Sunday, March 8, 2009

आनन्द के पीछे छिपा अवसाद


अगर आपका यह खयाल है कि भ्रष्टाचार हिन्दी व्यंग्य लेखकों की कमज़ोरी है, तो कृपया विख्यात पत्रकार मैक्लीन जे स्टोरर की इस कृति, फॉर्वर्ड ओ पीजेण्ट को ज़रूर पढें. आप मान जाएंगे कि यह तो सर्वव्यापी है. अगर आप पहले से भी ऐसा मानते हैं तो भी कोई हर्ज़ नहीं. किताब फिर भी आपको निराश नहीं करेगी. तो, पहले किताब की ही बात कर ली जाए.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक काल्पनिक शाखा यू एन मेट एक युवा ब्रिटिश समाज विज्ञानी डॉ फिलिप स्नो को वियतनाम भेजना चाहती है. इस शाखा का एक कर्मी, एक युवा स्वीडी, वहां से लापता हो गया है और इस कारण वहां भेजी जाने वाली सहायता राशि रुक गई है. यह भी शिकायत मिलती रही है कि बर्ड फ्लू पर शोध के लिए जो राशि दी जाती रही है उसके उपयोग में अनियमितताएं बरती जा रही हैं. स्नो को इस सबकी पड़ताल करनी है. स्नो वियतनाम के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानता. लेकिन उसने सुन रखा है कि वहां की धरती पर एक खास तरह का हानिप्रद रसायन, जिसका नाम एजेण्ट ऑरेंज है, पाया जाता है. यह रसायन कैंसर उपजाता है. ज़ाहिर है कि वह वियतनाम जाने को उत्सुक नहीं है. लेकिन उसे जाना पड़ता है.

स्नो के वियतनाम पहुंचने से वे सारे अधिकारी परेशान हो उठते हैं जो अपने-अपने तरीके से उस शोध राशि को खर्च करने की तैयारी में थे और हैं. वे लोग स्नो को अपनी जांच से विचलित करने के लिए अजीबो-गरीब हरकतें करते हैं, और वे हरकतें ही इस कृति को दिलचस्प बनाती हैं. किसम-किसम के ये अधिकारी बेहद लोलुप हैं और शुरू-शुरू में तो स्नो के प्रति लिजलिजी विनम्रता का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन जब उन्हें लगता है कि स्नो उनके झांसे में आने वाला नहीं है और अपने काम को ईमानदारी से अंजाम देने की ज़िद्द पर अड़ा है तो वे हताश होकर जासूसी के गम्भीर आरोप में उसके घर पर आधी रात गए एक छापा पड़वा देते हैं. वियतनाम में स्नो खुद को जिन चरित्रों से घिरा पाता है वे किसी भी तरह उस तथाकथित रसायन एजेण्ट ऑरेंज से कम घातक नहीं हैं, चाहे वे आक्रामक मार्क्सिस्ट चिंतक हों, वियतनाम में रह रहे विदेशी नशेड़ी हों, ज़रूरत से ज़्यादा सजग भिखारी हों, पगले वेटर हों या कठपुतली नौकरशाह.

रचना की रोचकता उन सारी स्थितियों में है जिन्हें ये बेईमान लोग अपनी कारगुजारियों से या बचाव के लिए पैदा करते हैं. एक फुटबाल मैच के दौरान वान इम्स्ट द्वारा खराब हो चुके टीके लगाने और उनके द्वारा जर्मन खिलाड़ियों की तबियत खराब हो जाने का वर्णन हो या एक मेक्सिकी अधिकारी की वियतनाम यात्रा के दौरान उसे खुश करने के हास्यास्पद प्रयासों और खुद उस अधिकारी की बेहूदा हरकतों का वर्णन, लेखक एब्सर्ड स्थितियां रचकर स्थितियों की भयावहता उजागर करने में कामयाब रहता है.

उसके इन प्रयासों में उसकी व्यंग्यात्मक भाषा खूब मददगार सिद्ध होती है. कुछ बानगियां पेश हैं: ‘वियतनाम में रहना ऐसा ही था जैसे आपको ओमेन के बीच धकेल दिया गया है. चारों तरफ डरावनी बातें घटित हो रही थीं और उनके खत्म होने के कोई आसार भी दिखाई नहीं दे रहे थे.’ या ‘पूरा परिवार एक आउटडोर कैफे में एक बड़ी गोल टेबल के चारों तरफ बैठ कर फुटबाल के आकार की एक आइसक्रीम को निपटाने की कोशिश कर रहा था’ या डॉ स्नो के बारे में लेखक की यह टिप्पणी कि ‘वियतनाम में उसकी नियति यही थी कि या तो वह उपहास का पात्र बने या एक एटीएम मशीन बना रहे. अक्सर तो उसे दोनों ही भूमिकाओं में रहना पड़ता था.’

स्टोरर ने खुद 15 बरस वियतनाम में बिताये हैं इसलिए उन्हें वहां की अन्दरूनी स्थितियों की अच्छी जानकारी है, और उस जानकारी का उन्होंने इस किताब में बहुत उम्दा तरह से इस्तेमाल किया है. फार्वर्ड ओ पीजेण्ट की कथा निकोलाई गोगोल की विख्यात कृति ‘इंस्पेक्टर जनरल’ की याद ताज़ा करती है तो इसका अन्दाज़े-बयां श्रीलाल शुक्ल की अमर कृति ‘राग दरबारी’ का स्मरण कराता है. किताब आपको बांधे रखने में पूरी तरह कामयाब है. आप पढते हुए आनंदित होते हैं, लेकिन उस आनंद के पीछे गहरा अवसाद भी घनीभूत होता रहता है.
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Discussed book:
Forward O Peasant
By Maclean J Storer
Published by Gauss Publishing
Paperback, 324 pages
Price US $ 16.95

राजस्थान पत्रिका के  रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 08 मार्च 2009 को प्रकाशित.



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Saturday, March 7, 2009

हम तो ऐसे हैं भैया

कोई चार बरस बाद फिर से दिल्ली के इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आना हुआ तो उसकी बदली शक्ल-सूरत देख कर बड़ा अच्छा लगा. चौबीस घण्टों के अंतराल में ही तीन अलग-अलग हवाई अड्डों को छूने का मौका मिला और अलग-अलग तरह के अनुभव हुए. दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर पहले से ज़्यादा चमक-दमक और सुविधाएं नज़र आईं लेकिन भीड़-भाड और अव्यवस्था में कोई बदलाव नहीं मिला. लंदन का हीथ्रो हवाई अड्डा अपनी विशालता की वजह से आतंकित करता लगा लेकिन यह भी महसूस हुआ कि उस विशालता के बावज़ूद वहां कोई अव्यवस्था नहीं है. अमरीका के सिएटल हवाई अड्डे को हालांकि उतना बड़ा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हमारे अपने हवाई अड्डे से काफी बड़ा होने के बावज़ूद वह अपनी सुविधाओं और व्यवस्थाओं में बहुत अंतरंग और आत्मीय लगा. इमिग्रेशन काउण्टर के ठीक पीछे बहुत बडी दीवार पर अमरीका में स्वागत की घोषणा देवनागरी लिपि में भी देखकर गर्व भी हुआ प्रसन्नता भी.

जयपुर से दिल्ली तक का टैक्सी का सफर यों तो ठीक था लेकिन बहरोड़ से निकलते ही जो भीषण ट्रैफिक जाम लगा मिला तो एक बार तो हमारे होश ही उड़ गए. गाड़ी से बाहर निकल कर पता किया तो बताया गया कि अगले दो-तीन घण्टे तो इस जाम के हटने की कोई सम्भावना नहीं है. यानि हमारी फ्लाइट तो मिस होनी ही है. गाड़ी में बैठे-बैठे ही अमरीका में बैठी बेटी से भी लगातार बात हो रही थी और हमारी चिंता के घेरे में वह भी आ रही थी. लेकिन जैसे कोई चमत्कार हुआ, जाम हटा और हम कुछ देर से ही सही, हवाई अड्डे पहुंच गये. फ्लाइट सात बजे थी, हम छह बजे पहुंच गए. वहां जाकर पता चला कि फ्लाइट भी एक घण्टा लेट है. इस बात से और ज़्यादा राहत मिली. चैक-इन हम जयपुर में अपने घर से ही कर चुके थे. तकनीक ने ज़िन्दगी को कितना आसान बना दिया है! जिस काम के लिए हवाई अड्डे पर लम्बी जद्दो-जहद करनी पड़ती थी, वह तो घर बैठे दो-चार मिनिट में ही हो गया था. न केवल दिल्ली की, लन्दन की चैक-इन भी हमने घर से ही कर ली थी और अपने बोर्डिंग पास हमारे हाथों में थे, अब तो बस सुरक्षा जांच और सामान जमा करवाने का काम बाकी था. ये काम भी आसानी से हो गए.

हम भारत में हैं और भारतीयों के बीच हैं यह एहसास हुआ कुछ देर बाद. ब्रिटिश एयरवेज़ की दिल्ली-लन्दन फ्लाइट में जहाज के अन्दर घुसने के इंतज़ार में हम जहां बैठे थे, उस जगह के ठीक सामने एक टेलीफोन बूथ था. नज़ारा यह था कि एक आदमी फोन पर बात करता और दस उससे करीब-करीब सटकर अपनी बारी का इंतज़ार करते. इंतज़ार करते हुए वे खूब जोर-जोर से बातें भी करते जा रहे थे. ज़ाहिर है ये दोनों स्थितियां टेलीफोन करने वाले के लिए कष्टप्रद थीं. थोडी देर बाद एक और नज़ारा सामने आया. जैसे ही यह घोषणा हुई कि बोर्डिंग शुरू हो रही है, लोग दरवाज़ों की तरफ उमड़ पडे. कुछ इस अन्दाज़ में कि अगर पहले नहीं घुसे तो सीट से हाथ धोना पड़ जाएगा, जबकि हरेक की सीट पूर्व निर्धारित होती है. आप पहले जाएं या बाद में, सीट वही रहती है. बार-बार कहा जा रहा था कि पहले अमुक-अमुक श्रेणी के लोग प्रवेश करेंगे, लेकिन इसके बावज़ूद दूसरी श्रेणियों के यात्री भी भीतर जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. बेचारी हवाई कम्पनी की लड़कियों की हालत उन्हें रोकने में खराब हो रही थी. मैं सोच रहा था, भारत में अभी भी हवाई यात्रा समाज के अपेक्षाकृत सम्पन्न और शिक्षित वर्ग तक सीमित है, लेकिन इस वर्ग के व्यवहार से यह कहीं भी नहीं लगता कि किसी तरह के अनुशासन और व्यवस्था के संस्कार इनमें हैं. ऐसा ही थोड़ी देर बाद फिर से महसूस हुआ. हवाई जहाज जब उड़ान भरने लगता है तो यात्रियों से अनुरोध किया जाता है कि वे अपने सेल फोन, लप टॉप वगैरह बन्द कर दें, सीट बेल्ट बांध लें और सीट अगर पीछे की हुई है तो उसे सीधा कर लें. ज़्यादातर यात्रियों ने इन निर्देशों की अनदेखी की और बेचारी एयर होस्टेसों को हर यात्री से अलग-अलग इस बात का अनुरोध करना पड़ा. लंदन से सिएटल की फ्लाइट में जहां, भारतीय यात्री अपेक्षाकृत कम थे, यह देखने को नहीं मिला. यात्रियों ने स्वत: निर्देशों का पालन किया बल्कि, जो थोड़े बहुत भारतीय भी फ्लाइट पर थे, देखा-देखी उनका व्यवहार भी बेहतर था. आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब हम भारत में होते हैं तो हमारा व्यवहार अलग होता है, और जब हम भारत से बाहर होते हैं तो अलग!

क्या भारत में हम भारतीय हमेशा ऐसे ही रहेंगे?








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Monday, February 23, 2009

किस्सा शेक्सपीयर की दूसरी पत्नी का


अत्यधिक ख्याति और लोकप्रियता के धनी विलियम शेक्सपीयर के साथ कई रहस्य अब भी बने हुए हैं. साहित्य की दुनिया में इस बात को लेकर अभी भी बहस जारी है कि जो रचनाएं उनके नाम से जानी जाती हैं क्या वे वाकई उन्हीं ने रची थीं. एक अन्य रहस्य उनके जीवन के एक विशेष कालखण्ड के बारे में है, जिसे ‘मिस्ट्री ईयर्स’ के नाम से जाना जाता है. कोई नहीं जानता कि अपनी किशोरावस्था के इन वर्षों में वे क्या करते रहे. शेक्सपीयर को लेकर जो तीसरा रहस्य है उसका सम्बन्ध उनके विवाह से है. उनका विवाह 28 नवम्बर 1582 को शोटेरी की एनी हाथावे से हुआ था. एनी के स्वर्गीय पिता के दो दोस्तों ने 40 पाउण्ड लेकर शेक्सपीयर को बलात इस विवाह के लिए प्रस्तुत किया. एनी तब गर्भवती थी. इस विवाह का विधिक प्रमाण लैटिन भाषा में उपलब्ध है. रहस्य की बात यह है कि इस विवाह से ठीक एक दिन पहले, एक अलग स्थान पर, स्ट्रेट्फर्ड के निकट के एक गांव में विलियम शेक्सपीयर ने टेम्पल ग्राफ्टन की एनी व्हाटले से विवाह किया. इसका भी प्रमाण उपलब्ध है. वुरसेस्टर संग्रहालय में उपलब्ध 27 नवम्बर, 1582 का एक दस्तावेज इस विवाह की पुष्टि करता है.
वैसे तो इस प्रमाण को कलम की फिसलन कहकर खारिज भी किया जा सकता है, क्योंकि एनी नाम दोनों ही प्रमाणों में समान है. लेकिन, ऐसा न करके, शेक्सपीयर के नाटकों और उनके जीवन से अनेक साक्ष्य जुटाकर, ऐतिहासिक उपन्यासकार कारेन हार्पर ने एक उपन्यास लिखा है मिस्ट्रेस शेक्सपीयर. कारेन एक लोकप्रिय उपन्यासकार हैं और उनके ऐतिहासिक और समकालीन दोनों ही तरह के उपन्यास खूब बिके हैं.

कारेन ने इस उपन्यास में उपलब्ध तथ्यों और कल्पना के सहारे जो रोचक कथा बुनी है उसके अनुसार शेक्सपीयर को सच्चा प्यार तो एनी व्हाटले से ही था. यह एनी और शेक्सपीयर स्ट्रेट्फर्ड में बालपन के साथी थे, लेकिन पारिवारिक वैमनस्य की वजह से एक दूसरे से दूर हो गए थे. युवावस्था में ये फिर एक दूसरे के नज़दीक आए और पारिवारिक असहमतियों के बावज़ूद इन्होंने विवाह करने का निश्चय किया. लेकिन, जब विलियम को एनी हाथावे से विवाह कर लेना पड़ा तो भग्न हृदया एनी व्हाटले ने लंदन जाकर खुद को पारिवारिक व्यवसाय में डुबो लिया. वर्षों बाद जब विलियम शेक्सपीयर भी लंदन आये तब भी दोनों के दिलों में एक दूसरे के प्रति प्यार और आकर्षण बरकरार था. ये दोनों फिर से मिले और तब एनी व्हाटले ने उनको कामयाब बनाने के लिए अथक प्रयास किए.

उपन्यासकार ने श्यामा सुन्दरी एनी व्हाटले को बहादुर और चतुर युवती के रूप में चित्रित किया है. यह इतालवी मां की संतान थी. अपनी चतुरता और साहस के बल पर यह विलियम शेक्सपीयर को अनेक राजनीतिक संकटों से आगाह करती है और महाकवि के अनेक सॉनेट्स तथा उनके प्रसिद्ध नाटक लव्ज़ लेबर लॉस्ट की प्रेरणा बनती है. इस नाटक को पूरा करने में तो उसका योगदान है ही, इसकी बिक्री में भी वह मदद करती है और शेक्सपीयर के लिए संरक्षक भी जुटाती है. इतना ही नहीं, ग्लोब थिएटर में हुए एक अग्निकाण्ड से उनकी प्राण रक्षा भी करती है. अनेक वास्तविक चरित्र जैसे क्रिस्टोफर मारलो, डॉ डी, सर वाल्टर रैले और एलिज़ाबेथ प्रथम इस उपन्यास के पन्नों की ऐतिहासिकता को प्रगाढ करते हैं तो महाकवि के नाटकों और कविताओं के अंश इसकी साहित्यिकता में वृद्धि करते हैं. उपन्यास का एक और आयाम है एलिज़ाबेथ कालीन लंदन के पचास साला राजनीतिक जीवन और तत्कालीन दुरभिसंधियों का कलाकारों और उनके संरक्षकों के नज़रिये से जीवंत चित्रण.

