Tuesday, June 10, 2014

वक़्त की पाबन्दी के शिकार

हम लोगों में चाहे लाख बुराइयां हों, एक बात की तारीफ करनी पड़ेगी. हम समय के ग़ुलाम तनिक भी नहीं हैं. समय अपनी गति से चलता है और हम अपनी. भले ही अंग्रेजों ने हमें काफी समय गुलाम बनाए रखा और अपनी बहुत सारी बुराइयां हम पर थोप दीं, वक़्त की पाबन्दी न वे हमें सिखा सके और न हमने उनसे सीखने की कोई कोशिश की. अब तो हालत यह है कि अपनी तमाम अंग्रेज़ियत के बावज़ूद हम लेट लतीफी को बड़े गर्व के साथ इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम कह कर सहज रूप से स्वीकार कर लेते हैं. आप किसी भी कार्यक्रम के आयोजक से, जब वो आपको अपने आयोजन का निमंत्रण पत्र थमा रहा हो, बात कीजिए,  वो बड़े बिन्दास अन्दाज़ में आपसे कहेगा कि हालांकि कार्यक्रम का समय कार्ड में चार बजे छापा गया है, आप साढ़े  चार बजे तक आ जाएं. पिछले  दिनों एक आयोजन में एक बहुत बड़े नेता जी को तो यह कहते सुनने का भी सौभाग्य मुझे मिल चुका है कि अगर उन्हें बुलाना है तो इंतज़ार करने के लिए तैयार रहें. यहीं यह भी बताता चलूं  कि वे महज़ ढाई घण्टा देर से पधारे थे. इसे कहते हैं ऊंचे लोग ऊंची बात!

लेकिन इन सारे ऊंचे और बड़े लोगों के बीच, कुछ मूर्ख ऐसे भी हैं जिन पर इस पूरे माहौल का कोई असर नहीं होता है और स्वतंत्र भारत में जीते और सांस लेते हुए भी वे समय के ग़ुलाम बने रहते हैं. निर्धारित समय जैसे-जैसे निकट आता है उनकी हृदय गति तेज़ होने लगती है और घड़ी की सुई अगर उस निर्धारित समय को छू कर आगे बढ़ जाए तो उन्हें लगता है कि बस अब तो प्रलय दरवाज़े तक आ पहुंची है. ऐसे लोगों से  उनके घर  वाले तो तंग रहते ही हैं, वे खुद भी कम परेशान नहीं होते हैं. हमारे एक नज़दीकी  मित्र हैं जो समय के बड़े पाबन्द हैं. एक बड़े पद पर रह चुके हैं और समाज में थोड़ा मान है इसलिए गाहे-बगाहे, यानि जब कोई वर्तमान उच्च पदासीन नहीं मिलता है तो  लोग उन भूतपूर्व जी को भी अपने आयोजनों की शोभा बढ़ाने के लिए बुला लिया करते हैं. इस समय की पाबन्दी ने उन्हें कई दफा अजीब-अजीब हालात में डाला है और उन सबसे सबक लेते हुए अब तो वे भी अपने आयोजकों को ठोक बजाकर सही समय बताने के लिए विवश कर लेते हैं और कोशिश करते हैं कि वास्तविक समय पर, न कि कार्ड में दिए गए समय पर,  आयोजन स्थल पर पहुंचें. लेकिन फिर भी कभी-कभी हादसे हो ही जाते हैं. वो कहते हैं न कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी.

हुआ यह कि पिछले दिनों छोटे बच्चों के एक स्कूल ने उन्हें अपने  आयोजन में बुलाया. हमारे मित्र के बहुत पूछने पर आयोजकों ने उन्हें आश्वस्त किया कि मामला क्योंकि छोटे बच्चों का है, वे कार्यक्रम एकदम  सही समय पर शुरु और ख़त्म करना चाहेंगे, और इसलिए उन्होंने अपनी तरफ से भी हमारे इस मित्र से आग्रह किया कि वे समय पर पहुंच जाएं. अब हमारे मित्र  ठहरे अपनी आदत से लाचार. पहुंच गए ठीक समय पर. लेकिन वहां ऐसा सन्नाटा पसरा था जैसे कोई आयोजन होना ही नहीं है. पन्द्रह  बीस मिनिट  इधर उधर घूम फिर कर जब वे फिर आयोजन स्थल पर पहुंचे तो सौभाग्य से दरवाज़े खुल चुके थे और वे अन्दर जा सके. सभागार तक पहुंचे तो वहां सफाई का काम चल रहा था. कुछ संकोच के साथ वे आगे की एक सीट की तरफ बढ़े तो वहां खड़े चौकीदार ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया कि वे सीटें तो ख़ास मेहमानों के लिए आरक्षित हैं. अब बेचारे वे उस चौकीदार को क्या कहते. मन मारकर और खुद को यह दिलासा देते हुए कि अभी जब आयोजक आकर ससम्मान उन्हें मंच पर ले जाएंगे तो इस चौकीदार को पता चलेगा कि उसने किस वी आई पी को रोका था, सातवीं कतार में बैठ गए. ख़ैर कोई आधे घण्टे बाद कुछ हलचल हुई, और आयोजक गण अपने मुख्य अतिथि स्थानीय विधायक जी के साथ   प्रकट हुए और बिना दांये-बांये देखे, चमचमाती फ्लैश लाइट्स के बीच सीधे मंच की तरफ बढ़ गए! न उन्होंने हमारे मित्र की तरफ देखा और न मित्रवर को यह उपयुक्त लगा कि वे खुद स्टेज पर चले जाएं! लेकिन इतना निश्चित  है कि उस वक़्त उनके मन में अपने समय पर पहुंचने की आदत को लेकर गुस्सा ज़रूर उमड़ा  होगा. अगर वे भी देर से पहुंचे होते तो उनकी ऐसी बेकद्री नहीं हुई होती! अब देखना है कि इस अनुभव से वे क्या सबक लेते हैं!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में 10 जून 2014 को जब वक़्त की पाबन्दी ने कराई किरकिरी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 3, 2014

परीक्षा परिणामों के मौसम में

परीक्षा  परिणामों के इस मौसम में दो बातें ख़ास तौर पर याद आ रही हैं. बहुत वक़्त नहीं बीता है जब परीक्षा परिणाम जानने के लिए अख़बार का इंतज़ार करना होता था, और आप अख़बार के प्रकाशन वाले शहर से जितनी  दूर होते यह इंतज़ार भी उतना ही लम्बा होता जाता था. मुझे याद है कि उदयपुर में मेरे भाई साहब बड़े यत्नपूर्वक किसी को रेल्वे स्टेशन भेजकर ब्लैक में बोर्ड के रिज़ल्ट वाला  अख़बार मंगवाया करते और फिर अपनी दुकान पर लोगों से पर्चियों पर उनके रोल नम्बर लिखवा कर लाउड स्पीकर पर परिणाम बताया करते थे. उस ज़माने में उनकी यह जन सेवा बेहद लोकप्रिय थी. अब कोई इस बात की कल्पना भी नहीं करेगा.  दूसरी बात यह कि आज जब बच्चों को 97-98 प्रतिशत लाते देखता हूं तो यह बात याद आती है कि हमें जिन प्रोफेसरों ने पढ़ाया उनमें शायद ही कोई प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण रहा हो!

निश्चय ही आज की पीढ़ी पहले वाली पीढ़ियों की तुलना में  ज़्यादा सजग, ज़्यादा मेहनती, ज़्यादा सुविधा सम्पन्न, ज़्यादा प्रतिभाशाली  और ज़्यादा प्रखर है. इस बात की पुष्टि के लिए किसी शोध की ज़रूरत नहीं है. आप किसी चार पाँच बरस के बच्चे से थोड़ी देर बात कीजिए, ख़ुद जान जाएंगे. लेकिन इस ‘ज़्यादा’  ने इस पीढ़ी के सामने संकट भी कम खड़े  नहीं किए हैं. आज रोज़गार देने वाले के सामने एक से बढ़कर एक रोज़गाराकांक्षी खड़े हैं, और जो औसत दर्ज़े का है उसे कोई पूछने को तैयार नहीं है. संकट वाकई बड़ा और गहरा है, लेकिन अपने आस पास नज़र दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि इसी संकट में लोग नई राहें भी निकाल रहे हैं.

यहां बैंगलोर में रहते हुए और नई पीढ़ी के बहुत सारे चमकते सितारों से बातें करते हुए समझ में आता है कि  कैसे ये लोग अपनी सूझ-बूझ और नई सोच की मदद से अपने लिए नई राहों का निर्माण कर रहे हैं. रोज़गार और काम के अवसर आपके चारों तरफ मौज़ूद हैं, बस ज़रूरत उनको देखने की और उनका इस्तेमाल करने की है. यहां मुझे पता चला कि एक पूरी स्ट्रीट ही स्टार्ट अप स्ट्रीट के नाम से जानी जाने लगी है. यानि एक ऐसी गली जिसमें तमाम नई शुरु हुई कम्पनियों के दफ्तर हैं. युवा लोग अपने साधनों के अनुरूप नई कम्पनियां बनाते हैं और आहिस्ता आहिस्ता उनका विस्तार करते जाते हैं. उनके काम  भी कम मज़ेदार  नहीं हैं. मसलन कुछ लोगों ने यह देखकर कि अलग-अलग जगहों से आए युवा घर जैसे खाने को तरसते हैं, एक कम्पनी बना दी जो गृहिणियों से सम्पर्क  स्थापित कर उनका बनाया खाना इन लोगों तक पहुंचा देती है. बहुत सारी गृहिणियां खुद अपनी पाक कला के बूते पर काफी अच्छी कमाई कर रही हैं. कोई पार्टियों के लिए खाना सप्लाई करती हैं तो कोई उत्सवों के लिए केक वगैरह बना कर अपने समय का सदुपयोग और अपने संसाधनों का विस्तार करती हैं. इन्हीं नई पहलों के ज़्यादा कामयाब और सुपरिचित रूप हैं फ्लिपकार्ट और ग्रुपऑन जैसी कम्पनियां. 

