद के तौर पर दी जाती है, लेकिन पार्टी का खयाल है कि ऐसा करने से अनावश्यक भव्यता का माहौल बनता है और बहुत सारे लोग इन मौकों का इस्तेमाल पैसा बनाने के लिए भी करते हैं, अत: इन पर नियंत्रण ज़रूरी है. पार्टी का यह भी विचार है कि छोटे गांवों में शादियां और अंतिम संस्कार के रस्मो-रिवाज़ कई दिनों तक चलते हैं और ये रोज़मर्रा के उत्पादन, जीवन, कामकाज,व्यवसाय, शिक्षण, यातायात आदि को बाधित करते हैं अत: उसने लोगों को सलाह दी है कि वे अपनी स्थानीय परम्पराओं का पालन आंख मूंदकर न करे. लेकिन पार्टी ने यह भी सावधानी बरती है कि उसके निर्देशों से लोगों की भावनाएं आहत न हो, अत: उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह परम्पराओं  पर पूरी तरह रोक नहीं लगाना चाहती है.

लेकिन ऐसी स्थितियों में जो प्रतिक्रियाएं अपेक्षित हैं वे ही चीन में भी हो रही हैं. वहां की जनता का एक वर्ग  इण्टरनेट और सोशल मीडिया पर इन प्रयासों और सलाहों पर अपने गुस्से और नाराज़गी का इज़हार कर रहा है. ऐसे लोगों का कहना है कि ये नियम अव्यावहारिक हैं और इनका पालन ज़्यादा ही कड़ाई से कराया जा रहा है! अब देखना है कि जीत परम्पराओं की होती है या सुधार की!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 28 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 20, 2018

वो रख देंगे आपके लिए 'आपका' कलेजा निकाल के!

हम लोग अभी तक इस बात के भी पूरी तरह अभ्यस्त नहीं हो पाए हैं कि शादी जैसे पारिवारिक आयोजन में ईवेण्ट मैनेजमेण्ट कम्पनी के वेतनभोगी लोग वे सारे काम करें जिन्हें हम घराती लोगों को करते देखने की उम्मीद लगाये रहते हैं. हम लोग तो जब किसी दावत में जाते हैं तो कहीं न कहीं मन की यह टीस उजागर हो ही जाती है कि हाय!  वो दिन कहां हवा हो गए जब घर वाले मनुहार कर कर के लड्डू मुंह में ठूंसा करते थे. अब तो अनजान वेटर निरपेक्ष  भाव से अपना दायित्व निर्वहन कर देते हैं! लेकिन जो लोग इन नए ज़माने के तौर तरीकों के आदी हो गए हैं, वे भी आगे का वृत्तांत  पढ़कर आज के ‘बाज़ारवादी’ ज़माने के चलन पर दो आंसू ज़रूर टपका देंगे. 

हर ख़ास-ओ-आम को खबर हो कि अब अपने देश भारत में एक कम्पनी ऐसी अवतरित हो चुकी है जो आपकी तरफ से आपकी प्रेमिका (या प्रेमी)‌ को हस्तलिखित प्रेम पत्र लिख भेजने के लिए तैयार बैठी है! ज़माना भले ही कम्प्यूटर, इण्टरनेट और ई मेल का हो, हाथ से लिखे ख़त में जो लज़्ज़त है उसका कोई मुकाबला नहीं है और इसी बात को समझ यह कम्पनी आपकी सेवा में हाज़िर हुई है. आप तो बस इन्हें अपना नाम, जिसे ख़त भेजना है उसका नाम, पता वगैरह और यह जानकारी कि ख़त में क्या लिखा जाना है और  कितने विस्तार या संक्षेप में लिखा जाना है यह बता दें बाकी सारा काम उनका. वे एक मसविदा बनाकर आपको भेज देंगे और अगर आप उसका अनुमोदन कर देंगे तो उसे एक हाथ से लिखे ख़त के रूप में भेज देंगे. कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह सेवा सशुल्क है, यानि आपको अपनी जेब थोड़ी हल्की करनी पड़ेगी. लेकिन वो अंग्रेज़ी में कहते हैं ना कि मुफ्त में दावत कौन देता है! जहां तक प्रेम पत्रों की बात है, यह कम्पनी अनगिनत सुविधाएं आपको मुहैया करवाती है. यानि आप यह चुन सकते हैं कि ख़त कैसी हस्तलिपी में लिखा जाएगा, यह चुन सकते हैं कि कैसे कागज़ पर वे लोग आपके लिए ‘आपका’ कलेजा निकाल कर रखेंगे और उसे पोस्ट करेंगे, आपका ख़त डाक से भेजा जाए या कूरियर से, सामान्य डाक से या तीव्र गति की डाक सेवा से, और उम्मीद की जानी चाहिए कि समय के साथ-साथ अन्य सुविधाएं भी इस सेवा में जुड़ती जाएंगी. हो सकता है निकट भविष्य में वे लोग क़ासिद (यानि पत्र वाहक)  की सेवाएं भी प्रदान करने लगें जिसकी खूब चर्चा बीते ज़माने की उर्दू शायरी में हुई है. याद कीजिए ग़ालिब का यह शे’र: “क़ासिद के आते आते ख़त एक और लिख रखूँ/  मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में.” जब इस सेवा का विस्तार हो जाएगा तो बहुत मुमकिन है कि क़ासिद के जेण्डर और उम्र को लेकर भी अनेक विकल्प मिलने लग जाएं! 

और हां, यह न समझ लें कि हाथ से लिखे ख़त भेजने का यह करोबार इश्क़-मुहब्बत तक सीमित है. यह सेवा व्यावसायिक पत्रों के लिए भी इसी मुस्तैदी से उपलब्ध है. कल्पना कीजिए कि कोई कम्पनी एक नया उत्पाद बाज़ार में लाती है और उसकी सूचना आपको कम्पनी के किसी उच्चाधिकारी द्वारा ‘अपने हाथ’ से लिखे पत्र से आपको मिले तो आपको कितनी खुशी होगी! हस्तलिखित पत्र भेजने की सेवा प्रदाता यह कम्पनी यह और ऐसी अनगिनत व्यावसायिक सेवाएं देने के लिए बेताब है. बस, आप हुक्म कीजिए. नए ग्राहक, पुराने ग्राहक, उत्पाद की सूचना, सहयोग के लिए आभार, आपको हुई असुविधा के लिए खेद – सब कुछ के लिए हाथ से खत लिखकर भेजने को तैयार है यह कम्पनी. 

और अगर आपको यह भी अपर्याप्त लग रहा हो तो और सुनिये. कम्पनी देश में ही नहीं विदेश में भी आपकी तरफ से किसी भी तरह का हस्तलिखित पत्र भेजने को तैयार है. यहां तक कि अगर आप बहुत जल्दी में हों और डाक से अपना हस्तलिखित पत्र भेजने का सब्र न कर सकते हों तो कम्पनी ई मेल से भी आपका हस्तलिखित पत्र भेज सकती है. और अगर यह सेवा भी आपको अपर्याप्त  लगे तो इतना और बताता चलूं कि कम्पनी आपकी तरफ से फ़ेसबुक पर स्टेटस  पोस्ट कर सकती है, ट्वीट कर सकती है, वॉट्सएप संदेश भेज सकती है- यानि किसी भी तरह का संदेश, किसी भी माध्यम से, किसी भी भारतीय अथवा विदेशी भाषा में,  किसी को भी  आपको भेजना हो, फिक्र करने की ज़रूरत नहीं. ‘वे’ हैं ना! आप तो बस आदेश दीजिए, भुगतान  कीजिए और निश्चिंत हो जाइये. चाहें तो यह कल्पना करना भी शुरु कर सकते हैं  कि यह तो इब्तिदा है;  आगे,  और आगे क्या होगा! कौन-कौन-सी सेवाएं पैसे खर्च करने पर मिलने लगेंगी! 
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 20 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 



Tuesday, February 13, 2018

अब कनाडा के राष्ट्रगान में केवल बेटे नहीं बेटियां भी शामिल!

