Sunday, September 15, 2013

शिक्षक दिवस पर स्मरण अपने ‘गुरुजी’ का!


 लगभग 35 साल खुद शिक्षक रह चुकने के भी दस बरस बाद भी मेरे मन में अपने अनेक शिक्षकों की स्मृतियां संचित  हैं.  करीब 16 बरसों (उन दिनों पूर्व प्राथमिक जैसा कुछ तो होता नहीं था) के अपने अध्ययन काल में अनेक शिक्षकों से पढ़ने और सीखने का मौका मिला. उनमें से बहुतों  की स्मृति तो  धूमिल होते-होते अब लगभग अदृश्य हो गई है, लेकिन कुछ की स्मृति कुछ इस तरह से ताज़ा है जैसे आज भी मैं उनसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूं. कभी मौका मिला तो उनमें से कुछेक को सलीके से स्मरण करूंगा, अभी तो अपने (निस्संकोच कह सकता हूं) सर्वाधिक प्रिय ‘गुरुजी’ को याद करना चाहूंगा. जी हां, वे मेरे लिए ‘सर!’ न होकर ‘गुरुजी’  ही थे.

मैं बात कर रहा हूं मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश आतुर की. अपने ज़माने के बहुत लोकप्रिय कवि थे वे, राजनीतिकर्मी भी और राजस्थान साहित्य अकादमी के ‘न भूतो न भविष्यति’ अध्यक्ष भी. उदयपुर के महाराणा भूपाल कॉलेज में 1961 में पहली बार बी.ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में मैं उनके सम्पर्क में आया,  लेकिन स्नातक अध्ययन के तीन वर्ष बहुत सामान्य रहे. बी.ए. पास करने के बाद विषम पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मेरी पढ़ाई पर विराम लग गया, लेकिन एक संयोग की वजह से, डॉ आतुर के सहज स्वाभाविक और खुले व्यक्तित्व ने उस विराम को पूर्ण विराम बनने से पहले अल्प विराम में परिवर्तित कर एम. ए. हिंदी में मेरे प्रवेश का, और इसी के साथ मुझे अपना बना लेने का पथ प्रशस्त कर दिया. उनसे विद्यार्थी का मेरा रिश्ता दो बरस का ही नहीं रहा.  बाद में जब मैंने पी-एच.डी. करने का फैसला किया तो उन्हीं को अपना गाइड बनाया और 1984 में उनका पहला पी-एच.डी. होने का सौभाग्य भी प्राप्त किया. सितम्बर 1989 में उनके स्वर्गवास होने तक उनसे मेरा रिश्ता न सिर्फ बना रहा, लगातार प्रगाढ़ होता गया. मुझे अब भी अच्छी तरह से याद है कि उदयपुर में उनकी स्मृति में आयोजित एक श्रद्धांजलि सभा में अनायास मेरे मुंह से यह बात निकल गई थी कि “मैं नहीं जानता कि पुनर्जन्म होता है या नहीं होता है. लेकिन अगर मेरा एक और जन्म हो तो मैं चाहूंगा  कि मेरा वो जन्म  प्रकाश  आतुर के बेटे के रूप में ही हो.”

वे एक प्रभावी शिक्षक थे, अपने विषय पर उनकी बहुत मज़बूत पकड़ थी. लेकिन उनकी जो बात उन्हें सामान्य शिक्षक से अलग करती है वो है अपने विद्यार्थियों के प्रति उनका गहनतम अनुराग. आर्थिक अभावों से भरे अपने विद्यार्थी काल  में उनकी निजी लाइब्रेरी की अनगिनत किताबों ने मुझे कभी यह महसूस नहीं होने  दिया कि  ‘काश! यह किताब भी  मेरे पास होती.’  उनकी किताबों को मैंने ऐसे बरता जैसे मेरे पिताजी उन्हें मेरे वास्ते खरीद कर रख गए हों! और किताबें ही क्यों, उनके प्रभाव का प्रयोग भी तो ऐसे ही किया. लेकिन ऐसा  हुआ कैसे? मैं परम संकोची, और उस ज़माने में कॉलेज शिक्षक का अलग ही रुतबा होता था. मुझ जैसा अति सामान्य और संकोची विद्यार्थी किसी प्रोफेसर के नज़दीक आ सके, इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं थी. लेकिन फिर भी यह चमत्कार हुआ. और इस चमत्कार के मूल में था उनका अपना वत्सल व्यक्तित्व.  एक अनुभव को साझा करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. जिस दिन मुझे पी-एच.डी. की उपाधि मिलना तै हुआ उस दिन,  तब प्रचलित प्रथा के अनुसार,  शाम को एक बड़ी दावत मुझे आयोजित करनी चाहिए थी. लेकिन वो दावत डॉ आतुर ने अपने घर पर रखी. उस दावत में जो बहुत सारे लोग शरीक थे उनमें से एक तो आज केन्द्र सरकार में काबीना मंत्री हैं. दावत से ठीक पहले, मैंने बहुत संकोच के साथ  डॉ आतुर से अनुरोध किया कि इस दावत का व्यय भार मुझे वहन करने की अनुमति दें! लगभग तीस बरस बीत जाने के बाद भी उनका गुस्से से तमतमाया चेहरा मेरी स्मृति में ज्यों का त्यों बना हुआ  है. “तुम कौन होते हो? तुम कैसे कर सकते हो यह? आज डॉ आतुर के बेटे को पी-एच.डी. मिली है, तो खुशी भी वो ही मनाएगा!”


मैं चाहूं तो भी गिनती नहीं कर सकता कि कितनी बार उदयपुर में उनके घर भोजन किया और शाम बिताई है! जीवन में हर सुख दुःख में उनका वरद हस्त मुझ पर रहा. उन्होंने मुझे सब कुछ दिया, और बदले में मुझसे कभी कुछ  भी नहीं चाहा. आज जीवन की सन्ध्या वेला में जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि डॉ आतुर ने मेरे जीवन की धारा बदल दी. अगर  वे  मेरी ज़िन्दगी में न आए होते तो मैं न जाने कहां और कैसा होता? उन्होंने मुझे पढ़ने को प्रेरित किया. उन्होंने मुझे साहित्य से जोड़ा. उन्होंने कॉलेज शिक्षक बनने की मेरी दबी हुई आकांक्षा को खाद-पानी दिया. उन्होंने मेरी पीठ पर हाथ रख कर मेरी रीढ़ को सीधी रहने की क्षमता प्रदान की. यह मेरा सौभाग्य था कि गुरु के रूप में मुझे वे मिले. उनकी पावन स्मृति को नमन! 

Thursday, September 5, 2013

अपने अध्यापक साथियों को याद करते हुए....

अपने करीब साढ़े तीन दशक के अध्यापन  काल में अनगिनत शिक्षकों का साहचर्य मिला. उनमें से हरेक की कोई न कोई ख़ासियत थी. लेकिन वक़्त बीतने के साथ बहुत सारी स्मृतियां धूमिल होती जाती हैं. आज अगर चाहूं तो भी उनमें से बहुतों के नाम भी  याद नहीं कर पाता हूं. अभी पिछले दिनों फेसबुक की दीवाल पर एक पुराना फोटो पोस्ट  करते हुए यह बात और भी शिद्दत से महसूस हुई. लेकिन यह बहुत स्वाभाविक है. उम्र का इतना असर हो होगा ही.  फिर भी, आज शिक्षक दिवस पर अपने कुछ साथी ख़ास तौर पर याद आ रहे हैं.  सिरोही  कॉलेज में कुछ समय के लिए कहीं और से स्थानांतरित  होकर आए एक साथी जिनका चेहरा तो याद आ रहा है, नाम याद नहीं आ रहा इस सूची में सबसे ऊपर हैं. उन्होंने अपने विदाई समारोह में बहुत गर्व पूर्वक कहा था कि उन्होंने अपने जीवन में एक भी कक्षा  नहीं पढ़ाई है. तब शायद लगभग पन्द्रह साल तो वे नौकरी कर ही चुके थे. विदाई समारोह के बाद जलपान करते हुए मैं अनायास ही उनसे पूछ बैठा था, “और इस बात पर आपको कभी शर्म भी महसूस नहीं हुई?” इसी अनुभव की पुनरावृत्ति एक बार और हुई. तब मैं अध्यापन की दुनिया से शैक्षिक प्रशासन की दुनिया में आ चुका था और अपनी नौकरी के आखिरी पायदान पर था.  वहां एक साथी मिले, जिनका नाम मैं काफी सुनता रहा था और मेरा खयाल था कि वे गम्भीर अकादमिक रुझान वाले हैं. लेकिन वो छवि खुद उन्होंने ही बड़ी सहज निर्ममता से ध्वस्त कर दी. एक दिन खुद किसी सन्दर्भ में बताने लगे कि उन्होंने (अपने तीसेक बरस के) अध्यापन काल में एक भी कक्षा नहीं पढ़ाई! अपने शैक्षिक प्रशासन काल में मैंने ऐसे कई लोगों के बारे में भी जाना जिन्होंने बाह्य दुनिया में काफी नाम कमाया है और जिनकी छवि बहुत बड़े विद्वानों की है. लेकिन शिक्षा विभाग में रहते हुए भी, किसी न किसी तरह जोड़ तोड़ करके वे पढ़ाने से, कॉलेजों में जाने से, बचते रहे. कभी प्रतिनियुक्ति के बहाने तो कभी और किसी बहाने वे ऐसी जगहों पर काबिज होते रहे जहां उन्हें पढ़ाना न पड़े. आज उनके बारे में सोचता हूं तो मन में सबसे पहले यही सवाल उठता है कि आखिर वे कैसे विद्वान थे? अगर उन्हें पढ़ाने से इतनी ही वितृष्णा थी तो अध्यापक बने ही क्यों? और जिन्होंने ली हुई तनख्वाह के बदले में अपेक्षित दायित्व का निर्वहन नहीं किया, वे भला क्यों और कैसे विद्वान थे? लेकिन समाज में उनका बड़ा मान है. बहुत कुशलता से उन्होंने अपनी छवि जो निर्मित की  है.

एक और सज्जन  की याद आ रही है जो अब दुनिया में नहीं हैं. मेरे सहकर्मी थे. उस ज़माने में जब पी-एच.डी भी कम होते थे, वे डी.लिट थे. हम लोग एक छोटे-से कॉलेज में थे. जिन लोगों को कॉलेजों की दुनिया का ज़रा भी अन्दाज़ा है वे जानते हैं कि कॉलेजों में प्राध्यापकों को पढ़ाने के अलावा भी बहुत सारे काम करने होते हैं. जैसे कॉलेज की पत्रिका निकालना, छात्रसंघ के चुनाव करवाना, अनुशासन बनाए रखने में संस्था प्रधान की सहायता करना, एन.एस.एस, एन.सी.सी. आदि का काम करना, सह-शैक्षिक और शिक्षणेत्तर गतिविधियां आयोजित करना आदि-आदि. प्राचार्य लोगों की रुचि और रुझान के अनुसार ये काम उन्हें सौंपते हैं और लोग कमोबेश निष्ठा से ये काम करते हैं. हम सभी ने किए हैं. लेकिन जिन साथी को मैं स्मरण कर रहा हूं वे इनमें से किसी भी काम को हाथ नहीं लगाते थे. उन्होंने अपने चारों तरफ एक ऐसा प्रभा मण्डल बना रखा था कि इतना बड़ा विद्वान भला ऐसा काम कैसे करेगा? अगर किसी प्राचार्य ने कभी उन्हें कोई काम सौंपना भी चाहा तो उन्होंने यह कहते हुए कि मैं अपनी तरह का इकलौता विद्वान हूं, उस काम को करने दृढ़ता  से इंकार कर दिया. मैं कभी यह नहीं समझ पाया कि उनकी विद्वत्ता संस्था के लिए किस काम की थी? मेरे मन में तब यह सवाल अकसर उठता था कि किसी संस्था के लिए इस तरह के विद्वान ज़्यादा उपयोगी हैं, जो तिनका भी नहीं तोड़ते, या वे उत्साही प्राध्यापक ज़्यादा उपयोगी हैं, जिनके पास ऐसी कोई विरल डिग्री भले ही न हो, लेकिन वे संस्था का हर काम करने के लिए सदा  तैयार रहते हैं?  
     
और जब मैं यह चर्चा कर रहा हूं तो उन महान लोगों की तो कोई बात कर ही नहीं रहा हूं जिन्होंने वैसे तो नितांत लो-प्रोफाइल रखा, विद्वान वगैरह  की भी कोई छवि नहीं निर्मित की, लेकिन कॉलेज शिक्षा विभाग में नौकरी करते हुए भी पढ़ने-पढ़ाने से कभी कोई ताल्लुक नहीं रखा. ऐसे लोगों में से अनेक का ताल्लुक बड़े अफसरों और नेताओं वगैरह  से होता है और ये लोग किसी दन्द फन्द में पड़े बग़ैर चुपचाप अपनी तनख़्वाह लेते हैं और मज़े करते हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा  रही है.  


लेकिन जब मैं इन तमाम लोगों को याद कर रहा हूं तो एक अलग तरह के साथी की याद भी मुझे आ रही है. मेरे ये साथी भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक थे, और बहुत उम्दा प्राध्यापक थे. उनका हर विद्यार्थी उनके ज्ञान और उनकी अध्यापन शैली का मुरीद था. इस बात को कहने की ज़रूरत नहीं है कि भौतिक शास्त्र एक ऐसा विषय है जिसमें ट्यूशन का प्रचलन बहुत ज़्यादा है. लेकिन मेरे ये साथी ट्यूशन नहीं करते थे. बिल्कुल भी नहीं करते थे. ऐसा नहीं है कि ये कोई खानदानी अमीर थे और इन्हें पैसों की ज़रूरत नहीं थी. अगर ऐसा होता तो  इनकी पत्नी क्यों नौकरी करने के लिए रोज़ बसों के धक्के खातीं? लेकिन ट्यूशन ये नहीं करते थे. अपनी बात को सुधार कर कहूं तो यह कि वे फीस लेकर ट्यूशन नहीं करते थे. साल में दो-चार प्रतिभाशाली लेकिन साधन विहीन बच्चों को वे घर पर पढ़ाते भी थे. फीस की बात वे करते ही नहीं और जब विद्यार्थी बहुत ज़ोर देता तो उनका एक ही जवाब होता. जवाब यह होता कि जब तुम पढ़ लिखकर नौकरी करने लग जाओ, तो इसी तरह किसी को पढ़ा देना, बस यही मेरी फीस होगी. उन्होंने कभी अपने इस काम की चर्चा नहीं की, कभी इसके लिए कोई इनाम नहीं मांगा. बस, अपनी तरह अपना काम करते रहे. यह एक संयोग ही था कि अपनी नौकरी के आखिरी चरण  में हम दोनों को फिर से एक साथ काम करने का मौका मिला, और वहां भी मैंने उनमें वही आदर्श देखा. कहना अनावश्यक है कि ऐसे बहुत सारे लोग होंगे. ऐसे भी और वैसे भी. 

Tuesday, February 26, 2013

जोग लिखी: साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह

जोग लिखी: साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह: हिंदी साहित्य में कुछ विधाएं केन्द्र में रही है और कुछ हाशिये पर. केन्द्र में रहने वाली विधाओं में  मुख्य हैं कविता और कहानी, जबकि बाकी स...