और ऐसा भी नहीं है कि रोज़गार के ये मौके तकनीकी रूप से समृद्ध या अभिजात वर्ग के लोगों को ही मिल रहे हैं. बल्कि मैं तो अपने चारों तरफ़ देखता हूं कि जिसमें किसी भी तरह की कोई योग्यता है और जो निष्ठा से काम करने को तैयार है उसके पास काम की कोई  कमी नहीं है. घरों में काम करने वाली बाइयां, खाना बनाने वाले, ड्राइवर सभी अपनी-अपनी काबिलियत और मेहनत के बल पर सम्मान और स्वाभिमानपूर्वक अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं. बल्कि अगर कभी आप काम देने वालों की नज़र से देखें तो पाएंगे कि वे अच्छा काम करने वालों की खोज में हमेशा रहते हैं और  ठीक मानदेय देने में भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती है. लेकिन इसके बावज़ूद अच्छा काम करने वालों की उनकी तलाश पूरी नहीं होती है.

ऐसे में कभी-कभी मैं सोचता हूं कि क्या हमारे देश में वाकई बेरोज़गारी है? बात थोड़ी कड़वी  लग सकती है लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं है कि जो लोग बेरोज़गारी का शोर मचाते हैं वे बिना काम किए तनख़्वाह के या कम काम के लिए ज़्यादा तनख़्वाह के  तलबगार हैं? उन्हें सिर्फ और सिर्फ वो सरकारी नौकरी चाहिए जिसमें वेतन की तो गारण्टी हो लेकिन काम करने की कोई ख़ास बंदिश न हो! निश्चय ही यह अति सामान्यीकरण है. सारे लोग ऐसे नहीं हैं. और बेशक कुछ हैं जिनके पास योग्यता है लेकिन कोई उस योग्यता को देख,  सराह और ले नहीं रहा है. लेकिन अपने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाएंगे तो आपको भी लगेगा कि हमारे यहां काम खूब है, काम करने के मौके भी खूब हैं, लेकिन काम करने की इच्छा ज़रा कम है! 
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 03 जून, 2014 को चाह से बन जाते हैं रोज़गार लेने की जगह देने वाले शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल  पाठ.    

Tuesday, May 27, 2014

अनेकता में एकता का देश हमारा

हम सबने अपनी अपनी पाठ्य पुस्तकों में भारत की अनेकता में एकता की बातें पढ़ी हैं, लेकिन इसका सही अनुभव तो अपने जाने-पहचाने प्रदेश से बाहर निकलने पर ही होता है.   खान-पान, बोली-चाली, पहनावा, रीति रिवाज़, जीवन जीने का ढंग – सब कुछ तो अलग मिलता है आपको. खुद मुझे इस बात की बहुत तीव्र अनुभूति अपनी हाल की ऊटी-कुन्नूर की एक छोटी-सी यात्रा में हुई. ऊटी के लिए यहां बैंगलोर में सुबह जल्दी घर से निकले और इस महानगर की सीमा से बाहर आते ही जैसी गंध नथुनों में भरने  लगी, जैसे पेड़ पौधे फूल पत्तियां दिखाई देने लगे, जैसे चेहरे और पहनावे  नज़र आने लगे, वे सब मेरे वास्ते नए थे.  और जैसे  इतना ही काफी न हो, सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में कहूं तो यह प्रकृति परिवेश पल-पल बदल रहा था. जैसे पेड़ पौधे अभी देखे, कुछ ही देर बाद उनसे एकदम अलग पेड़ पौधे मिल रहे थे. दक्षिण की एक सुपरिचित श्रंखला के रेस्तरां में नाश्ते के लिए रुके तो वहां वो कुछ भी नहीं था जो आम तौर पर हम नाश्ते में लेने के आदी हैं. बल्कि वो भी नहीं, जिसे हम ‘साउथ इण्डियन फूड’ के नाम से जानते हैं. अलबत्ता उससे मिलता-जुलता ज़रूर. कुछ और आगे जाने पर बच्चों की फरमाइश पर एक विदेशी श्रंखला वाले रेस्तरां में रुके तो वहां सब कुछ स्टैंडर्ड था. यानि कश्मीर से कन्याकुमारी तक, बल्कि देश से बाहर भी   उनकी श्रंखला में वही के वही उत्पाद आप पा सकते हैं. असल में भारतीय जीवन शैली और पाश्चात्य जीवन शैली का यही तो बहुत बड़ा फर्क़ है – कि हम अपनी विविधता  के साथ जीने का आनंद लेते हैं जबकि वे दुनिया की सारी विविधता को कुचल कर एकरस कर देना चाहते हैं.

हम लोग पहले कुन्नूर गए.  कुन्नूर और उसके आसपास देखने को खूब है और हमें यह भी बहुत अच्छा लगा कि कुन्नूर अभी  उस भीड़-भाड़ और अस्त व्यस्तता से काफी हद तक बचा हुआ है जिसके शिकार हमारे ज़्यादातर पर्यटन केन्द्र हो चुके हैं. असल में इस बात का त्रासद एहसास तो हमें अपनी  इस यात्रा के तीसरे दिन ऊटी पहुंच कर हुआ. एक तो रविवार और फिर वहां चल रहे ग्रीष्मकालीन फेस्टिवल के दौरान पुष्प प्रदर्शनी का आखिरी दिन. पूरा कस्बा गाड़ियों और पर्यटकों के अन्य छोटे-बड़े वाहनों से खचाखच भरा हुआ. पैदल चलने वालों के वास्ते तो कोई जगह ही नहीं. और गाड़ियां भी चल नहीं रहीं, रेंग रही. हमने भी जाने किस कुबेला में ऊटी के सर्वोच्च शिखर डोड़ाबेट्टा जाने का फैसला कर लिया. कोई दस किलोमीटर का सफर तीन घण्टों में तै कर जब हम इस शिखर पर पहुंचे तो वहां देखने को नरमुण्ड और सुनने को छोटी-मोटी चीज़ें बेचने वालों की आवाज़ों के सिवा और कुछ नहीं था. पार्किंग की मारा-मारी, भयंकर गन्दगी. लगा कि जितनी जल्दी यहां से भाग  निकलें, अच्छा रहे. और वही किया भी. डेढ घण्टे में नीचे आए और पेट पूजा के लिए रेस्तरां खोजने लगे तो फिर जगजीत की गाई वो गज़ल गुनगुनाने को मज़बूर होना पड़ा – हर तरफ बेशुमार आदमी. जैसे तैसे खाना खाया, ऊटी से भागे और बीस-तीस किलोमीटर दूर आकर चैन की एक लम्बी सांस ली.

तमाम खूबसूरत  विविधताओं का मज़ा कुछ चीज़ें किरकिरा करती हैं, और हर जगह करती हैं. हमारे सारे पर्यटन केन्द्र वहां आने वालों की बढ़ती जा रही भीड़ से त्रस्त हैं और जिन लोगों पर  उनकी देखरेख का दायित्व है वे इस त्रास को कम करने के लिए कुछ भी करते दिखाई नहीं दे रहे हैं. परिणाम  यह कि पर्यटन स्थल सुख चैन की बजाय अशांति और आपाधापी दे रहे हैं. आप किसी भी पर्यटन स्थल पर चले जाएं, सफाई नाम की चीज़ आपको ढूंढे से भी नहीं मिलेगी. पीने  का पानी तो अब  सुलभ कराना बन्द ही कर दिया गया है (बोतल खरीदिये और प्यास बुझाइये!) साफ सुथरे शौचालय भी मुश्क़िल से मिलते हैं. क्या पर्यटन का काम करने वालों को पर्यटकों की इस ज़रूरत का कोई अनुमान नहीं होता है?

इधर दक्षिण में एक और बात  का बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ. यहां आपको सब जगह तमाम निर्देश और सूचनाएं यहां की प्रांतीय भाषाओं  में लिखी मिलती हैं. प्रांतीय भाषाओं के प्रोत्साहन की बात अपनी जगह ठीक हो सकती है, लेकिन इससे अन्य भाषा भाषियों को  जिन कठिनाइयों से रूबरू होना पड़ता है उनके बारे में भी ज़रूर सोचा जाना चाहिए. बहुत सारी जगहों पर एक-सा कुछ लिखा हुआ देखकर जब मैंने एक स्थानीय से जानना चाहा कि यह क्या लिखा हुआ है तो उसने बताया कि ‘फूल तोड़ना मना है!’  क्या यही बात  छवि के माध्यम से नहीं कही जा सकती थी?  
इन पर्यटन स्थलों पर घूमते हुए मुझे अपने देखे विदेशी पर्यटन स्थल भी याद आते रहे. वहां हर पर्यटन स्थल पर उससे जुड़े स्मृति चिह्न, जैसे की रिंग, गिलास, नेल कटर,  चाय के कोस्टर, टी शर्ट, टोपियां, वगैरह ज़रूर मिलते हैं और जिन्हें बतौर यादगार पर्यटक खरीदकर अपने साथ ले जाते हैं. हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो सकता? इसमें तो सरकार को भी कुछ नहीं करना है! हर पर्यटन स्थल पर वहां की प्रामाणिक जानकारी देने वाला खूब साहित्य (प्राय: निशुल्क) मिल जाता है. क्या हमारे यहां इस दिशा में कोई कुछ नहीं कर सकता? और आखिरी बात यह कि अब जबकि हार हाथ में मोबाइल है, और  उसमें स्टिल और वीडियो  दोनों तरह के कैमरे हैं, फोटोग्राफी वर्जित है या कैमरा शुल्क इतने रुपये का क्या मतलब है?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 27 मई, 2014 को किंचित संशोधित रूप में जब मुश्क़िलों ने किरकिरा किया सफर का मज़ा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 20, 2014

स्वस्थ समाज और मज़बूत लोकतंत्र के लिए

देश में चुनाव सम्पन्न हो गए और नई सरकार की तस्वीर साफ हो गई है. इस बार के चुनाव कई मामलों में बेहद अनूठे रहे. वैसे तो हर बार यही कहा जाता है कि परिणाम  अप्रत्याशित रहे हैं, लेकिन इस बार के परिणाम ज़्यादा ही  अप्रत्याशित रहे हैं. इतने एक पक्षीय फैसलों की तो घोर से घोर समर्थकों ने भी आशा नहीं की थी. निश्चय ही यह उम्मीद की जानी चाहिए कि नई सरकार बिना किसी दबाव और समझौतों के काम करेगी, आम जन के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कार्य करेगी और जनाकांक्षाओं पर खरी उतरेगी.