आखिर सन 2018 की जनवरी में कनाडा की सीनेट ने वह बिल पास कर ही दिया जिसके लिए लिए वहां के समझदार लोग करीब चार दशकों से अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे थे. इस बिल के पास हो जाने से अब कनाडा का राष्ट्रगान केवल पुरुष पक्षी न रहकर उभयपक्षी या जेंडर न्यूट्रल हो जाएगा. कनाडा का राष्ट्रगान मूलत: 1880 में रचा गया था, लेकिन राष्ट्रगान का दर्ज़ा पाने में इसे एक शताब्दी का सफर तै करना पड़ा था. तब तक गॉड सेव द किंग ही कनाडा का भी राष्ट्रगान बना रहा. इस नए गीत की शुरुआती पंक्तियां हैं: “ओ कनाडा!अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड! / ट्रु पैट्रियट लव इन आल दाई  सन्स  कमाण्ड”. सन 1997 में पचास वर्षीया फ्रांसिस राइट का ध्यान इन पंक्तियों पर गया और उन्हें यह बात अखरी कि इस गान में केवल बेटों का ही ज़िक्र क्यों है, बेटियों का क्यों नहीं? कुछ अन्य की शिकायत ‘अवर होम एण्ड नेटिव लैण्ड’  से भी थी, विशेष रूप से उनकी जो कहीं अन्यत्र से आकर कनाडा वासी हो गए थे. लेकिन ज़्यादा ज़ोर इसके केवल बेटों को याद करने वाले  शब्दों पर ही था. 1998 में जब विवियन पॉय नामक एक पूर्व फैशन डिज़ाइनर सीनेट में पहुंची तब सीनेट की करीब आधी सदस्य स्त्रियां थीं. स्वभावत: उनमें से बहुतों को भी गीत के इन शब्दों पर गम्भीर आपत्ति थी. पॉय ने एक हस्ताक्षर अभियान शुरु किया जिसमें उनका सक्रिय साथ दिया उक्त फ्रांसिस राइट ने.

उन दिनों की याद करते हुए राइट ने कहा कि वो ज़माना सोशल मीडिया का तो था नहीं. उनका अभियान हिचकोले खाता हुआ ही चला. एक एक हस्ताक्षर जुटाने के लिए उनें कड़ी मेहनत करनी पड़ी, फिर भी बमुश्क़िल चार पांच सौ हस्ताक्षर ही जुट सके. कुछ परम्परा प्रेमी लोग उनसे यह कहते हुए ख़फ़ा भी हुए कि “अरे भाई, यह गान ठीक ही तो है. इसमें बदलाव की ज़रूरत ही क्या है?” लेकिन क्योंकि पॉय और राइट को इस तरह की प्रतिक्रियाओं की पहले से उम्मीद थी, वे हताश  नहीं हुईं. वे यह बात समझती थीं  कि आखिर जिस गान को 3.6 करोड़ लोग इतने समय से गा रहे हैं, उसमें किसी भी बदलाव के लिए उन्हें तैयार करना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं. पॉय ने जब इसमें बदलाव के वास्ते प्राइवेट मेम्बर्स बिल पेश किया तो उन्हें तो यहां तक सुनना पड़ा कि अगर गान के शब्दों में बदलाव करना ही है तो इसमें सिर्फ औरतों को क्यों जोड़ा जाए, समाज के अन्य तबकों जैसे मछुआरों, बैंक कर्मियों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों वगैरह को भी क्यों न जोड़ दिया जाए! ज़ाहिर है कि बहुत सारे लोग बदलाव की मांग को तर्क संगत नहीं  मानते थे. इसके बावज़ूद दिसम्बर 2003 में यह आस बंधी कि शायद यह बिल पास हो जाए, लेकिन तब एक पुरुष सीनेटर ने अपने अहं के चलते इसे पास होने से रुकवा दिया.

लेकिन पॉय ने हार नहीं मानी. उन्हें 63 वर्षीया नैंसी रुथ का साथ मिला, जो कुछ मानों में कनाडा की राजनीति में एक विवादास्पद नेता भी मानी जाती हैं. वे एक जानी-मानी सीनेटर हैं, स्त्रीवादी हैं  और खुलकर स्त्री समलैंगिक सम्बंधों का समर्थन करती हैं. नैंसी को यह अभियान अपने स्त्रीवादी सोच के अनुरूप लगा और उन्होंने  इसका उन्मुक्त समर्थन  किया. उन्होंने बाद में कहा कि “मैं भी चाहती थी  कि इस मुल्क की स्त्रियों को अपने राष्ट्रगान में जगह मिले. मैं चाहती  थी कि मेरे जीते जी ही ऐसा हो जाए.” अपने प्रयासों को और तेज़ करते हुए उन्होंने इसके लिए एक संगठन भी बनाया. लेकिन उनका  मनचीता हो पाता उससे पूर्व ही उनका कार्यकाल पूरा हो गया. उनके बाद भी प्रयास ज़ारी रहे और आखिरकार पिछले बरस जून में हाउस ऑफ कॉमन्स ने इस बदलाव  को लाने वाले बिल  को परित कर ही दिया. नैंसी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाया एक अन्य स्त्रीवादी सीनेटर फ्रांसिस लैंकिन ने. उनका कहना था कि “मैं एक ऐसी दुनिया में जीना कहती हूं जिसमें पहले ही दिन से सभी  के लिए समान अवसर हों. क्या इस बिल से ऐसा हो जाएगा? नहीं. लेकिन कम से कम यह तो होगा कि मेरी पोती मुझसे यह सवाल नहीं करेगी कि इस गान में केवल बेटे ही क्यों हैं? इसमें बेटियों का ज़िक्र क्यों नहीं है? अब ऐसा नहीं होगा.” और आखिर यह बिल पास हो ही गया. अब इस गान में ‘ऑल दाई सन्स कमाण्ड’  की जगह ‘इन ऑल ऑफ अस कमाण्ड’  गाया जाएगा.

इस बिल पर सबसे खूबसूरत प्रतिक्रिया ज़ाहिर की कनाडा की विख्यात लेखिका मार्गरेट एटवुड ने. उन्होंने नैंसी को सम्बोधित एक पत्र में लिखा, “एक कृतज्ञ राष्ट्र की तरफ से तुम्हारा शुक्रिया. सिर्फ वो ही व्यक्ति तुम्हारा आभार नहीं मानेगा जो यह चाहता है कि मैं जिस चट्टान के नीचे से निकल कर आई हूं, फिर से जाकर उसी के नीचे घुस जाऊं.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 6, 2018

कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिकों ने बना दिया शानदार पुस्तकालय

आपको अपने चण्डीगढ़ वाले नेकचंद का नाम और काम तो ज़रूर याद होगा. हां,  वही रॉक गार्डन के अनूठे सर्जक नेकचंद सैनी. हाल में मुझे उनकी याद आई सुदूर तुर्की की एक ख़बर पढ़ते हुए. फर्क़ बस इतना है कि वहां एक नहीं अनेक नेकचंदों ने मिलकर एक ऐसा करिश्मा कर दिखाया है कि जब आप भी उसके बारे में पढेंगे तो उन्हें शाबासी दिये बग़ैर नहीं रहेंगे. तुर्की के शहर अंकारा के कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिकों ने वहां एक शानदार पुस्तकालय बनाने का विचित्र किंतु सत्य कारनामा कर दिखाया है. इन श्रमिकों का काम यह था कि शहर भर में कचरा पात्रों से कचरा बीनें और उसे ले जाकर भराव क्षेत्र में डाल दें. यह करते हुए इनका ध्यान इस बात पर गया कि बहुत सारे कचरा पात्रों में, और अन्यत्र भी लोग अपनी पढ़ी हुई अथवा अनुपयोगी किताबें भी डाल देते हैं. इनकी ड्यूटी तो यह थी कि और तमाम कचरे-कबाड़ के साथ इन किताबों को भी इकट्ठा करें और भराव क्षेत्र में पटक आएं. लेकिन इनका मन नहीं माना. इन्हें लगा कि भला इतनी कीमती और ज़िंदगी को बदल डालने की क्षमता रखने वाली किताबों को ज़मींदोज़ क्यों हो जाने दें?  और तब इन्होंने सोचा कि क्यों न इन किताबों को इकट्ठा करके एक लाइब्रेरी ही बना दी जाए! बाद में एक कचरा इकट्ठा करने वाले श्रमिक सेरहत बेटेमूर ने कहा भी कि तमन्ना तो यह थी कि घर में मेरी अपनी लाइब्रेरी हो, लेकिन वैसा करना मुमकिन न हो सका और उसकी बजाय हमने यह सार्वजनिक पुस्तकालय बना डाला.

इन लोगों ने सोच विचार किया, अपनी बात को औरों के साथ भी साझा किया तो सबने इनके इरादे का समर्थन किया. लोग आगे बढ़कर भी इन्हें किताबें सौंपने लगे और इस तरह इनका पुस्तकालय बनाने का सपना मूर्त रूप लेने लगा. अब समस्या यह थी कि जो किताबें इकट्ठी हुई हैं उन्हें संजोया कहां जाए? किसी ने ध्यान दिलाया कि खुद इनके सफाई विभाग की एक इमारत बेकार पड़ी है. उसे देखा तो लगा कि अरे, यह तो पुस्तकालय के लिए आदर्श है. उसके लम्बे गलियारे और बड़े कमरे वाकई पुस्तकालय का आभास देते प्रतीत हुए. थोड़ी साफ़ सफाई और रंग रोगन के बाद वह इमारत काम चलाऊ बन गई तो उसमें इन्होंने अपने कई महीनों के श्रम से एकत्रित की गई करीब छह हज़ार किताबों को व्यवस्थित कर अपने विभाग के कर्मचारियों और उनके परिवार जन को सुलभ कराना शुरु कर दिया. लेकिन जैसे-जैसे किताबों का संग्रह बढ़ने लगा, इस पुस्तकालय की ख्याति भी फैलने लगी और शहर वासियों की मांग का सम्मान करते हुए इन लोगों ने अपने पुस्तकालय की सेवाएं विद्यार्थियों  और शहर भर के पुस्तक प्रेमियों को भी सुलभ कराना शुरू कर दिया. नगर के महापौर का भी पूरा समर्थन  इन्हें मिला और अब यह पुस्तकालय एक ऐसा स्थान बन चुका है जिस पर पूरे नगर को गर्व है.