साहित्य के बिस्मिल्लाह काशीनाथ सिंह


हिंदी साहित्य में कुछ विधाएं केन्द्र में रही है और कुछ हाशिये पर. केन्द्र में रहने वाली विधाओं में  मुख्य हैं कविता और कहानी, जबकि बाकी सारी विधाएं कमोबेश हाशिये पर ही रही हैं. अब इस बात पर अलग से विचार किया जा सकता है कि विधाओं की इस स्थिति के लिए इनके रचनाकार कितने ज़िम्मेदार हैं और आलोचक कितने. लेकिन ज़िम्मा चाहे जिसका हो, इस स्थिति से शायद  ही कोई असहमत हो.  असहमति इस बात से ज़रूर होती है कि कविता केन्द्रीय विधा है या कहानी. लेकिन नाटक, निबंध, ललित  निबंध, डायरी, रेखाचित्र, संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा वगैरह ने कभी केन्द्रीय स्थान के लिए अपना दावा पेश नहीं किया. बहुत कम रचनाकार ऐसे रहे जिन्होंने केवल इन विधाओं में से किसी में काम किया और महत्व प्राप्त किया. महत्व पाने के लिए किसी केन्द्रीय या महत्व वाली विधा में रचना कर्म की बैसाखी ज़रूरी ही रही.

लेकिन अपवाद कहां नहीं होते!

असल बात तो है रचना. अगर रचना में दम होता है तो फिर और सब बातें पीछे रह जाती   हैं. महत्व विधा का नहीं, उस विधा विशेष में किए गए काम का होता है. होना भी चाहिये. अब यही देखिए ना कि मैं बात केन्द्रीय विधा की कर रहा था, और मेरे सामने है काशीनाथ सिंह का रचनाकर्म. काशीनाथ सिंह जो सुपरिचित कथाकार हैं, उपन्यासकार हैं, नाटककार हैं, लेकिन आज उन्हें अधिक जाना जाता है उनके संस्मरणात्मक लेखन के लिए.  यानि उस विधा के लेखन के लिए जो कभी भी केन्द्रीय विधा नहीं रही.

‘अपना मोर्चा’ जैसे चर्चित और बहु प्रशंसित उपन्यास तथा ‘लोग बिस्तरों पर’, ‘सुबह का डर’, ‘आदमीनामा’, ‘नई तारीख’, ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, ‘कल की फटेहाल  कहानियां’   और कई अन्य संग्रहों में संग्रहित कहानियों के जाने-माने लेखक काशीनाथ सिंह का एक संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ पहल-88 में छपा और कुछ संस्मरण जैसे ‘नागानंद चरितम वल्द अस्सी चौराहा’, ‘जी ही जाने है आह मत पूछो’, ‘दंत कथाओं में त्रिलोचन’, 'देख तमाशा लकड़ी का’  वगैरह सन 90-91 में ‘हंस’  और ‘वर्तमान साहित्य’  में छपे तो जैसे पूरे हिन्दी साहित्य जगत में तहलका मच गया. बेशक ‘हंस’  में छपे  कुछ संस्मरणों की बेबाक भाषा ने अलग से उत्तेजना का माहौल बनाया, लेकिन गम्भीर और समझदार पाठकों का ध्यान इस बात की तरफ़ गए बगैर नहीं रह सका कि इस संस्मरण विधा को पहले तो किसी ने इस तरह से नहीं बरता था. और बात केवल ‘अभूतपूर्व’ होने की ही नहीं थी. बात यह भी थी कि इस बरताव से इस विधा में नई ऊर्जा  का संचार हो गया था. अब तक जिस विधा का इस्तेमाल प्राय: छवि निर्माण के निमित्त किया जाता था, और इसलिए आधार व्यक्तित्व से एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखी जाती थी, काशीनाथ सिंह ने इस विधा में कुछ और ही कर डाला. उन्होंने जिन लोगों  को अपने संस्मरणों में स्मरण किया  उन्हें  कुछ इस तरह स्मरण किया कि वे अपनी समस्त अस्थि-मज्जा के साथ, अपनी तमाम कमज़ोरियों और ताकतों के साथ, अपनी सारी  खूबसूरतियों और बदसूरतियों के साथ, अपनी हर भलाई और हर बुराई के साथ आपके सामने आ खड़े हुए. वे आपके इतने निकट आ गए कि लगा उनकी  सांस आपकी गर्दन को छू रही है, लगा उनकी पीक के दाग आपके कुर्ते पर अब लगे कि अब लगे. और तब लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि कोई विधा न कमज़ोर होती है और न ताकतवर. असली कमाल तो उसको बरतने वाले का होता है. काशीनाथ सिंह में दम था तो उन्होंने  एक नामालूम-सी विधा में भी भी कमाल कर दिखाया. याद आया – कमाल पैदा तो करे कोई!

काशीनाथ  सिंह के संस्मरण उनकी तीन किताबों में उपलब्ध हैं: याद हो कि न याद हो (1992), आछे दिन पाछे गए (2004) और घर का जोगी जोगड़ा (2006). इन किताबों में क्रमश: सात, आठ  और तीन संस्मरण है. इनके अतिरिक्त ‘घर का जोगी जोगड़ा’  में परिशिष्ठ के रूप में ‘नामवर से काशी’ शीर्षक एक छोटी-सी बातचीत भी है. इनमें से ‘गरबीली गरीबी वह’  शीर्षक संस्मरण, जो नामवर सिंह पर है, ‘याद हो कि न याद हो’ में भी है और ‘घर का जोगी जोगड़ा’ में भी. वैसे यह (घर का जोगी जोगड़ा) तो पूरी किताब ही नामवर सिंह पर है. हिंदी साहित्य की दुनिया में, काशीनाथ सिंह को नामवर सिंह का भाई होने के नाते काफी-कुछ सुनना और सहना पड़ा है (जबकि दिलजलों  का मानना-कहना यह  भी है कि काशीनाथ सिंह आज जो भी हैं वो इसी वजह से हैं) ऐसे में किसी की भी दिलचस्पी यह जानने में हो सकती है कि काशीनाथ सिंह अपने भाई के बारे में क्या सोचते हैं. यह बात न भी होती तो हिंदी के एक समर्थ आलोचक और सुपरस्टार होने के नाते नामवर सिंह सबकी रुचि के विषय थे और हैं. नामवर सिंह पर काशीनाथ जी के संस्मरणों की चर्चा थोड़ा ठहर कर.

काशीनाथ सिंह के इस संस्मरण त्रिलोक की शुरुआत होती है उनके गुरुवर डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी  पर लिखे संस्मरण ‘होलकर  हाउस में हजारी प्रसाद द्विवेदी’  से. संस्मरण शुरु होता है महाकाव्य ‘पृथ्वी राज रासो’  के उस अंश के वर्णन से जिसमें पृथ्वी राज के देवगिरि आगमन का दृश्य है और काशीनाथ सिंह इसे जोड़ते हैं हजारी बाबू के बनारस आगमन के दृश्य से. सात बरस बाद हजारी बाबू का बनारस आगमन एक बड़ी और महत्वपूर्ण घटना है लेकिन उनके वहां आने से बहुतों को कोई खुशी नहीं है. इसलिए नहीं है कि वे पारंपरिक आचार्य जो नहीं हैं. कैसा होता है यह पारम्परिक आचार्य? बताते हैं काशीनाथ जी: जदि आपकी चमड़ी चीमड़ या चम्चम हो, हड्डियां गुट्ठल या गद्गद हों, चोटी से चरणों तक बदन के ढांचे के ताने-बाने पर तनी हुई नसें या तो आशीर्वाद उगल रही हों या असहमति के फव्वारे फेंक रही हों, तब तो भाई आचार्य; अन्यथा राम  भजिए!  ज़ाहिर है कि हजारी बाबू ऐसे नहीं हैं. तो विरोध  तो  अवश्यंभावी है. और विरोध भी इतना अधिक कि उसने पण्डित जी से उनकी हंसी तक छीन ली. वह हंसी, जिसका अद्भुत वर्णन किया है काशीनाथ सिंह ने. मैं चाहता हूं कि आप भी उसका आनंद लें:  हंसते थे पण्डित जी भी और ऐसी हंसी कि क्या कहने? हज़ारों किस्से हैं इस हंसी के. कभी वह कवच होती थी, कभी हथियार. कभी खुद पर होती थी, कभी और पर. लेकिन उनकी एक हंसी ऐसी भी होती थी जो साथ के मनुष्य को कपड़े-लत्ते, रोजी-रोटी, हाट-बाज़ार, घर-द्वार, शत्रु-मित्र, ऊंच-नीच, अमीर-ग़रीब – इन सबके दुनियाओं से उठाकर वहां रख देती थी जहां वह ‘जीने का अर्थ’ खुलता हुआ महसूस करता था.  सोचिये और याद कीजिए कि क्या आपने कभी हंसी का ऐसा वर्णन पढ़ा है? और आप इस वर्णन के प्रभाव से उबरें-उबरें  कि  लेखक पण्डित जी की बेचैनी के दिनों के वर्णन  से आपको चमत्कृत कर डालता है. थोड़ा बड़ा है यह अंश लेकिन मैं यहां इसे अपने पाठकों से साझा करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं: आप अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि पण्डित  जी के लिए कितनी बेचैनी के दिन रहे होंगे? बेचैनी के दिन और बेचैनी की रातें...जब उनकी अपनी ही ‘सृष्टि’ की सारी संतानें बिना उनसे अनुमति लिए जबर्दस्ती उनके कमरे में घुस आती रही होंगी और कहती रही होंगी – ‘न्याय के लिए प्राण देना सीखो, सत्य के लिए प्राण देना सीखो, धर्म के लिए प्राण देना सीखो.’

एक संतान गई नहीं कि दूसरी आ खड़ी हुई – पिछले पाँच-सात महीनों से इन्हीं बच्चों को गुरुमंत्र दे रहे थे पिताश्री कि ‘किसी से न डरना  - गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी  नहीं.’  और बड़ी तालियां और फूलों के गजरे बटोरते रहे,  आप किससे डर रहे हैं?  अमरचंद जोशी  से? वे तो अपनी भलाई देख रहे हैं? जोशी ने आप पर कोई कृपा नहीं की है, उसने आपको रेक्टर भी अपने ही लिए बनाया है. इस तरह  के सारे पदों, प्रलोभनों से आप बड़े हैं महाराज! यही मौका  है, आप अपने को इन बच्चों के आगे झूठा मत साबित कीजिए.

नीचे धरती, ऊपर आकाश, बीच में आप. कबीर भी आए होंगे और उनके साथ ही उपन्यासों की बची-खुची संतानें एक-एक कर आती रही होंगी और रात के सन्नाटे में जगा-जगाकर कहती रही होंगी – ‘अब कै दिन की जिंदगानी रह गई है आपकी? अब अपनी मत देखिए, हमारी चिंता कीजिए. हम क्या जवाब देंगे?’

और पण्डित जी का वह सबसे प्रिय काल देवता भी आया होगा अपने ओठों पर कुटिल मुस्कान के साथ – ‘फेर दिया न पानी अपने सारे किए-कराए पर! रेक्टर न रहते तो क्या मर गए होते? जीने के लिए किसी न किसी पद पर बने रहना ज़रूरी था क्या? तुम्हें किस चीज़ की कमी थी? प्रतिष्ठा की? दौलत की? पद की? चाहते क्या हो तुम?  निश्चय ही इस अंश का सही प्रभाव वही ग्रहण कर सकता है जिसने पण्डित जी को डूब कर पढ़ा हो. असल में इस संस्मरण में काशीनाथ सिंह ने पण्डित जी पर पूरी श्रद्धा, पूरी आत्मीयता  और पूरी निस्संगता से कलम चलाई है. यहां पण्डित जी अपनी पूरी सामर्थ्य और तमाम कमज़ोरियों के साथ हमारे सामने आते हैं.

किताब का दूसरा संस्मरण है ‘दंतकथाओं में त्रिलोचन’. यहां भी त्रिलोचन  के प्रति वैसी ही आत्मीयता और वैसी ही बेबाकी है जैसी पण्डित जी वाले संस्मरण में थी. इस संस्मरण  को पढ़ते हुए हम काशीनाथ सिंह के अपने नगर बनारस के साथ एक ख़ास तरह के पसन्द-नापसंद  भरे रिश्ते से परिचित होते  हैं.  यह उनका नगर है लेकिन यह नगर प्रतिभाओं के साथ जैसा बर्ताव करता है उसके प्रति अपनी नाराज़गी को लेखक कहीं भी छिपाता नहीं है. त्रिलोचन पर उनकी निष्कर्षात्मक टिप्पणी दृष्टव्य है: त्रिलोचन! मुझे लगता है कि तुम्हारा क़द तुम्हारी कविताओं से बड़ा है और शायद काफी बड़ा.  किताब  का तीसरा संस्मरण एक अपेक्षाकृत कम ज्ञात व्यक्तित्व नागानंद मुक्तिकण्ठ पर है. बकौल रामनारायण, नागानंद ही वे ‘सज्जन’ हैं जिन्होंने धूमिल को चौपट किया था. और बकौल काशीनाथ  सिंह, ये नागानंद ही ‘धूमिल के रामानंद थे’. नागानंद के बारे में काशीनाथ सिंह की अंतिम राय यह है: “नागानंद को देखे आज सदियां बीत गई हैं. सुना है कि वे मध्यप्रदेश में कहीं हैं. शायद किसी कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग में. वे खुद तो कुछ नहीं लिख सके लेकिन उस दौर में नगर में जो कुछ लिखा जा रहा था, उसके पीछे नागानंद के वज़ूद की चुनौतियां थीं. उनका हाल चौराहे की बीचोबीच खड़े उस ट्रैफिक पुलिसिए का था जो खुद तो खड़ा रहता है, लेकिन जानेवालों को रास्ता बताता जाता है.   स्वाभाविक ही है कि इसके बाद वाला संस्मरण धूमिल पर है. शीर्षक है ‘जी ही जाने है आह मत पूछो’. अपने पाठकों से धूमिल का परिचय कराते हुए काशीजी ने बहुत बेबाकी से लिखा है:  यह आग और यह समझ  काफी देर बाद पैदा हुई थी, शुरू में नहीं. शुरू में तो वह हरेक खूंटे के नज़दीक गया और आदतन हरेक की पूंछ उठाके देखता रहा.  और इसके कुछ ही देर बाद काशी जी धूमिल के साहित्यिक विवेक के विकास की एक बानगी यह लिख कर पेश करते हैं: जिन दिनों कृष्णा सोबती की कहानी ‘यारों के यार’ पर बहस हो रही थी, उसकी दो प्रतिक्रियाएं थीं – एक, विचार कहानी पर न होकर ‘चुदक्कड़’ और ‘बहनचोद’ पर क्यों हो रहा है? दूसरे, यह देखना चाहिए कि कृष्णा सोबती इन शब्दों को जीवन में भी झेलती हैं या साहित्य में ही अकथ को कहने की गुंजाइश रखती हैं. साथ  ही, क्या चरित्र के मुंह में ऐसे शब्दों को डाल देना, जो उसके मुंह में नहीं हैं, उचित है?   लेखक ने दो स्थलों पर लगभग सूत्र रूप में धूमिल को ला खड़ा  किया है: धूमिल अपने आप में अपनी कविता था – कविता के ही मुहावरों की तरह उसका व्यक्तित्व धारदार व चमकदार था और  धूमिल वह कबाड़ी है जो ऐसे हर सामान को बड़ी सावधानी और एहतियात से बटोरता रहता है, जिसे दूसरे रद्दी और फालतू समझकर छोड़ा या फेंका करते हैं.   धूमिल पर लिखे इस संस्मरण के एक-एक शब्द से काशीनाथ का  उनके प्रति अनुराग टपकता है, लेकिन महत्व की बात यह है कि यह अनुराग उसके वस्तुपरक मूल्यांकन में बाधक नहीं बना है और रचनाकार ने जिस शिद्दत से उसकी खूबियों को उभारा है उसी शिद्दत से उसकी कमज़ोरियों का भी ज़िक्र किया है.

