Tuesday, November 3, 2015

जीना यहां, मरना वहां

राजस्थान के हर  क्षेत्र में इस आशय का कथन प्रचलित है कि चाहे कमतर महत्व का अन्न ही क्यों न खाना पड़े, अपना इलाका छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे. जैसे गेहूं छोड़कर मक्की खाना, लेकिन मेवाड़ छोड़कर कहीं नहीं जाना. आप मेवाड़ की जगह मारवाड़ कर दें, यह कथन मारवाड़ का हो जाएगा. और अपनी धरती से प्रेम केवल राजस्थान वासियों को ही नहीं रहा है. बहादुर शाह ज़फर के एक दरबारी शायर शेख इब्राहीम ‘जौक’ ने भी तो कहा था,  “कौन जाए पर जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर!” लेकिन इसी के साथ यह भी याद रखने की बात है कि हमारे ही देश में जीवन के अंतिम समय काशी चले जाने और वहीं प्राण त्याग करने का सपना भी देखा जाता रहा है.

लेकिन इधर हाल में आई एक रपट ने, लगता है कि काशी से उसका यह गौरव भी छीन लेना चाहा है. सिंगापुर का एक परोपकारी संगठन लियन फाउण्डेशन पिछले कई बरसों से द क्वालिटी ऑफ डेथ इण्डेक्स नामक एक सर्वेक्षण करवाता है. इस  सर्वेक्षण में दुनिया भर के कोई सवा सौ रोग लक्षण नियंत्रण विशेषज्ञ चिकित्सकों के साथ साक्षात्कार करके यह जानने का प्रयास किया जाता है कि किस देश में मृत्य पूर्व देखभाल की सुविधाएं कैसी हैं! तो इस बार अस्सी देशों से जुटाई गई जानकारी के अनुसार यह पाया गया है कि पूरी दुनिया में मरने के लिए सबसे उम्दा देश ब्रिटेन है. यानि, आप चाहे जहां रहें, मरने के लिए ब्रिटेन चले जाएं! अगर ब्रिटेन जाना मुमकिन न हो तो ऑस्ट्रेलिया जाएं, वहां भी न जा सकें आयरलैण्ड चले जाएं और अगर वह भी सम्भव न हो तो बेल्जियम का रुख कर लें.

यानि अगर आप सुख पूर्व मरना चाहते हैं तो आपको किसी न किसी अमीर  देश का ही रुख करना चाहिए. यह बात स्वाभाविक भी है. समृद्ध देश ही तो अपने नागरिकों की समुचित देखभाल का  खर्चा उठा  सकते हैं. वैसे यह जानना कम रोचक नहीं होगा कि इस अध्ययन के अनुसार ब्रिटेन में जीवन के अंत समय में देखभाल करने वाली इन सेवाओं का 80 से 100 प्रतिशत भार स्वयं रोगी द्वारा नहीं वरन अधिकांशत: सेवाभावी संगठनों द्वारा वहन किया जाता है.

द इकोनॉमिस्ट इण्टेलिजेंस यूनिट द्वारा किए गए इस अध्ययन में व्यापक राष्ट्रीय नीतियों, राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं में रोग के लक्षण नियंत्रित करने वाली सेवाओं के व्यापक समावेशन, सुदृढ़ होसपाइस आन्दोलन, और इस मुद्दे पर गहन सामुदायिक संलग्नता को आधार बनाया गया. ज़ाहिर है कि इन सबके मूल में है किसी भी देश के नागरिकों का आर्थिक स्तर. और यही कारण है कि आर्थिक संसाधनों की कमी और आधारभूत ढांचे के अभाव में विकासशील और तीसरी  दुनिया के बहुत सारे देश अपने नागरिकों को सामान्य कष्ट निवारक सुविधाएं भी सुलभ नहीं करवा पाते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद यह जानना भी कम सुखद नहीं है कि अपनी आर्थिक सीमाओं के बावज़ूद पनामा जैसा छोटा देश अपनी प्राथमिक चिकित्सा सेवाओं में रोग के लक्षणों के नियंत्रण के तंत्र का समावेश कर इकत्तीसवें स्थान पर पहुंच सका है. ऐसा ही सुखद परिणाम मंगोलिया ने भी प्राप्त किया है जिसने होसपाइस सुविधाओं और शिक्षा का विस्तार कर अठाइसवां स्थान पा लिया है. एक और ख़ास बात यह भी कि मंगोलिया ने यह चमत्कार एक अकेले  डॉक्टर  के दम पर कर दिखाया है.  और तो और युगाण्डा जैसा देश भी दर्दनाशक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाकर पैंतीसवें स्थान तक पहुंच सका है.

इतना सब बताते हुए भी मैं अपने देश भारत का ज़िक्र करने से बचता रहा हूं. वजह आप समझ सकते हैं. अस्सी देशों की सूची में हम सड़सठवें स्थान पर हैं. अगर खुश होना चाहें तो यह जान लें कि चीन हमसे भी पीछे है. वह इकहत्तरवें स्थान पर है. लेकिन जब आप यह जानेंगे कि हमारे ही महाद्वीप का एक देश ताइवान छठी पायदान पर है, तो आपकी यह खुशी भी उदासी में तबदील हो जाएगी. बात सिर्फ अमीरी की भी नहीं है. बात है सरकार की नीतियों की, उसकी प्राथमिकताओं की और समाज की बेहतरी में जन भागीदारी की.

एक तरफ जहां इस अध्ययन में पहले नम्बर पर आने वाले देश ब्रिटेन में भी यह शिकायत की  जा रही है कि वहां हर नागरिक को समुचित सुविधाएं मयस्सर नहीं हो रही हैं, वहीं तीसरी दुनिया के बहुत सारे देशों में, जिनमें हमारा अपना देश भी शामिल है, राष्ट्रीय बजट का बहुत ही छोटा हिस्सा स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं पर केन्द्रित रखा जाता है और उसमें भी यदा-कदा कटौती कर दी जाती है. ऐसे में अपने देश की वित्तीय प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार तो ज़रूरी हो ही जाता है. भला कौन नहीं चाहेगा कि जिस  मिट्टी में वह पला बढ़ा है उसी मिट्टी की गोद में वह चिर  निद्रा में भी लीन हो जाए!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 03 नवम्बर, 2015 को जीना यहां, मरना वहां, ताकि आसानी से कट जाए बुढ़ापा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    

Tuesday, October 27, 2015

हनीमून फोटोग्राफी: दो के साथ तीसरा क्यूं?

पिछले पचास-साठ बरसों में भारतीय वैवाहिक व्यवस्थाओं में जो बड़े बदलाव आए हैं उनमें वैवाहिक फोटोग्राफ़ी में आए बदलाव खास तौर पर ग़ौर तलब हैं. अगर आप आज पिछली या उससे पिछली पीढ़ी के प्रोपोज़ल फोटोग्राफ़ और शादी के एलबम देखें तो शायद  हंसे बग़ैर न रहें. किसी स्टूडियो में एक कृत्रिम गमले के पास खड़ी सकुचाई सिमटी युवती या थ्री पीस सूट में अकड़े और असहज खड़े युवा की तस्वीर हो या वो भारी भरकम एलबम हो जिसमें श्वेत श्याम तस्वीरें पहले कॉर्नर्स के सहारे अटकाई जाती थी और बाद में रंगीन तस्वीरें सीधे ही शीट पर प्रिण्ट की जाने लगीं, इन सबमें लोग जिन मुद्राओं में दिखाई देते हैं वे आज के दर्शक के मुंह पर एक वक्र मुस्कान लाने के लिए पर्याप्त हैं.   स्टिल तस्वीरों के बाद आया वीडियो का ज़माना जब हममें से ज़्यादा वीडियो के लिए भी वैसे ही पोज़ दिया करते थे जैसे स्टिल फोटो के लिए देते थे. पहले वीडियो फोटोग्राफी होती और फिर हमारा स्टूडियो उसमें स्पेशल इफेक्ट डाल कर और उसे चालू  फिल्मी संगीत  से सज़ा कर वीडियो कैसेट बना कर हमें देता जिसे थोड़े समय बाद हम वीसीडी में भी कन्वर्ट  करवाने लगे. अब शादियों में ड्रोन से फोटोग्राफी का चलन लोकप्रिय होता जा रहा  है.

बात सिर्फ तकनीक की ही नहीं है. अगर आप इन तस्वीरों और वीडियोज़ में दुल्हा दुल्हन और उनके परिजनों की मुद्राओं को देखें तो बदलाव को बहुत आसानी से लक्ष्य कर सकते हैं. पहले की तस्वीरों में दुल्हा-दुल्हन के बीच एक सम्मानजनक दूरी साफ देखी जा सकती है जो लगातार कम होती गई है. पहले की तस्वीरों में जैसे वे प्रयत्न करते हैं कि कहीं एक दूसरे को छू न लें, और यह प्रयत्न लुप्त होते-होते हालत यह हो गई कि दुल्हा दुल्हन एक दूसरे का हाथ थामे, आलिंगन बद्ध हो या चुम्बन करते हुए फोटो खिंचवाना भी ज़रूरी समझने लगे. इस बदलाव के मूल में समाज और जीवन शैली में आए बदलाव का भी कम योगदान नहीं है. हम सिल्वर स्क्रीन पर भी तो यह बदलाव देख रहे हैं. कह सकते हैं कि जो सिल्वर स्क्रीन पर कुछ समय पहले घटित हुआ वह हमारे शादी के एलबमों में अब घटित हो रहा है.