पुस्तकालय अनेक खण्डों में विभक्त है. इसका बच्चों वाला विभाग अपने कॉमिक्स के संग्रह के कारण सर्वाधिक लोकप्रिय है. वैज्ञानिक शोध विषयक  पुस्तकें भी यहां खूब हैं. पुस्तकालय के कुल सत्रह खण्डों में उपन्यास, अर्थशास्त्र की पाठ्य पुस्तकें, थ्रिलर्स और बाल साहित्य शामिल हैं. और जैसे इतना ही पर्याप्त न हो, अंग्रेज़ी और फ्रेंच सहित अनेक विदेशी भाषाओं की पुस्तकों के अपने संग्रह के कारण यह पुस्तकालय शहर में आने वाले  पर्यटकों तक के आकर्षण का केंद्र बन चुका है. तुर्की के श्रेष्ठतम लेखकों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय ख़्याति के अनेक लेखकों का साहित्य यहां सुलभ है. जैसे-जैसे पुस्तकालय की ख्याति फैलती जा रही है, इसकी सेवाओं का भी विस्तार हो रहा है. चौबीसों घण्टे खुला रहने वाला यह पुस्तकालय अब शहर की  शिक्षण संस्थाओं तक को किताबें उधार देने की स्थिति में आ गया है और शहर की जेलों में भी ये लोग अपनी किताबें भेजने लगे हैं. आस-पास के गांवों के स्कूली शिक्षक भी इस पुस्तकालय से किताबें मंगवाने  लगे हैं.

बहुत स्वाभाविक है कि पुस्तकालय के अपने इस सृजन से वे तमाम लोग प्रसन्न हैं जिन्होंने इसे मूर्त  रूप दिया है. खुशी की बात यह है कि उन्होंने जो किया है वे उतने भर से संतुष्ट नहीं हैं और अब और बड़े सपने देखने लगे हैं. पुस्तकालय के साथ वे संगीत सभा और नाट्य प्रदर्शन जैसी गतिविधियों को जोड़कर अपने पाठकों की संख्या में वृद्धि तो कर ही रहे हैं, उनकी योजना यह भी है कि वे एक चल पुस्तकालय भी बना लें जो आस-पास के गांवों के स्कूलों तक जाकर अपनी सेवाएं दे. इस योजना के मूर्त्त रूप लेने में कोई संदेह नहीं है क्योंकि इस पुस्तकालय की ख्याति अब देश की सीमाओं को लांघ कर दुनिया भर तक पहुंच चुकी है और हर तरफ से सहयोग के प्रस्ताव आने लगे हैं.


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जयपुर से प्रकाशित कोलप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 06 फरवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 30, 2018

बदलाव आ तो रहा है लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता!

भारत की तरह दुनिया के बहुत सारे देशों में यह रिवाज़ है कि शादी के बाद पत्नी पति का उपनाम अपना लेती है. मेरी शादी हुई तो मेरी पत्नी गुप्ता से अग्रवाल हो गई. लेकिन इधर के बरसों में जब से स्त्री अस्मिता विषयक चेतना प्रबल होने लगी है, बहुत सारी स्त्रियां शादी के बाद भी अपने पुराने उपनाम के साथ ही जीने लगी हैं. कला-संस्कृति वगैरह की दुनिया में तो यह रिवायत पहले से थी, हालांकि इसके कारण दूसरे थे. इधर एक नया चलन यह भी देखने में आया है शादी के बाद पति-पत्नी दोनों के नामों को मिलाकर एक नया नाम रचा जाने लगा है. हाल में हमने देखा कि मीडिया में विराट कोहली और अनुष्का शर्मा को विरुष्का नाम से सम्बोधित किया गया. लेकिन इधर लंदन से एक रोचक ख़बर आई है जहां दक्षिण पूर्वी लंदन के एक प्राइमरी स्कूल शिक्षक मिस्टर रोरी कुक ने शादी के बाद अपना नाम बदलकर रोरी डियरलव कर लिया. कहना अनावश्यक है कि डियरलव उनकी पत्नी का उपनाम है. जब वे शादी के लिए ली गई छुट्टियां बिताकर स्कूल पहुंचे और उनके स्कूल की एक छात्रा ने उनसे नाम में किये गए इस बदलाव की वजह जाननी चाही तो उन्होंने अपनी शादी की अंगूठी दिखाते हुए सहज भाव से उत्तर दिया कि उन्होंने शादी के कारण अपना नाम बदला है. अपनी बात को और साफ़ करते हुए उन्होंने उस छात्रा से कहा, “देखो, जब आप शादी करते हो तो आपको यह चुनाव करना होता है कि आप कौन-सा नाम रक्खोगे. आप अपना नाम रख सकते हो, आप और आपकी जीवन साथी एक-सा नाम रख सकते हैं, आप कोई नया नाम रख सकते हो, वगैरह. मैंने अपनी पत्नी वाला नाम रखना पसंद किया है.” इतने विस्तृत उत्तर का औचित्य बताते हुए श्री डियरलव ने कहा कि बच्चे अपने स्कूल में जो देखते हैं उसे वे सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं. अपने नाम के बदलाव के बारे में उन्हें बताकर मैंने उन्हें नए विचार से परिचित कराने का प्रयास किया है. मिस्टर डियरलव के स्कूल के विद्यार्थियों ने उनके नाम के इस बदलाव को सहज रूप से स्वीकार कर लिया लेकिन उनके कई सहकर्मियों की प्रतिक्रियाओं से लगा कि वे इस बात को पचा नहीं सके हैं. किसी ने कहा कि यह बहुत अजीब है, तो किसी और ने व्यंग्य करते हुए कहा कि मिस्टर डियरलव बहुत मॉडर्न है. लेकिन मिस्टर डियरलव ने इस तमाम प्रतिक्रियाओं को बहुत सहजता से ग्रहण किया. शायद उन्हें इन मिली-जुली प्रतिक्रियाओं का पहले से अनुमान था.  

इन सज्जन के जीवन में तो इस कदम से कोई ज़्यादा दिक्कतें नहीं आईं, उन्हीं के देश में ऐसा ही करने के इच्छुक एक युवक के मां-बाप ने तो उनकी शादी में शामिल होने से ही मना  कर दिया. उनकी बेबाक प्रतिक्रिया वही थी जो ऐसे मामलों में सामान्यत: अपने देश में भी होती है. उन्हें लगा कि उनका बेटा ‘जोरू का ग़ुलाम’  हो गया है. वैसे भी, ब्रिटिश समाज अपेक्षाकृत परम्परा-प्रेमी समाज माना जाता है. इंगलैण्ड और वेल्स में आज भी जो विवाह प्रमाण पत्र ज़ारी किये जाते हैं, उनमें युगल के पिता का ही नाम अंकित होता है, मां का नहीं. वहां कुछ सांसदों ने पिछले साल एक विधेयक प्रस्तुत कर यह आग्रह किया भी था कि विवाह के प्रमाण पत्रों में वर-वधू के माता और पिता दोनों के नाम अंकित किये जाने चाहियें. वैसे, बदलाव की बयार बहने तो वहां भी लगी है, तभी तो सन 2014 में समान सेक्स के विवाह को वैधता प्रदान कर दी गई थी.

बावज़ूद इन सारी बातों के, यह भी एक तथ्य है कि कम से कम इंगलैण्ड में तो ऐसे पुरुषों  की संख्या बढ़ती जा रही है जो विवाह के बाद अपनी पत्नी का उपनाम अंगीकार करते हैं. पिछले ही बरस किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार अब हर दस में से एक युवा ऐसा कर रहा है. ऐसा करने वालों में से एक, एक तिब्बती बौद्ध मेडिटेशन इंस्ट्रक्टर चार्ली शॉ का कहना है कि आज के समय में यह मानकर चलना कि शादी के बाद पत्नी अनिवार्यत: पति का उपनाम धारण करने लगेगी, निहायत ही बेहूदा बात है. लेकिन खुद अपने बारे में उनका यह भी कहना था कि उनके ऐसा  करने के मूल में कोई फेमिनिस्ट सोच नहीं था. उन्होंने तो ऐसा करके अपनी पत्नी के प्रति अपने लगाव को रेखांकित किया और साथ ही यह संदेश भी देना चाहा कि हमारे समाज में अभी भी पितृसत्तात्मक रुझान मौज़ूद हैं और अगर हम चाहें तो अपने स्तर पर उसके आगे घुटने टेकने से मना कर सकते हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि अभी छिटपुट स्तर पर होने वाले इन बदलावों को व्यापक सामाजिक स्वीकृति मिलने में कितना समय  लगता है.