इस बार के चुनावी माहौल में दो बातें बहुत ख़ास रही हैं. इन चुनावों में जितनी कटुता देखने को मिली, और एक दूसरे के प्रति जितनी  ख़राब भाषा का प्रयोग किया गया वैसा अब तक कभी नहीं हुआ था. वैसे इस बार के चुनावों को लोगों के अनुपम हास्य बोध के लिए भी याद किया जाना चाहिए. अपने चहेते नेताओं और दलों के पक्ष का समर्थन करने के लिए विरोधियों को लेकर जैसे-जैसे लतीफे,  प्रसंग, कार्टून वगैरह  रचे गए वैसे और उतनी मात्रा में शायद ही पहले कभी रचे गए हों. लेकिन यहां भी अधिकतर यह प्रवृत्ति देखने को मिली कि हम तो सबका कैसा भी मखौल उड़ा सकते हैं लेकिन हमारी तरफ देखने की कोई ज़ुर्रत भी न करे! अब जब चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि इस सब अप्रिय बातों को भुला दिया जाएगा और पूरी सद्भावना और सदाशयता के साथ काम किया और करने दिया जाएगा.

दूसरी बात जो ग़ौर तलब है वह यह कि इन चुनावों में पहली बार पर सोशल मीडिया, विशेष रूप से फेसबुक, ट्विट्टर,  वाट्सएप्प आदि  का इतने बड़े पैमाने इस्तेमाल हुआ. वैसे तो इस इस्तेमाल की पदचाप हाल ही में सम्पन्न हुए विधान सभा चुनावों में भी  काफी साफ सुनाई दी थी और एक नए जन्मे दल के लिए कहा गया था कि उसने इस माध्यम का बहुत सशक्त प्रयोग किया है, लेकिन इस संसदीय चुनाव में यह प्रयोग और बड़े पैमाने पर हुआ. लगभग सभी  राजनीतिक दलों ने बहुत योजनाबद्ध रूप से इन माध्यमों को अपने पक्ष  में इस्तेमाल किया और  इस कुशलता के साथ किया कि वे अपने समर्थकों को भावनात्मक रूप से अपने साथ इस हद तक जोड़ने में कामयाब रहे कि राजनीतिक पक्षधरता और संलग्नता निजी और पारिवारिक सम्बन्धों तक पर भारी पड़ गई. मैं कल ही यहां यहां बैंगलोर में एक ख़बर पढ़ रहा था कि दो परिपक्व और खासे शिक्षित युवाओं में बरसों पुरानी  गहरी दोस्ती सिर्फ इसी बात पर टूट गई कि उनमें से एक किसी एक राजनीतिक दल का कट्टर समर्थन कर रहा था. हम लोग जो फेसबुक पर सक्रिय हैं, उन्होंने भी यह बात लक्षित की है कि इस चुनाव के दौरान ‘अनफ्रेण्ड’ करने का कारोबार कुछ ज़्यादा ही चला है.

निश्चय ही इस पूरे सिलसिले में अपने राजनीतिक विचार के प्रति हमारी गहरी संलग्नता के साथ ही दूसरे के विचार और उसकी भावनाओं के प्रति असहिष्णुता की भूमिका को नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता है. अलग राजनीतिक विचारों का होना अस्वाभाविक और असामान्य बात नहीं है. यह तो प्रजातंत्र का मूल है. विचार वैभिन्य जितना देश या समाज में हो सकता है, उतना ही परिवार और दोस्तों के  बीच  भी हो सकता है. हम अलग-अलग विचार और पसन्द नापसन्द रखकर भी साथ रह सकते हैं, और प्रेम से रह सकते हैं – इस बात पर ज़ोर देने की बेहद ज़रूरत इन चुनावों ने महसूस कराई है. असल में, अब तक यह बात कि हमारा मत किसको जाएगा, गोपनीय रहती आई है और इस वजह से बहुत सारे टकरावों से भी हम बचे  रहे हैं. राजनीतिक दलों के प्रचारक अपना काम  करते रहे और मतदाता अमन चैन की ज़िन्दगी जीता रहा. लेकिन इस बार, कदाचित पहली बार, सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी पसन्द  खुलकर बताई और न सिर्फ यह किया, बल्कि जिनकी पसन्द उनसे भिन्न थी, उन पर तमाम तरह के उचित-अनुचित, सही ग़लत  प्रहार भी किए. एक तरह से आम मतदाता भी पार्टी का प्रचारक बन कर उभरा.  सारी खुराफत की जड़ यही बात  थी. अब इसके मूल में बहुत सारी बातें हो सकती हैं. हो सकता है ऐसा इसलिए हुआ हो कि देश का एक बड़ा वर्ग परिवर्तन के लिए व्याकुल था और वह उससे कम के लिए क़तई प्रस्तुत नहीं था. और भी बहुत  कुछ इसके मूल  में हो सकता है, जिसका विश्लेषण यहां प्रासंगिक नहीं होगा. लेकिन अब, जबकि वह परिवर्तन  हो चुका है, यह बहुत ज़रूरी है कि इस दौर की तमाम कटुताओं को खुले मन से विस्मृत कर दिया जाए, और न सिर्फ इतना बल्कि यह भी सोचा जाए कि भविष्य में इससे कैसे बचा जाएगा. चुनाव फिर होंगे, हर पाँच  बरस में होंगे. फिर हम किसी के पक्ष में और किसी के प्रतिपक्ष में होंगे. लेकिन हमारी पारस्परिक सद्भावना कभी आहत न हो, हमारे विचारों के कारण हमारे निजी और पारिवारिक रिश्ते तनिक भी क्षतिग्रस्त न हों, इसका ध्यान  ज़रूर रखा जाना चाहिए. यह बात एक मज़बूत  लोकतंत्र के लिए जितनी ज़रूरी है उतनी ही ज़रूरी एक स्वस्थ और परिपक्व समाज के लिए भी है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 20 मई, 2014 को आम मतदाता बनकर उभरा पार्टी प्रचारक शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 13, 2014

मैंने सर झुकाया उसके सामने!

अपनी कामकाज़ी ज़िन्दगी के करीब 36 बरस कॉलेजों में गुज़ारे तो स्वाभाविक ही है कि अपनी स्मृतियों के पिटारे में ज़्यादा माल भी वहीं का है. जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि उस ज़िन्दगी में काफी कुछ ऐसा था जिसे अपने पाठकों से साझा करूंगा तो उनके चेहरों पर भी मुस्कान आ जाएगी. मैंने अपने इस सुदीर्घ अध्यापन काल में अपने विद्यार्थियों से काफी कुछ सीखा है. कभी अपनी तरफ़ से सीखा तो कभी उन्होंने आगे बढ़कर  सिखाया. याद आता है कि अपनी नौकरी के शायद पहले या दूसरे बरस में जब मैं उसकी किसी शरारत पर अपने एक विद्यार्थी को बहुत ही शालीन और मुलायम लहज़े में ‘डांट’ चुका (और ज़ाहिर है कि वह डांट निष्फल रही) तो कक्षा से बाहर निकलते समय मेरे एक अन्य विद्यार्थी ने मुझे सलाह दी कि अगर मुझे किसी को डांटना है तो अपनी आवाज़ को तेज़ और लहज़े को कड़ा रखना होगा. उसने कहा कि अगर आप इसी मुलायम लहज़े में डांटेंगे तो कोई असर नहीं होगा. बाद में इसी तरह बहुत सारी अन्य ट्रिक्स ऑफ द ट्रेड सीखने को मिलीं.

लेकिन आज मुझे एक अन्य प्रकार का प्रसंग आपसे बांटने का मन हो रहा है. उन दिनों कॉलेजों में विद्यार्थियों के लिखे को प्रकाशित करने के लिए महाविद्यालय पत्रिकाएं निकालने का रिवाज़ था, और करीब-करीब हर महाविद्यालय कम से एक एक वार्षिक पत्रिका तो ज़रूर ही प्रकाशित करता था. कम से कम इसलिए कहा कि बहुत सारे महाविद्यालय इसके अलावा मासिक, त्रैमासिक आदि पत्रिकाएं  भी निकालते थे. अब आहिस्ता-आहिस्ता ऐसी तमाम गतिविधियां और परम्पराएं नष्ट हो चुकी हैं. हो सकता है कि उनकी जगह नई गतिविधियों ने ले ली  हो. तो मेरे उस कॉलेज में भी एक वार्षिक पत्रिका निकलनी थी और उसका सम्पादक मुझे बनाया गया था. मैंने नोटिस बोर्ड पर सूचना लगवा दी कि अपनी रचनाएं प्रकाशित करवाने के इच्छुक  विद्यार्थी अमुक तिथि तक मुझे अपनी रचनाएं दे दें. मेरा आग्रह इस बात  पर रहता था कि हम विद्यार्थियों की मौलिक रचनाएं प्रकाशित करें. कई अन्य सम्पादक तथाकथित  संकलित रचनाओं वाली पत्रिकाएं भी  निकाला करते थे. मौलिकता के मेरे आग्रह को लेकर कई बार विद्यार्थियों से छोटी-मोटी बहस भी हो जाती थी. लेकिन मैं अपने सोच पर कायम रहने की भरसक कोशिश करता था.

काफी सारी रचनाएं आ चुकी थीं. एक दिन एक विद्यार्थी एक पन्ना  लेकर मेरे पास आया और बोला कि  “सर! यह मेरी शायरी है, इसे पत्रिका में प्रकाशित कर दीजिए.”  सामान्यत: तो मैं रचनाएं लेकर अपने पास रख लेता था और बाद में उन्हें देखकर गुणावगुण के आधार पर उनको प्रकाशित करने न करने का निर्णय  करता था लेकिन उस दिन न जाने क्यों मेरा इरादा बदल गया. मैंने एक नज़र उस विद्यार्थी के दिए पन्ने  पर डाली तो पाया  कि अरे! यह तो मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल है. सोचा, अगर यह कहूंगा कि यह ‘शायरी’ तुम्हारी मौलिक रचना नहीं है तो विद्यार्थी को बुरा लगेगा, इसलिए मैंने अपनी बात कहने के लिए ज़रा घुमावदार  रास्ता चुना. गम्भीरता ओढ़ते हुए मैंने उस पन्ने की चन्द लाइनें पढ़ीं और फिर उससे बोला कि यह तो बहुत अच्छी रचना है.  विद्यार्थी प्रसन्न हुआ. मैंने उससे पूछा  कि यह किस विधा की रचना है? उस विद्यार्थी को मेरा विधा शब्द समझ में नहीं आया, तो मैंने अपनी बात को सरल करते हुए पूछा कि यह ग़ज़ल है, नज़्म है, या रूबाई है?  विद्यार्थी ने पूरे आत्म विश्वास से मुझ अज्ञानी को ज्ञानवान बनाते हुए कहा – “सर, मैंने कहा ना कि यह शायरी है!”  मैंने भी जैसे उसकी बात को समझते हुए  कहा कि “अच्छा, अच्छा! यह शायरी है. मुझे तो उर्दू आती नहीं है, इसलिए यह बात मालूम नहीं थी.”  फिर मैंने उस ‘शायरी’ के एक कठिन शब्द का अर्थ उससे जानना चाहा  जिस पर उस महान विद्यार्थी का जवाब बहुत ही शानदार था. बोला, “सर! शायर ऐसे कोई शब्दों को लेकर थोड़े ही शायरी करता  है. उसके मन में जब खयाल आते हैं तो शब्द अपने आप कागज़ पर उतर आते हैं!”  अब उससे किसी और शब्द का अर्थ पूछने का कोई मतलब ही नहीं था. मैंने एक बार फिर उसकी महान शायरी की (जो वाकई  महान थी! आखिर मिर्ज़ा ग़ालिब की जो थी) तारीफ की और उससे पूछा कि क्या उसने और भी ऐसी शायरी लिखी है? मैंने उससे अपनी यह इच्छा ज़ाहिर की कि अगर उसने लिखी हो तो मैं उन्हें भी प्रकाशित करंना चाहूंगा. वो विद्यार्थी वाकई बहुत महान था! बोला: “सर! अभी तो यह एक ही लिखी है! जब और खयाल आएंगे तो और लिखूंगा!” मैं उस महान विद्यार्थी और बड़े शायर के सामने नत मस्तक होने के सिवा और कर भी क्या सकता था? हां, इतना और बताता चलूं कि मैं कई बरस उस कॉलेज में रहा, और शायद फिर कभी उस विद्यार्थी को वैसे महान खयाल नहीं आए!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 13 मई 2014 को छात्रों से सीखी ट्रिक्स ऑफ द ट्रेड शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख.         

Tuesday, May 6, 2014

जब ज़िंदगी इतनी इंस्टैण्ट नहीं थी!

कुछ सुविधाओं और चीज़ों के हम इतने अधिक अभ्यस्त हो जाते  हैं कि यह खयाल तक नहीं आता कि जब ये हमें सुलभ नहीं थी तब हमारी ज़िंदगी कैसे चलती थी, और वो ज़िंदगी बेहतर थी या बदतर थी!  अब दूर संचार को ही लीजिए. अब मोबाइल हमारी ज़िंदगी से इतना एकाकार हो चुका है कि इसके बिना हम अपने आप को अधूरा समझने  लगे हैं. अगर आप किसी बस या ट्रेन में सफ़र कर रहे हों और कोई स्टेशन आने वाला हो, तब का मंज़र याद कीजिए. मोबाइल की घण्टियां (बल्कि किसम किस्म की रिंग टोन्स) आपको चेता देती हैं कि अब कोई स्टेशन आने वाला है. या तो आपका हम सफर अपने किसी मित्र-परिजन को बता रहा होता है कि उसकी मंज़िल आने ही वाली है या फिर वो प्रतीक्षारत अपने किसी परिजन को अपने जल्दी ही पहुंचने का सुसमाचार दे रहा होता है.

लेकिन बहुत पुरानी बात नहीं है जब हम सब इस सुविधा के बिना भी जी रहे थे. और न सिर्फ जी रहे थे, मज़ेदार अनुभव भी कर रहे थे. मैं एक कस्बाई  कॉलेज में हिंदी पढ़ाता था.  मेरे कॉलेज का हिंदी विभाग बहुत सक्रिय था. हम लोग अक्सर कोई न कोई आयोजन करते रहते थे. प्रांत का हिंदी का शायद ही कोई बड़ा लेखक हो जिसका सान्निध्य उन दिनों हमारे विभाग को न मिला हो. तो हुआ यह कि हमने पास के एक बड़े शहर के एक नामी रचनाकार को अपने यहां काव्य पाठ और व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया. वो चिट्ठियों के आदान-प्रदान वाला ज़माना था. टेलीफोन धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था और मोबाइल की तो कोई पदचाप भी सुनाई नहीं दे रही थी. चिट्ठियों के आदान प्रदान से उनका कार्यक्रम तै हो गया. कस्बा छोटा था, होटल संस्कृति तब चलन में नहीं थी. तय किया गया कि उन्हें बस से उतार कर साथियों में से किसी के घर ले जाएंगे ताकि वे फ्रेशहोना चाहें तो हो लें, फिर कॉलेज ले जाकर उनका कार्यक्रम करा लेंगे और उसके बाद किसी के घर पर सब लोग एक साथ भोजन करेंगे और उसके बाद उन्हें उनकी सुविधानुसार किसी बस में बिठा कर विदा कर देंगे.

बस स्टैण्ड दूर था, उससे पहले एक चौराहा था जहां ज़्यादातर सवारियां उतरती थी, और वो चौराहा हमारे उस साथी के घर (और कॉलेज)  के भी निकट था, जहां उन्हें पहले ले जाना तै हुआ था. हम चार साथी उस चौराहे पर खड़े हो गए कि बस आएगी तब अपने अतिथि को वहीं उतार लेंगे. एक-एक करके तीन बसें वहां से गुज़र गईं, लेकिन हमारे अतिथि नज़र नहीं आए. उनके पहुंचने का सम्भावित समय भी बीत चुका  था. सोचा किसी मज़बूरी के चलते वे नहीं आ पाए हैं. निराश मन कॉलेज गए, कार्यक्रम स्थगित किया और अपने इतर कामों में व्यस्त हो गए.

तीसरे दिन डाक से उन साहित्यकार महोदय का पत्र आया. बहुत संयत भाषा में, लेकिन शब्दों के पीछे से उनकी नाराज़गी झांक रही थी. पत्र उन्होंने शायद लिखा भी अपनी नाराज़गी के इज़हार के लिए ही था. जो कुछ उन्होंने लिखा उसका सार यह था कि जिस बस से उन्होंने आने की सूचना दी थी, उस बस से वे हमारे कस्बे में पहुंचे, बस स्टैण्ड पर जब बस रुकी तो खिड़की में से झांक कर देखा कि वहां हममें से कोई है या नहीं! उन्हें हममें से कोई वहां दिखाई नहीं दिया. वे बस से उतरे, और क्योंकि उसी वक़्त एक बस वापस उनके बड़े शहर जाने को तैयार खड़ी थी, उसमें बैठ कर वे अपने शहर लौट गए. उन्होंने हमसे कोई शिकायत नहीं की. यह उनका बड़प्पन था.

आज पीछे मुड़कर इस घटना को याद करता हूं तो उनकी खुद्दारी के प्रति माथा झुक जाता है. उन्हें लगा होगा कि जिन लोगों में इतनी भी तमीज़ नहीं है कि अपने मेहमान के स्वागत के लिए पहुंचें, उनके यहां क्या जाना! बेशक, इसमें हमारी कोई ग़लती नहीं थी. बसों की भीड़भाड़ में और लोगों के चढ़ने-उतरने की आपाधापी में न उन्होंने हमें देखा और न हमने उन्हें! लेकिन उन्होंने अपने पत्र में एक भी कठोर शब्द नहीं लिखा. यह कोई मामूली बात नहीं है. लेकिन अगर आज की तरह  मोबाइल चलन में होता तो निश्चय ही यह घटना घटित नहीं हुई होती. थोड़ी-सी देर उनका इंतज़ार  करने के बाद हम लोग जाने कितनी दफ़ा उनके मोबाइल को ज़हमत दे चुके होते! और इसके बावज़ूद भी अगर कोई चूक हो गई होती, और उसके बाद उनसे बात हुई होती तो शायद उन्होंने भी हमसे अपनी नाराज़गी व्यक्त की होती, और हमने भी कुछ न कुछ ज़रूर कहा होता  जिससे बदमज़गी पैदा हुई होती.  सोच-समझकर अपने आप को व्यक्त करने की जो सुविधा चिट्ठी में है वो भला मोबाइल की तात्कालिकता में कहां? अपनी तात्कालिकता में मोबाइल पर तो हम उनसे नाराज़ हुए होते और वे हमसे! लेकिन अपने घर पहुंच कर चिट्ठी लिखते हुए वे अपनी नाराज़गी पर काबू पा चुके होंगे.
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में दिनांक 06 मई, 2014 को मेरे साप्ताहिक  कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  के अंतर्गत 'तब ज़िंदगी इतनी इंस्टैण्ट नहीं थी' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 


Tuesday, April 29, 2014

एक सच्चे पुस्तक प्रेमी को नमन!

इस सप्ताह मुझे एक विलक्षण व्यक्तित्व और उनके प्रेरणादायी कृतित्व के बारे में जानने का मौका मिला. मैं उनसे इतना अधिक प्रभावित हुआ हूं कि इस सप्ताह का अपना यह कॉलम उन्हीं की स्मृति को समर्पित कर रहा हूं.

मुझे जयपुर लाइब्रेरी एण्ड इंफोर्मेशन सोसाइटी ने विश्व पुस्तक दिवास और किन्हीं स्वर्गीय मास्टर मोती लाल जी संघी की 139 वीं जयंती पर उनके द्वारा स्थापित श्री सन्मति पुस्तकालय में ‘पुस्तकों और सूचना स्रोतों के बदलते स्वरूप’ पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था. मैं स्वीकार करता हूं कि इस आयोजन में जाने से पहले मुझे स्व. मास्टर जी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन वहां उनके बारे में जो जानकारी मुझे मिली, और फिर वहां से मिली पाठ्य सामग्री से उनके बारे में जो कुछ मैंने जाना, उसे आपसे साझा करना बहुत ज़रूरी लग रहा है.

मोती लाल जी का जन्म 25 अप्रेल 1876 को चौमू के एक सामान्य परिवार में हुआ था. छठी कक्षा तक की पढ़ाई करने के बाद वे जयपुर आ गए और यहां से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और फिर इण्टरमीजिएट तक पढ़े. अपनी पढ़ाई अधबीच में छोड़ पहले तो उन्होंने जीवन निर्वाह के लिए ट्यूशनें कीं और फिर कई स्कूलों में नौकरियां कीं. साठ साल की उम्र पूरी करने पर 30 साल की सरकारी नौकरी पूरी करने के बाद जब वे रिटायर हुए तो उनकी पेंशन बीस रुपये प्रतिमाह थी.

अपनी नौकरी के दौरान ही गणित विषय के इन  मास्टर साहब को पुस्तकों से प्यार हो गया था और वे हर महीने कम से कम दस रुपये किताबों पर खर्च करने लगे थे. बहुत जल्दी उनके पास किताबों का एक अच्छा खासा संग्रह हो गया और उससे उन्होंने 1920 में अपने घर के पास सन्मति पुस्तकालय की स्थापना कर दी. अपनी नौकरी से बचे वक़्त में वे अपने दोस्तों और परिचितों के घर अपने पुस्तकालय की पुस्तकें लेकर जाते और उनसे उन्हें पढ़ने का अनुरोध करते. एक निश्चित समय के बाद वे उनके पास पहले दी गई किताब वापस लेने और नई किताब देने जाते. इस बीच अगर कोई वह किताब न पढ़ पाता तो वे उसे पढ़ने के लिए प्रेरित भी करते.

अपने रिटायरमेण्ट के बाद तो वे पूरी तरह से इस पुस्तकालय के ही होकर रह गए. उनका सारा समय पुस्तकालय में ही गुज़रता,  सिर्फ भोजन करने ही अपने घर जाते. संसाधनों का अभाव था, इसलिए इस पुस्तकालय के पितु मातु सहायक स्वामी सखा सब कुछ वे ही थे. वे ही बाज़ार  जाकर किताबें खरीदते, उनको रजिस्टर में दर्ज़ करते, उनपर कवर चढ़ाते, पाठकों को इश्यू करते, और लौटी हुई किताबों को जमा करते. अगर ज़रूरत होती तो पाठक के घर किताब पहुंचाने में भी वे संकोच  नहीं करते.

उनके पास जितने साधन थे उनके अनुसार वे नई किताबें खरीदते और पाठकों को सुलभ कराते. अगर ज़रूरत पड़ती तो किसी किताब की सौ तक प्रतियां भी वे खरीदते ताकि पाठकों की मांग की पूर्ति हो सके. उनके जीवन काल में इस पुस्तकालय में तीस हज़ार किताबें हो गई थीं. पुस्तकालय के संचालन के बारे में उनका अपना मौलिक और व्यावहारिक सोच था. नियम कम से कम थे. सदस्यों से न कोई प्रवेश शुल्क लिया जाता, न कोई मासिक या वार्षिक शुल्क, यहां तक कि कोई सुरक्षा राशि भी नहीं ली जाती थी. कोई पाठक जितनी चाहे किताबें इश्यू करवा सकता था. और जैसे इतना ही काफी न हो, किताब कितने दिनों के लिए इश्यू की जाएगी, इसकी भी कोई सीमा नहीं थी. उन्हें किसी अजनबी और ग़ैर सदस्य को भी किताब देने में कोई संकोच नहीं होता था. आपको किताब पढ़नी है तो रजिस्टर में अपना नाम पता लिखवा दीजिए और किताब ले जाइये! मास्टर मोती लाल जी का निधन 1949 में हुआ. लेकिन उनका बनाया श्री सन्मति पुस्तकालय अब भी उसी शान और उसी सेवा भाव से पुस्तक प्रेमियों की सेवा कर रहा है.

निश्चय ही आज के सन्मति पुस्तकालय के पीछे राज्य सरकार का वरद हस्त है और मास्टर साहब के प्रशंसक दानियों की उदारता का भी इसमें काफी बड़ा योगदान है. पुस्तकालय एक बड़े पाठक समुदाय  की निस्वार्थ सेवा कर रहा है. समय के अनुसार इसने अपनी सेवाओं में काफी बदलाव और परिष्कार भी किया है.  लेकिन मैं तो यहां मास्टर साहब और उनके जज़्बे को सलाम करना चाहता हूं. कहने की ज़रूरत नहीं कि जिस हिन्दी पट्टी में हम पुस्तक संस्कृति के अभाव का रुदन करते नहीं थकते हैं उसी पट्टी के बीच में रहकर, अपने अत्यल्प साधनों के बल पर उस सामान्य व्यक्ति ने जो कुछ कर दिखाया वह हमें न केवल आश्वस्त करता है, प्रेरित भी करता है कि अगर हम भी ठान लें तो अपने परिवेश को बदल  सकते हैं.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में मंगलवार दिनांक 29 अप्रेल, 2014 को 'आधी कमाई से किताबें खरीद बनाया पुस्तकालय' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ! 

Tuesday, April 22, 2014

क़िस्सा एक अति उत्साही शायर का

आज आपसे एक पुराना अनुभव साझा कर रहा हूं.  बात काफी पुरानी है. मैं एक कस्बाई कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक था और जैसा कि हिन्दी प्राध्यापकों के साथ आम तौर पर होता है, जहां भी कोई संयोजन वगैरह करना  होता, मुझे याद कर  लिया जाता था. उस कस्बे में हर बरस शिक्षक दिवस और कौमी एकता दिवस  पर जन सम्पर्क विभाग एक छोटी-मोटी कवि गोष्ठी  आयोजित करता था, जिसे सम्मानपूर्वक कवि सम्मेलन कहकर पुकारा जाता था. कस्बे के और आस-पास के तमाम नवोदित, उभरते हुए, स्थापित और वरिष्ठ कवि-शायर वगैरह इनमें शिरकत करते. वो ज़माना टेलीविज़न के आने से पहले का था और उस छोटे कस्बे  में लोगों के पास मनोरंजन के दूसरे कोई खास विकल्प भी नहीं थे इसलिए श्रोता भी काफी  जुट जाते थे. अब कह सकता हूं कि अगर तीस  कवि-शायर इनमें सहभागिता करते तो उनमें से दो-तीन ही स्तरीय होते, शेष तो बस होते थे!