जी हां. अब शादी से पहले दुल्हा दुल्हन बाकायदा रोमांस करते हुए फिल्म बनवाते हैं और वह फिल्म शादी के वक़्त सबको दिखाई जाती है. निश्चय ही शादी से पहले का यह रोमांस काफी सात्विक होता है और अगर फिल्म बनवाने वालों का आर्थिक और मानसिक स्तर उच्च होता है तो यह फिल्म काफी आकर्षक और सुरुचिपूर्ण भी होती है. लेकिन इसके बाद जो नए बदलाव आ रहे हैं वे काफी कुछ सोचने को विवश करते हैं. इधर एक नया चलन यह हुआ है कि आर्थिक रूप से समर्थ नव विवाहित युगल अपने हनीमून के लिए भी वीडियोग्राफर की सेवाएं लेने लगे हैं और वे सब कुछ को कैमरे में कैद करवा लेना चाहते हैं. इस सब कुछ को आप ख़ास तौर पर ग़ौर से पढ़ें. असल में यह सब कुछ को कैमरे में कैद करवाने का चलन हनीमून के वक़्त निर्वसन तस्वीरें खिंचवाने के चलन की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है. कुछ हाई फाई लोगों में दुल्हन की अनौपचारिक अन्तरंग  तस्वीरें खिंचवाने का चलन तो कुछ समय से था ही, जब फोटोग्राफर्स से यह आग्रह किया जाने लगा कि वे हनीमून के दौरान दुल्हन की निर्वसन छवियां भी कैमरे में कैद करें तो फोटोग्राफी की दुनिया में भी थोड़ी हलचल हुई. बहुत सारे जाने-माने  वैवाहिक छायाकारों ने ऑन रिकॉर्ड यह बात कही है कि उन्हें इस तरह के अनुरोध प्राप्त हुए हैं और इन अनुरोधों को पाकर वे असहज हुए या हुई हैं. एक फोटोग्राफर ने कहा है कि उन्हें ऐसा अनुरोध वर की तरफ से प्राप्त हुआ, जिस पर उसने पलटकर यह पूछा कि क्या इस बात के लिए वधू की इच्छा भी जान ली गई है, और जब इस सवाल का जवाब नकारात्मक मिला तो उसने यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. एक और फोटोग्राफर ने बताया कि किसी बहुत बड़े क्लाएंट के यहां से यह प्रस्ताव आया था और उसे सीधे इंकार करने में संकोच हुआ इसलिए उसने यह सोच कर भारी राशि की मांग कर ली कि प्रस्ताव करने वाला खुद ही पीछे हट जाएगा, लेकिन जब उसका यह दांव भी कारगर साबित नहीं हुआ तो उसे सीधे ही मना करना पड़ा.

लेकिन हनीमून के अंतरंग क्रियाकलाप को व्यावसायिक फोटोग्राफर की मदद से कैमरे में कैद करवाने की नई तमन्ना हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करती है. क्या यह मात्र अपने अन्तरंग पलों की सुखद स्मृतियों को भविष्य के लिए संजो कर रखने की भावुकतापूर्ण तमन्ना है या इसे किसी मानसिक विकृति की कोटि में शुमार किया जाना चाहिए! आप क्या सोचते हैं?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 20, 2015

तुमने एयरब्रश के कमाल से मेरी पत्नी को गायब कर दिया

हाल में अमरीका में एक ऐसी घटना घटी जो ऊपर से देखने में सामान्य लगती है लेकिन जिसके निहितार्थ गम्भीर हैं. वैसे इस घटना का सुदूर अमरीका में घटित होना मात्र एक संयोगात्मक तथ्य है, अन्यथा ऐसा कहीं भी हो सकता है. अपने देश में भी.

हुआ यह  कि वहां की एक महिला को लगा कि विवाह के दो दशक बीत जाने और इस बीच उसकी देह में आए उम्र जनित और अन्य बहुत सारे स्वाभाविक बदलावों के कारण वो अपने पति की निगाहों में पहले जितनी दिलकश नहीं रह गई है. उसने सोचा कि क्यों न पतिदेव को विवाह की वर्षगांठ पर एक अनोखा उपहार दिया जाए! जब पति के पास उस  उपहार का बक्सा पहुंचा तो उसने बड़ी उत्सुकता से साथ उस बक्से को खोला, और पत्नी के भेजे प्रेमिल उपहार को अपने हाथों में लिया. जैसे ही उसने एक नज़र उस उपहार पर डाली, उसका दिल बैठ गया.

उपहार के रूप में उसके हाथों में थी खूबसूरत तस्वीरों  की एक एलबम. ज़ाहिर है कि ये  तस्वीरें  उसकी पत्नी की थी थी. लेकिन वो कोई साधारण तस्वीरें  नहीं थीं. वो उसकी पत्नी की फोटोशॉप की हुई, बेहतर बनाई हुई तस्वीरें थीं. उम्र के उन दो दशकों ने उसकी पत्नी के चेहरे-मोहरे  को जो कुछ भी दिया था, उसे एयरब्रश की सहायता से हटा दिया गया था, और इसी बात ने पति देव को उदास कर दिया था.

उन्होंने उस फोटोग्राफर विक्टोरिया हाल्टन को एक ख़त लिखा.  विक्टोरिया ने हाल ही में उस ख़त को अपने फेसबुक पेज पर साझा किया है. यह पत्र पढ़ने और ग़ौर करने काबिल है. पति ने लिखा है: “नमस्ते विक्टोरिया. मैं  (नाम) का पति हूं. मैं आपको यह ख़त इसलिए लिख रहा हूं कि हाल ही में मुझे एक एलबम मिला है जिसमें मेरी पत्नी की वे तस्वीरें हैं जो आपने ली हैं. मैं यह क़तई  नहीं चाहता हूं कि आपको ऐसा लगे कि  मैं उन तस्वीरों से अपसेट हूं.... लेकिन हां, मेरे पास सोचने के लिए कुछ मुद्दे हैं जिन्हें मैं आप तक पहुंचाना चाहता हूं. मैं अपनी पत्नी के साथ तब से हूं जब वे अठारह बरस की थीं और हमारे दो खूबसूरत बच्चे हैं. इन बरसों में हमारी ज़िन्दगी में कई उतार-चढ़ाव आए हैं, और मेरा खयाल है कि खुद मेरी पत्नी ने ही आपसे इस तरह की परिष्कृत तस्वीरें तैयार करने को कहा है. असल में वे कभी-कभी यह शिकायत करती भी हैं कि अब मेरी निगाहों में वे उतनी आकर्षक नहीं रही हैं और अगर मेरी ज़िन्दगी में कोई और आई जो उनसे युवा हों तो क्या पता मैं उसकी तरफ खिंच जाऊं. तो मैंने जब इस एलबम को खोला तो मेरा दिल बैठ गया. ये  तस्वीरें बहुत खूबसूरत हैं और आपने अपना काम बखूबी किया है. आप बहुत टेलेण्टेड फोटोग्राफर हैं...लेकिन इन तस्वीरों में मेरी पत्नी नहीं है. आपने तो उसके हर नुक्स को गायब कर दिया है. शायद उसी ने आपको ऐसा करने को कहा था.  लेकिन आपके ऐसा करने से वो हर चीज़ गायब हो गई है जिसने  हमारी ज़िन्दगी का निर्माण किया था. जब आपने उसके स्ट्रेच मार्क्स हटाए तो आपने हमारे बच्चों के जन्म का इतिहास भी मिटा डाला, जब आपने उसकी झुर्रियां हटाईं  तो आपने हमारे संग-साथ के इन बरसों की तमाम मुस्कानें और हमारी चिन्ताएं भी मिटा दीं. जब आपने उसकी चर्बी हटाई तो आपने उसकी पाक कला निपुणता और उन सारी स्वादिष्ट चीज़ों की यादें भी मिटा डालीं जो इन बरसों में हमने साथ-साथ खाई थीं. मैं जानता हूं कि आपने अपना काम किया है. लेकिन मैं आपको सिर्फ यह बताने के लिए यह पत्र लिख रहा हूं कि इन तस्वीरों को देखकर मुझे यह बात महसूस हुई है कि शायद मैं अपनी पत्नी को ठीक से यह बात नहीं कह सका हूं कि मैं उससे कितना ज़्यादा  प्यार करता हूं और जैसी भी वो है उसी रूप में उसे कितना अधिक चाहता हूं. इस तरह की बातें उसे कभी-कभार ही सुनने को मिलती हैं इसलिए उसने शायद यही सोचा होगा कि मैं उसे इन फोटोशॉप की हुई तस्वीरों जैसी देखना चाहता हूं. मुझे और बेहतर करना होगा और अपनी ज़िन्दगी के शेष बचे दिनों में मैं उसकी अपूर्णता के साथ ही उल्लसित रहूंगा. मुझे यह याद  दिलाने के लिए आपका आभार.”

आज हो यह रहा है कि विज्ञापनों आदि के द्वारा हमारे  सामने बहुत सारी आकर्षक और काम्य छवियां लहरा कर हमें लुभाया जा रहा है और उस सबके बीच हम अपने असल को विस्मृत करते जा रहे हैं. यह प्रसंग हमें एक बार फिर उसी असल की तरफ लौटा ले जाता है. मुझे अनायास ही याद आ रहा है 1984 की फिल्म ‘सारांश’ के आख़िर में अनुपम खेर अपनी वृद्धा पत्नी से कहते हैं, “तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों में मेरे जीवन का सारांश है.”

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 20 अक्टोबर, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित  आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 13, 2015

तुम्हारी ज़मीन पर हमारा झण्डा

एनिमेशन फिल्मों की दुनिया में डिज़्नी एक बड़ा नाम है और इस लेबल से जब भी कोई फिल्म आती है उसे खूब देखा और सराहा जाता है. लेकिन इस बार मामला  थोड़ा अलग है. हाल में जब यह खबर आई कि डिज़्नी वाले द प्रिंसेस ऑफ नॉर्थ सूडान नाम से एक एनिमेशन फिल्म बनाने जा रहे हैं जो कि एक सत्य वृतांत पर आधारित होगी,  तो माहौल ख़ासा गरमा गया.  इसकी वजह जानने  से पहले उस वृत्तांत को जान लिया जाए जिस  पर यह फिल्म आधारित होगी.