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 30 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 23, 2018

परेशानियों में भी तलाश की जा सकती हैं खुशियां

यह कितनी रोचक बात है कि चट मंगनी पट ब्याह  की देशी कहावत चरितार्थ हुई सात समुद्र पार अमरीका के न्यूयॉर्क शहर में. वहां के एक संवेदनशील युवा, डैनी रॉस ने मात्र दो घण्टे से भी कम की अवधि में अपनी प्रेयसी निकोल से मंगनी और ब्याह दोनों ही कर डाले, और वो भी बाकायदा और परिवारजन की उपस्थिति में. असल में निकोल डैनी से अक्सर यह कहा करती थी कि “काश! ऐसा हो कि हम मेहमानों को सगाई की पार्टी के लिए आमंत्रित करें और फिर उन्हें यह कहकर अचम्भे में डाल दें कि हम अभी शादी भी कर रहे हैं.”  यह जैसे निकोल का एक ख़्वाब था, और उससे बेहद प्रेम करने वाले डैनी ने ठान लिया कि वह अपनी प्रेयसी के इस ख़्वाब को पूरा करके ही रहेगा, चाहे उसे इसके लिए कितनी भी परेशानियां क्यों न उठानी पड़ें. डैनी के इस संकल्प की एक और भी वजह थी. उसे यह बात मालूम थी कि उसकी प्रिया निकोल ल्यूपस नामक एक लाइलाज़ रोग से पीड़ित है. इस रोग में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र ग़लती से स्वस्थ कोशिकाओं पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट करने लगता है और इस वजह से रोगी को अनेक व्याधियां अपनी जकड़न में लेने लगती हैं. इस रोग की एक ख़ास बात यह है कि तनिक भी  चिंता अथवा तनाव से यह उग्र रूप धारण करने लगता है, इसलिए चिकित्सक लोग पहली सलाह यही देते हैं कि इसके मरीज़ को हर तरह की चिंता और तनाव से मुक्त रखा जाए.

डैनी ने तै कर लिया कि वह न केवल निकोल की अचानक शादी करने की तमन्ना को पूरा करेगा, उसे शादी की तैयारियों के हर तनाव से भी पूरी तरह मुक्त रखेगा. अपने इरादे को उसने पूरी सावधानी और गोपनीयता से साथ साकार करने की योजना तैयार की. पूरे पांच महीनों के अनथक श्रम और परिवार के कुछ बेहद नज़दीकी लोगों के सहयोग से उसने निकोल के सपने और अपनी योजना को मूर्त रूप देकर प्रेम की एक मिसाल कायम की. उसने सगाई की अंगूठियों  के चयन से लगाकर शादी के जोड़ों के चुनाव तक में निकोल को शामिल किए बग़ैर भी उसकी पसंद का पूरा ध्यान रखा. निकोल के लिए उसके माप का शादी का गाऊन खरीदने के लिए उसने निकोल की मां की मदद ली, जो संयोग से देहाकार में निकोल जैसी ही हैं. शादी की सारी खरीददारी कर वो एक जगह गोपनीय रूप से जमा करता रहा. और जब सारी तैयारियां पूरी हो गईं, तो निकोल को घुमाने के लिए शहर से बाहर ले गया.

लेकिन असल में घुमाने के लिए बाहर ले जाना उसकी योजना का एक हिस्सा था. उनकी अनुपस्थिति में डैनी के मां-बाप उनके घर में आ गए. मां-बाप के लिए  डैनी ने बहुत विस्तृत निर्देश लिख कर रख छोड़े थे कि उन्हें कैसे क्या-क्या तैयारियां करनी हैं. अपनी योजना को लेकर डैनी इतना आग्रहशील था कि उसने अपने मां-बाप के लिए यह भी लिख छोड़ा था कि उन्हें हर हालत में उसके लिखित निर्देशों का अक्षरश: पालन करना है और किसी भी स्थिति में उन निर्देशों से ज़रा भी इधर उधर नहीं होना है. जब निर्धारित कार्यक्रमानुसार डैनी और निकोल घूम कर लौटे तो निकोल को मात्र यह अनुमान था कि उसके प्रिय ने उसके लिए एक सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी आयोजित की होगी. घर के पिछवाड़े में कुछ रोशनी वगैरह देखकर उसका यह  अनुमान और पुख़्ता हो गया. लेकिन शादी तो दूर, सगाई की बात भी  उसके जेह्न में दूर-दूर तक नहीं थी. लेकिन कुछ ही मिनिटों के बाद निकटस्थ परिवार जन की उपस्थिति में उसका प्रिय डैनी उसके सामने घुटनों के बल बैठ कर प्रोपोज़ कर रहा था. चकित निकोल ने जैसे ही उसका प्रस्ताव स्वीकार किया, डैनी ने उसके ताज़्ज़ुब को और बढ़ाते हुए कहा, “तुम जानती ही हो कि मैं तुमसे कितनी मुहब्बत करता हूं! अगर तुम चाहो तो हम लोग अभी शादी भी कर लें. हमारे सारे प्रियजन यहां मौज़ूद हैं ही!” और यह कहते-कहते उसने निकोल को पीछे घुमाया तो उसकी नज़र पड़ी वहां सजे अपने वेडिंग गाउन और डैनी के टक्सेडो पर. यानि तैयारियां पूरी थीं.

कहना अनावश्यक है कि अधिकांश चकित परिजनों की उपस्थिति में निकोल और डैनी विवाह के पवित्र बंधन में बंध गए. अधिकांश इसलिए कि कुछ बेहद नज़दीकी परिजन डैनी की इस योजना से परिचित थे और उन्हीं के सक्रिय सहयोग से यह विवाह इस सुव्यवस्था के साथ सम्पन्न हो पाया था. इस अनुभव से अभिभूत निकोल ने बाद में कहा कि मैं ऐसा ही विवाह चाहती थी. डैनी से विवाह का इससे बेहतर रूप कोई और हो ही नहीं सकता था. डैनी का कहना था कि उसे बहुत खुशी होगी अगर ल्यूपस से ग्रस्त कोई व्यक्ति इस विवाह के बारे में जानेगा और यह समझेगा कि परेशानियों में भी खुशियां तलाश की जा सकती हैं!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 23 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 16, 2018

अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों से काम लेना भी आसान नहीं है!

भारत जैसे देश में जहां बेरोज़गारी की समस्या बहुत विकट है, समस्या का  एक आयाम यह भी है कि बहुत सारे ऐसे लोगों को जिनके पास खूब सारी डिग्रियां या योग्यताएं हैं, मज़बूरी के चलते ऐसी नौकरियां स्वीकार कर लेनी पड़ती हैं जिनमें उतनी योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं होती है. इस बात के लिए सिर्फ एक ही उदाहरण पर्याप्त होगा. अभी हाल में राजस्थान विधान सभा में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के मात्र बारह पदों के लिए जिन अठारह हज़ार आशार्थियों ने आवेदन किया उनमें से सात हज़ार से अधिक स्नातक उपाधि धारी थे और लगभग साढ़े नौ सौ आशार्थी ऐसे थे जिनके पास स्नातकोत्तर या बी. टेक, एम. टेक अथवा एमबीए जैसी डिग्रियां थीं. वैसे, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के इस पद के लिए न्यूनतम निर्धारित योग्यता थी पांचवीं पास होना. कल्पना की जा सकती है कि अगर किसी एम. टेक या एमबीए को इस पद के लिए चुन लिया जाता तो अपनी नौकरी करते हुए उसकी  मानसिक दशा क्या और कैसी होगी.

मैं इस बात पर विचार कर ही रहा था कि मुझे दुनिया के कुछ तथाकथित उन्नत और समृद्ध देशों में भी मौज़ूद ऐसी ही समस्या के बारे में पढ़ने को मिला. शायद आपके लिए भी यह बात चौंकाने वाली हो कि संयुक्त राज्य अमरीका में भी हर चार स्नातक उपधि धारी कर्मचारियों में से कम से कम एक तो ऐसा होता है जिसकी नौकरी के लिए उतनी योग्यता की ज़रूरत नहीं होती है.  उधर ब्रिटेन में हर छह स्नातक कर्मचारियों में से कम से कम एक ऐसा होता  है जो अपने काम की ज़रूरत के हिसाब से अधिक योग्यता धारी होता है. यही नहीं, वहां करीब अट्ठावन प्रतिशत स्नातक कर्मचारी ऐसे हैं जिनके काम के लिए इतनी योग्यता की कोई ज़रूरत नहीं है. बहुत सारे युवा कम योग्यता चाहने वाली ऐसी नौकरियां इस कारण भी स्वीकार कर लेते हैं कि या तो उन्हें अच्छा वेतन मिलता है या फिर किसी बड़ी कम्पनी से जुड़ने का मोह उन्हें अपनी तरफ खींच लेता है. इन देशों में ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि यहां के रोज़गार देने वालों ने  करीब-करीब उन सारी नौकरियों के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक की उपाधि तै कर दी है जिन पर पहले ग़ैर-स्नातकों  को रख लिया जाता था. शायद रोज़गार देने वाले यह सोचते हैं कि जिन कामों के लिए कम योग्यता से काम चल सकता है उन कामों को करने के लिए अधिक योग्यता धारी कार्मिकों को भर्ती कर वे अपने संस्थान का भला कर रहे हैं.

लेकिन हाल में जो अध्ययन हुए हैं वे परिणामों की एक दूसरी ही छवि प्रस्तुत करते हैं. जिन कामों के लिए कम योग्यता की ज़रूरत होती है उनको करते हुए ऐसे अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों में कुण्ठा जड़ें जमाने लगती है और उन्हें लगने लगता है कि उनका काम चुनौतीपूर्ण नहीं है, बोरिंग है और वे व्यर्थ में अपनी प्रतिभा नष्ट  कर रहे हैं. आहिस्ता-आहिस्ता इस तरह के कर्मचारियों में एक नकारात्मक रवैया घर करने लगता है और उनका बर्ताव विद्रोही होने लगता है. वे देर से आने और जल्दी जाने लग जाते हैं और अपने साथी कर्मचारियों को बिना वजह परेशान करने लग जाते हैं. इस तरह की प्रवृत्तियां युवतर कर्मचारियों और उनमें ज़्यादा देखने को मिलती हैं जो किसी टीम के सदस्य के रूप में काम कर रहे होते हैं. उन्हें बार-बार यह बात सालती है कि वे औरों से अधिक काबिल हैं और उन्हें कम योग्यता वालों के साथ काम करना पड़ रहा है. 

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सभी अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारी अपने संस्थानों के लिए हानिप्रद ही साबित होते हों. ऐसे कर्मचारियों में से वे जिनमें अधिक संवेदनशीलता होती है और जो अंतर्वैयक्तिक दक्षता सम्पन्न होते हैं वे अपने सहकर्मियों के साथ न केवल उपयुक्त बर्ताव करते हैं और  उनके साथ सहजता से  घुल मिल जाते हैं, अपनी दक्षता के दम पर उन्हें बेहतर कार्य निष्पादन के लिए भी प्रेरित कर देते  हैं.  अपनी शिक्षा की वजह से उनका व्यवहार संतुलित होता है और वे दूसरों के साथ आत्मीयता कायम कर बेहतर कार्य माहौल तैयार करने में मददगार साबित होते हैं. यहीं टीम के नेतृत्व की भूमिका भी  बहुत महत्वपूर्ण साबित होती है. अगर टीम लीडर समझदार होता है तो वो इस तरह के अधिक योग्यता प्राप्त कर्मचारियों का प्रयोग टीम में अच्छा माहौल बनाये रखने और उसकी उत्पादकता बढ़ाने में कर लेता है. टीम लीडर इस तरह के कर्मचारियों को उनकी योग्यता के अनुरूप काम देकर और अनेक प्रकार से पुरस्कृत व प्रोत्साहित कर उनकी कार्यक्षमता से अपने संस्थान को लाभान्वित करवा पाने में भी कामयाब रहता है. 


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत मंगलवार, 16 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 9, 2018

आत्मीय रिश्तों के बीच क्या काम कोर्ट कचहरी का?

हिंदी की अनेक कहानियों  में वृद्धजन की उपेक्षा और बदहाली बयां हुई है. उषा प्रियम्वदा की ‘वापसी’ में गजाधर बाबू लम्बी नौकरी के दौरान घर से दूर रहने के बाद यह अभिलाषा लिए घर लौटते हैं कि अब उन्हें परिवार  का संग-साथ मयस्सर होगा, लेकिन वे पाते हैं कि घर और परिवार में अब उनके लिए कोई जगह नहीं है. भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ़ की दावत’ में मिस्टर शामनाथ और उनकी पत्नी के लिए बूढ़ी मां एक ऐसी अनावश्यक वस्तु है जिसे मेहमानों की नज़र से बचाने के लिए कमरे में बंद करना ज़रूरी होता है. लेकिन उसी मां की फुलकारी जब अतिथि चीफ़ साहब को भा जाती है तो मां के प्रति उनका बर्ताव तुरंत बदल जाता है. गौरतलब यह बात है कि इन कहानियों में वृद्धों के प्रति उपेक्षा तो है,  अमानवीयता अधिक नहीं है और हिंसा तो कतई नहीं. लेकिन तब यानि सत्तर के दशक से  अब तक आते-आते हालात बहुत बदल चुके हैं.

हाल में भीलवाड़ा से यह खबर आई कि वहां कलक्टर  के यहां होने वाली जन-सुनवाई में छह महीनों में 29 ऐसे मामले दर्ज़ हुए हैं जिनमें बुज़ुर्ग मां-बाप ने यह शिकायत  करते हुए कि उनके बेटे-बहू उनकी समुचित देखभाल नहीं करते हैं, कलक्टर से सहायता की याचना की है. बुज़ुर्गों  की पीड़ा यह है कि उनके वारिसों ने उनसे उनकी पूरी सम्पत्ति ले ली और जब वे भरण पोषण का खर्चा मांगते हैं तो वे उनके साथ मार-पीट करते हैं. वृद्ध मां-बापों  ने ये मामले वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 के तहत दर्ज़ करवाए हैं. बात केवल भीलवाड़ा की ही नहीं है. देश के हर शहर और गांव से आए दिन इस तरह की खबरें आती ही रहती हैं. लेकिन अभी कुछ दिन पहले गुजरात के राजकोट से तो और भी बुरी खबर आई है. इस खबर के अनुसार वहां एक बेटे ने अपनी बीमार वृद्धा मां को छत से फेंककर मार ही डाला. हुआ यह कि राजकोट में रहने वाली एक सेवानिवृत्त शिक्षिका जयश्रीबेन विनोदभाई नाथवानी की मृत्यु जिस बिल्डिंग में वे रहती थीं उसकी  छत से गिरने से हो गई. तफ्तीश के बाद पुलिस ने इसे आत्महत्या मानकर केस बंद कर दिया. लेकिन घटना के दो माह बाद पुलिस को एक गुमनाम चिट्ठी मिली और तब सोसाइटी में लगे सीसीटीवी के फुटेज खंगाले गए तो मामला कुछ और ही निकला. इस फुटेज में बेटा अपनी मां को लिफ्ट से छत की तरफ ले जाता दिखाई दिया. बेटे ने पहले तो इस मृत्यु में अपनी किसी भूमिका से इंकार किया, लेकिन जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उसने मां को छत से नीचे फेंकने की बात कबूल कर ली. उसने कहा कि वो मां की तीमारदारी से परेशान हो गया था. 

बूढे और असहाय मां-बाप की उपेक्षा और उनके साथ दुर्व्यवहार के मामले दुनिया के और देशों में भी सामने आ रहे हैं. हाल में ताइवान से  भी ऐसा ही एक मामला  सामने आया है. लेकिन यहां किस्सा कुछ और है. वहां की शीर्ष अदालत ने मां की इस गुहार पर कि उसने अपने बेटे को डेंटिस्ट बनाने पर भारी खर्च किया, अत: अब वो तब किये गए कॉण्ट्रेक्ट के अनुसार एक बड़ी रकम की हक़दार है, उस बेटे को आदेश दिया है कि वो अपनी मां को करीब छह करोड़ दस लाख रुपये दे. इस मां का कहना है कि उसने अपने दो बेटों को  डेंटिस्ट बनाने पर बहुत भारी रकम खर्च की, लेकिन उसे पहले ही यह आशंका हो गई इसलिए उसने तभी अपने बेटों से एक अनुबंध पर हस्ताक्षर करवा लिए थे कि जब वे कमाने लगेंगे तो उन्हें अपनी कमाई का एक हिस्सा देंगे. गौरतलब है कि अपने पति से तलाकशुदा लुओ ने अकेले दम अपने बेटों को पाला-पोसा था. लुओ के बड़े बेटे ने तो कुछ धनराशि  देकर मां से समझौता कर लिया लेकिन छोटे बेटे चू ने यह कहते हुए मां की याचिका का विरोध किया कि जब उन्होंने यह कॉण्ट्रेक्ट साइन किया था तब उनकी उम्र बहुत कम थी, इस कारण अब इस कॉण्ट्रेक्ट को अवैध  मान लिया जाना चाहिए. अदालत ने बेटे की आपत्ति को अस्वीकार कर दिया है.

