Tuesday, October 22, 2013

महाभोज जारी आहे....

महाभोज जारी आहे...

चुनाव का बिगुल बज गया है. योद्धा अपने-अपने हथियार लेकर और जिरह बख्तर धारण कर युद्ध के लिए तैयार हो गए हैं. अभी वार्मिंग अप चल रहा है. असल युद्ध तो थोड़ा दूर है. पहले युद्ध होगा, फिर महायुद्ध. युद्ध बोले तो विधान सभा के चुनाव, और महायुद्ध बोले तो लोक सभा के चुनाव. वैसे आजकल यह युद्ध शब्द इतना लोकप्रिय हो चला है कि सब जगह युद्ध ही होता है. सुरों का युद्ध, शब्दों का युद्ध और यहां तक कि पकवान बनाने का भी युद्ध! ऐसे में चुनाव जो कि लड़ा जाता है, वो तो युद्ध है ही.  जब युद्ध होगा तो शोर-शराबा (यलगार हो!) भी होगा, खून-खराबा भी होगा और मार-काट भी होगी. तैयारियां जारी है. शोर-शराबा शुरु हो ही चुका है. शब्दों के तीर-तलवार-गोले-बम सब चल रहे हैं. आक्रमण  और प्रति आक्रमण जारी हैं. एक पक्ष दूसरे पर वार करता है तो दूसरा पक्ष पहले पर पलट वार करता है. एक पक्ष गरजता है, जवाब में दूसरा पक्ष बरसता है. रोज़ यह हो रहा है. रण भूमि हैं अख़बार और टेलीविज़न का पर्दा. एक पक्ष अपने शब्द बाण छोड़ता है तो हमें पता चल जाता है कि दूसरा पक्ष कितना पतित है, लेकिन दूसरे ही दिन जब दूसरा पक्ष अपने तरकश के तीर चलाकर  इस पक्ष के कपड़े तार-तार करता है तो हमें पता लगता है  कि कम तो यह पक्ष भी नहीं है. नागनाथ – सांपनाथ वाला मामला है.  और इन्हीं अधमों-पतितों-निकम्मों-नाकारों-बेगैरतों वगैरह में से किसी को हमें अपना बहुमूल्य वोट देना है. मुझे लगता है कि मतदान का दिन आते-आते तो हम अपने तमाम उम्मीदवारों के बारे में, उनके प्रतिपक्षियों की कृपा से,  इतना ज़्यादा जान जाएंगे कि बजाय किसी को वोट देने के नोटा (उपर्युक्त में से कोई नहीं) के विकल्प का प्रयोग  करना ही ज़्यादा सही लगेगा.

लेकिन क्या यह नोटा का विकल्प स्थिति में कोई बदलाव लाएगा? क्या आपके-मेरे और अपन जैसे बहुत सारों के ‘इनमें से कोई नहीं’ विकल्प को चुन लेने से इनमें से किसी एक का चुना जाना रुक जाएगा? कोई न कोई चुना तो फिर भी जाएगा! बस इतना-सा फर्क़ पड़ेगा कि चुनाव के बाद आने वाली खबरों में एक इबारत और जुड़ जाएगी, कि इतने प्रतिशत मतदाताओं ने इनमें से किसी को भी योग्य नहीं पाया! यानि किसी को न चुनने से तो किसी ऐसे  उम्मीदवार को जो हमारे मानदण्डों पर सबसे ज़्यादा खरा साबित हो रहा हो, चुनना ही बेहतर होगा.

अभी के तमाम शोर-शराबे में मुझे बार-बार मन्नू भण्डारी का लोकप्रिय उपन्यास ‘महाभोज’  याद आ रहा है. सरोहा नामक एक गांव में एक दलित युवक बिसेसर की हत्या हो जाती है. इस मामूली आदमी की हत्या अचानक महत्वपूर्ण इसलिए हो जाती है कि डेढ महीने बाद ही वहां विधानसभा की एक खाली सीट के लिए उपचुनाव होना है. मैदान में एक तरफ दा साहब और उनके समर्थक हैं तो दूसरी तरफ सुकुल बाबू और उनके समर्थक. ये लोग किस निर्ममता से उस बेचारे बिसेसर की मौत को अपने लिए एक महाभोज में तब्दील  कर देते हैं यही इस उपन्यास का कथ्य है. आज जब अपने नेताओं की ज़बानी मैं यह सुनता हूं कि इस पक्ष ने यह नहीं किया और उस पक्ष ने वो नहीं किया, इसने ग़रीबी नहीं हटाई और उसने महंगाई कम नहीं की, इसने मस्जिद नहीं बचाई और उसने मन्दिर नहीं बनाया, तो मुझे यही एहसास होता है कि मैं, इस देश का आम नागरिक,  खेत में पड़ी एक लाश हूं और ऊपर आकाश में बहुत सारे गिद्ध मुझे अपना जीमण बनाने को मेरे सर के ऊपर मण्डरा रहे हैं! 


बस एक चुप-सी लगी है....

इन दिनों निर्वस्त्र करने का अभियान ज़ोरों पर है. पहले एक बाबा जी का नम्बर लगा, फिर उनके सपूत का. वो वो बातें सामने आईं कि दिल दहल गया. लेकिन जिस समय में हम रह रहे हैं उसमें सच और झूठ के बीच अंतर करना बहुत मुश्क़िल हो गया है. अगर बाबा जी पर आरोप लगाने वाले तमाम संचार माध्यमों पर अपनी बात कह रहे हैं  तो ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है जो इन तमाम आरोपों के मूल में किसी मां-बेटे का ‘हाथ’  देख रहे हैं. वैसे अपने देश में यह आम परम्परा है. जब भी किसी पर कोई आरोप लगता है,  मैं इंतज़ार करने लगता हूं कि अब कोई न कोई वीर पुरुष (या वीरांगना) आकर यह कहेगा/कहेगी कि यह सब अमुक का रचा हुआ षड़यंत्र है. और मुझे निराश नहीं होना पड़ता है. नेताओं और बाबाओं के बाद इस बार बहुत दिन बाद साहित्य के एक बाबा का भी नम्बर लगा. इन दिनों पत्र-पत्रिकाओं से ज़्यादा चहल-पहल फेसबुक और ट्विट्टर पर रहती है. तो पिछले दिनों इसी  सोशल मीडिया पर हिन्दी के एक जाने-माने कथाकार और स्त्री विमर्श के पुरोधा के बर्ताव को लेकर खूब हो-हल्ला हुआ. असल में हुआ यह कि एक युवा कथाकार ने एक लम्बा वक्तव्य जारी कर अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के सन्दर्भ में इस वरिष्ठ कथाकार की स्त्री-विषयक संवेदनहीनता को रेखांकित किया. फिर तो कढ़ी में उबाल आना ही था. एक अन्य चर्चित यात्रा वृत्तांतकार ने इस पूरे वृत्तांत को दूसरे एंगल से देखा-दिखाया और उसके बाद बहुत सारे शब्द वीर मैदान में कूद पड़े. साहित्य पीछे रह गया, चर्चा के केन्द्र में साहित्यकार, उनके शब्द और कर्म के बीच का अंतर, उनकी नैतिकता, उनका सामाजिक चिंतन  जैसे मुद्दे आ गए. वो-वो बारीक बातें की गईं कि अपने अनपढ़ होने का एहसास शिद्दत से होने लगा. इस सारे विमर्श की ख़ास बात यह रही कि युवा कथाकार ने तो विस्तार से अपनी बात कही, लेकिन वरिष्ठ कथाकार अब तक मौन व्रत धारण किए हैं. जब तक उनका पक्ष सामने नहीं आ जाता, तस्वीर धुंधली ही रहेगी. जिज्ञासु हंसों को नीर-क्षीर विवेक के लिए वरिष्ठ कथाकार की पत्रिका के अगले अंक का बेसब्री से इंतज़ार है.   


जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 22 अक्टोबर, 2013 को किंचित सम्पादित रूप में प्रकाशित टिप्पणियों का मूल रूप.  


Wednesday, October 16, 2013

और ज़रा-सी दे दे.....

और ज़रा-सी दे दे

बड़े विकट समय में जी रहे हैं हम लोग. ‘साईं इतना दीजिए जा में कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं साधु ना भूखा जाए’ वाला वो वक़्त बहुत पीछे छूट चुका है जब हमारी ज़रूरतें सीमित हुआ करती थीं और जितना हमारे पास होता था, उससे बहुत अधिक की चाह नहीं होती थी और इतना समय हमारे पास होता था कि अपनी ज़िन्दगी के प्याले का रस चख सकें.  अब सब कुछ बदल गया है. ‘थोड़ा है थोड़े  की ज़रूरत है’  सिर्फ एक फिल्मी गाने के बोल हैं, हमारे जीवन का मूल मंत्र नहीं.  ‘और ज़रा-सी दे दे साक़ी’ वाली हालत है हम सबकी.

अभी कल ही कुछ दोस्त सदी के महानायक की चर्चा कर रहे थे. किसी इण्टरव्यू में खुद उन्होंने बताया था कि उन्हें तनिक भी फुर्सत नहीं होती है. होगी भी कहां से? क्या-क्या नहीं करते हैं वे! फिल्में, टीवी, विज्ञापन और भी न जाने क्या-क्या! सीमेण्ट से लगाकर तेल और पेन बाम तक सब कुछ तो बेचते हैं वे. गुजरात भी. एक मित्र दुःखी होकर बोल पड़े, आखिर क्या करेंगे वे इतने पैसों का? हां, इन कामों में से ज़्यादातर तो वे पैसों के लिए ही करते हैं! अपनी अनेक बीमारियों और बढ़ती उम्र के बावज़ूद वे इतना कर लेते हैं, इस बात  की तारीफ की जाए या इसके लिए उनसे सहानुभूति व्यक्त की जाए?
  
उधर ये बातें हो रही थीं और इधर मेरे मन के पर्दे पर रूसी कथाकार टॉल्स्टाय की प्रसिद्ध  कहानी ‘एक व्यक्ति को कितनी ज़मीन चाहिए’ चल रही थी  जिसका भावानुवाद हमारे अपने जैनेन्द्र कुमार ने कितनी ज़मीन शीर्षक से किया था. इस कहानी का नायक पोखम नामक एक किसान है. एक रात वह सपना देखता है कि उसके राज्य में मुनादी हो रही है कि जो भी बिना श्रम किए धनी होना चाहता है, वह कल सबेरे मैदान में आयोजित प्रतियोगिता में भाग लेकर अपनी किस्मत आजमा सकता है.  दो तीन बहुत आसान शर्ते हैं.  प्रतियोगी सूर्योदय के पहले प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच जाए. सूर्य निकलते ही  उसे दौडऩा प्रारंभ करना होगा.  दिनभर दौड़कर वह जितनी जमीन को घेर लेगा, वह उसकी अपनी हो जाएगी, लेकिन सूर्यास्त के समय  उसे ठीक उसी स्थल तक पहुंचना होगा, जहां से उसने दौड़ प्रारंभ की थी. पोखम दौड़ता चला जाता है. पचास-साठ मील ज़मीन नाप लेता है लेकिन सूर्य के डूबते-डूबते जैसे ही वह लौट कर दौड़ शुरु होने वाली जगह पहुंचता है, उसकी सांसें थम जाती है. “किस्मत की खूबी देखिए टूटी कहां कमन्द दो-चार हाथ जबके लबे-बाम रह गया” से भी बुरी स्थिति. जितनी ज़मीन उसने नापी थी, वो सब अब उसके लिए बेमानी हो जाती है. उसके भाईबंद और पड़ोसी उसे दफनाने के लिए वहीं साढ़े तीन हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा एक गड्ढा खोदते हैं. उसे बस उतनी-सी ही ज़मीन की तो ज़रूरत थी!