अमरीका के वर्जीनिया इलाके के एक प्रेमिल पिता जेरेमिया हीटन से एक रात उनकी छह साला लाड़ली बेटी ने एक मासूमियत भरा सवाल किया कि क्या वो भी कभी वास्तविक प्रिंसेस बन पाएगी? और बस, इस सवाल ने पिता के मन में गहरी हलचल पैदा कर दी. वे अपनी बेटी का नाज़ुक दिल नहीं तोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने खुद एक झण्डा डिज़ाइन किया और निकल पड़े दुनिया में कोई ऐसी जगह तलाश करने जहां की प्रिंसेस वे अपनी प्यारी बेटी को बना सकें. काफी खोज बीन और पूरे चौदह घण्टों की तलाश के बाद उन्हें सूडान और मिश्र के बीच आठ सौ वर्गमील की बिर तविल नामक एक ऐसी लगभग जन शून्य और बंजर ज़मीन मिली जिसे वे अपना साम्राज्य कह सकते थे. जेरेमिया हीटन को यह बात भी याद आती है कि इसी तरह तो दुनिया के बहुत सारे देशों, जिनमें संयुक्त राज्य अमरीका भी शामिल है, की खोज हुई थी. जून 2014 में अपनी बेटी के सातवें जन्म दिन पर ये जेरेमिया हीटन वहां जाते हैं और उस ज़मीन पर एक नया झण्डा गाड़ कर उसे उत्तरी सूडान नामक देश घोषित करते हैं, जिसकी प्रिंसेस उनकी बेटी होगी. 

डिज़्नी की इस प्रस्तावित फिल्म में ये हीटन महोदय अपनी लाड़ली बिटिया के नव स्थापित राष्ट्र को जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों से अचाने के लिए उन्नत और नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकों  कोई प्रयोगभूमि भी बनाना चाहते हैं. अपनी वेबसाइट पर उन्होंने इस ‘क्रांतिकारी बदलाव’ के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ  वैज्ञानिक शोध’ को मुमकिन बनाने के लिए आर्थिक सहयोग की मांग भी  की है.             


डिज़्नी वालों ने इस फिल्म की पटकथा लिखने का दायित्व ब्लैक लिस्ट के लिए सुविख्यात स्टेफ़नी फॉल्सॉम को सौंप दिया.

लेकिन जैसे ही इस फिल्म के निर्माण  की योजना की चर्चाएं सामने आईं संवेदनशील और डिज़्नी के अतीत से परिचित लोगों में गुस्से की एक लहर सी दौड़ गई. लोगों को लगा कि यह मात्र एक बेटी के प्यार में उसकी मासूम इच्छा पूरी करने को प्रयत्नशील पिता की कथा नहीं है. इस कथा का एक अन्य और अधिक ख़तरनाक  पाठ भी है. इन संवेदनशील लोगों को लगा कि इस मासूम कहानी के पीछे असल में अश्वेत दुनिया पर गोरों के वर्चस्व और साम्राज़्यवाद तथा उपनिवेशवाद की क्रूर गाथा छिपी है.  और यह भी क्या बात हुई कि एक गोरा बाप अपनी प्यारी बेटी की एक बालसुलभ आकांक्षा  को पूरा करने के लिए फौरन एक अभियान पर निकल पड़े और एक ऐसे देश और ऐसी धरती पर जाकर अपने स्वामित्व का झण्डा गाड़ दे जिसपर उसका कोई प्राकृतिक और स्वाभाविक अधिकार नहीं है. क्या इस मासूम-सी लगने वाली कथा में उपनिवेशवाद की और गोरे लोगों के बेशर्म स्वार्थ और वीभत्स लालच की चावियां नहीं कौंधती हैं?    

सवाल यह भी उठाया गया कि आखिर क्यों हर राजकुमारी गोरी ही होती है? क्या अफ्रीकी देश की कोई बच्ची राजकुमारी होने का सपना देखती हुई नहीं दिखाई जा सकती थी?  और इस सवाल के पीछे थी डिज़्नी फिल्मों के अतीत की अप्रिय स्मृतियां. जिन्होंने उनकी जंगल बुक या अलादीन जैसी फिल्में देखी हैं उन्हें याद होगा कि डिज़्नी का रवैया सदा ही गोरी चमड़ी के महिमामण्डन का रहता है. अपनी बहुत कम फिल्मों में उन्होंने अश्वेतों को उजली छवि के साथ चित्रित किया है. लोगों ने इस बात को भी याद करना ज़रूरी समझा कि खुद डिज़्नी नाज़ियों के प्रति सहानुभूति  रखते थे. और इसीलिए आलोचकों को यह बात आपत्तिजनक लगी कि डिज़्नी वाले अपनी पहली अफ्रीकी प्रिंसेस भी एक गोरी लड़की को ही बनाने जा रहे हैं.  उनका सवाल था कि क्या इस तरह वे लोग एक बार फिर श्वेत श्रेष्ठता और अमरीकी साम्राज्यवाद  का झण्डा बुलन्द नहीं करने जा रहे हैं?

हालांकि फिल्म की पटकथा लेखिका ने अपने बयानों आदि में आलोचकों को जवाब देने का और उनकी आशंकाओं को निर्मूल साबित करने का प्रयास किया है, और इस बात से पूरी दुनिया के समझदार लोगों को खुशी भी होगी अगर वे अपने कहे को पूरा कर सकीं, लेकिन अपने तमाम आशावाद के बावज़ूद डिज़्नी का वो अतीत जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया है, हमें इस बात पर विश्वास नहीं करने दे रहा है. ऐसे में फिल्म का इंतज़ार तो करना ही होगा.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 13 अक्टोबर, 2015 को द प्रिंसेस ऑफ नॉर्थ सूडान: तुम्हारी ज़मीन हमारा झण्डा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, October 6, 2015

इधर ब्रिटेन में एक सर्वेक्षण किया गया है जिसे इस विषय पर किया गया सबसे ज्यादा विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण बताया जा रहा है. यूनिवर्सिटी कॉलेज, लन्दन की एक टीम द्वारा किये गए इस सर्वेक्षण में लगभग  पाँच सौ प्रश्नकर्ताओं ने पूरे ब्रिटेन में 16 से 74 बरस की उम्र के  लगभग पन्द्रह हज़ार स्त्री-पुरुषों से  बहुत विस्तार  से बात करते हुए उनके निजी जीवन के बारे में निहायत ही व्यक्तिगत सवाल पूछे.

इस सर्वेक्षण में क्या-क्या पूछा गया इससे अधिक महत्वपूर्ण यह बात है कि  जहां अधिकतर उत्तरदाता निहायत व्यक्तिगत सवालों पर भी बात करने को तुरंत तैयार हो गए, वहीं सिर्फ तीन प्रतिशत से भी कम ने ऐसा करने से इंकार किया. अब ज़रा इसके  सामने यह तथ्य भी देखें कि इन्हीं उत्तरदाताओं में से बीस प्रतिशत अपने वेतन या अपने घर परिवार की सकल आय के बारे में बताने को तैयार नहीं थे. क्या पता, उनमें से कुछ  बेचारों को खुद ही इसकी जानकारी  न हो!

निस्संदेह आप यह जानने को उत्सुक होंगे कि इस सर्वेक्षण में क्या-क्या बातें पता लगीं? इस सर्वेक्षण का उद्देश्य था सेक्स शिक्षा और सेक्सुअल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जानकारी जुटाना. स्वभावत: इस सर्वेक्षण के सवाल भी इसी किस्म के थे. एक सवाल के जवाब में पता चला कि आज एक औसत ब्रितानी स्त्री के चार प्रेमी होते हैं (हाय राम!). लेकिन चौंकिये मत! वहां पुरुष अभी भी कम से कम इस मामले में स्त्री से आगे है. उसकी प्रेमिकाओं की औसत संख्या छह है. लेकिन अब एक विरोधाभास भी देख लीजिए. एक तरफ जहां औसत ब्रितानी स्त्री-पुरुष ने अपने प्रेमी-प्रेमिकाओं की संख्या में वृद्धि की है, वहीं दैहिक सम्पर्क के मामले में वे पीछे लौटे हैं. 1990 में जब इसी किस्म का एक सर्वेक्षण किया गया था तो पाया गया था कि वे महीने में पाँच दफा अंतरंग होते हैं, जबकि इस बार के सर्वेक्षण में यह संख्या घटकर तीन ही रह गई है.

लेकिन हम बात उनके निजी जीवन की नहीं करके यह कर रहे हैं कि किस बेबाकी से वे अपनी बेहद निजी जानकारियां भी सार्वजनिक कर डालते हैं.  एक सर्वेक्षणकर्ता ने भी कहा कि ज्यादातर लोग इण्टरव्यू शुरु होने के बाद इतने उन्मुक्त हो जाते हैं कि वे हमें सब कुछ बताने को तैयार हो जाते हैं. और जैसे इतना ही काफी न हो, उस सर्वेक्षणकर्ता  ने तो यहां तक कह डाला कि इन अंग्रेज़ों को अजनबियों से अपने सेक्स जीवन के बारे में बात करना अच्छा लगता है और वे अपने अफेयर्स के बारे में, अपने पार्टनर्स के बारे में सब कुछ कह डालना चाहते हैं. उनकी ज़ुबान पर लगाम बस एक ही जगह आकर लगती है. जैसे ही आप उनसे उनकी आमदनी के बारे में पूछते हैं, वे चुप हो जाते हैं. सर्वेक्षणकर्ताओं ने बाद में बताया कि उन्होंने पाया कि उनके देश वासी अपने वेतन के बारे में बात करने की तुलना में अपने शयन कक्ष के भीतर की अंतरंग गतिविधियों, अपने अफेयर्स और यहां तक कि अपने यौन रोगों के बारे में भी बात करने को सात गुना अधिक तैयार पाए गए.

ऐसा क्यों है कि जो बात सार्वजनिक नहीं करने की है उसे तो खुलकर बता दिया जाता है, और जिस बात में छिपाने जैसा कुछ भी नहीं है, उसे बताने से परहेज़ किया जाता है? इस बात का विश्लेषण किया डॉ पाम स्पर नामक एक रिलेशनशिप एक्सपर्ट  ने. उनका खयाल है कि ब्रिटेन में पैसों के बारे में बात करना सुरुचिपूर्ण नहीं माना जाता है. लेकिन अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए, और उसे भाषाजाल में लपेटते हुए उन्होंने यह भी कहा कि एक तरफ जहां लोग  अपने प्रेम जीवन के बारे में बात करने के लिए ज़रूरत से ज्यादा उत्सुक हैं, वहीं दूसरी तरफ वे  सच्चाई को लेकर बहुत ज्यादा कृपण  हैं. अगर इससे भी उनकी बात स्पष्ट न होती हो तो बस उनका यह कथन और सुन लीजिए: “कुछ लोग इस बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं कि उनका सेक्स जीवन कितना भरापूरा है.” 