अब एक और मामले के बारे में जान लें. अपने ही  मुल्क के शहर इटावा का एक वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है जिसमें यह बताया गया है कि अपने पिता के सख़्त रवैये से परेशान हो एक बच्चा सीधे थाने पहुंच गया है और पुलिसवालों से गुज़ारिश कर रहा है कि वे उसके पिता को सबक सिखाएं. इस प्रसंग में अपने मुल्क की बात मैंने जानबूझकर की है. इसलिए कि पश्चिम में तो बच्चों द्वारा अपने मां-बाप की शिकायत बहुत आम है. लेकिन अपने यहां यह बात  नई है. विचारणीय यह है कि क्या रिश्ते अब इस मुकाम तक आ पहुंचे हैं कि उन्हें सुलझाने के लिए कोर्ट कचहरी की मदद लेनी पड़ रही है!
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 09 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, January 2, 2018

जीवन रक्षक भूमिका भी है सोशल मीडिया की!

सोशल मीडिया हमारी ज़िंदगी में बहुत गहरे उतर चुका है. हममें से ज़्यादातर लोग उसे बरतते हैं, और साथ ही उसकी बुराइयों का रोना भी रोते रहते हैं. बहुतों को यह समय बर्बाद करने वाला शगल लगता है और समय-समय पर कुछ लोग इससे कुछ समय का अवकाश लेने और कुछ इसे सदा के लिए अलविदा कह देने की घोषणाएं करते रहते हैं. कुछ और ऐसे भी हैं जो इसके हानिप्रद  प्रभावों से तो पूरी तरह वाक़िफ़ हैं, लेकिन फिर भी इसे छोड़ नहीं पाते हैं. लेकिन वो कहते हैं ना कि हर बुराई के पीछे कोई  न कोई अच्छाई भी ज़रूर छिपी रहती है, तो ऐसा ही एक वाकया सामने आया है सात समुद्र पार ब्रिटेन  से. लंकास्टर की 33 वर्षीया गृहिणी शॉर्लट सॉल्सबरी  ने जब फ़ेसबुक पर अपनी बिटिया फेलिसिटी की रेटिनोब्लास्टोमा नाम नेत्र व्याधि से ग्रस्त एक आंख की ऐसी तस्वीर पोस्ट  की जिसमें उसकी  आंख की पुतली में एक असामान्य सफेद धब्बा नज़र आ रहा है, तो उन्हें सपने में भी इस बात का अनुमान नहीं था कि उनके द्वारा पोस्ट की गई यह तस्वीर एक और बच्ची के लिए जीवन–रक्षक साबित हो जाएगी.

हुआ यह कि शॉर्लट द्वारा पोस्ट की गई इस तस्वीर पर एक अन्य शहर की निवासी बीस वर्षीया ताओमी की नज़र पड़ी तो यकायक उनका ध्यान इस बात पर गया कि उनकी बीस माह की बेटी लीडिया की आंखें भी कुछ-कुछ ऐसी ही दिखाई देती हैं. ताओमी उन दिनों घर से बाहर रहकर छुट्टियां मना रही थीं. करीब दो सप्ताह बाद जब वे घर लौटीं तो वे अपनी बेटी को एक डॉक्टर के पास ले गईं, और डॉक्टर ने जांच करने के बाद जो बताया उससे उनके पैरों के नीचे की ज़मीन ही खिसक गई. डॉक्टर के अनुसार उनकी इस  नन्हीं बिटिया की बांयी आंख इण्ट्राओक्युलर रेटिनोब्लास्टोमा के सबसे भीषण प्रकार, जिसे टाइप ई कहा जाता है,  से ग्रस्त थी. सरल भाषा में इसे यों समझा जा सकता है कि उसकी आंख के भीतर का ट्यूमर या तो बहुत बड़ा है और या इस तरह का है कि उसका कोई इलाज़ मुमकिन ही नहीं है और न ही उस आंख को बचाया जा सकता है. रोग और ज़्यादा न फैले, इसके लिए यह ज़रूरी है कि उस आंख को जल्दी से जल्दी निकाल दिया जाए. ताओमी के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. डॉक्टरों ने भी  यही किया. इस बुराई में भी अच्छी बात यही थी कि रोग दूसरी आंख को अपनी गिरफ़्त में नहीं ले पाया था. अन्य कई जांचों के परिणाम अभी आने शेष हैं, लेकिन डॉक्टर आश्वस्त हैं कि उनके उपचार कारगर साबित होंग़े यह नन्हीं बच्ची सामान्य रूप से बड़ी होने लगेगी.

उधर फेलिसिटी भी, जो अब एक बरस की हो चुकी है धीरे-धीरे सामान्य होती जा रही है.  उसे कीमोथैरेपी दी जा रही है. जब वह मात्र नौ माह की थी तब उसके मां-बाप को पता चला कि वो रेटिनोब्लास्टोमा से ग्रस्त है. असल में यह रोग उसे जन्म से ही था, लेकिन मां-बाप इस बात से अनजान थे. एक दिन उनकी एक पारिवारिक मित्र लॉरा पॉवर  जो कि एक नर्स है, का ध्यान उसकी आंखों की असामान्यता पर गया और उसने शॉर्लट सॉल्सबरी  को किसी डॉक्टर से परामर्श लेने की सलाह दी. बाद में शॉर्लट ने बताया कि उन्हें कोई अंदाज़ ही नहीं था कि उनकी बेटी किसी रोग से पीड़ित भी हो सकती है. उनके लेखे तो वह एकदम सामान्य थी. हां, इस बात पर ज़रूर उनका ध्यान गया था  कि जब फेलिसिटी घुटनों के बल रेंगने लगी तो कई बार वह किसी चीज़ से टकरा जाया करती थी. लेकिन उन्हें यह बात असामान्य नहीं लगी. बाद में जब लॉरा की सलाह पर वे डॉक्टरों के पास गई तो अनेक जांचों के बाद उन्हें पता चला कि उनकी इस नन्हीं बिटिया की दोनों आंखों में तीन-तीन बेहद आक्रामक ट्यूमर्स हैं.

बिटिया का इलाज़ करा  चुकने के बाद शॉर्लट सॉल्सबरी ने महसूस किया कि उनका फर्ज़ बनता है कि वे अन्य मां-बापों को भी इस गम्भीर रोग के बारे में जानकारी दें. वैसे, जब शुरु-शुरु में फेलिसिटी की इस बीमारी का पता चला तो वे इसे गोपनीय रखती रहीं थी, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि ऐसा करना उचित नहीं है. और तब उन्होंने फेसबुक पर इस रोग के बारे में पूरी जानकारी पोस्ट की. उनका खयाल था कि वहां उनके जो दोस्त हैं वे इस पोस्ट को पढ़कर सचेत होंग़े, लेकिन देखते ही देखते उनकी इस पोस्ट को दुनियाभर में पैंसठ हज़ार लोगों ने साझा कर दिया. ज़ाहिर है इस पोस्ट से जो लोग लाभान्वित हुए उनमें से ताओमी भी एक हैं. ताओमी ने शॉर्लट  के प्रति  अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा भी कि अगर आपने यह पोस्ट नहीं लिखी होती तो मैं अपनी बिटिया के इस रोग से अनजान ही रह गई होती.
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जनवरी, 2018 को इसी शीर्षक से प्रकाशित अलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, December 26, 2017

एक बिल्ली जिसका नाम है जॉय फॉर ऑल!

अमरीका की एक प्रसिद्ध खिलौना कम्पनी की बनाई हुई एक बिल्ली, जिसका नाम जॉय फॉर ऑल है, पिछले दो बरसों से बाज़ार में है. यह बिल्ली गुर्राती है, म्याऊं म्याऊं करती है, अपने पंजे  को चाटती है और कभी-कभी उलटी होकर लेट भी जाती है ताकि आप इसका पेट सहला सकें. इस बिल्ली का निर्माण वरिष्ठ जन के लिए एक साथी की ज़रूरत को ध्यान में रखकर किया गया था. यहां याद कर लेना उचित होगा कि पश्चिमी देशों में बढ़ती उम्र का अकेलापन बहुत बड़ी सामाजिक समस्या है. यह बिल्ली अकेलेपन से जूझ रहे बूढों को कम्पनी देती है और बूढों को इसका मल मूत्र भी साफ नहीं करना पड़ता है. यानि यह बग़ैर उनकी ज़िम्मेदारी बढ़ाए उन्हें साहचर्य प्रदान करती है. लेकिन अच्छी ख़बर  इसके बाद है.