उपन्यास के केन्द्र में महाकवि शेक्सपीयर नहीं, उनकी प्रेमिका एनी व्हाटले है, जो अपनी कहानी खुद बयां करती है. स्वाभाविक ही है कि इस कारण उपन्यास में शेक्सपीयर का चरित्र पूरी तरह नहीं उभरा है, लेकिन शायद कारेन ने चाहा भी यही था. इस जीवनीपरक उपन्यास में यद्यपि कोई बड़ा रहस्य तत्व नहीं है, प्रेम में आकण्ठ डूबे शेक्सपीयर की कथा अपनी वैविध्यपूर्ण बुनावट और प्रामाणिकता का आभास देने वाले ब्यौरों के कारण पाठक को बांधे रखने में पूरी तरह कामयाब है.
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Discussed book:
Mistress Shakespeare
By Karen Harper
Published by Penguin/Putnam
384 pages
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ठ में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 22 फरवरी, 2009 को प्रकाशित.










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Sunday, February 8, 2009

कैसी होगी इक्कीसवीं सदी?


भविष्यवाणियां, चाहे वे ज्योतिषियों ने की हों, विज्ञान गल्प लेखकों ने या भू-राजनीतिज्ञों ने, सदा ही मानव को आकर्षित करती रही हैं. बावज़ूद इस बात के कि उनकी सत्यता और विश्वसनीयता प्राय: सन्दिग्ध रही है. फिर भी दुनिया की अग्रणी निजी गुप्तचरी और भविष्यवाणी करने वाली कम्पनी स्ट्रेटफॉर के सी ई ओ, मीडिया विशेषज्ञ और अब तक चार पुस्तकों के लेखक जॉर्ज फ्रीडमेन ने एक बार फिर गलत साबित होने का खतरा उठाया है. अपनी नई किताब द नेक्स्ट हण्ड्रेड ईयर्स: अ फोरकास्ट फोर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी के प्रारम्भ में ही फ्रीडमेन ने लिख दिया है कि वे जानते हैं कि उनकी अनेक भविष्यवाणियां ग़लत साबित होंगी, फिर भी उन्होंने इस किताब के माध्यम से भविष्य का एक एहसास सम्प्रेषित करने की कोशिश की है.

उन्होंने यह भी कहा है कि “हालांकि मेरे पास कोई क्रिस्टल बॉल (भविष्य देखने-दिखाने वाली गेंद) नहीं है, लेकिन मेरे पास एक ऐसी प्रविधि ज़रूर है, जो चाहे थोड़ी कम मुकम्मिल हो, मेरे तो ठीक ही काम आई है. उसी के ज़रिये मैं विगत को समझ सका हूं और आगत का अनुमान लगा सका हूं.” अपनी बात को कुछ और खोलते हुए वे कहते हैं कि मेरा तो काम ही यह है कि इतिहास की उथल-पुथल के पीछे छिपी व्यवस्था को देखूं-समझूं और यह अनुमान लगाऊं कि अब क्या घटनाएं, प्रवृत्तियां और तकनीक सामने आएंगी.”

क्या है फ्रीडमेन की खास-खास भविष्यवाणियां?

वे कहते हैं कि चीन एक बड़े और लम्बे आंतरिक संघर्ष के दौर से गुज़रेगा और मेक्सिको एक बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरेगा. फ्रीडमेन अनेक विशेषज्ञों के इस कथन से असहमत हैं कि अमरीका के सामने चीन बड़ी चुनौती है, न कि रूस. अनेक तर्कों द्वारा वे चीन की कमज़ोरियां उभारते हैं और अमरीका को आश्वस्त करते हैं कि चीन से डरने की ज़रूरत नहीं है. एक और भविष्यकथन वे यह करते हैं कि शताब्दी के मध्य में अमरीका और पूर्वी यूरॉप, यूरेशिया और दूर पूर्व के एक अप्रत्याशित साझा संगठन के बीच एक विश्व युद्ध होगा. राहत की बात यह कि इस युद्ध में सेना का आकार अपेक्षाकृत छोटा होगा और यह विनाशक भी कम होगा.

अमरीका और जिहादियों के बीच का संघर्ष खत्म हो जाएगा, लेकिन उसके स्थान पर अमरीका रूस से उलझ जाएगा. फ्रीडमेन अमरीका का भविष्य कुछ ज़्यदा ही उज्ज्वल देखते हैं. वे तो यहां तक कह जाते हैं कि आने वाली शताब्दी अमरीका की शताब्दी होगी. इस बात को और साफ करते हुए वे यह बताते हैं भले ही ऐसा प्रतीत होता हो कि अमरीका विनाश की ओर बढ रहा है, असल में तो वह अभी भी बेहद शक्तिशाली है, वह इस्लामी आतंकवादी खतरों से भली-भांति पार पा लेगा, 2010 और 2020 वाले दशकों में उभरने वाले सोवियत रूस को भी पीछे छोड़ देगा और अन्तत: अंतरिक्ष आधारित मिसाइल सिस्टम को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लेगा. शताब्दी के मध्य का समय अमरीका के लिए स्वर्णिम काल होगा. इस बात को लेखक ने बहुत विस्तार से समझाया है. और जब हम उनके तर्कों को पढते हैं तो उनसे असहमत होना कठिन लगता है.

एक और बड़ी भविष्यवाणी फ्रीडमेन यह करते हैं कि आने वाले समय की तकनीक, सैन्य उपयोग के लिए और नए ऊर्जा संसाधन के लिए, अंतरिक्ष पर केन्द्रित होगी तथा इसके पर्यावरणीय प्रभाव दूरगामी और क्रांतिकारी होंगे.

पूरी किताब से गुज़र कर फ्रीडमेन की यह बात तो सही लगती है कि भविष्यकथन को जितनी छिछोरी हरकत माना जाता है, उतनी वह है नहीं. उसमें भी बुद्धि और तर्कसंगतता कम नहीं है. अगर हम घटना विशेष के आलोक में भविष्यवाणियों को परखने की बजाय यह देखें कि वे किन प्रवृत्तियों की तरफ संकेत करती हैं तो हम उनसे लाभान्वित भी हो सकते हैं. शायद यही इस किताब का मक़सद भी है.

Discussed book:
The Next 100 Years: A Forecast for the 21stCentury
By George Friedman
Published by: Doubleday
272 pages, Hardcover
US $ 25.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत 08 फरवरी 2009 को प्रकाशित.









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Wednesday, January 28, 2009

उदयपुर में आयोजित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक गोष्ठी की रपट


उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक डॉ. माधव हाड़ा ने भगवानदास मोरवाल के चर्चित उपन्यास रेत के संबंध में कहा कि समाजशास्त्रीयता इस उपन्यास का साहित्येतर मूल्य है। उन्होंने कहा कि अस्मितावादी आग्रहों से परे होने पर भी रेत की संवेदना हाशिये के समाज से इस तरह संपृक्त है कि उसे अनदेखा करना अनुचित होगा। डॉ. हाड़ा ने किस्सा गोई को उपन्यास के शैल्पिक विन्यास की बड़ी सफलता बताया।
साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका बनास द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के डॉ. आशुतोष मोहन ने मोरवाल के तीनों उपन्यासों की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी उपन्यास अपनी पारम्परिक रूढ़ियों को तोड़कर नया रूप और अर्थवत्ता ग्रहण कर रहा है। डॉ. मोहन ने रेत की तुलना दूसरे अस्मितावादी उपन्यासों से किए जाने को गैर जरूरी बताते हुए इसकी नायिका रुक्मिणी को एक यादगार चरित्र बताया।
संगोष्ठी में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के सह-आचार्य डॉ. मलय पानेरी ने रेत पर पत्र वाचन किया। डॉ. पानेरी ने मोरवाल की लेखन शैली को प्रेमचन्द की कथा धारा का सबाल्टर्न विस्तार बताते हुए कहा कि यह उपन्यास अपने प्रवाह और सन्देश में विशिष्ट है। बनास के सम्पादक डॉ. पल्लव ने कहा कि चटखारा लेने की प्रवृत्ति उपन्यास को कमजोर बनाती है, मोरवाल की प्रशंसा इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि वे ऐसे आकर्षण में नहीं पड़ते।
इससे पूर्व संयोजन कर रहे शोध छात्र गजेन्द्र मीणा ने उपन्यास के कुछ महत्त्वपूर्ण अंशों का वाचन किया। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि रेत हमारे बीच रहने वाले एक कलंकित समुदाय को मानवीय दृष्टि से समझने की संवेदना हमें देता है। उन्होंने रेत की पठनीयता का कारण उसकी कथावस्तु की नवीनता को बताते हुए कहा कि यह हाशिये के बाहर के एक समाज की जन्मना अभिशापित औरत की जीवनचर्या को सामने लाती है। प्रो. नवल किशोर ने उपन्यास और स्त्री विमर्श के दैहिक पक्ष पर भी विस्तृत टिप्पणी की। चर्चा में जन संस्कृति मंच के संयोजक हिमांशु पण्ड्या, आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास, शोध छात्र नन्दलाल जोशी सहित अन्य पाठकों ने भी भागीदारी की। अन्त में गणेश लाल मीणा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

गणेशलाल मीणा
152, टैगोर नगर,
हिरण मगरी से.4,
उदयपुर - 313 002








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Monday, January 26, 2009

साहित्य का अविस्मरणीय मेला


पांच दिवसीय (21 से 25 जनवरी 2009) डी एस सी जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न हो गया. अपने आयोजन के इस चौथे वर्ष में आ पहुंचे इस फेस्टिवल ने अब साहित्यकारों और साहित्य रसिकों के मन में सम्मान पूर्ण स्थान बना लिया है. राजस्थान की राजधानी -गुलाबी नगरी जयपुर- के बीचो बीच स्थित डिग़ी पैलेस में आयोजित इस फेस्टिवल में दुनिया भर के लगभग 200 लेखकों-प्रकाशकों, अनगिनत कलाकारों और बहुत बड़ी संख्या में साहित्यानुरागियों ने शिरकत की.

पहले ज़रा इस आयोजन में शामिल हुए लेखकों की सूची पर एक नज़र डालें. शशि थरूर, विक्रम सेठ, चेतन भगत, विलियम डालरिम्पल, उर्वशी बुटालिया, तरुण तेजपाल, पवन के. वर्मा, पंकज मिश्रा, विकास स्वरूप, लीला सेठ, नंदन नीलेकनी, तहमीना अनम, मोहम्मद हनीफ, आशीष नंदी, जिलियन राइट, गुरुचरन दास, दानियल मुइनुद्दीन, के सच्चिदानन्दन, यू आर अनंतमूर्ति, गुलज़ार, हरि कुंजुरु, पॉल ज़करिया, पिको अय्यर, निकिता लालवाने, निरुपमा दत्त, तुलसी बद्रीनाथ, अंतरा देव सेन, नबनीता देव सेन, अपूर्व नारायण, आलोक राय, अशोक वाजपेयी, अलका सरावगी, उदयन वाजपेयी, अशोक चक्रधर, नूर ज़हीर, शक्ति दान कविया, माली राम शर्मा, हरि राम मीणा, सत्यनारायण, गोविन्द माथुर आदि. कहना अनावश्यक है कि यह पूरी सूची नहीं है, लेकिन इस सूची से यह साफ ज़ाहिर है कि देश-विदेश के, हिन्दी और हिन्दीतर भाषाओं के अनेक शीर्षस्थ लेखक इस फेस्टिवल में शामिल हुए. गीतकार प्रसून जोशी, फिल्म निर्देशक मुज़फ्फर अली, विधु विनोद चोपड़ा, कलाकार अमिताभ बच्चन, नंदिता दास, दीप्ति नवल, अनुपम खेर, गंभीर फिल्म विश्लेषक नसरीन मुन्नी कबीर ने भी अलग-अलग सत्रों में शिरकत की और आयोजन स्थल पर मुक्त रूप से लोगों से मिलते-जुलते रहे. यह भी कहना ज़रूरी है कि अनुपम खेर, जो शहर में किसी शूटिंग के सिलसिले में थे, बिना निमंत्रण के ही फेस्टिवल में चले आए.

अब, जिस आयोजन में इतने सारे लेखक आए हों, उसकी भव्यता के बारे में तो कुछ भी कहना गैर ज़रूरी है. इस आयोजन ने न केवल लेखकों को आपस में मिलने-जुलने का और विभिन्न विषयों पर औपचारिक-अनौपचारिक विमर्श करने का अवसर उपलब्ध कराया, साहित्यानुरागियों को भी अपने प्रिय लेखकों से रू-ब-रू होने का अविस्मरणीय अनुभव प्रदान किया.
पांच दिनों तक सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक डिग्गी पैलेस में ही तीन स्थलों पर (और कभी-कभी चार जगहों पर भी) एक-एक घण्टे के सत्र एक के बाद एक चलते रहे. जिसका जहां मन हो जाए. किसी भी सत्र में जाने का मन न हो तो लॉन में, मैदान में कहीं भी बैठ कर गपशप करे. खास बात यह कि तमाम बड़े और स्टार लेखक भी यही करते रहे. इसलिए यह बात बहुत आम रही कि जिस टेबल पर आप बैठें हैं उसके पास वाली टेबल पर चेतन भगत या विक्रम सेठ या तरुण तेजपाल या अशोक वाजपेयी बैठे हैं. कोई औपचारिकता नहीं, कोई रोक-पाबन्दी नहीं. आप का मन हो जिससे बात करें, उसके ऑटोग्राफ लें या उसके साथ फोटो खिंचवाएं. स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थी दिन भर लेखकों को घेरे रहते और मुझ जैसे बूढे भी कभी यू आर अनंतमूर्ति तो कभी अशोक वाजपेयी तो कभी गुलज़ार के साथ फोटो खिंचवाते नज़र आते. कार्यक्रम शाम छह बजे बाद भी जारी रहते. एक दिन बाउल गायक थे तो एक दिन फ्यूज़न संगीत. एक शाम प्रसून जोशी और दीप्ति नवल ने अपनी कविताएं भी सुनाईं.

पूरे कार्यक्रम में कहीं भी खास और आम के बीच भेद नहीं था. जहां कुर्सी नज़र आए, बैठ जाएं. कुर्सी न हो तो ज़मीन पर बैठ जाएं, हॉल में न घुस पाएं तो बाहर बड़े-बडे एल सी डी स्क्रीन पर भीतर की कार्यवाही देख लें. एक सत्र में तरुण तेजपाल देर से आए और बिना किसी संकोच के ज़मीन पर बैठ गए. उसी सत्र में तरुण विजय कहीं पीछे ज़मीन पर बैठे थे. न इन लेखकों ने इसे अपना अपमान समझा और न आयोजक इस बात को लेकर अतिरिक्त सजग नज़र आए. यही हाल खाने पीने के दौरान भी रहा. सारे लेखक, चाहे वो विक्रम सेठ हों, गुलज़ार हों, प्रसून जोशी हों, चेतन भगत हो, विलियम डालरिम्पल हों, अशोक वाजपेयी हों, दूसरे तमाम ज्ञात-अज्ञात लोगों के साथ समान भाव से खाते-पीते रहे. आयोजकों की तारीफ इस बात के लिए भी करना ज़रूरी है कि उन्होंने लेखकों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया. राजस्थान के किसी छोटे-से कस्बे से आने वाले लेखक को भी उसी होटल (पंच सितारा) में ठहराया जहां विक्रम सेठ, चेतन भगत, गुलज़ार, या प्रसून जोशी को ठहराया.

आयोजन के सत्रों में औपचारिकता न्यूनतम थी. माल्यार्पण वगैरह कुछ नहीं. एक दो वाक्यों में पैनल का परिचय और विमर्श शुरू. सत्र एकदम ठीक समय पर शुरू और ठीक वक़्त पर खतम. अगर ऐसी समय की पाबन्दी हमारी ज़िन्दगी में आ जाए, या कम से कम हमारे आयोजनों में ही आ जाए, तो कितना अच्छा हो. पैनल के विचार विमर्श के बाद श्रोताओं को खुली आज़ादी होती कि वे सवाल पूछें.

कुछ लोगों को लगा कि यह आयोजन अंग्रेज़ी की तरफ अधिक झुका हुआ था. हम लोगों का सम्बन्ध भारतीय भाषाओं से है इसलिए स्वाभाविक है कि हम ऐसे आयोजनों में उनकी अधिक सहभागिता की अपेक्षा करते हैं. अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति की वजह से इस फेस्टिवल में अंग्रेज़ी सहित अंक भारतीय-अभारतीय भाषाओं की मौज़ूदगी थी, इसलिए मुझे तो स्वाभाविक ही लगा कि हिन्दी, बांगला, उर्दू,राजस्थानी वगैरह के हिस्से में एक दो तीन सत्र ही आ पाए. लेकिन अगर भारतीय भाषाओं की सहभागिता और बढाई जाए तो अच्छा ही रहेगा.