इसी बात का एक अन्य कोण से वहीं के एक शिष्टाचार विशेषज्ञ विलियम हानसन ने भी विश्लेषण किया है.  उनका कहना है  कि “हम ब्रिटिश लोग पैसों के बारे में बात करने से घृणा करते हैं. यह विषय इतना गन्दा है कि हमने तै कर लिया है कि हम कभी इस पर बात नहीं करेंगे.” हानसन ने  इसी सिलसिले में एक बात और कही है और कम से कम वह बात तो हम अपने देश और समाज में भी पाते हैं. उन्होंने कहा कि जो “कदीमी अमीर है वे अपनी सम्पदा के बारे में बात करते हुए संकोच बरतते हैं जबकि जो हाल ही में अमीर हुए हैं वे आम तौर पर ज्यादा बेशर्म होते हैं.”  

चलिये, कम से एक एक मामले में तो हम और वे एक जैसे हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 06 अक्टोबर, 2015 को छिपाना भी नहीं आता, बताना भी नहीं आता शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.       

Tuesday, September 29, 2015

एक पंथ दो काज

कहा जाता है कि थोड़ा पैसा व्यापारी को खा जाता है. लेकिन इसे अर्ध सत्य माना जाना चाहिए. व्यापार सिर्फ पैसों का ही खेल नहीं है, इसमें दिमाग और अक्ल की भूमिका भी कम नहीं है. अगर आपके पास अक्ल है और आप उसका सही इस्तेमाल  कर पाते हैं तो कम पूंजी के बावज़ूद आप कामयाब हो सकते हैं. व्यापार की दुनिया से देश से और विदेशों की ऐसी अनेक सफलता गाथाएं याद की जा सकती हैं जहां किसी व्यापारी ने अपनी बुद्धि के बल पर बड़े-बड़े पूंजीपतियों को पीछे छोड़ दिया.

यह बात याद आई है मुझे हाल ही की एक ख़बर पढ़ते  हुए.  खबर सात समुद्र पार यानि लंदन की है. वहां के एक व्यापारी डेव ने एक नया धन्धा शुरु किया है जो खूब फल फूल रहा है. उसने एक कम्पनी शुरु की है, जिसका नाम ‘वी बाय एनी  पोर्न’  -हम हर तरह की अश्लील सामग्री खरीदते है– है! डेव की  यह कम्पनी  उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है जिन्होंने हाल में अपने किसी बुज़ुर्ग परिजन को खोया है और उनका सामान खंगालते हुए पाया है कि उनके पास प्लेबॉय, पेण्टहाउस जैसी अश्लील पत्रिकाओं और इसी तरह की अन्य सामग्री का खज़ाना था. हमारे पाठकों को यह बात स्मरण ही होगी कि इण्टरनेट के आगमन से पहले, अस्सी और नब्बे के दशक में इस तरह की पत्रिकाओं और अन्य मुद्रित  सामग्री का काफी क्रेज़ था और लोग न केवल रुचि पूर्वक इनका पारायण करते थे, इन्हें (अलबत्ता छिपाकर) सहेजकर भी रखते थे. भारत जैसे परम्परावादी देश में तो इस तरह की सामग्री प्रतिबंधित थी लेकिन दुनिया के बहुत सारे देशों में यह आसानी से सुलभ थी. हमारे यहां प्रतिबंध के बावज़ूद लोग येन केन प्रकारेण अपनी तलब पूरी कर ही लेते थे. इस तरह की सामग्री के औचित्य अनौचित्य पर बहुत कुछ कहा जाता रहा है और कहा जा सकता है, लेकिन फिलहाल हम बात कर रहे हैं इनसे सम्बद्ध व्यवसाय की.

तो हुआ यह कि इन डेव महाशय को लगा कि अब वो समय आ गया है जब अस्सी-नब्बे के दशक में इस सामग्री में रुचि रखने और इसका संग्रहण करने वाली पीढ़ी भगवान के घर का रुख कर रही है, तो क्यों न वे तो इस पीढ़ी के बच्चों के लिए अपने बुज़ुर्गों की इस विरासत से निजात पाने में मददगार बन जाएं!  परोपकार का परोपकार और धन्धे का धन्धा! इसी को तो कहते हैं एक पन्थ दो काज! आप कहेंगे कि भाई, इसमें परोपकार कहां से आ गया? मैं बताता हूं. हुआ यह कि डेव महाशय को पता चला कि एक बुज़ुर्ग के देहांत के बाद जब उनकी बेटी ने घर की सफाई की तो उसे अपने पिता के संग्रह में ऐसी काफी सारी सामग्री मिली. सामग्री कोई बहुत बुरी नहीं थी, सामान्य लोकप्रिय  पत्रिकाओं के संग्रह थे, लेकिन बेचारी बिटिया को लगा कि अगर उसकी मां को अपने स्वर्गीय पतिदेव के इस संग्रह के बारे में पता चलेगा तो वे बहुत शर्मिन्दा होंगी. उस बिटिया का संकोच डेव महाशय तक पहुंचा और उनके मन में इस तरह के परोपकार  का भाव जागा. उनका यह भाव तब और प्रबल हुआ जब किसी गांव के धर्म स्थल के एक प्रबन्धक ने उन्हें फोन कर बताया कि बहुत सारे लोग अपनी भौतिक सम्पदा उस धर्म स्थल के नाम कर इस जहाने फानी से कूच करते हैं. जब उस धार्मिक संगठन के लोगों ने इस तरह छोड़ी सम्पदा का अवलोकन किया तो अनेक घरों में इस तरह की पत्रिकाओं का ज़खीरा  भी उन्हें मिला.

इसी तरह के कुछ अन्य प्रसंगों और अनुभवों  ने डेव महोदय को अपना यह व्यापार शुरु करने की प्रेरणा दी. ये महाशय लगभग गुमनाम रहकर अपना व्यापार करते हैं ताकि उनके सम्पर्क में आने वालों को लज्जित  न होना पड़े. तरीका यह है कि अगर किसी को अपने यहां पड़ी इस तरह की सामग्री से निजात पाना  है तो वह इन्हें फोन करता है, ये पहुंच कर उस सामग्री का अवलोकन कर उसका मोल आंकते हैं, और अगर बात बन जाती है तो मूल्य चुकाकर वो सामग्री ले आते हैं. लाते भी ऐसे ट्रक में भरकर हैं जिस पर कोई पहचान अंकित नहीं होती है. लाने के बाद जो सामग्री इन्हें अनुपयुक्त लगती है उसे तो वे नष्ट कर देते हैं, शेष सामग्री को उत्तरी लंदन स्थित अपनी एक अन्य दुकान के हवाले कर देते हैं जिसकी ख्याति विचित्र और कामोत्तेजक साहित्य के संग्राहक के रूप में  है.   

डेव महाशय के व्यवसाय को अभी मात्र एक बरस हुआ है लेकिन इसी अल्प अवधि में इन्होंने संतुष्ट और कृतज्ञ ग्राहकों की एक बड़ी जमात जुटा ली है. है न बिना हर्र फिटकरी के चोखा रंग ले आने वाला मामला!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 29 सितम्बर, 2015 को  'परोपकार' का अजब-गज़ब व्यवसाय' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.               

Tuesday, September 22, 2015

देर आयद दुरुस्त आयद

साहित्य को लेकर जो दो बातें सबसे ज्यादा दुहराई जाती हैं वे हैं – 1. साहित्य समाज का दर्पण है, और 2. साहित्य समाज को राह दिखाने वाली मशाल है.  वैसे समझदार और विद्वान लोग इन दोनों ही बातों से काफी असहमति भी रखते हैं. लेकिन इसके बावज़ूद हम पाते हैं कि जब भी हमारे समाज में ऐसा कुछ घटित होता है, जिससे मिलता जुलता कुछ भी अतीत में किसी ने लिख दिया था, तो हम मशाल वाली इस बात को ज़रूर याद कर लेते हैं. अगर आज कोई हत्याकाण्ड हो जाए और हमें अनायास याद आ जाए कि ऐसी ही कहानी किसी कहानीकार ने तीस-चालीस साल पहले लिखी थी तो बस! हमारे चेहरे चमक उठते हैं! यह सारी बात करने की ज़रूरत मुझे भी ऐसे ही एक सन्दर्भ की वजह से पड़ी है.

कुछ बरस पहले हिन्दी में विमर्शों का दौर चला था और जो विमर्श बेहद चर्चित हुए उनमें से एक था स्त्री विमर्श. हालांकि यह खासा गम्भीर और सोद्देश्य मुद्दा था, कुछेक नासमझों ने इसे उच्छ्रंखलता की सीमा को छूने वाले वाली स्त्री की यौनिक स्वतंत्रता तक भी सीमित करके देखा था. इधर हाल में जब अमरीका में स्त्रियों की वियाग्रा कही जाने वाले फ्लिबरांसर नामक एक गोली को एफडीए की अनुमति हासिल हो जाने की खबर को स्त्री मुक्ति का पर्याय बताने की बातें पढ़ी तो मुझे अपने स्त्री विमर्श का वह दौर भी बेसाख़्ता याद आ गया और सच कहूं तो इस बात की किंचित खुशी भी हुई एक बार फिर साहित्य समय से आगे साबित हो गया.