अमरीका की  नेशनल साइंस फाउण्डेशन ने तीन बरस के लिए एक लाख मिलियन डॉलर का अनुदान दिया है जिसकी मदद से यह खिलौना कम्पनी और ब्राउन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक मिलकर इस इस रोबोटिक बिल्ली को कृत्रिम बुद्धि से भी युक्त  कर देंगे. आशा की जाती है कि यह कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न  बिल्ली वृद्धजन को उनके रोज़मर्रा के सामान्य काम निबटाने में मददगार साबित होगी. फिलहाल ब्राउन विश्वविद्यालय के ह्युमैनिटी सेण्टर्ड रोबोटिक्स इनिशिएटिव के शोधकर्ता इस बात की पड़ताल में जुटे हैं कि इस बिल्ली को ऐसे कौन कौन-से कामों के लिए तैयार करना उपयुक्त होगा जो घर में अकेले रहने वाले वृद्धजन के लिए उपयोगी हों. इस बात के लिए ये लोग शोधकर्ताओं की टीम की मदद से यह पड़ताल कर रहे हैं कि वृद्धजन की रोज़मर्रा की ज़िंदगी कैसी होती है और उनकी ज़रूरतें क्या  होती हैं. वे यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि उन्नत बिल्ली नए काम किस तरह करेगी. विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने मज़ाक के लहज़े में कहा कि हमारी यह बिल्ली न तो कपड़े प्रेस करेगी और न बर्तन मांजेगी. उससे कोई यह भी उम्मीद नहीं करता है कि वो गपशप करेगी, और न ही यह आस लगाता है कि वो जाकर अखबार उठा लाएगी. उनके मन में यह बात बहुत साफ़ है कि बोलने वाली बिल्ली की ज़रूरत किसी को  नहीं है. इस प्रोफ़ेसर ने यथार्थपरक लहज़े में कहा कि हम अपनी इस बिल्ली की कार्यक्षमता के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर कोई दावा नहीं करना चाहते. हम तो बस एक ऐसी बिल्ली तैयार करना चाहते हैं जो रोज़मर्रा के बहुत सामान्य काम कर सके, जैसे कि वो अपने साथी वृद्ध को उनकी खोई चीज़ें तलाश करने में मदद कर दे या उन्हें डॉक्टर के अपाइण्टमेण्ट की याद दिला दे या ज़रूरत पड़ने पर यह सुझा दे कि वे किसे फोन करें! और हां, उनकी कोशिश यह भी है कि यह बिल्ली बहुत  महंगी न हो, हर कोई इसे खरीद सके. अभी जो बिल्ली बाज़ार में उपलब्ध है उसकी कीमत एक सौ डॉलर है और इनकी कोशिश है कि यह नई कृत्रिम बुद्धि वाली बिल्ली इससे थोड़ी ही ज़्यादा कीमती  हो. यही वजह है कि इन लोगों ने अपनी इस परियोजना को नाम दिया है: अफोर्डेबल रोबोटिक इण्टेलीजेंस फॉर एल्डरली सपोर्ट- संक्षेप में एरीज़ (ARIES).

पश्चिमी दुनिया की सामाजिक परिस्थितियों में कृत्रिम बुद्धि सम्पन्न बिल्ली का यह विचार बहुत पसंद किया जा रहा है. एक कामकाज़ी महिला ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनकी 93 वर्षीया मां उनके साथ रहती हैं और उम्र के साथ वे बहुत सारी बातें भूलने लगी हैं. लेकिन उन्होंने  अपनी मां को जो जॉय फॉर ऑल बिल्ली खरीद कर दी वह उनके लिए बहुत मददगार साबित हुई है और जब वे काम पर चली जाती हैं तो बिल्ली उनकी मां की बहुत उम्दा साथिन साबित होती है, उनकी मां भी उससे  असली बिल्ली जैसा  ही बर्ताव करती हैं, हालांकि वे यह जानती है कि यह बिल्ली बैट्री चालित है. वे सोचती हैं कि जब यह बिल्ली कृत्रिम बुद्धि से युक्त हो जाएगी तो उनकी मां के लिए इसकी उपादेयता कई गुना बढ़ जाएगी. अभी मां काफी कुछ भूल जाती है, बिल्ली उन्हें ज़रूरी बातें याद दिला दिया करेगी.

इस परियोजना पर काम कर रहे विशेषज्ञों को उम्मीद है कि निकट भविष्य में विकसित की जाने वाली यह कृत्रिम बुद्धि युक्त बिल्ली मनुष्यों के साथ एक ऐसा पारस्परिक रिश्ता  कायम कर सकेगी जिसकी उन्हें बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. वे यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि उनके द्वारा विकसित की जाने वाली यह बिल्ली वृद्धजन को एकाकीपन, चिंता और अवसाद से काफी हद तक निज़ात दिला सकने में कामयाब होगी. कामना  करनी चाहिए कि वर्तमान सुख-सुविधाओं और अमीरी की तरफ बुरी तरह  भागते-दौड़ते और व्यक्ति केंद्रित समाज ने जो समस्याएं पैदा कर दी हैं उनसे एक हद तक मुक्ति दिलाने में और कोई नहीं तो यह यांत्रिक प्राणी तो सफल हो ही जाएगा.

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 जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.            

Tuesday, December 19, 2017

आभासी दुनिया में भी मनुष्य तो मनुष्य ही होता है!

आम चर्चाओं में अक्सर आभासी दुनिया की गतिविधियों  को यह कहकर नकारा जाता है कि इनका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता है लेकिन हाल में अमरीका के पूर्वी हार्लेम के 22 वर्षीय रैप गायक सह प्रोड्यूसर स्पेंसर स्लेयॉन और फ्लोरिडा की रिटायरमेण्ट कम्युनिटी में रहने वाली 81 वर्षीया रोज़ालिन गुटमैन की दोस्ती का किस्सा सामने आया तो इस नकार पर पुनर्विचार की ज़रूरत महसूस होने लगी. हुआ यह कि स्पेंसर को अपने मोबाइल पर वर्ड्स विथ फ्रैण्ड्स नामक एक खेल खेलने का चस्का लगा. स्क्रैबल से मिलते-जुलते इस खेल को किसी अजनबी लेकिन वास्तविक साथी के साथ खेलना होता है. अजनबी साथी का चयन खेल स्वत: कर देता है. खेल  के आनंद और रोमांच को और बढ़ाने के लिए दोनों खिलाड़ी परस्पर चैट भी कर सकते हैं. तो स्पेंसर को इस खेल के लिए साथी मिलीं रोज़ालिन और उन दोनों ने  सैंकड़ों गेम खेल डाले. लेकिन रहे वे खेल तक ही सीमित. कभी उन्होंने चैट नहीं की. खेल का चस्का दोनों को ऐसा लगा कि वे हर रोज़ खेलने लगे, और इसी क्रम में आहिस्ता-आहिस्ता चैट भी करने लगे. चैट की शुरुआत तो खेल विषयक मुद्दों से ही हुई लेकिन फिर वे अपने निजी जीवन को लेकर भी गपशप करने लगे, और इसी इलसिले में एक दिन स्पेंसर ने रोज़ालिन को यह भी बता दिया कि वो संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए न्यूयॉर्क चला जाना चाहता है. बात आगे बढ़ती इससे पहले कुछ ऐसी व्यस्तताएं आड़े आईं कि स्पेंसर ने खेल खेलना बंद कर दिया और अपने मोबाइल से इस खेल के एप को भी डिलीट करने का इरादा कर लिया. लेकिन तब तक उसकी दोस्ती रोज़ालिन से इतनी गहरी हो चुकी थी कि उसे यह ज़रूरी लगा कि यह करने से पहले वो उन्हें अलविदा कह दे.  चैट करते हुए उसने उनसे पूछा कि वे उसे क्या सलाह देना चाहेंगी? और रोज़ालिन का जवाब था, ‘तुम अपनी ज़िंदगी से जो भी चाहते हो, हाथ बढ़ाओ और उसे अपनी मुट्ठी में कर  लो!’ और वो न्यूयॉर्क चला गया.

वहां जाकर और अपने सपने को पूरा करने के लिए जद्दोज़हद करते हुए यकायक एक दिन उसे फिर इस खेल की याद आई और उसने इसे अपने मोबाइल में फिर से इंस्टॉल कर डाला. रोज़ालिन से भी उसका फिर सम्पर्क कायम हो गया. इसी बीच एक दिन जब वह किसी से गपशप कर रहा था तो उसने अपनी इस ऑनलाइन मित्र की सराहना भरी चर्चा की. संयोग से इस चर्चा को उसके एक स्थानीय मित्र की मां एमी बटलर ने सुन लिया. एमी वहां के एक चर्च में धर्मोपदेशक थीं और उन्हें लगा कि दो दोस्तों की यह कथा तो उन्हें अपने किसी प्रवचन में भी सुनानी चाहिए. लेकिन  कहानी में हक़ीक़त के और रंग भरने के लिए उन्हें रोज़ालिन से मिलना ज़रूरी लगा. उन्होंने फोन पर बात की तो यह महसूस किया कि अगर वे रोज़ालिन से प्रत्यक्ष मुलाकात करें तो और भी अच्छा रहेगा. और एमी बटलर स्पेंसर स्लेयॉन को साथ लेकर पहुंच गईं रोज़ालिन के पास उनके शहर फ्लोरिडा में. स्पेंसर और रोज़ालिन की पहली प्रत्यक्ष मुलाक़ात का अपना अनुभव साझा करते हुए एमी ने बाद में बताया कि उनका यह मिलन मेरी कल्पना से कहीं ज़्यादा खूबसूरत था. उनके हाव-भाव में तनिक भी असहजता नहीं थी और दोनों में एक दूसरे के प्रति चुम्बकीय आकर्षण था.

ज़्यादा वक़्त तीनों में से किसी के भी पास नहीं था. लेकिन एमी ने इस मुलाक़ात की जो तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं उनमें कुछ ऐसा जादू था कि उन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा. बाद में स्पेंसर ने कहा कि उनके देश में जिस तरह का नस्लीय माहौल है उसके संदर्भ में एक अश्वेत पुरुष और श्वेत स्त्री की इस मैत्री का ऐसा स्वागत समय की एक बड़ी ज़रूरत को पूरा करने  वाली बात है. रोज़ालिन ने हालांकि पत्रकारों से कोई बात नहीं की, एमी से अपनी बातचीत में ज़रूर उन्होंने ताज़्ज़ुब किया कि इस मुलाकात में ऐसा विलक्षण क्या है? क्या तमाम लोगों को आपस में ऐसा ही व्यवहार नहीं करना चाहिए! रोज़ालिन का यह कथन अनायास ही हमें अपने समय के बड़े कथाकार स्वयंप्रकाश की कहानी  ‘उस तरफ’ की याद दिला देता है जिसमें एक पत्रकार जैसलमेर के एक गांव में लगी भीषण आग में से बारह बच्चों को जीवित बचा ले आने वाले एक बेहद मामूली  आदमी नखतसिंह से इण्टरव्यू  करने जाता है और नखतसिंह उसी से सवाल करने लगता है कि जो कुछ उसने किया उसमें असाधारण क्या थ! स्पेंसर और रोज़ालिन की मैत्री कथा ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि मनुष्य तो मनुष्य ही होता है, चाहे वह यथार्थ दुनिया में हो या आभासी दुनिया में!


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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 19 दिसम्बर, 2017 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, December 13, 2017

चुप्पी तोड़ने वाले बने टाइम के पर्सन ऑफ द ईयर

साल के आखिरी माह  में सारी दुनिया बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करती है कि लोकप्रिय पत्रिका टाइम किसे अपना पर्सन ऑफ द ईयर घोषित करती है. इस पत्रिका ने 1927 से इस सिलसिले को शुरु किया था. विचार यह था कि हर बरस किसी ऐसे व्यक्ति नामांकित किया जाए जिसने बीते बरस में सकारात्मक या नकारात्मक किसी भी तरह से ख़बरों को प्रभावित किया हो. शुरुआती बरसों में ये लोग मैन ऑफ द ईयर घोषित करते थे लेकिन 1999 से इस सम्मान का नाम बदल कर पर्सन ऑफ द ईयर कर दिया गया. ज़ाहिर है कि यह बदलाव सारी दुनिया में लैंगिक समानता की बढ़ती जा रही स्वीकृति की परिणति था. इस बरस एक लम्बी प्रक्रिया के बाद किसी व्यक्ति को नहीं अपितु एक समूह को यह सम्मान प्रदान किया गया है. यहीं यह भी स्मरण कर लेना उपयुक्त होगा  कि इस  पत्रिका ने अतीत में भी व्यक्ति की बजाय समूह का चयन किया है. लेकिन इसकी विस्तृत चर्चा थोड़ी देर बाद. अभी तो यह कि टाइम पत्रिका ने यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाली महिलाओं और पुरुषों को साल 2017 के लिए पर्सन ऑफ द ईयर चुना है. टाइम पत्रिका ने इन्हें एक नया नाम दिया है: ‘द साइलेंस ब्रेकर्स’  यानि चुप्पी तोड़ने वाले. पर्सन ऑफ द ईयर की इस दौड़ में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प दूसरे नम्बर पर रहे हैं.

अक्टोबर माह में न्यूयॉर्क टाइम्स और द न्यूयॉर्कर में एक खोजपरक  रिपोर्ट छपी थी जिसमें कई मशहूर अभिनेत्रियों  ने हॉलीवुड के प्रख्यात निर्माता निर्देशक हार्वी वाइन्सटाइन पर यौन उत्पीड़न के गम्भीर आरोप लगाए थे. इस रिपोर्ट  के बाद तो जैसे अपनी व्यथा-कथा सुनाने वालों की बाढ़ ही आ गई. सारी दुनिया से स्त्रियों ने (और कुछ पुरुषों ने भी) अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न  की घटनाएं उजागर  कीं. टाइम पत्रिका के प्रधान सम्पादक एडवर्ड फेलसेनथाल ने ठीक कहा है कि “यह बहुत तेज़ी से होता हुआ सामाजिक बदलाव है जिसे हमने दशकों में देखा है. इसकी शुरुआत सैंकड़ों महिलाओं और कुछ पुरुषों के व्यक्तिगत साहस से हुई जिन्होंने आगे बढ़कर अपनी कहानियां बयां कीं.”  इस सामाजिक बदलाव को लाने में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ी भूमिका अदा की. वहां प्रयुक्त हैशटैग #मी टू दुनिया के 85 देशों में अनगिनत बार इस्तेमाल किया जा चुका है. कुछ लोगों के वैयक्तिक साहस से शुरु हुआ यह अभियान अब जागरण का एक बहुत बड़ा आंदोलन बन चुका है और यह खिताब इस आदोलन की बड़ी स्वीकृति का परिचायक है. लेकिन टाइम की तरफ से यह  भी सही कहा गया है कि अभी यह कहना बहुत कठिन है कि इस आंदोलन का कुल जमा हासिल क्या है. इसका कितना असर  हुआ है और कितना और होगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा कि कुछ लोगों के अपना सच अनावृत करने से शुरु हुए इस आंदोलन ने लोगों के जीवन यथार्थ को बदलने में कितनी सफलता पाई है. लेकिन आम तौर पर इस चयन का बहुत गर्मजोशी से स्वागत हुआ है. एक सामान कामकाजी अमरीकी महिला डाना लुइस ने कहा कि “मैं अपनी ग्यारह वर्षीया बेटी को दिखाना चाहती हूं कि खुद के लिए भी खड़ा होना चाहिए, भले ही तुम्हें लगे कि पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ़ है. अगर तुम लड़ती  रहोगी तो एक दिन तुम्हें कामयाबी भी ज़रूर हासिल होगी.”  

इस चयन की घोषणा के बाद यही बात बरसों पहले मी टू अभिव्यक्ति  का सृजन करने वाली तराना बर्क और हाल में इसे प्रोत्साहित करने वाली अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने भी अपने अपने साक्षात्कारों में कही है.  तराना बर्क ने कहा कि “मैं तो शुरु से ही यह कह रही हूं कि यह महज़ एक क्षण नहीं, एक आंदोलन है. मेरा खयाल है कि हमारा काम तो अब शुरु हो रहा है. यह हैशटैग एक घोषणा है. लेकिन अब हमें वाकई  उठ खड़ा होना और काम करने लगना है.”  मिलानो ने उनकी हे एबात को जैसे आगे बढ़ाते हुए अपनी रूप्रेखा सामने रखी और कहा, “मैं चाहती हूं कि कम्पनियां अब एक आचार संहिता अपनाएं, कम्पनियां और ज़्यादा औरतों को नौकरियां दें. मैं चाहती हूं कि हम अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दें. हमें इन सब कामों को गति देना है और बतौर स्त्री हम हम सबको एक दूसरी का समर्थन करना है और कहना है कि बहुत हुआ यह सब, अब और नहीं सहेंगी हम.”

अब यह भी जान लें कि टाइम पत्रिका ने सन 1950 में  पहली दफा किसी व्यक्ति की बजाय समूह को यह सम्मान प्रदान किया था. तब यह सम्मान ‘द अमरीकन फाइटिंग मैन’   को दिया गया था. इसके बाद 1966 में ‘अमरीकन्स अण्डर 25’ को, 1975 में ‘अमरीकन वुमन’ नाम से चुनिंदा बारह अमरीकी महिलाओं को,  2002 में ‘द व्हिसलब्लोअर्स’ को और  2006 में ‘यू’ यानि हम सबको सामूहिक रूप से यह सम्मान दिया जा चुका है. 

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 12 दिसम्बर, 2017 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.