किताब का अगला संस्मरण है ‘किस्सा साढ़े चार यार’ और यह आधारित है रवीन्द्र कालिया, विजयमोहन, दूधनाथ सिंह और ज्ञानरंजन पर. ये सभी काशीनाथ सिंह के अंतरंग हैं इसलिए ज़ाहिर है इन पर खूब खुल कर लिखा गया है और जम कर मज़ेदार चुटकियां भी ली गई हैं.  किसी की भी खिंचाई करने में लेखक ने कोई कसर नहीं छोड़ी है, और दोस्ती में यह स्वाभाविक भी है.  लेकिन शायद यह भी दोस्ती का ही तकाज़ा है कि दोस्तों की कमज़ोरियों को भी कुछ इस तरह पेश किया जाए कि वह उनकी कमज़ोरी न लगे. अब देखिये ना, काशीनाथ सिंह अपने दोस्त दूधनाथ सिंह के झूठ बोलने के बहुत सारे प्रसंग सुनाने के बाद कहते हैं:  दूधनाथ का झूठ दूधनाथ पर नहीं, इलाहाबाद की साहित्यिक संस्कृति पर करारी टिप्पणी है. अब, क्या आपको नहीं लगता कि यह बात किसी के लिए भी इतनी ही सहजता से कही जा सकती है?  लेकिन मित्रों, दोस्ती में इतना हक़ तो मिलना ही चाहिए. किताब का अगला संस्मरण सम्भवत: काशीजी के सर्वाधिक चर्चित संस्मरणों में से एक है: ‘देख तमाशा लकड़ी  का’.   इस संस्मरण  के शुरू में जो वैधानिक चेतावनी नुमा टिप्पणी है वो आपको आगे लगने वाले झटकों के लिए तैयार कर देती है: मित्रों, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते  कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है! जो भाष अमें गंदगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद ‘परम’ (चूतिया का र्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएं – काशी के अपने मुहल्ले अस्सी पर आधारित यह सस्मरण सुभाषितों से भरा पड़ा है, और सुभाषित वेज भी हैं नॉन वेज भी. एक जगह पत्रकारों की खबर इस तरह ली गई है : तीसरी नस्ल और भी ज़ालिम है – पत्रकारों की! ‘तलवार मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’ वालों की. ये मालिकों को गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी-डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है!  किताब का आखिरी संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ नामवर जी पर है. इस पर बात मैं ‘घर का जोगी जोगड़ा’ किताब पर (उसमें भी यह शामिल है) बात करते हुए करूंगा.


त्रयी की दूसरी किताब ‘आछे दिन पाछे गए’ को स्मरण-कथाओं की किताब कहते हुए ‘समीक्षक मित्र कमला प्रसाद’ (अब दिवंगत) को समर्पित किया गया है. इसमें जो रचनाएं संग्रहीत हैं वे 1976 से 2003 के बीच विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई थीं. सर्वाधिक, आठ में से पाँच रचनाएं ‘हंस’ में प्रकाशित हुईं और शेष ‘कहन’, ‘रविवार’  और ‘हिरावल’  में प्रकाशित हुईं. किताब की पहली रचना है ‘रहना नहीं देस बिराना है’. इस स्मरण कथा में खूब सारा बनारस है और लगभग उतना ही आत्म तर्पण है. बनारस को लेखक ने बहुत दिलचस्प अन्दाज़ में याद किया है. देखें: जब भी मैं याद करता हूं इस नगर को, यह ‘मुग़ले आज़म’ फिल्म के अकबर की तरह मेरी आंखों के आगे खड़ा, तमतमाया हुआ, हांफता-हूंफता नज़र आता है. वही गुस्से में आग उगलती आंखें, थरथराता बदन, घंघनाती आवाज़, सुनाई पड़ता है –‘अनारकली, सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे!’

यह अकबर कोई और नहीं, हिंदी विभाग था और सलीम मेरा अस्सी, अस्सी मुहल्ले के लोग, यहां के मेरे पढ़-अपढ़ यार-दोस्त और वे लड़के जिनके साथ मैं पढ़ता-पढ़ाता था और जिन्हें हाल-हाल तक नहीं पता था कि अकसर हमारे बीच उठता-बैठता यह चमरकिट-सा आदमी मास्टर के सिवा भी कुछ है.   ज़ाहिर है कि यह आदमी मास्टर के सिवा एक लेखक है, और अपने लेखन  को लेकर उसका विचार यह है: कभी-कभी मुझे लगता है कि मैंने सारा जीवन वह लिखा जिसे नहीं लिखता, तब भी चल जाता मगर वह नहीं लिखा जो लिखना चाहिए था!

किताब  का दूसरा लेख ‘कलकत्ता में बांकेलाल’ शीर्षक से लेखक के अभिन्न मित्र रामधार  उर्फ़ बांकेलाल उर्फ़ प्रख्यात कोश विज्ञानी डॉ आर ए (राम अधार) सिंह पर है. लेख की सबसे बड़ी विशेषता है इसमें शामिल किए गए रामधार के पत्र/पत्रांश! तीसरा लेख ‘मुसाफ़िरखाना  में चार दिन’ दो युवा रचनाकारों महेश्वर और रमेश पर केन्द्रित है. अब तक के तमाम लेखों से हटकर है इस किताब का अगला लेख ‘कहानी की वर्णमाला और मैं’. यह एक ऐसा लेख है जिसे, मेरी राय में, हर कहानीकार को और हर उस व्यक्ति को जो कहानीकार बनना चाहता है, अवश्य पढ़ना चाहिए. यहां काशीनाथ  सिंह ने जैसे अपने पूरे लेखकीय  जीवन का निचोड़  सामने रख दिया है. एक जगह उन्होंने लिखा है:  कहानी विचारों से नहीं बनती है, वह बनती है ज़िन्दगी से, वह ज़िन्दगी जो समाज में कई स्तरों पर फैली है और किसी रूप में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.   एक और महत्व की बात यह है: एक लेखक में चीज़ों को देखने की एक साफ़ दृष्टि होनी चाहिए.  इस लेख में अगर लेखन पर उनके विचार हैं तो किताब के छठे लेख ‘परिवेश’ स्मृतियों में’ में  अपने किए का लेखा-जोखा है. किताब का पांचवां लेख ‘इक्कीसवीं सदी के देश का सफर’ में काशीनाथ सिंह जी की जापान यात्रा का वृत्तांत है.  इस किताब का सबसे शानदार लेख इसका अन्तिम लेख ‘या तरुवर महं एक पखेरू’ है जिसमें लेखक ने अपने गुरुजन, दीक्षित जी, विजयशंकर मल्ल, और बच्चन सिंह को अपने ख़ास अन्दाज़ में स्मरण किया है. इन तीनों गुरुजन पर लेखक की टिप्पणी देखिए: हमारे तीन गुरु और तीनों में जैसे खराब पढ़ाने की होड़, जनमत यह था कि अगर गौर से न सुना जाए तो ‘और’ के विशेष उच्चारण-कौशल के कारण बच्चन जी इन सब पर भारी हैं!  
बच्चन सिंह के प्रति काशीनाथ जी  का अतिरिक्त अनुराग कई जगह व्यक्त हुआ है, लेकिन यह अनुराग भी उन्हें यह लिखने से नहीं रोक सका है: ‘आलोचना’ का सम्पादन करते समय उन्हें ‘समीक्षक’ सिद्ध करने में नामवर ने कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जो चीज़ नहीं थी और आज भी  नहीं है, उसके लिए नामवर या कोई भी क्या करता?
वह चीज़ है ‘रीढ़’.
इसे ही आलोचक लोग ‘प्रतिभा’ बोलते हैं.

किताब का आखिरी लेख ‘तीसरे भाई की खोज में प्रानपियारे’ आलोचक और अप्रतिम संगठनकर्ता कमला प्रसाद पर केन्द्रित है. लेखक ने ‘सहृदय’ और ‘साहित्य’  को जुड़वां भाई बताते हुए कमला बाबू को उनका तीसरा भाई कहा है. इस लेख के एक-एक शब्द से कमला बाबू के प्रति काशीनाथ जी का अनुराग व्यक्त होता है. यहां अगर उनकी खिंचाई भी है तो बेहद लाड़ के साथ!


संस्मरण त्रयी की तीसरी किताब है वर्ष 2006 में प्रकाशित ‘घर का जोगी जोगड़ा’. ‘भैया के अस्सीवें  बसंत पर’ यह किताब ज़ाहिर है कि नामवर जी पर केन्द्रित है. ‘स्मरण’  शीर्षक अपनी भूमिका में काशीनाथ जी ने लिखा है, शायद ही मेरी कोई ऐसी कहानी हो जो भैया को पसन्द हो लेकिन ऐसा संस्मरण और कथा-रिपोर्ताज भी शायद ही हो जो उन्हें नापसन्द हो.

अब बात करें  इस किताब की. जैसा मैंने पहले कहा, इसमें तीन संस्मरण और एक परिशिष्ट-साक्षात्कार है. पहले संस्मरण ‘जीयनपुर’ में बनारस ज़िले के उस अनाम-से गांव का जहां नामवर जी का जन्म हुआ, और उनकी वंश परम्परा का परिचय है. दूसरा संस्मरण ‘गरबीली ग़रीबी वह’ नामवर जी के व्यक्तित्व से उनकी बनावट और बुनावट से और उनके सोच से हमारा गहन साक्षात्कार कराता है. असल में इस किताब के लेखों में व्यक्ति नामवर जी और आलोचक नामवर जी, दोनों को गहराई से जानने का मौका मिलता है. थोड़ी चर्चा नामवर जी के अध्यापक पक्ष की भी है. इस तरह इस किताब से हमें नामवर जी को लगभग समग्रता में जानने-समझने का मौका मिलता है. यहां काशीनाथ जी ने अपने भाई पर एक बहुत मार्के की बात  कही है:  लोग कहते थे और उन्हें दर्द था कि ‘नामवर ने इनके बारे में लिखा’, ‘उनके बारे में लिखा’, ‘मेरे बारे में नहीं लिखा’ या ‘मेरे बारे में ऐसा लिखा.’ मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं, सिर्फ अपने बारे में लिखा है और ‘अपने बारे में’ का मतलब है जिसमें उसने ‘अपने आप’ को सबसे अधिक पाया है. वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं, रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं.  यह लेख जितनी गहराई से नामवर की पड़ताल करता है वह अतुलनीय है. एक जगह काशी ने अपने भाई को यह कहते हुए उद्धृत किया है : ऐसा  कुछ भी न करना कि मेरा सिर झुके. बाद में जब एक दफ़ा काशीनाथ सिंह अपने भाई से यह चाहते हैं कि हिंदी विभाग में वे लेक्चरर की दो खाली जगहों में से एक के लिए अध्यक्ष शर्मा जी से उनकी सिफारिश कर दें तो नामवर गम्भीर हो जाते हैं, और लम्बी सांस लेकर कहते हैं: जो मैं नहीं कर सकता, उसके लिए क्यों कहते हो? होगा तो होगा, नहीं होगा तो नहीं होगा. तुम देख सको तो खुद देखो. मैं किसी से नहीं कहूंगा. ‘घर का जोगी जोगड़ा’ शीर्षक वाले संस्मरण, जिसकी शुरुआत भौजी के न रहने की ख़बर से होती है, में बात भौजी से शुरू होकर परिवार की स्थितियों पर आ जाती है. भौजी के लिए काशी जी ने लिखा है: उनकी ज़िन्दगी ही ‘चुपचाप’ की थी!  कभी किसी को पता ही नहीं चला कि वे ‘थीं’  भी! ....शादी के दस पन्द्रह साल तक उन्होंने जाना ही नहीं कि मुंह में ज़बान भी है. ... वे भारत की उन नारियों में से रही हैं, जो कभी नहीं जान पातीं कि पैदा होने और मरने के बीच जीवन भी होता है. वे आज़ादी से पहले के अपने मुल्क की उन बेटियों में से एक थीं जो जानती थीं कि जिस घर में पैदा हुई हैं, वह उनका घर नहीं है. उनका अपना घर कहां है, किधर है, कब होगा – इसे न उनकी मां जानती थी, न बाप.   यहां जिस तटस्थता और बेबाकी के साथ लेखक ने तत्कालीन परिवेश का और उस परिवेश में स्त्री की कुदशा का चित्रण किया है, उसकी सराहना के लिए हर अभिव्यक्ति अपूर्ण ही होगी. नामवर के पिता बिना अपने बेटे की सहमति के मचखियां निवासी नवाब सिंह को ज़बान दे देते हैं कि अपने बेटे की शादी उनकी बेटी से कर देंगे, नामवर पत्नी  को अपने साथ नहीं रखते, बनारस में भी काशी महसूस करते हैं कि भौजी भैया की कार्यसूची में फिलहाल थीं ही नहीं. कुल मिलाकर यह कि पत्नी से उनकी जो अपेक्षाएं थीं, वे पूरी  नहीं हो सकती थीं, और दोनों के बीच की खाई चौड़ी होती गई. लेकिन जैसे इतना  ही काफ़ी न हो, बेटे  विजय और बेटी गीता से भी उन्हें वो नहीं मिला जो वे चाहते थे. यह सारा वर्णन काशीनाथ जी ने अद्भुत तटस्थता के साथ किया है. निश्चय  ही  उनकी सहानुभूति अपने भाई के साथ है लेकिन इसके बावज़ूद वे कहीं भी औरों को छोटा करने नज़र नहीं आते. मेरे लेखे यह बहुत बड़ी बात है.

अध्यापक नामवर का परिचय कराते हुए काशी जी  ने लिखा है:  वे क्लास में कहानी कभी नहीं बांचते थे, वे उसे किताब  के पन्नों से निकालकर बाहर रख देते थे – रोज़मर्रे के जीवन के बीच; लिहाज़ा हर विद्यार्थी किसी समय की लिखी कहानी को  अपने अनुभव के आसपास देखने लगता था.  नामवर जी के अध्यापक रूप की चर्चा करते हुए लेखक ने उनके समय के अन्य कई अध्यपकों की अध्यापन शैली का भी रोचक किंतु गहन विश्लेषण कर दिया  है. हर कोई जानता और मानता है कि नामवर जी एक अप्रतिम वक़्ता है. इसी बात की चर्चा करते हुए काशी नाथ जी ने लिखा है: और भाषा पर ऐस अनिर्बाध नियंत्रण कि क्या कहिए? क्या मज़ाल जो कोई शब्द या वाक्य या मुहावरा उनकी इच्छा के बिना अपनी मर्ज़ी से कहीं ताक-तूककर चुपके से या ज़बरदस्ती घुस आने की ज़ुर्रत करे. सुनने में अटपटा लग सकता है लेकिन सच्चाई यह है कि बोलने की यह कला जितनी ईश्वरप्रदत्त नहीं है, उससे अधिक अर्जित है – अपनी मेहनत, लगन और धुन की कमाई. 

नामवर सिंह  वाले संस्मरण का सबसे बेहतरीन हिस्सा उसका अंतिम अंश है जहां काशीनाथ सिंह ने नामवर जी के आलोचक रूप का मूल्यांकन किया है. वैसे तो इस पूरे आलेख में टुकड़ों-टुकड़ों में एक आलोचक के रूप में नामवर सिंह के विकास को उभारा गया है लेकिन उस सबका अर्क यहां मौज़ूद है. देखें: वे हिंदी के  पहले मिशनरी आलोचक हुए जो साहित्य की चिंताओं के साथ हिंदी और अहिन्दी प्रदेश के शहरों में ही नहीं, कस्बों और गांवों तक में गए; ज्ञानियों, विज्ञानियों और अज्ञानियों के बीच गए, पढ़े-लिखों और  बेपढ़ों को सुना-सुनाया, हिलाया-डुलाया, झकझोरा – उनके बीच बोलकर जो साहित्य से बाहर के थे, ग़ैर पेशे के थे और हिंदी और साहित्य के प्रति उपहास का भाव रखते थे. उन्होंने उनके भीतर एक बेचैनी पैदा की – जीवन के लिए, समाज के लिए; और अहसास कराया कि साहित्य वही नहीं है जो किताबों में है, और जो किताबों में है वह भी तुम्हारे जीवन और साहित्य के सिवा दूसरा नहीं है. किताबों से बाहर जो तुम्हारे खाने-पीने और जीने-मरने में है वह भी साहित्य है.  मैं बहुत चाहकर भी खुद को रोक नहीं पा रहा हूं एक और अंश उद्धृत करने से: लोगों, अपनी सारी ज़िन्दगी मैंने ऐसा वक्ता नहीं देखा  जिसने अपनी ज़बान से क़लम का काम लिय अहो, जो अपनी वाणी से सुनने वालों के दिल-दिमाग पर लिखता रहा हो. एक ही विषय पर कई-कई व्याख्यान और हर व्याख्यान में हर बार नए नुक्ते, नई बात, नई जानकारियां – जहां सभा कानों से ही नहीं आंखों से भी सुन रही हो.   जिन्होंने कभी भी नामवर जी को बोलते सुना होगा वे पुष्टि करेंगे कि इस कथन में कितनी सच्चाई है.
काशीनाथ  सिंह की इन तीनों संस्मरण पुस्तकों से गुज़रने के बाद जो बात सबसे पहले  याद रहती है वह है ज़िन्दगी के प्रति उनका गहन अनुराग. जिसमें जीवन के प्रति लबालब प्यार न भरा हो वो ज़िन्दगी की हर छोटी-बड़ी डिटेल को इस तरह याद रख ही नहीं सकता. आप किसी पेड़ के पास से गुज़रते हैं, लेकिन अगर आपसे उसका वर्णन करने को कहा जाए तो आपको कुछ भी नहीं सूझेगा. सूझेगा तो उसी को जो पेड़ से सच्चा प्यार करता होगा. जो भी उनके जीवन में आया, काशीनाथ सिंह ने खुलकर उसे अपनाया और यही वजह है कि इन संस्मरणों में हाड़-मांस के, जीते-जागते इंसान हैं. देवता यहीं नहीं हैं. और यही काशीनाथ सिंह के लेखन की पहली खासियत है कि वे इंसान को इंसान ही रहने देते हैं. दूसरी बात जो मुझे बहुत महत्व की लगती है वो है उनकी ज़िन्दादिली. इन तीनों किताबों के हर पन्ने से उनकी ज़िन्दादिली झांकती है. ज़िन्दादिली और काशी (नगरी)  की विख्यात मस्ती. काशीनाथ  सिंह का गद्य दूसरे लेखकों के गद्य से बहुत अलहदा किस्म का है. इस गद्य के पीछे  शायद उनके भाई नामवर सिंह की भी थोड़ी प्रेरणा रही होगी. नामवर जी ने इन्हें एक पत्र में लिखा था: गद्य कैसा हो? ख़ुश्क़! यानि गीला न हो, भीगा न हो – कपड़े की तरह उसे निचोड़ कर, पानी निथार कर सुखा लो और जब हल्का, कड़कड़ हो जाए, उसमें चमक आ जाए तब इस्तेमाल करो! राग-विराग मुक्त गद्य!  बेशक,  हल्का, कड़कड़ करने वाला और चमकदार गद्य है यह, ऐसा जो शायद ही किसी और लेखक के पास हो.

काशीनाथ  सिंह की ये तीनों किताबें संस्मरण विधा के अंतर्गत आती हैं. हालांकि इन किताबों में जो है उसे सिर्फ़ संस्मरण नहीं कहा जाना चाहिए. अस्ल में इधर हिंदी में विभिन्न विधाओं में जो आवाजाही बढ़ी है और जिस तरह उनके बीच की दीवारें ढही हैं, उनका उत्कृष्ट उदाहरण हैं ये रचनाएं. यहां कहानी भी है, व्यंग्य भी, रेखाचित्र भी, नाटक भी, समीक्षा भी और न जाने और क्या-क्या भी!  और इन सबके बेहतरीन मेल से जो कुछ निर्मित हुआ है, उसे, क्योंकि हमारे पास दूसरा कोई उपयुक्त नाम नहीं है, हम संस्मरण ही कह कर काम चला रहे हैं. वही संस्मरण, जिसकी  हिंदी में कोई बड़ी हैसियत नहीं रही है. बकौल काशीनाथ  जी, संस्मरण की जगह साहित्य के समाज में उस दलित जैसी थी जिसके लिए ‘पंगत’ में कोई पत्तल नहीं. और यह काशीनाथ सिंह की कलम का ही कमाल है कि उन्होंने  इस उपेक्षित विधा को हिंदी की एक अनुपेक्षणीय विधा बना डाला, ठीक अपने ही शहर के उस बड़े कलाकार उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की तरह, जिन्होंने एक नामालूम से वाद्य, शहनाई को भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक ज़रूरी वाद्य बना डाला था.

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सम्बोधन त्रैमासिक के काशीनाथ सिंह विशेषांक में प्रकाशित


Sunday, January 20, 2013

विश्वविद्यालयों में शोध: कोई उम्मीद नहीं


आपने तो मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया है. एक फोड़ा जो पका हुआ था और काफी कष्ट दे रहा था आपने उसे छेड़ कर मेरा दर्द और बढ़ा दिया है. करीब चार दशक बिताए हैं उच्च शिक्षा के काम में और अब सेवा निवृत्त हो जाने के बाद भी इस क्षेत्र से रिश्ता पूरी तरह टूटा नहीं है. बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ का हिस्सा रहा हूं. अब मैदान में नहीं हूं लेकिन उससे पूरी तरह जुदा भी नहीं हो गया हूं. ऐसे में जब आपने शोध की वर्तमान स्थितियों के बारे में सवाल  उठाया काफी ऊहा पोह के बाद लगा कि सच कह ही दूं. इस छोटे-से आलेख में जो कह रहा हूं वह सामान्यीकृत  कथन है. अपवाद सर्वत्र होते हैं, यहां उच्च शिक्षा में भी हैं. लेकिन वे अपवाद इतने कम हैं कि उनके आधार पर कोई बात नहीं की जा सकती. इसलिए मैंने बार-बार अपवाद का ज़िक्र छेड़ने से खुद को रोका है.

जैसे जैसे विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ी है, उनमें नौकरी के अवसर भी बढ़े हैं. और बहुत स्वाभाविक है कि नौकरी चाहने वालों की संख्या में भी बहुत तेज़ी से वृद्धि हुई है. विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में अध्यापन की नौकरी पाने के लिए शोध उपाधि अपरिहार्य है इसलिए नौकरी पाने के लिए शोध करने वालों की संख्या में जो वृद्धि हुई है उसे असामान्य नहीं माना जा सकता. जब तक शोध का सीधा सम्बन्ध नौकरी से नहीं था, बहुत सारे लोग ऐसे थे जो विशुद्ध अकादमिक कारणों से शोध कार्य में रत होते थे. हम सबने अपने अध्ययन काल में ऐसे अनेक शोध कार्यों से अपने ज्ञान में वृद्धि की है. लेकिन अब स्थितियां बदलने से उस तरह के लोग लगभग अदृश्य हो गए हैं और बच रहे हैं सिर्फ वे जिन्हें शोध इसलिए करना है कि उसे दिखा कर एक अदद नौकरी पाई जा सके. यानि शोध के पीछे जो भाव होता था या होना चाहिए वह तो लुप्त हो गया है, रह गई है महज़ खाना पूर्ति.

अब इस स्थिति की परिणति वही हो सकती है जिसकी तरफ आपने इशारा किया है. जिसे नौकरी पानी है वो चाहता है कि जल्दी से जल्दी, जैसे-तैसे करके ‘डॉक्टर’ हो जाए, और उस उपाधि को दिखाकर नौकरी पा ले. जल्दी से जल्दी की बात समझ में आती है, जैसे-तैसे वाली बात को थोड़ा और स्पष्ट करना होगा. पिछले कुछ  बरसों में हमारे यहां उच्च शिक्षा का ज़बर्दस्त विस्तार हुआ है. इस बात की तारीफ की जा सकती थी, बशर्ते इस विस्तार में गुणवत्ता की बलि न दे दी गई होती. हुआ यह कि सरकारों (यानि केन्द्र और राज्य सरकारों) ने लोकप्रियता पाने के लिए अनाप-शनाप कॉलेज और विश्वविद्यालय खोल दिए. इनमें से अधिकांश में न पढ़ने वाले थे और न पढ़ाने वाले,  और न पढ़ने-पढ़ाने का कोई माहौल. पुस्तकालय नहीं, प्रयोगशाला नहीं, कमरे नहीं. फिर भी कॉलेज और विश्वविद्यालय खड़े कर दिए गए. मुझे ऐसे बहुत सारे कॉलेजों की व्यक्तिगत जानकारी है जहां प्राध्यापक अपनी जेब से फीस भरकर विद्यार्थियों का नामांकन करते रहे हैं ताकि क्लास बनी रहे, वर्कलोड बना रहे और उनका अस्तित्व बना रहे. सरकारी कॉलेजों में तबादले की तलवार बड़ी मारक होती है. जो न करवा ले वही ठीक. अगर एम ए में दस या  बीस विद्यार्थी न्यूनतम न हुए तो क्लास टूट जाएगी, वर्क लोड घट जाएगा, तबादला हो जाएगा इसलिए जो भी मिले उसे जैसे तैसे भर्ती कर लो. और जिसे जैसे तैसे भर्ती कर लिया उसे जैसे तैसे पास भी कर दो, करवा दो. एम ए के पेपर बनाने और कॉपियां जांचने में भी प्राय: यही मानसिकता काम करती है कि अगर ज़्यादा विद्यार्थी फेल हो गए तो हमारे विषय का धन्धा मन्दा पड़ जाएगा, इसलिए पास तो करना ही है. मैं तो कई बार कहता हूं कि अगर हम ईमानदारी से अपनी कॉपियां जांचें तो परिणाम शायद दस प्रतिशत भी न रहे. लेकिन अगर ऐसा हो गया तो जो हड़कम्प  मचेगा, जो बावेला मचेगा उसकी सहज ही  कल्पना की जा सकती है. आज ही देश के एक अग्रणी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष का बयान छपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि वे अपने यहां चल रही केन्द्रीय बोर्ड की पाठ्यपुस्तकें इसलिए हटवाना और नई किताबें इसलिए लिखवा कर लागू करवाना चाहते हैं कि उनके प्रांत के अधिकांश  विद्यार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं और उन्हें केन्द्रीय बोर्ड की पुस्तकें पढ़ने समझने में दिक्कत होती है. यानि आप नहीं चाहते कि आपके प्रांत के ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थी देश के अन्य प्रांतों के विद्यार्थियों के बराबर वाले स्तर पर आएं. आप उनकी सुविधा के लिए अपने स्तर को नीचा करने को तैयार हैं. यह एक प्रांत का उदाहरण है लेकिन स्थिति कमोबेश हर जगह यही है. तो ये ही लोग बी ए (या बी एस-सी या बी कॉम) करते हैं और ये ही एम ए वगैरह पास हो जाते हैं और ये ही शोध करते हैं.

जिन्हें एम ए की उत्तर पुस्तिकाएं जांचने का मौका मिला है वे जानते हैं कि अधिकांश विद्यार्थियों का स्तर कैसा होता है. मेरा विषय हिंदी है लेकिन जब मैं अन्य विषयों के अपने साथियों से बात करता हूं तो पाता हूं कि स्थिति हर जगह करीब-करीब एक-सी है. अब जिस विद्यार्थी ने एम ए करते हुए कभी मूल ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ या ‘गोदान’  के दर्शन नहीं किए, जिसे यह पता नहीं कि कवि और लेखक में कोई अंतर भी होता है या नहीं,  उससे आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि जब वह शोध करेगा तो कोई चमत्कार कर देगा!  अभी कल ही एक विश्वविद्यालय के मेरे प्रोफेसर मित्र बता रहे थे कि उनके विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में किताबों की क्या स्थिति है. मज़ाल है कि कोई किताब वहां मिल जाए. मतलब स्तरीय किताब. अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की लाइब्रेरियां  जिस स्थिति में  है उसमें कोई विद्यार्थी अगर चाहे तो भी कुछ अच्छा नहीं कर सकता. ज़्यादातर जगहों पर तो पाठ्य पुस्तकें तक उपलब्ध नहीं होती हैं. मेरे प्रांत राजस्थान के सौ से ज़्यादा सरकारी कॉलेजों में लाइब्रेरियन ही नहीं हैं. नए खुले कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में पुस्तकालयों की जो स्थिति है उसके बारे में कुछ न कहा जाना ही सबसे अच्छी बात  होगी. और यही बात प्रयोगशालाओं के बारे में सच है. कमरा है तो उपकरण नहीं, उपकरण है तो सामग्री नहीं, और सामग्री है तो स्टाफ  नहीं. सबसे अच्छा यही है कि एक कमरा लो, उसपर बोर्द लगाओ ‘लाइब्रेरी’ या ‘लैबोरेट्री’. और फिर ठोक तो उस पर एक भारी ताला. यानि है भी और नहीं भी है.  

लेकिन इस सबके बावज़ूद विद्यार्थीगण हायर सैकण्ड्री करते हैं, बी ए करते हैं,  एम ए करते हैं और फिर बेहतर नौकरी पाने के लिए या जब तक और कुछ न हो जाए, मसलन शादी वगैरह, तब तक का वक़्त सम्मानजनक रूप से काटने के लिए शोध करने का काम करते हैं. इनमें से अधिकांश  जब अपने भावी शोध निदेशक से मुखातिब होते हैं तो उनके मन में शायद ही यह स्पष्ट होता हो कि वे किस विषय पर शोध करना चाहते हैं और क्यों करना चाहते हैं. बहुत सारे तो बहुत बेबाक रूप से कह भी देते हैं कि जो विषय सबसे आसान हो उसी पर उन्हें शोध करवा दिया जाए. इस बीच अनेक विश्वविद्यालयों ने चाहे एम फिल और पूर्व शोध परीक्षाओं की व्यवस्था करके गुणवत्ता सुनिश्चित करने के अनेक प्रयास किए हों, स्थिति में बहुत बदलाव इसलिए नहीं आ सका है कि नींव बहुत ही कमज़ोर है. जहां ये प्रयास हुए हैं वहां ‘समझदार’ लोगों ने इनकी भी काट निकाल ली है.

अब इस तरह की  कमज़ोर नींव वाले युवा जब शोध कार्य करते हैं तो उस कार्य का स्तर कैसा होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं. और यह स्थिति केवल हिंदी विषय में नहीं है, सारे ही विषयों में है. प्रसंगवश यहां एक निजी प्रसंग लाने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं. कई बरस पहले, मेरे एक पूर्व विद्यार्थी ने, जो तब तक विधि विषय के प्राध्यापक बन कर मेरे ही सहकर्मी बन चुके थे, अपने शोध प्रबंध का प्रारूप मुझे इस अनुरोध के साथ दिया कि मैं उसको भाषिक दृष्टि से देख लूं. उस शोध प्रबंध की स्थिति यह थी कि उसमें कहीं भी कोई वाक्य जहां से शुरू होता वहां खत्म नहीं हो रहा था. लगता था कि किसी ने अंग्रेज़ी से अनुवाद करने की बचकानी कोशिश की है और वह कोशिश भी असफल रही है. मैंने घुमा-फिराकर यह बात जब उन्हें कही तो वे बोले कि हमारे विषय में तो ऐसा ही होता है. कहना अनावश्यक है कि कुछ समय के बाद उनके नाम के आगे डॉक्टर लगने लगा था. मुझे लगता है कि हिंदी में शोध की स्तरहीनता की ज़्यादा चर्चा की एक वजह यह भी है कि हम लोगों का ताल्ल्लुक लिखने पढ़ने से है और हम लोग इस मुद्दे पर भी काफी लिख-पढ़ लेते हैं, जबकि अन्य अधिकांश विषयों वाले सार्वजनिक मंचों पर प्राय: ऐसी  कोई चर्चा नहीं करते हैं, इसलिए उनकी अकादमिक दुनिया की भीतरी जानकारी दूसरों को  नहीं मिल पाती है.

अब इस तरह जो शोध होता है उसके परीक्षण-मूल्यांकन  में बहुत बड़ी भूमिका आपसी रिश्तों की होती है. जन्नत की हक़ीक़त सबको पता है इसलिए ‘तुम मेरे विद्यार्थी को पास कर दो, मैं तुम्हारे विद्यार्थी को पास कर दूंगा’ का खुला खेल निर्बाध रूप से चलता है. और इसी खेल  के पहले वो सब भी जहां-तहां चलता है जिसका ज़िक्र आपने किया है. मेरा इशारा पेशेवर शोध लेखकों से शोध प्रबंध लिखवाने, अन्य शोध प्रबंधों की नकल करने, रुपये पैसों के लेन-देन और यौन शोषण आदि की तरफ है. असल में ये सारी बातें उसी स्थिति का विस्तार है जिसका ज़िक्र हम शुरू से कर रहे हैं.

जो स्थिति है उसे लेकर कोई असहमति नहीं है. बहुत बुरी स्थिति है. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस स्थिति में बदलाव की, सकारात्मक बदलाव की भी कोई उम्मीद है? मेरा स्वर आपको बहुत निराशाजनक लग सकता है, लेकिन मेरी तो स्पष्ट राय है कि फिलहाल कोई उम्मीद नहीं है. आदर्श की बातें बहुत की जा सकती हैं, कि ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए. लेकिन उनका अर्थ क्या है? हम जिस तरह के समाज में रह रहे हैं उस समाज में अगर यह नहीं होगा तो क्या होगा? ऐसा कैसे मुमकिन है कि सारा समाज तो सड़ांध मारता रहे, और शोध का क्षेत्र पवित्रता की खुशबू बिखेरे? नीचे से ऊपर तक सब कुछ तो गड़बड़ है. कौन-सी चीज़ है जो ठीक चल रही है? क्या चुनाव ठीक हो रहे हैं? ठीक लोग चुने जा रहे हैं? अस्पतालों में इलाज़ ठीक  हो रहा है? पुलिस अपना काम कर रही है? मां-बाप ठीक से अपनी संतान को पाल-पोस रहे हैं? वे जहां और जो भी काम करते हैं, वो काम ठीक  से कर रहे हैं? अख़बार ठीक से निकल  रहे हैं? मीडिया अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रहा है? प्रधानमंत्री जी वो सब कर रहे हैं जो करने के लिए हमने उन्हें चुना था? एक सफाई कर्मी  ठीक से सफाई कर रहा है? प्राइमरी  स्कूल का मास्टर ठीक से पढ़ा रहा है? कॉलेज का विद्यार्थी अपनी 75 प्रतिशत कक्षाएं अटैण्ड कर रहा है? आप बताइये तो सही कि क्या ठीक चल रहा है? कॉलेजों विश्वविद्यालयों में पर्याप्त मात्रा में शिक्षक नहीं हैं, बरसों से भर्ती  नहीं हुई है जबकि लोग लगातार  रिटायर होते जा रहे हैं.  पढ़लिखकर भी लोगों  को जो नौकरी मिलेगी उसमें उन्हें उचित वेतन भी नहीं मिलने वाला है. हमारे ज़्यादातर शिक्षण संस्थानों में ठेके पर अध्याप्क रखे जा रहे हैं. मेरे प्रांत में बहुत सारे निजी कॉलेजों में पाँच पाँच हज़ार रुपये में  लोग पढ़ा रहे हैं. तो जिनके सामने कोई उज्ज्वल भविष्य भी नहीं है उनसे आप कैसे यह उम्मीद कर सकते हैं कि वे बहुत निष्ठा से अपना काम करके शोध कार्य करेंगे?   तो इन सब बातों को अनदेखा करते हुए कोई भला कैसे शोध के स्तर को ऊँचा उठाने की बात कर सकता है? कम से कम मैं तो नहीं कर सकता. इसलिए नहीं कर सकता कि इस दुनिया को भीतर से मैंने देखा है और इसकी रग-रग से वाक़िफ हूं.

बहुत चाहा कि अपनी यह टिप्पणी इस निराशाजनक  स्वर पर ख़त्म न करूं लेकिन जब अपनी देखी दुनिया को याद किया तो बस, यह हुआ कि बकौल साहिर, कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया.
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'समकालीन सरोकार' के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित. 

Friday, November 30, 2012

कैसे समझाएं इन्हें

Hindi Blogs. Com - हिन्दी चिट्ठों की जीवनधारा


काफी दिनों से बढ़ते जा रहे मोतियाबिंद से परेशान था. ऑपरेशन कराना टालता जा रहा था.  बात यह है कि ऑपरेशन चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, उससे डर तो लगता ही है. लेकिन वो कहा जाता है ना कि बकरे की अम्मा कब तक ख़ैर मनाएगी. कई दोस्तों से पूछा, और सबकी राय का आकलन करने के बाद जा पहुंचा शहर के सबसे नामी, सर्वाधिक आधुनिक सुविधाओं वाले (और  इसीलिए स्वाभाविक रूप से खासे महंगे भी)  नेत्र चिकित्सालय में. रिसेप्शन काउण्टर पर लगी एक पट्टिका पर नज़र पड़ी तो दिल खुश हो गया. लिखा था: “अस्पताल में मरीज़ कृपया अपने मोबाइल बन्द रखें.” यह हुई ना बात. लोगों को मोबाइल इस्तेमाल करने का शऊर ही कहां है? जहां देखो वहीं शुरू हो जाते हैं, बिना आस-पास वालों की असुविधा का ज़रा भी खयाल किए. रिसेप्शन काउण्टर पर रजिस्ट्रेशन करवाया, दो जगह जूनियर डॉक्टरों से अपनी आंखें जंचवाई और फिर मुझे पहुंचा दिया गया अस्पताल के मुख्य डॉक्टर के कक्ष में. उन्हीं के नाम पर यह अस्पताल है. वे एक मरीज़ को देख रहे थे, मुझे पास पड़े सोफे पर बिठा दिया गया. वे मरीज़ को देख रहे थे, पास खड़े एक दोस्त से बात कर रहे थे और कान में लगे ईयर फोन पर किसी की बात सुनते हुए यदा-कदा उन्हें भी जवाब देते जा रहे थे. इसी बीच वो मरीज़ निपट गया. अब  मुझे डॉक्टर के सामने वाली स्टूल पर बिठा दिया गया. मेरा कार्ड डॉक्टर के सामने था. उनका द्वि-चैनली संवाद पूर्ववत जारी रहा. और उसी के साथ मेरी आंखों की जांच भी हो गई. मुझसे कुछ पूछने की ज़रूरत उन्हें महसूस नहीं हुई. पास खड़े उनके सहायक ने जब मुझे उठने का संकेत किया तो मैंने ढीढ बनकर डॉक्टर से कहा कि आपने मुझसे कुछ भी तो नहीं पूछा. और तब बेमन से उन्होंने एक दो सवाल किए और मुझे बाहर भेज दिया. उनकी जल्दी में शायद इतना ही सम्भव था.

बाहर मुझे बताया गया कि मुझे अपनी दोनों आंखों का ऑपरेशन करवाना होगा. बहरहाल, किस्सा कोताह यह कि निर्धारित तिथि को निर्धारित समय पर मैं अपनी आँख का ऑपरेशन करवाने अस्पताल पहुंच गया और कुछ प्रारम्भिक चिकित्सकीय कामों के बाद लेजाकर मुझे ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया. कक्ष में कुल तीन लोग थे. एक स्वयं वे डॉक्टर, एक उनकी सहायिका और एक परिचारक. सहायिका जी ने बहुत कोमलता से मेरी आँख के नीचे निश्चेतन करने वाला इंजेक्शन लगाया, मेरी दोनों आंखों को ढक दिया गया और जिस आँख का ऑपरेशन होना था, उस पर पड़े आवरण में एक खिड़की बना दी गई. अब जो करना था मुख्य डॉक्टर को करना था. मुझे आभास तो हो रहा था कि मेरी आँख के साथ क्या हो रहा है, लेकिन महसूस कुछ नहीं हो रहा था. डॉक्टर अपने दक्ष हाथों से मेरी आँख में कुछ कर रहे थे और साथ-साथ अपनी सहायिका जी से गपशप भी करते जा रहे थे. मुझे वो गपशप क़तई अच्छी नहीं लग रही थी, लेकिन इतनी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि उन्हें मना करूं. थोड़ी देर बाद मुझे आवाज़ से पता लगा कि डॉक्टर साहब मोबाइल पर किसी से बात भी कर रहे हैं. हाथ उनके बदस्तूर चल रहे थे. बात सामान्य किस्म की थी, लेकिन लम्बी चली. मैं कुढ़ता रहा. कोई पन्द्रह मिनिट लगे होंगे इस सब में, और मेरी ऑपरेशन की गई आँख पर पट्टी चिपका कर मुझे ऑपरेशन थिएटर से बाहर छोड़ दिया गया.

पन्द्रह दिन बाद मेरी दूसरी आँख का ऑपरेशन हुआ और उस दौरान भी यही सब हुआ. यानि डॉक्टर साहब का फोन पर बतियाना, अपनी सहकर्मी से  गपशप करना वगैरह. ख़ैर! ऑपरेशन हो गया, और मैं घर आ गया. लेकिन घर आकर तमाम दूसरी व्यस्तताओं के बीच भी यह बात मन में घुमड़ती रही कि मरीज़ को देखते वक़्त और उसके बाद ऑपरेशन के वक़्त डॉक्टर का अपने सहकर्मी से और मोबाइल पर गपशप करते रहना कितना वाज़िब था. यह सब करते हुए उनके हाथ ज़रा भी इधर-उधर हो  जाएं तो? क्या आँख के ऑपरेशन जैसे नाज़ुक काम में एकाग्रता की ज़रूरत नहीं होती है? क्या किसी डॉक्टर का अपने मरीज़ के साथ इस तरह का गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार उचित है? वगैरह. काफी सोच-विचार के बाद,  अपनी तमाम नाराज़गी पर काबू पाते हुए, यथासम्भव संयत लहज़े में मैंने एक पत्र इन डॉक्टर महोदय को लिखा और ई मेल कर दिया.

बहुत जल्दी ही मुझे डॉक्टर महोदय का उत्तर भी मिला. मुझे खुशी इस बात की हुई कि अपने उत्तर में उन्होंने मेरी प्रतिक्रिया पर, जो शालीन होने के बावज़ूद मधुर तो नहीं ही थी, कोई नाराज़गी ज़ाहिर नहीं की, लेकिन  उनका जवाब यह था कि वे खुद भी चाहते हैं कि ऐसा न करें, लेकिन मरीज़ों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसा करना पड़ता है. यानि, बहुत कुशलता से उन्होंने अपने व्यवहार का दायित्व मरीज़ों की सुविधा के नाम कर दिया. या फिर उन्होंने समझकर भी मेरी बात को नहीं समझा.  अब उनके इस उत्तर पर क्या कहा जा सकता है सिवा चचा ग़ालिब को याद करने के :
                            या रब न वो  समझे  हैं न  समझेंगे मेरी बात
                            दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और!
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दिनांक 30 नवम्बर 2012 को जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तम्भ में 'सुविधा के ख़तरे' शीर्षक से प्रकाशित. 

Saturday, October 6, 2012

“हममें यह योग्यता भरपूर है कि हम अच्छी से अच्छी योजना को मिट्टी में मिला सकते हैं”

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डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल से कालू लाल कुलमी की बातचीत


वर्तमान शिक्षा पद्धति के बारे में आपकी क्या राय है?  
मोटे तौर पर तो मैं यह मानता हूं कि पद्धतियां सब ठीक होती हैं, असल  बात तो यह है कि आप उन्हें बरतते किस तरह से हैं. और जहां तक बरतने का सवाल है, अपने देश के सन्दर्भ में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा है. हममें और कोई योग्यता हो न हो, यह योग्यता भरपूर है कि अच्छी से अच्छी पद्धति, अच्छी से अच्छी योजना को हम मिट्टी में मिला सकते हैं. अपने देश में आज़ादी के बाद भी अनेक आयोग बने, और उन्होंने शिक्षा पद्धति में बदलाव के लिए अनेक बेहतरीन अनुशंसाएं भी कीं. कुछ अनुशंसाओं को स्वीकार भी किया गया. लेकिन नीचे तक आते-आते उनका कोई मतलब नहीं रह जाता है. आपको लगता है कि कहीं कुछ भी नहीं बदला है. और अगर  बदला है तो इतना कि चीज़ें बदतर ही हुई हैं. देखो, असल बात यह होती है कि आपकी मंशा  क्या है. आपके  इरादे क्या हैं. जहां आपके इरादे नेक होते हैं वहां बिना किसी पद्धति के भी उम्दा काम हो जाते हैं, और जहां इरादे नेक नहीं होते हैं वहां बेचारी पद्धति भी क्या कर लेगी? यह बात कहने में भले ही खराब लगे, लेकिन मुझे तो लगता है कि हमारे देश में कोई काम करना ही नहीं चाहता है. न मंत्री, न अफसर और न अध्यापक. विद्यार्थी भी पढ़ना नहीं चाहता. वह यह चाहता है कि बिना पढ़े पास हो  जाए, डिग्री  मिल जाए, नौकरी मिल जाए और फिर बिना कुछ किए उसे मोटी तनख्वाह मिलती रहे. और बेचारे विद्यार्थी को भी दोष क्यों दें! आखिर वह भी तो इसी हवा में सांस ले रहा है.  ऐसे में मुझे तो पद्धति की बात करना ही व्यर्थ लगता है.  