हम चाहे इस बात को स्वीकार करें या न करें, यह एक तल्ख सच्चाई है कि मानव जाति के यौनिक व्यवहार पर पुरुष वर्चस्व हावी है. सब कुछ पुरुष के कोण से ही देखा, जाना और किया जाता है. स्त्री की भूमिका तो बस चीज़ों को जस का तस स्वीकार कर लेने भर की है. न उसकी हां की कोई अहमियत होती है और न उसे ना कहने का कोई हक होता है. उसे तो बस प्रजनन का एक उपकरण या पुरुष के आनंद का एक साधन भर होना है. पश्चिम के नारी मुक्ति आन्दोलन को इस बात का श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि उसने इस असमानतापूर्ण और अन्याय भरे व्यवहार की तरफ ध्यान खींचा और कदाचित उस आन्दोलन के बाद से ही स्त्रियां इस मामले पर अपनी आवाज़  बुलन्द करने लगी. सिमोन द बुवा ने बहुत सही कहा कि मानवीय दैहिक संसर्ग के मामले में पुरुष स्वामी की भूमिका में होता है और उसे अपने दास की अनुमति की कोई ज़रूरत महसूस नहीं  होती है.

लेकिन यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है. स्त्रियां अपनी ज़रूरत और अपनी महत्ता को समझने और उसके लिए आग्रह करने लगी हैं और पुरुष भी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं. इसी सोच के आगे बढ़ने की परिणति यह भी हो रही है कि जिस बात  की तरफ अब तक किसी का ध्यान नहीं गया, अब उसे भी सोचा और समझा जाने लगा है.  अब दुनिया भर में यह बात समझी जाने लगी है कि जिस तरह  यौनिक संसर्ग के मामले में यदा-कदा पुरुष अक्षम होता है उसी तरह स्त्रियां भी होती या हो सकती हैं. और दोनों  ही  के मामले में उपचार के बारे में सोचा जाना चाहिए. पुरुषों के मामले में वियाग्रा इसी उपचार की एक कड़ी है. और अब स्त्रियों के लिए भी इसी तरह के उपचार के बारे में सोचा जाने लगा है.

और यहीं से बात कई इतर मोड़ भी लेने लगती है. एक तो यह कि अकूत मुनाफे की सम्भावनाओं को देख बाज़ार इसमें कूद पड़ा है. नई नई शोध हो रही हैं और चीज़ों  को नित नए तरीकों से विज्ञापित किया जा रहा है. दूसरा यह कि इस मेडिकल फिनोमिना को स्त्री-पुरुष के असमान वर्चस्व वाले कोण दे देखा परखा जा रहा है और यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या वजह है कि पुरुष वियाग्रा के आविष्कारकों को तो नोबल पुरस्कार से नवाज़ा गया था जबकि स्त्री वियाग्रा की चर्चा उपहास का विषय बनती  है!  इतना ही नहीं इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाया जाता है कि पुरुष यौनिकता पर शोध में जितनी राशि खर्च की गई है उसका बहुत छोटा हिस्सा भी स्त्री यौनिकता पर शोध में खर्च नहीं किया गया है.  

शिकायतें अपनी जगह, हम तो इस बात से ही प्रसन्न हो लेते हैं कि चलो देर से ही सही, एक सही और अब तक अलक्षित रहे मुद्दे की तरफ दुनिया का ध्यान जा रहा है!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 सितम्बर, 2015 को  उनकी इच्छा की बात, साहित्य फिर दर्पण साबित  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 25, 2015

ये तेरा घर, ये मेरा घर... ये घर बहुत हसीन है

दसेक बरस पहले अमरीका प्रवास के दौरान मैं इस बात से चौंका था कि आत्मीय परिवार की एक युवती उसी शहर में अपने मां-बाप से अलग घर लेकर रह रही थी. शायद मेरे लिए यह बात कल्पना से परे थी कि कोई अविवाहित लड़की उसी शहर में अपने मां-बाप का घर होते हुए भी कहीं अन्यत्र रहे. लेकिन हाल ही में जब अपने ही देश के एक शहर बैंगलोर में यह बात जानी कि यहां की बहुत सारी  अविवाहित लड़कियां इसी शहर में अनेक वजहों से अपने मां-बाप के घरों में न रहकर कहीं और रहती हैं तो मैं उस तरह चौंका तो नहीं, लेकिन सोचने को ज़रूर विवश हुआ कि हमारा परिवेश किस तेज़ी से बदल रहा है.

सामान्यत: माना जाता है कि उत्तर भारत की तुलना में दक्षिण भारत अधिक पारम्परिक है. इस बात को किसी मूल्य निर्णय के तौर पर न लिया जाए. लेकिन इसके बावज़ूद यहां बहुत सारी लड़कियां अलग-अलग कारणों से अपने मां-बाप के घर से अलग घर लेकर रहती हैं. पहला कारण जो मुझे समझ में आता है वो तो यही है कि आजकल कामकाजी लड़कियों की संख्या बहुत तेज़ी  से बढ़ती जा रही है और अगर मां-बाप के घर से कामकाज का ठिकाना बहुत दूर हो तो बैंगलोर जैसे भागते-दौड़ते शहर के अस्त व्यस्त ट्रैफिक से जूझने की मुसीबत का सबसे आसान इलाज यही हो सकता है कि कार्य स्थल के नज़दीक घर लेकर रहा जाए. चाहें तो इसे परम्परा या संस्कार पर सुविधा की जीत भी कह सकते हैं. इसी के साथ यह बात भी जोड़ी जा सकती है कि आजकल नौकरी और कामकाज के तौर तरीके भी बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं. काम के घण्टे बढ़ते और समय अनियमित होता जा रहा है. कभी आप अल्ल सुबह काम पर जाते हैं तो कभी  बहुत देर रात गए लौटते हैं. ज़ाहिर  है कि इससे घर के और लोगों  का जीवन क्रम भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है. ऐसे में अगर संवेदनशील बेटियां यह तै करती हैं कि वे अलग घर लेकर रहें तो उनकी भावनाओं को समझा जा सकता है और सराहा भी जाना चाहिए.  

तीसरी बात जो इस सन्दर्भ में ध्यान में आती है वो है हमारे  सोच में आ रहा बदलाव. जब आप किसी परिवार में रहते हैं तो एक–दूसरे का खयाल रखते हुए बहुत सारे समझौते भी करते चलते हैं. मसलन, मुझे जो खाने की इच्छा है उसे मैं यह सोच कर दबा लेता हूं कि मेरे घर वालों को अच्छा नहीं लगेगा.  यह एक उदाहरण है. ऐसी अन्य बहुत सारी बातें भी हैं. लेकिन अब अपनी पसन्द नापसन्द को लेकर हम आसानी से कोई समझौता नहीं करना चाहते. मन चाहा खाना-पीना और मनचाहा पहनना ही नहीं चाहते, मनचाही तरह से अपनी ज़िन्दगी को जीना भी चाहते हैं.  अपनी निजी स्पेस चाहते हैं.  इस सोच के विकास में शिक्षा, आर्थिक स्वावलम्बन, परिवेश, मीडिया – सबकी अपनी-अपनी भूमिका है.

यहीं एक विषयांतर कर लूं. हाल ही में मुंबई की एक ई हेल्थकेयर कम्पनी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के जो आंकड़े सामने आए हैं वे भी प्रकारांतर से मेरी इसी बात की पुष्टि करते हैं. भारत के आठ महानगरों और बारह  शहरों के पन्द्रह हज़ार किशोरों  (13-19) पर किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार लगभग तीस प्रतिशत लड़के और अठारह प्रतिशत लड़कियां बीस साल की उम्र  तक पहुंचने से पहले ही शारीरिक सम्पर्क बना चुके होते हैं. और इसी सर्वेक्षण के अनुसार  लड़के औसतन साढे  पन्द्रह बरस की और लड़कियां साढे सोलह बरस की उम्र तक आने से पहले पहला शारीरिक सम्पर्क कर चुकते हैं. यहीं इस बात की तरफ भी ध्यान दिलाता चलूं कि कुछ समय पहले हुए इसी तरह के सर्वेक्षणों में यह उम्र इतनी कम नहीं हुआ करती थी. यानि अपनी देह को लेकर भी आज़ाद खयाली बढ़ती जा रही है. इस बात को भी ऊपर वाली बातों के साथ जोड़ कर देखा जाना ज़रूरी है.

मैं ध्यान इस बात की तरफ आकृष्ट करना चाहता हूं कि आज के किशोर और युवा अपनी तरह से अपनी जिन्दगी जीने के लिए अधिक से अधिक बेताब  होते जा रहे हैं. भले ही अपरिपक्व अवस्था में मनचाही करने के अपने ख़तरे कम न हों, उनमें यह सोच जड़ें जमाने लगा है कि हम प्रयोग करेंगे, और अगर गलत हुए तो उसका मोल भी चुकाएंगे. इस बात पर बहुत लम्बी बहस हो सकती है कि यह कितना उचित और कितना अनुचित है, लेकिन एक यथार्थ यह भी है कि आप चाहें न चाहें, ऐसा हो रहा है और आने वाले समय में और अधिक होगा. अब देखने की बात यह है कि अपने परिवेश में आ रहे इन बदलावों को हम किस तरह लेते हैं और अगर इनमें कोई खतरे हैं तो उनका मुकाबला किस सूझ बूझ के साथ करते  हैं.

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जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 25 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Wednesday, August 19, 2015

मरने का इरादा और जीने की तमन्ना

आम तौर पर चिकित्सकों को, चाहे वे किसी भी उपचार पद्धति का अनुसरण करते हों, जीवन रक्षक माना जाता है और इसी नाते समाज उनका औरों से अधिक सम्मान भी करता है, लेकिन इस दुनिया की बहुत सारी विचित्रताओं में से एक यह भी है कि चिकित्सकों की इसी बिरादरी के एक सदस्य की पहचान डॉ डेथ के रूप में है. कौन है यह व्यक्ति और क्यों इसकी इतनी चर्चा है आजकल? ऑस्ट्रेलिया के डॉ फिलिप निश्के को लम्बे अर्से से उन लोगों में से एक के रूप में जाना जाता है जो इच्छा मृत्यु के अधिकार के पक्षधर हैं. इन्हीं डॉ निश्के ने एक नई मशीन की इजाद की है और विडम्बना की बात यह कि उसका नाम रखा है – डेस्टिनी, यानि नियति. यह मशीन आत्महत्या करने में सहायता करती है. तो डॉ निश्के हाल में एडिनबरा में आयोजित हुए फ्रिंज फेस्टिवल में एक विशेष शो के अंत में अपनी इस  मशीन का एक प्रदर्शन भी करने वाले थे, लेकिन पहले तो स्कॉटिश अधिकारियों ने यह कहा कि वे शो से पहले इस मशीन का निरीक्षण करेंगे, फिर डॉ निश्के के इस प्रदर्शन में कुछ तरमीम के निर्देश दिए और आखिरकार इसके प्रदर्शन पर पूरी ही रोक लगा दी.

एडिनबरा के फ्रिंज फेस्टिवल में डॉ निश्के जो  शो प्रस्तुत करने वाले थे, ‘डाइसिंग विद डॉ डेथ’ वह  फेस्टिवल के आयोजकों के अनुसार मृत्यु के अधिकार पर चल रही बहस का मजाकिया पहलू सिखाने के लिए था. यह शो स्टैण्ड अप और नरेटिव का मिला-जुला  रूप था और इसमें हंसी मजाक के अलावा आत्महत्या के बारे में काफी गम्भीर चर्चाएं भी प्रस्तावित थीं.  इन चर्चाओं के बाद क्लाइमेक्स के रूप में  डॉ निश्के अपनी मशीन  डेस्टिनी को भी दिखाने वाले थे. इस डेस्टिनी मशीन के एक छोर पर एक गैस कनस्तर जुड़ा हुआ है जिसमें नाइट्रोजन और कार्बन डाइ ऑक्साइड का प्राणघातक मिश्रण होता है. लेकिन अधिकारियों ने निर्देश दिया कि डॉ निश्के अपने प्रदर्शन के दौरान केवल नाइट्रोजन का प्रयोग  करें जो घातक नहीं होती है. बाद में इस आदेश को  बदला गया और उन्हें निर्देश दिया गया कि वे नाइट्रोजन का भी नहीं मात्र हवा का इस्तेमाल करें, और फिर इस आदेश को भी बदलते हुए कहा गया कि वे मशीन को निष्क्रिय ही करके रखें.  और इस सबके आखिर में पूरे शो को ही निरस्त  कर दिया गया.

स्वाभाविक है कि डॉ निश्के को यह बात नागवार गुज़री और उन्होंने अपनी तरह से इसकी आलोचना भी की. यहां इस बात को याद करना भी रोचक होगा कि इस शो को किसी और बिना पर नहीं, कम्प्रेस्ड गैस नियमों के तहत प्रतिबन्धित किया गया. हो सकता है अधिकारियों के ध्यान में भी यह बात रही हो कि किसी कानून का उल्लंघन न हो इस बात की पूरी परवाह करते हुए डॉ निश्के  ने अपने दर्शकों से इस आशय के एक डिस्क्लेमर पर पहले से हस्ताक्षर करवा लिए थे कि इस शो में दी गई जानकारी का इस्तेमाल वे किसी को आत्महत्या के लिए मदद देने के लिए नहीं करेंगे.

डॉ निश्के के बार में एक और जानकारी देना बहुत ज़रूरी  है. इन पर पिछले बरस पर्थ के एक व्यक्ति निजेल ब्रेली को आत्महत्या में मदद देने का आरोप  लगा था और इसके परिणामस्वरूप ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल बोर्ड ने उनके प्रैक्टिस करने के अधिकार पर रोक लगा दी थी. लेकिन असल और रोचक बात तो इसके बाद की है.  डॉ निश्के एक फ्लाइट में लॉस एंजिलस से सिडनी जा रहे थे. सुबह के चार बजे एयरलाइंस के कर्मचारियों ने इन्हें नींद से जगाया और यह अनुरोध किया कि उसी फ्लाइट में अपनी पत्नी और दो साल के शिशु के साथ यात्रा रहे एक 37 वर्षीय गम्भीर रोगी की जान बचाने में वे मदद करें. डॉ निश्के ने एयरलाइंस के अधिकारियों  को यह बता दिया कि उनका प्रैक्टिस अधिकार निलम्बित है, लेकिन वायु सेवा के अधिकारियों ने इसके बावज़ूद उनसे सहायता की प्रार्थना की. डॉ निश्के ने भी अपने चिकित्सकीय धर्म का निर्वहन करते हुए न केवल दो घण्टे की शेष बची हवाई यात्रा में उस रोगी को पर्याप्त  सार सम्हाल प्रदान की, फ्लाइट के सिडनी पहुंचने के बाद भी वे  वहां के रॉयल नॉर्थ शोर अस्पताल तक उसके साथ गए.

डॉ निश्के के इस कृत्य पर ऑस्ट्रेलिया में एक नई बहस शुरु हो गई है कि क्या एक ऐसे डॉक्टर को, जिसका प्रैक्टिस करने का अधिकार निलंबित है, किसी रोगी का उपचार करना चाहिए था? डॉ निश्के ने तो चुटकी लेते हुए कहा है कि वे ऐसे मानवीय कानून का समर्थन करेंगे जो किसी डी रजिस्टर्ड डॉक्टर को भी किसी की जान बचाने दे, सबसे ख़ास बात यह कि ऑस्ट्रेलिया के मेडिकल बोर्ड ने भी कहा है कि डॉ निश्के के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी. यही तो है मृत्यु पर जीवन की विजय!  

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक (जो फिल्म गाइड के लोकप्रिय गीत- 'आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है' से प्रेरित  है) से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, August 11, 2015

चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँJaipur

नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की एक कहानी बहुत चर्चित रही थी – ‘दिल्ली में एक मौत’. महानगर के लोगों के लिए मौत भी किस तरह एक भावहीन रूटीन हो जाती है, इस बात को उभारने वाली इस कहानी ने लोगों को चौंकाया  कम व्यथित ज्यादा किया था. मौत का नाम आते ही एक औसत भारतीय अतिरिक्त संवेदनशील हो उठता है. कबीर के बहुत सारे पद याद आने लगते हैं. जैसे यह:
                                हम का ओढ़ावै चदरिया चलती बिरियाँ।
                                प्रान राम जब निकसन लागे उलट गई दोउ नैन पुतरियाँ।।
                                भीतर से जब बाहर लाये छूट गई सब महल अटरियाँ।।
                                चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँ।।
                                कहत कबीर सुनो भाई साधो संग चलीं वह सूखी लकरियाँ।। 

लेकिन बदलते समय का क्या कीजिए जिसमें यह भावुकता भी बहुत तेज़ी से विस्थापित होती जा रही है! इधर सुनने में आया है कि बहुत सारी ऑनलाइन कम्पनियां खुल गई हैं जो अंतिम  संस्कार का सारा प्रबन्ध  अपने बलिष्ठ कन्धों पर लेने को बेताब  हैं. आप बस एक बार इन्हें सेवा का मौका तो दीजिए. इनके नाम देखिये ना: पण्डितजीऑनलाइन डॉट कॉम, गयापहुंचाओ  डॉट  कॉम, काशीमोक्ष डॉट कॉम, मातृगया डॉट कॉम आदि. ये ऑनलाइन कम्पनियां पण्डित, कर्मकाण्ड आदि का सारा प्रबन्ध करने का वादा करती हैं. मुझे बहुत रोचक बात तो यह लगी कि इससे भी आगे बढ़कर कुछ कम्पनियां हनीमून पैकेज की  तर्ज पर  अंतिम संस्कार टुअर पैकेज भी पेश करने लगी हैं जिनमें आपको अस्थि विसर्जन के लिए सुपरिचित धार्मिक नगरों में ले जाने, वहां पण्डों आदि की विश्वसनीय व्यवस्था करने और समग्र कर्मकाण्ड विधि विधान पूर्वक पूरा कराने के वादे किए जाते हैं. बहुत सारी कम्पनियां हैं जो आपकी गैर हाजिरी में आपकी तरफ से भी ये सारे धार्मिक कृत्य करने को तत्पर हैं. आप उन्हें कूरियर से अस्थियां भेज दें, बाकी काम उनका. अगर आप चाहेंगे तो वे अस्थि विसर्जन की वीडियो क्लिप बनाकर आपको भेज देंगे जिसे आप वॉट्सएप पर अपने परिजनों के साथ साझा भी भी कर सकेंगे. कई कम्पनियां इससे पहले वाले यानि दाह संस्कार के दायित्व निबाहने  को भी तैयार हैं.

सवाल यह है कि इस बदले परिदृश्य को कैसे देखा जाए? क्या यह कहकर अपनी पीड़ा ज़ाहिर की जाए कि देखो कैसा आ ज़माना गया है! लोग कितने संवेदनशून्य हो गए हैं! या इस आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की जाए?  जब मैं अपने चारों तरफ के माहौल पर नज़र डालता हूं तो पाता हूं कि हालात बहुत बदल गए हैं. पहले जहां लोग बल्कि कई पीढ़ियां एक ही गांव, कस्बे या शहर में अपना जीवन बिता लेते थे, आज लोग दो-चार पांच बरस भी अगर एक शहर में टिक जाएं तो उन्हें अपनी गतिशीलता पर सन्देह होने लगता है. लोग शहर बदलते हैं, नौकरियां बदलते हैं और यह सब करते हुए उनका परिवेश खुद ब खुद बदल जाता है. ऐसे में अब न वे पण्डित रह गए हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आपके सुख दुख में काम आते थे और न वे दोस्त पड़ोसी और सहकर्मी हैं जिनसे आपका कोई खास नाता हो. सब कुछ गतिशील और परिवर्तनशील. कबीर ने जिन चार लोगों के द्वारा खाट उठाने का ज़िक्र किया वे चार लोग भी कहां से लाएं? आप किसी नए शहर में पहुंचते हैं जहां आपकी कोई जड़ें नहीं होती हैं. तब पारम्परिक रूप से तो रस्मों और कर्मों का निर्वहन नहीं हो सकता ना! कोई न कोई विकल्प तो चाहिये!