सदी के महानायक तो खैर फिर भी मेहनत करते हैं और कमाते हैं, अपने चारों तरफ हम ऐसे ऐसे महापुरुषों  को देखते या उनके बारे में पढ़ते सुनते हैं जो तमाम ग़ैर कानूनी तरीकों से पैसा बटोरने में लगे हैं और जिनकी धन-लिप्सा का कोई ओर छोर नहीं है.  मैं अक्सर सोचता हूं कि वे इस धन का करेंगे क्या? क्या उन्हें कभी इसका आनंद लेने की फुर्सत भी मिलेगी या कि वे भी एक दिन  उस अभागे पोखम की तरह..... 
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चीयर्स!


सामाजिक मीडिया हमारे समय की एक नई प्रवृत्ति है. पहले लोग  प्रत्यक्ष मिला करते थे, अब वर्चुअल स्पेस में मिलते हैं. पहले हमें अपने सामाजिक वृत्त (सोशल सर्कल) पर गर्व होता था, अब हम इस बात पर गर्व करते हैं कि फेसबुक पर हमारे इतने दोस्त हैं और हमारी किसी टीप को इतने लाइक्स मिले हैं. कई लोग इस बदलाव पर बहुत दुःखी होते हैं – क्या से क्या हो गया!  लेकिन  मुझे इस बदलाव का कोई मलाल नहीं है. भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में, फैलते जा रहे शहरों में, ट्रैफिक की मारा-मारी में, भला पहले की तरह का मेल-मिलाप कैसे मुमकिन है? और अगर वो मुमकिन नहीं है तो उसका जैसा भी विकल्प है, उसका स्वागत क्यों न किया जाए! मुझे तो अच्छा लगता है जब मेरे जन्म दिन पर सौ दौ सौ चार सौ ‘मित्र’ मुझे मुबारक़बाद  देते हैं! जिन लोगों से मैं कभी भी नहीं मिला हूं, और शायद कभी मिलूंगा भी नहीं, वे अगर मेरे बारे में सोचते हैं और मेरी खुशी में इज़ाफा करने के लिए चन्द लमहे निकालते हैं तो मुझे खुश क्यों नहीं होना चाहिए? जब हालात तेज़ी से बदलते जा रहे हैं तब हम भी अपने तौर-तरीके क्यों ना बदलें! अंतत: दोस्तों, सारी बात आपके नज़रिये की है. आप चाहें तो गिलास को आधा खाली मान कर टसुए बहा लें और चाहें तो उसे आधा भरा हुआ मान कर सेलिब्रेट कर लें!  


जयपुर से प्रकाशित अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम इधर उधर के अंतर्गत 15 अक्टोबर 2013  को प्रकाशित किंचित संक्षिप्तिकृत टिप्पणियों का मूल पाठ.  

Thursday, October 10, 2013

इधर-उधर : 1



भाभीजी – आप तो ऐसी न थीं!

भारतीय समाज में कुछ रिश्ते हंसी-मज़ाक और छेड़छाड़ के लिए भी जाने जाते हैं. जैसे देवर-भाभी का रिश्ता, या जीजा-साली का रिश्ता. कहना अनावश्यक है कि इन रिश्तों में शरारत का जो तत्व मुमकिन रहा है उसकी भी अपनी मर्यादाएं रही हैं. सब कुछ इस तरह से मुमकिन रहा कि रिश्तों की शुचिता पर कोई आंच  न आए. लेकिन बदलते वक़्त का आप क्या करेंगे? पिछले कुछ समय से एक भाभी विशेष की हमारे यहां बड़ी चर्चा रही है. और चर्चा भी कुछ ऐसी कि सरकार को उस पर रोक लगाने को भी मज़बूर होना पड़ा. जी हां, मेरा इशारा उन्हीं तीन अक्षरों के नाम वाली भाभीजी की तरफ है. नाम  इसलिए नहीं ले रहा हूं कि अगर संयोग से किन्हीं भाभीजी का भी नाम वही हो तो उन्हें बेवजह शर्मिन्दा न होना पड़े. इधर हाल ही में वे ही भाभीजी फिर से चर्चा में हैं. चर्चा की वजह यह है कि उन भाभीजी के कार्टून किरदार के रचयिता को अब अपने कार्टून के लिए मॉडल के रूप में एक सचमुच की अदाकारा मिल गई हैं, और वे इस बात को छिपा भी नहीं रही हैं कि अब उन भाभीजी के रूप में उनका ही चेहरा-मोहरा इस्तेमाल किया जाएगा. बल्कि  छिपाना तो दूर, वे तो आह्लादित हैं कि अब अनगिनत युवा अपनी फैंटेसियों में उन्हें शुमार कर सकेंगे. क्या इसे हमारे समाज में विकसित हो रही नई नैतिकता के रूप में देखा जाना चाहिए? कुछ समय पहले तक जिस बात से लोगों को लज्जा का अनुभव होता था, अब नहीं होता है. वैसे तो कला जगत में, और विशेष रूप से साहित्य और फिल्मों में यह बदलाव काफी पहले से नज़र आने लगा था! साहित्य के घनघोर पाठकों को  कृष्णा सोबती की ‘मित्रो मरजानी’  ज़रूर याद होगी जो पूरी ठसक और धौंस के साथ अपने शरीर और मन की चाह की बात बहुत बिन्दास शब्दावली में करती है. यहीं यह भी याद दिलाता चलूं कि यह 1967 की रचना है. कृष्णा सोबती की यह चारित्रिक सृष्टि मित्रो अपने पति सरदारी लाल से सम्पूर्ण शारीरिक सुख न मिलने पर सिर्फ  कुढ़ती ही नहीं, अपनी कुढ़न को सास और देवरानी के सामने खुलकर व्यक्त भी करती है और पति की ग़ैर हाज़री में उसके दोस्त प्यारो से नैन मटक्का भी कर लेती है. ‘इस देह  से जितना जस-रस ले लो वही खट्टी कमाई है’ कहने वाली मित्रो जब बच्चा न होने के बारे में अपनी सास और जेठानी से ताने सुनती है पलटकर कह देती है कि तुम्हारे लाल में ही दमखम नहीं है तो मैं क्या करूं? वह तो यह सवाल तक उठा लेती है कि ‘अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो पाप!’ इस बिन्दास मित्रो के अलावा  साहित्य में भाभियां तो इतनी  मिल जाती हैं कि उनके लिए अलग से भाभीवाद नामक एक बाड़ा ही बनाया जा चुका है.  फिल्मों में तो नैतिकता के स्थापित मानों को ध्वस्त करने और नई नैतिकता गढ़ने के इतने प्रसंग मिल जाएंगे कि उनके लिए एक कॉलम तो क्या एक पोथा भी कम होगा.  लेकिन फिर भी यह कहना ज़रूरी है  कि इस अभिनेत्री द्वारा ‘उन’ भाभीजी के रूप में अपनी आकृति के इस्तेमाल की इस घोषणा को एक ऐसी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए जिसके शायद दूरगामी परिणाम हों!


कम्प्यूटर पर पाटा संस्कृति का पुनर्जन्म 


पहले घरों के बाहर चबूतरे हुआ करते थे जहां शाम ढले दिन-भर के कामकाज से मुक्त हो बुज़ुर्ग लोग दिन भर के घटनाक्रम की जुगाली किया करते थे. बीकानेर में तो एक अलग पाटा संस्कृति ही विकसित हो गई थी. लेकिन समय के साथ काफी कुछ बदला है. चबूतरे और पाटे अब अपनी रौनक खो चुके हैं. अलबत्ता मॉर्निंग वॉक के नाम पर सुबह-सुबह पार्कों वगैरह  में मिलने वाले लोग घूमते-फिरते वही काम किसी सीमा तक कर लेते हैं. लेकिन इधर मार्क जुगकरबर्ग जी की कृपा से दुनिया भर के उन लोगों को जो कम्प्यूटर से परहेज़ नहीं बरतते हैं, एक नई पाटा संस्कृति सुलभ हो गई है. जी हां. मेरा इशारा फेसबुक की तरफ ही है. यहां लोग खुलकर अपनी कहते हैं और दूसरों की सुनते - मेरा  मतलब पढ़ते  हैं. अपना दिल टूटने से लगाकर नमो-ममो तक के हाल-चाल और उस हाल-चाल पर हर तरह की टीका-टिप्पणी का रस यहां लिया जा सकता है. कुछ लोग इस सार्वजनिक मंच पर आकर अपने गन्दे पोतड़े (डर्टी लिनेन!) धोते हैं तो कुछ इसे आत्म प्रचार का सर्वश्रेष्ट माध्यम मानकर इसका भरपूर इस्तेमाल कर दूसरों को हलकान किए रहते हैं.  फेसबुक का सबसे मज़ेदार फीचर है टैग करना! टैग करना बोले तो अपने हाथों में आपका चेहरा पकड़ कर उसे अपनी तरफ घुमा कर कहना, ज़रा सुनिए तो! किसी ने कोई कविता लिखी और कर दिया चालीस-पचास साहित्य रसिकों को टैग! किसी को किसी बाबा की कोई बात पसन्द आई तो सौ सवा सौ लोगों तक उस बात को पहुंचाना अपना पुनीत कर्तव्य और अधिकार मान बैठे. यह मर्ज़ एक महामारी का रोग ले चुका है. हमारे शहर के ही एक कवि-कथाकार-पत्रकार  मित्र तो इस रोग से इस हद तक पीड़ित हुए कि उन्होंने बाकायदा घोषणा करके टैग करने का अपराध करने वालों को अनफ्रैण्ड करने की हिंसक कार्यवाही तक कर डाली. फेसबुक की दुनिया में अगर कोई किसी को अनफ्रैण्ड करता है इस बात का बहुत बुरा माना जाता है. अनफ्रैण्ड करना एक तरह से जाति बहिष्कार का ही नया संस्करण है. अब किसी का पुनर्जन्म होगा तो इतना बदलाव तो होगा ही!



जयपुर से प्रकाशित अपराह्न-दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'इधर-उधर' में 09 अक्टोबर 2013 को किंचित संक्षिप्त रूप में प्रकाशित टिप्पणियों का मूल पाठ.  

Wednesday, October 9, 2013

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन....

आज इलाहाबाद  की एक संस्था से एक पत्र आया तो कई पुरानी यादें ताज़ा हो गईं.


पहले इस पत्र की बात कर ली जाए. 


इलाहाबाद की इस संस्था अखिल भारतीय हिन्दी सेवी संस्थान के प्रचार मंत्री और ‘ठेंगे पर सब मार दिया’ जैसे विलक्षण नाम वाले मासिक के सम्पादक मधुकर मिश्र जी ने अपने पत्र द्वारा मुझे सूचित किया  मेरा "शुभ नाम संस्थान में ‘राष्ट्रभाषा-गौरव’ तथा ‘साहित्य-शिरोमणि’ मानद उपाधि के लिए प्रस्तावित” हुआ है. उन्होंने अपने पत्र में मुझे सलाह दी कि यदि मुझे यह प्रस्ताव स्वीकार हो तो “संस्थान के नियमों का समय से पालन करते हुए” पंजीकरण कराने की कृपा करूं. संस्थान का सम्बद्ध  नियम यह है कि “मानद उपाधि हेतु आमंत्रित साहित्यकार”  मात्र 2100/- की राशि भेजे.  पत्र प्राप्त करने वाले को कोई असुविधा न हो इसलिए इस पत्र में यह भी स्पष्ट कर दिया गया  कि यह राशि (जिसे पंजीकरण  राशि का सम्मानजनक नाम दिया गया है) मनी ऑर्डर (या बैंक ड्राफ्ट) के ज़रिये भेजी जाए और यह भी कि राशि श्री राजकुमार शर्मा (जिनके परिचय में बताया गया है कि वे “वर्चस्वी पत्रकार/ साहित्यकार/ सदगृहस्थ-संत”  और ‘जागरण’ के प्रधान सम्पादक तथा ‘ठेंगे पर सब मार दिया’ के सलाहकार सम्पादक हैं) के व्यक्तिगत नाम से ही भेजी जाए और यह भी कि “अध्यक्ष  या संस्थान का उल्लेख न करें क्योंकि बैंक अकाउण्ट राजकुमार शर्मा जी के शुभ नाम से है.”   


मैंने महज़ विनोद के लिए यह बात फेसबुक पर पोस्ट कर दी, तो स्वाभाविक ही है कि अनेक मित्रों की किसम-किसम की प्रतिक्रियाएं भी वहां आईं. कुछेक मित्रों ने यह लिखा कि उन्हें भी ऐसा ही प्रस्ताव मिला है, तो कुछेक ने चुटकियां भी लीं. लेकिन इसी सब के बीच अमरीका में रह रहे हमारे एक मित्र ने मीडिया दरबार (mediadarbar.com)  नामक एक वेबसाइट का एक लिंक भी पोस्ट कर दिया जिसमें विस्तार  से यह खबर छपी है कि  “हिंदी और पंजाबी के प्रख्यात साहित्यकार और मीडिया विशेषज्ञ अमुक जी (नाम जान-बूझकर नहीं दे रहा हूं –दुर्गा.)  को अखिल भारतीय हिंदी सेवी संस्थान, इलाहाबाद की ओर से राष्ट्र भाषा गौरव प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा.  हिंदी सेवी संस्थान ने ‘उन’ के दो दशक से ज्यादा समय में हिंदी साहित्य के प्रति किए कार्यों को देखते हुए उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा की है.  संस्थान के सचिव और संपादक मधुकर मिश्र के मुताबिक, हिंदी साहित्य में डा. अमुक जी के अमूल्य योगदान को देखते हुए उन्हें इस राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया गया है.”  कहना अनावश्यक है कि इस ख़बर के स्रोत स्वयं सम्मानित साहित्यकार महोदय ही होंगे. यह सम्भावना इस बात से भी पुष्ट  होती है कि इस समाचार में आगे उनकी अनेक उपलब्धियों  का बखान है. सम्मानित करने वाली संस्था के पास शायद ही वे तमाम जानकारियां हों. इस तरह की संस्थाएं आपकी उपलब्धियों का लेखा-जोखा रखने की जहमत नहीं उठाया करतीं.  यह देखना बहुत मज़ेदार है कि जो कृत्य हम सबको हास्यास्पद (या कहें अपमानजनक) लग रहा है उसी को डॉ अमुक जी ने अपने सम्मान की तरह प्रचारित कर डाला है.

और यह सब पढ़ते हुए मुझे अपने ही शहर जयपुर के एक और स्वनामधन्य तथाकथित लेखक की याद हो आई. असल में वे शिक्षा से जुड़े थे, मैनेजमेण्ट के व्यक्ति थे,  एक बड़े और नामी कॉलेज के प्राचार्य थे, और खूब उत्साही थे. मेरे भूतकालिक प्रयोग का कोई बुरा अर्थ न लें. वे स्वस्थ हैं, लेकिन बस आजकल उनकी सक्रियता कम हो गई है. नाम उनका इसलिए भी नहीं ले रहा हूं कि अकादमिक क्षेत्रों में उनकी कोई पहचान नहीं है. उनके बारे में भी स्थानीय स्तर के अखबारों में बहुत थोड़े-थोड़े अंतरालों से इस तरह के सम्मानों की ख़बरें छपती रहती थीं. उन सम्मानों में आम तौर पर उन्हें भारत की, एशिया की या विश्व की महान प्रतिभाओं/ लेखकों/शिक्षाशास्त्रियों आदि में शुमार किया जाना  बताया जाता था. हम लोग जो इस तरह के सम्मानों की हक़ीक़त  से वाक़िफ थे, इन खबरों को पढ़कर मुस्कुरा कर रह जाते थे. लेकिन एक बार, शुद्ध शरारत के भाव से मैंने उन्हें फोन कर ऐसे ही किसी सम्मान पर जब बधाई दी तो उन्होंने जिस विनम्रता से मेरी  बधाई को स्वीकार किया, उसका मैं कायल हुए बिना नहीं रह सका. मुझे मानना पड़ा कि उन्हें इस सम्मान की सम्माननीयता में तनिक भी संशय नहीं है. 

और इन्हीं दो बातों से मेरी कुछ पुरानी  यादें  ताज़ा हो आईं. बात शायद 1980 के आसपास की है. तब मैं राजकीय महाविद्यालय, सिरोही में हिंदी पढ़ाता था. एक दिन डाक में  एक लिफ़ाफ़ा आया. उसके भीतर रखे सुमुद्रित पत्र  में लिखा था कि वह संस्था (या कम्पनी) देश की विभिन्न क्षेत्रों की चुनी हुई प्रतिभाओं  की एक डाइरेक्टरी (निर्देशिका) प्रकाशित करने जा रही है और उसमें प्रकाशन के लिए मेरे नाम का भी चयन किया गया है. मुझसे अपना विस्तृत परिचय और प्रकाशनोपरांत उस डाइरेक्टरी  को रियायती मूल्य पर खरीदने के सहमति पत्र पर हस्ताक्षर मांगे गए थे. उस पत्र के साथ एक प्रारूप भी  संलग्न था जिसमें मैं अपनी तरह के अन्य विशेष योग्यता वाले मित्रों के नाम सुझा सकता था. और इसके बाद इस तरह के पत्र आने का एक क्रम ही बन गया. धीरे-धीरे पता चला कि कॉलेज  के अन्य साथियों के पास भी वैसे ही पत्र आते  हैं. इन पत्रों में प्रकाशित होने वाली डाइरेक्टरियों के शीर्षक बदलते थे, शेष सब कुछ अपरिवर्तित  रहता था. एक दिन मुझे  न जाने क्या सूझा कि उनके भेजे हुए प्रारूप में अपने कॉलेज के सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों (यानि चपरासियों) के नाम भरकर भेज दिए. और लीजिए! पन्द्रह दिन भी नहीं बीते होंगे कि मेरे कॉलेज के सारे चतुर्थ श्रेणी  कर्मचारियों के नाम वे सफेद आकर्षक लिफाफे आ पहुंचे जिनमें उन्हें यह सूचित किया गया था कि उनके नाम का चयन विश्व की सर्वोत्कृष्ट प्रतिभा के रूप में किया गया है. अभी मैंने अपने जिन स्थानीय मित्र का ज़िक्र किया, वे इसी तरह की उपलब्धियों का ढिंढोरा बरसों तक पीटते रहे हैं.

जो लोग इस तरह के सम्मान- पुरस्कार आदि बांटते (बेचते?) हैं उनका हित तो बहुत स्पष्ट है. यह उनके धन्धे का एक तरीका है. सामान नहीं बेचा, सम्मान बेच लिया. बल्कि सामान में तो कुछ लागत भी लगती है, सम्मान तो बिना लागत का माल है.  बिना कुछ खर्च किए  कमाई हो जाए तो क्या बुरा है!  मुझे लगता है कि जितने लोगों को वे इस तरह के प्रस्ताव पत्र भेजते हैं, उनमें से अगर दस-बीस प्रतिशत लोग भी उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लेते होंगे (और इतने तो अवश्य ही करते होंगे) तो उनकी दुकान अच्छी तरह चल जाती होगी. लेकिन मैं अक्सर यह सोचता हूं कि जिन लोगों में थोड़ी भी प्रतिभा है, थोड़ी भी समझ  है, और थोड़ा-भी आत्म सम्मान है, वे भला इस तरह के प्रस्ताव क्यों स्वीकार करते होंगे? क्या उन्हें यह लगता है कि उनके पास जितनी प्रतिभा है वो इतने से सम्मान के लिए भी नाकाफी है? वे जो भी करते या रचते हैं उससे उन्हें कोई सम्मान नहीं मिलने वाला है. इसलिए चलो सम्मान खरीद ही क्यों ना लिया जाए? किसे  पता चलेगा? उनकी समझ का स्तर शायद यही है कि वे सोचते हैं कि ऐसा सम्मान सिर्फ उन्हीं को प्रस्तावित किया जा रहा है! और सम्मान बेचने वाले और उन जैसे खरीदने वाले के अलावा किसी को इस सौदे की भनक भी नहीं लगेगी. और या फिर यह भी मुमकिन है कि वे बहुत शातिर हों और यह मानते हों कि क्या फर्क़ पड़ेगा, अगर कुछ लोग इस सम्मान  की हक़ीक़त  को जानते भी होंगे तो. सभी तो नहीं जानते होंगे! अगर अख़बार में सम्मान की खबर हज़ार लोग पढ़ेंगे तो उनमें से आधे तो मान ही लेंगे कि सम्मान उनकी महानता की वजह से मिला है. अगर इतने लोग भी उनको महान मान लेंगे तो उनका अहं तो संतुष्ट हो ही जाएगा. शायद ऐसे ही लोगों के दम पर सम्मान बेचने वालों की दुकानदारी चलती रहती है.
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medaidarbar.com पर  और फिर दिनांक 08 अक्टोबर 2013 को जनसत्ता के 'समांतर' कॉलम में प्रकाशित टिप्पणी.  

Sunday, September 29, 2013

राजनीति पर मूर्ति का आवरण

28 सितम्बर 2013 की टाइम्स ऑफ  इण्डिया में लेखक और पूर्व राजनयिक श्री पवन के वर्मा का एक लेख छपा है 'व्हेन आर्ट मास्क्स पॉलिटिक्स'. मुझे यह लेख इतना ज़्यादा अच्छा लगा कि तुरंत इसका अनुवाद करने बैठ गया. तो प्रस्तुत है इस लेख का मेरा किया अनुवाद:  


नरेन्द्र मोदी एक उम्दा वक्ता हैं और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार चुने जाने के बाद  हरियाणा के रेवाड़ी में उनके पहले सार्वजनिक भाषण ने इस बात के पर्याप्त  प्रमाण भी दे दिए हैं. लेकिन सरदार पटेल की उनकी भरपूर  तारीफ से मुझे आश्चर्य हुआ है. मोदी ने घोषणा की है कि वे भारत के हर गांव से लोहा इकट्ठा  करके गुजरात में स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊँचाई की सरदार पटेल की एक मूर्ति लगवाएंगे जो दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति होगी.

मुझे आश्चर्य इसलिए हुआ  कि सरदार पटेल ही वे व्यक्ति थे जिन्होंने उस आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया था जिसके सदस्य नरेन्द्र मोदी 15 बरस की कच्ची उम्र में बने थे और खुद उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार जिसका उनके जीवन और चिंतन प्रक्रिया को ढालने में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रहा है. जब 2 फरवरी, 1948 को “देश में काम कर रही आज़ादी को ख़तरे में डालने वाली और देश के नाम को कलंकित करने वाली नफरत और हिंसा की शक्तियों को उखाड़ फेंकने के”  अपने इरादे  के तहत भारत सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगाया तब पटेल ही भारत के गृह मंत्री थे.

आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु माधव सदाशिव गोलवलकर के नाम लिखे अपने 11 सितम्बर, 1948 के एक पत्र में सरदार आरएसएस के नेताओं की बेबाक भर्त्सना करते हैं: “उनके सारे भाषण साम्प्रदायिक विष से भरे हुए हैं. हिन्दुओं में जोश का संचार करने और उनके संरक्षण के लिए संगठित करने के लिए ज़हर फैलाना ज़रूरी नहीं था. इस ज़हर के अंतिम परिणाम के रूप में देश को गांधीजी के मूल्यवान जीवन से हाथ धोना पड़ा.”

महत्वपूर्ण बात यह है कि महात्मा गांधी की हत्या में आरएसएस और हिन्दू महासभा की भूमिका को लेकर सरदार  के मन में कभी कोई संशय नहीं था. पण्डित नेहरु को लिखे 27 फरवरी, 1948 के पत्र में वे यह बात बहुत स्पष्टता के साथ कहते हैं: “हिंदू महासभा की कट्टर शाखा ने सीधे सावरकर के निर्देशन में इस षड़यंत्र की योजना  तैयार की और इसे क्रियान्वित  किया.... निस्संदेह आरएसएस और हिन्दू महासभा के जो लोग गांधी के सोचने के तरीकों और उनकी नीतियों के विरोधी थे उन्होंने उनकी हत्या का स्वागत किया.”  

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक अन्य पत्र (18 जुलाई, 1948) में वे इसी स्थिति  को  दुहराते हैं: “जहां तक आरएसएस और हिन्दू महासभा का सवाल है...हमारी रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करती हैं कि इन दोनों संगठनों और ख़ास तौर पर पहले वाले संगठन की वजह से देश में एक ऐसा वातावरण बनाया गया जिसमें यह भयंकर त्रासदी सम्भव  हो सकी.”

प्रसंगवश, हालांकि अपने मुकदमे के समय नाथू राम गोडसे ने आरएसएस के साथ अपने किसी स्पष्ट सम्बन्ध से इंकार किया था, कई वर्षों के बाद जनवरी, 1994 में फ्रण्टलाइन पत्रिका को दिए गए एक इण्टरव्यू में उनके भाई गोपाल सच्चाई को लेकर एकदम स्पष्ट थे: “सभी भाई आरएसएस में थे, नाथूराम, दत्तात्रेय, मैं और गोविंद. बल्कि आप कह सकते हैं कि हम लोग अपने घर की बजाय आरएसएस में ही बड़े हुए. हमारे लिए वह एक परिवार की तरह था. नाथूराम आरएसएस में एक बौद्धिक कार्यवाह बन गए.  उन्होंने भी यह कहा है और इसे कभी छोड़ा  नहीं.” 

सरदार पटेल गांधीजी और उनके समावेशी नज़रिये के पक्के अनुयायी  थे. जिस संगठन आरएसएस ने मोदी का मार्गदर्शन  किया और उनके दुनियावी नज़रिये को गढ़ा उसके प्रति उनका प्रबल विरोध एक दस्तावेज़ी सच्चाई है. तो फिर पटेल को अपना कर और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनकी दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति बनाकर मोदी क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं?

एक विचार तो यह हो सकता है कि आरएसएस के बारे में सरदार की राय से मोदी सहमत हों. आखिर इतने बड़े मुद्दे पर एक उत्साही प्रशंसक और उसके नव प्राप्त नायक के बीच इतना घोर मतभेद तो नहीं हो सकता है. अगर हो तो मोदी को स्पष्ट ऐसा कहना चाहिए. और अगर नहीं तो उन्हें  इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि वे चुने हुए विस्मरण और स्वार्थपूर्ण छल के एक सोच-समझे  प्रयास के द्वारा पटेल को सिंहत्व प्रदान कर रहे हैं, यानि देश के एकीकरण के लिए पटेल के प्रयास का गुणगान और जिन लोगों ने साम्प्रदायिक उन्माद और हिंसा की राजनीति के द्वारा देश को तोड़ने की कोशिश की उनके बारे में उनके कठोर विचारों की जानबूझकर अवहेलना.  

इस बात के  सुनिश्चित प्रमाण उपलब्ध  हैं कि मोदी को बीजेपी का नेतृत्व प्रदान करने के राजनीतिक चयन के बारे में आरएसएस ने एक महत्वपूर्ण  भूमिका निबाही है. ये प्रमाण इस बारे में भी बहुत स्पष्ट हैं कि मोदी आरएसएस की विचारधारा से बेहद प्रभावित हैं. जब सबसे ज्यादा समय तक और सर्वाधिक ‘सफल’ आरएसएस मुखिया गोलवलकर सरसंघचालक थे (1940-73) तब मोदी एक प्रचारक थे.

कहा जाता है कि मोदी ने उनकी तारीफ में एक किताब भी लिखी थी. तो क्या वे गोलवलकर के बहुत स्पष्टता से कहे गए इन विचारों से भी सहमत हैं कि भारत अनन्य रूप से एक हिन्दू राष्ट्र है, जिसमें अन्य विश्वासों वाले लोगों के लिए कोई जगह नहीं  है यहां तक कि उन्हें नागरिक अधिकर भी प्राप्त नहीं हैं? क्या वे, यहूदियों को समूल नष्ट कर देने के कृत्य को देश के लिए सबसे बड़े गर्व की बात मानने के लिए नाज़ी जर्मनी की गोलवलकर की तारीफ का भी समर्थन करते हैं? क्या वे भी गोलवलकर की ही तरह यह मानते हैं कि मनुस्मृति ही, जो कि शूद्रों  को ब्राह्मणों की सतत सेवा में लगाना चाहती है और स्त्रियों की अधीनता की बात करती है, देश के लिए एकमात्र वैध कानून है? मेरा खयाल है कि बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में इस प्रतिगामी सोच का महत्व कम करने और अपनी  राजनीतिक अपील का विस्तार करने का एक साहसिक प्रयास किया था.  लेकिन मोदी के उत्थान के साथ बीजेपी की निर्देशक विचारधारा के रूप में आरएसएस के  मूल दर्शन की वापसी हुई है.

अगर सरदार पटेल इस घटनाक्रम को देख रहे होंगे तो निस्संदेह वे बहुत दुःखी और साथ ही बहुत नाराज़ भी होंगे. नाराज़ इस बात के लिए कि जिनका  उन्होंने खुले तौर पर विरोध किया  वे ही चालाकी के साथ उन्हें अपना रहे हैं. और दुःखी इस बात के लिए कि उनके ये नए भक्त भारत  का जो प्रारूप पेश कर रहे हैं वह  उस प्रारूप से कितना अलहदा है जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था.
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Sunday, September 15, 2013

शिक्षक दिवस पर स्मरण अपने ‘गुरुजी’ का!


 लगभग 35 साल खुद शिक्षक रह चुकने के भी दस बरस बाद भी मेरे मन में अपने अनेक शिक्षकों की स्मृतियां संचित  हैं.  करीब 16 बरसों (उन दिनों पूर्व प्राथमिक जैसा कुछ तो होता नहीं था) के अपने अध्ययन काल में अनेक शिक्षकों से पढ़ने और सीखने का मौका मिला. उनमें से बहुतों  की स्मृति तो  धूमिल होते-होते अब लगभग अदृश्य हो गई है, लेकिन कुछ की स्मृति कुछ इस तरह से ताज़ा है जैसे आज भी मैं उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूं. कभी मौका मिला तो उनमें से कुछेक को सलीके से स्मरण करूंगा, अभी तो अपने (निस्संकोच कह सकता हूं) सर्वाधिक प्रिय ‘गुरुजी’ को याद करना चाहूंगा. जी हां, वे मेरे लिए ‘सर!’ न होकर ‘गुरुजी’  ही थे.

मैं बात कर रहा हूं मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर की. अपने ज़माने के बहुत लोकप्रिय कवि थे वे, राजनीतिकर्मी भी और राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘न भूतो न भविष्यति’ अध्यक्ष भी. उदयपुर के महाराणा भूपाल कॉलेज में 1961 में पहली बार बी.ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में मैं उनके सम्पर्क में आया,  लेकिन स्नातक अध्ययन के तीन वर्ष बहुत सामान्य रहे. बी.ए. पास करने के बाद विषम पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मेरी पढ़ाई पर विराम लग गया, लेकिन एक संयोग की वजह से, डॉ आतुर के सहज स्वाभाविक और खुले व्यक्तित्व ने उस विराम को पूर्ण विराम बनने से पहले अल्प विराम में परिवर्तित कर एम. ए. हिंदी में मेरे प्रवेश का, और इसी के साथ मुझे अपना बना लेने का पथ प्रशस्त कर दिया. उनसे विद्यार्थी का मेरा रिश्ता दो बरस का ही नहीं रहा.  बाद में जब मैंने पी-एच.डी. करने का फैसला किया तो उन्हीं को अपना गाइड बनाया और 1984 में उनका पहला पी-एच.डी. होने का सौभाग्य भी प्राप्त किया. सितम्बर 1989 में उनके स्वर्गवास होने तक उनसे मेरा रिश्ता न सिर्फ बना रहा, लगातार प्रगाढ़ होता गया. मुझे अब भी अच्छी तरह से याद है कि उदयपुर में उनकी स्मृति में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में अनायास मेरे मुंह से यह बात निकल गई थी कि “मैं नहीं जानता कि पुनर्जन्म होता है या नहीं होता है. लेकिन अगर मेरा एक और जन्म हो तो मैं चाहूंगा  कि मेरा वो जन्म  प्रकाश  आतुर के बेटे के रूप में ही हो.”

वे एक प्रभावी शिक्षक थे, अपने विषय पर उनकी बहुत मज़बूत पकड़ थी. लेकिन उनकी जो बात उन्हें सामान्य शिक्षक से अलग करती है वो है अपने विद्यार्थियों के प्रति उनका गहनतम अनुराग. आर्थिक अभावों से भरे अपने विद्यार्थी काल  में उनकी निजी लाइब्रेरी की अनगिनत किताबों ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने  दिया कि  ‘काश! यह किताब भी  मेरे पास होती.’  उनकी किताबों को मैंने ऐसे बरता जैसे मेरे पिताजी उन्हें मेरे वास्ते खरीद कर रख गए हों! और किताबें ही क्यों, उनके प्रभाव का प्रयोग भी तो ऐसे ही किया. लेकिन ऐसा  हुआ कैसे? मैं परम संकोची, और उस ज़माने में कॉलेज शिक्षक का अलग ही रुतबा होता था. मुझ जैसा अति सामान्य और संकोची विद्यार्थी किसी प्रोफेसर के नज़दीक आ सके, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं थी. लेकिन फिर भी यह चमत्कार हुआ. और इस चमत्कार के मूल में था उनका अपना वत्सल व्यक्तित्व.  एक अनुभव को साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. जिस दिन मुझे पी-एच.डी. की उपाधि मिलना तै हुआ उस दिन,  तब प्रचलित प्रथा के अनुसार,  शाम को एक बड़ी दावत मुझे आयोजित करनी चाहिए थी. लेकिन वो दावत डॉ आतुर ने अपने घर पर रखी. उस दावत में जो बहुत सारे लोग शरीक थे उनमें से एक तो आज केन्द्र सरकार में काबीना मंत्री हैं. दावत से ठीक पहले, मैंने बहुत संकोच के साथ  डॉ आतुर से अनुरोध किया कि इस दावत का व्यय भार मुझे वहन करने की अनुमति दें! लगभग तीस बरस बीत जाने के बाद भी उनका गुस्से से तमतमाया चेहरा मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों बना हुआ  है. “तुम कौन होते हो? तुम कैसे कर सकते हो यह? आज डॉ आतुर के बेटे को पी-एच.डी. मिली है, तो खुशी भी वो ही मनाएगा!”


मैं चाहूं तो भी गिनती नहीं कर सकता कि कितनी बार उदयपुर में उनके घर भोजन किया और शाम बिताई है! जीवन में हर सुख दुःख में उनका वरद हस्त मुझ पर रहा. उन्होंने मुझे सब कुछ दिया, और बदले में मुझसे कभी कुछ  भी नहीं चाहा. आज जीवन की सन्ध्या वेला में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि डॉ आतुर ने मेरे जीवन की धारा बदल दी. अगर  वे  मेरी ज़िन्दगी में न आए होते तो मैं न जाने कहां और कैसा होता? उन्होंने मुझे पढ़ने को प्रेरित किया. उन्होंने मुझे साहित्य से जोड़ा. उन्होंने कॉलेज शिक्षक बनने की मेरी दबी हुई आकांक्षा को खाद-पानी दिया. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मेरी रीढ़ को सीधी रहने की क्षमता प्रदान की. यह मेरा सौभाग्य था कि गुरु के रूप में मुझे वे मिले. उनकी पावन स्मृति को नमन! 

Thursday, September 5, 2013

अपने अध्यापक साथियों को याद करते हुए....

अपने करीब साढ़े तीन दशक के अध्यापन  काल में अनगिनत शिक्षकों का साहचर्य मिला. उनमें से हरेक की कोई न कोई ख़ासियत थी. लेकिन वक़्त बीतने के साथ बहुत सारी स्मृतियां धूमिल होती जाती हैं. आज अगर चाहूं तो भी उनमें से बहुतों के नाम भी  याद नहीं कर पाता हूं. अभी पिछले दिनों फेसबुक की दीवाल पर एक पुराना फोटो पोस्ट  करते हुए यह बात और भी शिद्दत से महसूस हुई. लेकिन यह बहुत स्वाभाविक है. उम्र का इतना असर हो होगा ही.  फिर भी, आज शिक्षक दिवस पर अपने कुछ साथी ख़ास तौर पर याद आ रहे हैं.  सिरोही  कॉलेज में कुछ समय के लिए कहीं और से स्थानांतरित  होकर आए एक साथी जिनका चेहरा तो याद आ रहा है, नाम याद नहीं आ रहा इस सूची में सबसे ऊपर हैं. उन्होंने अपने विदाई समारोह में बहुत गर्व पूर्वक कहा था कि उन्होंने अपने जीवन में एक भी कक्षा  नहीं पढ़ाई है. तब शायद लगभग पन्द्रह साल तो वे नौकरी कर ही चुके थे. विदाई समारोह के बाद जलपान करते हुए मैं अनायास ही उनसे पूछ बैठा था, “और इस बात पर आपको कभी शर्म भी महसूस नहीं हुई?” इसी अनुभव की पुनरावृत्ति एक बार और हुई. तब मैं अध्यापन की दुनिया से शैक्षिक प्रशासन की दुनिया में आ चुका था और अपनी नौकरी के आखिरी पायदान पर था.  वहां एक साथी मिले, जिनका नाम मैं काफी सुनता रहा था और मेरा खयाल था कि वे गम्भीर अकादमिक रुझान वाले हैं. लेकिन वो छवि खुद उन्होंने ही बड़ी सहज निर्ममता से ध्वस्त कर दी. एक दिन खुद किसी सन्दर्भ में बताने लगे कि उन्होंने (अपने तीसेक बरस के) अध्यापन काल में एक भी कक्षा नहीं पढ़ाई! अपने शैक्षिक प्रशासन काल में मैंने ऐसे कई लोगों के बारे में भी जाना जिन्होंने बाह्य दुनिया में काफी नाम कमाया है और जिनकी छवि बहुत बड़े विद्वानों की है. लेकिन शिक्षा विभाग में रहते हुए भी, किसी न किसी तरह जोड़ तोड़ करके वे पढ़ाने से, कॉलेजों में जाने से, बचते रहे. कभी प्रतिनियुक्ति के बहाने तो कभी और किसी बहाने वे ऐसी जगहों पर काबिज होते रहे जहां उन्हें पढ़ाना न पड़े. आज उनके बारे में सोचता हूं तो मन में सबसे पहले यही सवाल उठता है कि आखिर वे कैसे विद्वान थे? अगर उन्हें पढ़ाने से इतनी ही वितृष्णा थी तो अध्यापक बने ही क्यों? और जिन्होंने ली हुई तनख्वाह के बदले में अपेक्षित दायित्व का निर्वहन नहीं किया, वे भला क्यों और कैसे विद्वान थे? लेकिन समाज में उनका बड़ा मान है. बहुत कुशलता से उन्होंने अपनी छवि जो निर्मित की  है.

एक और सज्जन  की याद आ रही है जो अब दुनिया में नहीं हैं. मेरे सहकर्मी थे. उस ज़माने में जब पी-एच.डी भी कम होते थे, वे डी.लिट थे. हम लोग एक छोटे-से कॉलेज में थे. जिन लोगों को कॉलेजों की दुनिया का ज़रा भी अन्दाज़ा है वे जानते हैं कि कॉलेजों में प्राध्यापकों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम करने होते हैं. जैसे कॉलेज की पत्रिका निकालना, छात्रसंघ के चुनाव करवाना, अनुशासन बनाए रखने में संस्था प्रधान की सहायता करना, एन.एस.एस, एन.सी.सी. आदि का काम करना, सह-शैक्षिक और शिक्षणेत्तर गतिविधियां आयोजित करना आदि-आदि. प्राचार्य लोगों की रुचि और रुझान के अनुसार ये काम उन्हें सौंपते हैं और लोग कमोबेश निष्ठा से ये काम करते हैं. हम सभी ने किए हैं. लेकिन जिन साथी को मैं स्मरण कर रहा हूं वे इनमें से किसी भी काम को हाथ नहीं लगाते थे. उन्होंने अपने चारों तरफ एक ऐसा प्रभा मण्डल बना रखा था कि इतना बड़ा विद्वान भला ऐसा काम कैसे करेगा? अगर किसी प्राचार्य ने कभी उन्हें कोई काम सौंपना भी चाहा तो उन्होंने यह कहते हुए कि मैं अपनी तरह का इकलौता विद्वान हूं, उस काम को करने दृढ़ता  से इंकार कर दिया. मैं कभी यह नहीं समझ पाया कि उनकी विद्वत्ता संस्था के लिए किस काम की थी? मेरे मन में तब यह सवाल अकसर उठता था कि किसी संस्था के लिए इस तरह के विद्वान ज़्यादा उपयोगी हैं, जो तिनका भी नहीं तोड़ते, या वे उत्साही प्राध्यापक ज़्यादा उपयोगी हैं, जिनके पास ऐसी कोई विरल डिग्री भले ही न हो, लेकिन वे संस्था का हर काम करने के लिए सदा  तैयार रहते हैं?  
     
और जब मैं यह चर्चा कर रहा हूं तो उन महान लोगों की तो कोई बात कर ही नहीं रहा हूं जिन्होंने वैसे तो नितांत लो-प्रोफाइल रखा, विद्वान वगैरह  की भी कोई छवि नहीं निर्मित की, लेकिन कॉलेज शिक्षा विभाग में नौकरी करते हुए भी पढ़ने-पढ़ाने से कभी कोई ताल्लुक नहीं रखा. ऐसे लोगों में से अनेक का ताल्लुक बड़े अफसरों और नेताओं वगैरह  से होता है और ये लोग किसी दन्द फन्द में पड़े बग़ैर चुपचाप अपनी तनख़्वाह लेते हैं और मज़े करते हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा  रही है.  


लेकिन जब मैं इन तमाम लोगों को याद कर रहा हूं तो एक अलग तरह के साथी की याद भी मुझे आ रही है. मेरे ये साथी भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक थे, और बहुत उम्दा प्राध्यापक थे. उनका हर विद्यार्थी उनके ज्ञान और उनकी अध्यापन शैली का मुरीद था. इस बात को कहने की ज़रूरत नहीं है कि भौतिक शास्त्र एक ऐसा विषय है जिसमें ट्यूशन का प्रचलन बहुत ज़्यादा है. लेकिन मेरे ये साथी ट्यूशन नहीं करते थे. बिल्कुल भी नहीं करते थे. ऐसा नहीं है कि ये कोई खानदानी अमीर थे और इन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी. अगर ऐसा होता तो  इनकी पत्नी क्यों नौकरी करने के लिए रोज़ बसों के धक्के खातीं? लेकिन ट्यूशन ये नहीं करते थे. अपनी बात को सुधार कर कहूं तो यह कि वे फीस लेकर ट्यूशन नहीं करते थे. साल में दो-चार प्रतिभाशाली लेकिन साधन विहीन बच्चों को वे घर पर पढ़ाते भी थे. फीस की बात वे करते ही नहीं और जब विद्यार्थी बहुत ज़ोर देता तो उनका एक ही जवाब होता. जवाब यह होता कि जब तुम पढ़ लिखकर नौकरी करने लग जाओ, तो इसी तरह किसी को पढ़ा देना, बस यही मेरी फीस होगी. उन्होंने कभी अपने इस काम की चर्चा नहीं की, कभी इसके लिए कोई इनाम नहीं मांगा. बस, अपनी तरह अपना काम करते रहे. यह एक संयोग ही था कि अपनी नौकरी के आखिरी चरण  में हम दोनों को फिर से एक साथ काम करने का मौका मिला, और वहां भी मैंने उनमें वही आदर्श देखा. कहना अनावश्यक है कि ऐसे बहुत सारे लोग होंगे. ऐसे भी और वैसे भी. 

Tuesday, February 26, 2013

जोग लिखी: साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह

जोग लिखी: साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह: हिंदी साहित्य में कुछ विधाएं केन्द्र में रही है और कुछ हाशिये पर. केन्द्र में रहने वाली विधाओं में  मुख्य हैं कविता और कहानी, जबकि बाकी स...

साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह


हिंदी साहित्य में कुछ विधाएं केन्द्र में रही है और कुछ हाशिये पर. केन्द्र में रहने वाली विधाओं में  मुख्य हैं कविता और कहानी, जबकि बाकी सारी विधाएं कमोबेश हाशिये पर ही रही हैं. अब इस बात पर अलग से विचार किया जा सकता है कि विधाओं की इस स्थिति के लिए इनके रचनाकार कितने ज़िम्मेदार हैं और आलोचक कितने. लेकिन ज़िम्मा चाहे जिसका हो, इस स्थिति से शायद  ही कोई असहमत हो.  असहमति इस बात से ज़रूर होती है कि कविता केन्द्रीय विधा है या कहानी. लेकिन नाटक, निबंध, ललित  निबंध, डायरी, रेखाचित्र, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा वगैरह ने कभी केन्द्रीय स्थान के लिए अपना दावा पेश नहीं किया. बहुत कम रचनाकार ऐसे रहे जिन्होंने केवल इन विधाओं में से किसी में काम किया और महत्व प्राप्त किया. महत्व पाने के लिए किसी केन्द्रीय या महत्व वाली विधा में रचना कर्म की बैसाखी ज़रूरी ही रही.

लेकिन अपवाद कहां नहीं होते!

असल बात तो है रचना. अगर रचना में दम होता है तो फिर और सब बातें पीछे रह जाती   हैं. महत्व विधा का नहीं, उस विधा विशेष में किए गए काम का होता है. होना भी चाहिये. अब यही देखिए ना कि मैं बात केन्द्रीय विधा की कर रहा था, और मेरे सामने है काशीनाथ सिंह का रचनाकर्म. काशीनाथ सिंह जो सुपरिचित कथाकार हैं, उपन्यासकार हैं, नाटककार हैं, लेकिन आज उन्हें अधिक जाना जाता है उनके संस्मरणात्मक लेखन के लिए.  यानि उस विधा के लेखन के लिए जो कभी भी केन्द्रीय विधा नहीं रही.

‘अपना मोर्चा’ जैसे चर्चित और बहु प्रशंसित उपन्यास तथा ‘लोग बिस्तरों पर’, ‘सुबह का डर’, ‘आदमीनामा’, ‘नई तारीख’, ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, ‘कल की फटेहाल  कहानियां’   और कई अन्य संग्रहों में संग्रहित कहानियों के जाने-माने लेखक काशीनाथ सिंह का एक संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ पहल-88 में छपा और कुछ संस्मरण जैसे ‘नागानंद चरितम वल्द अस्सी चौराहा’, ‘जी ही जाने है आह मत पूछो’, ‘दंत कथाओं में त्रिलोचन’, 'देख तमाशा लकड़ी का’  वगैरह सन 90-91 में ‘हंस’  और ‘वर्तमान साहित्य’  में छपे तो जैसे पूरे हिन्दी साहित्य जगत में तहलका मच गया. बेशक ‘हंस’  में छपे  कुछ संस्मरणों की बेबाक भाषा ने अलग से उत्तेजना का माहौल बनाया, लेकिन गम्भीर और समझदार पाठकों का ध्यान इस बात की तरफ़ गए बगैर नहीं रह सका कि इस संस्मरण विधा को पहले तो किसी ने इस तरह से नहीं बरता था. और बात केवल ‘अभूतपूर्व’ होने की ही नहीं थी. बात यह भी थी कि इस बरताव से इस विधा में नई ऊर्जा  का संचार हो गया था. अब तक जिस विधा का इस्तेमाल प्राय: छवि निर्माण के निमित्त किया जाता था, और इसलिए आधार व्यक्तित्व से एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखी जाती थी, काशीनाथ सिंह ने इस विधा में कुछ और ही कर डाला. उन्होंने जिन लोगों  को अपने संस्मरणों में स्मरण किया  उन्हें  कुछ इस तरह स्मरण किया कि वे अपनी समस्त अस्थि-मज्जा के साथ, अपनी तमाम कमज़ोरियों और ताकतों के साथ, अपनी सारी  खूबसूरतियों और बदसूरतियों के साथ, अपनी हर भलाई और हर बुराई के साथ आपके सामने आ खड़े हुए. वे आपके इतने निकट आ गए कि लगा उनकी  सांस आपकी गर्दन को छू रही है, लगा उनकी पीक के दाग आपके कुर्ते पर अब लगे कि अब लगे. और तब लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि कोई विधा न कमज़ोर होती है और न ताकतवर. असली कमाल तो उसको बरतने वाले का होता है. काशीनाथ सिंह में दम था तो उन्होंने  एक नामालूम-सी विधा में भी भी कमाल कर दिखाया. याद आया – कमाल पैदा तो करे कोई!

काशीनाथ  सिंह के संस्मरण उनकी तीन किताबों में उपलब्ध हैं: याद हो कि न याद हो (1992), आछे दिन पाछे गए (2004) और घर का जोगी जोगड़ा (2006). इन किताबों में क्रमश: सात, आठ  और तीन संस्मरण है. इनके अतिरिक्त ‘घर का जोगी जोगड़ा’  में परिशिष्ठ के रूप में ‘नामवर से काशी’ शीर्षक एक छोटी-सी बातचीत भी है. इनमें से ‘गरबीली गरीबी वह’  शीर्षक संस्मरण, जो नामवर सिंह पर है, ‘याद हो कि न याद हो’ में भी है और ‘घर का जोगी जोगड़ा’ में भी. वैसे यह (घर का जोगी जोगड़ा) तो पूरी किताब ही नामवर सिंह पर है. हिंदी साहित्य की दुनिया में, काशीनाथ सिंह को नामवर सिंह का भाई होने के नाते काफी-कुछ सुनना और सहना पड़ा है (जबकि दिलजलों  का मानना-कहना यह  भी है कि काशीनाथ सिंह आज जो भी हैं वो इसी वजह से हैं) ऐसे में किसी की भी दिलचस्पी यह जानने में हो सकती है कि काशीनाथ सिंह अपने भाई के बारे में क्या सोचते हैं. यह बात न भी होती तो हिंदी के एक समर्थ आलोचक और सुपरस्टार होने के नाते नामवर सिंह सबकी रुचि के विषय थे और हैं. नामवर सिंह पर काशीनाथ जी के संस्मरणों की चर्चा थोड़ा ठहर कर.

काशीनाथ सिंह के इस संस्मरण त्रिलोक की शुरुआत होती है उनके गुरुवर डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी  पर लिखे संस्मरण ‘होलकर  हाउस में हजारी प्रसाद द्विवेदी’  से. संस्मरण शुरु होता है महाकाव्य ‘पृथ्वी राज रासो’  के उस अंश के वर्णन से जिसमें पृथ्वी राज के देवगिरि आगमन का दृश्य है और काशीनाथ सिंह इसे जोड़ते हैं हजारी बाबू के बनारस आगमन के दृश्य से. सात बरस बाद हजारी बाबू का बनारस आगमन एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना है लेकिन उनके वहां आने से बहुतों को कोई खुशी नहीं है. इसलिए नहीं है कि वे पारंपरिक आचार्य जो नहीं हैं. कैसा होता है यह पारम्परिक आचार्य? बताते हैं काशीनाथ जी: जदि आपकी चमड़ी चीमड़ या चम्चम हो, हड्डियां गुट्ठल या गद्गद हों, चोटी से चरणों तक बदन के ढांचे के ताने-बाने पर तनी हुई नसें या तो आशीर्वाद उगल रही हों या असहमति के फव्वारे फेंक रही हों, तब तो भाई आचार्य; अन्यथा राम  भजिए!  ज़ाहिर है कि हजारी बाबू ऐसे नहीं हैं. तो विरोध  तो  अवश्यंभावी है. और विरोध भी इतना अधिक कि उसने पण्डित जी से उनकी हंसी तक छीन ली. वह हंसी, जिसका अद्भुत वर्णन किया है काशीनाथ सिंह ने. मैं चाहता हूं कि आप भी उसका आनंद लें:  हंसते थे पण्डित जी भी और ऐसी हंसी कि क्या कहने? हज़ारों किस्से हैं इस हंसी के. कभी वह कवच होती थी, कभी हथियार. कभी खुद पर होती थी, कभी और पर. लेकिन उनकी एक हंसी ऐसी भी होती थी जो साथ के मनुष्य को कपड़े-लत्ते, रोजी-रोटी, हाट-बाज़ार, घर-द्वार, शत्रु-मित्र, ऊंच-नीच, अमीर-ग़रीब – इन सबके दुनियाओं से उठाकर वहां रख देती थी जहां वह ‘जीने का अर्थ’ खुलता हुआ महसूस करता था.  सोचिये और याद कीजिए कि क्या आपने कभी हंसी का ऐसा वर्णन पढ़ा है? और आप इस वर्णन के प्रभाव से उबरें-उबरें  कि  लेखक पण्डित जी की बेचैनी के दिनों के वर्णन  से आपको चमत्कृत कर डालता है. थोड़ा बड़ा है यह अंश लेकिन मैं यहां इसे अपने पाठकों से साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं: आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि पण्डित  जी के लिए कितनी बेचैनी के दिन रहे होंगे? बेचैनी के दिन और बेचैनी की रातें...जब उनकी अपनी ही ‘सृष्टि’ की सारी संतानें बिना उनसे अनुमति लिए जबर्दस्ती उनके कमरे में घुस आती रही होंगी और कहती रही होंगी – ‘न्याय के लिए प्राण देना सीखो, सत्य के लिए प्राण देना सीखो, धर्म के लिए प्राण देना सीखो.’

एक संतान गई नहीं कि दूसरी आ खड़ी हुई – पिछले पाँच-सात महीनों से इन्हीं बच्चों को गुरुमंत्र दे रहे थे पिताश्री कि ‘किसी से न डरना  - गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी  नहीं.’  और बड़ी तालियां और फूलों के गजरे बटोरते रहे,  आप किससे डर रहे हैं?  अमरचंद जोशी  से? वे तो अपनी भलाई देख रहे हैं? जोशी ने आप पर कोई कृपा नहीं की है, उसने आपको रेक्टर भी अपने ही लिए बनाया है. इस तरह  के सारे पदों, प्रलोभनों से आप बड़े हैं महाराज! यही मौका  है, आप अपने को इन बच्चों के आगे झूठा मत साबित कीजिए.

नीचे धरती, ऊपर आकाश, बीच में आप. कबीर भी आए होंगे और उनके साथ ही उपन्यासों की बची-खुची संतानें एक-एक कर आती रही होंगी और रात के सन्नाटे में जगा-जगाकर कहती रही होंगी – ‘अब कै दिन की जिंदगानी रह गई है आपकी? अब अपनी मत देखिए, हमारी चिंता कीजिए. हम क्या जवाब देंगे?’

और पण्डित जी का वह सबसे प्रिय काल देवता भी आया होगा अपने ओठों पर कुटिल मुस्कान के साथ – ‘फेर दिया न पानी अपने सारे किए-कराए पर! रेक्टर न रहते तो क्या मर गए होते? जीने के लिए किसी न किसी पद पर बने रहना ज़रूरी था क्या? तुम्हें किस चीज़ की कमी थी? प्रतिष्ठा की? दौलत की? पद की? चाहते क्या हो तुम?  निश्चय ही इस अंश का सही प्रभाव वही ग्रहण कर सकता है जिसने पण्डित जी को डूब कर पढ़ा हो. असल में इस संस्मरण में काशीनाथ सिंह ने पण्डित जी पर पूरी श्रद्धा, पूरी आत्मीयता  और पूरी निस्संगता से कलम चलाई है. यहां पण्डित जी अपनी पूरी सामर्थ्य और तमाम कमज़ोरियों के साथ हमारे सामने आते हैं.

किताब का दूसरा संस्मरण है ‘दंतकथाओं में त्रिलोचन’. यहां भी त्रिलोचन  के प्रति वैसी ही आत्मीयता और वैसी ही बेबाकी है जैसी पण्डित जी वाले संस्मरण में थी. इस संस्मरण  को पढ़ते हुए हम काशीनाथ सिंह के अपने नगर बनारस के साथ एक ख़ास तरह के पसन्द-नापसंद  भरे रिश्ते से परिचित होते  हैं.  यह उनका नगर है लेकिन यह नगर प्रतिभाओं के साथ जैसा बर्ताव करता है उसके प्रति अपनी नाराज़गी को लेखक कहीं भी छिपाता नहीं है. त्रिलोचन पर उनकी निष्कर्षात्मक टिप्पणी दृष्टव्य है: त्रिलोचन! मुझे लगता है कि तुम्हारा क़द तुम्हारी कविताओं से बड़ा है और शायद काफी बड़ा.  किताब  का तीसरा संस्मरण एक अपेक्षाकृत कम ज्ञात व्यक्तित्व नागानंद मुक्तिकण्ठ पर है. बकौल रामनारायण, नागानंद ही वे ‘सज्जन’ हैं जिन्होंने धूमिल को चौपट किया था. और बकौल काशीनाथ  सिंह, ये नागानंद ही ‘धूमिल के रामानंद थे’. नागानंद के बारे में काशीनाथ सिंह की अंतिम राय यह है: “नागानंद को देखे आज सदियां बीत गई हैं. सुना है कि वे मध्यप्रदेश में कहीं हैं. शायद किसी कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग में. वे खुद तो कुछ नहीं लिख सके लेकिन उस दौर में नगर में जो कुछ लिखा जा रहा था, उसके पीछे नागानंद के वज़ूद की चुनौतियां थीं. उनका हाल चौराहे की बीचोबीच खड़े उस ट्रैफिक पुलिसिए का था जो खुद तो खड़ा रहता है, लेकिन जानेवालों को रास्ता बताता जाता है.   स्वाभाविक ही है कि इसके बाद वाला संस्मरण धूमिल पर है. शीर्षक है ‘जी ही जाने है आह मत पूछो’. अपने पाठकों से धूमिल का परिचय कराते हुए काशीजी ने बहुत बेबाकी से लिखा है:  यह आग और यह समझ  काफी देर बाद पैदा हुई थी, शुरू में नहीं. शुरू में तो वह हरेक खूंटे के नज़दीक गया और आदतन हरेक की पूंछ उठाके देखता रहा.  और इसके कुछ ही देर बाद काशी जी धूमिल के साहित्यिक विवेक के विकास की एक बानगी यह लिख कर पेश करते हैं: जिन दिनों कृष्णा सोबती की कहानी ‘यारों के यार’ पर बहस हो रही थी, उसकी दो प्रतिक्रियाएं थीं – एक, विचार कहानी पर न होकर ‘चुदक्कड़’ और ‘बहनचोद’ पर क्यों हो रहा है? दूसरे, यह देखना चाहिए कि कृष्णा सोबती इन शब्दों को जीवन में भी झेलती हैं या साहित्य में ही अकथ को कहने की गुंजाइश रखती हैं. साथ  ही, क्या चरित्र के मुंह में ऐसे शब्दों को डाल देना, जो उसके मुंह में नहीं हैं, उचित है?   लेखक ने दो स्थलों पर लगभग सूत्र रूप में धूमिल को ला खड़ा  किया है: धूमिल अपने आप में अपनी कविता था – कविता के ही मुहावरों की तरह उसका व्यक्तित्व धारदार व चमकदार था और  धूमिल वह कबाड़ी है जो ऐसे हर सामान को बड़ी सावधानी और एहतियात से बटोरता रहता है, जिसे दूसरे रद्दी और फालतू समझकर छोड़ा या फेंका करते हैं.   धूमिल पर लिखे इस संस्मरण के एक-एक शब्द से काशीनाथ का  उनके प्रति अनुराग टपकता है, लेकिन महत्व की बात यह है कि यह अनुराग उसके वस्तुपरक मूल्यांकन में बाधक नहीं बना है और रचनाकार ने जिस शिद्दत से उसकी खूबियों को उभारा है उसी शिद्दत से उसकी कमज़ोरियों का भी ज़िक्र किया है.

किताब का अगला संस्मरण है ‘किस्सा साढ़े चार यार’ और यह आधारित है रवीन्द्र कालिया, विजयमोहन, दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन पर. ये सभी काशीनाथ सिंह के अंतरंग हैं इसलिए ज़ाहिर है इन पर खूब खुल कर लिखा गया है और जम कर मज़ेदार चुटकियां भी ली गई हैं.  किसी की भी खिंचाई करने में लेखक ने कोई कसर नहीं छोड़ी है, और दोस्ती में यह स्वाभाविक भी है.  लेकिन शायद यह भी दोस्ती का ही तकाज़ा है कि दोस्तों की कमज़ोरियों को भी कुछ इस तरह पेश किया जाए कि वह उनकी कमज़ोरी न लगे. अब देखिये ना, काशीनाथ सिंह अपने दोस्त दूधनाथ सिंह के झूठ बोलने के बहुत सारे प्रसंग सुनाने के बाद कहते हैं:  दूधनाथ का झूठ दूधनाथ पर नहीं, इलाहाबाद की साहित्यिक संस्कृति पर करारी टिप्पणी है. अब, क्या आपको नहीं लगता कि यह बात किसी के लिए भी इतनी ही सहजता से कही जा सकती है?  लेकिन मित्रों, दोस्ती में इतना हक़ तो मिलना ही चाहिए. किताब का अगला संस्मरण सम्भवत: काशीजी के सर्वाधिक चर्चित संस्मरणों में से एक है: ‘देख तमाशा लकड़ी  का’.   इस संस्मरण  के शुरू में जो वैधानिक चेतावनी नुमा टिप्पणी है वो आपको आगे लगने वाले झटकों के लिए तैयार कर देती है: मित्रों, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते  कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है! जो भाष अमें गंदगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद ‘परम’ (चूतिया का र्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएं – काशी के अपने मुहल्ले अस्सी पर आधारित यह सस्मरण सुभाषितों से भरा पड़ा है, और सुभाषित वेज भी हैं नॉन वेज भी. एक जगह पत्रकारों की खबर इस तरह ली गई है : तीसरी नस्ल और भी ज़ालिम है – पत्रकारों की! ‘तलवार मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ वालों की. ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी-डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है!  किताब का आखिरी संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ नामवर जी पर है. इस पर बात मैं ‘घर का जोगी जोगड़ा’ किताब पर (उसमें भी यह शामिल है) बात करते हुए करूंगा.

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त्रयी की दूसरी किताब ‘आछे दिन पाछे गए’ को स्मरण-कथाओं की किताब कहते हुए ‘समीक्षक मित्र कमला प्रसाद’ (अब दिवंगत) को समर्पित किया गया है. इसमें जो रचनाएं संग्रहीत हैं वे 1976 से 2003 के बीच विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. सर्वाधिक, आठ में से पाँच रचनाएं ‘हंस’ में प्रकाशित हुईं और शेष ‘कहन’, ‘रविवार’  और ‘हिरावल’  में प्रकाशित हुईं. किताब की पहली रचना है ‘रहना नहीं देस बिराना है’. इस स्मरण कथा में खूब सारा बनारस है और लगभग उतना ही आत्म तर्पण है. बनारस को लेखक ने बहुत दिलचस्प अन्दाज़ में याद किया है. देखें: जब भी मैं याद करता हूं इस नगर को, यह ‘मुग़ले आज़म’ फिल्म के अकबर की तरह मेरी आंखों के आगे खड़ा, तमतमाया हुआ, हांफता-हूंफता नज़र आता है. वही गुस्से में आग उगलती आंखें, थरथराता बदन, घंघनाती आवाज़, सुनाई पड़ता है –‘अनारकली, सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे!’

यह अकबर कोई और नहीं, हिंदी विभाग था और सलीम मेरा अस्सी, अस्सी मुहल्ले के लोग, यहां के मेरे पढ़-अपढ़ यार-दोस्त और वे लड़के जिनके साथ मैं पढ़ता-पढ़ाता था और जिन्हें हाल-हाल तक नहीं पता था कि अकसर हमारे बीच उठता-बैठता यह चमरकिट-सा आदमी मास्टर के सिवा भी कुछ है.   ज़ाहिर है कि यह आदमी मास्टर के सिवा एक लेखक है, और अपने लेखन  को लेकर उसका विचार यह है: कभी-कभी मुझे लगता है कि मैंने सारा जीवन वह लिखा जिसे नहीं लिखता, तब भी चल जाता मगर वह नहीं लिखा जो लिखना चाहिए था!

किताब  का दूसरा लेख ‘कलकत्ता में बांकेलाल’ शीर्षक से लेखक के अभिन्न मित्र रामधार  उर्फ़ बांकेलाल उर्फ़ प्रख्यात कोश विज्ञानी डॉ आर ए (राम अधार) सिंह पर है. लेख की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें शामिल किए गए रामधार के पत्र/पत्रांश! तीसरा लेख ‘मुसाफ़िरखाना  में चार दिन’ दो युवा रचनाकारों महेश्वर और रमेश पर केन्द्रित है. अब तक के तमाम लेखों से हटकर है इस किताब का अगला लेख ‘कहानी की वर्णमाला और मैं’. यह एक ऐसा लेख है जिसे, मेरी राय में, हर कहानीकार को और हर उस व्यक्ति को जो कहानीकार बनना चाहता है, अवश्य पढ़ना चाहिए. यहां काशीनाथ  सिंह ने जैसे अपने पूरे लेखकीय  जीवन का निचोड़  सामने रख दिया है. एक जगह उन्होंने लिखा है:  कहानी विचारों से नहीं बनती है, वह बनती है ज़िन्दगी से, वह ज़िन्दगी जो समाज में कई स्तरों पर फैली है और किसी रूप में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.   एक और महत्व की बात यह है: एक लेखक में चीज़ों को देखने की एक साफ़ दृष्टि होनी चाहिए.  इस लेख में अगर लेखन पर उनके विचार हैं तो किताब के छठे लेख ‘परिवेश’ स्मृतियों में’ में  अपने किए का लेखा-जोखा है. किताब का पांचवां लेख ‘इक्कीसवीं सदी के देश का सफर’ में काशीनाथ सिंह जी की जापान यात्रा का वृत्तांत है.  इस किताब का सबसे शानदार लेख इसका अन्तिम लेख ‘या तरुवर महं एक पखेरू’ है जिसमें लेखक ने अपने गुरुजन, दीक्षित जी, विजयशंकर मल्ल, और बच्चन सिंह को अपने ख़ास अन्दाज़ में स्मरण किया है. इन तीनों गुरुजन पर लेखक की टिप्पणी देखिए: हमारे तीन गुरु और तीनों में जैसे खराब पढ़ाने की होड़, जनमत यह था कि अगर गौर से न सुना जाए तो ‘और’ के विशेष उच्चारण-कौशल के कारण बच्चन जी इन सब पर भारी हैं!  
बच्चन सिंह के प्रति काशीनाथ जी  का अतिरिक्त अनुराग कई जगह व्यक्त हुआ है, लेकिन यह अनुराग भी उन्हें यह लिखने से नहीं रोक सका है: ‘आलोचना’ का सम्पादन करते समय उन्हें ‘समीक्षक’ सिद्ध करने में नामवर ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जो चीज़ नहीं थी और आज भी  नहीं है, उसके लिए नामवर या कोई भी क्या करता?
वह चीज़ है ‘रीढ़’.
इसे ही आलोचक लोग ‘प्रतिभा’ बोलते हैं.

किताब का आखिरी लेख ‘तीसरे भाई की खोज में प्रानपियारे’ आलोचक और अप्रतिम संगठनकर्ता कमला प्रसाद पर केन्द्रित है. लेखक ने ‘सहृदय’ और ‘साहित्य’  को जुड़वां भाई बताते हुए कमला बाबू को उनका तीसरा भाई कहा है. इस लेख के एक-एक शब्द से कमला बाबू के प्रति काशीनाथ जी का अनुराग व्यक्त होता है. यहां अगर उनकी खिंचाई भी है तो बेहद लाड़ के साथ!

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संस्मरण त्रयी की तीसरी किताब है वर्ष 2006 में प्रकाशित ‘घर का जोगी जोगड़ा’. ‘भैया के अस्सीवें  बसंत पर’ यह किताब ज़ाहिर है कि नामवर जी पर केन्द्रित है. ‘स्मरण’  शीर्षक अपनी भूमिका में काशीनाथ जी ने लिखा है, शायद ही मेरी कोई ऐसी कहानी हो जो भैया को पसन्द हो लेकिन ऐसा संस्मरण और कथा-रिपोर्ताज भी शायद ही हो जो उन्हें नापसन्द हो.

अब बात करें  इस किताब की. जैसा मैंने पहले कहा, इसमें तीन संस्मरण और एक परिशिष्ट-साक्षात्कार है. पहले संस्मरण ‘जीयनपुर’ में बनारस ज़िले के उस अनाम-से गांव का जहां नामवर जी का जन्म हुआ, और उनकी वंश परम्परा का परिचय है. दूसरा संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ नामवर जी के व्यक्तित्व से उनकी बनावट और बुनावट से और उनके सोच से हमारा गहन साक्षात्कार कराता है. असल में इस किताब के लेखों में व्यक्ति नामवर जी और आलोचक नामवर जी, दोनों को गहराई से जानने का मौका मिलता है. थोड़ी चर्चा नामवर जी के अध्यापक पक्ष की भी है. इस तरह इस किताब से हमें नामवर जी को लगभग समग्रता में जानने-समझने का मौका मिलता है. यहां काशीनाथ जी ने अपने भाई पर एक बहुत मार्के की बात  कही है:  लोग कहते थे और उन्हें दर्द था कि ‘नामवर ने इनके बारे में लिखा’, ‘उनके बारे में लिखा’, ‘मेरे बारे में नहीं लिखा’ या ‘मेरे बारे में ऐसा लिखा.’ मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं, सिर्फ अपने बारे में लिखा है और ‘अपने बारे में’ का मतलब है जिसमें उसने ‘अपने आप’ को सबसे अधिक पाया है. वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं, रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं.  यह लेख जितनी गहराई से नामवर की पड़ताल करता है वह अतुलनीय है. एक जगह काशी ने अपने भाई को यह कहते हुए उद्धृत किया है : ऐसा  कुछ भी न करना कि मेरा सिर झुके. बाद में जब एक दफ़ा काशीनाथ सिंह अपने भाई से यह चाहते हैं कि हिंदी विभाग में वे लेक्चरर की दो खाली जगहों में से एक के लिए अध्यक्ष शर्मा जी से उनकी सिफारिश कर दें तो नामवर गम्भीर हो जाते हैं, और लम्बी सांस लेकर कहते हैं: जो मैं नहीं कर सकता, उसके लिए क्यों कहते हो? होगा तो होगा, नहीं होगा तो नहीं होगा. तुम देख सको तो खुद देखो. मैं किसी से नहीं कहूंगा. ‘घर का जोगी जोगड़ा’ शीर्षक वाले संस्मरण, जिसकी शुरुआत भौजी के न रहने की ख़बर से होती है, में बात भौजी से शुरू होकर परिवार की स्थितियों पर आ जाती है. भौजी के लिए काशी जी ने लिखा है: उनकी ज़िन्दगी ही ‘चुपचाप’ की थी!  कभी किसी को पता ही नहीं चला कि वे ‘थीं’  भी! ....शादी के दस पन्द्रह साल तक उन्होंने जाना ही नहीं कि मुंह में ज़बान भी है. ... वे भारत की उन नारियों में से रही हैं, जो कभी नहीं जान पातीं कि पैदा होने और मरने के बीच जीवन भी होता है. वे आज़ादी से पहले के अपने मुल्क की उन बेटियों में से एक थीं जो जानती थीं कि जिस घर में पैदा हुई हैं, वह उनका घर नहीं है. उनका अपना घर कहां है, किधर है, कब होगा – इसे न उनकी मां जानती थी, न बाप.   यहां जिस तटस्थता और बेबाकी के साथ लेखक ने तत्कालीन परिवेश का और उस परिवेश में स्त्री की कुदशा का चित्रण किया है, उसकी सराहना के लिए हर अभिव्यक्ति अपूर्ण ही होगी. नामवर के पिता बिना अपने बेटे की सहमति के मचखियां निवासी नवाब सिंह को ज़बान दे देते हैं कि अपने बेटे की शादी उनकी बेटी से कर देंगे, नामवर पत्नी  को अपने साथ नहीं रखते, बनारस में भी काशी महसूस करते हैं कि भौजी भैया की कार्यसूची में फिलहाल थीं ही नहीं. कुल मिलाकर यह कि पत्नी से उनकी जो अपेक्षाएं थीं, वे पूरी  नहीं हो सकती थीं, और दोनों के बीच की खाई चौड़ी होती गई. लेकिन जैसे इतना  ही काफ़ी न हो, बेटे  विजय और बेटी गीता से भी उन्हें वो नहीं मिला जो वे चाहते थे. यह सारा वर्णन काशीनाथ जी ने अद्भुत तटस्थता के साथ किया है. निश्चय  ही  उनकी सहानुभूति अपने भाई के साथ है लेकिन इसके बावज़ूद वे कहीं भी औरों को छोटा करने नज़र नहीं आते. मेरे लेखे यह बहुत बड़ी बात है.

अध्यापक नामवर का परिचय कराते हुए काशी जी  ने लिखा है:  वे क्लास में कहानी कभी नहीं बांचते थे, वे उसे किताब  के पन्नों से निकालकर बाहर रख देते थे – रोज़मर्रे के जीवन के बीच; लिहाज़ा हर विद्यार्थी किसी समय की लिखी कहानी को  अपने अनुभव के आसपास देखने लगता था.  नामवर जी के अध्यापक रूप की चर्चा करते हुए लेखक ने उनके समय के अन्य कई अध्यपकों की अध्यापन शैली का भी रोचक किंतु गहन विश्लेषण कर दिया  है. हर कोई जानता और मानता है कि नामवर जी एक अप्रतिम वक़्ता है. इसी बात की चर्चा करते हुए काशी नाथ जी ने लिखा है: और भाषा पर ऐस अनिर्बाध नियंत्रण कि क्या कहिए? क्या मज़ाल जो कोई शब्द या वाक्य या मुहावरा उनकी इच्छा के बिना अपनी मर्ज़ी से कहीं ताक-तूककर चुपके से या ज़बरदस्ती घुस आने की ज़ुर्रत करे. सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन सच्चाई यह है कि बोलने की यह कला जितनी ईश्वरप्रदत्त नहीं है, उससे अधिक अर्जित है – अपनी मेहनत, लगन और धुन की कमाई. 

नामवर सिंह  वाले संस्मरण का सबसे बेहतरीन हिस्सा उसका अंतिम अंश है जहां काशीनाथ सिंह ने नामवर जी के आलोचक रूप का मूल्यांकन किया है. वैसे तो इस पूरे आलेख में टुकड़ों-टुकड़ों में एक आलोचक के रूप में नामवर सिंह के विकास को उभारा गया है लेकिन उस सबका अर्क यहां मौज़ूद है. देखें: वे हिंदी के  पहले मिशनरी आलोचक हुए जो साहित्य की चिंताओं के साथ हिंदी और अहिन्दी प्रदेश के शहरों में ही नहीं, कस्बों और गांवों तक में गए; ज्ञानियों, विज्ञानियों और अज्ञानियों के बीच गए, पढ़े-लिखों और  बेपढ़ों को सुना-सुनाया, हिलाया-डुलाया, झकझोरा – उनके बीच बोलकर जो साहित्य से बाहर के थे, ग़ैर पेशे के थे और हिंदी और साहित्य के प्रति उपहास का भाव रखते थे. उन्होंने उनके भीतर एक बेचैनी पैदा की – जीवन के लिए, समाज के लिए; और अहसास कराया कि साहित्य वही नहीं है जो किताबों में है, और जो किताबों में है वह भी तुम्हारे जीवन और साहित्य के सिवा दूसरा नहीं है. किताबों से बाहर जो तुम्हारे खाने-पीने और जीने-मरने में है वह भी साहित्य है.  मैं बहुत चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रहा हूं एक और अंश उद्धृत करने से: लोगों, अपनी सारी ज़िन्दगी मैंने ऐसा वक्ता नहीं देखा  जिसने अपनी ज़बान से क़लम का काम लिय अहो, जो अपनी वाणी से सुनने वालों के दिल-दिमाग पर लिखता रहा हो. एक ही विषय पर कई-कई व्याख्यान और हर व्याख्यान में हर बार नए नुक्ते, नई बात, नई जानकारियां – जहां सभा कानों से ही नहीं आंखों से भी सुन रही हो.   जिन्होंने कभी भी नामवर जी को बोलते सुना होगा वे पुष्टि करेंगे कि इस कथन में कितनी सच्चाई है.
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काशीनाथ  सिंह की इन तीनों संस्मरण पुस्तकों से गुज़रने के बाद जो बात सबसे पहले  याद रहती है वह है ज़िन्दगी के प्रति उनका गहन अनुराग. जिसमें जीवन के प्रति लबालब प्यार न भरा हो वो ज़िन्दगी की हर छोटी-बड़ी डिटेल को इस तरह याद रख ही नहीं सकता. आप किसी पेड़ के पास से गुज़रते हैं, लेकिन अगर आपसे उसका वर्णन करने को कहा जाए तो आपको कुछ भी नहीं सूझेगा. सूझेगा तो उसी को जो पेड़ से सच्चा प्यार करता होगा. जो भी उनके जीवन में आया, काशीनाथ सिंह ने खुलकर उसे अपनाया और यही वजह है कि इन संस्मरणों में हाड़-मांस के, जीते-जागते इंसान हैं. देवता यहीं नहीं हैं. और यही काशीनाथ सिंह के लेखन की पहली खासियत है कि वे इंसान को इंसान ही रहने देते हैं. दूसरी बात जो मुझे बहुत महत्व की लगती है वो है उनकी ज़िन्दादिली. इन तीनों किताबों के हर पन्ने से उनकी ज़िन्दादिली झांकती है. ज़िन्दादिली और काशी (नगरी)  की विख्यात मस्ती. काशीनाथ  सिंह का गद्य दूसरे लेखकों के गद्य से बहुत अलहदा किस्म का है. इस गद्य के पीछे  शायद उनके भाई नामवर सिंह की भी थोड़ी प्रेरणा रही होगी. नामवर जी ने इन्हें एक पत्र में लिखा था: गद्य कैसा हो? ख़ुश्क़! यानि गीला न हो, भीगा न हो – कपड़े की तरह उसे निचोड़ कर, पानी निथार कर सुखा लो और जब हल्का, कड़कड़ हो जाए, उसमें चमक आ जाए तब इस्तेमाल करो! राग-विराग मुक्त गद्य!  बेशक,  हल्का, कड़कड़ करने वाला और चमकदार गद्य है यह, ऐसा जो शायद ही किसी और लेखक के पास हो.

काशीनाथ  सिंह की ये तीनों किताबें संस्मरण विधा के अंतर्गत आती हैं. हालांकि इन किताबों में जो है उसे सिर्फ़ संस्मरण नहीं कहा जाना चाहिए. अस्ल में इधर हिंदी में विभिन्न विधाओं में जो आवाजाही बढ़ी है और जिस तरह उनके बीच की दीवारें ढही हैं, उनका उत्कृष्ट उदाहरण हैं ये रचनाएं. यहां कहानी भी है, व्यंग्य भी, रेखाचित्र भी, नाटक भी, समीक्षा भी और न जाने और क्या-क्या भी!  और इन सबके बेहतरीन मेल से जो कुछ निर्मित हुआ है, उसे, क्योंकि हमारे पास दूसरा कोई उपयुक्त नाम नहीं है, हम संस्मरण ही कह कर काम चला रहे हैं. वही संस्मरण, जिसकी  हिंदी में कोई बड़ी हैसियत नहीं रही है. बकौल काशीनाथ  जी, संस्मरण की जगह साहित्य के समाज में उस दलित जैसी थी जिसके लिए ‘पंगत’ में कोई पत्तल नहीं. और यह काशीनाथ सिंह की कलम का ही कमाल है कि उन्होंने  इस उपेक्षित विधा को हिंदी की एक अनुपेक्षणीय विधा बना डाला, ठीक अपने ही शहर के उस बड़े कलाकार उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की तरह, जिन्होंने एक नामालूम से वाद्य, शहनाई को भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक ज़रूरी वाद्य बना डाला था.

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सम्बोधन त्रैमासिक के काशीनाथ सिंह विशेषांक में प्रकाशित