शिक्षा  का बुनियादी ढांचा किसके अनुकूल और किसके प्रतिकूल होता जा रहा है? 
यहां मैं आपके प्रश्न को पूरे देश के परिदृश्य  के साथ जोड़कर देखना-समझना चाहूंगा. आज़ादी के बाद के बरसों में भले ही हमारा आदर्श समाजवाद  रहा हो और हमने उस दिशा में काफी प्रयास भी किए हों, अब कम से कम मुझे तो इस बात में कोई संशय नहीं रह गया है कि हम समाजवाद को पूरी तरह त्याग चुके हैं. आज का समय बेशर्म पूंजीवाद का समय है. मुझे लगता है कि इससे आपको अपने सवाल का जवाब भी मिल गया होगा. फिर भी अगर आप मुझी से सुनना चाहते हैं तो मैं कहूंगा कि आज न सिर्फ शिक्षा, सब कुछ सिर्फ़ और सिर्फ उनके पक्ष में है जो अमीर या ताकतवर है.

स्कूली शिक्षा का ग्रामीण और नगरीय स्वरूप किस तरह से पटने की जगह बंटता जा रहा है? 
आपके इस प्रश्न का भी जवाब ऊपर वाले उत्तर में आ जाता है. भाई, हम तो गांवों  को नष्ट करने और शहरों को फैलाने में जुटे हैं. ग्रामीण शिक्षा हमारी प्राथमिकता में है ही नहीं.  अलबत्ता चुनावी विवशताओं की वजह से इसका दिखावा ज़रूर किया जाता है. और उस दिखावे में भी थोड़ा-बहुत सार्थक हो जाता, अगर निचले स्तर पर काम करने वालों में ज़रा भी ईमानदारी, नैतिकता और आदर्श-भाव होता. गांव के स्कूल के मास्टर का बर्ताव आप देख लीजिए. हो सकता है कुछ अध्यापकों में उचित मात्रा में आदर्श भाव भी बचा हो, अधिसंख्य  अध्यापक केवल अपनी नौकरी बजाने और तनख्वाह कमाने से ताल्लुक रखते हैं. और वैसे बेचारे अध्यापक को भी क्यों दोष दें? जब चारों तरफ का माहौल ऐसा है तो वो उससे अलग कैसे हो सकता है! तो, आपके सवाल पर लौटूं. मुझे यह कहने की अनुमति दें  कि ग्रामीण शिक्षा का जो स्वरूप अब बचा है वह अत्यधिक दारुण है और उसके और शिक्षा के नगरीय स्वरूप के बीच बहुत बड़ी खाई है.

सरकारी स्कूलों के प्रति सरकार की उदासीनता के बारे में क्या कहेंगे? जिस समय तारे ज़मीन पर फिल्म आई थी उस समय इस बात पर बहुत बहस हुई. शिक्षाविद फिल्म की सराहना करते हुए कहते रहे कि यह फिल्म अगर किसी सरकारी स्कूल पर बनती तो ज़्यादा तथ्य और सत्य सामने आते. 
अपनी नौकरी में मेरा सम्बन्ध स्कूली शिक्षा से नहीं रहा, लेकिन मैं बराबर महसूस करता हूं कि सरकार की सरकारी स्कूलों में दिलचस्पी दिखावटी है, वास्तविक नहीं. सरकार खुद अपने तामाम कल्याणकारी प्रतिष्ठान नष्ट करने में जी-जान से जुटी है. मेरा सम्बन्ध उच्च शिक्षा से रहा है और वहां भी यही हाल है. अस्पतालों का भी यही हाल है. सड़कों का भी. लगता है कि सरकार  खुद यही चाहती है कि ये तमाम कल्याणकारी काम जल्दी से जल्दी बन्द हो जाएं. पूंजीवाद की गोद में जा बैठने की परिणति और हो भी क्या सकती है? इस सारी स्थिति  को तारे ज़मीन  पर  से जोड़ कर देखने की मुझे कोई ज़रूरत नहीं लगती. वह बहुत उम्दा फिल्म थी, लेकिन उसका फोकस इस बात पर तो नहीं था. इसलिए उसे अलग ही रहने दें.

आप अध्यापक के रूप में अपने पेशे में सफल रहे! आपको क्या बात परेशान करती रही, जिसको आप बदलने के लिए सदैव तत्पर रहे? 
यह तो मैं कैसे कह सकता हूं कि मैं अपने ‘पेशे’ में सफल रहा! मूल्यांकन दूसरे ही करें तो ज़्यादा ठीक रहता है. लेकिन हां, अब पीछे मुड़कर देखने पर मुझे इस बात का संतोष है मैं अपना काम पूरी निष्ठा से कर सका. मैंने इस बात की परवाह बहुत कम की कि और लोग, मेरे साथी वगैरह  क्या कर रहे हैं. खुद पर ध्यान केन्द्रित किया कि मुझे क्या करना है. एक अध्यापक का कर्म बहुत हद तक एकल होता है. औरों के सहयोग की उसमें बहुत ज़्यादा अनिवार्यता नहीं होती. अगर कमरा नहीं खुला है तो आप बाहर बैठकर भी पढ़ा सकते हैं. जीवन के ज़्यादा बड़े हिस्से में तो मैं अध्यापक ही रहा, और मैं इस बात पर अपनी पीठ थपथपा सकता हूं कि मैंने पढ़ाने में कभी कोताही नहीं की. अच्छा पढ़ाया  या  बुरा, यह मेरे विद्यार्थी  जानें.  बाद में जब प्रशासनिक दायित्व वहन करने का समय आया तो यह ज़रूरी हो गया कि मेरी टीम और मेरे बीच तालमेल हो. हमारे लक्ष्य समान हों. प्रशासन में आप जानते ही हैं कि बहुत सारा काम होता है जो आपको अपने अधीनस्थों से करवाना होता है. आप एक पत्र लिख देंगे, लेकिन उसे टाइप कोई और करेगा, पुट अप कोई और करेगा, डिस्पैच कोई और करेगा. यह एक उदाहरण है. तो ऐसे में कहीं एक भी कड़ी कमज़ोर हो तो सारा किया-कराया व्यर्थ हो जाता है. मेरे प्रशासनिक कार्यकाल में भी ऐसा होता रहा है. इसीलिए मैं उसे अपने अध्यापन के अनुभव से अलग करके देखना चाहता हूं. लेकिन, अपने प्रशासनिक कार्यकाल में भी मेरी कोशिश रही कि जो लोग मेरे पास आएं उनके काम जितना मुमकिन हो उतनी सहजता से हो जाएं. मेरी इस मंशा को पूरा करने में मुझे बहुत हद तक अपने अधीनस्थों और अधिकारियों का सहयोग भी मिला. हालांकि मैं जितना करना चाहता था, लेकिन उतना हो नहीं पाया. इसे आप चाहे तो मेरी सीमा भी मान लीजिए. मैं जिस पद पर था उस पद पर मैंने महसूस  किया कि जो निर्णय प्रशासनिक स्तर पर होने चाहिये थे वे सारे के सारे राजनीतिक स्तर पर होने लगे हैं. कभी कभी तो यह भी महसूस हुआ कि क्यों हम पर तनख्वाह का इतना भारी खर्च किया जा रहा है? जिस काम के लिए हमें रखा गया है वो सारा काम तो मंत्री महोदय या उनके आगे-पीछे घूमने वाले  ही कर रहे हैं. हमारे पास तो बस एक काम बचा था, और वो था फाइल पर ‘यथाप्रस्तावित’ लिख देना. हो सकता है बहुत सारे मित्रों को लगे कि हथियार डाल कर मैंने पलायन किया. यह भी हो सकता है कि अगर मेरी जगह कोई और रहा होता तो उसने उससे कुछ अलग किया होता जो मैंने किया.  जो हो, अब वह बात काफी पुरानी हो गई है. लेकिन यदा-कदा मित्रों से बात होती है तो पता चलता है कि अब स्थितियां और भी अधिक खराब हो गई हैं. पहले पाँच-दस प्रतिशत गुंजाइश इस बात की थी कि हम अपनी बात कह लें, अब शायद वो भी नहीं बची है. मुझे हमेशा लगता रहा और अब भी लगता है कि नीति निर्माण का काम नेताओं का है और उसे क्रियान्वित  करने का काम अधिकारियों का. दोनों के बीच संवाद हो लेकिन कर्तव्य निर्वहन करते वक़्त दोनों अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखाओं का खयाल रखें. कहना अनावश्यक है कि  मैं इस दिशा में कुछ ख़ास नहीं कर सका. अपने बचाव में मैं यह और जोड़ना चाहूंगा कि इस स्थिति को बदलने के लिए मैं बहुत छोटा और निष्प्रभावी था.

आज़ादी के बाद हमारा समाज मूल्यों के साथ जड़ताओं को ख़त्म करने का संकल्प करता हुआ आगे बढ़ता है. आज़ादी के पैंसठ वर्षों बाद तकनीकी शिक्षा की बाढ़ आ गई है. तमाम व्यापारी शिक्षा के बाज़ार में उतर रहे हैं. अपने नाम पर विश्वविद्यालय खोल कर बैठ गए हैं. यह किस तरह के भविष्य का संकेत है? 
वैसे तो आपके सवाल में ही जवाब भी छिपा हुआ है. आज़ादी के बाद के हमारे संकल्प बहुत बेहतरीन थे, लेकिन हुआ यह कि हमने धीरे-धीरे उनको विस्मृत कर दिया. और अब तो से सिर्फ किताबों में बचे रह गए हैं. तकनीकी शिक्षा की बाढ़ असल में एक विश्वव्यापी फिनोमिना  है. सारी दुनिया में यही हो रहा है. भारत कोई अकेला नहीं है. लेकिन मैं इसी के साथ यह भी जोड़ना चाहता हूं कि इस स्थिति को विकट बनाने में हम लोगों का यानि अकादमिक विषयों की शिक्षा देने वालों का भी बहुत बड़ा योगदान है. अब आप मेरे विषय की यानि हिंदी की बात लीजिए. हमारे अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिंदी का जो पाठ्यक्रम है उसे देखिए और फिर बताइये कि आखिर क्यों पढ़े कोई हिंदी? यह पाठ्यक्रम पढ़ा कर आप उसे यानि एक युवा को किस काबिल बना रहे हैं? स्तर को गिराते-गिराते हम यहां तक ले आए हैं कि अब आम विद्यार्थी मूल कृति को पढ़ना तो दूर उसे देखता तक नहीं है. समझने की तो बात ही छोड़  दीजिए. कमोबेश यही हालत अन्य अनुशासनों की भी है. और वैसे तो तकनीकी शिक्षा के हाल भी कोई खास अच्छे नहीं हैं. लेकिन उस शिक्षा का बाज़ार तो है.
आपने सही कहा कि तमाम व्यापारी शिक्षा की दुकानें खोल कर बैठ गए हैं. मुझे तो लगता है कि आज देश में सबसे बड़ा और मुनाफे का धन्धा ही शिक्षा का है. सरकार धीरे-धीरे  न सिर्फ उससे हाथ खींचती जा रही है, लूटने वालों को खुली छूट भी देती जा रही है. बेशक हालात  एक अन्धकारमय भविष्य के ही हैं.

आज की शिक्षा हमें न तो काबिल बनाती है न कामयाब! हां, वह युवा बेरोज़गार ज़रूर बनाती है. क्या कहेंगे? 
देखो, इतने बरस शिक्षा के क्षेत्र में काम करने और स्थितियों को नज़दीक से देखने समझने के बाद मैं यह कहने में ज़रा भी झिझक महसूस नहीं करता कि  आज की शिक्षा किसी को भी काबिल नहीं बना रही है. हर जगह तो शॉर्ट कट अपनाए जा रहे हैं. पास बुक्स, इम्पोर्टेण्ट प्रश्न, दस में से पाँच सवाल, उपस्थिति की अनिवार्यता से मुक्ति, इण्टरनेट से उठाई गई सामग्री, पैसे  देकर बनवाए गए प्रोजेक्ट्स... क्या है यह सब? जो विद्यार्थी हिंदी में एम. ए. करके निकलता है  वह ‘सुरदास’ लिखता है और हम उसे पास करते हैं. शुद्ध भाषा में वो चार पंक्तियां नहीं लिख सकता. मेरा सवाल है, वो कामयाब हो भी क्यों? उसमें ऐसी क्या बात है कि वो कामयाब हो? और बेरोजगार वो शिक्षा की वजह से है? या अपने निकम्मेपन की वजह से? अपनी काहिली की वजह से? उसे तो बस मस्ती मारने के लिए कॉलेज में एडमिशन लेना है. फिर न तो क्लास में आना है, न पढ़ना है, न मेहनत करनी है. आप मुझे बताइये कि उसे बेरोज़गार क्यों नहीं होना चाहिये? हां, इस बीच एक बात और हुई है. नेहरु का समाजवादी मॉडल त्याग देने की वजह से सरकारी नौकरियां बहुत कम हो गई हैं. ये सारे निकम्मे लोग सरकारी नौकरियों में खप जाया करते थे. अब इनके लिए वे चरागाह तो बहुत सीमित हो गए हैं. निजी क्षेत्र नौकरी देता है तो काम भी चाहता है और काम न ये कर सकते हैं, न करना चाहते हैं. इसलिए मेरे भाई, इनकी बेरोज़गारी के लिए मैं सिर्फ शिक्षा को दोषी नहीं मानता.

हर जगह निजी स्कूल कॉलेजों की बाढ़ आ रही है. यह इस देश की साठ प्रतिशत गरीब आबादी को किस तरह का भविष्य देने का वादा है? 
यह बात पहले भी कही जा चुकी है कि सरकार धीरे-धीरे अपने दायित्वों से पीछे हट रही है. शिक्षा, चिकित्सा सब उसने निजी क्षेत्र के हवाले करने की मुहिम चला रखी है. ज़ाहिर है कि यह स्थिति बहुत बुरी है.

समाज के निर्माण में शिक्षा का योगदान कम होता जा रहा है. शिक्षा पर व्यय को  अनुत्पादक खर्च के रूप में देखा जा रहा है. यह किस तरह  का संकेत है? 
आने वाले बुरे दिनों का सूचक है. और क्या कहूं?
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डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल 
ई-2/211, चित्रकूट, जयपुर -302021.
dpagrawal24@gmail.com

कालू लाल कुलमी
गांव राजपुरा, पोस्ट कानोड़, तहसील वल्लभनगर ज़िला उदयपुर (राजस्थान) पिन- 313604.
Paati.kalu@gmail.com

Thursday, August 2, 2012

“संगीत सतत साधना है और यहां सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं है” सुविख्यात वायलिन वादिका डॉ एन. राजम से डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की बातचीत

1930 के दशक में चैन्नई में एक विख्यात सांगीतिक  परिवार में जन्मीं एन. राजम आज देश की शीर्षस्थ वायलिन वादिकाओं में से एक मानी जाती हैं. लेकिन उनकी इस प्रतिष्ठा  के पीछे है साधना और समर्पण की सुदीर्घ महागाथा.  चार वर्ष की अल्प वय में उनके पिता, सुपरिचित एवम सम्मानित वायलिन वादक विद्वान ए. नारायणन ने उन्हें वायलिन बजाना सिखाना शुरू कर दिया था. निष्णात पिता की शिक्षा और कुशाग्र-बुद्धि पुत्री-शिष्या के इस मणिकांचन  संयोग की एक परिणति तो यह हुई कि नौ बरस की होते-होते तो एन. राजम आकाशवाणी पर वायलिन बजाने लग गई और मात्र 13 वर्ष की होने पर उन्हें आकाशवाणी के ही नेशनल प्रोग्राम में श्रीमती एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के साथ बजाने का अवसर  मिल गया. इसी दौरान उन्हें पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के कुछ रिकॉर्ड्स सुनने का अवसर मिला और वे पण्डित जी के गायन से इतनी अधिक प्रभावित हुईं कि उनकी शिष्या बनने का सपना देखने लगीं. लेकिन यह स्वप्न साकार बहुत बाद में हो सका. पण्डित जी की शिष्या बनीं वे 1954 में और फिर तो 1970 में पण्डित जी के स्वर्गवास तक वे उनकी शिष्या ही बनी रहीं.  पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का यह शिष्यत्व एन. राजम की संगीत साधना का अत्यधिक महत्वपूर्ण पड़ाव है.  


एन. राजम ने संगीत साधना के साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. दसवीं  तक की पढ़ाई उन्होंने चैन्नई में ही की और उसके बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राइवेट विद्यार्थी के  रूप में इण्टर, बी.ए. तथा एम. ए. की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं. इनके अलावा उन्होंने गन्धर्व महाविद्यालय से बी.म्यूज़. तथा प्रयाग संगीत समिति से एम. म्यूज़. की उपाधियां भी अर्जित कीं. 


अपनी अकादमिक शिक्षा पूरी कर एन. राजम ने 1959 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक पद पर काम करना शुरू किया और उसी विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी और कर्नाटक प्रणालियों का तुलनात्मक अध्ययन विषयक शोध-कार्य कर पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की. श्रीमती राजम ने लगभग चार दशकों तक विश्वविद्यालय की सेवा की और  अपने विश्वविद्यालय के संगीत विभाग की अध्यक्षा और संगीत नाट्य संकाय विभाग की अधिष्ठाता के पदों तक पहुंचीं. 


श्रीमती एन राजम के शिष्यों की संख्या तो इतनी है कि उसकी गिनती भी मुमकिन नहीं है, लेकिन उनकी सबसे ज़्यादा विख्यात शिष्या उनकी पुत्री संगीता शंकर ही हैं, हालांकि  उनकी भतीजी कला रामनाथ ने भी खूब नाम कमाया है. इनके अलावा रागिनी और नंदिनी शंकर, प्रणव कुमार, सत्य प्रकाश मोहंती, वी. बालाजी और स्वर्ण खूंटिया आदि का नाम भी सुपरिचित है.  श्रीमती एन राजम के भाई टी. एन कृष्णन खुद बहुत नामी वायलिन वादक हैं. 


श्रीमती एन राजम को अनगिनत पुरस्कारों  और सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है और यह सिलसिला अभी भी जारी है. सुर सिंगार संसद ने उन्हें 1967 में ‘सुरमणि’ की उपाधि प्रदान की तो संगीत नाटक अकादमी ने पुरस्कृत किया और काशी हिंदू  विश्वविद्यालय ने मदनमोहन मालवीय पुरस्कार प्रदान किया. भारत सरकार ने 1984 में आपको पद्मश्री से और 2004 में पद्म भूषण से अलंकृत किया. 2004 में ही आपको पुत्ताराजा सम्मान भी प्रदान किया गया. वर्ष 2010 में आपको पुणे की आर्ट एण्ड म्यूज़िक फाउण्डेशन ने पुणे पण्डित अवार्ड से नवाज़ा. 


कई बरस पहले मुझे वाराणसी में एक शाम श्रीमती एन. राजम से  लम्बी बातचीत करने का मौका मिला. इस बातचीत का आलेख मेरे कागज़ों में कहीं दबा रह गया. प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ अंश: 

हम अपनी बातचीत यहीं से प्रारम्भ करें कि आज़ादी के बाद से भारतीय संगीत परिदृश्य में क्या बड़े परिवर्तन आए हैं? 
सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह आया है कि जो संगीत पहले कुछ लोगों तक सीमित था, वह अब सर्व-सुलभ हो गया है. यह बात सीखने और सुनने दोनों पर समान रूप से लागू होती है. विश्वविद्यालयों में भी संगीत की शिक्षा दी जाने लगी है. इस सांस्थानिक शिक्षण की नींव पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने रखी थी.

क्या आप ऐसा मानती हैं कि संस्थाओं में दी गई शिक्षा से कलाकार तैयार हो सकते हैं? 
हां, अगर गुरुकुल परम्परा की अच्छाई संस्थागत शिक्षण में अंगीकार की जाए तो कलाकार भी तैयार हो सकते हैं. गुरुकुल में कई वर्ष तक एक ही राग सिखाया जाता था. अब पाठ्यक्रमों में विस्तार पर ज़्यादा बल होता है. इस पर पुनर्विचार आवश्यक है. फिर, यह मत भूलिये कि संस्थागत शिक्षण मात्र कुछ ही बरस पुराना तो है. लम्बे समय तक तो यह कहकर ही संगीत शिक्षा का विरोध किया जाता रहा है कि तबला वगैरह विश्वविद्यालय में क्यों ला रहे हैं!  संस्थागत शिक्षण को अभी बहुत कम समय हुआ है. अभी उसके मूल्यांकन का उपयुक्त अवसर  नहीं है.

आप दक्षिण भारत से हैं, इसलिए आपसे यह जानना चाहता हूं कि आज कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत परिदृश्य में क्या बड़े अंतर हैं? 
मुझे तो दोनों जगह एक-सी स्थितियां लगती हैं. कोई आधारभूत अंतर दिखाई नहीं देता. दोनों ही जगह पहले संगीत का मतलब शास्त्रीय संगीत होता था, फिर सिनेमा आया और अब टीवी वगैरह, और इन्होंने क्रमश: संगीत की परिभाषा बदलने में बड़ी भूमिका अदा की.

आपने अभी कहा कि सिनेमा और टीवी ने संगीत को बदलने में बड़ी भूमिका अदा की है. किस तरह हुआ है यह?
पूरी तरह से इनकी बुराई तो मैं नहीं करना चाहती. इनके कारण शास्त्रीय आधार वाले अनेक गीत लोकप्रिय होकर जनता तक पहुंचे ही हैं, लेकिन कुल मिलाकर इनके कारण जनता का ध्यान शास्त्रीय संगीत से हटा भी है.

शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार में सरकार की भूमिका के बारे में आप क्या सोचती हैं? 
सरकार ने सांस्कृतिक छात्रवृत्तियों, सांस्कृतिक केन्द्रों आदि के माध्यम से और कलाकारों को संरक्षण देकर काफी काम किया है, पर हमारा देश इतना बड़ा है कि जो किया गया है वह दिखाई ही नहीं देता है. यानि, और भी काफी कुछ किया जाना ज़रूरी है. भारत महोत्सवों आदि में ज़्यादा ज़ोर लोक कलाओं पर ही रहा है. मैं यह कहना चाहती हूं कि सरकार को चाहिये कि वो संगीत को अनिवार्य विषय बनाए, पहली कक्षा  से ही संगीत की शिक्षा सबको दी जाए. ऐसा करने से लोग कान से तैयार होंगे. तब अपने आप संगीत  का संवर्धन होगा.

आज की युवा पीढ़ी शास्त्रीय संगीत के प्रति कैसा नज़रिया रखती है?
जहां परिवारों में शास्त्रीय संगीत के प्रति कुछ रुझान है वहां तो बच्चे भी उसमें  रुचि लेते हैं, लेकिन जहां ऐसा नहीं है वहां ज़्यादा उम्मीद नहीं रखी जा सकती. हमारे संचार माध्यम शास्त्रीय संगीत की तुलना में फिल्म संगीत को अधिक समय देते हैं, इसका भी युवा पीढ़ी  पर खासा असर पड़ता है. लेकिन इस सबके  बावज़ूद  ‘स्पिक मैके’ जैसी संस्थाओं ने बहुत बड़ा काम किया है. मैं प्रारम्भ से ही इस संस्था के साथ हूं. वैसे भी मेरे मन में विद्यार्थियों के प्रति एक सहज अनुराग का भाव है. मैं पाती हूं कि जहां भी पहले ‘स्पिक मैके’  का कोई आयोजन होता है, उपस्थिति थोड़ी कम होती है, लेकिन धीरे-धीरे वातावरण बनने लगता है.

अपने समकालीन कलाकारों के साथ जुगलबन्दी के आपके अनुभव कैसे रहे हैं? मुझे लगता है कि इस बारे में आप अधिक उत्साही नहीं रही हैं.
हां, आपका खयाल ठीक है. मैंने इस तरफ ज़्यादा रुचि नहीं दिखाई. इसका कारण यह है कि जुगलबन्दी में बहुत जल्दी अहम का टकराव होने लगता है. कलाकार एक दूसरे को नीचा दिखाने के तरीके ढूंढ़ने लगते हैं. किसी को डाउन करना बड़ी बात नहीं है, पर मैं मानती हूं कि इस दृष्टि से स्टेज पर जाना ही नहीं चाहिए. आखिर क्यों किसी से सम्बन्ध खराब किये जाएं? लेकिन ऐसा नहीं है कि हर कलाकार के साथ ऐसा ही होता हो. बिस्मिल्लाह खां साहब के साथ मेरे बहुत अच्छे अनुभव रहे हैं. इसका एक कारण यह भी रहा कि उनकी और मेरी दोनों ही की वादन शैली गायकी अंग की है.

इधर हमारे कलाकारों में प्रयोगशीलता की तरफ़ भी काफी झुकाव दिखाई देता है. कईयों ने पूर्व-पश्चिम मिलन के प्रयास भी किए हैं. क्या आपने भी ऐसा कुछ किया है?
मेरा विश्वास परम्परा की शुद्धता में है. यह कहकर मैं दूसरे कलाकारों की आलोचना नहीं कर रही हूं. हो सकता है कि उनकी प्रयोगशीलता में भी कोई अच्छी बात हो, पर मैं मानती हूं कि दो अलग-अलग संगीत धाराओं या शैलियों को मिलाने की कोशिश का कोई औचित्य नहीं है. यह मेरी अपनी पसन्द की बात है.

भारत में और विशेषत: भारतीय भाषाओं में संगीत-समीक्षा की क्या स्थिति है? 
बड़े शहरों में, ख़ास तौर पर महानगरों में तो कुछ वाकई जानकार लोग इस क्षेत्र में हैं, लेकिन छोटी जगहों में बिना जानकारी के कुछ भी लिख डालने वाले लोग अपने काम के साथ न्याय नहीं कर पाते हैं. अंग्रेज़ी में मोहन नाडकर्णी, माधव मेनन और हिंदी में मदन लाल व्यास गहरी समझ के साथ लिखते हैं.

क्या आपको भी ऐसा लगता है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत में महिलाओं की भागीदारी कुछ कम है? अगर ऐसा है तो इसके कारण क्या हैं? 
ऐसा तो नहीं है कि महिलाएं बहुत कम हैं, लेकिन वे कई कारणों से आगे नहीं आ पाती हैं. उचित वातावरण उन्हें नहीं मिल पाता है और इसलिए वे इतनी ख्याति भी अर्जित नहीं कर पाती हैं.

एक महिला होने की वजह से क्या आप पर भी कोई अतिरिक्त दबाव रहते हैं? 
मुझे तो एकसाथ दोहरी तिहरी ज़िम्मेदारी निबाहनी होती है. दबाव तो रहते ही हैं. फिर, अनेक त्याग करने पड़ते हैं – और यह इस बात के बावज़ूद कि मुझे मेरे ससुराल से पूरा सहयोग मिला है, पति ने हर तरह से प्रोत्साहित किया है. फिर भी, संगीत साधना करते हुए, प्रोग्राम देते हुए, घर परिवार की ज़िम्मेदारी तो पूरी ही निबाहनी होती है. इतना सब करने का लाभ क्या है?

आपने अभी घर-परिवार की बात की. आप काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाती रही हैं और संगीत जगत की भी एक बहुत बड़ी शख्सियत हैं. क्या इन दो भूमिकाओं में भी कभी कोई टकराव हुआ?  
जी नहीं, हालांकि ऐसा होना असम्भव भी नहीं है. टकराव तो कभी भी, कहीं भी हो सकता है. लेकिन मैंने विश्वविद्यालय में पढ़ाते हुए एक सबड्यूड रोल रखा, लो प्रोफाइल रखा. मैंने यह बात हमेशा ध्यान में रखी कि कलाकर तो मैं सिर्फ स्टेज पर हूं, उसके बाद तो औरों की तरह एक मामूली इंसान ही हूं.   यही कारण है कि मेरी दो या तीन भूमिकाओं में कभी कोई टकराव नहीं हुआ.  घर पर गृहिणी, विश्वविद्यालय में अध्यापिका या अधिष्ठाता, मंच पर कलाकार – मेरे मन में ये विभाजन सदैव स्पष्ट रहे.

आपने तो लगभग पूरे हिन्दुस्तान में बजाया है. कहां बजाकर आपको सबसे ज़्यादा सुख मिला? 
मुंबई और पूना में  बजाना मुझे हमेशा अच्छा  लगा है. देखिये, बात यह है कि रसिक श्रोता तो सब जगह होते हैं, असली बात होती है आयोजकीय कुशलता. जहां संगठन अच्छा होता है वहां प्रोग्राम भी अच्छा होता है. छोटे शहरों में भी कई बार बड़े समझदार श्रोता मिल जाते हैं. राजस्थान में कोटा में मुझे ऐसा ही सुखद अनुभव हुआ है.

कोई बेहद सुखद अनुभव भी तो होगा आपकी स्मृति मंजूषा में! 
हां है ना. पूना में पण्डित भीमसेन जोशी जी सवाई गन्धर्व समारोह किया करते थे. एक बार  मैं उसमें बजा रही थी. बजाते-बजाते बीच में ही अचानक लाइट चली गई. क्योंकि वहां आम तौर पर बिजली जाती नहीं थी इसलिए आयोजकों ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं कर रखी थी. एकदम घुप्प अन्धेरा हो गया. मैंने भी बजाना बन्द कर दिया. उस वक़्त विलम्बित खयाल बजा रही थी. आलाप पूरा किया ही था, बोल तान  बजाने थे.  थोड़ी देर बाद जब लाइट आई तो मैं दूसरी चीज़ बजाने लगी. लेकिन यह क्या! ऑडियंस चिल्लने लगी कि जहां आपने छोड़ा था वहीं से शुरू कीजिए. बीस-पच्चीस हज़ार श्रोता थी, ज़रा भी अव्यवस्था नहीं हुई, कोई शोर-शराबा नहीं हुआ. उस वक़्त मुझे जो सुख मिला उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकती.
इसी तरह, एक बार यहीं की, यानि बी एच यू की बात है, कोई समारोह था. लड़के लोग हूटिंग पर उतारू थे और मुझे बजाना था. गुरुजी –पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर जी-  सामने बैठे थे. मुझे तो बहुत डर लग रहा था. बजाना ही नहीं चाह रही थी. चाह क्या रही थी, हिम्मत ही नहीं हो रही थी. गुरुजी ने कहा,  “मेरी शिष्या हो, जाओ, बजाओ!” अब उनके आदेश को तो भला कैसे टालती? मैंने बजाया, और उस पर जो वंस मोर की आवाज़ें उभरी कि कुछ पूछिये मत. गुरुजी मुझे अकसर संगत के लिए ले जाया करते थे. वे लोगों से कहते थे, मुझे अगर हू-ब-हू सुनना है तो इस लड़की को सुनो. उनकी तो बहुत  सारी यादें मन में संजो रखी हैं मैंने.

कुछ लोगों को लगता है कि आपकी वायलिन वादन की शैली अपने समकालीन सारे कलाकारों से अलहदा है. क्या आप भी ऐसा मानती हैं? 
बात यह है कि भारत के ज़्यादातर वादक गतकारी शैली में बजाते हैं. उनसे अलग, मैं गायकी शैली में बजाती हूं. जैसे गायक एक-एक फ्रेज़ को, एक-एक टुकड़े को अलग करके गाते हैं, वही प्रभाव मैं अपने वादन में पैदा करने की कोशिश करती हूं. आपने पूछ ही है तो यह कहने की गुस्ताखी कर रही हूं कि यह मेरी अपनी देन है.

संगीत के अतिरिक्त आपकी और भी कुछ रुचियां ज़रूर होंगी. कुछ उस बारे में भी बताएं! 
मेरे पास वक़्त ही नहीं है कि मैं कोई और शौक पालूं. अगर कोई शौक पाल लिया होता तो फिर संगीत को पूरा समय कैसे दे पाती? मेरा जो भी समय है वह सारा का सारा संगीत को समर्पित है.

अब भी, इतनी लम्बी साधना के बाद भी क्या संगीत को नियमित समय देना पड़ता है? 
हां, अगर खाना न खायें तो चल सकता है लेकिन रियाज़ किये बगैर नहीं चलता. रियाज़ तो नियमित रूप से करना ही पड़ता है. हर बार जब स्टेज पर जाते हैं तो लगता है कि एक परीक्षा दे रहे हैं, और उस परीक्षा के लिए पूरी तैयारी करनी होती है. इतना ज़रूर है कि अब और-और चीज़ों का दबाव भी समय पर बढ़ा है. यही कारण है कि पहले जहां आठ नौ घण्टे रियाज़ करती थी अब वह घट कर कम हो गया है. लेकिन रियाज़ तो करना ही होता है.

आखिरी सवाल. संगीत के क्षेत्र में आने वाली नई पीढ़ी को क्या सलाह, क्या गुरु मंत्र देना चाहेंगी?  
यही कि संगीत तो एक निरंतर साधना है, तपस्या है. यहां सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं है. जो लोग यह सोचते हैं कि दो-तीन साल सीख कर यश प्राप्त कर लेंगे, उन्हें तो निराश ही होना पड़ेगा. यहां सफलता के लिए कड़ी और लगातार मेहनत ज़रूरी है. आपमें अगर गुण है और मेहनत करके आपने उसे मांजा है, तराशा है, तो आपकी पूछ भी ज़रूर होगी. हीरे की चमक को कोई ताकत छिपा कर नहीं रख सकती है.

इस बातचीत के बाद भी श्रीमती राजम से काफी देर तक अनौपचारिक गपशप होती रही थी. उनसे बात करते हुए एक क्षण को भी यह नहीं लगा कि मैं एक बहुत बड़ी कलाकार से रू-ब-रू हूं. यही लगता रहा कि अपने परिवार की किसी  ऐसी बड़ी से बात कर रहा हूं जो उम्र के थोड़े-से अंतराल के बावज़ूद संवेदना के स्तर पर समान धरातल पर हैं. बरसों बीत गए हैं इस बातचीत  को लेकिन इसकी स्मृतियां अभी भी ताज़ी हैं.  


Wednesday, August 1, 2012

यहां फोटो खींचना मना है! क्यों?

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जब हम छोटे थे, बार-बार पढ़ने को मिला करता था, ‘भारत एक कृषि  प्रधान देश  है’. तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है. अब अपने चारों तरफ नज़र डालता हूं तो मेरा मन करता है कि कहूं, ‘भारत निषेध प्रधान देश है’. जैसे मना करना हमारा राष्ट्रीय शौक,  नहीं-नहीं स्वभाव है. आप अपने आस-पास की तमाम दीवारों को देख लीजिए. थूकना मना है, फालतू बैठना मना है, फूल तोड़ना मना है, घास पर चलना मना है, धूम्रपान करना मना है, चलती बस से शरीर का कोई अंग बाहर निकालना मना है, गंदगी फैलाना मना है, शोर करना मना है, इस पानी से हाथ धोना मना है..... और ऐसे अनगिनत  निर्देश  वाक्य आपको भी याद आ जाएंगे. कभी-कभी लगता है कि हमारे यहां सब कुछ करना मना ही है, कुछ भी करने की इजाज़त नहीं है. यही शायद हमारा राष्ट्रीय स्वभाव है.

लेकिन ज़रा ठहरिये. ऊपर मैंने जो वाक्य लिखे हैं, उनमें से ज़्यादातर ज़रूरी भी हैं. लोग चाहे जहां थूक देते हैं, इसलिए लिखना पड़ता है कि थूकना मना है. लोग हर कहीं कचरा फेंक देते हैं, इसलिए लिखना पड़ता है कि गन्दगी फैलाना मना है. अब यह बात अलग है कि लिखने वाले लिख कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं और करने वाले फिर भी अपनी मनमानी करते रहते हैं. मुझे तो यह भी लगता है कि शायद निषेधों की अतिशयता ही उन्हें निष्प्रभावी बना डालती है.  अगर आप बीस बातों के लिए मना न करके सिर्फ एक या दो बातों के लिए ही मना करें तो शायद उस मना का कुछ अधिक प्रभाव भी हो.

अभी ऊपर मैंने जिन निषेधों का ज़िक्र किया वे आवश्यक निषेध हैं. लेकिन हमारे निषेध प्रेमी स्वभाव की वजह से ऐसे भी अनेक निषेध प्रचलन में आ गए हैं जिनकी वस्तुत: कोई ज़रूरत ही नहीं है. ऐसा ही एक निषेध है ‘यहां फोटो खींचना मना है’. आम तौर पर यह निषेध पर्यटन स्थलों पर देखने को मिलता है. पहले इस निषेध वाक्य को सरकारी भवनों पर भी लटकाने की परम्परा थी. मेरे शहर में बिजली घर के ग्रिड सब स्टेशन पर बहुत लम्बे समय तक फोटो खींचने की मनाही लटकी  रही थी. और मैं सदा यह सोचता था कि कौन मूर्ख होगा जो इस बदसूरत निर्मिति का फोटो खींचने में अपने कम से कम दसेक रुपये (वो ज़माना डिजिटल फोटोग्राफी से पहले का था) बर्बाद  करेगा!  बाद में किसी ने समझाया कि सुरक्षा कारणों से यह निषेध लागू किया गया था. तब भी मुझे लगता था कि किसी को कोई विध्वंसात्मक हरक़त करने के लिए ही अगर इस निर्मिति का फोटो खींचना होगा तो  क्या वो इतना मूर्ख होगा कि सामने खड़े होकर इसका फोटो खींचेगा? वो किसी अत्याधुनिक तकनीक (जैसे हवाई छायांकन) का उपयोग करके फोटो नहीं ले लेगा?

कई मन्दिरों के बाहर भी फोटो  खींचने की मनाही अंकित होती है. कुछ जगहों पर पूरे मंदिर का और कुछ जगहों पर केवल देव विग्रह का छायांकन  वर्जित होता है. कुछ जगहों पर कोई निषेध नहीं होता. निषेध करने वालों का तर्क यह होता है कि  फोटोग्राफी करने वाले मंदिर में अपेक्षित शालीनता का उल्लंघन कर जाते हैं इसलिए उन्हें फोटोग्राफी का निषेध करना पड़ता है. यह बात उपयुक्त भी लगती है. अगर कोई उत्साही युगल देव प्रतिमा  के सामने खड़े होकर किसी अंतरंग मुद्रा में  फोटो खिंचवाए तो अन्य भक्तगण का बुरा मानना स्वाभाविक है. और देव प्रतिमा के सामने ही क्यों  पूरे ही मन्दिर परिसर में भी ऐसा करना अवांछित माना जाएगा. जिन  मन्दिरों के  प्रबंधकगण किसी भी तरह का निषेध नहीं करते हैं वे शायद वहां आने वालों के विवेक पर अधिक विश्वास करते हैं.

कुछ ऐतिहासिक या  पर्यटक महत्व के दर्शनीय स्थलों  में इसलिए छायाचित्रांकन का निषेध कर दिया जाता है कि वहां का प्रबंधन खुद वहां के छायाचित्र बेचता है और चाहता है कि अगर आपको उस स्थल की किसी स्मृति को संजो कर ले जाना है तो आप उन्हें इसका मोल चुकाएं. कहना अनावश्यक है कि यह शुद्ध व्यावसायिक दृष्टि वाला निषेध है. कुछ अन्य जगहों पर आपको कैमरे का इस्तेमाल करने के लिए अतिरिक्त शुल्क भी देना होता है. यह भी व्यावसायिक नज़रिया ही है.

अपनी ताज़ा मैसूर यात्रा के दौरान मैंने मैसूर के विश्वविख्यात राजमहल में छायांकन का ऐसा निषेध देखा जो मुझे बहुत अटपटा लगा. असल में इसी निषेध ने मुझे यह टिप्पणी लिखने को प्रेरित भी किया. मैसूर पैलेस में प्रवेश करते ही आपको पता चल जाता है कि वहां भीतर कैमरा ले जाना मना है. प्रवेश द्वार के पास ही उन्होंने यह व्यवस्था भी कर रखी है कि आप अपने कैमरे वहां जमा करा दें. बाकायदा एक रसीद और जिस लॉकर में आपका कैमरा रखा गया है उसे बन्द करके उसकी चाबी आपको दे दी जाती है. वहां लिखा तो यह हुआ है कि यह सुविधा निशुल्क है, लेकिन उसका शुल्क लिया जाता है. शायद शुल्क लेने का निर्णय बाद का हो और सूचना पट्ट पर तदनुसार संशोधन नहीं हो पाया  हो. बहरहाल, पर्यटकों के कैमरों को सुरक्षित रखने की यह व्यवस्था तो मुझे बहुत अच्छी लगी.

लेकिन मेरे मन में सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस व्यवस्था की कोई ज़रूरत भी थी? एक पूरा  कमरा और दो-तीन लोग इस व्यवस्था में लगे हुए हैं. इन लोगों की तनख्वाह पर भी ठीक-ठाक खर्च होता होगा. पर्यटक को भी कई बार अपने कैमरे जमा करवाने या उन्हें वापस लेने के लिए लम्बी कतार की यातना सहनी पड़ती होगी.

लेकिन पहला सवाल तो यही कि एक महल, जिसे आप टिकिट बेच कर और भरपूर प्रचार कर दिखा रहे हैं, अगर कोई उसके फोटो ले तो आपको आपत्ति क्यों हो? यह तो गुड़ खाये और गुलगुलों से परहेज़ करे जैसी बात हुई ना! समझने की बात तो यह है कि अगर कोई उसका फोटो खींचेगा तो वह अप्रत्यक्ष रूप से उस महल का प्रचार ही करेगा. जब भी हम अपने मित्रों परिजनों को अपनी यात्रा की तस्वीरें दिखाते हैं  तो वे भी उन स्थलो के सौन्दर्य से प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहते हैं और उनके मन में भी उन स्थलों  की यात्रा करने की चाहत जागती है. इस तरह उस स्थल का प्रचार ही होता है. फोटोग्राफी से उस इमारत का कुछ भी नहीं बिगड़ता है. फिर मनाही क्यों? शायद इसीलिए कि निषेध हमारे स्वभाव का एक अंग बन चुका है.

यहां मैंने एक बात और लक्ष्य की जिससे मुझे इस मनाही की मूर्खता पर गुस्सा भी आया और हंसी भी. इस महल में कैमरे ले जाना निषिद्ध है (हालांकि बहुत कड़ाई से तलाशी वगैरह न  होने की वजह से कुछ ‘वीर’  लोग अपने कैमरे ले भी आए और उनका इस्तेमाल करते रहे) लेकिन मोबाइल पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है. अब आजकल सामान्य से सामान्य मोबाइल फोन में भी काम चलाऊ कैमरा तो होता ही है और थोड़े बेहतर मोबाइल हैण्ड सेटों में तो खासे उम्दा कैमरे होते हैं. अभी नोकिया ने तो इकतालीस मेगापिक्सल वाला कैमरा निकाल कर सबको पीछे छोड़ दिया है.  लोग अपने मोबाइल कैमरों का भरपूर इस्तेमाल कर रहे थे. यानि प्रकारांतर से, रोक सिर्फ कैमरे पर थी, फोटोग्राफी पर नहीं. शायद वहां व्यवस्था करने वालों को लगा हो कि मोबाइल का भीतर ले जाना वर्जित करना व्यावहारिक नहीं होगा. लेकिन उनका ध्यान शायद इस बात पर नहीं गया कि मोबाइल से फोटोग्राफी भी की जा सकती है.  और इस तरह उनका फोटोग्राफी पर रोक का इरादा महज़ एक मज़ाक बन कर रह गया.

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि हमारे पर्यटक स्थलों के प्रबंधक  इस बात पर खुले मन से विचार करें कि क्या फोटोग्राफी पर प्रतिबंध  लगाना उचित है, और व्यावहारिक भी? अपनी विदेश यात्राओं के दौरान मैंने पाया है कि वहां फोटोग्राफी पर न केवल  कोई प्रतिबंध नहीं होता है, इसके विपरीत वे लोग बाकायदा सूचना पट्ट लगाकर  आपको यह और बताते हैं कि अगर आप यहां से फोटो लेंगे तो अच्छा आएगा. फोटोग्राफी के लिए अलग से पैसे ले लेने  की बात  भी उस ज़माने में भले ही उपयुक्त रही हो जब कैमरों का प्रचलन बहुत कम था और विशिष्ठ (और धनी ) लोग ही कैमरे रखा करते थे. अब कैमरों के सस्ते, सुलभ और आम आदमी की पहुंच में आ जाने के बाद, डिजिटल फोटोग्राफी के चलन से फोटोग्राफी के इस शौक़  के सस्ता हो जाने के बाद और मोबाइल हैण्ड सेटों में कैमरों के आ जाने की वजह से लगभग हर हाथ में कैमरा पहुंच जाने के बाद,  किसी तरह के प्रतिबन्ध का कोई अर्थ ही नहीं रह गया है. और फिर प्रतिबन्ध हो भी क्यों?

और जो बात यहां मैंने फोटोग्राफी के सन्दर्भ में कही है वही बात बहुत सारे अन्य निषेधों पर भी लागू होती है. लेकिन उसकी चर्चा फिर कभी.
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जयपुर से प्रकाशित दैनिक नवज्योति में 29 जुलाई, 2012 को प्रकाशित.