उस साल भी,  पिछले कई सालों की तरह शिक्षक दिवस पर कवि गोष्ठी का संचालन करने का दायित्व मुझे ही दिया गया था. कुछ कवि-शायरों से मैंने अनुरोध किया था कि वे अपनी रचनाएं सुनाएं, और बहुतों ने मुझसे अनुरोध किया था कि वे भी अपनी रचना सुनाना चाहते हैं. इस तरह रचना पाठ करने वालों की काफी बड़ी लिस्ट हो गई थी. छोटे कस्बों की परम्परानुसार मां सरस्वती की तस्वीर के आगे दीप प्रज्ज्वलन और मुख्य अतिथि की शान में कसीदे वगैरह पढ़ने के बाद गोष्ठी शुरु हुई. उस दिन मुख्य अतिथि को फूलों की माला नहीं पहनाई जा सकी, क्योंकि बाज़ार  में उस दिन ढूंढे से भी फूल माला नहीं मिल सकी थी. उसकी बजाय उन्हें रेशम की वो चमकीली माला पहना कर काम चलाया गया, जो आम तौर पर देवताओं की तस्वीर पर लटकाने के काम  आती है. मुख्य अतिथि जी ने उस माला को देखकर नाक भौं भी सिकोड़ी थी,  जिस पर कार्यक्रम प्रभारी स्थानीय जन सम्पर्क अधिकारी  ने उनके कान में सफाई देते हुए क्षमा याचना भी कर ली थी. 

गोष्ठी ठीक ही चल रही थी. मैं एक-एक करके कवियों-शायरों को बुलाता जा रहा था. पहले मैं कवि का नाम पुकारता, उनका संक्षिप्त परिचय देता और फिर उनसे रचना पाठ का आग्रह करता. अगर श्रोताओं को उनकी रचनाएं ज़्यादा पसन्द आतीं और वे उनसे और सुनाने  की फरमाईश करते तो मैं भी उनसे एक और रचना सुनाने का अनुरोध  कर देता, जिसे वे सहर्ष स्वीकार करते अन्यथा मैं उनकी पठित रचनाओं पर एक संक्षिप्त रस्मी प्रशंसात्मक टिप्पणी करते हुए अगले कवि का नाम पुकार लेता. 

इस बार अपनी लिस्ट में से मैंने एक नए शायर को पुकारा. मैंने उन्हें पहले कभी नहीं सुना था, हालांकि वैसे मैं उन्हें जानता था क्योंकि  उस छोटे कस्बे में सभी सबको जानते थे. वे मंच पर आए और उस ज़माने के एक लोकप्रिय फिल्मी गाने ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए’ की धुन पर कोई तुकबन्दी जैसी चीज़ उन्होंने पढ़ी. उनकी वो रचना  ख़त्म होती, उससे पहले अचानक सामने से एक नौजवान दौड़ता हुआ आया और उनके गले में ताज़ा गुलाब के फूलों की एक माला डाल कर लौट गया. श्रोताओं के एक समूह ने उनसे एक और रचना सुनाने का आग्रह किया और उन्होंने बिना संयोजक की तरफ देखे, फौरन अपनी दूसरी रचना जो शायद उससे भी बुरी थी, सुनाना शुरु कर दिया. इस रचना  पाठ के दौरान उसी तरह चार बार और उनको मालाएं पहनाई गईं.  मुख्य अतिथि जी कुपित निगाहों से पी आर ओ साहब को देख रहे थे और उनकी आंखें कह रही थीं कि तुम तो कह रहे थे कि फूलों की मालाएं नहीं मिलीं, फिर ये कहां से आ गईं? उधर मैं उन कूड़ा रचनाओं से तंग आ रहा था. लेकिन श्रोताओं के समने कोई तमाशा न करना मेरी विवशता थी. जैसे ही उन शायर महोदय ने अपनी दूसरी रचना ख़त्म की, मैंने ज़रा भी मोहलत दिए बग़ैर, एकदम से उनको धन्यवाद देकर वह प्रकरण ख़त्म करना चाहा, लेकिन उनके चाहने वाले पुरज़ोर अन्दाज़ में ‘वंस मोर’ ‘वंस मोर’ चिल्लाने लगे. बात को सम्हालने  की गरज़ से मैंने श्रोताओं  से कहा कि मैं उनकी गुणग्राहकता का आदर करता हूं और यह विश्वास दिलाता हूं कि गोष्ठी के अगले दौर में इन शायर महोदय से आपको और भी रचनाएं  सुनवाऊंगा, लेकिन अभी तो आप हमारी गोष्ठी के अगले कवि जी को सुनिये. और जैसे-तैसे करके वो गोष्ठी ख़त्म हुई.

मुझे बाद में पता चला कि उन शायर महोदय का अपने चाहने वालों से इस बात पर काफी झगड़ा हुआ कि उन्होंने पैसे तो दस मालाओं दिये थे लेकिन पांच ही मालाएं क्यों पहनाई गईं! उधर, चाहने वालों का कहना था कि उन्होंने कुछ मालाएं उनकी तीसरी रचना के लिए बचा कर रखी थी, लेकिन उनके प्रयोग का मौका ही नहीं आया.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में  मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 22 अप्रेल, 2014 को फूलों की माला और वंस मोर की तुकबन्दी शीर्षक से प्रकाशित मनोरंजक संस्मरण का मूल पाठ. 

Wednesday, April 16, 2014

आंखों देखी बनाम कानों सुनी


अभी कल ही हैदराबाद से एक बहुत पुराने मित्र का बड़ा आत्मीयता भरा पत्र आया. उन्होंने एक अखबार की कतरन संलग्न करते हुए लिखा कि वे शीर्षक देख कर इस ‘आंखों देखी’ नामक फिल्म को देखने गए, लेकिन निराश हुए. निराश होने की वजह यह थी कि शीर्षक से उन्हें लगा था कि यह फिल्म मेरी इसी से मिलते-जुलते शीर्षक (आंखन देखी) वाली किताब पर आधारित होगी, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था. वैसे यह फिल्म ‘आंखों देखी’ इधर की सबसे ज़्यादा चर्चित और प्रशंसित फिल्मों में से एक है. फिल्म की प्रशंसा देश में ही नहीं विदेश में भी हुई है. इसे साउथ एशियन इण्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फीचर फिल्म का ऑडिएंस अवार्ड भी मिला है और अब इसे 12 वें एनुअल इंडियन फिल्म फेस्टिवल ऑफ लॉस एंजेलिस (आईएफएफएलए) के अंतर्गत लॉस एंजेलिस में भी दिखाया जाएगा.

फिल्म की कहानी बड़ी रोचक है. पुरानी दिल्ली की एक संकड़ी गली के दो कमरों और एक दालान वाले छोटे-से मकान में पचास पार के बाऊजी अपने भरे-पूरे परिवार के साथ रहते हैं. जगह कम है लेकिन परिवार खुश है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि बाऊजी एक दिन अचानक यह तै कर लेते हैं कि वो सिर्फ उसी बात पर यकीन करेंगे जो उन्होंने अपनी आंखों से देखी होगी. और इसके बाद उनकी ज़िंदगी दुश्वार होने लगती है. वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भारत का प्रधान मंत्री कौन है, वे यह मानने को तैयार नहीं है कि आज कौन-सा वार है, वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि पृथ्वी गोल है, क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वे किसी गोले पर चलें तो गिर पड़ेंगे. वे यह भी मानने को तैयार नहीं हैं कि शेर दहाड़ता है, क्योंकि उन्होंने उसे कभी दहाड़ते हुए नहीं सुना है. वे अपनी ट्रेवल एजेण्ट की नौकरी छोड़ देते हैं क्योंकि वे किसी को एम्सटर्डम यात्रा का प्लान इसलिए नहीं बेच पाते हैं कि वे खुद कभी वहां नहीं गए हैं. उनका परिवार उनसे तंग आने लगता है. उधर उनका छोटा भाई ऋषि जिसे वे बेहद चाहते हैं, सपरिवार उनका घर छोड़ कर दूसरी जगह रहने चल जाता है. इस बात से बाऊजी बहुत आहत होते हैं और बीमार पड़ जाते हैं. जब उनकी पत्नी यह कहती है कि उनकी असली बीमारी तो यह है कि वे बोलते बहुत ज़्यादा हैं, तो वे बोलना भी बंद कर देते हैं. लेकिन इससे उन्हें लगता है कि वे चीज़ों पर ज़्यादा अच्छी तरह ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं.

और इसी के साथ, कुछ लोगों को यह भी लगता है कि उनकी बात में दम है, और वे एक पहुंचे हुए इंसान हैं. वे उनके अनुयायी बन जाते हैं. फिल्म में काफी कुछ घटित होता है. उस सबकी चर्चा यहां अनावश्यक है.
मैं तो यह सोच रहा हूं कि अगर हम सब भी अपनी ज़िंदगी का मूल मंत्र इस बात को बना लें कि जो अपनी आंखों से देखेंगे उसी पर विश्वास करेंगे तो क्या होगा? क्या ऐसी कोई ज़िद करने से ज़िंदगी सहज स्वाभाविक रूप से चल सकती है? कल्पना कीजिए कि कोई आपसे पूछे कि आपके पिता कौन थे, तो आप क्या जवाब देंगे? अगर आपकी यह ज़िद आपके स्कूली जीवन में ही शुरु हो जाए तो आपकी पढ़ाई का क्या होगा? इतिहास में तो आप कभी पास हो ही नहीं सकेंगे. आपने न अकबर को देखा है न अशोक को! कमोबेश भूगोल का भी यही हाल होगा. जब इस फिल्म के बाऊजी ही पृथ्वी को गोल नहीं मानते हैं तो आप भला क्यों मानने लगे?

मज़ेदार हालात तो चुनाव के दौरान पैदा होंगे. कल्पना कीजिए कि तमाम लोग इस बात का निर्वाह कर रहे हैं जो उन्होंने अपनी आंखों से देखा है वही कहेंगे और उसी पर भरोसा करेंगे, तो हमारे चुनावों के सबसे बड़े मुद्दों में से एक, भ्रष्टाचार तो जड़-मूल से ही ख़त्म हो जाएगा. आखिर किसने किसका भ्रष्टाचार देखा है? मैं तो सोच-सोचकर हैरान और हलकान हूं कि अगर ऐसा हो जाए तो चुनाव लड़ा किन बातों पर जाएगा? इस बात पर कि दो उम्मीदवारों में से कौन ज़्यादा गोरा या कौन ज़्यादा फिट है? हो सकता है तब दो या दो से ज़्यादा उम्मीदवारों के बीच खाने-पीने की या कुश्ती की प्रतियोगिता रखी जाए और इन्हीं आधारों पर उनकी जीत-हार घोषित की जाए! वैसे, अगर ऐसा हो जाए तो बुरा भी क्या है? आज चुनावों में जो कटुता, कर्कशता, भोण्डापन, भद्दापन, बदमज़गी बढ़ते जा रहे हैं, उनसे तो निज़ात मिलेगी!

आपका क्या ख़याल है?
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 15 अप्रेल, 2014 को जब ज़िद ने कर दिया जीना दुश्वार शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.

Tuesday, April 8, 2014

जो आपकी फिक्र करते हैं उन्हें हमारा सलाम!

जयपुर ट्रैफिक पुलिस ने फेस बुक पर एक छोटी-सी वीडियो क्लिप ज़ारी की है. यह  क्लिप कहती है कि सड़क पार करने के दो तरीके होते हैं. और फिर यह  उन दो तरीकों के नमूने पेश करती है.  मात्र एक मिनिट नौ सेकण्ड की इस क्लिप में पहले एक नौजवान जयपुर के भारी ट्रैफिक के बीच अपनी बाइक पर आड़े तिरछे कट मारता हुआ सड़क पार करता है. इस तरह के जां बाजों से हम रोज़ रू-बरू होते हैं!  लेकिन जयपुर ट्रैफिक पुलिस ने इस तरह के बहादुरों की शान में यह वीडियो क्लिप जारी नहीं की है. जिनकी शान में यह क्लिप जारी की गई है उनका प्रवेश थोड़ी देर से  होता है. ये भी चार पैर वाले हैं. पहले जो वीर आए थे दो पैर उनके थे और दो उनकी बाइक के. अब इस क्लिप में जो आते हैं, चारों पैर उनके अपने हैं. नहीं समझे ना आप? जयपुर ट्रैफिक के इस नायक को हम श्वान उर्फ कुत्ते जी के नाम से जानते हैं. ये सड़क पर आते हैं, दांये-बांये देखते हैं, लाल बत्ती होने और ट्रैफिक रुकने का इंतज़ार करते हैं, फिर सावधानी  से आधी सड़क पार करते हैं, ट्रैफिक  के लिए लाइट हरी हो जाने पर ऐन चौराहे पर रुकते हैं, लाइट लाल होने का इंतज़ार  करते हैं और फिर जब लाइट लाल हो जाती है तो बची हुई आधी सड़क पार करते हैं.

इस  क्लिप में जो नौजवान है उसकी बाइक सामने से आती एक कार से टकराती है  और जिस तरह वो और उनकी बाइक उछलते हैं उससे आशंका होती है कि बाद में उनके साथ ज़रूर कुछ अघटनीय घटित हुआ होगा. हमारे यहां एक मुहावरा है ना कि कुत्ते की मौत मरना!....लेकिन इस क्लिप में जो कुत्ता है वो सुरक्षा से सड़क पार कर जाता  है और उसके साथ कुछ भी अप्रिय घटित नहीं होता है.

इस वीडियो को देखकर मुझे कई सबक मिले हैं. पहला सबक तो यह है कि अगर आप कुत्ते की मौत न मरना चाहें तो कुत्ते की तरह सड़क पार करें! दूसरा यह कि बहादुरी से सड़क इंसान ही पार कर सकता है, कुत्ता तो भीषण डरपोक प्राणी है. ऐसा जीना भी क्या जीना, लल्लू! तीसरा यह कि अगर ग़ालिब आज होते तो इस वीडियो को देखकर ज़रूर लिखते  – आदमी से बेहतर है कुत्ता बनना.... क्योंकि इसमें मिलती हैं लाइक्स ज़्यादा!

जबसे यह वीडियो देखा है, मैं गहरे विचार में डूबा हूं! आखिर जयपुर ट्रैफिक पुलिस को हमें शिक्षा देने के लिए तमाम प्राणियों में से यह श्वान ही क्यों मिला? चाहते तो हाथी को भी ले सकते थे. आपको पता ही होगा कि संस्कृत कवियों ने गज गामिनियों की शान में कितने कसीदे पढ़े हैं! अगर आपने संस्कृत राम: रामौ रामा:  से आगे न भी पढ़ी हो तो उन  विख्यात चित्रकार के बारे में तो ज़रूर पढ़ा सुना होगा जो कभी माधुरी दीक्षित पर मर मिटे थे. उन्होंने गज गामिनी नाम से एक पूरी फिल्म ही बना डाली थी! चलो, हमारी ट्रैफिक पुलिस को हाथी पसंद नहीं आया तो कोई बात नहीं! वे जंगल के राजा को ले सकते थे! अगर उन्होंने शेर को फिल्म में लेकर हमें सीख दी होती तो हम गर्व से यह तो कहते कि भाई हम शेर की तरह सड़क पार करते  हैं!  लेकिन गर्व करने का यह मौका भी उन्होंने हमसे छीन लिया. इन्होंने आदर्श बनाया भी तो उस प्राणी को जिसे प्राय: एक प्राकृतिक कृत्य के संदर्भ में दीवारों पर अमर किया जाता रहा है: देखो! अमुक यह कर रहा है! क्या अब लज्जित करने के लिए उसी तर्ज़ पर यह कहा जाएगा कि देखो आदमी सड़क पार कर रहा है?

अब आप ही बताएं कि एक श्वान को हम अपना आदर्श कैसे मान लें? क्या लोगों से जाकर यह कहें कि इंसान की तरह ज़िंदा रहने के लिए हम कुत्ते की तरह सड़क पार करते हैं? कुत्ते की तरह सड़क पार करके ज़िंदा रहने से क्या कुत्ते की मौत मर जाना बेहतर नहीं होगा? और जीकर भी क्या होगा? अगर ज़िंदा रह भी गए तो कोई यमला पगला दीवाना आकर हमारा खून ही तो पियेगा! साथ में एक दो गालियां और देगा!

लेकिन मित्रों यह सब बैठे ठाले का चिंतन था. कभी-कभार दिमाग में ख़लल आ जाता है ना! सच तो यह है कि जयपुर ट्रैफिक पुलिस की यह वीडियो हमें बेहद पसंद आई है और  हम चाहते हैं कि हर नागरिक न सिर्फ इसे देखे, बल्कि इससे सबक भी ले! इंसान की ज़िंदगी बहुत कीमती है, हमें कोई हक़ नहीं है कि हम उसे नष्ट करें! अगर जयपुर ट्रैफिक पुलिस हमारी ज़िंदगी को लेकर इतनी फिक्रमंद है तो हम उनके सोच को सलाम करते हैं!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 08 अप्रेल, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, April 1, 2014

कई रस हैं बनारस में

जबसे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने अपना 2014 का लोकसभा का चुनाव बनारस से लड़ने की घोषणा की है,  देश के प्राचीनतम और पवित्रम नगरों में से एक यह नगर एक बार फिर से दुनिया भर के मीडिया के आकर्षण का केंद्र बन गया है. लेकिन ऐसा नहीं है कि काशी और वाराणसी  के नामों से भी जाना जाने वाला यह शहर इससे पहले कम महत्वपूर्ण था. बल्कि सच तो यह है कि राजनीति के गर्दो-गुबार ने इस शहर के समृद्ध  अतीत को थोड़ा धूमिल ही किया है. और इसी से याद आता है कि यह नगर नई कविता के बहुत महत्वपूर्ण कवि धूमिल का भी था. जी हां, वे ही धूमिल जिनके कविता संग्रह  संसद से सड़क तक के बगैर आधुनिक हिंदी कविता की कोई तस्वीर बनती ही नहीं है.  बीट जनरेशन के अमरीकी यहूदी  कवि एलेन गिंसबर्ग ने इसी शहर में रहकर अपना महत्वपूर्ण सृजन किया और साठ के दशक में यह शहर दुनिया भर के हिप्पियों वगैरह के आकर्षण का केंद्र बना रहा. इस शहर का महत्व तो इतना ज़्यादा रहा है कि इसके नाम पर लोग अपने बच्चों के नाम रखते थे जैसे- बनारसी दास या काशीनाथ.

और बात जब साहित्य की आ ही गई है तो यह भी याद कर लेना चाहिए कि गोस्वामी तुलसीदास ने अपना रामचरितमानस इसी नगर में लिखा था और कबीर भी यहीं हुए थे. और ये ही क्यों, रविदास और कबीर के गुरु रामानंद भी तो यहीं के थे. हिंदी साहित्य के आधुनिक काल  की शुरुआत जिनसे होती है वे भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके लगभग समकालीन राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, जासूसी तिलस्मी उपन्यासों के सर्जक देवकीनंदन खत्री, महान आलोचक रामचंद्र शुक्ल, कथा सम्राट प्रेमचंद, कामायनीकार जयशंकर प्रसाद और हमारे समय के एक बहुत बड़े कथाकार-निबंधकार-आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, कथाकार  शिवप्रसाद सिंह और ललित निबंधकार विद्यानिवास मिश्र  उन महान साहित्यकारों में से कुछ हैं जो बनारस में हुए. 

बात अगर भारतीय शास्त्रीय संगीत की करें तो बनारस घराने के इस शहर ने पण्डित रवि शंकर और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसे भारत रत्नों  के अलावा  पण्डित ओंकारनाथ   ठाकुर, गिरिजादेवी, सिद्धेश्वरी देवी, अनोखे लाल, सामता प्रसाद उर्फ गुदई महाराज, कण्ठे  महाराज, राजन और साजन मिश्र, सितारा देवी, गोपीकृष्ण जैसे अनेक संगीत रत्न दिये हैं. कला प्रेमियों और इतिहास वेत्ताओं की जब भी याद आएगी, राय कृष्णदास और उनके सुयोग्य पुत्र आनंद कृष्ण के साथ-साथ बी एच यू परिसर में स्थित उनका भारत भवन याद आए बगैर नहीं रहेगा. और बी एच यू की बात करेंगे तो भला उसके निर्माता मदन मोहन मालवीय को कोई कैसे याद नहीं करेगा?

हिंदी फिल्मों और फिल्मकारों को भी इस शहर ने खूब आकर्षित किया है. अगर डॉन में अमिताभ बच्चन ने इसी शहर का पान खा कर अपनी अकल का ताला खोला तो खुल्लम खुल्ला में गोविंदा को अपनी नायिका के लिए यहां के पान की उपमा ही सबसे अच्छी लगी – ये लड़की नहीं ये बनारस का पान है. पान के अलावा, हमारे फिल्मकारों को जब भी ठगी की कोई कहानी पसंद आई तो उन्हें बनारस ही याद आया. बनारसी ठगों की कारगुज़ारियों पर आधारित 1968 की दिलीप कुमार-संजीव कुमार अभिनीत संघर्ष हो या बाद की बनारसी बाबू’, ‘बनारसी ठग या दो ठग– ये सब बनारस की एक  खास तरह की छवि सामने लाने वाली फिल्में रहीं. यमला पगला दीवाना- पार्ट 1 और पार्ट 2   के ठगों ने भी अपने उल्टे सीधे कामों के लिए बनारस की धरती को ही उपयुक्त पाया. लेकिन इधर के फिल्मकारों को इस शहर की याद प्रेम के संदर्भ में भी आने लगी  है. सुमधुर गाने बनारसिया वाली धनुष और सोनम की प्रेम कहानी रांझणा की कथा भूमि  बनारस ही है और थोड़ा समय पहले आई बनारस अ मिस्टिक लव स्टोरीऔर आने वाली इसक तेरा  के केंद्र में भी बनारस ही था और है. और हां, ‘राम तेरी गंगा मैली’, ‘लागा चुनरी में दागऔर विवादित फिल्म वॉटरकी नायिकाओं की दुर्दशा का भी कोई न कोई सम्बंध इसी शहर से जुड़ता है.

अब जबकि देश की तमाम चुनावी हलचलों के केंद्र में यह पवित्र नगर है, यह याद दिलाता चलूं कि इसी नगर के एक कथाकार शिव प्रसाद मिश्र रुद्रकाशिकेय ने अपने  एक उपन्यास बहती गंगामें  इस नगर के दो सौ बरसों के इतिहास को अनूठे अंदाज़ में समेटा है और इसी नगर के एक अन्य नामचीन कथाकार काशीनाथ सिंह  की किताब काशी का अस्सी अपने विलक्षण अंदाज़े बयां और इस  शहर को एक अलग नज़र से देखने और दिखाने के लिए चुनाव हो चुकने के बरसों बाद भी याद रखी जाएगी. फिलहाल तो देखना यह है कि क्या आने वाले चुनाव  उन हालात को थोड़ा भी बदल पाने में कामयाब होंगे, जिनसे क्षुब्ध होकर  कभी धूमिल को लिखना पड़ा था कि
क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है 
जिन्हें एक पहिया ढोता है 
या इसका कोई खास मतलब होता है?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 01 अप्रेल, 2014 को 'क्या गुल खिलाएगा 'धूमिल' का शहर बनारस'   शीर्षक से प्रकाशित आलेख  मूल पाठ.  

Tuesday, March 25, 2014

सलाम कीजिए...आली जनाब आए हैं!

कमलेश्वर के उपन्यास काली आंधीपर आधारित आंधी फिल्म में गुलज़ार साहब का लिखा हुआ एक गीत था: 'सलाम कीजिए..आली जनाब आए हैं. ये पाँच सालों का देने हिसाब आए हैं..'इन दिनों चारों तरफ़ इन्हीं  आली जनाबों की धूम है. लेकिन एक फर्क़ है. फर्क़ यह है कि आजकल आली जनाब अपने पांच सालों का हिसाब देने की बजाय दूसरों के पांच सालों का हिसाब मांगने में ज़्यादा रुचि लेते हैं. वैसे इससे कोई ज़्यादा फर्क़ नहीं पड़ता. ये लोग आपस में ही एक दूसरे को इतना बेपर्दा किए दे रहे हैं कि हिसाब देने न देने की कोई अहमियत नहीं रह गई है. इन सबके बारे में जान कर बेचारा मतदाता शायर खलिश बडौदरा की तरह सोच रहा है: ऐसे-वैसे कैसे-कैसे हो गए/ कैसे-कैसे ऐसे-वैसे हो गए! 

चुनाव के दिनों में जो कुछ भी होता है वो सब हो रहा है. जनता या देश की सेवा के लिए अपनी भूली-बिसरी ललक का यकायक याद आ जाना, टिकिटों  के लिए मारा-मारी, रूठना-मनाना, एक से दूसरे दल में आना-जाना, एक चुनाव क्षेत्र की भरपूर सेवा कर लेने के बाद दूसरे चुनाव क्षेत्र का रुख करना, कहीं टिकिट लेने के लिए तो कहीं टिकिट न लेने के लिए अजीबो-गरीब तर्क देना, अपनी कमीज़ को दूसरों की  कमीज़ से उजला बताना, अपने दागों को अच्छा साबित करना सब कुछ हो रहा है.

इनमें से हरेक अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त है, या कम से कम आश्वस्त होने का दिखावा  कर रहा है, ताकि माहौल  बना रहे. टिकिट मिल जाने के बाद अपने समर्थकों के साथ जुलूस में जाकर नामांकन पत्र  दाखिल किए जाएंगे और उसके बाद पूरी विनम्रता से मतदाता को एहसास कराया जाएगा कि पितु मातु सहायक स्वामी सखाजो भी हो तुम्हीं हो. तुम्हीं  मेरे मंदिर, तुम्हीं  देवता हो. कम से कम वोटिंग मशीन पर बटन दबाने तक तो हो ही. बाद की बाद में देखी जाएगी. फिर तुम कहां, हम कहां! ढूंढते रह जाओगे!

यह सब पिछले चुनावों में भी हुआ था, उससे पिछले में भी, उससे भी पिछले में भी, और इंशाअल्लाह आगे भी होता रहेगा. और इस सबके बीच हमारा जनतंत्र परिपक्व होता रहेगा, आगे बढ़ता रहेगा, मज़बूत होता रहेगा. हम सब भी इन  सबका भरपूर आनंद लेते हैं. जब हम लोग छोटे थे तब राजनीतिक दलों वाले बिल्ले वगैरह बांटा करते थे और हम बच्चे बड़ी हसरत भरी निगाहों से दाताओं को ताका करते थे. अब जीवन स्तर ऊंचा उठ गया है, उनका भी और हमारा भी. आज बच्चे, कम आय वालों की बस्तियों के बच्चे  तक,  बिल्लों जैसी तुच्छ  चीज़ों के लिए नहीं भागते हैं. निर्वाचन विभाग ने उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले खर्च की सीमा यों ही तो नहीं बढ़ाई है. चुनाव बहुत तेज़ी से हाई टेक हुए हैं. हाई टेक भी और हाई प्रोफाइल भी. अब उम्मीदवार मतदाता के दर पर आने की जहमत भी कम ही उठाते हैं. इसकी जगह बड़ी सभाओं, उनके लाइव टेलीकास्टों और सोशल मीडिया के भरपूर प्रयोग ने ले ली है. प्रचार के तरीके अधिक परिष्कृत और अधिक अप्रत्यक्ष होते जा रहे हैं. इन तमाम बातों का असर यह ज़रूर हो रहा है कि अब कम साधन सम्पन्न उम्मीदवार या दल के लिए चुनाव  जीतना तो दूर, लड़ना भी दुश्वार होता जा रहा है. बात सब आम की करते हैं, लेकिन होते ख़ास हैं. वो दिन हवा हुए जब लोग साइकिल पर घूम कर या ज़्यादा से ज़्यादा किसी जर्जर जीप पर सवार  होकर चुनाव जीत लिया करते थे. अब नेता तो  दूर रहा, कार्यकर्ता भी इन विनम्र  साधनों से काफी ऊपर उठ चुका है.

बदलाव पर आप चाहे जितना रोना-धोना कर लें, या शालीन भाषा में कहें तो विमर्श कर लें, वो होकर रहता है. उसे रोक पाना नामुमकिन होता है. लेकिन इन तमाम  बदलावों के बीच एक बात अभी भी जस की तस है, और वो है नेता और जनता का रिश्ता. आपने मरहूम अहमद फ़राज़ साहब की ये ग़ज़ल ज़रूर सुनी होगी. तमाम नामचीन गायकों ने इसे गाया है. एक दफ़ा फिर इस ग़ज़ल के चंद अशआरों को सुनिये और सुनते हुए महबूब की बजाय अपने लीडर का तसव्वुर कीजिए. शायद कुछ मज़ा आए:

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम[1] न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ 

अब तक दिले-ख़ुशफ़हम[2] को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने 
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ



[1] मेल-जोल
[2] शीघ्र बात समझ जाने वाला दिल
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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 25 मार्च, 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ!