संस्कृति और अमरीकी जीवन के गहन अध्येता और एमॉरी विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर मार्क बॉयेर्लाइन की नई किताब ‘द डम्बेस्ट जनरेशन: हाउ द डिजिटल एज स्टुपिफाइज़ यंग अमरीकन्स एण्ड जिओपार्डाइजेज़ अवर फ्यूचर’ अमरीका की तीस साल तक की उम्र वाली वर्तमान पीढी के बौद्धिक खालीपन को जिस शिद्दत के साथ उजागर करती है वह हमें भी बहुत कुछ सोचने को विवश करता है. मार्क बेबाकी से कहते हैं कि सायबर कल्चर अमरीका को कुछ भी नहीं जानने वालों के देश में तब्दील करती जा रही है. वे चिंतित होकर पूछते हैं कि अगर किसी देश की नई पीढी का समझदार होना अवरुद्ध हो जाए तो क्या वह देश अपनी राजनीतिक और आर्थिक श्रेष्ठता कायम रख सकता है?
वैसे तो पॉप कल्चर और युवा पीढी पर उसके प्रभावों को लेकर काफी समय से बहस हो रही है. वर्तमान डिजिटल युग जब शुरू हुआ तो बहुतों ने यह आस बांधी थी कि इण्टरनेट, ई मेल, ब्लॉग्ज़, इण्टरएक्टिव वीडियो गेम्स वगैरह के कारण एक नई, अधिक जागरूक, ज़्यादा तीक्ष्ण बुद्धि वाली और बौद्धिक रूप से परिष्कृत पीढी तैयार होगी. इंफर्मेशन सुपर हाइवे और नॉलेज इकोनॉमी जैसे नए शब्द हमारी ज़िन्दगी में आए और उम्मीद की जाने लगी कि नई तकनीक के इस्तेमाल में दक्ष युवा अपने से पिछली पीढी से बेहतर होंगे. लेकिन, दुर्भाग्य, कि यह आस आस ही रही. जिस तकनीक से यह उम्मीद थी कि उसके कारण युवा अधिक समझदार, विविध रुचि वाले और बेहतर सम्प्रेषण कौशल सम्पन्न होंगे, उसका असर उलटा हुआ. ताज़ा रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमरीका की नई पीढी के ज़्यादातर लोग न तो साहित्य पढते हैं, न म्यूज़ियम्स जाते हैं और न वोट देते हैं. वे साधारण वैज्ञानिक अवधारणाएं भी नहीं समझ-समझा सकते हैं. उन्हें न तो अमरीकी इतिहास की जानकारी है और न वे अपने स्थानीय नेताओं को जानते हैं. उन्हें यह भी नहीं पता कि दुनिया के नक्शे में ईराक या इज़राइल कहां है. इन्हीं सारे कारणों से मार्क बॉयेर्लाइन ने उन युवाओं को, जो अभी हाई स्कूल में हैं, द डम्बेस्ट जनरेशन का नाम दिया है. बॉयेर्लाइन ने जो तथ्य दिए हैं वे बहुत अच्छी तरह यह स्थापित करते हैं कि आज का युवा डिजिटल मीडिया के माध्यम से और ज़्यादा आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है. वह नई तकनीक का इस्तेमाल किताब पढने या पूरा वाक्य लिखने जैसी गतिविधियों से अलग जाकर सतही, अहंकारवादी और भटकाने वाली ऑन लाइन दुनिया में रत रहने में कर रहा है. बॉयेर्लाइन यू ट्यूब और माय स्पेस का नाम लेते हैं और कहते हैं कि इन और इन जैसे दूसरे वेब अड्डों पर युवाओं ने अपनी मनचाही जीवन शैली विषयक सामग्री की भरमार कर रखी है और वे इस संकुचित परिधि से बाहर नहीं निकलते हैं. मार्क इस मिथ को भी तोडते हैं कि इण्टरनेट में बढती दिलचस्पी ने युवाओं के बुद्धू बक्सा-मोह को कम किया है. वे आंकडों के माध्यम से स्थापित करते हैं कि युवाओं ने इण्टरनेट को दिया जाने वाला समय मुद्रित शब्द से छीना है और उनका टी वी प्रेम तो ज्यों का त्यों है. मार्क बताते हैं कि 1981 से 2003 तक आते-आते पन्द्रह से सत्रह साल वाले किशोरों का फुर्सती पढने का वक़्त अठारह मिनिट से घटकर सात मिनिट रह गया है.
इससे आगे बढकर मार्क यह भी कहते हैं कि 12 वीं कक्षा के छियालीस प्रतिशत विद्यार्थी विज्ञान में बेसिक स्तर को भी नहीं छू पाते हैं, एडवांस्ड स्तर तक तो महज़ दो प्रतिशत ही पहुंचते हैं. यही हाल उनकी राजनीतिक समझ का भी है. हाई स्कूल के महज़ छब्बीस प्रतिशत बच्चे नागरिक शास्त्र में सामान्य स्तर के हैं. नेशनल असेसमेण्ट ऑफ एज्यूकेशनल प्रोग्रेस की इसी रिपोर्ट के अनुसार बारहवीं कक्षा के बच्चों में 1992 से 2005 के बीच पढने की आदत में भी भारी कमी आई है. इस कक्षा के केवल चौबीस प्रतिशत बच्चे ही ठीक-ठाक वर्तनी और व्याकरण वाला काम-चलाऊ गद्य लिख सकने में समर्थ हैं. यही हाल उनकी मौखिक अभिव्यक्ति का भी है.
मार्क का निष्कर्ष है कि आज की सांस्कृतिक और तकनीकी ताकतें ज्ञान और चिंतन के नए आयाम विकसित करने की बजाय सार्वजनिक अज्ञान का एक ऐसा माहौल रच रही है जो अमरीकी प्रजातंत्र के लिए घातक है. मार्क जो बात अमरीका के लिए कह रहे हैं, विचारणीय है कि कहीं वही बात भारत के युवा पर भी लागू तो नहीं हो रही? खतरे की घण्टी के स्वरों को हमें भी अनसुना नहीं करना चाहिए. ◙◙◙
Discussed book: The Dumbest Generation: How the Digital Age Stupefies Young Americans and Jeopardizes Our Future By Mark Bauerlein Published By: Tarcher 273 pages, Hardcover US $ 24.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 29 मई 2008 को प्रकाशित.
न्यूज़वीक के सम्पादक, भारत में जन्मे और लम्बे समय से न्यूयॉर्क में रह रहे फरीद ज़करिया की एकदम ताज़ा किताब ‘द पोस्ट-अमेरिकन वर्ल्ड’ अर्थात उत्तर अमरीकी दुनिया, एक ऐसे भावी परिदृश्य की कल्पना करती है जिसमें आज का सर्वशक्तिमान अमरीका न तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का नियंता है, न भू-राजनीति का संचालक और न संस्कृतियों का परिचालन कर्ता. ज़करिया को चीन, भारत, ब्राज़ील, रूस और कई अन्य देशों का उत्थान, जिसे वे ‘राइज़ ऑफ द रेस्ट’ का नाम देते हैं, एक ऐसी परिघटना नज़र आता है जो दुनिया की तस्वीर बदल देने वाला है. दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें, सबसे बडे बांध, सबसे ज़्यादा चलने वाली फिल्में और नवीनतम सेलफोन – इन सबका निर्माण अमरीका के बाहर ही हो रहा है. और, बावज़ूद इसके कि विश्व की आबादी बढ रही है, कम से कम दुनिया के तीन चौथाई देशों में अत्यधिक गरीबी में रह रहे लोगों की संख्या में कमी हो रही है.
ज़करिया लिखते हैं कि अब तक तो अमरीका एक राजनैतिक और सैन्य महाशक्ति है, लेकिन इन दो को छोडकर शेष तमाम क्षेत्रों में शक्ति संतुलन की तस्वीर बदलती जा रही है. औद्योगिक, वित्तीय, शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक – इन सारे क्षेत्रों में अमरीकी वर्चस्व के गढ ढहते जा रहे हैं. चीन, भारत और अन्य उभरते बाज़ारों तथा दुनिया के बडे भाग में हो रहे आर्थिक विकास और दुनिया के लगातार विकेन्द्रिकृत और आपस में जुडते जाने की वजह से हम एक ऐसी उत्तर-अमरीकी दुनिया की तरफ बढ रहे हैं जिसे कई जगहों से कई लोग परिभाषित और निर्मित कर रहे हैं.
ज़करिया कहते हैं कि हमारा दौर पिछले 500 बरसों के तीसरे महान टेक्टॉनिक पॉवर शिफ्ट का दौर है. पहला दौर था आधुनिकता, विज्ञान, तकनीक, वाणिज्य, पूंजीवाद, कृषि और औद्योगिक क्रांति का, जिसे हम पश्चिम के अभुदय का दौर भी कह सकते हैं. दूसरा दौर बीसवीं शताब्दी में अमरीका के उत्थान का दौर था. और तीसरा यानि वर्तमान दौर है ‘राइज़ ऑफ द रेस्ट’ का जिसमें चीन और भारत अपने पास (और दूर भी) बडी शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं, रूस अधिक आक्रामक हो रहा है और बाज़ार तथा अर्थशास्त्र के क्षेत्र में यूरोप अधिक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण ढंग से सक्रिय हो रहा है.. ज़करिया संस्मरणात्मक होते हुए लिखते हैं कि अस्सी के दशक में जब वे भारत आते तो पाते थे कि यहां के ज़्यादातर लोग अमरीका से अभिभूत थे. इस भाव के मूल में अमरीका का शक्तिशाली होना या कोई अन्य बौद्धिक कारण नहीं थे. अक्सर लोग उनसे, यानि ज़करिया से, डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में पूछते क्योंकि वही अमरीका का प्रतीक था - चमकदार, अमीर और आधुनिक! ट्रम्प इस विचार का मूर्त रूप था कि अगर आप कुछ भी बडा करना या पाना चाहते हो तो अमरीका में ही कर या पा सकते हैं. लेकिन, आज, मनोरंजन की दुनिया को छोड दें तो अमरीकी व्यक्तित्वों में किसी की दिलचस्पी नहीं बची है. आप भारत के अखबार पढिए, यहां का टी वी देखिए. आप पाएंगे कि यहां के अनेक व्यापारी डोनाल्ड ट्रम्प से ज़्यादा अमीर हैं. आज भारतीयों के पास अपने अभिभूतकारी रियल एस्टेट धनपति हैं. और, जैसा भारत में हो रहा है, वैसा ही दुनिया के अधिकतर देशों में हो रहा है.
ज़करिया एक अहम बात यह कहते हैं कि यह ‘राइज़ ऑफ द रेस्ट’ अमरीकी विचारों और कृत्यों का ही परिणाम है. पिछले साठ सालों से अमरीकी राजनेता और राजनयिक दुनिया भर में मुक्त बाज़ार, मुक्त राजनीति तथा व्यापार और तकनीक के गठजोड की वकालत करते घूम रहे हैं. उसी का परिणाम है कि आज दुनिया के अनेक देश अमरीका के समकक्ष खडे हो गए हैं. सवाल यह है कि इस तेज़ी से बदलती जा रही, एक ध्रुवीय दुनिया में अमरीका की भूमिका क्या होगी? ज़करिया की सलाह है कि अमरीका को अपने हठधर्मी पूर्ण और आदेश देने वाले महाशक्ति के रूप को त्याग कर अन्य देशों से निकट और समानता के सम्बन्ध बनाने होंगे और उन्हें सलाह देनी होगी, उनसे सहयोग करना होगा, यहां तक कि उनसे समझौते भी करने होंगे. इस नई दुनिया में अमरीका की भूमिका एक वैश्विक दलाल की ही हो सकती है.
ज़करिया की एक बडी चिंता इस बात को लेकर है कि दुनिया के एक साथ कई देशों का विकास के पथ पर अग्रसर होना, और किसी नियंत्रक महाशक्ति का न होना, किसी बडे गडबडझाले का कारण हो सकता है. उनका कहना है कि आर्थिक वैश्वीकरण से विकास आता है और विकास के साथ ही आता है राष्ट्रवाद भी. राष्ट्रीय गर्व का यह भाव स्वभावत: सहयोग-भाव को घटाता है. और यही है आज की और कल की दुनिया की सबसे बडी विडम्बना और सबसे बडी चिंता. ज़करिया से इसका हल पूछें तो वे कहते हैं : हॉरिजॉण्टल, नॉट वर्टिकल; को-ऑपरेटिव, नॉट हायरार्किकल!
◙◙◙ Discussed book: The Post-American World By Fareed Zakaria Published by: Norton, W.W. & Company, Inc. Hardcover. 288 Pages. US $ 25.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 22 मई 2008 को प्रकाशित.
पति पत्नी कार में कहीं जा रहे हैं. पत्नी पूछती है, “आप कॉफी के लिए कहीं रुकना चाहेंगे?” ”नहीं, धन्यवाद!” पति ईमानदारी से जवाब देता है और यात्रा जारी रहती है. परिणाम? दरअसल पत्नी जो खुद कॉफी के लिए रुकना चाहती थी, यह सोच कर नाराज़ हो जाती है कि पति ने उसकी इच्छा का मान नहीं रखा. उधर, पत्नी को नाराज़ देख पति भी परेशान हो जाता है और समझ नहीं पाता कि पत्नी कॉफी पीना ही चाहती थी तो साफ-साफ क्यों नहीं बोली?
इस प्रकरण में पति तो यह नहीं समझ सका कि पत्नी ने जो पूछा था, उसका असल मक़सद पूछना नहीं, संवाद शुरू करना था, और पत्नी यह नहीं महसूस कर सकी कि पति ने जब कॉफी के लिए मना किया तो उसने महज़ अपनी पसन्द ज़ाहिर की थी, कोई हुक्म नहीं दिया था. हम सब की ज़िन्दगी में अक्सर ऐसा होता है. जब स्त्री और पुरुष अपनी-अपनी तरह से भाषा को बरतते हैं तो उसकी परिणति एक दूसरे पर स्वार्थी और ज़िद्दी होने का इलज़ाम लगाने में होती है.
जॉर्ज़ टाउन विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान की प्रोफेसर और विख्यात समाज-भाषा वैज्ञानिक डेबोराह तान्नेन ने अपनी नई किताब यू जस्ट डॉण्ट अण्डर स्टैण्ड : वुमन एण्ड मेन इन कन्वर्सेशन में स्त्री और पुरुष द्वारा भाषा के इसी भिन्न व्यवहार पर गहन किंतु रोचक विमर्श किया है. उनका स्पष्ट मत है कि ज़्यादातर स्त्रियां बातचीत को सम्पर्क और संवाद के लिए प्रयोग करती हैं जबकि पुरुष इसका प्रयोग सामाजिक हैसियत अर्जित करने या बनाए रखने के लिए और ज्ञान देने के लिए करते हैं. डेबोराह ने स्त्रियों की बातचीत को निजी बातचीत (रैपो टॉक) और पुरुषों की बातचीत को सार्वजनिक बातचीत (रिपोर्ट टॉक) की संज्ञा दी है. लेखिका ने अनेक उदाहरणों से यह समझाया है कि स्त्रियां सहेलियों और प्रेमियों से बात करके निकटता स्थापित करती हैं. वे अपनी समस्याओं का साझा भी करती हैं. लेकिन पुरुष प्राय: ऐसा नहीं करते. अगर स्त्री उनके सामने कोई समस्या रखती है तो वे तुरंत उसका समाधान पेश करते हैं. तब, स्त्री को लगता है कि पुरुष उसकी समस्या में रुचि नहीं ले रहा है. स्त्री को सुनने वाले की चाहना थी, न कि समाधान देने वाले की. तब, पुरुष शिकायत करता है कि स्त्री तो अपना ही रोना रोती रहती है, और समाधान में उसकी कोई रुचि नहीं है. पुरुष की इस शिकायत के मूल में है स्त्री की आधारभूत प्रकृति से उसका अपरिचय. खुद पुरुष किसी से अपनी समस्या की चर्चा तब तक नहीं करता जब तक कि उसे समाधान की ज़रूरत न हो. इस बात के उदाहरण के रूप में डेबोराह लिखती हैं, “जब मेरी मां मेरे पिता से कहती हैं कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो मेरे पिता उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास चलने को कहते हैं. उनकी यह प्रतिक्रिया मेरी मां को अच्छी नहीं लगती. पिता समस्या का समाधान पेश करते हैं जबकि मां केवल उनकी सहानुभूति चाहती हैं.”
स्त्री और पुरुष भाषा की भिन्नता की खोज करते हुए डेबोराह ने लडके और लडकियों के खेलने के तौर-तरीकों का भी विश्लेषण किया है. वे बताती हैं कि लडके बडे समूहों में और प्राय: बाहर खेलने में रुचि रखते हैं. उनके समूह में एक पदानुक्रम भी होता है, यानि एक ग्रुप लीडर होता है जो सबको हुक्म देता है. लडकों के खेल-में हार-जीत भी होती है. इसके विपरीत, लडकियां अक्सर छोटे समूह में या जोडियों में ही खेलना पसन्द करती हैं और हरेक की कोई न कोई बेस्ट फ्रेंण्ड होती है. उनके यहां कोई आदेश नहीं दिए जाते. लडकियों के लिए निकटता महत्वपूर्ण होती है. उनके खेलों में हार-जीत भी नहीं होती. उनकी प्रकृति का यह अंतर उनकी संवाद शैली का भी निर्माण करता है.
लेखिका ने स्त्री और पुरुष संवादों की तह में जाकर खोजा है कि हर स्त्री अंतत: एक ही बात पूछती है: क्या तुम मुझे पसन्द करते हो? और इसी तरह हर पुरुष भी एक ही बात पूछता है: क्या तुम मेरा सम्मान करते/करती हो?
निष्कर्ष के रूप में डेबोराह सलाह देती हैं कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही एक-दूसरे की संवाद शैली की मूलभूत भिन्नताओं को समझना चाहिए. जैसे, स्त्रियां जैसी बातें अपनी सहेलियों से करती हैं वैसी ही बातें अगर अपने पुरुष मित्रों से भी करेंगी तो यह उन्हें अपनी सहेली में तब्दील करने जैसा होगा. और इसी तरह, पुरुष को भी यह समझना चाहिए कि जब कोई स्त्री उससे मुखातिब है तो वह दर असल कुछ कह नहीं रही बल्कि अपने रिश्ते को मज़बूत करने की चेष्टा कर रही है. वे कहती हैं कि दोनों को किसी मध्य बिन्दु तक आने का प्रयास भी करना चाहिए. कुल मिलाकर, अगर स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दूसरे से यह उम्मीद करना बन्द कर दें कि वे उन्हीं की तरह संवाद करेंगे तो ज़िन्दगी ज़्यादा खूबसूरत हो सकती है. ◙◙◙
Discussed book: You Just Don’t Understand: Women and Men in Conversation By Deborah Tannen Published by Harper Collins Publishers 352 pp US $ 13.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 15 मई 2008 को प्रकाशित.
लाइफ पत्रिका के पूर्व सम्पादक बिल शापिरो को एक पुराना खत मिला. यह खत उस महिला का था, जिससे कभी वे डेटिंग किया करते थे. खत उस महिला को किसी ने तब लिखा था जब शापिरो उसकी ज़िन्दगी में नहीं आए थे. इस खत ने शापिरो को यह सोचने को प्रेरित किया कि किसी के लिए ऐसे खतों की क्या अहमियत हो सकती है, और क्यों ऐसा होता है कि कुछ लोग तो ताज़िन्दगी खतों को सीने से लगाए रहते हैं और कुछ उन्हें बिल्कुल भी महत्व नहीं देते! सोच का सिलसिला आगे बढा तो वे अपने मित्रों-परिचितों से उनके प्रेम-पत्र प्राप्त करने में जुट गए. अपनी तलाश को और भी विस्तार देते हुए उन्होंने लोगों के घरों की टाण्डों, अलमारियों, यहां तक कि उनके सिगार और शू बॉक्सेज़ तक़ को टटोल लिया. इस तरह उनके हाथ लगा विविध वर्णी, असल प्रेम पत्रों का एक बडा खज़ाना. इन खतों में थी सम्वेदनाओं की नाज़ुकी, रिश्तों की कमनीयता, अभिव्यक्ति की बेबाकी, मन का अपराध बोध, बेपनाह गुस्सा और भी न जाने क्या-क्या. लेकिन जो भी था, था बेहद ईमानदार क्योंकि ये खत केवल और केवल प्रेम करने वाले के लिए लिखे गए थे. इन सारे खतों में से चुनिन्दा खतों का खूबसूरत संकलन बिल शापिरो ने “अदर पीपुल्स लव लैटर्स: 150 लैटर यू वर नेवर मेण्ट टू सी” शीर्षक से प्रस्तुत किया है. ये खत एक बात तो यह साफ करते हैं कि आज का प्रेम केवल वरदान नहीं है. इन खतों के माध्यम से हम रिश्तों के एक ऐसे बडे कैनवस से रू-ब-रू होते हैं जिसमें उल्लास से लेकर अवसाद तक सब कुछ है. इन पत्रों को पढते हुए यह भी एहसास होता है कि हमारा समाज देह के पीछे किस हद तक पागल है, और यह भी कि इसका उसे अफसोस भी है. किताब में जो सामग्री है, उसे खत कहने में थोडी उदारता बरतनी पड रही है, क्योंकि जो कुछ यहां प्रस्तुत किया गया है वह सब पारम्परिक अर्थ में खत नहीं है. कहीं किसी पोस्टकार्ड पर कुछ घसीट दिया गया है, तो कहीं किसी पोस्ट-इट नोट पर ही कुछ लिख दिया गया है. कहीं किसी कॉकटेल नैपकिन पर कुछ लिख दिया गया है तो कहीं वह भी न मिलने पर माचिस की डिबिया का ही इस्तेमाल कर लिया गया है. ये पत्र क्योंकि अत्यंत साधारण लोगों के हैं, इनमें से कई की लिखावट ऐसी है कि उसे पढने में खासा प्रयत्न करना पडता है. वर्तनी और व्याकरण की भूलों की कोई कमी नहीं है. लेकिन यही सहजता इन पत्रों को उन पत्रों से अलग करके आत्मीय बनाती है जो पेशेवर लोगों की किताबों में मिलते हैं. इन पत्रों का दर्द और पश्चाताप इतना असल और हृदयस्पर्शी है कि आपको लगता है, जैसे आपने ही इन्हें जिया और लिखा है.
इन पत्रों की कालावधि खासी लम्बी है. पुलिस चीफ पीटर जे डोर्टी का 22 दिसम्बर 1911 को ‘डियरेस्ट लिज़ी’ को लिखा पत्र हमें पीछे ले जाता है तो ई मेल, टेक्स्ट मैसेज और यहां तक कि ब्लॉग्ज़ भी, हमें आज के समय में ले आते हैं. इन अलग-अलग काल खण्डों के पत्र यह भी साफ करते हैं कि ई मेल जैसी नई तकनीक लिखने की कला पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है. शब्दों के सधे और कलात्मक प्रयोग का स्थान अब दो-टूक और सपाट अभिव्यक्ति ले रही है. एक मेल का यह अंश देखें : ‘आज मेरे मन में फिर से दुष्ट विचार आ रहे हैं. क्या तुम उनके बारे में जानना चाहोगी?’ किताब प्रेम के बदलते स्वरूप का परिचय देने के साथ-साथ इस बात से भी आह्लादित करती है कि प्रेम के आरम्भिक दिनों का माधुर्य अगर बाद तक भी बना रहता है तो कितना प्रीतिकर हो जाता है. किताब में लम्बे समय से विवाहित कुछ युगलों के पत्र इस बात का एहसास कराते हैं. इसी तरह 1969 में वियतनाम से लिखा गया एक सैनिक का पत्र अपनी मार्मिकता में विलक्षण है.
शापिरो खतों को जस-का तस प्रस्तुत करके ही नहीं रुक गए हैं, उन्होंने इन पत्र लेखकों में से अनेक से बात करके यह भी जाना और बताया है कि बाद में उनके सम्बन्धों की परिणति क्या हुई. किताब का एक बडा आकर्षण इस बात में है कि इन सारे पत्रों को यहां उनके मूल रूप में, छाया के रूप में, प्रस्तुत किया गया है. इसलिए इन्हें पढने के साथ देखने का भी अनुभव जुड जाता है. हम सलवटों से भरे कागज़, मुडे-तुडे नैपकिंस, कीडे-मकोडों जैसी हस्त लिपि, फैली स्याही – इन सबसे बावस्ता होते हुए, यह जानते हुए भी कि दूसरों की निजी ज़िन्दगी में झांकना शालीनता के खिलाफ हैं, ऐसा करके स्वयं को समृद्ध करते हैं.
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Discussed book: Other People’s Love Letters: 150 Letters You Were Never Meant to See By Bill Shapiro (Editor) Published by: Crown Publishing Group 192 Pages, Hardcover 2007.
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 08 मई 2008 को प्रकाशित.
महाकवि कीट्स ने कहा था, सौन्दर्य सत्य है, और सत्य ही सौन्दर्य है. विश्व के अनेक बडे वैज्ञानिकों ने भी अपने कार्य द्वारा इस कथन को पुष्ट किया है. ब्रिटेन के सुविख्यात क्वांटम सिद्धांतकार डिराक ने शायद इसीलिए अपने कार्य को ‘खूबसूरत गणित की खोज’ कहा था. अनेकानेक वैज्ञानिक सौन्दर्यशास्त्री समीकरणों और तथ्यों के सुन्दर संयोजन पर मुग्ध होते रहे हैं. कुछ अन्यों ने शोधकर्म में ही सौदर्य के दर्शन किए हैं. ऐसे ही अन्यों की सूची में एक नाम और जुडा है. यह नाम है न्यूयॉर्क टाइम्स के विज्ञान लेखक जॉर्ज जॉनसन का. जॉर्ज की सद्य प्रकाशित किताब ‘द टेन मोस्ट ब्यूटीफुल एक्सपरीमेण्ट्स’ जैसे कीट्स के उपरोक्त कथन का ही विस्तार है. यहां जॉर्ज ने आधुनिक विज्ञान के चार शताब्दियों के इतिहास को खंगाल कर परिकल्पना की साहसिकता, सामग्री के संयोजन, व्याख्या की गहनता और परिणामों की महत्ता की खूबसूरती को चिह्नित किया है.
जॉर्ज ने इस किताब की प्रस्तावना में लिखा है कि उन्होंने जान बूझकर ऐसे प्रयोगों को चुना है जो आज के औद्योगिकृत, विशाल, अरबों-खरबों डॉलर के खर्च, ढेरों-ढेर उपकरणों और किसी कॉर्पोरेशन के आकार वाली वैज्ञानिकों की बडी टीम के द्वारा किए जाने वाले प्रयोगों के काल से पहले के हैं. जॉर्ज अपने पाठक को उस काल में ले जाते हैं जब दुनिया को रहस्यपूर्ण शक्तियों से परिपूर्ण माना जाता था और वैज्ञानिक भी प्रकाश और विद्युत से चमत्कृत हो जाता था. इसके बाद जॉनसन हमें वैज्ञानिकों की उस पुरातन दुनिया में ले जाते हैं जहां कोई अकेला शोधकर्ता घर में ही बनाए गए उपकरण, या उसके भी बगैर, ज्ञान के दरवाज़े पर दस्तक दिया करता था. कुछ उदाहरण देखिए: न्यूटन का इन्द्रधनुष, पावलोव के कुत्ते या फिर एण्टोइन-लॉरेण्ट द’ लेवोइज़ियर की यह खोज कि ऑक्सीजन एक तत्व है. इस तरह के सादगी से किए गए प्रयोगों का बखान कर जॉनसन हमें उस दुनिया से मिलाते हैं जिसमें सारी शोध बेहद व्यावहारिक हुआ करती थी. वे कहते हैं कि ‘विज्ञान की महानतम खोजें अज्ञात से टकराने वाले एकल मस्तिष्कों की देन है.’ जॉनसन की इस किताब का हर वैज्ञानिक किसी न किसी अज्ञात की खोज करता है.
अपनी इस किताब के लिए जॉनसन ने दस ऐसे वैज्ञानिकों और उनके प्रयोगों को चुना है जिन्होंने अपनी तार्किकता, स्पष्टता और साक्षातता के दम पर अपने समय की हठवादिता को धराशायी किया. इस किताब में सुविख्यात और कम ख्यात या अलक्षित रह गए, दोनों तरह के प्रयोग हैं. पहला अध्याय ढाल पर से गेंदों को लुढका कर गति का अध्ययन करने वाले गैलिलियो के उस प्रयोग के बारे में है जिसे आधुनिक विज्ञान का संस्थापक प्रयोग माना जाता है. एक अन्य अध्याय आइज़ैक न्यूटन द्वारा रंगों की प्रकृति का अध्ययन करने के लिए प्रिज़्म का प्रयोग करने के बारे में है. एक अध्याय है विद्युत की व्याख्या करने वाले लुइगी गालवानी के बारे में. एक अन्य अध्याय में एडवर्ड मॉर्ले के साथ मिलकर प्रकाश की सतत गति निर्धारित करने वाले एल्बर्ट मिचेलसन के काम का विवरण है. एक अध्याय है कुत्तों वाले सुविख्यात प्रयोग द्वारा शरीर विज्ञान और स्नायु विज्ञान को गति प्रदान करने वाले इवान पावलोव के बारे में.
किताब इस सवाल पर भी विचार करती है कि वह क्या चीज़ है जो किसी वैज्ञानिक प्रयोग को सुन्दर बनाती है. कहना अनावश्यक है, जॉनसन सादगी के पक्षधर हैं. उन्हें वह प्रयोग सुन्दर लगता है जो सीधा-सादा किंतु कलात्मक हो. लेकिन केवल इतना ही नहीं. यह और कि ऐसा प्रयोग जो साधारण व्याख्याओं के ज़रिए बद्धमूल धारणाओं को ध्वस्त भी करता हो. जैसे, गैलिलियो ने सारे पदार्थों की गति पर समान गणित लागू कर अरस्तू के इस विचार को ध्वस्त किया कि भारी पदार्थ अधिक तीव्र गति से गिरते हैं. इसी तरह विलियम हारवे ने प्रचलित धारणा को तोडते हुए यह स्थापित किया कि पूरे शरीर में एक ही तरह का रक्त संचारित होता है. न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि रंग अपवर्तित प्रकाश किरणें मात्र हैं, जबकि उनसे पहले दकार्ते इन्हें ‘ईथर की घूमती गोलिआओं’ जैसी जटिल चीज़ घोषित कर चुके थे, और इसे आम स्वीकृति हासिल थी.
जॉनसन ने यह स्वीकार किया है कि इस किताब के लिए दस प्रयोगों का उनका चयन मनमाना है, लेकिन अपनी सफाई में उन्होंने यह भी कहा है कि इन सारे प्रयोगों को उन्होंने एक तो इनकी सादगी की वजह से और दूसरे इस वजह से कि ये विज्ञान के आधारभूत क्षेत्रों की पडताल करते हैं, चुना है. जॉनसन यह भी चाहते हैं कि उनके पाठक भी प्रयोगों की इस सूची में अपनी-अपनी पसन्द के प्रयोग जोडें.
जॉनसन का निष्कर्ष है कि वे वैज्ञानिक जिन्होंने दुनिया की जटिलताओं को समझ कर उनकी साफ-सुथरी व्याख्याएं कीं वे प्राचीन यूनान और रोम के उन वैज्ञानिकों के समतुल्य हैं जिन्होंने पत्थरों के ढेरों का अध्ययन कर भवन निर्माण के आधारभूत सिद्धांत बनाए. जॉनसन बहुत कुशलता से विज्ञान की खूबसूरती को रेखांकित करते हैं.
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Discussed book:
The Ten Most Beautiful Experiments
By George Johnson
Knopf Publishing Group
208 pp. Hardcover
US $ 22.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 1 मई 2008 को प्रकाशित.
माय फेयर लेडी, साउण्ड ऑफ म्यूज़िक और मेरी पॉपिंस की स्टार जूली एण्ड्र्यूज़ को सब जानते हैं, लेकिन जिन ऊबड-खाबड राहों पर चलकर वे इन शिखरों तक पहुंची वे तो अब तक अजानी ही थीं. जूली एण्ड्र्यूज़ ने बच्चों के लिए कई किताबें भी लिखी हैं. कुछ अकेले और कुछ अपनी बेटी के साथ मिलकर. उनके लिखे को खूब सराहा भी गया है. वे नियमितता से डायरी भी लिखती रही हैं. उन्हीं के आधार पर रचित होम: ए मेमोयर ऑफ माय अर्ली ईयर्स शीर्षक अपनी सद्य प्रकाशित आत्मकथा में उन्होंने 1935 में अपने जन्म से प्रारम्भ कर 60 के दशक के मध्य में फिल्मी दुनिया में धमाकेदार दस्तक के बाद वाल्ट डिज़्नी के साथ जुडने तक की जीवन यात्रा को प्रस्तुत किया है. वाल्ट डिज़्नी ने ही उन्हें 1963 में मेरी पॉपिंस में काम करने का अवसर दिया था. जूली की इस आत्मकथा का प्रारम्भ 1935 के इंग्लैण्ड से होता है जहां सरे नामक छोटे किंतु रमणीय गांव में कला क्षेत्र में स्थान बनाने की अभिलाषी मां बारबरा और सामान्य से लोहार-सुथार पिता टेड वेल्स के घर जूली का जन्म होता है. जूली का खूबसूरत बचपन आगे बढ पाता उससे पहले ही उसके मां-बाप में तलाक हो जाता है. कारण यह कि मां अपनी संगीत यात्राओं के साथी टेड एंड्र्यूज़ से प्यार करने लगती है. और अंतत: उससे विवाह कर लेती है. उनका परिवार सरे से लंदन आ जाता है और युद्धोत्तर लन्दन में हवाई हमलों की दहशत के बीच बडी होती है जूली. सौतेले पिता के साथ मां को भी म्यूजिकल थिएटर में अपनी कला प्रदर्शित करने का मौका मिलता है. नए पिता जूली को भी संगीत सीखने को प्रेरित करते हैं और उसी दौरान यह पता चलता है कि जूली की आवाज़ विलक्षण है. 12 साल की छोटी वय में तो उसे रॉयल कमाण्ड पर्फोर्मेंस में युवतम एकल गायिका होने का सम्मान मिल जाता है. जूली लिखती हैं कि जब वे गाना शुरू करतीं तो लगता कि जैसे कार्यक्रम वहीं थम जाता और लोग खडे होकर तालियां बजाने लगते. तालियां थमने का नाम ही नहीं लेतीं. इसी काल में जब वह करीब 15 साल की है उसकी मां यह रहस्योद्घाटन करती है कि उसके पिता उसके जैविक पिता नहीं थे. स्वाभाविक है कि उसे गहरा सदमा पहुंचता है. यही वह समय है जब जूली को कुछ समय लन्दन के स्लम्स में भी रहना पडा क्योंकि उसके मां बाप की आय बहुत सीमित थी. लेकिन जैसे-तैसे खुद को सम्भाल वह अपनी कला-साधना जारी रखती है और किशोरावस्था की देहली पर पहुंचते-पहुंचते तो वह अपनी स्टेज पर्फॉर्मेंस से पूरे परिवार का भरण पोषण तक करने लग जाती है. इस किशोरावस्था में जूली को कुछ ग्लैमरपूर्ण भूमिकाएं अदा करने का भी अवसर मिलता है, लेकिन विडम्बना यह कि जब वह ये भूमिकाएं अदा करती, उसके मोजे प्राय: फटे होते थे.
जब जूली 18 साल की होती है, उसे लन्दन पैलेडियम में एक पैंटोमाइम प्रस्तुत करने का मौका मिलता है और यह मौका उसके लिए ब्रॉडवे की एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति द बॉयफ्रैण्ड में एक महत्वपूर्ण भूमिका दिलाने का साधन बन जाता है. इसी से शुरू होता है उसका म्यूज़िकल कॉमेडी वाला दौर. इसके बाद तो रैक्स हैरिसन के साथ माय फेयर लेडी में काम करना जैसे दूर नहीं रह जाता है. लेकिन जूली माय फेयर लेडी की शूटिंग के दौरान रेक्स हैरिसन के लगभग अमानवीय व्यवहार को भी याद करना नहीं भूलती. वह रिचर्ड बर्टन के उस प्रणय निवेदन का भी ज़िक्र करती है, जिसे उसने करीब-करीब स्वीकार कर ही लिया था, बावज़ूद इस बात के कि तब उसने अपने बचपन के दोस्त टोनी वाल्टन से शादी की ही थी. किताब के अनेक मार्मिक प्रसंगों में से एक है प्रख्यात छायाकर सेसिल बीटन का प्रसंग. सेसिल घण्टों जूली का फोटो सेशन करता है और अंत में यह कहते हुए अपनी ही कला पर मुग्ध होता है कि जूली कितनी अनफोटोजीनिक है! जूली का यह आत्मकथात्मक वृत्तांत खत्म होता है ऑस्कर विजेता फिल्म मेरी पॉपिंस में उसके डेब्यू के साथ. लेकिन इससे पहले हमारे सामने एक लगभग साधारण युवती की ऐसी दारुण कथा उभरती है जिसके मनमौजी कण्ठ को असमय ही प्रौढ हो जाना पडा था (क्या आपको लता याद आती हैं?) और जिसे बेफिक्रे बचपन को भुलाकर एक संघर्ष भरी और जटिल पारिवारिक ज़िन्दगी का वरण करना पडा था (याद कीजिए रेखा को!) जूली से उसके एक विश्लेषक ने, जिसे किताब में कई बार उद्धृत किया गया है, एक बार पूछा था कि अपने मां बाप में से किससे उसे अधिक नफरत है? जूली ने बहुत कुशलता से इस सवाल को टाल दिया था. यह वृत्तांत पढते हुए लगता है कि वह किसका नाम लेती? मां बाप का तलाक, बचपन में ही स्टेज पर धकेल दिया जाना, पिता से जुदाई, मां का दुर्व्यवहार और उसका शराबी बन जाना, सौतेले पिता द्वारा की गई पिटाइयां और यदा-कदा उनके यौनिक दुर्व्यवहार - ये सब ऐसे आघात हैं जिनकी टीस उसे साठ बरस बाद भी महसूस होती है. यह वर्णन पढते समय ही हम उस भ्रम जाल से भी निकलते हैं जो जूली की बाद की वैभवपूर्ण ज़िन्दगी को देख हमारे मन में निर्मित होता है. इस वृत्तांत को पढकर एहसास होता है कि चन्द खुशकिस्मतों को छोड दें तो दुनिया में शायद ही ऐसा कोई मिले जिसे गरीबी, मौत, भूख, युद्ध, परिवार आदि के झंझटों में से किसी न किसी से न जूझना पडा हो. ◙◙◙
Discussed book: Home: A Memoir of My Early Years By Julie Andrews Published by: Hyperion Hardcover, 320 pages US $ 26.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 17 अप्रेल 2008 को प्रकाशित.
पीपुल्स एण्ड एम्पायर्स और यूरोपियन एन्काउण्टर्स विद द न्यू वर्ल्ड जैसी बहु प्रशंसित-चर्चित किताबों के लेखक, ब्रिटिश इतिहासकार एंथनी पग्डेन की ताज़ा किताब वर्ल्ड्स एट वार: द 2500 ईयर स्ट्रगल बिटवीन ईस्ट एण्ड वेस्ट लगभग साढे छह सौ पन्नों में सभ्यताओं के संघर्ष के ढाई हज़ार वर्षों के इतिहास की पडताल का विचारोत्तेजक प्रयास है.
किताब का प्रारम्भ उस प्राचीन विश्व के वर्णन से होता है जहां यूनान फारसी साम्राज्य के विरुद्ध अपने पहले संघर्ष को आज़ादी और गुलामी के, प्रजातंत्र और राजशाही के तथा वैयक्तिकता और ईश्वर के रूप में मनुष्य की पूजा के संघर्ष के रूप में देखता है. इसके बाद पग्डेन की कथा उस रोम में प्रवेश करती है जहां नागरिकता और नियामक कानून की आधुनिक अवधारणाओं ने जन्म लिया. बकौल पग्डेन, रोम के नेता अपने विजितों को स्वाधीन मानते थे, जबकि पूर्व में विजित विजेता की सम्पत्ति माने जाते थे. पग्डेन इसाई धर्म के जन्म और पश्चिम द्वारा उसे शासन का औज़ार बनाने का भी नाटकीय वर्णन करते हैं. दरअसल यहीं से धर्म निरपेक्ष और शेष ताकतों के बीच उस संघर्ष की शुरुआत होती है जो अब भी चल रहा है. इसके बाद आता है इस्लाम. और फिर पूर्व और पश्चिम के धार्मिक विश्वासों में टकराहट बढती जाती है. और फिर होती है चर्चा प्रथम विश्व युद्ध की. पग्डेन कहते हैं कि इसके अनेक छद्म उद्देश्यों में से एक था ताकत के बल पर मुस्लिम दुनिया को नए रूपाकार में ढालना. और आज तो पश्चिम, पूर्व पर अपनी तरह का प्रजातंत्र और अपनी तरह की धर्म निरपेक्षता थोपने के लिए प्रयत्नरत है. एक चेतावनी के साथ लेखक अपनी बात समेटता है: आतंकवाद और युद्ध तब तक खत्म नहीं होंगे जब तक कि धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणाएं साफ नहीं हो जातीं. * 1798 में जब नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी सेनाओं के साथ मिश्र में प्रवेश किया तो उसके मन में केवल सैन्य विजय का ही भाव नहीं था. तीस हज़ार सैनिकों के अलावा उसके साथ एक चल विश्वविद्यालय भी था जिसमें अर्थशास्त्री, कवि, वास्तुकार, खगोलशास्त्री यहां तक कि पेरिस ऑपेरा के गायक तक थे. इनके अलावा था हज़ारों किताबों का एक पुस्तकालय जिसमें मांटेस्क्यू, रूसो, मांतेन, वाल्टेयर और पश्चिमी धर्म-विधान के सारे क्लैसिक थे. इसके लगभग दो शताब्दी बाद, 1971 में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने एक प्राचीन फारसी महल के प्रांगण में विदेशी गणमान्य लोगों के लिए दो हज़ार मिलियन डॉलर खर्च कर एक शानदार जश्न आयोजित किया. मक़सद था शाह को महान डेरियस और ज़ेरेक्स का वंशज सिद्ध करना. इन दोनों प्रसंग के ज़रिए पग्डेन यह बताना चाहते हैं कि नेपोलियन और शाह, जो क्रमश: पश्चिम और पूर्व के प्रतिनिधि हैं, खुद को अपने-अपनी स्वर्णिम सभ्यताओं का वारिस मानते हैं. लेकिन, पग्डेन यह बताना भी नहीं भूलते कि दोनों में ही कुछ विलक्षणताएं भी हैं. स्विटज़रलैण्ड में शिक्षित शाह आधुनिकीकरण के धर्म निरपेक्ष समर्थक थे. जबकि नेपोलियन ने महज़ स्थानीय मौलवियों को खुश करने के लिए मिश्रियों के समक्ष यह घोषित किया कि वह पैगम्बर मुहम्मद साहब और पवित्र कुरान का आराधक है. किंवदंतियों, प्रसंगों और प्रभावशाली वृत्तांत के माध्यम से महज़ बारह अध्यायों में ढाई हज़ार वर्ष का इतिहास समेटते हुए पग्डेन नीरस इतिहास को जीवंत बनाने में कोई कसर नहीं छोडते. लेकिन इस रोचकता के बीच भी सजग पाठक यह लक्षित किए बगैर नहीं रहता कि जिसे हेरोडोटस ने स्थायी शत्रुता कहा था, उसे पश्चिम और पूर्व के बीच स्थापित करने के प्रयास में पग्डेन चीन, जापान, सुदूर पूर्व और भारत की करीब-करीब अनदेखी कर जाते हैं. दूसरे शब्दों में उनका पूर्व इस्लामी समाज तक सिमट कर रह गया है. एक और बात यह महसूस होती है कि यह किताब पूर्व और पश्चिम बीच कम, धर्म और एनलाइटनमेण्ट के बीच टकराव की कथा अधिक है, और उसमें भी लेखक के निशाने पर इस्लाम का वह अंश है जो चर्च और राज्य के बीच दूरी की पश्चिमी सोच से असहमति रखता है. पग्डेन ओसामा बिन लादेन को यह कहते हुए उद्धृत करते हैं कि पश्चिम का सबसे बडा अपराध यही है कि वह धर्म को अपनी राजनीति से अलग रखता है. पग्डेन मानते हैं कि अधिकांश मुस्लिम धर्मशास्त्री और न्यायविद इस बात से सहमत हैं. लगता तो यह भी है कि पग्डेन की इस्लाम की समझ उन मुल्ला-मौलवियों के कहे तक महदूद है जो हिंसा का समर्थन करते हैं. एक और महत्वपूर्ण बात यह भी कि किताब पूर्व को ‘सभ्य और आधुनिक’ बनाने के पश्चिम के सुदीर्घ और असफल किंतु हास्यास्पद प्रयासों को सामने ले आती है. निश्चय ही यह लेखक के अनचाहे ही हो गया है. अपनी इन सीमाओं के बावज़ूद किताब खासी रोचक और विचारोत्तेजक है. लेखक से इस बात पर तो सहमत होना ही पडता है कि पूर्व और पश्चिम के बीच बडा अंतर तो मूल्यों और संस्कृति का है, न कि अधिनायकवाद बनाम प्रजातंत्र का, या धार्मिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का, या मुस्लिम बनाम इसाई का. ◙◙◙ Discussed book: Worlds at War: The 2,500-Year Struggle between East and West By: Anthony Pagden Published by: Random House Hardcover, 656 pages US $ 35.00
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 10 अप्रेल, 2008 को प्रकाशित.
तारीख और साल ठीक से याद नहीं, लेकिन मंज़र ज्यों का त्यों मन के पर्दे पर अंकित है. मैं चित्तौड कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक था. एक दिन (अनुमान करता हूं कि '70 के आसपास की बात है) किसी ने घर की कॉल बैल बजाई. देखा, धर्मेन्द्र जैसा एक युवक है. सदाशिव श्रोत्रिय का घर तलाश रहा था. मैं भी कॉलेज में पढाता हूं इस कारण मेरे घर की घण्टी बजा दी. सदाशिव जी उसी कॉलेज में अंग्रेज़ी पढाते थे, और पास ही रहते थे. दिल के तो और भी ज़्यादा पास. मकान का पता बताने के सिलसिले में जाना कि पता पूछने वाला युवक स्वयंप्रकाश हैं. स्वयंप्रकाश के नाम से मैं सदाशिव श्रोत्रिय के कारण ही अधिक परिचित था तब तक, हालांकि स्वयंप्रकाश एक लेखक के रूप में खासे ख्यात हो चुके थे. उसी शाम सदाशिव जी ने हमें भी अपने घर बुला लिया और तब पहली बार ठीक से स्वयंप्रकाश से मुलाक़ात हुई. उस शाम स्वयंप्रकाश ने सदाशिव जी के घर के बाहर वाले चौक में बहुत सारे गीत-गज़ल सुनाए. रात भी है कुछ भीगी-भीगी, चांद भी है कुछ मद्धम मद्धम आज भी जब सुनता हूं तो मुझे लता मंगेशकर की बजाय स्वयंप्रकाश की आवाज़ में ही सुनाई पडता है. उस शाम और रात स्वयंप्रकाश ने बहुत सारी चीज़ें सुनाई. शायद मेहदी हसन की गाई कुछ गज़लें, किशोर कुमार के कुछ गीत, गोपाल सिंह नेपाली की एक कविता... 1974 में मेरा तबादला चित्तौड से सिरोही हो गया. सदाशिव श्रोत्रिय का बहुत प्यारा साथ छूट गया. बल्कि यों कहूं कि चित्तौड छोडने से बडा दर्द सदाशिव जी के सान्निध्य से वंचित होने का था, तो ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी. लेकिन नौकरी तो नौकरी है. अनमने मन से सिरोही आना पडा. जैसे तैसे व्यवस्थित हुए. अच्छा भी लगने लगा. इतना कि नौकरी और उम्र के कोई 25 साल उस कस्बे में गुज़र गए. लेकिन वह तो अलग किस्सा है. पता चला कि स्वयंप्रकाश पास ही के कस्बे सुमेरपुर में, जो सिरोही से महज़ 40 किलोमीटर की दूरी पर है, टेलीफोन विभाग में आर एस ए पद पर कार्यरत है. उन दिनों टेलीफोन आज की तरह आम नहीं खास था. टेलीफोन किसी आपात स्थिति में ही किया जाता था. खैर. स्वयंप्रकाश से सम्पर्क हुआ. कभी हम दोनों, बल्कि हमारे दोनों बच्चों को भी तो याद करें, चारों सुमेरपुर चले जाते, और कभी स्वयंप्रकाश सिरोही आ जाते. मेरा किराये का घर ऐसी जगह था कि मुम्बई से सुमेरपुर की तरफ जाने वाले वाहन ऐन मेरे घर के सामने से ही गुज़रते. तो अक्सर ऐसा होता कि स्वयंप्रकाश सुमेरपुर से किसी ट्रक में बैठ कर मेरे घर के सामने उतरते, या मैं, घर के बाहर ही खडा होकर किसी ट्रक को हाथ देकर रुकवाता, और सुमेरपुर जा पहुंचता. हम लोगों ने स्कूटर खरीद लिया तो जब भी मन करता स्कूटर उठाते और सुमेरपुर जा पहुंचते. दोस्ती धीरे-धीरे परवान चढने लगी. चालीस किलोमीटर की दूरी जैसे कोई दूरी थी ही नहीं. जवानी भी तो थी. हमारी भी, स्वयंप्रकाश की भी. उन दिनों न जाने कितनी बार स्वयंप्रकाश के साथ हमने अपने शांति नगर के उस छोटे-से घर के और भी छोटे कमरे में गीत-संगीत की महफिलें सजाईं. सिरोही के दोस्त जब भी इसरार करते, हम स्वयंप्रकाश को आवाज़ देते, और वे फौरन से पेश्तर चले आते. अपने उस छोटे-से कमरे में हमने स्वयंप्रकाश से उनका बहुत प्यारा गीत आज एक लडकी को नींद नहीं आएगी न जाने कितनी बार सुना है. उनकी अनेक क्रांतिकारी किस्म की कविताएं और भी बहुत सारी कविताएं, और कहानियां भी. नीलकांत का सफर को वे जिस बेहतरीन अन्दाज़ में सुनाते हैं, उसका तो कहना ही क्या. और मेहदी हसन, गुलाम अली, जगजीत की बेशुमार गज़लें. तब तक मैं भी साहित्य से अधिक गहराई से जुडने लगा था. और आज यह निस्संकोच स्वीकार करना चाहूंगा कि इस जुडाव में स्वयंप्रकाश की बहुत बडी भूमिका थी. उन्होंने मेरे साहित्य के संस्कारों को और संवारा. साहित्य में विचारधारा के महत्व से परिचित कराया. और आज मेरा जुडाव प्रगतिशील विचारधारा से है तो इसका सारा श्रेय स्वयंप्रकाश के उन दिनों के साथ को है. उन दिनों मेरे कॉलेज का हिन्दी विभाग भी बहुत सक्रिय था. हमने अनेक बार स्वयंप्रकाश को अपने विभाग के और कॉलेज के कर्यक्रमों में बुलाया. अक्सर बिना किराया तक दिये. पारिश्रमिक की तो बात ही क्या कीजिये. आज यह बात अजीब भी लगती है और मुझे लगता है कि यह मेरी मूर्खता भी थी. लेकिन थी, और की. स्वयंप्रकाश ने ऐसी मूर्खता करने की भरपूर छूट मुझे दी, और मैंने ली. उनसे भाषण करवाये, कविताएं सुनीं, पुरस्कार वितरित कराए. क्या-क्या नहीं किया. उन दिनों (अब स्वर्गीय) एम. के. भार्गव मेरे प्रिंसिपल थे. वे भी स्वयंप्रकाश से बहुत आत्मीयता रखते. अगर कुछ दिन बीत जाते तो खुद ही पूछ लेते कि क्या बात है स्वयंप्रकाश नहीं आए, और मैं संकोच से बताता कि आए तो थे, तो नाराज़ होते कि मिलवाया क्यों नहीं. अगर मेरे कॉलेज में कुछ भी खास होता तो स्वयंप्रकाश दौडे चले आते. मुझे याद आता है कि एक बार मैंने अपने कॉलेज में एम एस सथ्यु की अद्भुत फिल्म ‘गरम हवा’ का प्रदर्शन किया था. उससे अगले ही दिन स्वयंप्रकाश हमारे यहां आए. मैंने उनसे इस फिल्म का ज़िक्र किया तो वे भी इसे देखने को व्याकुल हो उठे. तब मैंने अपने कॉलेज के स्टाफ रूम में, रविवार के दिन खुद प्रोजेक्टर चला कर उन्हें वह फिल्म दिखाई. मज़े की बात यह कि हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक स्वयंप्रकाश खुद तब तक हिन्दी के एम ए नहीं थे. लगभग उन्हीं दिनों उन्होंने यह इरादा किया कि वे हिन्दी में एम ए करेंगे. मेरे ही सिरोही कॉलेज से उन्होंने प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में हिन्दी में एम ए किया. उन दिनों हमारे कॉलेज की लाइब्रेरी, खास तौर पर उसका हिन्दी खण्ड ऐसा था कि शायद पूरे राजस्थान में अन्यत्र कहीं नहीं था. स्वयंप्रकाश ने उसका भरपूर उपयोग किया. सिरोही एक छोटा-सा कस्बा था और अब भी है. वहां कुछ भी आपका निजी नहीं होता. स्वयंप्रकाश मेरे दोस्त हैं, यह सबको पता था. इस हद तक कि मेरी मां का निधन हुआ तो कॉलेज से, बिना मेरे कहे, मेरे ऑफिस सुपरिनटेण्डेण्ट मोहम्मद शब्बीर खान ने स्वयंप्रकाश को फोन कर यह सूचना दे दी, और स्वयंप्रकाश भी सुमेरपुर से सीधे सिरोही के श्मसान पहुंच गये. मुझे आज भी याद है, स्वयंप्रकाश के गले लगते ही मेरी रुलाई फूट पडी थी, जो तब तक अवरुद्ध ही थी. दोस्ती के उन शानदार दिनों में स्वयंप्रकाश के अनेक मित्रों से भी हमारी दोस्ती हुई. शिवगंज (सुमेरपुर का जुडवां कस्बा) के सुपरिचित डॉक्टर एस पी पुरोहित से दोस्ती हुई, जो अब तक बरकरार है. सुमेरपुर में अंग्रेज़ी की अध्यापिका मंजु पाल से जो दोस्ती और पारिवारिकता उस वक़्त हुई वह समय के साथ और मज़बूत हुई है और मंजु आज भी हमारे परिवार की सदस्य बनी हुई है. दोस्ती के उन्हीं दिनों में स्वयंप्रकाश ने शादी भी की. पत्नी और मैं उनकी शादी में शरीक हुए. उनकी बारात में उनकी बहनों ने जो शानदार डांस किए उनकी स्मृति और साथ ही यह स्मृति भी कि जाने-माने कवि नन्द भारद्वाज को भी मैंने उसी अवसर पर नाचते देखा था, अब भी आह्लादित करती है. इसके बाद तो जितनी आत्मीयता स्वयंप्रकाश से थी उतनी ही उनकी पत्नी रश्मि से भी हो गई. सुमेरपुर जाकर उनका आतिथ्य ग्रहण करना हमारे लिए सदैव आकर्षण का विषय रहता, और हम बार-बार जाते. वे लोग भी इसी तरह हमारे यहां आते और हमारी ज़िन्दगी को खुशनुमा बनाते. उसी दौर में स्वयंप्रकाश को लगा कि उसने एम ए तो कर ही लिया है, अब हिन्दी में ही पी-एच डी भी कर ली जाए. मैंने अपने गुरु डॉ कृष्ण कुमार शर्मा जी से बात की तो उन्होंने सहर्ष अपनी सहमति प्रदान कर दी, और इस तरह मित्र स्वयंप्रकाश मेरे गुरु-भाई भी हो गए. हंसते-खेलते उन्होंने अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाने का अधिकार भी अर्जित कर लिया. हंसते-खेलते इसलिए कि जो विषय उन्होंने चुना था ‘राजस्थान की हिन्दी कहानी’ उस पर उनका ज्ञान, अध्ययन और समझ उन्हें डी लिट्ट भी दिला सकती थी. डॉ कृष्ण कुमार शर्मा ने स्वयंप्रकाश को एक लेखक वाला मान देकर पी-एच डी कराई – यह बात मैं कभी नहीं भूलूंगा. वैसे, इससे उनकी विशाल हृदयता के साथ-साथ उनकी गुण ग्राहकता भी प्रमाणित होती है. हिन्दी में एम. ए. और फिर पी-एच डी कर लेने के बाद स्वयंप्रकाश को लगने लगा कि उन्हें टेलीफोन विभाग की छोटी-सी दुनिया से बाहर निकलना चाहिए. और जल्दी ही वे निकल भी गए. हिन्दुस्तान ज़िंक में राजभाषा अधिकारी बन कर वे सुमेरपुर से और हमसे दूर चले गए. उदयपुर, जावर माइंस, सर्गीपल्ली(उडीसा) चन्देरिया-चित्तौडगढ वगैरह जगह-जगह घूमते रहे. जब वे सर्गीपल्ली थे उन्हीं दिनों श्रीमती गांधी की हत्या हुई थी. स्वयंप्रकाश ने उन उथल पुथल भरे और अमानवीय दिनों में अपनी एक रेल यात्रा का वर्णन करते हुए मुझे एक लम्बा पत्र लिखा था, बाद में इसी अनुभव पर उन्होंने अपनी एक अमर कहानी लिखी – क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है. इन अनेक जगहों पर जाने से उनका अनुभव संसार और अधिक समृद्ध हुआ. सर्गीपल्ली को छोडकर सभी जगह हम उनके घर गए. जावर माइंस में उनके घर जाकर एक खास अनुभव हुआ, जो बाद में मेरे भी खासा काम आया. जावर माइंस में हम उनके ड्राइंग रूम में बैठे थे. उनके एक सहकर्मी दम्पती आए. भद्र महिला उनकी बुक रैक देखने लगी. तभी उनकी नज़र एक किताब पर पडी जिस पर लेखक के रूप में अंकित था – स्वयंप्रकाश. भद्र महिला ने बहुत आश्चर्य से पूछा कि भाई साहब, यह किताब आपकी लिखी हुई है? आप लिखते भी हैं, हमें तो पता ही नहीं था. और स्वयंप्रकाश ने इस बात को लगभग टाल-सा दिया. उन लोगों के जाने के बाद स्वयंप्रकाश ने हमें बताया कि वे अपनी नौकरी और अपने लेखन को अलग-अलग रखते हैं. यही कारण है कि उनके ज़्यादातर सहकर्मियों को यह पता नहीं है कि वे एक लेखक भी हैं. यहीं यह उल्लेख कर देना ज़रूरी है कि उस समय तक स्वयंप्रकाश राष्ट्रीय पहचान अर्जित कर चुके थे. स्वयंप्रकाश की यह बात मेरे भीतर भी कहीं जम गई, और काम तब आई जब मुझे जयपुर में आई ए एस अधिकारियों के साथ काम करने का मौका मिला. मैं अपने रचनाकर्म को घर रख कर नौकरी करने जाता रहा और ठीक-ठाक तरह से नौकरी कर सेवा निवृत्त हुआ. मुझे भी लगा कि नौकरी और लेखकी को अलग-अलग रखना ही ठीक है. जब आप लेखक हों, लेखकों के साथ हों, तो यह भूल जाएं कि आपका पद क्या है, और जब नौकरी कर रहे हों तो यह याद न रखें कि लेखक के रूप में आपका क़द क्या है. इसी में जीवन का सुख निहित है. स्वयंप्रकाश जहां भी रहे मुझे लम्बे-लम्बे खत लिखते रहे. वे खत सूचनाप्रद होते, मनोरंजक होते और होते नए-नए विचारों से भरपूर. पत्रों में एक तरह से वे मेरी क्लास लेते. नई किताबों के बारे में बताते, नई देखी नई-पुरानी फिल्मों की चर्चा करते, खेलों पर टिप्पणी करते, वेज-नॉन वेज लतीफे शेयर करते, दीन-दुनिया की बातें करते, ज़िन्दगी की छोटी-छोटी बातों में मिलने वाले रस का और भी अधिक रसपूर्ण बयान करते, अपने नए अनुभवों को साझा करते और मुझे साहित्यिक रूप से सक्रिय होने के लिए प्रेरित करते, मेरे निकम्मे पन के लिए प्रताडित करते. मैंने उनसे इस बात के लिए तो अनेक बार डांट खाई है कि मैं बहुत संक्षिप्त पत्र लिखता हूं. नौकरी के अंतिम काल में हुए अनेक तबादलों में मेरी जो सबसे मूल्यवान क्षति हुई है वह स्वयंप्रकाश के उन पत्रों की ही है. बहुत सम्हालकर रखा था उन पत्रों को. लेकिन आखिर वे खो ही गए. अगर वे पत्र मेरे पास होते, तो मुझे यह लेख लिखने की बजाय उन पत्रों में से कुछ को उद्धृत करना ज़्यादा प्रभावशाली लगता. क़्या नहीं था उन पत्रों में? उम्मीद करता हूं कि अनेक मित्रों ने स्वयंप्रकाश के पत्रों को सम्हालकर रखा होगा. स्वयंप्रकाश मेरे लिए तो फ्रेण्ड फिलॉसोफर और गाइड हैं ही, पत्नी विमला के लिए बहुत प्यारे देवर या छोटे भाई हैं, जिनसे भरपूर मज़ाक की जा सकती है और जिन्हें चाहे जो खिलाकर भरपूर सराहना पाई जा सकती है. हम दोनों से ज़्यादा हमारे बच्चे उन्हें चाहते हैं. विश्वास और चारु दोनों स्वयंप्रकाश के भक्त हैं. बेटा विश्वास प्राय: अपनी बातचीत में स्वयंप्रकाश के फिकरों और मुहावरों को इस्तेमाल कर लिया करता है. चारु तो उनके लिखे एक-एक शब्द को पी जाना चाहती है. स्वयंप्रकाश ने अपनी किताब दूसरा पहलू की प्रति मुझे नहीं, अपनी इस प्यारी बेटी चारु को ही देना पसन्द किया था. अब चारु अमरीका में रहती हुई भी अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच यह पूछ लेती है कि अंकल जी ने इधर नया क्या लिखा है? स्वयंप्रकाश को भी इन बच्चों और अब तो इनके बच्चों से भी, इतना ही लगाव है. बहुत सारी असुविधाएं झेलकर भी वह चारु की शादी में शरीक होने जालोर जैसी अटपटी जगह आया, और न केवल आया, अपनी उपस्थिति से पूरे माहौल को जीवंत बनाये रखा. उस मौके पर स्वयंप्रकाश ने जो एक अभूतपूर्व डांस किया उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग मेरे एक मित्र ने कर ली थी. अगर उस क्लिप को श्यामक डावर देख ले तो वह खुद स्वयंप्रकाश का गण्डा बंद शागिर्द बन जाए. ऐसा मस्त डांस देखने का सौभाग्य जीवन में बहुत कम लोगों को मिला होगा. मेरी बेटी भाग्यशाली है कि उसके विवाह के अवसर पर हिन्दी के इतने बडे रचनाकार ने यह कमाल (और धमाल) किया. वैसे मसखरी स्वयंप्रकाश के व्यक्तित्व का एक अभिन्न पक्ष है. उसके लेखन में तो यह खूब देखा ही जा सकता है. बल्कि अनेक आलोचकों ने उसकी भाषा के खिलंदडे पन को खास तौर पर पसन्द किया है. पाठकों को तो यह अच्छा लगता ही है. उसके पत्रों में भी यह मसखरी खूब होती है. और रोज़मर्रा के व्यवहार में भी. मुझे याद आता है कि एक बार वह, शायद उदयपुर से, हमारे घर सिरोही आया. रात के दो-तीन बजे होंगे. हम लोग अपनी फाटक पर ताला लगा दिया करते थे. बाउण्ड्री वाल कूद कर वह अन्दर आया, दरवाज़ा खटखटाया. कई बार खटखटाया. और जब आधे सोये--आधे जागे मैंने या पत्नी ने पूछा कौन? तो बडी गम्भीरता से बोला- ‘मैं चोर’. हम लोग एक बार तो कांप से गये. डरते-डरते सावधानी से दरवाज़ा खोला तो ज़ोर का ठहाका, और फिर चाय की चुस्कियां.. चाय और सिगरेट स्वयंप्रकाश को बे-इन्तिहा पसन्द है. चाय वह कभी भी, कहीं भी, कितनी ही बार पी सकता है. और सिगरेट, वह भी पनामा – वह तो उसे चाय से अधिक प्रिय है. लेकिन चाय को लेकर उसके मन में कोई नखरे का भाव मैंने कभी नहीं पाया. बल्कि, पिछले दिनों जब उससे मुलाक़ात हुई और मैं एक ठीक-ठाक से रेस्तरां में चाय पिलाने ले गया तो वह बलात मुझे वहां से बाहर निकाल लाया और फिर सडक किनारे एक ठेले वाले की मुड्डियों पर बैठकर चाय पीते हुए ही हमने डेढ दो घण्टे अपने सुख-दुख साझा किए.
इधर स्वयंप्रकाश के जीवन का एक नया दौर और मोड उसे हमसे थोडा और दूर ले गया है. हिन्दुस्तान ज़िंक से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर अंतत: उसने फिर अपनी जडों की तरफ लौटने का फैसला कर लिया. राजस्थान छोडकर फिर बैतलवा भोपाल जा बैठा. कुछ नई तरह से ज़िन्दगी शुरू करने की उसकी व्यस्तताएं और कुछ मेरी अपनी व्यस्तताएं. चिट्ठी पत्री का सिलसिला लगभग टूट-सा गया है. मिलना-जुलना भी कम हो गया है. अंकिता की शादी में उसने बुलाया और हम लोग भी बहुत दिनों से योजना बना रहे थे कि इस मौके पर तो भोपाल जाएंगे ही, लेकिन नहीं जा पाए. स्वयंप्रकाश और रश्मि ने इसका बुरा क्यों नहीं माना होगा? मानना ही चाहिए. अब तो कभी-कभार औरों से उनके समाचार मिलते हैं. अब उम्र के जिस मोड और मुकाम पर हम हैं, वहां उन बीते खूबसूरत दिनों को याद करते हुए स्वयंप्रकाश के ही एक कहानी संग्रह का शीर्षक थोडे से परिवर्तन के साथ दुहराने का मन करता है : आएंगे अच्छे दिन भी?
ऑस्ट्रियन डिज़ाइनर और ग्राफिक आर्टिस्ट श्टेफन सेग्माइस्टर की ख्याति का थोडा-सा अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें डिज़ाइन की दुनिया का गॉड (खुदा) कहा जाता है. उनकी ख्याति उनकी रचनाशीलता के साथ-साथ दानशीलता और विनम्रता के लिए भी उतनी ही है. हाल ही में इन्हीं श्टेफन की एक नई किताब आई है थिंग्ज़ आई हेव लर्न-ड इन माई लाइफ सो फार. अपनी प्रस्तुति में विलक्षण होने के साथ ही यह किताब इस महान कलाकार के मनोजगत में झांकने का एक विरल अवसर प्रदान करती है.
इस किताब की जन्म-कथा भी दिलचस्प है. हुआ यह कि इस विलक्षण और अति व्यस्त डिज़ाइनर ने वर्ष 2000 में अपने काम से एक साल का अवकाश लिया. मकसद यह तलाश करना था कि वे अपनी अभिव्यक्ति को और सक्षम कैसे बना सकते हैं. “मैंने सोचा कि क्यों न फिल्म निर्माण में हाथ आजमाया जाए. फिर लगा कि मुझे उसी भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए जिसे मैं जानता हूं, और वह भाषा है डिज़ाइन की भाषा.” इसी अवकाश–काल में श्टेफन नियमित रूप से रोज़ डायरी भी लिखने लगे. कुछ दिनों बाद ही अपनी लिखी प्रविष्टियां पढते हुए श्टेफन को लगा कि यह तो कुछ ऐसा है जिसे औरों से भी साझा किया जा सकता है. इसी सोच की परिणति है यह किताब. वैसे, श्टेफन ने इस किताब के साथ ही इसी शीर्षक से एक विशाल प्रदर्शनी भी आयोजित की है जहां उन्होंने अपने कुछ सहयोगियों के साथ इस किताब में शामिल सूक्तियों को कलाकृतियों के रूप में प्रदर्शित किया है.
श्टेफन की इस किताब में ये बीस सूक्तियां हैं : 1. औरों की मदद करके मैं खुद की मदद करता हूं. 2. हिम्मत ने हमेशा मेरा साथ दिया है. 3. यह सोचना मूर्खतापूर्ण है कि भावी जीवन सुखद होगा. मुझे तो वर्तमान में जीना है. 4. सहायता समूह को संगठित करना आश्चर्यजनक रूप से सुगम है. 5. मिथ्याचरण सदा मेरे प्रतिकूल रहा है. 6. मैं जो भी करता हूं, उसका प्रतिफल मुझे ज़रूर मिलता है. 7. कल्पना करना बेहद मुश्किल है. 8. ड्रग्ज़ शुरू में तो अच्छी लगती हैं लेकिन फिर वे आप पर सवार हो जाती हैं. 9. वक़्त बीतने के साथ मैं हर बात का आदी होता चला गया, और फिर उनकी उपेक्षा करने लगा. 10. धन मुझे सुखी नहीं बनाता. 11. मेरे सपनों का कोई अर्थ नहीं है. 12. डायरी रखने से वैयक्तिक विकास में सहायता मिलती है. 13. अच्छा दीखने का प्रयास मेरी ज़िन्दगी को सीमित करता है. 14. भौतिक विलासिताओं का उपयोग अल्प मात्रा में ही किया जाना चाहिए. 15. चिंता करने से कोई समस्या हल नहीं होती. 16. शिकायत करना बेवक़ूफी है. या तो कुछ करो या फिर भूल जाओ. 17. हरेक यही सोचता है कि वह सही है. 18. अगर मुझे व्यावसायिक रूप से किसी नई दिशा की तलाश है तो बेहतर होगा कि पहले मैं खुद ही उसे आजमा कर देखूं. 19. कम अपेक्षाएं रखना उम्दा रणनीति है. 20. हर ईमानदार दिलचस्प होता है.
इस किताब को मैंने विलक्षण इसलिए कहा कि यह पारम्परिक अर्थ में किताब है ही नहीं. बेहतर तो यह होगा कि इसे किताब न कहकर कलाकृति कहा जाए. एक बक्सा और उसमें रखे कुछ पैम्फलेट. कोई जिल्दबन्द किताब नहीं जिसे कवर-टू-कवर पढा जाए. इन पैम्फलेट्स में इस किताब, इन सूक्तियों और सूक्तियों पर आधारित कलाकृतियों की सृजन गाथा अंकित है. मसलन सूक्ति क्रमांक 9 के बारे में यह बताया गया है कि न्यूयॉर्क में श्टेफन एक खिडकी में बैठे थे, उन्होंने अपने पांव बाहर लटका रखे थे. लोगों ने सोचा कि वे कूदने वाले हैं. पुलिस बुला ली गई और श्टेफन जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर भाग निकले. इसी तरह वे चौथी सूक्ति के लिए बताते हैं कि कैसे उन्होंने कुछ बेघरबार लोगों को महीने में दो बार राशन सामग्री सुलभ कराने का अभियान सफलतापूर्वक चलाया.
यह कलाकृति, या किताब, आप इसे जो भी नाम दें, उन सब बातों पर एक बार फिर से हमारा ध्यान खींचती हैं जो हमें अपने जीवन में महत्वपूर्ण लगती हैं. हो सकता है इनमें से कुछ बातों से हममें से कुछेक की असहमति हो, लेकिन ये बातें अंतत: सोच का एक प्रस्थान बिन्दु तो बनती ही हैं. इतना भी कम नहीं है. ◙◙◙
Discussed book: Things I have Learned in My Life So Far By Stefan Sagmeister, Daniel Nettle, Steven Heller, Nancy Spectar Published by: Abrams Paperback, 248 pages US $ 24.00
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 03 अप्रैल 2008 को प्रकाशित.
जनता से बार-बार कहा जाता है कि वह अपने करों की अदायगी ईमानदारी से और नियमितता से करे. यह उचित भी लगता है. इसलिए कि आखिर हमारे करों से ही तो सरकारें विभिन्न विकास कार्य करती हैं. जनता के करों से ही तो सडकें बनती हैं, अस्पताल चलते हैं, स्कूल कॉलेज खुलते हैं. निश्चय ही करों का उपयोग इतनी बतों तक सीमित नहीं होता. विधान सभाएं और संसद भी हमारे करों से ही संचालित होते हैं. और भी न जाने कितने काम हमारे करों के बलबूते पर होते हैं. जनता की आकांक्षाएं असीमित होती हैं और कर चुकाने की इच्छा और सामर्थ्य सीमित. स्वाभाविक है कि दोनों के बीच जद्दो जहद चलती रहती है. नए स्कूल कॉलेज अस्पताल खुलते हैं तो जनता खुश होती है, इनके लिए मांग भी करती रहती है, लेकिन जब कर भार बढता है तो जनता दुखी और नाराज़ होती है. इस बार केन्द्र और मेरे राज्य राजस्थान में चुनाव होने हैं इसलिए सोच समझकर ऐसे बजट पेश किए गए हैं कि जनता पर कर भार न्यूनतम है. स्वाभाविक है कि भोली जनता खुश है. यह जानते हुए भी कि अगले साल जब चुनाव हो जाएंगे और पांच सालों की निश्चिंतता हो जाएगी, करों की भारी मार पडेगी ही. मैं सोचता हूं जो चुनाव के ऐन पहले वाले बजट में होता है वह शेष चार बजटों में क्यों नहीं होता? क्या लोकतंत्र की सरकारों को जनता की आकांक्षाओं के प्रति इतना अन्धा होना चाहिए?
मैं जानता हूं कि आप मेरी ही बात को पकड कर पूछेंग़े कि कर नहीं लगेंगे तो विकास कैसे होगा? बिलकुल वाज़िब सवाल है. मैं भी कहता हूं कि विकास के लिए कर लगने ही चाहिए. लेकिन, ज़ोर देकर कहता हूं कि विकास के लिए, और ज़रूरी कामों के लिए. न कि गैर ज़रूरी कामों के लिए. मेरा जी तब दुखता है जब मेरी गाढी कमाई का पैसा बेवजह पानी में बहाया जाता है. मैं अपने सांसद, विधायक चुनता हूं, उनकी पंचायतों यानि संसद और विधान सभाओं के संचालन का पूरा खर्च उठाता हूं लेकिन क्या वे अपने काम और व्यवहार से यह साबित करते हैं कि उन्हें मेरी, यानि अपने मतदाता की ज़रा भी परवाह है. कभी ध्यान दें कि हमारी विधान सभाओं और संसद का कितना समय बेवजह के हो हल्ले में बीत जाता है! क्या यह मेरी गाढी कमाई के पैसे का सरासर दुरुपयोग नहीं है?
आजकल रिवाज़ चल पडा है कि सरकारें अखबारों में बडे-बडे विज्ञापन छपवा कर अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का गुणगान करती हैं. इन विज्ञापनों पर मेरे टैक्स का रुपया ही तो खर्च होता है. क्या ये ज़रूरी हैं? सरकार ने मेरे लिए जो किया वह मुझे विज्ञापन के माध्यम से बताने की क्या ज़रूरत है? क्या खुद काम को नहीं बोलना चाहिए? हम सब जानते हैं कि इन विज्ञापनों का असल मक़सद तो हमारे जन प्रतिनिधियों की छवि का निर्माण करना है. यह मी मेरे पैसे का सरासर दुरुपयोग है.
राज्य सरकारें समय-समय पर उत्सव भी मनाती हैं. इधर पिछले चार सालों से मेरे राज्य राजस्थान में इसकी स्थापना का उत्सव कुछ अधिक ही जोर-शोर से मनाया जाने लगा है. एक सप्ताह बहुत बडे पैमाने पर ‘नाच गाना’ होता है, देश के सारे प्रकाशनों में भव्य विज्ञापन छपते हैं (हो गया प्रैस का तो मुंह बन्द!). नाच गाना शब्द से जिन्हें आपत्ति हो वे इसकी जगह ‘सांस्कृतिक कार्यक्रम’ पढ लें. देश भर से नामचीन कलाकारों को बुला कर उनकी प्रस्तुतियां कराई जाती हैं. इस बार हेमा मालिनी, ए आर रहमान, सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल, कुणाल गांजावाला, राहत फतेह अली खान जैसे कलाकार हमें धन्य करने आये. इन सब कार्यक्रमों पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, कहना भी अल्प कथन ही होगा. सरकार की दरियादिली देखते ही बनती है. करोडों का बजट होता है इस कार्यक्रम का.
प्रदेश की कलाकार बिरादरी अक्सर सवाल उठाती है कि इस सब में राजस्थान कहां होता है? सवाल अपनी जगह वाज़िब है. यह कार्यक्रम जनता के मनोरंजन के लिए है या राजस्थान के महत्व स्थापन के लिए? हेमा मालिनी बहुत बडी नृत्यांगना हैं, लेकिन राजस्थान से उनका क्या रिश्ता है? उनके नाचने से राजस्थान के गौरव में कैसे वृद्धि होती है? यही बात अन्य कलाकारों के लिए भी. जवाब में कहा जाता है कि राजस्थान के कलाकारों में भीड खींचने की ऐसी सामर्थ्य नहीं है. चलिये थोडी देर के लिए इस तर्क को भी स्वीकार कर लें, तो क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपका मकसद क्या है: भीड जुटाना या प्रदेश (की कला-संस्कृति) का विकास करना? क्या सरकार का काम महज़ नाच-गाना करवाना है? और सारे काम तो जैसे वह कर चुकी है. लोगों को सुखी और सुरक्षित जीवन मिल चुका है. चारों तरफ अमन-चैन है. लोग सुख की नींद सो रहे हैं. न प्यासबची है, न भूख; न चोरी है न अपराध. अब तो बस चैन की बंसी बजनी शेष थी, सो उसी के लिए यह सारा ताम झाम. क्या यह अजीब नहीं लगता कि पेयजल की व्यवस्था के लिए, अस्पतालों में मामूली दवाइयों के लिए, टूटी सडक की मरम्मत के लिए तो सरकार के पास पैसा नहीं होता, लेकिन ऐसे जश्न के लिए उसके पास वित्तीय संसाधनों की कोई कमी नहीं होती.
लेकिन मैं एक बात और भी उठाना चाहता हूं. इन कार्यक्रमों के जो बडे-बडे विज्ञापन छपते हैं उनमें बार-बार यह कहा जाता है कि इन कार्यक्रमों में प्रवेश निशुल्क है और किसी निमंत्रण पत्र की आवश्यकता नहीं है. यह एक आदर्श स्थिति है. लेकिन यथार्थ इससे भिन्न है. सभी कार्यक्रमों के बाकायदा निमंत्रण पत्र छपते हैं, बंटते हैं और उनके लिए खासी मारा-मारी भी होती है. इसलिए कि निमंत्रण पत्र आपको आगे बैठने का, वी आई पी होने का हक़ देते हैं, और अखबारी सूचना धक्का-मुक्की और अव्यवस्था का शिकार होने का अवसर प्रदान करती है. निमंत्रण पत्र किन्हें अता फरमाए जाते हैं? विधायकों-सांसदों-मंत्रियों को, अफसरों को, अति महत्वपूर्ण लोगों को, पत्रकारों को और जो जुग़ाड कर ले उनको. इनमें से पत्रकारों की बात समझ में आती है. उनके कर्तव्य निर्वहन के लिए उन्हें यह सुविधा दी जानी चाहिए. लेकिन शेष लोगों को निमंत्रण पत्र, और उसके माध्यम से विशेष स्थान पर बैठ कर कार्यक्रम देखने का अधिकार क्यों मिलना चाहिए? एक सांसद, एक मंत्री, एक अफसर और एक अन्य नागरिक के बीच भेद क्यों किया जाना चाहिए? पहले आओ पहले बैठो की व्यवस्था क्यों नहीं लागू की जानी चाहिए? एक नागरिक के रूप में मेरी पीडा, बल्कि मेरा आक्रोश यह है कि पैसा मेरा और मैं ही उसके उपयोग में पीछे धकेला जाऊं, यह क्यों होना चाहिए? ऐसे आयोजनों में मेरा पैसा लगता है. उतना ही जितना किसी जन प्रतिनिधि या अफसर का लगता है. फिर मेरी तुलना में उन्हें विशिष्टता क्यों प्रदान की जाती है? बल्कि सच तो यह कि मेरे पैसे पर मेरे अपमान का प्रबन्ध किया जाता है. क्या इससे भी खराब कुछ हो सकता है?
मैं उस दिन के इंतज़ार में हूं जब हमारी जनता में इतनी जागरूकता आ जाएगी कि वह इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था, बल्कि इस बे-इमानी को समझेगी, न केवल समझेगी, बल्कि इसके विरोध में भी उठ खडी होगी. जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक तो यह माले मुफ्त, दिले बेरहम का बेशर्मी भरा खेल चलता ही रहेगा.
जनता से बार-बार कहा जाता है कि वह अपने करों की अदायगी ईमानदारी से और नियमितता से करे. यह उचित भी लगता है. इसलिए कि आखिर हमारे करों से ही तो सरकारें विभिन्न विकास कार्य करती हैं. जनता के करों से ही तो सडकें बनती हैं, अस्पताल चलते हैं, स्कूल कॉलेज खुलते हैं. निश्चय ही करों का उपयोग इतनी बतों तक सीमित नहीं होता. विधान सभाएं और संसद भी हमारे करों से ही संचालित होते हैं. और भी न जाने कितने काम हमारे करों के बलबूते पर होते हैं. जनता की आकांक्षाएं असीमित होती हैं और कर चुकाने की इच्छा और सामर्थ्य सीमित. स्वाभाविक है कि दोनों के बीच जद्दो जहद चलती रहती है. नए स्कूल कॉलेज अस्पताल खुलते हैं तो जनता खुश होती है, इनके लिए मांग भी करती रहती है, लेकिन जब कर भार बढता है तो जनता दुखी और नाराज़ होती है. इस बार केन्द्र और मेरे राज्य राजस्थान में चुनाव होने हैं इसलिए सोच समझकर ऐसे बजट पेश किए गए हैं कि जनता पर कर भार न्यूनतम है. स्वाभाविक है कि भोली जनता खुश है. यह जानते हुए भी कि अगले साल जब चुनाव हो जाएंगे और पांच सालों की निश्चिंतता हो जाएगी, करों की भारी मार पडेगी ही. मैं सोचता हूं जो चुनाव के ऐन पहले वाले बजट में होता है वह शेष चार बजटों में क्यों नहीं होता? क्या लोकतंत्र की सरकारों को जनता की आकांक्षाओं के प्रति इतना अन्धा होना चाहिए? मैं जानता हूं कि आप मेरी ही बात को पकड कर पूछेंग़े कि कर नहीं लगेंगे तो विकास कैसे होगा? बिलकुल वाज़िब सवाल है. मैं भी कहता हूं कि विकास के लिए कर लगने ही चाहिए. लेकिन, ज़ोर देकर कहता हूं कि विकास के लिए, और ज़रूरी कामों के लिए. न कि गैर ज़रूरी कामों के लिए. मेरा जी तब दुखता है जब मेरी गाढी कमाई का पैसा बेवजह पानी में बहाया जाता है. मैं अपने सांसद, विधायक चुनता हूं, उनकी पंचायतों यानि संसद और विधान सभाओं के संचालन का पूरा खर्च उठाता हूं लेकिन क्या वे अपने काम और व्यवहार से यह साबित करते हैं कि उन्हें मेरी, यानि अपने मतदाता की ज़रा भी परवाह है. कभी ध्यान दें कि हमारी विधान सभाओं और संसद का कितना समय बेवजह के हो हल्ले में बीत जाता है! क्या यह मेरी गाढी कमाई के पैसे का सरासर दुरुपयोग नहीं है? आजकल रिवाज़ चल पडा है कि सरकारें अखबारों में बडे-बडे विज्ञापन छपवा कर अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का गुणगान करती हैं. इन विज्ञापनों पर मेरे टैक्स का रुपया ही तो खर्च होता है. क्या ये ज़रूरी हैं? सरकार ने मेरे लिए जो किया वह मुझे विज्ञापन के माध्यम से बताने की क्या ज़रूरत है? क्या खुद काम को नहीं बोलना चाहिए? हम सब जानते हैं कि इन विज्ञापनों का असल मक़सद तो हमारे जन प्रतिनिधियों की छवि का निर्माण करना है. यह मी मेरे पैसे का सरासर दुरुपयोग है. राज्य सरकारें समय-समय पर उत्सव भी मनाती हैं. इधर पिछले चार सालों से मेरे राज्य राजस्थान में इसकी स्थापना का उत्सव कुछ अधिक ही जोर-शोर से मनाया जाने लगा है. एक सप्ताह बहुत बडे पैमाने पर ‘नाच गाना’ होता है, देश के सारे प्रकाशनों में भव्य विज्ञापन छपते हैं (हो गया प्रैस का तो मुंह बन्द!). नाच गाना शब्द से जिन्हें आपत्ति हो वे इसकी जगह ‘सांस्कृतिक कार्यक्रम’ पढ लें. देश भर से नामचीन कलाकारों को बुला कर उनकी प्रस्तुतियां कराई जाती हैं. इस बार हेमा मालिनी, ए आर रहमान, सुनिधि चौहान, श्रेया घोषाल, कुणाल गांजावाला, राहत फतेह अली खान जैसे कलाकार हमें धन्य करने आये. इन सब कार्यक्रमों पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है, कहना भी अल्प कथन ही होगा. सरकार की दरियादिली देखते ही बनती है. करोडों का बजट होता है इस कार्यक्रम का. प्रदेश की कलाकार बिरादरी अक्सर सवाल उठाती है कि इस सब में राजस्थान कहां होता है? सवाल अपनी जगह वाज़िब है. यह कार्यक्रम जनता के मनोरंजन के लिए है या राजस्थान के महत्व स्थापन के लिए? हेमा मालिनी बहुत बडी नृत्यांगना हैं, लेकिन राजस्थान से उनका क्या रिश्ता है? उनके नाचने से राजस्थान के गौरव में कैसे वृद्धि होती है? यही बात अन्य कलाकारों के लिए भी. जवाब में कहा जाता है कि राजस्थान के कलाकारों में भीड खींचने की ऐसी सामर्थ्य नहीं है. चलिये थोडी देर के लिए इस तर्क को भी स्वीकार कर लें, तो क्या यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपका मकसद क्या है: भीड जुटाना या प्रदेश (की कला-संस्कृति) का विकास करना? क्या सरकार का काम महज़ नाच-गाना करवाना है? और सारे काम तो जैसे वह कर चुकी है. लोगों को सुखी और सुरक्षित जीवन मिल चुका है. चारों तरफ अमन-चैन है. लोग सुख की नींद सो रहे हैं. न प्यासबची है, न भूख; न चोरी है न अपराध. अब तो बस चैन की बंसी बजनी शेष थी, सो उसी के लिए यह सारा ताम झाम. क्या यह अजीब नहीं लगता कि पेयजल की व्यवस्था के लिए, अस्पतालों में मामूली दवाइयों के लिए, टूटी सडक की मरम्मत के लिए तो सरकार के पास पैसा नहीं होता, लेकिन ऐसे जश्न के लिए उसके पास वित्तीय संसाधनों की कोई कमी नहीं होती. लेकिन मैं एक बात और भी उठाना चाहता हूं. इन कार्यक्रमों के जो बडे-बडे विज्ञापन छपते हैं उनमें बार-बार यह कहा जाता है कि इन कार्यक्रमों में प्रवेश निशुल्क है और किसी निमंत्रण पत्र की आवश्यकता नहीं है. यह एक आदर्श स्थिति है. लेकिन यथार्थ इससे भिन्न है. सभी कार्यक्रमों के बाकायदा निमंत्रण पत्र छपते हैं, बंटते हैं और उनके लिए खासी मारा-मारी भी होती है. इसलिए कि निमंत्रण पत्र आपको आगे बैठने का, वी आई पी होने का हक़ देते हैं, और अखबारी सूचना धक्का-मुक्की और अव्यवस्था का शिकार होने का अवसर प्रदान करती है. निमंत्रण पत्र किन्हें अता फरमाए जाते हैं? विधायकों-सांसदों-मंत्रियों को, अफसरों को, अति महत्वपूर्ण लोगों को, पत्रकारों को और जो जुग़ाड कर ले उनको. इनमें से पत्रकारों की बात समझ में आती है. उनके कर्तव्य निर्वहन के लिए उन्हें यह सुविधा दी जानी चाहिए. लेकिन शेष लोगों को निमंत्रण पत्र, और उसके माध्यम से विशेष स्थान पर बैठ कर कार्यक्रम देखने का अधिकार क्यों मिलना चाहिए? एक सांसद, एक मंत्री, एक अफसर और एक अन्य नागरिक के बीच भेद क्यों किया जाना चाहिए? पहले आओ पहले बैठो की व्यवस्था क्यों नहीं लागू की जानी चाहिए? एक नागरिक के रूप में मेरी पीडा, बल्कि मेरा आक्रोश यह है कि पैसा मेरा और मैं ही उसके उपयोग में पीछे धकेला जाऊं, यह क्यों होना चाहिए? ऐसे आयोजनों में मेरा पैसा लगता है. उतना ही जितना किसी जन प्रतिनिधि या अफसर का लगता है. फिर मेरी तुलना में उन्हें विशिष्टता क्यों प्रदान की जाती है? बल्कि सच तो यह कि मेरे पैसे पर मेरे अपमान का प्रबन्ध किया जाता है. क्या इससे भी खराब कुछ हो सकता है? मैं उस दिन के इंतज़ार में हूं जब हमारी जनता में इतनी जागरूकता आ जाएगी कि वह इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था, बल्कि इस बे-इमानी को समझेगी, न केवल समझेगी, बल्कि इसके विरोध में भी उठ खडी होगी. जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक तो यह माले मुफ्त, दिले बेरहम का बेशर्मी भरा खेल चलता ही रहेगा.
ब्रितानी लेखिका जे के रॉलिंग की हैरी पॉटर श्रंखला के उपन्यास हमारे समय का एक बडा अजूबा हैं. उनकी लोकप्रियता अतुलनीय है. सभी देशों, उम्र व स्तर के पाठकों ने उनमें गहरी दिलचस्पी ली है. यह कहते हुए मैं मार्केटिंग के कौशल के योगदान को कम करके नहीं आंक रहा. अंग्रेज़ी साहित्य की दुनिया में हैरी पॉटर श्रंखला के उपन्यासों की लोकप्रियता की तह में जाने के प्रयास भी कम नहीं हुए हैं. इसी क्रम में इधर चर्चा में है जॉन ग्रेंजर की किताब अन लॉकिंग हैरी पॉटर : फाइव कीज़ फॉर द सीरियस रीडर. शीर्षक से ही साफ है कि यहां लेखक इस श्रंखला को समझने के लिए पांच कुंजियां दे रहा है. जॉन ग्रेंजर हैरी पॉटर श्रंखला के गम्भीर अध्येता हैं और पहले भी हिडन की टू हैरी पॉटर जैसी किताब लिख तथा हू किल्ड एल्बस डम्बलडोर जैसी किताब सम्पादित कर नाम और नामा कमा चुके हैं.
अपनी वर्तमान किताब में जॉन एक प्रशंसक और विवेचक की दोहरी भूमिका में हैं. यहां उनका लक्ष्य यह स्थापित करना है कि बावज़ूद अपनी लोकप्रियता के, हैरी पॉटर श्रंखला के उपन्यास गम्भीर और चिंतनपरक विश्लेषण के हक़दार हैं. अपनी बात को पुष्ट करने के लिए जॉन जे के रॉलिंग की बौद्धिकता, साहित्यिकता और रचना निर्माण क्षमता को उभारते हैं. वे रॉलिंग की कहानी कहने की प्रविधि और उसके निहितार्थों (जिन्हें कुंजी कहा गया है) के अनेक आधारभूत पहलुओं का भी विश्लेषण करते हैं. यह सब करते हुए जॉन स्थापित करते हैं कि रॉलिंग अपने शिल्प और अपनी दृष्टि के बारे में बहुत सजग और प्रतिबद्ध हैं, और इसीलिए उनकी कथा का पूर्वानुमान करने का खतरा भी उठाया जा सकता है. इस किताब में जॉन ने यह खतरा भी उठाया है.
जॉन की यह किताब छह अध्यायों में है. पहला अध्याय रॉलिंग के सृजन की पहली कुंजी देता है : वृत्तांत की बहक. यहां जॉन बताते हैं कि अपनी प्रिय कथाकार जेन ऑस्टेन की ही तरह रॉलिंग भी अपनी कथा को अन्य पुरुष की सीमित सर्वज्ञता के नज़रिए से पेश करती हैं. पाठक उतना ही जान पाता है जितना हैरी को ज्ञात है, शेष सारे चरित्र तो वैसे भी नेपथ्य में ही रहते हैं. जैसे, जब तक हैरी का उनसे सामना नहीं होता, हम भी नहीं जानते कि एल्बस या सेवेरस क्या कर रहे हैं. यानि, हम वही देखते हैं जो हैरी देखता है, और इस तरह पाठक हैरी के सारे राग-द्वेष ओढ लेता है. यह सिलसिला कथा के अंत तक चलता रहता है. और जब हैरी खुद गलत सिद्ध होता है तो पाठक को भी एक झटका लगता है.
किताब का दूसरा अध्याय रॉलिंग के लेखन की दूसरी कुंजी कीमियागिरी की चर्चा करता है. हैरी पॉटर श्रंखला के उपन्यासों को कट्टर ईसाइयों और घोर बुद्धिजीवियों ने नकारा है. यहां लेखक यह स्थापित करता है कि वैयक्तिक रूपांतरण के मामले में रॉलिंग कितनी गहन आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि से लैस है. अपने उत्साह में जॉन रॉलिंग को शेक्सपियर और आदि क्लासिकी लेखकों की परम्परा से जोड देते हैं.
किताब का तीसरा अध्याय रॉलिंग की कथा-शैली का विवेचन करते हुए उनके फॉर्मूले की कुंजी प्रदान करता है. जॉन ग्रेंजर बताते हैं कि पॉटर श्रंखला के उपन्यासों की कथा और ब्यौरे तो अलग हैं लेकिन उनमें एक समान पैटर्न भी देखा जा सकता है, हालांकि इस पैटर्न में थोडा वैविध्य भी है. किताब के चौथे और पांचवें अध्याय यह पडताल करते हैं कि हैरी पॉटर की ये पुरानी लगने वाली कहानियां आज के पाठक को अभिभूत क्यों करती हैं! ग्रेंजर ठीक ही लिखते हैं कि रॉलिंग 21 वीं शताब्दी में लिख रही हैं तो हमें उनके लेखन में कुछ उत्तर आधुनिक तत्वों की आशा तो करनी ही चाहिए. जॉन ग्रेंजर प्रगति और तकनीक को सन्देह की नज़रों से देखने के उत्तर आधुनिक विचार को हैरी पॉटर उपन्यासों में देखते हैं और कहते हैं कि यहां भी एक ब्रिटिश जादुई समाज है जो खुद को प्रगतिशील समझता है लेकिन है उससे उलट. इसी तरह ग्रेंजर को सरकारों, शिक्षा और प्रेस की रॉलिंग की आलोचना में तथा इस विचार में कि कुछ भी वैसा नहीं होता, जैसा दिखाई देता है, उत्तर आधुनिक विखण्डन की छाया दिखाई देती है. लेकिन जॉन ग्रेंजर यह कहना नहीं भूलते कि रॉलिंग उत्तर आधुनिक होते हुए भी इसका अतिक्रमण करती रहती हैं. वे अपनी अलौकिक दुनिया के लिए ऐसे प्रतीक चुनती हैं जो स्पष्टत: ईसाई हैं. इतना ही नहीं, बकौल ग्रेंजर, रॉलिंग अपने उपन्यासों में कहीं भी चर्च की आलोचना नहीं करतीं. इस तरह इन दो अध्यायों मे जॉन ग्रेंजर दो कुंजिया देते हैं उत्तर आधुनिकता और पारम्परिक प्रतीकवाद.
किताब के आखिरी अध्याय में इन पांच कुंजियों के सहारे यह पडताल की गई है कि रॉलिंग के आगामी लेखन की दिशा क्या हो सकती है. कहना अनावश्यक है अब यह अध्याय बेमानी हो गया है.
ग्रेंजर की यह किताब एक अति लोकप्रिय कथा श्रंखला को समझने का गम्भीर सारस्वत प्रयास है. कितना अच्छा हो कि इस तरह से भारतीय भाषाओं की लोकप्रिय कृतियों का भी विवेचन हो. ◙◙◙
Discussed book: Unlocking Harry Potter: Five Keys for the Serious Reader By John Granger Published by: Zossima Press Paperback: 312 pages US $ 18.99
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 27 मार्च 2008 को प्रकाशित.
लोकप्रिय अंग्रेज़ी कथाकार जेन ऑस्टेन की जोन स्पेन्स कृत सुलिखित सद्य प्रकाशित जीवनी बिकमिंग जेन ऑस्टेन इन दिनों चर्चा में है. इस किताब पर ‘बिकमिंग जेन’ नाम से एक फिल्म भी बन चुकी है. यह जीवनी जेन ऑस्टिन के जीवन का आत्मीय वृत्तांत है. स्पेन्स ने गहन शोध करके यह तथ्य उजागर किया है कि जेन एक आकर्षक आयरिश युवक टॉम लेफ्रॉय के प्रेम में डूबी थीं और इसी प्रेम की रचनात्मक परिणति है उनका बेहद लोकप्रिय उपन्यास ‘प्राइड एण्ड प्रेज्युडिस’. जोन जेन के चरित्र को परत-दर-परत खोलते हैं और हम यह जान पाते हैं कि इस रिश्ते तथा उनके जीवन की अन्य घटनाओं ने किस तरह उनकी सर्जनात्मकता को प्रभावित किया. एक अर्थ में तो इस जीवनी को उद्घाटक कहा जा सकता है. जेन की डायरी और उनके पत्रों से पर्याप्त सहायता लेकर जीवनीकार जोन ने लेखिका के जीवन की अनेक घटनाओं और उनके लेखन के बीच सम्बन्ध दिखाया है. वैसे यहीं यह कहना भी अप्रासंगिक न होगा कि खुद जेन ऑस्टेन अपने निजी जीवन और रचना के अंत:सम्बन्धों को नकारा करती थीं. जेन के जीवन के दो प्रमुख व्यक्ति हैं एलिज़ा डी फ्यूलाइड और टॉम लेफ्रॉय. स्पेन्स लिखते हैं कि जेन की उनसे 14 वर्ष बडी चचेरी बहन एलिज़ा और हेनरी का प्रेम प्रसंग बीस साल बाद भी जेन के दिलो-दिमाग पर छाया रहा. इस प्रसंग की अनुगूंज जेन की कहानियों ‘लव एण्ड फ्रेंडशिप’ और ‘लेस्ली कासल’ में सुनी जा सकती हैं जहां एक युवा पुरुष और उसकी अधेड प्रेमिका के सम्बन्धों के खतरों की चर्चा है या एक उछृंखल युवती पर व्यंग्य है. एलिज़ा के चरित्र की छवियां ‘हेनरी एण्ड एलिज़ा’ में भी पहचानी जा सकती हैं. टॉम लेफ्रॉय वह व्यक्ति है जिससे अपने असल जीवन में जेन प्यार करती थीं और इस इंतज़ार में थीं कि वह अपनी वकालत की पढाई पूरी कर ले तो शादी की जाए. बकौल जोन, टॉम के प्रति जेन का अनुराग इतना गहरा था कि उसने टॉम के प्रिय उपन्यास ‘टॉम जॉन्स’ के किसी न किसी चरित्र के नाम पर अपने हर उपन्यास का कम से कम एक चरित्र रचा, भले ही वह चरित्र गौण हो. जेन को टॉम के परिवार से ही अपने उपन्यास ‘प्राइड एण्ड प्रेज्युडिस’ के लिए आधारभूत घटनाक्रम प्राप्त हुआ. जोन यह भी कहने से नहीं चूकते कि इस उपन्यास में एलिज़ाबेथ का चरित्र असल ज़िन्दगी के टॉम के आधार पर निर्मित है और डार्सी के चरित्र मंर खुद जेन को पहचाना जा सकता है. जेन के कई उपन्यासों में टॉम की जो छवि उभारती है वह एक ऐसे आकर्षक युवा की है जो अपने प्रेम में पडी महिलाओं को इसलिए छोडता रहता है कि उसे प्रेम से अधिक प्रिय पैसा और पद है. असल ज़िन्दगी में भी यह हुआ कि टॉम पर उसके परिवार का दबाव पडा कि वह विपन्न जेन को भूल जाए, क्योंकि उस पर पूरे परिवार की ज़िम्मेदारियां हैं. टॉम भी आयरलैण्ड की एक सम्पन्न युवती से नाता जोडने के लिए जेन को भुला देता है. स्पेन्स बलपूर्वक यह कहते हैं कि परिवार से इतर ये दो व्यक्ति, एलिज़ा और टॉम, जेन को सर्वाधिक प्रिय थे और अपनी किशोरावस्था में वह इनसे इतनी अधिक प्रभावित हुई कि इनके व्यक्तित्व और इनसे जुडे प्रसंग उसके लेखन में बार-बार आते हैं. जेन की इस जीवनी में टॉम और एलिज़ा के अलावा और भी अनेक लोग हैं, जैसे एनेले फ्रॉय, जिन्होंने जेन ऑस्टेन के मनोजगत का निर्माण किया. जीवनीकार इन सब के माध्यम से लेखिका के मनोजगत तक पहुंचने की राह का निर्माण करता है और जीवन के कला में रूपांतरण की प्रक्रिया से हमारा साक्षात्कार कराता है. वह बताता है कि जेन ने अपने परिवार से भी काफी कुछ लिया, “उनकी बातों से तर्क क्षमता, कार्य-कारण सम्बन्ध की पहचान, सम्भावनाओं की अचूक पकड और मानवीय आकांक्षाओं की गहरी समझ!” जोन यह किताब लिखते हुए जीवनीकार और आलोचक की भूमिकाओं के बीच चहल-कदमी करते रहते हैं. मसलन ‘मेन्सफील्ड पार्क’ की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि हमारा मूल्यबोध हमें एक राह दिखाता है तो मन दूसरी राह पर चलने को कहता है. ‘मेन्सफील्ड पार्क’ इसी मानवीय उलझन की कथा है और लेखिका ने प्रयत्न पूर्वक ऐसा संसार रचा है कि पाठक उपन्यास के चरित्रों को लेकर भी उलझन में पडता है. इसी तरह की टिप्पणी ‘पर्सुएसन’ के लिए भी की गई है. इस तरह की अनेक टिप्पणियां पढने के बाद निश्चय ही हम न केवल जेन ऑस्टेन के जीवन के बारे में अधिक जान पाते हैं, उनके कथा साहित्य से भी हमारा रिश्ता अधिक प्रगाढ होता है.
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Discussed book: Becoming Jane Austen By Jon Spence Published By Continuum Paperback, 294 pages Price: £ 8.99
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स में 20 मार्च 2008 को प्रकाशित.
आपका सर दर्द कर रहा है. घर में सस्ती एस्पिरिन है, आप लेते हैं. दर्द ठीक नहीं होता. दुकानदार आपको एक महंगी दवा देता है. उसमें भी वही एस्पिरिन है, लेकिन उससे आपका सर दर्द ठीक हो जाता है.
आपको किसी शानदार होटल में बहुत महंगा खाना खाने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं होती, लेकिन रिक्शा वाले से आप एक रुपये के लिए भी झिकझिक करते हैं. आप बहुत ईमानदार इंसान हैं. अपने दफ्तर में कोई आर्थिक घपला नहीं करते. लेकिन उसी दफ्तर की स्टेशनरी वगैरह घर ले जाने में आपको कोई संकोच नहीं होता.
आप जानते हैं कि ज़्यादा खाना आपकी सेहत के लिए हानिप्रद है, फिर भी आप किसी शादी में बेझिझक ठूंस-ठूंस कर भकोसते हैं.
आखिर ऐसा क्यों होता है?
एम आई टी के व्यवहारवादी अर्थशास्त्री डान एरियली की मानें तो हममें से ज़्यादातर लोग यह गलतफहमी पाले रहते हैं कि अपनी ज़िन्दगी के अधिकांश फैसले हम सोच-समझकर और तर्कपूर्वक करते हैं. एरियली ने लम्बी शोध के बाद यह पाया कि कैसे हमारी अपेक्षाएं, भावनाएं, सामाजिक स्थितियां और अनेकानेक अदृश्य तथा अतार्किक ताकतें हमारी तर्क क्षमता को विकृत करती हैं. हम न केवल असामान्य और बेहूदा गलतियां करते हैं, उन्हें लम्बे समय तक दुहराते भी रहते हैं. एरियली बताते हैं कि हमारा ऐसा व्यवहार न तो अतार्किक होता है और न निरर्थक. बल्कि यह सब निहायत व्यवस्थित और पूर्वानुमान योग्य होता है. इसीलिए, उनकी ताज़ा किताब का शीर्षक है : प्रेडिक्टेब्ली इर्रेशनल : द हिडन फोर्सेज़ दैट शेप आवर डिसीजन्स. अब दवा वाली बात ही लीजिए. अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के एक अध्ययन के हवाले से एरियली बताते हैं कि जब आप महंगी एस्पिरिन लेते हैं तो उससे दर्द निवारण की आपकी उम्मीद भी बढ जाती है, जबकि सस्ती दवा लेते हुए आप खुद उसके असर के बारे में संशयालु होते हैं. इसी बात को आगे बढाते हुए एरियली यह भी कहते हैं कि हम वस्तुओं का मूल्यांकन केवल उन्हीं के गुण दोष के आधार पर नहीं करते, बल्कि उनकी तुलना वैसी ही और वस्तुओं से करते हुए उनका मूल्यांकन करते हैं. आप बाज़ार में म्यूज़िक सिस्टम खरीदने जाते हैं. खुद आपके मन में यह साफ नहीं होता कि आप कैसा सिस्टम चाहते हैं. दुकानदार आपको एक के बाद एक कई सिस्टम दिखाता सुनाता है, और अंतत: आप जो फैसला करते हैं वह कुछ इस तरह होता है कि यह पहले वाले से बेहतर है. यानि आपके फैसले सापेक्ष और तुलनात्मक होते हैं. आपकी इसी मनोवृत्ति का फायदा चतुर सेल्स पर्सन उठाता है. वह पहले आपको एक साधारण उत्पाद दिखाता है, फिर उससे बेहतर, और तब आपको लगता है कि पहले वाला उत्पाद तो खरीदने काबिल नहीं है. अगर उसने बाद वाला उत्पाद न दिखाया होता तो आपने उस उत्पाद को खारिज़ नहीं किया होता. एरियली एक और बात कहते हैं. यह बहुत मह्त्वपूर्ण है. वे कहते हैं कि जब आपके जीवन में बाज़ार के और समाज के प्रतिमान टकराते हैं तो असल मुसीबत पैदा होती है. जब आप बाज़ार जाते हैं और कुछ खर्च करते हैं तो आप चाहते हैं कि आपको उस खर्च के बदले में कुछ मिले: कोई वस्तु या कोई सेवा. मुसीबत तब पैदा होती है जब आप अपनी सामाजिक ज़िन्दगी में भी यही उम्मीद करना शुरू करते हैं. आप अपने दोस्त पर कुछ खर्च करते हैं और बदले में चाहते हैं कि वह आपका सम्मान करे. ऊपर से यह बात अविश्वसनीय लगती है, लेकिन एरियली जिस तरह, खास तौर पर प्रेम सम्बन्धों के हवाले से, इसे पेश करते हैं, यही बात बहुत कुछ सोचने को प्रेरित करती है.
एरियली बल पूर्वक कहते हैं कि हम अपने अतार्किक लगने वाले व्यवहार को अक्सर दुहराते रहते हैं. यह इसलिए होता है कि असल में वह व्यवहार सकारण होता है. अब यही बात लें कि आप कोई विज्ञापन देखते हैं जिसमें लिखा होता है कि ‘एक के साथ एक मुफ्त’ और आप तुरंत प्रभावित हो जाते हैं. क्या आप यह नहीं जानते कि कुछ भी मुफ्त देकर दुकानदार भला नुकसान क्यों उठाएगा? मुफ्त बताकर दी जाने वाली चीज़ के भी वह आपसे पैसे लेता है. कुल मिलाकर मुफ्त के लालच में पडकर आप वह वस्तु भी खरीद लेते हैं, जिसकी शायद आपको ज़रूरत नहीं थी. अगर आप तर्क से इस बात को समझ भी लेते हैं तो भी अगली बार फिर से ‘मुफ्त’ पढते ही उसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं. चतुर व्यापारी आपकी इसी कमज़ोरी का फायदा उठा कर दिन–दूनी रात-चौगुनी तरक्की करता रहता है. इन दिनों भारत में बाज़ार जिस तरह अपने हाथ-पाव पसार रहा है, उसकी बहुत सारी झांकियां हमें अनायास ही इस किताब में मिल जाती हैं. निश्चय ही यह किताब हमें अपने व्यवहार, भले ही वह आर्थिक हो या सामाजिक, पर पुनर्विचार का अवसर प्रदान करती है. ◙◙◙
Discussed book: Predictably Irrational: The Hidden Forces That Shape Our Decisions By Dan Ariely Published by: Harper Collins Hardcover: 304 pages US $ 25.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 13 मार्च 2008 को प्रकाशित.
अगर दुनिया पर औरतों का राज हो जाए तो? व्हाइट हाउस की पूर्व प्रेस सचिव डी डी म्येर्स का खयाल है कि अगर ऐसा हो जाए तो सब कुछ बदल जाएगा. राजनीति अधिक सुघड हो जाएगी, व्यापार अधिक उत्पादक हो जाएगा और समुदाय भावना अधिक पुष्ट हो जाएगी. स्त्री सशक्तिकरण से दुनिया अधिक बेहतर हो जाएगी. इसलिए, कि औरतें मर्दों से भिन्न होती हैं. 1992 में बिल क्लिण्टन के राष्ट्रपति अभियान की प्रवक्ता, 93-94 में व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव, राजनीतिक विवेचक, मीडिया विश्लेषक और एन बी सी के द वेस्ट विंग कार्यक्रम की कंसल्टेण्ट के रूप में अपनी भूमिकाओं को स्मरण करते हुए म्येर्स यहां शीर्ष स्थानीय महिलाओं की महत्वपूर्ण किंतु प्राय: उपेक्षित और अवमूल्यित क्षमताओं का आकलन करती हैं. वे कहती हैं कि “स्त्रियां बेहतर सम्प्रेषक, बेहतर श्रोता होती हैं और आम सहमति कायम करने की अधिक योग्यता रखती हैं.” उनका खयाल है कि अधिक प्रतिस्पर्धी और निरंतर चिडचिडे होते जा रहे विश्व में स्त्रियां ही हैं जिनके पास समस्याओं को सुलझाने वाली योग्यता है और जो अपनी समझ का प्रयोग कर बेहतर माहौल तैयार कर सकती हैं. पूरी किताब तीन खण्डों में विभक्त है: दुनिया पर औरतों का राज क्यों नहीं है, दुनिया पर औरतों का राज क्यों होना चाहिए, और औरतें कैसे दुनिया पर राज कर सकती हैं. म्येर्स अपनी बात का प्रारम्भ स्वानुभव से करती हैं. वे एक मार्मिक प्रसंग लाती हैं. जब वे दूसरी कक्षा में पढती थीं, उनकी कक्षा के बच्चों से पूछा गया कि बे बडे होकर क्या बनना चाहते हैं. उनके पास बैठे लडके ने कहा कि वह टी वी मैकेनिक बनना चाहता है. म्येर्स को लगा कि देखो, लडके को यह आज़ादी है कि वह जो चाहे बन सकता है, लेकिन बेचारी लडकी को तो मास्टरनी, नर्स या नन ही बनना पडेगा. म्येर्स अपने जीवन पर मां और दादी के सशक्त प्रभावों को भी बहुत आत्मीयता और कृतज्ञता से स्मरण करती हैं.
व्हाइट हाउस में प्रेस सचिव के पद पर पहुंचने वाली वे प्रथम महिला थीं. वे कहती हैं कि इस पद पर पहुंचने से उनकी ज़िन्दगी तो बदली, लेकिन दुनिया नहीं. तभी उन्हें लगा कि दुनिया को बदलने के लिए ज़रूरी है कि और अधिक औरतें शीर्ष पर पहुंचें. वहां उन्हें भेदभाव का सामना भी कम नहीं करना पडा. जब उनकी पदोन्नति हुई तो आर्थिक लाभ यह कहते हुए किसी अन्य पुरुष को दे दिया गया कि उसे तो एक परिवार का भरण पोषण भी करना है. म्येर्स को इस बात की गहरी तकलीफ है कि औरतों का मूल्यांकन उनके काम की बजाय उनके रंग-रूप के आधार पर अधिक किया जाता है. वे बताती हैं कि जब वे व्हाइट हाउस में थीं, प्रेस की दिलचस्पी राष्ट्रपति की राजनीति से हटकर उनके इयर रिंग्ज़, उनके मेक अप, कपडों, यहां तक कि केशों के बारे में भी कम नहीं थी. अमरीका में विद्यमान विषमताओं के बारे में वे तथ्य देकर बताती हैं. वहां स्त्री मतदाता पुरुष मतदाताओं से ज़्यादा हैं लेकिन सीनेट में केवल सोलह प्रतिशत महिलाएं हैं, देश के पचास गवर्नर्स में से केवल आठ स्त्रियां हैं, आज तक कोई महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकी है. व्यापार जगत में भी स्थिति ऐसी ही है. फॉर्च्यून 500 कम्पनियों में महिला सी ई ओ केवल दो प्रतिशत हैं, कॉर्पोरेट ऑफिसर सोलह प्रतिशत. शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भी यही स्थिति है. अमरीका से बाहर की दुनिया में भी हालत कमोबेश यही है.
औरतें दुनिया पर राज क्यों करें, इस सवाल का बहुत सीधा जवाब म्येर्स यह कहकर देती हैं कि औरतों के पास परानुभूति की क्षमता होती है. औरत ही बच्चे को जन्म देती है और स्वयं से पहले उसके या अन्य के बारे में सोचती हैं. म्येर्स कहती हैं कि अकेले इस गुण के दम पर ही महिलाएं बेहतर सिद्ध हो जाती हैं. दूसरी बात है महिलाओं की व्यावहारिक बुद्धि. म्येर्स कहती हैं कि औरतें एक दूसरे की मदद करती हुई उन सारे अवरोधों को हटा सकती हैं जो खुद उन्होंने महसूस किए हैं और वे बच्चों को यह सिखा कर बेहतर दुनिया बना सकती हैं कि कैसे अंतर को पहचानते हुए समानताओं का वरण किया जा सकता है. म्येर्स मानती हैं कि आज दुनिया में जो टकराव की संस्कृति विद्यमान है उसकी जगह आम सहमति की संस्कृति लाने में स्त्रियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है.
खुद म्येर्स कहती हैं कि उन्होंने यह किताब न तो पुरुषों पर प्रहार करने के लिए लिखी है और न वे उनका महत्व कम करना चाहती हैं. वे तो मात्र इतना कहना चाहती हैं कि दुनिया बदल जाएगी, अगर हम बेटियों को भी बेटों-सा मान देने लग जाएं!
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Discussed book: Why Women Should Rule the World By Dee Dee Myers Published by Harper Pages 288, Hardcover.
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' में दिनांक 06 मार्च 2008 को प्रकाशित.
अगर शिकागो में एक भी बच्चा ऐसा है जो स्कूल नहीं जा सकता तो वह मेरे लिए महत्वपूर्ण है, भले ही वह मेरा बच्चा नहीं है. अगर कहीं कोई ऐसा वृद्ध है जो अपने इलाज़ के पैसे नहीं जुटा सकता और उसे अपने मकान किराये या इलाज़ में से एक को चुनना पडता है तो मुझे लगता है कि मैं गरीब हूं, भले ही वह वृद्ध मेरा कोई नहीं लगता. अगर कहीं कोई अरब-अमरीकी परिवार बिना कारण धर लिया जाता है और अपनी मदद के लिए वकील नहीं कर पाता तो मुझे लगता है कि मेरी नागरिक स्वाधीनता खतरे में है... यह अंश है बराक ओबामा के एक भाषण का. ओबामा की ताज़ा किताब ड्रीम्स ऑफ माइ फादर : ए स्टोरी ऑफ रेस एण्ड इनहेरिटेंस नस्लवाद पर एक ऐसे व्यक्ति का नज़रिया पेश करती है जिसने खुद उसे तथा विविध संस्कृतियों को देखा-जिया है. किताब में हम उसकी दृष्टि को निर्मित होते देखते हैं. 1961 में एक श्वेत मां और अश्वेत केन्याई विद्यार्थी-पिता की संतान के रूप में जन्मे बराक ओबामा की यह संस्मरणात्मक कृति असामान्य तो है ही, नस्लवाद की कई परतों को भी उघाडती है. बराक ओबामा ने 1991 में हारवर्ड लॉ स्कूल से स्नातक उपाधि प्राप्त की और उसके बाद वे हारवर्ड लॉ रिव्यू के पहले अफ्रीकी अमरीकी अध्यक्ष बने. उन्होंने सामुदायिक संगठन, नागरिक अधिकार अटॉर्नी और लॉ प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएं दीं. 1997 में उन्होंने इलिनॉय की जनरल असेम्बली में दक्षिणी शिकागो का प्रतिनिधित्व किया और अब वे इलिनॉय से ही जूनियर सिनेटर बनने की राह पर अग्रसर हैं. ये ओबामा जब हारवर्ड लॉ रिव्यू के अध्यक्ष बने तो उन्हें एक किताब लिखने का प्रस्ताव मिला. इस किताब के माध्यम से ओबामा ने अपने असामान्य जीवन की यात्रा के कुछ पडावों को अपने पाठकों से साझा किया है. इस काव्यात्मक किंतु भावुकता-विहीन संस्मरण पुस्तक की शुरुआत न्यूयॉर्क से होती है जहां ओबामा को पता चलता है कि उनके पिता एक कार दुर्घटना में चल बसे हैं. यह दुखद समाचार उनकी स्मृति यात्रा का प्रारम्भ करता है. सबसे पहले वे कैनसस के एक छोटे-से कस्बे में अपनी मां के परिवार के हवाई प्रव्रजन के अवशेष तलाशते हैं और फिर केन्या जाकर अपने परिवार का अफ्रीकी पक्ष ढूंढते हैं. वहीं पिता के जीवन के अप्रिय पहलू से भी उनका सामना होता है. हम जान पाते हैं कि ओबामा के पिता हवाई विश्वविद्यालय में एक एक्सचेंज स्टुडेण्ट के रूप में गए हुए थे. वहां उनकी मुलाक़ात एक सुन्दरी से हुई. उसी मुलाक़ात और निकटता की परिणति हुई ओबामा के जन्म के रूप में. ओबामा की मां का परिवार कैनसस से हवाई गया था. ओबामा जब महज़ दो साल का था तभी उसके पिता हारवर्ड चले गए, और फिर लगभग दस बरस बाद लौटे, मात्र एक माह के लिए. बाद में यह पता चला कि ओबामा के पिता की एक पत्नी और कुछ बच्चे पहले से ही अफ्रीका में थे. हारवर्ड में उन्हें तीसरी पत्नी मिली, जिससे कई बच्चे और हुए. ओबामा ने अपनी ज़िन्दगी के कई बरस इण्डोनेशिया में मां और इण्डोनेशियाई सौतेले पिता के साथ बिताए. जब उनकी मां पढाई के लिए समुद्र पार चली गई तो वे अपने नाना-नानी के साथ भी रहे. ओबामा के पिता चुस्त और महत्वाकांक्षी थे. जीवन के प्रारम्भिक दौर में वे खासे सफल भी रहे लेकिन बाद में अपने अपरिपक्व व्यवहार की वजह से वे केन्याई तानाशाही की आंखों की किरकिरी बन गए. उन्होंने नौकरी खोई और ब्लैकलिस्ट हुए. इन आघातों ने उन्हें पियक्कड बना दिया. बाद में जब केन्या में नया निज़ाम आया तो उनके बुरे दिन खत्म हुए लेकिन तब तक परिवार टूट-बिखर चुका था. ओबामा को ये सारी बातें बाद में ही पता चलीं. स्वाभाविक था कि उनके मन में अपने पिता की जो आदर्श और प्रेरक छवि थी, वह इन बातों से ध्वस्त हुई. इसकी एक परिणति यह भी हुई कि ओबामा ने खुद को शिकागो के एक सामुदायिक संगठन के कामों में डुबो लिया. अपनी तरह के लोगों के सुख दुख बांटने में उन्हें जीवन की सार्थकता नज़र आने लगी. तीन साल इस तरह बिताने के बाद ओबामा एक बार फिर केन्या लौटते हैं, अपने स्वर्गीय पिता की दुनिया में, अपने प्रामाणिक ‘स्व’ की खोज में. एक अश्वेत अमरीकी के रूप में वे अपने नित्यप्रति के क्रिया कलापों में अपनी पहचान पाते हैं. उन्हें पता चलता है कि केन्या में लगभग 400 जनजातियां हैं और हरेक में कुछ न कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो अन्य जन जातियों में भी हैं. ओबामा पाते हैं कि केन्या और शिकागो दोनों ही जगहों पर नस्लवाद, गरीबी और भ्रष्टाचार है. लेकिन इसी के साथ उन्हें अपने समुदाय में ऐसे लोग भी मिलते हैं जो ईमानदार और भले हैं तथा अपने लक्ष्यों के प्रति पूर्णत: समर्पित हैं. किताब में फॉकनर को उधृत करते हुए ओबामा कहते हैं कि अतीत न तो कभी मरता है और न कभी दफ्न होता है. वह व्यतीत भी नहीं होता. अतीत इसी तरह वर्तमान का निर्माण करता है. यहां हम बहुत साफ देखते हैं कि किस तरह ओबामा के अतीत ने उसके वर्तमान को रचा है. ◙◙◙
Discussed book: Dreams from My Father: A Story of Race and Inheritance By Barack Obama Published By: Three Rivers Press Paperback: 480 Pages US $ 14.95
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 28 फरवरी 2008 को प्रकाशित.
क्या मात्र छह शब्दों में कोई अपने पूरे जीवन का सार प्रस्तुत कर सकता है? क्या इतने कम शब्दों में एक पूरी कहानी कही जा सकती है? कभी जाने-माने कथाकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे के सामने भी यह कठिन काम करने की चुनौती पेश की गई थी. उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप महज़ छह शब्दों में एक पूरी कथा कह दी थी. वे छह शब्द थे : “फोर सेल: बेबी शूज़, नेवर वोर्न” (बच्चे के अनपहने जूते बिकाऊ हैं). वैसे, हमारे अपने महाकवि बिहारी का भी सबसे बडा कौशल इसी बात में माना जाता है कि उन्होंने दोहा जैसे छोटे छन्द में बहुत बडी बात कही थी.
2006 में ऑन लाइन कथा पत्रिका स्मिथ ने अपने पाठकों और लेखकों के सामने फिर से यही चुनौती पेश की. उसने लोगों से उनके संस्मरण आमंत्रित किए. लेकिन एक शर्त थी. शब्द सीमा थी छह शब्दों की. और अब इस किताब के रूप में उन्हीं प्रविष्टियों में से लगभग एक हज़ार प्रविष्टियां हमारे सामने लाई गई हैं. इन्हें 32 श्वेत श्याम रेखांकनों ने और भी आकर्षक बना दिया है. स्मिथ पत्रिका के संस्थापक सम्पादक लॉरी स्मिथ मेन्स जर्नल के लेख सम्पादक, और याहू के एग्ज़ीक्यूटिव सम्पादक रह चुके हैं और उनके लेख न्यूयॉर्क टाइम्स, वायर्ड, पॉप्युलर साइन्स आदि में छपते रहे हैं. राशेल फर्शाइज़र स्मिथ पत्रिका की संस्मरण सम्पादिका हैं और अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं. इन दोनों द्वारा सम्पादित नॉट क्वाइट व्हाट आई वाज़ प्लानिंग: सिक्स वर्ड मेमोयर्स बाइ राइटर्स फेमस एण्ड ओब्स्क्योर एक ऐसी किताब है जो एक साथ ही दिलचस्प भी है, मज़ाकिया भी, विचारोत्तेजक भी और यदा-कदा हास्यास्पद भी. इस किताब के लेखकों में (अगर उन्हें लेखक कहा जा सके, क्योंकि उनमें से हरेक के लिखे महज़ छह शब्द ही तो यहां हैं) प्रसिद्ध लेखक हैं, कम प्रसिद्ध लेखक हैं और आम पाठक भी हैं. इन सबको एक साथ पढने के बाद लगता है कि हमने मानवता की गंगा में डुबकी लगा ली है. यहां उल्लास भी है, अवसाद भी. निराशा है तो आशा भी. जितने भी मनोभाव हो सकते हैं वे सब यहां एक साथ सुलभ हैं. इतने अल्प शब्दों में जो बात कही गई है, उसका हिन्दी अनुवाद अपने आप में कम चुनौती पूर्ण नहीं है. अनुवाद में छह शब्द घट-बढ जाते हैं. नौ वर्षीया हाना डेविस ने लिखा, “कैंसर से अभिशप्त, दोस्तों से वरदानित” तो पत्रकार चक क्लोस्टरमेन ने आश्चर्य किया, “किसी ने परवाह नहीं की. फिर की. क्यों?” जैक नेल्सन ने कहा, “मैं अबभी दो केलिए कॉफी बनाता हूं” तो एक अन्य ने अपने खट्टे-मीठे प्रणय को इन शब्दों में अभिव्यक्त किया, “मिला सच्चा प्यार, दूसरे से शादी करके”. लेखक जॉयस केरॉल ओट्स ने इसी बात को कुछ दूसरे अन्दाज़ में कहा, “सबसे अच्छा बदला: तुम्हारे बिना बेहतर ज़िन्दगी” . नोरा एफ्रॉन ने सलाह दी, “जीवन का रहस्य: शादी करो इतालवी से” तो ए जे जेकब ने अपने पूरे जीवन को इस तरह बयान किया: “गंजा जन्मा, बाल उगे, फिर गंजा.” किताब में केवल लेखकों के ही आत्म कथ्य नहीं हैं, जीवन के विविध क्षेत्रों के जाने-माने हस्ताक्षर यहां मौज़ूद हैं. विदूषक स्टीफेन कोलबर्ट कहते हैं, “मेरा खयाल है कि यह मज़ाकिया है” तो बिल क्वेरेंगेस्सर ने मज़ेदार उक्ति दी है, “सत्तर बरस, कम आंसू, बालदार कान”. अलाना शुबाख का निष्कर्ष है: “रक्षक ग्रंथि अनेक निराशाओं की जनक” तो सेबस्टियन जंगर का कहना है, “मैंने पूछा, उन्होंने बताया, मैंने लिखा.” अब बतायें, भला लेखन की इससे संक्षिप्त व्याख्या और कुछ भी हो सकती है? अगर यह अपर्याप्त लगे तो मार्था गार्वे की सलाह सुन लीजिए: “सेक्स पर लिखो, प्यार को सीखो”. किताब को पढते हुए लगता है कि ज़िन्दगी को महज़ छह शब्दों में बयान करने की चुनौती दिलचस्प भी है, शिक्षाप्रद भी. यह किताब लगभग उसी समय प्रकाशित हुई है जब हमारे अपने देश भारत में नन्ही कार नैनो की चर्चा है. ये नैनो संस्मरण भी उससे कम आकर्षक नहीं हैं. कहना अनावश्यक है कि किताब को पढते-पढते हम भी अपने छह शब्द बुनने-चुनने लगते हैं. अगर मुझे भी मात्र छह शब्दों में इस किताब पर टिप्पणी करनी हो तो मेरे छह शब्द होंगे : “पढें, मज़ा लें, पढायें, बार-बार”.
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Discussed book: Not Quite What I Was Planning: Six-Word Memoirs by Writers Famous and Obscure By Larry Smith and Rachel Fershieiser Published by Harper Perennial Paperback, 240 Pages US $ 12.00
सारी दुनिया में अनगिनत लोग ऐसे रोगों से पीडित हैं जिनका कोई इलाज़ नहीं है. अकेले अमरीका में हर दिन 9 करोड लोग ऐसी बीमारियों से जूझते हैं.. ऐसी बीमारियों के बारे में जब भी कोई बात होती है, हम रोग के लक्षणों के बारे में चर्चा करके रह जाते हैं. शायद ही कभी ऐसा होता हो कि हम उन इन्सानों की ज़िन्दगी में भी झांक पाते हों जो रोज़-रोज़ इन रोगों की असहनीय वेदनाओं से आहत होते हैं और फिर भी जीते रहते हैं. एक ऐसी दुनिया में जहां सामान्यता का उत्सव मनाया जाता है, व्हील चेयर पर या छडी के सहारे ज़िन्दगी गुज़ारना कैसा होता है? 2003 में प्रकाशित बेस्ट सेलर पुस्तक ब्लाइण्डसाइडेड के लेखक रिचार्ड एम कोहेन ने अपनी सद्य प्रकाशित किताब स्ट्रोंग एट द ब्रोकन प्लेसेस: वॉइसेस ऑफ इलनेस, अ कोरस ऑफ होप में पांच ऐसे लोगों की ज़िन्दगी की परतें खोली हैं जो हालांकि उम्र, लिंग, नस्ल और आर्थिक स्तर के लिहाज़ से एक दूसरे से नितांत भिन्न हैं, साहस, मज़बूत इरादों और जिजीविषा के लिहाज़ से समान हैं. वैसे, लेखक खुद भी एक गम्भीर स्नायविक रोग मल्टीपल स्क्लेरोसिस से ग्रस्त है. आइए, इन पांच महानायकों से हम भी मिलें! डेनिस ग्लास एक असाध्य न्यूरो डीजेनेरेटिव रोग ए एल एस से ग्रस्त है. उसके लिए बोल पाना तक सुगम नहीं रह गया है. वह अपनी गर्दन भी ठीक से नहीं उठा पाता है. लेकिन, बिना आत्मदया का शिकार हुए, अपने परिवार से अलग रह कर वह इस रोग से लडा रहा है. किताब का दूसरा महानायक 46 बरस का बज़ बे अपेक्षाकृत अधिक प्राणघातक नॉन हॉजकिंस लिम्फोमा (कैंसर) से पीडित है और सामने खडी मौत को देख कर भी उम्मीद का दामन छोडने को तैयार नहीं है. वह मानता है कि अपने सकारात्मक सोच से 98% लडाई जीती जा सकती है. अपनी इस अति गम्भीर बीमारी के बावज़ूद वह एक होसपाइस वालण्टियर के रूप में अपनी सेवाएं देता है. किताब के तीसरे महानायक 18 साल के बेन कम्बो के लिए व्हील चेयर उसकी बेडी भी है, मुक्तिदात्री भी. जब वह तीन साल का था तभी पता चला कि उसे मस्क्यूलर डायस्ट्रोफी नाम का रोग है जिससे मांसपेशियां बहुत कमज़ोर हो जाती हैं. इस रोग का कोई इलाज़ नहीं है. लेकिन, बावज़ूद इस सचाई के, बेन रोग के साथ लडते हुए अपनी पढाई जारी रखे हुए है. किताब की चौथी चरित्र 28 साल की सारा लेविन पाचन नली की क्रोहन्स डिसीस से बुरी तरह ग्रस्त है. लेकिन फिर भी वह बच्चों के एक प्रयोगात्मक स्कूल में अपनी सेवाएं देने में कोई कोताही नहीं बरततीं. उनकी बडी आंत निकाली जा चुकी है और शेष बची ऊपरी पाचन नली बुरी तरह क्षत विक्षत है. पेट में लगातार रक्त-स्राव होता रहता है. कुछ भी ठीक नहीं है, सिवा उनके साहस के, जो एकदम अडिग और अविचल है. यह सारा की जिजीविषा ही है कि उसने 2007 में विवाह भी कर लिया. बाइपोलर डिस ऑर्डर से ग्रस्त लारी फ्रिक्स ने 80 के दशक का काफी वक़्त मनोरोग चिकित्सालय में गुज़ारा और अपने उन्माद के दौरों पर काबू पाने के लिए शराब का सहारा तक लिया. उन पर मनोरोगी होने का ठप्पा लग चुका है, लेकिन वे हैं कि इस कलंक को झुठलाते हुए एक मानसिक स्वास्थ्य कर्मी के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान करने को अपनी ज़िन्दगी की सबसे बडी सार्थकता मानते हैं. लेखक कोहेन ने इन पांच असाधारण लोगों की ज़िन्दगी को नज़दीक से देखने-परखने में तीन साल खर्च किए. कोहेन के शब्दों में, ये ‘रोगों के नागरिक’ हैं. उसका कहना है कि अलग-अलग पृष्टभूमि के बावज़ूद दर्द के साथ इनका रिश्ता समान है और इन सबका सन्देश भी एक ही है. इनका सन्देश है आत्मिक दृढता का, विषम स्थितियों में भी हौंसला बनाए रखने का, कठिनतम परिस्थितियों में शांत बने रहने का और अपने शेष बचे जीवन को दूसरों के लिए काम में लेने का. कोहेन का कहना है, हम जहां टूटते हैं, वहीं सबसे ज़्यादा मज़बूत भी होते हैं. अपनी उम्मीद से भी ज़्यादा! बीमारियों की आवाज़ों के बीच से आशा का समूहगान सुनवाने वाले कोहेन को यह उम्मीद है कि इस किताब को पढने के बाद वे लोग जो ऐसे ही असाध्य रोगों से जूझ रहे हैं, या उनके शुभाकांक्षी, महसूस करेंगे कि अपने संघर्ष में वे अकेले नहीं हैं. ◙◙◙
Discussed book: Strong at the Broken Places: Voices of Illness, a Chorus of Hope By Richard M. Cohen Published by Harper Pages 352, Hardcover US $ 24.95
अर्थशास्त्र को प्राय: एक मनहूस विज्ञान कहा जाता रहा है. गैर अर्थशास्त्री इसे नीरस, अमूर्त और एक हद तक अनुपयोगी ज्ञान-शाखा मानते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में अर्थशास्त्रियों ने अपने लेखन से इन धारणाओं को बदलने के प्रयास किए हैं. फ्रीकोनोमिक्स के रूप में किए गए एक ऐसे ही प्रयास में अर्थशास्त्र को अधिक रुचिकर रूप में प्रस्तुत किया गया था. उसके बाद तो जैसे दिलचस्प किताबों की एक श्रंखला ही बन गई. यहां तक कि स्पोर्ट्स अर्थशास्त्र पर भी दो किताबें आ गईं. अर्थशास्त्र विषयक दिलचस्प किताबों की श्रंखला में जुडी ताज़ा कडी है टिम हार्फर्ड की द लॉजिक ऑफ लाइफ: द रेशनल इकॉनोमिक्स ऑफ एन इर्रेशनल वर्ल्ड.
हार्फर्ड की इस दिलचस्प किताब का प्रस्थान बिन्दु यह विचार है कि इंसान इंस्ट्रुमेंटल रेशनलिटी (करणात्मक बुद्धिसंगतता) का इस्तेमाल करते हुए लागत और लाभ की गणना कर अपने जीवन के फैसले करता है. हार्फर्ड कहते हैं कि रेशनल लोग इंसेण्टिव्ज़ से परिचालित होते हैं. अगर उन्हें कोई काम महंगा लगता है तो वे उसे कम करते हैं और अगर सस्ता व अधिक लाभप्रद लगता है तो ज़्यादा करते हैं. जब कोका कोला की कीमत बढती है तो लोग पेप्सी ज़्यादा पीना शुरू कर देते हैं. जब शहरों में अपार्टमेण्ट्स की कीमतें बढती हैं तो लोग उपनगरों का रुख करने लगते हैं. इस तर्क को आगे बढाते हुए हार्फर्ड उन बहुत सारे मुद्दों पर विचार करते हैं जो सामान्यत: अर्थशास्त्र की परिधि में नहीं आते. जैसे, विवाह, नशे और जुए की लत, आपके बॉस को बहुत ज़्यादा तनख्वाह क्यों मिलती है, पडोसियों का पृथ्क्करण, अपराध का अर्थशास्त्र आदि. ज़ाहिर है, किताब बहुत व्यापक क्षेत्र में विचरण कर यह सिद्ध करती है कि अर्थशास्त्र एक बहुमुखी ज्ञान-शाखा है.
अपनी बात कहने के लिए हार्फर्ड जीवन के ऐसे अनेक प्रसंग लाते हैं जो ऊपरी तौर पर बुद्धिसंगत नहीं लगते. आखिर किसी का ड्रग लेना, असुरक्षित यौन सम्बन्ध स्थापित करना वगैरह बुद्धि संगत कैसे हो सकता है? प्रेम या तलाक़ के पीछे भला क्या आर्थिक तर्क हो सकते हैं? सच तो यह है कि हमारा पूरा जीवन ही एक अबूझ पहेली है. एक बस्ती बहुत विकसित हो जाती है और उसके ठीक बगल वाली अविकसित रह जाती है. एक निकम्मा आदमी जीवन की तमाम सीढियां चढ कर जाने कहां पहुंच जाता है! इन और ऐसी अनेक गुत्थियों को टिम हार्फर्ड सुलझाते हैं. वे एक ही बात कहते हैं – हमारे हर कृत्य के पीछे किसी न किसी इंसेण्टिव का हाथ होता है. हार्फर्ड ने अपनी इस किताब में वैवाहिक सम्बन्धों पर भी अर्थशास्त्र के नज़रिए से विचार किया है. अर्थशास्त्री गेरी वेबर के हवाले से वे कहते हैं कि विवाह समबन्धों के मूल में भी तीन आर्थिक ताकतों की अंत:क्रिया देखी जा सकती है: श्रम विभाजन, माप तोल की अर्थ व्यवस्था और तुलनात्मक लाभ का आकलन. गेरी स्त्री-पुरुष के बीच पारम्परिक श्रम विभाजन की चर्चा करते हुए एक मज़ेदार बात यह कहते हैं कि पुरुष आजीविका अर्जन का काम इसलिए नहीं करता कि वह यह काम बेहतर तरीके से कर सकता है, वह यह काम इसलिए करता है कि गृह प्रबन्धन का काम अगर वह करेगा तो ज़्यादा ही खराब तरह से करेगा.
हार्फर्ड जब आज के वैवाहिक परिदृश्य का विश्लेषण करते हैं तो वे कुछ विचारोत्तेजक तथ्य भी सामने लाते हैं. स्वाभाविक है कि ये तथ्य पश्चिमी दुनिया से हैं. वे कहते हैं कि आज औरतें कामकाजी केवल इसीलिए नहीं होती जा रही हैं कि उन्हें इसमें मज़ा आता है या इससे उन्हें खर्च करने की आज़ादी मिलती है. वे काम इसलिए भी करती हैं कि आज उनके सामने तलाक़ के खतरे बढ गए हैं. इसलिए, हार्फर्ड का तर्क है कि, आज बढते तलाकों के मूल में प्रेम के मनोविज्ञान में आ रहा बदलाव नहीं बल्कि परिस्थितियों के प्रति बुद्धिसंगत प्रतिक्रिया है. आज की औरत के प्रति अधिक संवेदनशील होते हुए हार्फर्ड कहते हैं कि अधिक शक्तिशाली पदों पर स्त्री की पहुंच ने आज उसे यह आज़ादी दी है कि अगर उसके वैवाहिक रिश्ते ठीक-ठाक न हों तो वह तलाक़ ले ले, और इसके उलट यह भी कि तलाक़ का यह विकल्प शक्तिशाली सेवाओं में स्त्रियों की भागीदारी में इज़ाफा कर रहा है.
यह अर्थशास्त्र की ऐसी किताब है जो आंकडों या समीकरणों की बजाय व्यक्तियों के माध्यम से अपनी बात कहती है. हार्फर्ड का सन्देश बहुत स्पष्ट है. अगर आप अपनी दुनिया को समझना या बदलना चाहते हैं तो पहले उन बुद्धिसंगत विकल्पों को समझिए जिन्होंने इसे इसकी मौज़ूदा शक्ल बख्शी है. ◙◙◙
Discussed book: The Logic of Life: The Rational Economics of an Irrational World By Tim Harford Published by Random House Hardcover, 272 pages US $ 25.00
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 07 फरवरी 2008 को प्रकाशित