आयोजन को सफल बनाने में नमिता गोखले और टीम वर्क के संजॉय रॉय जिस तरह जुटे रहे, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है. कुल मिलाकर, यह फेस्टिवल मुझ जैसे साहित्य प्रेमी के लिए तो किसी बहुत बड़ी दावत की मानिन्द था. एक ऐसी दावत, जिसका ज़ायका बहुत लम्बे समय तक मुंह में बना रहेगा.

आयोजन के कुछ फोटो यहां देखें:
http://picasaweb.google.com/dpagrawal24/JaipurLiteratureFestival?authkey=BbkqVwzdw8c#










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Sunday, January 25, 2009

युवा लेखक का पहला उपन्यास

दिल्ली में जन्मे 24 वर्षीय करण महाजन स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि अर्जित करने के बाद अब उस ब्रुकलिन शहर में रहते हैं, जहां, उन्हीं के शब्दों में, हर कोई या तो लेखक है, या शिशु या दोनों ही. हाल ही में फेमिली प्लानिंग शीर्षक से उनका पहला उपन्यास आया है, जिसकी खूब चर्चा और सराहना से उत्साहित हो अब वे अपनी दूसरी किताब पर काम कर रहे हैं. अपने इस पहले उपन्यास के लिए करण ने एक करोड़ की आबादी वाले दिल्ली शहर को केन्द्र बनाया है. इसके बहुत सारे हाई वे और ओवर पास कथानायक राकेश आहूजा ने बनवाये हैं. राकेश, जो इंजीनियर हैं और शहरी विकास मंत्री भी. जितने उत्पादक वे अपने विभाग में हैं, उससे कम अपने घर में नहीं हैं. उनके तेरह बच्चे हैं और चौदहवां आने वाला है. राकेश की पहली पत्नी का निधन अमरीका में एक वाहन दुर्घटना में हो गया था और दूसरी पत्नी संगीता, हालांकि उनकी मन वांछिता नहीं है, फिर भी उनके तेरह बच्चों की मां है. सबसे बड़ा बेटा सोलह वर्षीय अर्जुन मंत्री जी की पहली पत्नी की संतान है.

उपन्यास की शुरुआत एक रोचक दृश्य से होती है. अर्जुन अपने पिता को गर्भवती मां के साथ प्रणय रत देख लेता है. हालांकि वह उन्हें महज़ 1.67 सेकण्ड के लिए देखता है, लेकिन अब तक प्रणय के बारे में उसने जो भी जाना है, खास तौर पर अमरीका के माध्यम से, वह सब झन्न से टूट-बिखर जाता है. अर्जुन अपने पिता से सीधे पूछता है, “आप और मां लगातार बच्चे क्यों पैदा किए जा रहे हो?” इस सवाल से हतप्रभ पिता राकेश कुछ सोच कर जवाब देते हैं, “बेटा, मैंने तुम्हें योगराज कमीशन की रिपोर्ट के बारे में बताया तो था. फिर? तुम तो जानते ही हो कि मैं धर्मान्ध नहीं हूं लेकिन आयोग ने जो कुछ कहा वह सौ फीसदी स्पष्ट है. हमें देश में ज़्यादा हिन्दुओं की ज़रूरत है.” बेटा तिलमिलाकर सवाल करता है, “तो मैं, बल्कि हम सब, आपके लिए सिर्फ राजनीतिक मोहरे हैं?” बाप सफाई देते हुए कहता है, “ नहीं, बेटा. लेकिन तुम तो जानते ही हो कि ये लोग.... इनके तो एक से ज़्यादा बीबियां होती हैं और इनके परिवार बढते रहते हैं, जबकि.....” अर्जुन तल्खी से पूछता है, “क्या आपको मेरा नाम भी याद है?”

लेकिन यह इस उपन्यास का एक पक्ष है. लेखक बहुत कौशल से अर्जुन के इस सवाल के बहाने राकेश को उसके अतीत में ले जाता है. वह याद करता है कि कैसे उसे चालाकी से वर्तमान पत्नी के साध बांध दिया गया था. इस स्मृति और बेटे के सवाल से व्यथित हो वह अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे देता है. वैसे इस्तीफा उसके लिए कोई नई बात नहीं है, वह पहले भी 62 बार इस्तीफा दे चुका है. जितनी दुश्वारियां उसकी ज़िन्दगी में है, उनसे कम इस उपन्यास के अन्य पात्रों की ज़िन्दगी में नहीं हैं. राकेश की गर्भवती पत्नी संगीता बहुत दुखी है. वजह यह कि उसके प्रिय सीरियल का नायक मर गया है. न केवल संगीता, बल्कि देश भर की औरतें शोक में डूबी हैं और उन्होंने एक राष्ट्र व्यापी हड़ताल की धमकी तक दे रखी है. उधर अर्जुन अपनी स्कूल बस की खूबसूरत सहयात्री आरती को अपने रॉक बैण्ड की कथाएं सुना कर लुभाना चाहता है, लेकिन दिक्कत यह कि उसका कोई रॉक बैण्ड है ही नहीं.

राकेश की घरेलू और राजनीतिक ज़िन्दगी के हास्यास्पद प्रसंग इन सारे किरदारों की ज़िन्दगी की दुश्वारियों की विडम्बना को और गहरा जाते हैं. राकेश आहूजा की सरकार की करतूतें, उसकी पत्नी की टूटी-फूटी अंग्रेज़ी, और बेटे की संगीत विषयक हरकतें उपन्यास में हास्य के गहरे रंग भरती हैं. कथा बहु आयामी है. उपन्यास के ट्रेज़ेडी-कॉमेडी के सुविचारित मेल को इसकी सधी हुई भाषा और ज़्यादा प्रभावोत्पादक बनाती है. एक उदाहरण देखें. लेखक दिल्ली के भीषण ट्रैफिक का वर्णन करते हुए कहता है, “वे लोग कारों के अंतहीन काफिले में शरीक थे, वह काफिला जो फेफड़ों के कैंसर की धीमी तीर्थ यात्रा पर था.” इसी तरह वह युवा अर्जुन की सांगीतिक ‘प्रतिभा’ को इस तरह व्यक्त करता है: “उसकी आवाज़ ठीक वैसी ही थी जैसी कि किसी बड़े बांध से पानी के पहले रिसाव की होती है. वह भयावह थी क्योंकि यह तो शुरुआत थी और उसका भीषण रूप अभी शेष था.”

उपन्यास पढते हुए यह कहीं भी नहीं लगता कि यह एक 24 वर्षीय रचनाकार की कृति है, और वह भी प्रथम कृति. अपने व्यंग्यात्मक लहज़े और जीवन के मार्मिक क्षणों की अचूक पकड़ के कारण इसे भुला पाना कठिन है. यही है इसकी सफलता का राज़.
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Discussed book:
Family Planning (A Novel)
By Karan Mahajan
Published by Harper Collins Publishers
288 pages
US $ 13.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 25 ज़नवरी 2009 को प्रकाशित.









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Sunday, January 11, 2009

निजी भी राजनीतिक भी

तेहरान के एक पूर्व मेयर और शाह के शासन काल में ईरानी संसद की पहली महिला सांसद निज़हत नफीसी की बेटी अज़र नफीसी की संस्मरणात्मक किताब थिंग्ज़ आई हैव बीन साइलेण्ट अबाउट प्रकाशित होते ही चर्चा में आ गई है. इन्हीं अज़र नफीसी की 2003 में आई पिछली किताब रीडिंग लोलिता इन तेहरान की पन्द्रह लाख प्रतियां बिकी थीं और उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समकालीन क्लासिक माना गया था. अपनी इस नई किताब में अज़र ने बदलते हुए ईरान में तनाशाह मां के साथ बड़े होने का मर्मस्पर्शी वर्णन किया है.

किताब का स्वर साहित्य की विमुक्तकारी भूमिका की प्रशस्ति का है. प्रारम्भिक पन्नों से यह आस जगने लगती है कि लेखिका अपने जीवन के बारे में कुछ सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करेगी, लेकिन जैसे-जैसे आगे पढते हैं, हम पाते हैं कि उनकी रुचि सनसनी पैदा करने में नहीं बल्कि अपनी डिफिकल्ट मां के साथ अपने विक्षोभपूर्ण रिश्तों के बयान और उनके विश्लेषण में है. ईरान की सब कुछ को गोपन रखने की संस्कृति का अतिक्रमण करते हुए वे यह कहते हुए सब कुछ खोलती हैं कि “मां के बारे में अब सब कुछ लिखकर और अपनी चुप्पी तोड़कर मैं प्रतिरोध का एक और प्रयास कर रही हूं.” लेखिका यह कहना भी नहीं भूलतीं कि “जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, अब उनके बारे में चुप नहीं रहा जा सकता”.

तानाशाह मां के प्रति अपनी नाखुशी का इज़हार करते हुए अज़र नफीसी निजी इतिहास को राजनीतिक इतिहास के साथ गूंथती चलती है, और यही बात इस किताब को महत्वपूर्ण बनाती है. असल में मां के प्रति उनका क्रुद्ध और उग्र प्रतिरोध उस इस्लामी सर्व सत्तात्मक निज़ाम के प्रति भी प्रतिरोध है जो 1979 में ईरान में स्थापित हुआ था. वे लिखती हैं, “यह समझने से बहुत पहले ही कि एक निर्मम राजनीतिक सत्ता किस तरह अपने नागरिकों पर सवार होती है और उनकी पहचान और निजता छीनती है, मैंने अपने परिवार के भीतर अपने निजी जीवन में यह महसूस कर लिया था.” वे कहती हैं, “इस्लामी क्रांति के बाद मैं तो मज़ाक में यह कहा करती थी कि हमने तो अपनी मां के साथ रहते हुए खुद को पहले ही ऐसे समय के लिए तैयार कर लिया था.”

अज़र नफीसी को बहुत पहले ही यह भनक पड़ गई थी कि एक दम्पती के रूप में उनके मां-बाप सुखी नहीं हैं. मां और बाप दोनों ही अपने जीवन के बारे में गढी हुई बातें बच्चों को बताते रहे. अज़र नफीसी की मां बुद्धिमती किंतु जटिल व्यक्तित्व वाली थी. महत्व भरी और रोमाण्टिक ज़िन्दगी के उनके अपने सपने पूरे नहीं हो पाये तो उन्होंने अपने, अपने परिवार और अपने विगत के बारे में अनेक खुशनुमा वृत्तांत गढ लिए. अज़र इन वृत्तांतों की हक़ीक़त जानती थी. उधर पिता ने एक दूसरी तरह की किस्सगोई में पलायन कर राहत पाने की चेष्टा की. वे अपने बच्चों को शाहनामा जैसे क्लासिक की कथाएं सुन-सुना कर सुकून पाने लगे. पिता का साहित्यिक रुझान बेटी को विरासत में मिला. अज़र की पूरी सहानुभूति अपने पिता के साथ और खुली नाराज़गी अपनी मां के प्रति किताब के हर शब्द से टपकती है.

साठ के दशक में जब उनके पिता को राजनीतिक कारणों से पांच साल जेल में रहना पड़ा तब किशोरी अज़र को मां के दबाव में अनचाही शादी के लिए तैयार होना पड़ा. ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी में पढते हुए उन्होंने इस पति को तलाक दिया और ईरानी छात्र आंदोलन में कूद पड़ीं. वे कहती हैं, “सत्तर के दशक में विदेश में रह रहे किसी भी ईरानी के लिए सरकार विरोधी होना लाजमी था, लेकिन देश के भीतर स्थितियां भिन्न थीं.” 1979 में, क्रांति के बाद वे अपने नए पति के साथ ईरान लौटीं, लेकिन देश का नया शासन भी बेहतर नहीं था. अज़र और उनके दोस्तों को परेशान किया गया और जेल भी भेजा गया. जब वे तेहरान विश्वविद्यालय में पढ़ा रहीं थी तब उन्हें बुर्क़ा न पहनने के ज़ुर्म में नौकरी से हटाया गया. यह अलग बात है कि इसके बावज़ूद उन्होंने निजी अध्ययन समूह बनाकर वैकल्पिक तरीकों से अध्यापन ज़ारी रखा. अंतत: 1997 में उन्होंने देश छोड़ दिया.

अज़र के लिए लेखन प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम है. प्रतिरोध, चाहे दमनकारी शासन के प्रति हो या दमनकारी मां के प्रति.


Discussed book:
Things I’ve Been Silent About
By Azer Nafisi
Published by Random House Publishing Group
368 pages, Hardcover
US $ 27.00

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 11 जनवरी, 2009 को प्रकाशित.








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Sunday, December 28, 2008

दासता का एहसान

1993 की नोबल पुरस्कार विजेता टॉनी मॉरिसन अपने लेखन में बार-बार यह कहती रही हैं कि अमरीकी साहित्य और इतिहास उसकी अश्वेत जनसंख्या के निषेध पर निर्मित है और अमरीकी राष्ट्र की नींव श्वेत-अश्वेत के बीच की ‘हम’ और ‘वे’ की खाई पर टिकी है. ऐसे में यह बात अतिरिक्त महत्व अर्जित कर लेती है कि उन का नया उपन्यास अ मर्सी ( A Mercy) ठीक उसी सप्ताह में प्रकाशित हुआ है जिस सप्ताह में अमरीका ने अपने राष्ट्रपति के रूप में एक ऐसे शख्स को चुना जो इस खाई को नकारता नज़र आता है.

टॉनी मॉरिसन का यह उपन्यास अ मर्सी उनके बहु-प्रशंसित और पुलिट्ज़र विजेता उपन्यास बिलवेड (Beloved) से पहले की कथा कहता है. बिलवेड को हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स ने पिछले 25 वर्षों का महानतम उपन्यास घोषित किया है. अ मर्सी की कथा 1682 में शुरू होती है. एक भला व्यापारी जेकब वार्क है. उसके पास एक फार्म है जिससे उसे कोई खास मुनाफा नहीं हो रहा है. वह एक तम्बाकू खेत मालिक डी’ओर्टेगा से अपना कर्ज़ा वसूलने मेरीलैण्ड जाता है. ओर्टेगा कर्ज़ा चुकाने में असमर्थ है इसलिए वह अपने दो दर्ज़न गुलाम जेकब वार्क के सामने कर देता है. वार्क को यह अच्छा तो नहीं लगता लेकिन फिर भी दयावश वह एक छोटी लड़की फ्लोरेंस को चुन लेता है. उसकी यह दया ही उपन्यास का शीर्षक है. फ्लोरेंस पर दया उसकी मां ने भी की है, कि उसे ओर्टेगा के खेतों की क्रूरता से निकालकर वार्क के खेतों की अपेक्षाकृत आसान ज़िन्दगी प्रदान की है. मेरीलैण्ड गया हुआ जेकब यह सोचता है कि ओर्टेगा के पास इतना बड़ा घर और इतने उम्दा कपड़े क्यों है और क्यों वह अभावों में जी रहा है. इसी सवाल से उसे नई भावी अर्थव्यवस्था का सूत्र मिलता है. नई गुलाम श्रम व्यवस्था का. वह भी बारबाडोस के खेतों में निवेश करता है. उसका यह कृत्य प्रतीकात्मक रूप से इतिहास का वह क्षण है जब अमरीका सुदूर प्रांतों में गुलाम श्रमिकों के माध्यम से पूंजीवाद के डैने पसारने लगता है. (आज के आउटसोर्सिंग में भी इसकी अनुगूंज सुनी जा सकती है!). अपने प्रयत्न में उसे सफलता मिलती है. जब वह मरणासन्न है तो उसकी पत्नी रेबेका तीन लड़कियों की मदद से उसका करोबार संभालने के प्रयास में है. असली कथा तो इन तीन लड़कियों और रेबेका की ही है. मॉरिसन ने जैसे इन चार स्त्रियों में ही देश की उम्मीद के दीदार किए हैं.

ये चारों स्त्रियां अलग-अलग तरह से गुलाम हैं. इंग़लैण्ड से आई रेबेका को नौकर, वेश्या और पत्नी में से एक विकल्प चुनना था और उसे अंतिम विकल्प सबसे सुरक्षित लगा. लीना का पूरा परिवार उसके बाल्यकाल में ही प्लेग का शिकार हो गया था और रखैल बनकर उसने अपने जीवन को जैसे-तैसे स्थिर किया है. एक जहाज पर पली बढ़ी, कम अक्ल वाली सोरो, और फ्लोरेंस, जिसने एक गुलामी का त्याग करके दूसरी गुलामी का वरण किया. उपन्यास की धुरी है रेबेका. शेष चारों स्त्रियों के किरदार उसी की धुरी पर घूमते हैं. उसके बिना इन चारों लड़कियों का कोई ठिकाना नहीं होता और अगर ये लड़कियां न होतीं तो रेबेका कभी की मर गई होती. इस तरह स्वामी-दास के रिश्तों और स्त्रियों की अंतर्निर्भरता के इस विरोधाभास के माध्यम से टॉनी ने जैसे अमरीकी इतिहास को ही साकार कर दिया है. कथा का एक और आयाम है फ्लोरेंस का एक अफ्रीकी लुहार के प्रति अनुराग. इस लुहार को वार्क ने अपना नया घर बनाने के लिए नौकर रखा है. इस लुहार के लिए टॉनी लिखती हैं, “वह शादी कर सकता था, अपनी चीज़ें रख सकता था, यात्रा कर सकता था और अपना श्रम बेच सकता था.” यानि वह पूरी तरह से आज़ाद था. यह बात रेखांकनीय है कि टॉनी ने एक पूरी तरह मुक्त व्यक्ति के रूप में एक अफ्रीकी का सृजन कर दास-स्वामी की रूढ छवि को तोड़ा है. यह भी गौर तलब है कि यह अफ्रीकी लुहार चीज़ों को ढालता, बनाता और संवारता है. जैसे वह मानवता का लुहार है.

टॉनी कथा कहने के लिए रूढ शिल्प का प्रयोग नहीं करतीं. यहां उन्होंने हर किरदार को एक अध्याय दिया है और वे बहुत कम एक दूसरे के सामने आए हैं. उपन्यास एक तरह से मौखिक इतिहास की शक्ल में उभरता है. अपने काव्यात्मक और अनेकार्थी गद्य तथा बेहद प्रभावशाली ब्यौरों के कारण भी यह उपन्यास हमें अभिभूत करता है.

Discussed book:
A Mercy
By Toni Morrison
Published by Knopf
Hardcover, 176 pages
US $ 23.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे साप्ताहिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 28 दिसम्बर, 2008 को प्रकाशित.









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Sunday, December 14, 2008

कामयाबी के पीछे क्या है?

ब्लिंक और द टिपिंग पॉइंट जैसी बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक माल्कम ग्लैडवेल की हाल ही में प्रकाशित किताब आउटलायर्स: द स्टोरी ऑफ सक्सेस इस बात की पड़ताल करती है कि क्यों कुछ लोग अपनी ज़िन्दगी में बेहद कामयाब रहते हैं और क्यों अन्य अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते. सेल्फ मेड मेन की प्रचलित अवधारणा को सिरे से खारिज़ करते हुए ग्लैडवेल बलपूर्वक कहते हैं कि सुपरस्टार अपनी प्रतिभा और मेधा के दम पर अचानक अवतरित नहीं हो जाते, बल्कि वे अनिवार्यत: अनेक छिपी हुई सुविधाओं और असामान्य अवसरों का लाभ लेकर और अपनी सांस्कृतिक विरासत के बलबूते पर कठिन परिश्रम कर वह सब अर्जित कर पाते हैं जो दूसरों को मयस्सर नहीं होता. अपनी स्थापना की पुष्टि के लिए ग्लैडवेल मोज़ार्ट से लगाकर बिल गेट्स तक की ज़िन्दगी का विश्लेषण करते हैं और कहते हैं कि जो सफलता ऐसे लोगों को मिली, कुछ तो उसके हक़दार थे, कुछ ने उसे अर्जित किया और कुछ को वह केवल भाग्यवश ही मिल गई.

दर असल आउटलायर एक वैज्ञानिक पारिभाषिक शब्द है, जिसका अभिप्राय है ऐसी चीज़ या परिघटना जो सामान्य अनुभव के बाहर हो. जैसे, ग्लैडवेल कहते हैं कि गर्मियों में पेरिस में सामान्यत: मौसम गर्म या बेहद गर्म रहता है. लेकिन अगर अगस्त के मध्य में किसी दिन तापमान शून्य से नीचे चला जाए तो उसे आउटलायर कहा जाएगा. ग्लैडवेल इस किताब के ज़रिये हमें यह समझाना चाहते हैं कि जो लोग शीर्ष तक पहुंच पाते हैं वे कैसे वहां तक पहुंचते हैं. हर आउटलायर की एक कथा होती है जो उस पूरे परिप्रेक्ष्य को उजागर करती है जिसमें वह कामयाब होता या होती है. इस पूरे परिप्रेक्ष्य में शामिल हैं उसका परिवार व संस्कृति, दोस्तियां, बचपन, जन्म के संयोग, इतिहास और भूगोल. ग्लैडवेल कहते हैं कि केवल यह भर पूछ लेना काफी नहीं है कि कामयाब लोग कैसे होते हैं, यह भी पूछा जाना ज़रूरी है कि वे कहां के रहने वाले हैं. इससे भी तै होता है कि कौन कामयाब होगा और कौन नहीं.

ग्लैडवेल कहते हैं कि कामयाबी के लिए किसी का मेधावी होना ही काफी नहीं है. इस बात को वे एक मार्मिक प्रसंग से साफ करते हैं. प्रसंग है क्रिस्टोफर लंगन का, जो अपने 195 के आई क्यू (आइंस्टीन का आई क्यू 150 था) के बावज़ूद मिसौरी के एक अस्तबल में काम करने से आगे नहीं बढ सका. क्यों नहीं वह वह एक न्यूक्लियर रॉकेट विशेषज्ञ बन गया? इसलिए कि उसका परिवेश ही ऐसा था कि वह अपनी असाधारण मेधा का फायदा नहीं उठा सका. इसलिए कि उसे जो भी करना था, अपने दम पर करना था, जबकि, बकौल ग्लैडवेल, दुनिया में कोई भी –चाहे वह रॉक स्टार हो, प्रोफेशनल एथलीट हो, सॉफ्ट्वेयर बिलिनेयर हो या कोई विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न हो– अकेले कुछ नहीं कर पाता. बिल गेट्स की कामयाबी का विश्लेषण करते हुए ग्लैडवेल कहते हैं कि वे आज सफलता के उस मुकाम पर नहीं होते अगर उनके प्राइवेट स्कूल ने उन्हें एक उन्नत कम्प्यूटर सुलभ न कराया होता. बाद में भी वे और भी बेहतर कम्प्यूटरों पर काम इसलिये कर सके क्योंकि वे वाशिंगटन के पास रह रहे थे. ग्लैडवेल का कहना है कि बहुत सारे युवाओं में बिल गेट्स जैसी प्रतिभा है लेकिन वे उनकी तरह की कामयाबी इसलिए हासिल नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें वैसे उन्नत कम्प्यूटरों पर काम करने का अवसर नहीं मिल पाता.

किताब यह तो बताती है कि जो लोग कामयाब हुए वे कैसे और क्यों हुए, लेकिन यह नहीं बताती कि कामयाबी अर्जित कैसे की जाए. इसी तरह, इस किताब को पढते हुए यह गुत्थी भी नहीं सुलझ पाती कि क्यों कुछ लोग तो उन्हें मिले अवसरों का भरपूर फायदा उठा लेते हैं और क्यों अन्य ऐसा नहीं कर पाते. लेकिन, इसके बावज़ूद, किताब दिलचस्प और विचारोत्तेजक है. छोटी-छोटी अनेक सूचनाएं इसके आकर्षण को और बढाती हैं, जैसे यह कि ज़्यादातर पेशेवर हॉकी खिलाड़ियों का जन्म जनवरी में ही हुआ है, या एशियाई बच्चे गणित में इसलिए निष्णात होते हैं कि उनके मां-बाप हज़ारों सालों से चावल की खेती में भरपूर मेहनत करते रहे हैं, या सिलिकॉन वैली के ज़्यादार अरब पति 1955 के आस पास जन्मे हैं.


Discussed book:
Outliers: The Story of Success
By Malcolm Gladwell
Published by: Little, Brown and Company
Hardcover, 320 pages
US $ 27.00

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया में 14 दिसम्बर, 2008 को प्रकाशित.







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Saturday, December 6, 2008

थोड़ी-सी लिपस्टिक आपके लिए भी

पिछले दिनों हमारे कुछ राजनीतिज्ञ अपने बयानों के कारण चर्चा में रहे. एक बयान दिया भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नक़वी ने. उनके बयान पर जानी-मानी लेखिका शोभा डे ने एक तल्ख टिप्पणी की हिन्दुस्तान टाइम्स में. मुझे उनकी ज़्यादातर बातें सही लगीं. शोभा डे की टिप्पणी वे लोग भी पढ़ें जो हिन्दुस्तान टाइम्स नहीं पढ़ते, इसी खयाल से मैं उस टिप्पणी का अनुवाद यहां दे रहा हूं:

दुर्गाप्रसाद



थोड़ी-सी लिपस्टिक आपके लिए भी
शोभा डे

हां, मुख्तार नक़वी जी, मैं लिपस्टिक लगाती हूं. लेकिन, पाउडर नहीं लगाती. और हां, मैं उस दक्षिण मुम्बई में रहती हूं जिसे एक अभिजात रिहायश माना जाता है (हालांकि उसे एक अभिजात स्लम कहना ज़्यादा सही होगा). मैं अक्सर पांच सितारा होटलों में जाती हूं, खास तौर पर भव्य ताज महल होटल में. मैं बिना किसी संकोच के उसे अपना दूसरा घर कहती हूं, क्योंकि वो मेरा दूसरा घर है.

ज़्यादातर मानदण्डों के अनुसार मेरी जीवन शैली को विशिष्ट कहा जा सकता है.

तो?

इन सुख सुविधाओं के लिए मैंने लम्बे समय तक कठिन श्रम किया है. इन सबको मैंने ईमानदार साधनों से जुटाया है. मुझे अमीरी विरासत में नहीं मिली और मेरा पालन-पोषण एक मध्यम वर्गीय घर-परिवार में हुआ. सभी भारतीय अभिभावकों की तरह मेरे मां-बाप ने भी शिक्षा के माध्यम से अपने बच्चों को एक बेहतर ज़िन्दगी देने का ख्वाब देखा. हमने उनके सपनों को, और कुछ अपने सपनों को भी, साकार किया. क्या यह कोई ज़ुर्म है?

मैं गर्व पूर्वक अपना टैक्स अदा करती हूं और अपने तमाम बिल भरती हूं. लेकिन क्या ऐसा ही आपकी बिरादरी के अधिकांश लोगों, जो वर्तमान समय के असली अभिजन हैं, के लिए भी कहा जा सकता है? मेरा इशारा राजनीतिज्ञों की तरफ है जिनकी जवाबदेही शून्य है लेकिन जो उन तमाम सुविधाओं का भोग करते हैं जिनके लिए वे अन्यों की आलोचना करते हैं.

अपनी जीवन शैली के लिए लज्जित होने से मैं इंकार करती हूं. कहावत है न कि बदला लेने का सबसे बढिया तरीका है बेहतर ज़िन्दगी जीना.

बहुतेरे तथाकथित नेताओं के विपरीत मेरा कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. जब मैं घर से बाहर निकलती हूं तो उम्दा कार में निकलती हूं, लेकिन वह कार कोई चलता फिरता दुर्ग नहीं होती जिसकी रक्षा सरकारी खर्च पर पलने वाले बन्दूक धारियों का समूह किया करता है. जब मैं निकलती हूं तो मेरे कारण ट्रैफिक को दूसरे रास्तों पर मोड़ कर औरों के लिए असुविधा पैदा नहीं की जाती. हवाई अड्डों पर दूसरों की तरह मेरी भी तलाशी ली जाती है.

इसलिए मिस्टर नक़वी, आपकी हिम्मत कैसे हुई इस तरह की अनुपयुक्त और अवांछित टिप्पणी करके मुझे (और अन्य स्त्रियों को) नीचा दिखाने की? हम लोग प्रोफेशनल हैं जो अपनी भरपूर क्षमता का प्रयोग करते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं. क्या आप भी ऐसा ही दावा कर सकते हैं? हम लोग चाहें लिपस्टिक लगायें, अपने चेहरों पर पाउडर पोतें, विग लगायें या कृत्रिम भौंहें लगायें, यह हमारा अपना निजी मामला और विशेषाधिकार है. आपकी यह टिप्पणी सिर्फ महिलाओं और विशेष रूप से उन शहरी कामकाजी महिलाओं के बारे में, जो कि आप जैसों के द्वारा निर्धारित पारम्परिक छवियों की अवहेलना करती हैं, आपके एकांगी और पक्षपातपूर्ण रवैये का दयनीय प्रदर्शन मात्र है.

आपकी और आप जैसे उन स्व-घोषित बुद्धिजीवियों जिन्होंने अभिजात लोगों को गरियाने का एक नया खेल तलाशा है, की यह टिप्पणी ऐसे वक़्त में आई है जब हमारा ध्यान अधिक महत्व के मुद्दों, जैसे घेरेबन्दी के समय में जीवित रहने की चुनौती पर, केन्द्रित होना चाहिए था. समाज के अधिक समृद्ध/शिक्षित लोगों पर इस प्रहार से एक रुग्ण संकीर्ण मानसिकता का पता चलता है.

मेरी आवाज़ की भी वही वैधता है जो एक अनाम सब्ज़ी विक्रेता की आवाज़ की है, क्योंकि हम दोनों भारत के नागरिक हैं. क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वे टी वी एंकर जो लिपस्टिक या पाउडर का इस्तेमाल नहीं करतीं, अपने काम में दूसरों से बेहतर हैं? क्या राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाली औरतों को इसलिए सौन्दर्य प्रसाधनों से परहेज़ करना चाहिए ताकि उन्हें (निश्चय ही मर्दों द्वारा) अधिक ‘गम्भीरता’ से लिया जा सके? क्या सार्वजनिक जीवन में काम करने वाली महिलाओं को इसलिए घटिया कपड़े पहनने चाहियें कि उनकी विश्वसनीयता अधिक बढी हुई नज़र आए और समाज द्वारा उन्हें जो भूमिका प्रदान की गई है वे उसके उपयुक्त दिखाई दें? क्या लिपस्टिक उनके योगदान और योग्यता का अपहरण कर लेती है?

सवाल उस महिला कोण्डोलिज़ा राइस से भी पूछा जाना चाहिए जो सालों से दुनिया की मोस्ट स्टाइलिश सूची में जगह पाती रही हैं. पूछा सोनिया गांधी से भी जाना चाहिए जो हर वक़्त त्रुटिहीन वेशभूषा में नज़र आती हैं, और लिपस्टिक भी ज़रूर ही लगाती हैं. और हां, मैं अपनी नई करीबी दोस्त जयंती नटराजन को भला कैसे भूल सकती हूं?

बहुत दुख की बात है कि वर्तमान संकट के दौरान लैंगिक भेद का मुद्दा बीच में लाकर श्री नक़वी ने सारे मुद्दों को इतना छोटा बना दिया. जॉर्ज़ फर्नाण्डीज़ ने अपनी ज़मीन उस वक़्त खो दी थी जब उन्होंने कोका कोला के विरुद्ध लड़ाई शुरू करने का फैसला किया था. नक़वी शायद अपनी लड़ाई लिपस्टिक के खिलाफ लड़ रहे हैं.

अफसोस की बात है कि मुम्बई ने जो यातना झेली उसे एक तरह के ऐसे वर्ग युद्ध तक सिकोड़ दिया गया जिसमें बेचारे अभिजन से यह आशा की जा रही है कि वे यह कहते हुए अपना बचाव करें कि “नहीं, नहीं, इस हमले में जान देने वालों के लिए हमें भी कम अफसोस नहीं है.” अब तो बड़े हो जाइए. यह एक भयावह ट्रेजेडी थी. ट्रेजेडी को भी एक ऐसे चेहरे या छवि की ज़रूरत होती है जो सामूहिक वेदना को व्यक्त कर सके. और इसी कारण ताजमहल होटल ने उस छवि, उस प्रतीक का रूप धारण किया जो पूरे देश के उस त्रास, उस वेदना, उस पीड़ा को अभिव्यक्त करता है. आप क्यों उसे वर्ग में बांट रहे हैं?

क्या हमारे राजनीतिज्ञ पांच सितारा होटलों में सबसे बढ़िया कमरों (और वह भी बिना कोई कीमत अदा किए) की मांग नहीं करते? कम से कम हम शेष लोग उनके लिए भारी कीमत तो चुकाते हैं. क्या भारत के मैले-कुचैले कपड़ों और झोलेवाले बुद्धिजीवी जब भी और जहां भी मिल जाए मुफ्त की स्कॉच पीने से बाज आते हैं? साथियों, पहले अपनी दारू की कीमत अदा कीजिए, फिर दुनिया को बचाना.

कहा जाता है कि नारायण राणे के बेटे बेंटली कारों में घूमते हैं और आठ कमाण्डो उनकी रक्षा के लिए तैनात रहते हैं. उनका खर्चा कौन उठाता है? हम जैसे शोषक! जब हमें अपने देश की छवि का अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शन करना होता है तो हम अपने अरबपतियों और बॉलीवुड स्टार्स को आगे कर देते हैं. ये ही वे अभिजन हैं जो संकट के समय राहत-पुनर्वास कार्यों के लिए दिल खोलकर दान देते हैं. मुझे तो नक़वी जैसों की बातों से उबकाई आती है. मैं जैसी हूं और जैसी नज़र आती हूं, उसके लिए अगर कोई मुझे ‘अपराधी’ ठहराने की कोशिश करता है तो मुझे घिन आती है.

माफ़ कीजिए नक़वी जी. मेरे होठों को देखें: लिपस्टिक ज़्यादा तो नहीं है? ज़्यादा गाढी और चमकदार? अगर आप चाहें, मुझ से थोड़ी-सी उधार ले सकते हैं.

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अनुवाद: डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हिन्दुस्तान टाइम्स में शनिवार, 6 दिसम्बर को प्रकाशित आलेख ‘लिपस्टिक ऑन हिज़ कॉलर’ का मुक्त अनुवाद.









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Sunday, November 23, 2008

गरीबी विहीन दुनिया का सपना

नोबल शांति पुरस्कार विजेता और ग्रामीण बैंक के संस्थापक सुपरिचित बांगलादेशी अर्थ शास्त्री मुहम्मद यूनुस की सद्य प्रकाशित किताब क्रिएटिंग अ वर्ल्ड विदाउट पॉवर्टी एक अभिनव अवधारणा प्रस्तुत करती है. अवधारणा है सामाजिक व्यापार, सोश्यल बिज़नेस की; जिसके द्वारा आज के समय की सबसे बड़ी समस्या -गरीबी- का उन्मूलन किया जा सकता है. यूनुस मानते हैं कि विश्व शांति के लिए गरीबी सबसे बड़ी चुनौती है; आतंकवाद, धार्मिक कठमुल्लेपन, जातीय घृणा, राजनैतिक विद्वेष या किसी भी अन्य ऐसी ताकत जिसे हिंसा और युद्ध के लिए उत्तरदायी माना जाता हो, से बढकर. बकौल यूनुस, गरीबी निराशा को जन्म देती है और निराशा लोगों को इस तरह के कृत्यों में लिप्त होने को उकसाती है.

यूनुस ने अपनी पहली किताब बैंकर टू द पुअर में ग्रामीण बैंक की स्थापना और उसके शुरुआती वर्षों के विकास का परिचय दिया था. अब इस नई किताब में वे इसी बात को आगे बढाते हैं और ग्रामीण बैंक और माइक्रो क्रेडिट ने जिस आर्थिक और सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया, उसके अगले दौर की रूपरेखा पेश करते हैं. वह अगला दौर है सामाजिक व्यापार का, जो विश्व स्तर पर गरीबी उन्मूलन करेगा और तमाम लोगों की सर्जनात्मक ऊर्जा को इस्तेमाल कर हर मनुष्य के लिए संसाधनों की विपुलता के स्वप्न को साकार करेगा.

किताब में तीन मुख्य बातें हैं. पहली है गरीबी, उसके कारण और निवारण के उपाय. यहां वे बताते हैं कि गरीबी के मूल में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था तथा गलत विचार हैं, न कि गरीबों का आलस्य, अज्ञान और नैतिक न्यूनताएं. दूसरी बात है इस आने वाली क्रांति में महिलाओं की भूमिका. यूनुस मानते हैं कि अगर लाखों-करोडो ऐसी महिलाओं के मन में दबी सर्जनात्मकता, ऊर्जा और परिवार के उत्थान की आकांक्षा को पंख दे दिए जाएं तो फिर उनकी उड़ान को कोई ताकत नहीं रोक सकती. तीसरी बात यह कि तकनीक की भूमिका इस क्रांति में बहुत महत्वपूर्ण है. संचार और प्रबन्धन के नवीनतम औज़ार हरेक को, विशेष रूप से एशिया, अफ्रीका और लातिन अमरीका के दूरस्थ गांवों के लोगों को मुहैया कराये जाने चाहिये. इसका परिणाम आर्थिक और राजनीतिक ताकत के विकेन्द्रीकरण के रूप में सामने आएगा.

यूनुस इस किताब में समस्या के समाधान के लिए सामाजिक व्यापार की अवधारणा पेश करते हैं. उनका यह सामाजिक व्यापार कोई चेरिटी न होकर व्यापार है, और यह दान पर निर्भर न होकर स्व-अर्जित लाभ पर निर्भर है. फर्क़ केवल यह है कि जहां सामान्य व्यापार का लक्ष्य केवल मुनाफा कमाना होता है, सामाजिक व्यापार का लक्ष्य सामाजिक समस्या हल करना, सामाजिक आवश्यकता की पूर्ति करना और सामाजिक मुनाफा पैदा करना है. सामाजिक व्यापार में कोई काम मुफ्त नहीं किया जाएगा. यह जो भी काम करेगा वह स-मूल्य होगा, हालांकि वह मूल्य बाज़ार मूल्य से बहुत कम हो सकेगा. इस सामाजिक व्यापार का आकलन इसके द्वारा कमाए गए मुनाफे से न होकर इस बात से होगा कि इसने सामाजिक समस्याओं को हल करने की दिशा में कितनी सकारात्मक भूमिका निबाही. एक और फर्क़ यह भी होगा कि यह सामाजिक व्यापार कोई लाभांश वितरित नहीं करेगा. इसमें जो भी मुनाफा होगा उसका पुनर्निवेश कर दिया जाएगा.

अपनी इस अवधारणा को आगे बढाते हुए यूनुस दो तरह के सामाजिक व्यापार की रूपरेखा पेश करते हैं. पहले प्रकार का व्यापार भोजन, मकान, स्वास्थ्य शिक्षा आदि के क्षेत्र में होगा जो एक तरह से सामाजिक लाभ के लिए होगा. दूसरे तरह का व्यापार किसी सामाजिक लाभ के लिए भले ही न होगा, वह गरीबों द्वारा संचालित होगा और उसमें होने वाला मुनाफा गरीबों की दशा सुधारने में प्रयुक्त होगा. यूनुस का ग्रामीण बैंक इसी तरह का व्यापार है. इन दोनों किस्मों के व्यापारों को मिलाकर भी किया जा सकता है, लेकिन यूनुस बहुत साफ कहते हैं कि सामाजिक और पारम्परिक व्यापार को कभी नहीं मिलाया जा सकता.

इस बात में गहरा भरोसा रखने वाले कि जब सही वक़्त आता है तो एक छोटा-सा नया विचार ही दुनिया को बदल डालता है, मोहम्मद यूनुस उन लोगों को करारा जवाब देते हैं जो गरीबी उन्मूलन को अब भी एक पूरा न हो सकने वाला सपना मानते हैं. वे कहते हैं कि हज़ारों साल से दुनिया में चेचक रही है, लाखों औरतें प्रसव के दौरान मौत का शिकार होती रही हैं. दुनिया में लम्बे समय तक उम्र के तीस बरस पार करना दुर्लभ हुआ करता था. लेकिन आज यह सब भी तो बदला है. विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और सामाजिक प्रगति ने हमें समझा दिया है कि बीमरियां रोगाणुओं या गन्दगी की वजह से होती है न कि भूत-प्रेत की वजह से. अगर यह सब हुआ है तो गरीबी क्यों नहीं हट सकती?

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Discussed book:
Creating a World without Poverty
By Muhammad Yunus, Karl Weber
Published by: Public Affairs
Hardcover, Pages 296
US $ 26.00

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 23 नवम्बर, 2008 को प्रकाशित.


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Thursday, November 20, 2008

स्वागत का एक तरीका यह भी

आप सभी ने यह नोट किया होगा कि जब भी कोई आयोजन होता है, चाहे वह सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो, साहित्यिक हो, या राजनीतिक हो, खास मेहमानों का स्वागत माला पहना कर या पुष्प गुच्छ भेंट कर किया जाता है. सामाजिक या पारिवारिक आयोजनों की बात ज़रा अलग है, वहां तो जो मालाएं पहनाई जाती हैं, उसे या उन्हें लोग कुछ देर पहने रहते हैं. राजनीतिक आयोजनों की भी बात थोड़ी अलग है. आजकल चुनाव का मौसम है और मालाओं से लदे-फंदे नेता गली-गली नज़र आते हैं. शायद अपने गले में अधिकाधिक मालाएं डाल कर वे यह दर्शाने का प्रयास करते हैं कि वे कितने लोकप्रिय हैं. लेकिन साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में अतिथिगण को जो मालाएं पहनाई जाती हैं, उन्हें पहनाते ही उतार कर सामने टेबल पर रख देने का रिवाज़ आम है. अगर पुष्प गुच्छ भेंट किया जाता है तो उसे भी वहीं टेबल पर छोड़ दिया जाता है. किस अतिथि को कितनी मालाएं पहनाई जाएं यह आयोजकों की श्रद्धा या क्षमता या दोनों पर निर्भर करता है. मालाओं का सस्ता या महंगा होना भी इन्हीं बातों पर निर्भर करता है. उधर दक्षिण भारत में तो बहुत ही बड़ी और भारी मालाओं का रिवाज़ है.
क्या यह औपचारिकता संसाधनों की बरबादी नहीं है? मैं तो कई बार अपने मित्रों से मज़ाक-मज़ाक में कहा करता था कि अगर अतिथि जी को प्रति माला की दर से दस रुपये भी भेंट कर दिए जाएं तो उन्हें अधिक प्रसन्नता होगी. शायद ऐसी ही कुछ मानसिकता रही होगी, कि जब मेरा वश चला, मैंने इस माल्यार्पण की रस्म को टाला. मंच से कह दिया गया कि हम अमुक-अमुक जी का स्वागत करते हैं. अधिकांश ने इसे पसन्द किया, एकाध ने घुमा-फिरा कर अपनी अप्रसन्नता भी सम्प्रेषित की. जो भी हो, जब मेरा वश चला, मैंने माल्यार्पण की निरर्थक और फिज़ूलखर्ची वाली रस्म को टाला. मुझे याद है कि राजस्थान के एक राजनेता ने भी यह नीतिगत घोषणा कर रखी थी कि उन्हें मालाएं नहीं पहनाई जाएं. वैसे, किसी भी राजनेता के लिए ऐसी घोषणा करना कितना कठिन होगा, हम कल्पना कर सकते हैं.
ऐसे में आज जयपुर में एक आयोजन में एक सुखद अनुभव हुआ, और मेरा मन हुआ कि उसे आप सबके साथ साझा करूं. आज यहां राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के तत्वावधान में चिल्डृन्स बुक ट्रस्ट, दिल्ली ने बाल साहित्य पर एक सेमिनार का आयोजन किया. सी बी टी ने अतिथियों का स्वागत किया, लेकिन पुष्प मालाओं से नहीं, बल्कि एक अनूठे और सार्थक तरीके से. आयोजकों ने अपने विशिष्ट अतिथिगण का स्वागत करते हुए उन्हें पुस्तक का पैकेट भेंट किया. कहना अनावश्यक है कि अतिथिगण के लिए भी उस पैकेट को (माला की तरह) टेबल पर छोड़ जाने की कोई पारम्परिक विवशता नहीं थी. हर अतिथि अपना उपहार अपने साथ ले गया. और, एक सारस्वत आयोजन में पुस्तक भेंट करके स्वागत करने से बेहतर और क्या हो सकता है, मैं तो नहीं सोच पा रहा हूं.
कितना अच्छा हो कि हम पुस्तक भेंट कर स्वागत करने की इस परम्परा को लोकप्रिय बनाएं. इससे अतिथि को आपके स्वागत के स्मृति चिह्न को लम्बे समय तक अपने साथ रखने का अवसर मिलेगा, पुस्तक संस्कृति विकसित होगी, और फूलों की बेकद्री पर रोक लगेगी.

आप क्या सोचते हैं?









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Sunday, November 2, 2008

समतल दुनिया में हरी क्रांति की ज़रूरत

तीन बार के पुलिट्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकार-लेखक थॉमस एल फ्रीडमैन ने करीब एक दशक पहले अपनी किताब लेक्सस एण्ड द ऑलिव ट्री में भूमण्डलीकरण का स्वागत किया था. उसके बाद 2005 में आई और अब तक की बेहद चर्चित किताबों में से एक, द वर्ल्ड इज़ फ्लैट में उन्होंने यह बताया कि सूचना क्रांति किस तरह दुनिया को समतल कर रही है और हमारे रोज़गार के अवसरों को कुछ इस तरह पुनर्संयोजित कर रही है अब उसे रोक पाना सीमाओं, समुद्रों और दूरियों के लिए भी मुमकिन नहीं रह गया है. इन्हीं फ्रीडमैन ने अब अपनी सद्य प्रकाशित किताब हॉट, फ्लैट एण्ड क्राउडेड: व्हाई वी नीड अ ग्रीन रिवोल्यूशन – एण्ड हाउ इट केन रिन्यू अमेरिका में बताया है कि हमारे समय के तीन बहुत बड़े बदलाव हैं ग्लोबल वार्मिंग, ग्लोबल फ्लैटनिंग और ग्लोबल क्राउडिंग. ये तीन बदलाव ऐसी तीन लपटों की तरह है जो आपस में मिलकर बहुत बड़ी आग में बदल चुकी है. यह आग पांच बड़ी समस्याओं को पैदा कर रही है. ये समस्याएं हैं – मौसम का बदलाव, पेट्रो-तानाशाही, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के के उपभोग और उपलब्धता का बिगड़ता जा रहा संतुलन, जैव विविधता का खत्म होते जाना, और ऊर्जा दारिद्रय. आने वाला समय कैसा होगा, यह इसी बात पर निर्भर करेगा कि हम इन पांचों समस्याओं का सामना कैसे करते हैं.

फ्रीडमैन चेताते हैं कि हममें से हरेक को यह जान लेना चाहिए कि अब तेल की कीमतें कभी भी घटेंगी नहीं और अपव्यय करने और प्रदूषण फैलाने वाली तकनीकों को और बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. फ्रीडमैन कहते हैं कि ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में आखिरी बड़ा नवाचार आणविक ऊर्जा का पचास बरस पहले हुआ था. उसके बाद तो जैसे जड़ता ही आ गई है. वे एक उम्दा बात यह कहते हैं कि पाषाण युग की समाप्ति इसलिए नहीं हुई थी कि पत्थर खत्म हो गया था. इसी तरह, वातावरण को नष्ट करने वाले जीवाश्म ईंधन का युग भी खत्म हो सकता है, अगर हम उसके लिए सचेष्ट हों.
फ्रीडमैन जीवाश्म ईंधन जैसे तेल, कोयला और प्राकृतिक गैस के जलाने से पैदा कार्बन डाइ ऑक्साइड की वृद्धि पर बहुत चिंतित हैं. वे बताते हैं कि कार्बन डाइ ऑक्साइड से उपजा प्रदूषण वायुमण्डल में इकट्ठा होता रहता है और इसी कारण मौसम में बदलाव आ रहे हैं. अपने देश अमरीका को वे विशेष रूप से लताड़ते हैं कि वहां प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत सबसे ज़्यादा है और इसीलिए पर्यावरण को बिगाड़ने का सबसे ज़्यादा दोषी भी उन्हीं का देश है. स्वाभाविक है कि वे स्थिति को सुधारने के लिए अमरीकी नेतृत्व से सक्रियता की उम्मीद करते हैं. वैसे, वे चिंतित एशियाई देशों के व्यवहार से भी कम नहीं हैं. फ्रीडमैन कहते हैं कि दुनिया के औद्योगिक उत्पाद को बढाने के मामले में भले ही चीन ने कमाल किया हो, उसने पर्यावरण को भी कम क्षति नहीं पहुंचाई है. वे बताते हैं कि पिछले छह सालों में चीन में कोयला जनित विकास में इतनी वृद्धि हुई है कि उसे अपने कोयला उत्पाद में उतनी वृद्धि करनी पड़ी है जितनी कि पूरे अमरीका की उत्पाद क्षमता है. अब इसी के साथ यह बात और जोड़ लीजिए कि सारी दुनिया में आबादी शहरों की तरफ जा रही है. इसी की परिणति है दुनिया का ‘हॉट, फ्लैट और क्राउडेड’ होते जाना. अपनी सारी चिंताओं के बावज़ूद फ्रीडमैन उम्मीद भी करते हैं कि चीन और अन्य देश नए पर्यावरण-मित्र उद्योगों में ज़्यादा निवेश कर इस मामले में अमरीका को भी पीछे छोड़ देंगे.

जैसा कि इसके शीर्षक से ही साफ है, किताब अमरीका को केन्द्र में रखकर लिखी गई है, लेकिन फ्रीडमैन की लेखन शैली उनकी चिंताओं में पूरी दुनिया को समेटती चलती है. जब वे यह कहते हैं कि पर्यावरण की चिंता केवल हमारे अस्तित्व का ही प्रश्न नहीं है, बल्कि इससे अमरीका अधिक समृद्ध, अधिक उत्पादक और अधिक सुरक्षित भी बनेगा, तो हम बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि यह बात और देशों पर भी उतनी ही अच्छी तरह से लागू होती है.

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Discussed book:
Hot, Flat and Crowded: Why We Need a Green Revolution – and How It Can Renew America
By Thomas L. Friedman
Published by Farrar, Straus and Giroux
448 Pages. Hardcover
US $ 27.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय संस्करण में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 2 नवम्बर, 2008 को प्रकाशित.











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Tuesday, October 7, 2008

पत्नी: पति के पीछे या उसके साथ

पत्रकार और प्रसारण माध्यमों की जानी-मानी टिप्पणीकार मेगन बाशम की एकदम हाल ही में प्रकाशित किताब ‘बिसाइड एवरी सक्सेसफुल मेन’ एक चौंकाने वाली स्थापना करती है और वह यह कि आज की औरत कामकाजी दुनिया से बाहर निकलने के लिए व्याकुल है, लेकिन दोहरी कमाई से घर चला पाने की विवशता के कारण काम करते रहने को मज़बूर है. कहना अनावश्यक है, यह स्थापना प्रचलित नारीवादी सोच से हटकर है.

मेगन पश्चिम के एक लोकप्रिय मनोरंजन चैनल ई! से एक मार्मिक प्रसंग उठाती हैं. एक आकर्षक युवा शल्य चिकित्सक ने उतनी ही आकर्षक एक डॉक्टर से शादी की है. कुछ समय बाद वे एक घर खरीदने की योजना बनाते हैं. एक एस्टेट एजेण्ट उन्हें एक बहुत उम्दा घर बताता है. घर दोनों को बहुत पसन्द आता है. पति पत्नी से कहता है, “यह घर हमारे लिए एकदम उपयुक्त है. लेकिन अगर हम इसे खरीदना चाहें तो तुम्हें अपनी नौकरी ज़ारी रखनी पड़ेगी.” पत्नी पूछती है, “कब तक?” “यह तो मैं नहीं जानता. शायद काफी दिनों तक.” पति का जवाब है. हताश-उदास पत्नी कहती है, “मगर हमने तो बच्चों के बारे में बात की थी, तुम भी तो तैयार थे.” “अभी उसके लिए बहुत वक़्त है.” पति का यह भावहीन उत्तर सुनकर पत्नी अपनी कडुआहट रोक नहीं पाती है, “हां, काफी वक़्त है, अगर तुम किसी और औरत के साथ बच्चे चाहो तो. मैं पैंतीस की तो हो चुकी हूं.”

अब ज़रा इस यथार्थ की तुलना कुछ वर्ष पहले के उस यथार्थ से कीजिए जहां पति चाहता था कि पत्नी घर में ही रहे, बच्चे पैदा करे और पाले. मेगन बताती हैं कि जब भी वे और उनकी सहेलियां मिलती हैं (सभी 25 से 35 के बीच की उम्र की हैं) तो उनकी बातचीत इस मुद्दे पर सिमट आती है कि आखिर कब उनके पति उन्हें नौकरी से मुक्ति दिलायेंगे? मेगन न्यू जर्सी की एक महिला वकील को यह कहते हुए उद्धृत करती हैं कि उनका सपना है कि वे अपने काम से मुक्त हो जाएं और सप्ताह के किसी दिन दोपहर में ग्रॉसरी शॉपिंग करें. इसी तरह एक 29 वर्षीया डॉक्टर कहती हैं कि हालांकि उन्हें अपने काम में मज़ा आता है, वे एक पत्नी और मां बने रहना ज़्यादा पसन्द करेंगी. ‘अच्छा होता, मैं डॉक्टर न होती’. वे कहती हैं.

मेगन बताती हैं को उनके देश में हुए अधिकांश जनमत सर्वेक्षण यही बताते हैं कि अब ज़्यादा से ज़्यादा महिलाएं अपने जीवन के बेहतर वर्षों को घर और बच्चों के लिए प्रयुक्त करना चाहती हैं. यहां तक कि वे युवा अविवाहित लड़कियां भी, जिन्होंने अब तक बच्चों की ज़रूरतों का स्वयं अनुभव नहीं किया है, कहती हैं कि वे कैरियर की सीढियां चढने की बजाय परिवार की देखभाल मे समय लगाना अधिक पसन्द करेंगी.

लेकिन असल चुनौती यहीं उत्पन्न होती है. क्या स्त्री पढ-लिख कर काम न करे? अपने ज्ञान, प्रतिभा, योग्यता सब को चूल्हे-चौके में झोंक दे? और अगर वह ऐसा कर भी दे, तो उन आर्थिक ज़रूरतों की पूर्ति कैसे होगी, जो दिन-ब-दिन बढती जा रही हैं. और यहीं मेगन एक नई बात कहती हैं. वे सुझाती हैं कि शिक्षित, प्रतिभासम्पन्न, और दक्ष महिलाओं के लिए बेहतर विकल्प यह है कि वे अपनी योग्यताओं का इस्तेमाल अपने पतियों के कैरियर के उन्नयन में करें. ऐसा करने से न तो उनकी योग्यताओं का अपव्यय होगा, न उन्हें ठाले रहने का मलाल होगा और न बेहतर ज़िन्दगी जीने के अपने सपनों में कतर-ब्योंत करनी होगी. काम के मोर्चे पर पति की कामयाबी में सहयोगी बन कर स्त्री कुछ भी खोये बगैर सब कुछ प्राप्त कर सकती है. आज की स्त्री को मेगन की सलाह है कि वह एकल स्टार बनने की बजाय मज़बूत टीम की सदस्य बने. और यही वजह है कि उन्होंने इस किताब के शीर्षक में बिहाइण्ड की जगह बिसाइड शब्द का प्रयोग किया है.


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Discussed book:
Beside Every Successful Men
By Megan Basham
Published by Crown Forum
Hardcover, 256 pages
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत 5 अक्टोबर, 2008 को प्रकाशित.










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Wednesday, September 24, 2008

जावेद अख्तर का एक अद्भुत भाषण

कभी-कभी ऐसा कुछ पढ़ने को मिल जाता है कि मन उसे औरों के साथ साझा करने को व्याकुल हो उठता है. पिछले दिनों मेरे साथ ऐसा ही कुछ हुआ. इण्टरनेट पर जो बहुत सारी सामग्री दोस्तों की कृपा से मिलती है, उसमें हालांकि बहुत सारा कचरा होता है, कभी-कभी उस कचरे के ढेर में सोना, बल्कि उससे भी कीमती कुछ मिल जाता है. किसी ने मुझे जावेद अख्तर का एक भाषण भेजा. भाषण उन्होंने इण्डिया टुडे कॉंक्लेव में दिल्ली में कुछ बरस पहले दिया था. इस भाषण ने मुझ पर जादू का-सा असर किया. लगा, जो भी मिल जाए उसे पकड़ कर कहूं कि इस भाषण को पढो. और करीब-करीब यही किया भी. नेट पर जितनों को फॉरवर्ड कर सकता था, किया. जिन्हें डाक से भेज सकता था उन्हें इसकी फोटो कॉपी भेजी. मन फिर भी नहीं भरा. बिना किसी के कहे, इसका हिन्दी अनुवाद कर डाला. अपने मित्र, प्रख्यात कथाकार और प्रतिष्ठित पत्रिका 'अक्सर' के सम्पादक डॉ हेतु भारद्वाज को इसे पढने को दिया तो उन्होंने इसे अपनी पत्रिका में छापने का इरादा कर लिया. मुझे तो भला क्या ऐतराज़ होता. मैं तो चाहता ही यही था कि यह भाषण अधिकाधिक लोगों तक पहुंचे.

मन इस से भी नहीं भरा, तो अपने अनुवाद को इस ब्लॉग पर भी रख रहा हूं ताकि आप भी इसे पढ सकें.

तो प्रस्तुत है, जावेद अख्तर के भाषण का मेरे द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद:


मुझे पूरा विश्वास है देवियों और सज्जनों कि इस भव्य सभा में किसी को भी मेरी स्थिति से ईर्ष्या नहीं हो रही होगी. श्री श्री रविशंकर जैसे जादुई और दुर्जेय व्यक्तित्व के बाद बोलने के लिए खड़ा होना ठीक ऐसा ही है जैसे तेंदुलकर के चमचमाती सेंचुरी बना लेने के बाद किसी को खेलने के लिए मैदान में उतरना पड़े. लेकिन किन्हीं कमज़ोर क्षणों में मैंने वादा कर लिया था.
कुछ बातें मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूं. आप कृपया मेरे नाम –जावेद अख्तर- से प्रभावित न हों. मैं कोई रहस्य उजागर नहीं कर रहा. मैं तो वह बात कह रहा हूं जो मैं अनेक बार कह चुका हूं, लिखकर, टी वी पर या सार्वजनिक रूप से बोलकर, कि मैं नास्तिक हूं. मेरी कोई धार्मिक आस्थाएं नहीं हैं. निश्चय ही मैं किसी खास किस्म की आध्यात्मिकता में विश्वास नहीं करता. खास किस्म की!
एक और बात! मैं यहां बैठे इस भद्र पुरुष की आलोचना करने, इनका विश्लेषण करने, या इन पर प्रहार करने खड़ा नहीं हुआ हूं. हमारे रिश्ते बहुत प्रीतिकर और शालीन हैं. मैंने हमेशा इन्हें अत्यधिक शिष्ट पाया है.
मैं तो एक विचार, एक मनोवृत्ति, एक मानसिकता की बात करना चाहता हूं, किसी व्यक्ति विशेष की नहीं.

मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब राजीव ने इस सत्र की शुरुआत की, एक क्षण के लिए मुझे लगा कि मैं ग़लत जगह पर आ गया हूं. इसलिए कि अगर हम कृष्ण, गौतम और कबीर, या विवेकानन्द के दर्शन पर चर्चा कर रहे हैं तो मुझे कुछ भी नहीं कहना है. मैं इसी वक़्त बैठ जाता हूं. मैं यहां उस गौरवशाली अतीत पर बहस करने नहीं आया हूं जिस पर मेरे खयाल से हर हिन्दुस्तानी को, और उचित ही, गर्व है. मैं तो यहां एक सन्देहास्पद वर्तमान पर चर्चा करने आया हूं.

इण्डिया टुडे ने मुझे बुलाया है और मैं यहां आज की आध्यात्मिकता पर बात करने आया हूं. कृपया इस आध्यात्मिकता शब्द से भ्रमित न हों. एक ही नाम के दो ऐसे इंसान हो सकते हैं जो एक दूसरे से एकदम अलग हों. तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की. रामानंद सागर ने टेलीविज़न धारावाहिक बनाया. रामायण दोनों में है, लेकिन मैं नहीं सोचता कि तुलसीदास और रामानंद सागर को एक करके देख लेना कोई बहुत अक्लमन्दी का काम होगा. मुझे याद आता है कि जब तुलसी ने रामचरितमानस रची, उन्हें एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा था. भला कोई अवधी जैसी भाषा में ऐसी पवित्र पुस्तक कैसे लिख सकता है? कभी-कभी मैं सोचता हूं कि किसम-किसम के कट्टरपंथियों में, चाहे वे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के क्यों न हों, कितनी समानता होती है! 1798 में, आपके इसी शहर में, शाह अब्दुल क़ादिर नाम के एक भले मानुस ने पहली बार क़ुरान का तर्ज़ुमा उर्दू में किया. उस वक़्त के सारे उलेमाओं ने उनके खिलाफ एक फतवा ज़ारी कर डाला कि उन्होंने एक म्लेच्छ भाषा में इस पवित्र पुस्तक का अनुवाद करने की हिमाक़त कैसे की! तुलसी ने रामचरितमानस लिखी तो उनका बहिष्कार किया गया. मुझे उनकी एक चौपाई याद आती है :
”धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ जौलाहा कहौ कोऊ.

काहू की बेटी सौं बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारन सोऊ..
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु कोऊ.
मांगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो एकू न दैबो को दोऊ..”


रामानंद सागर ने अपने धारावाहिक से करोड़ों की कमाई की. मैं उन्हें कम करके नहीं आंक रहा लेकिन निश्चय ही वे तुलसी से बहुत नीचे ठहरते हैं.
मैं एक और उदाहरण देता हूं. शायद यह ज़्यादा स्पष्ट और उपयुक्त हो. सत्य की खोज में गौतम महलों से निकले और जंगलों में गए. लेकिन आज हम देखते हैं कि वर्तमान युग के गुरु जंगल से निकलते हैं और महलों में जाकर स्थापित हो जाते हैं. ये विपरीत दिशा में जा रहे हैं. इसलिए हम लोग एक ही प्रवाह में इनकी बात नहीं कर सकते. इसलिए, हमें उन नामों की आड़ नहीं लेनी चाहिए जो हर भारतीय के लिए प्रिय और आदरणीय हैं.

जब मुझे यहां आमंत्रित किया गया तो मैंने महसूस किया कि हां, मैं नास्तिक हूं और किसी भी हालत में बुद्धिपरक रहने की कोशिश करता हूं. शायद इसीलिए मुझे बुलाया गया है. लेकिन, उसी क्षण मैंने महसूस किया कि एक और खासियत है जो मुझमें और आधुनिक युग के गुरुओं में समान रूप से मौज़ूद है. मैं फिल्मों के लिए काम करता हूं. हममें काफी कुछ एक जैसा है. हम दोनों ही सपने बेचते हैं, हम दोनों ही भ्रम-जाल रचते हैं, हम दोनों ही छवियां निर्मित करते हैं. लेकिन एक फर्क़ भी है. तीन घण्टों के बाद हम कहते हैं – “दी एण्ड, खेल खत्म! अपने यथार्थ में लौट जाइए.” वे ऐसा नहीं करते. इसलिए, देवियों और सज्जनों मैं एकदम स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं यहां उस आध्यात्मिकता के बारे में बात करने आया हूं जो दुनिया के सुपरमार्केट में बिकाऊ है. हथियार, ड्रग्स और आध्यात्मिकता ये ही तो हैं दुनिया के तीन सबसे बड़े धन्धे. लेकिन हथियार और ड्रग्स के मामले में तो आपको कुछ करना पड़ता है, कुछ देना पड़ता है. इसलिए वह अलग है. यहां तो आप कुछ देते भी नहीं.
इस सुपर मार्केट में आपको मिलता है इंस्टैण्ट निर्वाण, मोक्ष बाय मेल, आत्मानुभूति का क्रैश कोर्स – चार सरल पाठों में कॉस्मिक कांशियसनेस. इस सुपर मार्केट की चेनें सारी दुनिया में मौज़ूद हैं, जहां बेचैन आभिजात वर्गीय लोग आध्यात्मिक फास्ट फूड खरीद सकते हैं. मैं इसी आध्यात्मिकता की बात कर रहा हूं.
प्लेटो ने अपने डायलॉग्ज़ में कई बुद्धिमत्तापूर्ण बातें कही हैं. उनमें से एक यह है कि किसी भी मुद्दे पर बहस शुरू करने से पहले शब्दों के अर्थ निश्चित कर लो. इसलिए, हम भी इस शब्द- ‘आध्यात्मिकता’ का अर्थ निश्चित कर लेने का प्रयत्न करते हैं. अगर इसका अभिप्राय मानव प्रजाति के प्रति ऐसे प्रेम से है जो सभी धर्मों, जतियों, पंथों, नस्लों के पार जाता है, तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं उसे मानवता कहता हूं. अगर इसका अभिप्राय पेड़-पौधों, पहाड़ों, समुद्रों, नदियों और पशुओं के प्रति, यानि मानवेत्तर विश्व से प्रेम से है, तो भी मुझे क़तई दिक्कत नहीं है. बस इतना है कि मैं इसे पर्यावरणीय चेतना कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का मतलब विवाह, अभिभावकत्व, ललित कलाओं, न्यायपालिका, अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के प्रति हार्दिक सम्मान का नाम है? मुझे भला क्या असहमति हो सकती है श्रीमान? मैं इसे नागरिक ज़िम्मेदारी कहना चाहूंगा. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ अपने भीतर उतरकर स्वयं की ज़िन्दगी का अर्थ समझना है? इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मैं इसे आत्मान्वेषण या स्व-मूल्यांकन कहता हूं. क्या आध्यात्मिकता का अर्थ योग है? पतंजलि की कृपा से, जिन्होंने हमें योग, यम, यतम, आसन, प्राणायाम के मानी समझाए, हम इसे किसी भी नाम से कर सकते हैं. अगर हम प्राणायाम करते हैं, बहुत अच्छी बात है. मैं इसे हेल्थ केयर कहता हूं. फिजीकल फिटनेस कहता हूं.

तो अब मुद्दा सिर्फ अर्थ विज्ञान का है. अगर यही सब आध्यात्मिकता है तो फिर बहस किस बात पर है? जिन तमाम शब्दों का प्रयोग मैंने किया है वे अत्यधिक सम्मानित और पूरी तरह स्वीकार कर लिए गए शब्द हैं. इनमें कुछ भी अमूर्त या अस्पष्ट नहीं है. तो फिर इस शब्द- आध्यात्मिकता- पर इतनी ज़िद क्यों? आखिर आध्यात्मिकता शब्द में ऐसा क्या है जो इन शब्दों में नहीं सिमट आया है? वो ऐसा आखिर है क्या?
पलटकर कोई मुझी से पूछ सकता है कि आपको इस शब्द से क्या परेशानी है? क्यों मैं इस शब्द को बदलने, त्यागने, छोड़ देने, बासी मान लेने का आग्रह कर रहा हूं. आखिर क्यों? मैं आपको बताता हूं कि मेरी आपत्ति किस बात पर है. अगर आध्यात्मिकता का अर्थ इन सबसे है तो फिर बहस की कोई बात नहीं है. लेकिन कुछ और है जो मुझे परेशान करता है. शब्द कोष में आध्यात्मिकता शब्द, -स्पिरिचुअलिटी- की जड़ें आत्मा, स्पिरिट में हैं. उस काल में जब इंसान को यह भी पता नहीं था कि धरती गोल है या चपटी, तब उसने यह मान लिया था कि हमारा अस्तित्व दो चीज़ों के मेल से निर्मित है. शरीर और आत्मा. शरीर अस्थायी है. यह मरणशील है. लेकिन आत्मा, मैं कह सकता हूं, बायो डिग्रेडेबल है. आपके शरीर में लिवर है, हार्ट है, आंतें हैं, दिमाग है. लेकिन क्योंकि दिमाग शरीर का एक हिस्सा है और मन दिमाग के भीतर रहता है, वह घटिया है क्योंकि अंतत: शरीर के साथ दिमाग का भी मरना निश्चित है. लेकिन चिंता न करें, आप फिर भी नहीं मरेंगे, क्योंकि आप तो आत्मा हैं और क्योंकि आत्मा परम चेतस है, वह सदा रहेगी, और आपकी ज़िन्दगी में जो भी समस्याएं आती हैं वे इसलिए आती हैं कि आप अपने मन की बात सुनते हैं. अपने मन की बात सुनना बन्द कर दीजिए.. आत्मा की आवाज़ सुनिए – आत्मा जो कॉस्मिक सत्य को जानने वाली सर्वोच्च चेतना है. ठीक है. कोई ताज़्ज़ुब नहीं कि पुणे में एक आश्रम है, मैं भी वहां जाया करता था. मुझे वक्तृत्व कला अच्छी लगती थी. सभा कक्ष के बाहर एक सूचना पट्टिका लगी हुई थी: “अपने जूते और दिमाग बाहर छोड़ कर आएं”. और भी गुरु हैं जिन्हें इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं होता है कि आप जूते बाहर नहीं छोड़ते. लेकिन दिमाग?.....नहीं.

अब, अगर आप अपना दिमाग ही बाहर छोड़ देते हैं तो फिर क्या होगा? आपको ज़रूरत होगी ऐसे गुरु की जो आपको चेतना के अगले मुकाम तक ले जाए. वह मुकाम जो आत्मा में कहीं अवस्थित है. वह सर्वोच्च चेतना तक पहुंच चुका है. उसे परम सत्य ज्ञात है. लेकिन क्या वह आपको बता सकता है? जी नहीं. वह आपको नहीं बता सकता. तो, अपना सत्य आप खुद ढूंढ सकेंगे?. जी नहीं. उसके लिए आपको गुरु की सहायता की ज़रूरत होगी. आपको तो उसकी ज़रूरत होगी लेकिन वह आपको इस बात की गारण्टी नहीं दे सकता कि आपको परम सत्य मिल ही जाएगा... और यह परम सत्य है क्या? कॉस्मिक सत्य क्या है? जिसका सम्बन्ध कॉस्मॉस यानि ब्रह्माण्ड से है? मुझे तो अब तक यह समझ में नहीं आया है. जैसे ही हम अपने सौर मण्डल से बाहर निकलते हैं, पहला नक्षत्र जो हमारे सामने आता है वह है अल्फा सेंचुरी, और वह हमसे केवल चार प्रकाश वर्ष दूर है. उससे मेरा क्या रिश्ता बनता है? क्यों बनता है?
तो, राजा ने ऐसे कपड़े पहन रखे हैं जो सिर्फ बुद्धिमानों को ही दिखाई देते हैं. और राजा लगातार बड़ा होता जा रहा है. और ऐसे बुद्धिमानों की संख्या भी निरंतर बढती जा रही है जिन्हें राजा के ये कपड़े दिखाई दे रहे हैं और जो उनकी तारीफ करते हैं. मैं सोचता था कि आध्यात्मिकता दरअसल धार्मिक लोगों की दूसरी रक्षा पंक्ति है. जब वे पारम्परिक धर्म से लज्जित अनुभव करने लगते हैं, जब यह बहुत चालू लगने लगता है तो वे कॉस्मॉस या परम चेतना के छद्म की ओट ले लेते हैं. लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है. इसलिए कि पारम्परिक धर्म और आध्यात्मिकता के अनुयायीगण अलग-अलग हैं. आप ज़रा दुनिया का नक्शा उठाइए और ऐसी जगहों को चिह्नित कीजिए जो अत्यधिक धार्मिक हैं -चाहे भारत में या भारत के बाहर- एशिया, लातिन अमरीका, यूरोप.... कहीं भी. आप पाएंगे कि जहां-जहां धर्म का आधिक्य है वहीं-वहीं मानव अधिकारों का अभाव है, दमन है. सब जगह. हमारे मार्क्सवादी मित्र कहा करते थे कि धर्म गरीबों की अफीम है, दमित की कराह है. मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता. लेकिन आजकल आध्यात्मिकता अवश्य ही अमीरों की ट्रांक्विलाइज़र है.
आप देखेंगे कि इनके अनुयायी खासे खाते-पीते लोग है, समृद्ध वर्ग से हैं. ठीक है. गुरु को भी सत्ता मिलती है, ऊंचा कद और पद मिलता है, सम्पत्ति मिलती है..(जिसका अधिक महत्व नहीं है), शक्ति मिलती है और मिलती है अकूत सम्पदा. और भक्तों को क्या मिलता है? जब मैंने ध्यान से इन्हें देखा तो पाया कि इन भक्तों की भी अनेक श्रेणियां हैं. ये सभी एक किस्म के नहीं हैं. अनेक तरह के अनुयायी, अनेक तरह के भक्त. एक वह जो अमीर है, सफल है, ज़िन्दगी में खासा कामयाब है, पैसा कमा रहा है, सम्पदा बटोर रहा है. अब, क्योंकि उसके पास सब कुछ है, वह अपने पापों का शमन भी चाहता है. तो गुरु उससे कहता है कि “तुम जो भी कर रहे हो, वह निष्काम कर्म है. तुम तो बस एक भूमिका अदा कर रहे हो, यह सब माया है, तुम जो यह पैसा कमा रहे हो और सम्पत्ति अर्जित कर रहे हो, तुम इसमें भावनात्मक रूप से थोड़े ही संलग्न हो. तुम तो बस एक भूमिका निबाह रहे हो.. तुम मेरे पास आओ, क्योंकि तुम्हें शाश्वत सत्य की तलाश है. कोई बात नहीं कि तुम्हारे हाथ मैले हैं, तुम्हारा मन और आत्मा तो शुद्ध है”. और इस आदमी को अपने बारे में सब कुछ अच्छा लगने लगता है. सात दिन तक वह दुनिया का शोषण करता है और सातवें दिन के अंत में जब वह गुरु के चरणों में जाकर बैठता है तो महसूस करता है कि मैं एक संवेदनशील व्यक्ति हूं.

लोगों का एक और वर्ग है. ये लोग भी धनी वर्ग से हैं. लेकिन ये पहले वर्ग की तरह कामयाब लोग नहीं हैं. आप जानते हैं कि कामयाबी-नाकामयाबी भी सापेक्ष होती है. कोई रिक्शा वाला अगर फुटपाथ पर जुआ खेले और सौ रुपये जीत जाए तो अपने आप को कामयाब समझने लगेगा, और कोई बड़े व्यावसायिक घराने का व्यक्ति अगर तीन करोड भी कमा ले, लेकिन उसका भाई खरबपति हो, तो वो अपने आप को नाकामयाब समझेगा. तो, यह जो अमीर लेकिन नाकामयाब इंसान है, यह क्या करता है? उसे तलाश होती है एक ऐसे गुरु की जो उससे कहे कि “कौन कहता है कि तुम नाकामयाब हो? तुम्हारे पास और भी तो बहुत कुछ है. तुम्हारे पास ज़िन्दगी का एक मक़सद है, तुम्हारे पास ऐसी संवेदना है जो तुम्हारे भाई के पास नहीं है. क्या हुआ जो वह खुद को कामयाब समझता है? वह कामयाब थोड़े ही है. तुम्हें पता है, यह दुनिया बड़ी क्रूर है. दुनिया बड़ी ईमानदारी से तुम्हें कहती है कि तुम्हें दस में से तीन नम्बर मिले हैं. दूसरे को तो सात मिले हैं. ठीक है. वे तुम्हारे साथ ऐसा ही सुलूक करेंगे.” तो इस तरह इसे करुणा मिलती है, सांत्वना मिलती है. यह एक दूसरी तरह का खेल है.
एक और वर्ग. मैं इस वर्ग के बारे में किसी अवमानना या श्रेष्ठता के भाव के साथ बात नहीं कर रहा. और न मेरे मन में इस वर्ग के प्रति कोई कटुता है, बल्कि अत्यधिक सहानुभूति है क्योंकि यह वर्ग आधुनिक युग के गुरु और आज की आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा अनुयायी है. यह है असंतुष्ट अमीर बीबियों का वर्ग.

एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी सारी निजता, सारी आकांक्षाएं, सारे सपने, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व विवाह की वेदी पर कुर्बान कर दिया और बदले में पाया है एक उदासीन पति, जिसने ज़्यादा से ज़्यादा उसे क्या दिया? कुछ बच्चे! वह डूबा है अपने काम धन्धे में, या दूसरी औरतों में. इस औरत को तलाश है एक कन्धे की. इसे पता है कि यह एक अस्तित्ववादी असफलता है. आगे भी कोई उम्मीद नहीं है. उसकी ज़िन्दगी एक विराट शून्य है; एकदम खाली, सुविधाभरी लेकिन उद्देश्यहीन. दुखद किंतु सत्य!
और भी लोग हैं. ऐसे जिन्हें यकायक कोई आघात लगता है. किसी का बच्चा चल बसता है, किसी की पत्नी गुज़र जाती है. किसी का पति नहीं रहता. या उनकी सम्पत्ति नष्ट हो जाती है, व्यवसाय खत्म हो जाता है. कुछ न कुछ ऐसा होता है कि उनके मुंह से निकल पड़ता है: “आखिर मेरे ही साथ ऐसा क्यों हुआ?” किससे पूछ सकते हैं ये लोग यह सवाल? ये जाते हैं गुरु के पास. और गुरु इन्हें कहता है कि “यही तो है कर्म. लेकिन एक और दुनिया है जहां मैं तुम्हें ले जा सकता हूं, अगर तुम मेरा अनुगमन करो. वहां कोई पीड़ा नहीं है. वहां मृत्यु नहीं है. वहां है अमरत्व. वहां केवल सुख ही सुख है”. तो इन सारी दुखी आत्माओं से यह गुरु कहता है कि “मेरे पीछे आओ, मैं तुम्हें स्वर्ग में ले चलता हूं जहां कोई कष्ट नहीं है”. आप मुझे क्षमा करें, यह बात निराशाजनक लग सकती है लेकिन सत्य है, कि ऐसा कोई स्वर्ग नहीं है. ज़िन्दगी में हमेशा थोड़ा दर्द रहेगा, कुछ आघात लगेंगे, हार की सम्भावनाएं रहेंगी. लेकिन उन्हें थोड़ा सुकून मिलता है.
आपमें से कोई मुझसे पूछ सकता है कि अगर इन्हें कुछ खुशी मिल रही है, कुछ शांति मिल रही है तो आपको क्या परेशानी है? मुझे अपनी पढ़ी एक कहानी याद आती है. किसी संत की कही एक पुरानी कहानी है. एक भूखे कुत्ते को एक सूखी हड्डी मिल जाती है. वह उसी को चबाने की कोशिश करने लगता है और इसी कोशिश में अपनी जीभ काट बैठता है. जीभ से खून आने लगता है. कुत्ते को लगता है कि उसे हड्डी से ही यह प्राप्त हो रहा है. मुझे बहुत बुरा लग रहा है. मैं नहीं चाहता कि ये समझदार लोग ऐसा बर्ताव करें, क्योंकि मैं इनका आदर करता हूं. मानसिक शांति या थोड़ा सुकून तो ड्रग्स या मदिरा से भी मिल जाता है लेकिन क्या वह आकांक्ष्य है? क्या आप उसकी हिमायत करेंगे? जवाब होगा, नहीं. ऐसी कोई भी मानसिक शांति जिसकी जड़ें तार्किक विचारों में न हो, खुद को धोखा देने के सिवा और कुछ नहीं हो सकती. कोई भी शांति जो आपको सत्य से दूर ले जाए, एक भ्रम मात्र है, महज़ एक मृग तृष्णा है. मैं जानता हूं कि शांति की इस अनुभूति में एक सुरक्षा-बोध है, ठीक वैसा ही जैसी तीन पहियों की साइकिल में होता है. अगर आप यह साइकिल चलाएं, आप गिरेंगे नहीं. लेकिन बड़े हो गए लोग तीन पहियों की साइकिलें नहीं चलाया करते. वे दो पहियों वाली साइकिलें चलाते हैं, चाहे कभी गिर ही क्यों न जाएं. यही तो ज़िन्दगी है.

एक और वर्ग है. ठीक उसी तरह का जैसा गोल्फ क्लब जाने वालों का हुआ करता है. वहां जाने वाला हर व्यक्ति गोल्फ का शौकीन नहीं हुआ करता. ठीक उसी तरह हर वह इंसान जो आश्रम में नज़र आता है, आध्यात्मिक नहीं होता. एक ऐसे गुरु के, जिनका आश्रम दिल्ली से मात्र दो घण्टे की दूरी पर है, घनघोर भक्त एक फिल्म निर्माता ने एक बार मुझसे कहा था कि मुझे भी उनके गुरु के पास जाना चाहिए. वहां मुझे दिल्ली की हर बड़ी हस्ती के दीदार हो जाएंगे. सच तो यह है कि वे गुरु जी निर्माणाधीन दूसरे चन्द्रास्वामी हैं. तो, यह तो नेटवर्किंग के लिए एक मिलन बिन्दु है. ऐसे लोगों के प्रति मेरे मन में अगाध सम्मान है जो आध्यात्मिक या धार्मिक हैं और फिर भी भले इंसान हैं. इसकी वजह है. मैं मानता हूं कि किसी भी भाव या अनुभूति की तरह आपकी भी एक सीमा होती है. आप एक निश्चित दूरी तक ही देख सकते हैं. उससे आगे आप नहीं देख सकते. आप एक खास स्तर तक ही सुन सकते हैं, उससे परे की ध्वनि आपको सुनाई नहीं देगी. आप एक खास मुकाम तक ही शोक मना सकते हैं, दर्द हद से बढ़ता है तो खुद-ब-खुद दवा हो जाता है. एक खास बिन्दु तक आप प्रसन्न हो सकते हैं, उसके बाद वह प्रसन्नता भी प्रभावहीन हो जाती है. इसी तरह, मैं मानता हूं कि आपके भलेपन की भी एक निश्चित सीमा है. आप एक हद तक ही भले हो सकते हैं, उससे आगे नहीं. अब कल्पना कीजिए कि हम किसी औसत इंसान में इस भलमनसाहत की मात्रा दस इकाई मानते हैं. अब हर कोई जो मस्जिद में जाकर पांच वक़्त नमाज़ अदा कर रहा है वह इस दस में से पांच इकाई की भलमनसाहत रखता है, जो किसी मदिर में जाता है या गुरु के चरणों में बैठता है वह तीन इकाई भलमनसाहत रखता है. यह सारी भलमनसाहत निहायत गैर उत्पादक किस्म की है. मैं इबादतगाह में नहीं जाता, मैं प्रार्थना नहीं करता. अगर मैं किसी गुरु के पास, किसी मस्जिद या मंदिर या चर्च में नहीं जाता तो मैं अपने हिस्से की भलमनसाहत का क्या करता हूं? मुझे किसी की मदद करनी होगी, किसी भूखे को खाना खिलाना होगा, किसी को शरण देनी होगी. वे लोग जो अपने हिस्से की भलमनसाहत को पूजा-पाठ में, धर्म या आध्यात्म गुरुओं के मान-सम्मान में खर्च करने के बाद भी अगर कुछ भलमनसाहत बचाए रख पाते हैं, तो मैं उन्हें सलाम करता हूं.
आप मुझसे पूछ सकते हैं कि अगर धार्मिक लोगों के बारे में मेरे विचार इस तरह के हैं तो तो फिर मैं कृष्ण, कबीर या गौतम के प्रति इतना आदर भाव कैसे रखता हूं? आप ज़रूर पूछ सकते हैं. मैं बताता हूं कि क्यों मेरे मन में उनके प्रति आदर है. इन लोगों ने मानव सभ्यता को समृद्ध किया है. इनका जन्म इतिहास के अलग-अलग समयों पर, अलग-अलग परिस्थितियों में हुआ. लेकिन एक बात इन सबमें समान थी. ये अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए. ये दलितों के लिए लड़े. चाहे वह रावण हो, कंस हो, कोई बड़ा धर्म गुरु हो या गांधी के समय में ब्रिटिश साम्राज्य या कबीर के वक़्त में फिरोज़ शाह तुग़लक का धर्मान्ध साम्राज्य हो, ये उसके विरुद्ध खड़े हुए.
और जिस बात पर मुझे ताज़्ज़ुब होता है, और जिससे मेरी आशंकाओं की पुष्टि भी होती है वह यह कि ये तमाम ज्ञानी लोग, जो कॉस्मिक सत्य, ब्रह्माण्डीय सत्य को जान चुके हैं, इनमें से कोई भी किसी सत्ता की मुखालिफत नहीं करता. इनमें से कोई सत्ता या सुविधा सम्पन्न वर्ग के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलन्द नहीं करता. दान ठीक है, लेकिन वह भी तभी जब कि उसे प्रतिष्ठान और सत्ता की स्वीकृति हो. लेकिन आप मुझे बताइये कि कौन है ऐसा गुरु जो बेचारे दलितों को उन मंदिरों तक ले गया हो जिनके द्वार अब भी उनके लिए बन्द हैं? मैं ऐसे किसी गुरु का नाम जानना चाहता हूं जो आदिवासियों के अधिकारों के लिए ठेकेदारों से लड़ा हो. मुझे आप ऐसे गुरु का नाम बताएं जिसने गुजरात के पीड़ितों के बारे में बात की हो और उनके सहायता शिविरों में गया हो. ये सब भी तो आखिर इंसान हैं.
मान्यवर, यह काफी नहीं है कि अमीरों को यह सिखाया जाए कि वे सांस कैसे लें. यह तो अमीरों का शगल है. पाखण्डियों की नौटंकी है. यह तो एक दुष्टता पूर्ण छद्म है. और आप जानते हैं कि ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में इस छद्म के लिए एक खास शब्द है, और वह शब्द है: होक्स(HOAX). हिन्दी में इसे कहा जा सकता है, झांसे बाजी!.
धन्यवाद.
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इण्डिया टुडे कॉनक्लेव में दिनांक 26 फरवरी, 2005 को ‘स्पिरिचुअलिटी, हलो ऑर होक्स’ सत्र में दिया गया व्याख्यान.

Sunday, September 21, 2008

व्यवस्था का सच

कल्पना कीजिए एक ऐसे देश की जहां यह सोचना तक अपराध माना जाए कि कोई अपराध हुआ है. और फिर भी अगर आप ऐसा सोच लें तो उसे देश के प्रति काबिले-सज़ा अपराध मान लिया जाए और आपको या तो किसी दूरस्थ दुर्गम प्रदेश में सश्रम कारावास दे दिया जाए या फिर बिना सुनवाई के ही खत्म कर दिया जाए. एक ऐसा देश जहां आपके पडौसी ही आपको देशद्रोही घोषित कर सकते हों या पुलिस बिना किसी वजह के आपके घर की तलाशी ले सकती हो. ऐसा देश जहां कोई भी, आपका अपना परिवार तक, भरोसे के काबिल न हो. कहां है ऐसा देश? ऐसा देश है 28 वर्षीय लन्दन निवासी लेखक टॉम रॉब स्मिथ के हाल ही में प्रकाशित और बहुचर्चित उपन्यास चाइल्ड 44 में.

विज्ञान कथा लेखक जेफ नून की एक कहानी का रूपांतर करते हुए 28 वर्षीय टॉम रॉब स्मिथ का सामना एक रूसी सीरियल किलर आन्द्रेई चिकातिलो के वृत्तांत से हुआ. चिकातिलो ने 50 से ज़्यादा औरतों और बच्चों की हत्या की थी. 1944 में उसे फांसी हुई. इस वृत्तांत ने स्मिथ को पचास के दशक के स्टालिन कालीन सोवियत रूस के जीवन पर आधारित यह उपन्यास लिखने को प्रेरित किया. बकौल स्मिथ, यह उपन्यास उनके तीन उपन्यासों की श्रंखला में पहला है. इन दिनों वे इस श्रंखला के दूसरे उपन्यास पर काम कर रहे हैं.

उपन्यास चाइल्ड 44 की कथा का केन्द्रीय चरित्र है एम जी बी (रूसी गुप्तचर संस्था) का एक अफसर लियो स्टेपानोविच. लियो अपनी सरकार और उसकी नीतियों में शत प्रतिशत विश्वास रखता है. सरकार जिस किस्म की अन्धी वफादारी अपने नागरिकों से चाहती है, उसमें उसे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन, स्टालिन कालीन रूस में होता यह है कि शिकारी खुद ही शिकार हो जाता है. अफसर लियो को इन अफवाहों का खात्मा करने का आदेश मिलता है कि उसके एक जूनियर सहकर्मी फ्योदोर के चार वर्षीय बेटे की हत्या हुई है. इस मृत्यु के बारे में सरकारी रिपोर्ट में कहा गया था कि यह रेल की पटरियों पर हुई एक सामान्य दुर्घटना है, जबकि इस रिपोर्ट पर न फ्योदोर को भरोसा था न उनके पडौसियों को. उनका मानना था कि बालक के शव को रेल की पटरियों पर डालने से पहले उस पर नृशंस प्रहार किए गए थे. अफसर लियो, तत्कालीन सरकार की ही तरह, मानता है कि श्रमिकों के उस स्वर्णिम स्वर्ग में, जहां कि हर नागरिक को उसकी ज़रूरत की हर चीज़ सुलभ है, अपराध जैसी कोई चीज़ बची ही नहीं है. अगर कुछ बचा है तो वह है बाहर की दुनिया के भ्रष्टों के हमले. तो, सरकार का वफादार लियो अपनी ड्यूटी निबाहता हुआ फ्योदोर को सरकारी रिपोर्ट पर सन्देह करने के खतरों से आगाह करता है. जैसा उस समय का माहौल था, फ्योदोर चुप हो जाता है, लेकिन उसके मन में लियो के प्रति एक गांठ ज़रूर पड़ जाती है. एक दूसरे प्रकरण में, जब लियो की की हुई जांच और उसका निर्णय सन्देह के घेरे में आता है तो फ्योदोर को बदला लेने का मौका मिल जाता है.
कथा आगे बढती है. वह तर्क जो अब तक लियो दूसरों पर लागू करता रहा है, कि जो व्यक्ति किसी भी बात पर सन्देह करता है, वह स्वयं सन्दिग्ध होता है, दमनकारी शासन द्वारा खुद उस पर चस्पां कर दिया जाता है. उसकी निष्ठा की परख के लिए उसे आदेश दिया जाता है कि वह वह अपनी ही पत्नी रईसा की जासूसी करे. जांच की उलझन को भला लियो से ज़्यादा कौन समझ सकता है! अगर उसने यह कहा कि रईसा देश की वफादार नागरिक है तो वह खुद सन्देह के घेरे में आ जाएगा. उलझन का अंत होता है, स्टालिन की मौत से. उसके अनुचरों की अनिश्चित स्थिति इस दम्पती को बहुत हलके-से दण्ड के साथ भाग छूटने का मौका देती है. लियो को पदावनत करके एक उजाड शहर में भेज दिया जाता है. यह क्या कम है कि उसे अपने प्राणों से हाथ न धोना पड़ा. लेकिन जो ज़िन्दगी उसे और उसकी पत्नी को मिलती है वह भी कम त्रासद नहीं है. अब धीरे-धीरे उस पर यह राज़ खुलता है कि अब तक वो जो मानता रहा है वह मिथ्या था. उसका काम कानून का निर्वाह कराने का था ही नहीं. वहीं उसे अनेक अपराधों और अपराधियों का पता चलता है. लेकिन तब भी, यह कहना कि अपराधी विद्यमान हैं, मुमकिन नहीं क्योंकि तब भी यही माना जाता था कि अपराधी तो पतनशील पूंजीवादी व्यवस्था में ही होते हैं, श्रमिकों के स्वर्ग में नहीं.
इसके बाद कथाकार इस दम्पती को असल हत्यारे की तलाश में लगा देता है और यहीं से उपन्यास एक थ्रिलर की गति पकड़ता है.
पूरा उपन्यास उस व्यवस्था की विसंगतियां उभारता है जिसका मानना है कि सन्दिग्ध को इतना सताओ कि वह अपना अपराध कुबूल कर ले. यह इसी व्यवस्था की विसंगति है कि असल अपराधी बच निकलते हैं. कथानायक लियो इस विसंगति से वाक़िफ होने के बाद जैसे प्रायश्चित स्वरूप कुछ बेहतर करना चाहता है, और इसमें बेशक उसे पाठकों की पूरी हमदर्दी हासिल होती है.
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Discussed book:
Child 44
A novel by Tom Rob Smith
Published by: Grand Central Publishing
448 pages Hardcove.
US $ 24.99

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' में 21 सितम्बर, 2008 को प्रकाशित आलेख का असम्पादित रूप.









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Wednesday, September 10, 2008

सच्चाई ज़रूरी है आज के अतिवादी समय में

पुलिट्ज़र पुरस्कार विजेता पत्रकार रोन सस्किण्ड की हाल ही में प्रकाशित किताब ‘द वे ऑफ द वर्ल्ड: ए स्टोरी ऑफ ट्रुथ एण्ड होप इन एन एज ऑफ एक्स्ट्रीमिज़्म’ ने इन दिनों अमरीका को बड़ी असहज स्थिति में डाल रखा है. किताब में कुछ बेहद सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किए गए हैं. बात इतनी आगे बढ़ गई है कि सीनेट सेलेक्ट कमिटी ऑन इण्टेलीजेंस और हाउस ज्यूडिशियरी कमिटी को कहना पड़ा है कि रोन ने जो खुलासे किए हैं, उनकी पड़ताल की जाएगी. वैसे, जैसा इस तरह के मामलों में हमेशा होता है, सम्बद्ध पक्षों ने खण्डन का कर्मकाण्ड पूरा कर लिया है. आखिर रोन ने ऐसा क्या कह दिया है इस किताब में? रोन ने कहा है कि 2003 में व्हाइट हाउस ने अमरीकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए को आदेश दिया था कि वह ईराक़ और अल-कायदा की नज़दीकी प्रकट करने वाले जाली दस्तावेज़ तैयार और प्रचारित करे. आदेश का पालन करते हुए सी आई ए ने एक जाली पत्र तैयार किया. पत्र ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख हाब्बुश ने सद्दाम हुसैन को ‘लिखा’ था. एक जुलाई 2001 की तारीख वाले इस पत्र में कहा गया कि 9 सितम्बर की घटना के रिंग लीडर मोहम्मद अत्ता को इस काण्ड के लिए ईराक़ में प्रशिक्षित किया गया. रोन कहते हैं कि इस जाली पत्र ने व्हाइट हाउस की सारी समस्याएं हल कर दीं.
रोन की यह किताब अनेक दस्तावेज़ी साक्ष्यों के हवाले से बताती है कि बुश प्रशासन युद्ध के कई सप्ताह पहले ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख से यह जान चुका था कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार नहीं हैं. लेकिन इस सच्चाई को झुठलाते हुए ईराक़ी गुप्तचर सेवा के प्रमुख से अमरीकियों को यह भरोसा दिलवाने वाला पत्र लिखवाया गया कि ईराक़ के पास महाविनाश के हथियार हैं और उसकी संलग्नता अल-क़ायदा के साथ है. अमरीका ने गुप्तचर सेवा प्रमुख को इस ‘सेवा’ के बदले पचास लाख डॉलर प्रदान किए.
ये और ऐसे अनेकानेक सनसनीखेज खुलासे करते हुए पुस्तक के लेखक रोन सस्किण्ड कहते हैं कि एक देश के रूप में अमरीका पथभ्रष्ट हो गया है और वह नैतिक सत्ता, जो कि उसके अस्तित्व का आधार है, उसके हाथ से फिसल चुकी है. रोन बेहद भावपूर्ण शब्दों में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं कि इस समय की सबसे बड़ी चुनौती -आतंकवादियों के हाथों में आणविक हथियार– का सामना करने वाली नैतिक नेतृत्व क्षमता अमरीका खो चुका है. किताब के अनेक केन्द्रीय विचारों में से एक है कथनी और करनी के बीच की बढती खाई, अमरीकी सरकार और अधिकारियों द्वारा की जाने वाली नैतिकता की बड़ी-बड़ी बातें, हवाई वक्तव्य और उनके बरक्स उसकी काली करतूतें. किताब में एक जगह बेनज़ीर भुट्टो को यह कहते हुए उद्धृत किया गया है, “रोन, मैं अपनी तमाम ज़िन्दगी इन प्रजातांत्रिक मूल्यों की बात करती रही हूं, लेकिन पिछले महीने ही मुझे उनकी ताकत का एहसास हुआ है.” किताब में खूब सारी घटनाएं और अनेक याद रह जाने वाले किरदार हैं. बेनज़ीर भुट्टो मुशर्रफ से पूछती हैं कि क्या उनकी जान की रक्षा की जाएगी? और इसके जवाब में मुशर्रफ कहते हैं कि “यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारे रिश्ते कैसे रहते हैं. इसे अच्छी तरह समझ लें.” रोन टिप्पणी करते हैं कि यह उत्तर किसी माफिया डॉन की धमकी जैसा लगता है. रोन यह भी बताते हैं कि अपने आखिरी दिनों में बेनज़ीर को यह समझ में आ गया था कि अमरीका ने आदर्श को एक तरफ रख कर अवैध सत्ता से हाथ मिलाते हुए उन्हें दर किनार करना शुरू कर दिया था.
किताब अमरीकी सरकार द्वारा मानवाधिकार हनन के अनेक प्रसंगों, और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर किए जाने वाले अगणित हमलों के प्रसंग उजागर करती हुई ऐसे अनेक चरित्रों को सामने लाती है जो अन्धेरे में रोशनी की मानिन्द हैं. ऐसा ही एक चरित्र है संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी आयुक्त वेण्डी चेम्बरलिन का. वेण्डी कहती हैं, “अगर पूरे दिन के काम के बाद, शाम को आप यह पाएं कि आपने अपनी शपथ का पूरा निर्वाह किया है तो फिर आपका कोई शत्रु हो ही नहीं सकता, और अगर हो भी तो वह अपराजेय नहीं हो सकता.”
किताब आज के आपाधापी और मूल्यहीनता के समय में, जबकि सच्चाई, न्याय और जवाबदेही केवल शब्दों तक सिमट कर रह गई है नैतिक मूल्यों की ज़रूरत को बहुत प्रखरता से रेखांकित करती है.
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Discussed book:
The Way of the World: A Story of Truth and Hope in an Age of Extremism
By Ron Suskind
Published by Harper
432 pages , Hardcover
US $ 27.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' में 07 सितम्बर, 2008 को प्रकाशित आलेख का असम्पादित रूप.








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