और इसी विकल्पहीनता को लपक लेता है बाज़ार! अगर पण्डित नहीं है, कोई जानकार नहीं है, कोई परिजन नहीं है तो वो यानि सेवा प्रदाता तो  है ना! हम देखते हैं कि विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर भी ईवेण्ट मैनेजमेण्ट के रूप में बाज़ार परिजनों की कमी महसूस नहीं होने देने का हर मुमकिन जतन करता है, तो शोक में क्यों न वह अपना दायित्व वहन करे? मुझे लगता है कि यह पारस्परिक  जरूरत का मामला है. बाज़ार को आपका पैसा चाहिए और आपको अपनी रस्मों और दायित्वों के निर्वहन की तमाम सुविधाएं, जिन्हें अन्यथा जुटा पाना अब आपके लिए सम्भव नहीं रह गया है. ऐसे में, भले ही अंतिम संस्कार पैकेज की बात आपको चौंकाए या आहत करती प्रतीत हो, इसकी ज़रूरत और एक हद तक इसके औचित्य से इंकार कर पाना भी सम्भव नहीं लगता. अब देखिये ना, अगर पारस्परिक संवाद की जगह दूरभाष ने ले ली है, चिट्ठी की जगह ई मेल ने ले ली है, कष्ट और श्रम साध्य तीर्थयात्रा की जगह सुविधापूर्ण और द्रुत यात्राओं ने ले ली है तो और और मामलों में बदलाव क्यों नहीं आएंगे? और कड़वा ही सही यथार्थ  यह है कि आप भले ही न चाहें बदलाव तो आते ही हैं, और आप भी रो-झींक कर उन्हें स्वीकार करते हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की एक कहानी बहुत चर्चित रही थी – ‘दिल्ली में एक मौत’. महानगर के लोगों के लिए मौत भी किस तरह एक भावहीन रूटीन हो जाती है, इस बात को उभारने वाली इस कहानी ने लोगों को चौंकाया  कम व्यथित ज्यादा किया था. मौत का नाम आते ही एक औसत भारतीय अतिरिक्त संवेदनशील हो उठता है. कबीर के बहुत सारे पद याद आने लगते हैं. जैसे यह :                        
                                हम का ओढ़ावै चदरिया चलती बिरियाँ।
                                प्रान राम जब निकसन लागे उलट गई दोउ नैन पुतरियाँ।।
                                भीतर से जब बाहर लाये छूट गई सब महल अटरियाँ।।
                                चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँ।।
                                कहत कबीर सुनो भाई साधो संग चलीं वह सूखी लकरियाँ।। 

लेकिन बदलते समय का क्या कीजिए जिसमें यह भावुकता भी बहुत तेज़ी से विस्थापित होती जा रही है! इधर सुनने में आया है कि बहुत सारी ऑनलाइन कम्पनियां खुल गई हैं जो अंतिम  संस्कार का सारा प्रबन्ध  अपने बलिष्ठ कन्धों पर लेने को बेताब  हैं. आप बस एक बार इन्हें सेवा का मौका तो दीजिए. इनके नाम देखिये ना: पण्डितजीऑनलाइन डॉट कॉम, गयापहुंचाओ  डॉट  कॉम, काशीमोक्ष डॉट कॉम, मातृगया डॉट कॉम आदि. ये ऑनलाइन कम्पनियां पण्डित, कर्मकाण्ड आदि का सारा प्रबन्ध करने का वादा करती हैं. मुझे बहुत रोचक बात तो यह लगी कि इससे भी आगे बढ़कर कुछ कम्पनियां हनीमून पैकेज की  तर्ज पर  अंतिम संस्कार टुअर पैकेज भी पेश करने लगी हैं जिनमें आपको अस्थि विसर्जन के लिए सुपरिचित धार्मिक नगरों में ले जाने, वहां पण्डों आदि की विश्वसनीय व्यवस्था करने और समग्र कर्मकाण्ड विधि विधान पूर्वक पूरा कराने के वादे किए जाते हैं. बहुत सारी कम्पनियां हैं जो आपकी गैर हाजिरी में आपकी तरफ से भी ये सारे धार्मिक कृत्य करने को तत्पर हैं. आप उन्हें कूरियर से अस्थियां भेज दें, बाकी काम उनका. अगर आप चाहेंगे तो वे अस्थि विसर्जन की वीडियो क्लिप बनाकर आपको भेज देंगे जिसे आप वॉट्सएप पर अपने परिजनों के साथ साझा भी भी कर सकेंगे. कई कम्पनियां इससे पहले वाले यानि दाह संस्कार के दायित्व निबाहने  को भी तैयार हैं.

सवाल यह है कि इस बदले परिदृश्य को कैसे देखा जाए? क्या यह कहकर अपनी पीड़ा ज़ाहिर की जाए कि देखो कैसा आ ज़माना गया है! लोग कितने संवेदनशून्य हो गए हैं! या इस आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की जाए?  जब मैं अपने चारों तरफ के माहौल पर नज़र डालता हूं तो पाता हूं कि हालात बहुत बदल गए हैं. पहले जहां लोग बल्कि कई पीढ़ियां एक ही गांव, कस्बे या शहर में अपना जीवन बिता लेते थे, आज लोग दो-चार पांच बरस भी अगर एक शहर में टिक जाएं तो उन्हें अपनी गतिशीलता पर सन्देह होने लगता है. लोग शहर बदलते हैं, नौकरियां बदलते हैं और यह सब करते हुए उनका परिवेश खुद ब खुद बदल जाता है. ऐसे में अब न वे पण्डित रह गए हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आपके सुख दुख में काम आते थे और न वे दोस्त पड़ोसी और सहकर्मी हैं जिनसे आपका कोई खास नाता हो. सब कुछ गतिशील और परिवर्तनशील. कबीर ने जिन चार लोगों के द्वारा खाट उठाने का ज़िक्र किया वे चार लोग भी कहां से लाएं? आप किसी नए शहर में पहुंचते हैं जहां आपकी कोई जड़ें नहीं होती हैं. तब पारम्परिक रूप से तो रस्मों और कर्मों का निर्वहन नहीं हो सकता ना! कोई न कोई विकल्प तो चाहिये!

और इसी विकल्पहीनता को लपक लेता है बाज़ार! अगर पण्डित नहीं है, कोई जानकार नहीं है, कोई परिजन नहीं है तो वो यानि सेवा प्रदाता तो  है ना! हम देखते हैं कि विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर भी ईवेण्ट मैनेजमेण्ट के रूप में बाज़ार परिजनों की कमी महसूस नहीं होने देने का हर मुमकिन जतन करता है, तो शोक में क्यों न वह अपना दायित्व वहन करे? मुझे लगता है कि यह पारस्परिक  जरूरत का मामला है. बाज़ार को आपका पैसा चाहिए और आपको अपनी रस्मों और दायित्वों के निर्वहन की तमाम सुविधाएं, जिन्हें अन्यथा जुटा पाना अब आपके लिए सम्भव नहीं रह गया है. ऐसे में, भले ही अंतिम संस्कार पैकेज की बात आपको चौंकाए या आहत करती प्रतीत हो, इसकी ज़रूरत और एक हद तक इसके औचित्य से इंकार कर पाना भी सम्भव नहीं लगता. अब देखिये ना, अगर पारस्परिक संवाद की जगह दूरभाष ने ले ली है, चिट्ठी की जगह ई मेल ने ले ली है, कष्ट और श्रम साध्य तीर्थयात्रा की जगह सुविधापूर्ण और द्रुत यात्राओं ने ले ली है तो और और मामलों में बदलाव क्यों नहीं आएंगे? और कड़वा ही सही यथार्थ  यह है कि आप भले ही न चाहें बदलाव तो आते ही हैं, और आप भी रो-झींक कर उन्हें स्वीकार करते हैं.

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Tuesday, August 4, 2015

थोड़ी-सी बेवफ़ाई......

कुछ बातें  ऐसी होती हैं जिनकी उड़ती-उड़ती-सी ख़बर तो होती है लेकिन जिनके बारे में आपको कोई पुष्ट प्रामाणिक जानकारी नहीं होती है,  और जब वो जानकारी आपको मिलती है तो आप न सिर्फ  चौंक जाते हैं, आहत भी महसूस करते हैं.  हाल ही में जब मैंने कनाडा में अवस्थित एक ऑनलाइन डेटिंग और सोशल नेटवर्किंग सर्विस के हाईजैक हो जाने की ख़बर पढ़ी और सहज जिज्ञासावश इसके विस्तार में गया तो मेरे साथ यही हुआ. दो महिलाओं के लोकप्रिय नामों एशले और मैडिसन को जोड़कर बनाई गई यह सशुल्क सर्विस इतनी फैली हुई है कि दुनिया के 46 देशों में इसके करीब चार करोड़ सदस्य हैं. इस साल के आंकड़ों की मानें तो हर माह इसे करीब सवा करोड़ विज़िट्स मिलती हैं और इसे दुनिया की एडल्ट वेबसाइट्स में अठारहवां स्थान हासिल है. यह तो कोई ख़ास बात नहीं है. दुनिया में इस तरह की बहुत सारी सर्विसें और साइट्स मौज़ूद हैं. मेरा ध्यान तो इस साइट की तरफ इस खबर की वजह से गया कि इम्पैक्ट टीम नामक हैकरों के एक समूह ने यह दावा किया कि उन्होंने इस साइट के उपभोक्ता खज़ाने से लोगों की निजी जानकारियां चुरा लीं हैं और अगर इस साइट को फौरन बन्द नहीं कर दिया गया तो इस जानकारी को सार्वजनिक कर दिया जाएगा.

पड़ताल की तो मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि यह साइट हिन्दी में भी उपलब्ध है और इसकी टैग लाइन है: जीवन अल्प है. एक अफ़ेयर कर लें. इतना ही नहीं, भारत में फरवरी 2014 में लॉंच की गई इस सेवा के फिलहाल करीब पौने तीन लाख सशुल्क सदस्य हैं. इन सदस्यों में लगभग पचास हज़ार तो वे स्त्रियां हैं जो मुख्यत: दिल्ली और राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र में रहती हैं और इस सर्विस के लॉंच होने के पहले ही दिन इससे जुड़ गई थीं. भारतीय स्त्री पुरुषों और उनके वैवाहिक सम्बन्धों की एकनिष्ठता के बारे में जो आम छवि प्रचलित है, उसे वे आंकड़े जो इस सर्विस ने पिछले बरस जारी किए थे, छिन्न भिन्न कर देते हैं. सर्विस के एक सर्वे के अनुसार अब 76 प्रतिशत भारतीय स्त्रियां और 61 प्रतिशत भारतीय पुरुष बेवफाई को गुनाह या अनैतिक नहीं मानते हैं. यह सर्वे दस शहरों में 75,321 स्त्री-पुरुषों पर किया गया था और इसके उत्तर दाताओं में से 80 प्रतिशत विवाहित थे. अगर यह पढ़कर आप चौंके नहीं हैं तो फिर यह बात और जान लीजिए कि उत्तरदाताओं में से 80 प्रतिशत वे थे जिनकी पारम्परिक यानि अरेंज्ड शादी हुई थी और इन उत्तर दाताओं में से 81 प्रतिशत पुरुषों और 68 प्रतिशत स्त्रियों ने न केवल यह स्वीकार किया कि  उनके विवाहेत्तर सम्बन्ध हैं, उन्होंने यह भी माना कि इन सम्बन्धों  का उनके वैवाहिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. इस सर्वे में जिन स्त्री पुरुषों को शामिल किया गया उनकी औसत उम्र क्रमश: 31 और 45 वर्ष थी. कहना अनावश्यक है कि ये तमाम जानकारियां बेहद चिंतित और क्षुब्ध करने वाली हैं.

असल में पति पत्नी के साथ  ‘वो’ की मौज़ूदगी  की बात हमारे फिल्म और टीवी धारावाहिक जैसे  लोकप्रिय मनोरंजन माध्यम तो काफी समय से करते आ रहे हैं और यह सिलसिला अभी भी जारी है. वरिष्ठ गांधीवादी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार कभी तब  के  बेहद लोकप्रिय एक साप्ताहिक में  पत्नी के अलावा एक अदद प्रेमिका की वकालत कर चुके हैं, यह बात बहुतों को याद होगी. लेकिन जिस सर्विस की मैंने चर्चा की है उस पर जो प्रवृत्ति सामने आ रही है वह मूलत: हमारे सामाजिक ढांचे में आ रहे बदलाव की चिंताजनक देन है. काम काज के तौर तरीके तेज़ी से बदल रहे हैं. पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियां भी ज़्यादा डिमाण्डिंग और चैलेंजिंग़ दायित्व स्वीकार करने लगी हैं, ज़्यादा यात्राएं, ज़्यादा समय तक ऑफिस में रुकना और अपने सहकर्मियों से निकटता के अवसर बढ़ना आम होता जा रहा है. इसी के साथ दाम्पत्य जीवन में साथ रहने के समय में भी स्वभावत: कमी आती जा रही है. मुझे याद आती है यह बात कि नीदरलैण्ड की टिलबर्ग यूनिवर्सिटी में  2011 में एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि बढ़ती जा रही आर्थिक और सामाजिक सशक्तता अब स्त्रियों को भी वही सुविधा दे रही है जिसका उपभोग पुरुष सदियों से करते आ रहे थे. लेकिन क्या यह ऐसी बात है जिस पर गर्व किया जाए? और क्या ऐसा ही हमारे अपने देश में भी नहीं हो रहा है?

सोचने की बात यह है कि चाहे एक छोटे और सीमित वर्ग में ही सही, विवाह संस्था के प्रति लोगों के नज़रिये में यह जो परिवर्तन आ रहा है क्या उसे हमारी परम्पराओं, हमारे मूल्यों  और सामाजिक संरचना की सेहत के लिए खतरे की घण्टी के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 अगस्त, 2015 को पति पत्नी और वो, बज रही है ख़तरे की घण्टी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    

Tuesday, July 21, 2015

रफ़्तार-ए-उम्र पर ब्रेक

वैसे तो फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों की शादी की खबरें समाचार माध्यमों को कुछ ज़्यादा ही आकर्षित करती हैं, लेकिन हाल ही में जब यह खबर आई कि ‘दिल चाहता है’  और ‘लगान’  जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं अभिनेत्री सुहासिनी मुले ने 2011 में मुम्बई के एक फिजिसिस्ट अतुल गुर्टू से शादी कर ली थी तो तमाम माध्यम यह बताना नहीं भूले कि उस समय सुहासिनी  साठ की और अतुल पैंसठ के हो चुके थे. बल्कि ख़ास  खबर ही यह थी कि साठ बरस की एक स्त्री ने पैंसठ  बरस के एक पुरुष से विवाह किया है. दरअसल हम सब बुढापे को लेकर कुछ ज़्यादा ही आक्रांत रहते हैं. हिन्दी के एक बड़े कवि हुए हैं केशवदास. उनके बारे में यह बात विख्यात है कि अपनी वृद्धावस्था में एक बार वे किसी कुएं पर बैठे हुए थे. तभी कुछ स्त्रियां वहां पानी भरने के लिए आईं और उन्हें ‘बाबा’ कह दिया. इस पर व्यथित होकर उन्होंने यह  दोहा कहा:  

केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिं।
चंद्रवदन  मृगलोचनी  बाबा कहि कहि जाहिं।।

इसे गद्य में कहें तो यह कि केशव दास कहते हैं कि मेरे साथ मेरे केशों (यानि सफेद बालों) ने जैसा  दुर्व्यवहार किया है वैसा तो शत्रु भी नहीं करते हैं. और यह दुर्व्यवहार क्या है? चांद जैसे चेहरे और हिरनी जैसी आंखों वालियां मुझे बाबा कहकर सम्बोधित कर रही हैं! ज़ाहिर है कि या तो उस ज़माने में बाल काला करने वाले रसायन सुलभ नहीं थे या केशव उनका प्रयोग नहीं करते थे! लेकिन बाल रंगने से भी क्या हो जाता है? काले बालों वाले क्या बूढ़े नहीं  होते? बुढ़ापा भी तो कई तरह से आता है! मिर्ज़ा ग़ालिब का एक बहुत मशहूर शे’र है: ग़ो हाथ को नहीं ज़ुम्बिश, आंखों में तो दम है/ रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे! शायर वृद्ध हो गया है, उसके हाथ अशक्त हो गए हैं, लेकिन मन की लालसाएं अभी भी बरक़रार हैं. वो यह कहते हुए मदिरा पात्र सामने रखे रहने  देने का अनुरोध कर रहा है कि उसकी आंखें अभी भी मदिरा पान  करने में समर्थ  हैं!

केशव और बिहारी दोनों मुझे याद इसलिए आए कि एक अंतर्राष्ट्रीय शोध समूह ने न्यूज़ीलैण्ड के एक ही शहर में 1972-73 में जन्मे 954 लोगों का अध्ययन कर प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज़ में एक रिपोर्ट प्रकाशित कराई है जिसके अनुसार एक ही साल में जन्म लेने वाले लोगों की बायोलॉजिकल उम्र अलग-अलग हो सकती है और होती है. आपको वो विज्ञापन तो ज़रूर याद होगा – साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान! ठीक वही बात  कि साठ साल का एक व्यक्ति बूढ़ा हो सकता है और साठ ही साल का दूसरा व्यक्ति जवान भी  हो सकता है. इस अध्ययन के दौरान पाया गया कि  कुछ लोगों की उम्र थम गई थी जबकि कुछ की उम्र तीन गुना तेज़ रफ्तार से बढ़ रही  थी यानि वे एक साल में तीन साल आगे जा रहे थे.

इस बात  को ठीक से समझने के लिए यह जानना उपयोगी होगा कि विशेषज्ञ हमारी उम्र को चार अलग-अलग तरहों से आंकते और मापते हैं. सबसे पहला और सुपरिचित तरीका वो है जिसे क्रोनॉलोजिकल (कैलेण्डर के मुताबिक बढ़ने वाली) उम्र कहते हैं. हमारी आम बातचीत इसी आधार पर होती है और तमाम जगहों पर हम इसी उम्र को दर्ज़ भी करते हैं.  लेकिन अब यह माना जाने लगा है कि उम्र की यह गणना दोषपूर्ण है. उम्र को मापने का दूसरा तरीका है बायोलॉजिकल उम्र या जैविक उम्र, जिसकी गणना कुछ ख़ास बायोमार्कर्स के आधार पर की जाती है और जिसमें शरीर के साथ-साथ मानसिक विकास और बदलाव को भी मद्देनज़र रखा जाता है. उक्त अध्ययन में इसी बायोलॉजिकल उम्र को आधार बनाया गया है. तीसरा तरीका है मनोवैज्ञानिक उम्र, जिसकी गणना का आधार मनुष्य के सोचने, तर्क करने और उसकी भावनात्मक परिपक्वता जैसी गैर शारीरिक विशेषताएं होती हैं. और चौथा तरीका  है फंक्शनल उम्र जो इन तीनों प्रकारों का मिश्रित रूप है.

ऊपर मैंने जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया उसमें एक ही साल में पैदा हुए लोगों के वज़न, उनके गुर्दों के काम करने के तरीके और मसूढों की तन्दुरुस्ती को परखा गया था. लेकिन इस रिपोर्ट का ज़्यादा महत्व इस बात में है कि अगर उम्र बढ़ने की रफ्तार के बारे में और अधिक अध्ययन हुआ तो बहुत मुमकिन है उम्र को बढ़ाने वाले कारणों का भी पता चल जाए और फिर उन कारणों पर नियंत्रण कर उम्र के बढ़ने की रफ्तार को कम भी कर लिया जाए! जिस तरह हमने रोगों पर काबू पाया है और बहुत सारे प्राणघातक रोगों से बिल्कुल मुक्ति   पा ली है उसे देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि अगर उम्र की रफ्तार पूरी तरह थम न भी जाए तो धीमी तो हो ही जाएगी.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 जुलाई, 2015 को रफ़्तारे उम्र पर ब्रेक, साठ साल का बूढ़ा या साठ साल का जवान शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ.