अब तक महिला विषयक लेखन के लिए सुपरिचित बेस्ट सेलर लेखिका नाओमी वुल्फ अपनी नई किताब ‘द एण्ड ऑफ अमरीका: लेटर ऑफ वार्निंग टू अ यंग पैट्रिअट’ के माध्यम से अपने देशवासियों को आगाह करती हैं कि उनके देश में प्रजातंत्र का बने रहना इस बात पर निर्भर है कि वे उसमें कितनी भागीदारी निबाहते हैं. यूरोपीय व अन्य देशों के सत्तावादी उभारों के इतिहास का स्मरण करते हुए वह भयावह आशंका जताती है कि अमरीका में भी ऐसा हो सकता है. वुल्फ बताती हैं कि किस तरह दुनिया के तमाम निरंकुश अत्याचारी शासक एक खास क्रम में उठाये गए दस कदमों से प्रजातंत्र को कुचलते रहे हैं. ये दस कदम हैं : सबसे पहले आंतरिक और बाह्य संकट का हौव्वा खडा किया जाए, गुप्त कारागार स्थापित किए जाएं, एक पैरा मिलिट्री फोर्स बनाई जाए, आम नागरिकों की निगरानी शुरू की जाए, नागरिक समूहों में घुसपैठ की जाए, मनमाने तरीके से नागरिकों की पकड-धकड की जाए और बिना किसी तर्क के उन्हें छोड भी दिया जाए, मुख्य व्यक्तियों को निशाना बनाया जाए, प्रेस को नियंत्रित किया जाए, आलोचना को ‘जासूसी’ का और असहमति को ‘देशद्रोह’ का नाम दिया जाए, और न्याय पूर्ण व्यवस्था को नष्ट किया जाए. सारी दुनिया में इन कदमों का प्रयोग खुले समाजों को बर्बाद करने में किया जाता रहा है.
नाओमी वुल्फ की यह किताब भयावह है क्योंकि यह अमरीका के आज के घटनाक्रम और बीसवीं शताब्दी के मध्य के उस घटनाक्रम में साम्य दर्शाती है जिसकी परिणति फासीवाद और द्वितीय विश्व युद्ध में हुई थी. वुल्फ ज़ोर देकर कहती हैं कि समाज तानाशाही की तरफ यकायक नहीं मुड जाया करते. प्राय: होता यह है कि ज़्यादातर लोगों की सामान्य नियमित दिनचर्या अप्रभावित रहती है. हो सकता है कि हम ‘अमरीकन आइडल’ देखते रहें, मॉल में जाकर पिज़्ज़ा ऑर्डर करते रहें और उसी वक़्त हमारी आज़ादी हमसे छीनी जाती रहे. इसीलिए वे कहती हैं कि अमरीका आज जिस रास्ते पर चल रहा है वह डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि आज़ादी का लोप तो सबको ही प्रभावित करेगा.
वुल्फ पूरी ऊर्जा और शिद्दत से यह एहसास कराती है कि बुश प्रशासन की नीतियों की वजह से उनका देश एक खतरनाक फासिस्ट शिफ्ट से गुज़र रहा है. वे कहती हैं कि फासीवाद तानाशाही के बगैर भी पनप सकता है.
हालांकि आम अमरीकी यह मानने को तैयार नहीं होता कि 9/11 के बाद उसका देश किसी भी तरह नाज़ी जर्मनी और चिली के फासीवाद और सर्वसत्तावादी कालखण्ड के समकक्ष बनता जा रहा है, लेकिन एक बहुत छोटे किंतु प्रतिबद्ध प्रकाशक के यहां से प्रकाशित वुल्फ की महज़ 192 पृष्ठों की किताब यह स्थापित करने में पूरी तरह कामयाब है कि उन समाजों और आज के अमरीकी समाज के बीच की समानांतरता और समानताओं या कि अनुगूंजों को अनसुना नहीं किया जा सकता. इस तरह यह किताब एक साथ ही चौंकाती है, डराती है और हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है.
नोआमी वुल्फ इस किताब में 30 के दशक के जर्मनी, 40 के दशक के रूस, 50 के दशक के पूर्वी जर्मनी, 60 के दशक के चेकोस्लोवाकिया, 70 के दशक के चिली और 80 के दशक के चीन के परिदृश्य से 2000 के बाद के अमरीका की समानताएं दिखाकर प्रजातंत्र के सम्भावित पटाक्षेप के खिलाफ जनमत जगाने का मूल्यवान प्रयास करती हैं. वे साफ शब्दों में कहती हैं कि प्रजातंत्र ऐसा तमाशा नहीं है जिसे दर्शक दीर्घा में बैठकर देख जाए. अमरीका के संस्थापकों ने ऐसे देश की कल्पना नहीं की थी जहां वकील, स्कॉलर, राजनीतिज्ञ जैसे प्रोफेशनल ही संविधान की व्याख्या और जनाधिकारों की चिंता करें. उन लोगों ने यह कभी नहीं चाहा था कि आम लोगों से अलग ताकतवर लोग आज़ादी की रक्षा करें. उन्होंने तो यह चाहा था कि आम लोग ही अपनी आज़ादी की रक्षा करें. अमरीका के संस्थापकों ने आज़ादी को नैसर्गिक, ईश्वर प्रदत्त और ऐसी व्यवस्था कभी नहीं कहा-समझा जिसमें सभ्यता स्वत: बनी रहेगी. बल्कि उन्होंने तो अत्याचार और दमन को यथास्थिति तथा स्वाधीनता को अपवाद माना. ऐसा अपवाद जिसको पाने के लिए संघर्ष किया जाए और जो अगर मिल जाए तो उसे सीने से लगाकर रखा जाए. नोआमी वुल्फ को शिकायत है कि अमरीकियों ने प्रजातंत्र को बहुत अगम्भीरता से लिया है, जबकि इसका तो अस्तित्व ही नागरिकों की सहभागिता और सक्रियता पर निर्भर है.
किताब अमरीका को सम्बोधित है, लेकिन हम भारतीयों के लिए भी इसकी प्रासंगिकता कम नहीं है. आज अमरीका इतनी बडी वैश्विक शक्ति बन चुका है कि वहां की हर छोटी-बडी हलचल शेष विश्व को भी प्रभावित करती है. अगर वहां प्रजातंत्र का क्षरण होता है तो उसका असर हम सब पर भी पडेगा. इस बात के अतिरिक्त भी, जो बातें नोआमी अमरीका को सम्बोधित कर कह रही हैं, उन्हें हमें भी सुनना और गुनना चाहिए. कभी पण्डित नेहरु ने भी तो कहा था : एटर्नल विजिलेंस इज़ द प्राइस ऑफ लिबर्टी.
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चर्चित पुस्तक :
The End of America: Letter of Warning To A Young Patriot
By Naomi Wolf
Publisher: Chelsea Green Publishing; White River Jct., VT 05001,USA
Pages: 192
US $ 13.95
[राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में दिनांक 30 अक्टूबर 2007 को मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत प्रकाशित.]
Tuesday, October 30, 2007
Tuesday, October 23, 2007
महान भारतीय गणितज्ञ के जीवन पर केन्द्रित उपन्यास
जनवरी 1913 की एक सुबह. अपने समय के एक बहुत बडे ब्रिटिश गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को भारतीय डाक टिकिट लगा एक रहस्यमय लिफाफा मिलता है. लिफाफे में है नौ पन्नों का एक बिखरा-बिखरा–सा पत्र. 23 साल के एक स्व-घोषित गणितीय जीनियस ने लिखा है कि उसने एक सार्वकालिक गणितीय गुत्थी को करीब-करीब सुलझा लिया है. हार्डी के कैम्ब्रिज के अनेक साथी कहते हैं कि यह पत्र फर्जी है, इसे गम्भीरता से लेने की कोई ज़रूरत नहीं है, लेकिन न जाने क्यों हार्डी को लगता है कि पत्र लेखक, भारतीय क्लर्क श्रीनिवास रामानुजन की बातों में दम है. वे अपने साथी लिटिलवुड और पत्नी एलिस के साथ मद्रास जा रहे एक युवा प्राध्यापक नेविल की मदद लेकर इस रहस्यमय रामानुजन के बारे में और जानकारी जुटाने तथा अगर सम्भव हो, उसे कैम्ब्रिज बुलाने के लिए तत्पर हो उठते हैं. हार्डी का यह निर्णय एक ऐसा निर्णय था जिसने न केवल उनकी और उनके दोस्तों की बल्कि पूरे गणित-इतिहास की ही धारा बदल डाली.
एक जाने-माने ब्रिटिश गणितज्ञ और एक अनजान तथा औपचारिक शिक्षा से लगभग वंचित गणितीय जीनियस की विस्मयकारी लेकिन त्रासद अंत वाली सत्य कथा पर आधारित डेविड लीविट्ट का ताज़ा उपन्यास ‘द इण्डियन क्लर्क’ इतिहास के एक छोटे-से अंश को एक भावपूर्ण, मंत्रमुग्धकारी कथा में रूपांतरित करने का रोचक प्रयास है. इससे पहले डेविड लीविट्ट के ग्यारह उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘द बॉडी जोनाह बॉय्ड’, ‘व्हाइल इंग्लैण्ड स्लीप्स’ और ‘ईक्वल अफेक्शन’ खासे चर्चित भी रहे हैं. ‘व्हाइल इंग्लैण्ड स्लीप्स’ एक गलत वजह से भी चर्चित रहा था. जाने-माने लेखक स्टीफेन स्पेण्डर ने इस पर नकल का आरोप लगाते हुए मुक़दमा ठोक दिया था और लीविट्ट को इसके कुछ अंश हटाने पडे थे.
ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित ‘द इण्डियन क्लर्क’ का आरम्भ 1936 की एक घटना से होता है. एक बूढे प्रोफेसर, जाने-माने गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने उनके मित्र श्रीनिवास रामानुजन के जीवन और कार्यों पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया है. रामानुजन को एक ऐसी विलक्षण गणितीय प्रतिभा के रूप में स्वीकृति मिल चुकी है जिसका सानी कई शताब्दियों में भी नहीं है. हार्डी से दस साल छोटे रामानुजन मद्रास में गरीबी और गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहे थे. उपनिवेशी शासन भला उनकी तरफ ध्यान क्यों देता? लेकिन हार्डी और उनके मित्रों के प्रयास से रामानुजन को यह अवसर मिला कि स्वदेश में उनकी जिस प्रतिभा को अनदेखा किया गया, उसका लोहा वे सारी दुनिया से मनवा सके. रामानुजन 1914 से 1919 के जिस काल खण्ड में इंग्लैण्ड में रहे वही इस उपन्यास का सबसे बडा हिस्सा है.
उपन्यास का नायक तमिल ब्राह्मण श्रीनिवास रामानुजन इंग्लैण्ड को बहुत रुचिकर और ऊष्मापूर्ण नहीं पाता. उसे वहां की सब्ज़ियां और मसाला रहित खाना बेस्वाद लगता है. लेकिन गणित उसके लिए आध्यात्म है, गणित के समीकरण मानो दैवीय अभिव्यक्ति हैं. हार्डी का सोच उससे भिन्न है. वे मानते हैं कि गणित और ईश्वर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं. इन हाड-मांस के वास्तविक चरित्रों के साथ ही हैं दो और चरित्र जिनके सृजन में रचनाकार ज़्यादा छूट ले सका है. लेविस की पत्नी एलिस और हार्डी की विरूपित बहन गरट्रूड. एलिस रामानुजन से प्यार करने लगती है और गरट्रूड अपने विख्यात भाई की छाया और स्त्री होने के अभिशाप के घेरे में सिमट कर रह जाती है.
पहला विश्वयुद्ध न केवल बाह्य साम्राज्य की चूलें हिलाता है, वह इन चरित्रों के पारस्परिक रिश्तों की नीवों की नज़ाकत को भी उजागर करता है. युद्ध के कारण कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय न केवल अस्पताल में तब्दील हो जाता है, उसकी बौद्धिक स्वतंत्रता पर प्रचार-तंत्र कब्ज़ा भी कर लेता है. विख्यात दार्शनिक बरट्रैण्ड रसेल को उनके शांतिमय विचारों के कारण जेल भेज दिया जाता है और हमारे जी. एच. हार्डी समझौता परस्ती का रास्ता अख्तियार कर अपनी प्रोफेसरशिप बचा पाते हैं. कहना अनावश्यक है कि डेविड लीविट्ट ने एक ऐसा विषय चुनने का दुस्साहस किया है जो उपन्यास की विधा के लिए उपयुक्त नहीं कहा जा सकता. उपन्यास की कथा बार-बार शिथिल पडती है. ऊपर से उनका विपुल शोध, जिसकी वजह से उपन्यास कभी-कभी जीवनी का आभास देने लगता है. लेकिन बावज़ूद इन बातों के, जब लीविट्ट गणित और उसके विरोधाभासों को मानवीय रिश्तों के सामने रखते हैं तो एक मार्मिक रूपक यह उभरता है कि कैसे अत्यंत सशक्त रिश्ते तर्क और कल्पना का अतिक्रमण कर जाया करते हैं.
इस उपन्यास का जितना महत्व अब अफसाना बन चुके श्रीनिवास रामानुजन के जीवन, संघर्ष और योगदान को उभारने में है, उतना ही बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इंग्लैण्ड के जीवन की बारीक पडताल में भी है. हम भारतीयों को तो लीविट्ट का विशेष रूप से आभार मानना चाहिए कि उन्होंने इस विलक्षण गणितीय प्रतिभा के जीवन पर इतने गहन शोध के साथ यह उपन्यास रचा है.
Discussed book:
The Indian Clerk: A Novel
By David Leavitt
Published By Bloomsbury USA
Pages 496
US $ 24.95
यह आलेख दिनांक 23 अक्टूबर 2007 को 'राजस्थान पत्रिका' के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' में प्रकाशित हुआ.
एक जाने-माने ब्रिटिश गणितज्ञ और एक अनजान तथा औपचारिक शिक्षा से लगभग वंचित गणितीय जीनियस की विस्मयकारी लेकिन त्रासद अंत वाली सत्य कथा पर आधारित डेविड लीविट्ट का ताज़ा उपन्यास ‘द इण्डियन क्लर्क’ इतिहास के एक छोटे-से अंश को एक भावपूर्ण, मंत्रमुग्धकारी कथा में रूपांतरित करने का रोचक प्रयास है. इससे पहले डेविड लीविट्ट के ग्यारह उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘द बॉडी जोनाह बॉय्ड’, ‘व्हाइल इंग्लैण्ड स्लीप्स’ और ‘ईक्वल अफेक्शन’ खासे चर्चित भी रहे हैं. ‘व्हाइल इंग्लैण्ड स्लीप्स’ एक गलत वजह से भी चर्चित रहा था. जाने-माने लेखक स्टीफेन स्पेण्डर ने इस पर नकल का आरोप लगाते हुए मुक़दमा ठोक दिया था और लीविट्ट को इसके कुछ अंश हटाने पडे थे.
ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित ‘द इण्डियन क्लर्क’ का आरम्भ 1936 की एक घटना से होता है. एक बूढे प्रोफेसर, जाने-माने गणितज्ञ जी. एच. हार्डी को हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने उनके मित्र श्रीनिवास रामानुजन के जीवन और कार्यों पर व्याख्यान देने के लिए बुलाया है. रामानुजन को एक ऐसी विलक्षण गणितीय प्रतिभा के रूप में स्वीकृति मिल चुकी है जिसका सानी कई शताब्दियों में भी नहीं है. हार्डी से दस साल छोटे रामानुजन मद्रास में गरीबी और गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहे थे. उपनिवेशी शासन भला उनकी तरफ ध्यान क्यों देता? लेकिन हार्डी और उनके मित्रों के प्रयास से रामानुजन को यह अवसर मिला कि स्वदेश में उनकी जिस प्रतिभा को अनदेखा किया गया, उसका लोहा वे सारी दुनिया से मनवा सके. रामानुजन 1914 से 1919 के जिस काल खण्ड में इंग्लैण्ड में रहे वही इस उपन्यास का सबसे बडा हिस्सा है.
उपन्यास का नायक तमिल ब्राह्मण श्रीनिवास रामानुजन इंग्लैण्ड को बहुत रुचिकर और ऊष्मापूर्ण नहीं पाता. उसे वहां की सब्ज़ियां और मसाला रहित खाना बेस्वाद लगता है. लेकिन गणित उसके लिए आध्यात्म है, गणित के समीकरण मानो दैवीय अभिव्यक्ति हैं. हार्डी का सोच उससे भिन्न है. वे मानते हैं कि गणित और ईश्वर दो अलग-अलग सत्ताएं हैं. इन हाड-मांस के वास्तविक चरित्रों के साथ ही हैं दो और चरित्र जिनके सृजन में रचनाकार ज़्यादा छूट ले सका है. लेविस की पत्नी एलिस और हार्डी की विरूपित बहन गरट्रूड. एलिस रामानुजन से प्यार करने लगती है और गरट्रूड अपने विख्यात भाई की छाया और स्त्री होने के अभिशाप के घेरे में सिमट कर रह जाती है.
पहला विश्वयुद्ध न केवल बाह्य साम्राज्य की चूलें हिलाता है, वह इन चरित्रों के पारस्परिक रिश्तों की नीवों की नज़ाकत को भी उजागर करता है. युद्ध के कारण कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय न केवल अस्पताल में तब्दील हो जाता है, उसकी बौद्धिक स्वतंत्रता पर प्रचार-तंत्र कब्ज़ा भी कर लेता है. विख्यात दार्शनिक बरट्रैण्ड रसेल को उनके शांतिमय विचारों के कारण जेल भेज दिया जाता है और हमारे जी. एच. हार्डी समझौता परस्ती का रास्ता अख्तियार कर अपनी प्रोफेसरशिप बचा पाते हैं. कहना अनावश्यक है कि डेविड लीविट्ट ने एक ऐसा विषय चुनने का दुस्साहस किया है जो उपन्यास की विधा के लिए उपयुक्त नहीं कहा जा सकता. उपन्यास की कथा बार-बार शिथिल पडती है. ऊपर से उनका विपुल शोध, जिसकी वजह से उपन्यास कभी-कभी जीवनी का आभास देने लगता है. लेकिन बावज़ूद इन बातों के, जब लीविट्ट गणित और उसके विरोधाभासों को मानवीय रिश्तों के सामने रखते हैं तो एक मार्मिक रूपक यह उभरता है कि कैसे अत्यंत सशक्त रिश्ते तर्क और कल्पना का अतिक्रमण कर जाया करते हैं.
इस उपन्यास का जितना महत्व अब अफसाना बन चुके श्रीनिवास रामानुजन के जीवन, संघर्ष और योगदान को उभारने में है, उतना ही बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इंग्लैण्ड के जीवन की बारीक पडताल में भी है. हम भारतीयों को तो लीविट्ट का विशेष रूप से आभार मानना चाहिए कि उन्होंने इस विलक्षण गणितीय प्रतिभा के जीवन पर इतने गहन शोध के साथ यह उपन्यास रचा है.
Discussed book:
The Indian Clerk: A Novel
By David Leavitt
Published By Bloomsbury USA
Pages 496
US $ 24.95
यह आलेख दिनांक 23 अक्टूबर 2007 को 'राजस्थान पत्रिका' के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' में प्रकाशित हुआ.
Saturday, October 20, 2007
दुनिया हमारे बगैर
तेज़ी से बढती दुनिया की आबादी और तकनीक का कल्पनातीत प्रसार. कहीं ऐसा तो नहीं कि मनुष्य प्रकृति से भी ज़्यादा शक्तिशाली बन गया है? हम बहुत तेज़ी से, हालांकि अनचाहे ही, मौसम को बदल रहे हैं, पारिस्थितिकी को बदल, प्रदूषित और यहां तक कि नष्ट कर रहे हैं, और अपने तथाकथित विकास को कुछ इस तरह धकिया रहे हैं कि इस पृथ्वी के अन्य जीवों को भी एक नए मानव-निर्मित विश्व से तालमेल बिठाने को मज़बूर होना पड रहा है.
ऐसे में, यह कल्पना कि अगर अचानक पूरी मानव-जाति लुप्त हो जाए तो क्या होगा?
यह दुष्टतापूर्ण कल्पना की है ‘ईको इन माय ब्लड’ (1999) पुस्तक के लेखक, जाने-माने और बहु पुरस्कृत पत्रकार एलन वाइज़मैन ने अपनी सद्य प्रकाशित किताब ‘द वर्ल्ड विदाउट अस’ में. वाइज़मैन ने सवाल किया है कि अगर कोई विषैला वायरस या किसी भी तरह की कोई हलचल रातों-रात हमारी इस पृथ्वी को जन-विहीन कर दे तो जो कुछ मानव ने अब तक बनाया-संजोया है वह और कब तक बचा रह सकेगा. बेशक वाइज़मैन की यह कल्पना शरारती है, एक हद तक रुग्ण भी, लेकिन है विचारोत्तेजक. और यह भी कि किताब इस सवाल पर ही खत्म नहीं हो जाती, इससे आगे भी जाती है. किताब की उपादेयता इस बात से और बढती है कि अपने इस सवाल का जवाब पाने के लिए लेखक ने सॉलिड साइंस और कल्पना का जो मिश्रण तैयार किया है वह हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करता है.
वाइज़मैन कहते हैं कि मानव जाति के विलुप्त हो जाने के दो दिन बाद ही मैनहट्टन के सबवे’ज़ को सूखा रखने वाले पम्प काम करना बन्द कर देंगे, कुछ ही दिनों बाद टनल्स में पानी भर जाएगा, सडकों के नीचे की सारी मिट्टी बह जाएगी और सदियों तक बने रहने के लिए निर्मित गगन चुम्बी अट्टालिकाओं की नींवें ढहने लगेंगी. रोज़मर्रा काम में आने वाली चीज़ें फॉसिल बन जायेंगी और सारी धातुएं गल-पिघलकर लाल रंग की चट्टानों जैसी दीखने लगेंगी. हो सकता है कि मनुष्य के शुरुआती दौर की कुछ इमारतें ही स्थापत्य के अवशेष के बतौर बची रह जाएं. यह सारी कल्पना वाइज़मैन ने बगैर किसी आधार के नहीं कर डाली है. इसके लिए उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों से चर्चा की, पर्यावरण वैज्ञानिकों, कला संरक्षकों, प्राणी वैज्ञानिकों, तेल शोधकों, यहां तक कि धर्म गुरुओं से भी गम्भीर विमर्श किया और विश्व भर के महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा की. तब जाकर तैयार हुई है यह 336 पन्नों की रोमांचक, उत्तेजक, अवसादक और सम्मोहक किताब. किताब के पन्नों से गुज़रते हुए वाइज़मैन की नीयत साफ हो जाती है. हालांकि वे एक भयावह तस्वीर उकेरकर आगत से हमें डराते हैं लेकिन उनका मक़सद है हमें अपने अंधाधुंध विकास के खतरों के प्रति सजग करना.
वाइज़मैन ने अपने वृत्तांत को इस सोच के साथ बुना है कि अगर पृथ्वी पर से सारा मानवीय दबाव एकबारगी ही खत्म हो जाए तो उस की प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी ! हमने जबसे और जो-जो ज़्यादतियां उस पर की हैं, उनसे पहले का महौल पुनर्स्थापित होने में कितना समय लगेगा. मानव-निर्मित कंकरीट का जंगल नष्ट हो जाने के बाद असली जंगल कितने समय में उग सकेगा? और, आदम के इस धरा पर अवतरित होने से पहले के हालात और स्वर्गोपम धरा की वापसी होगी भी या नहीं. क्या प्रकृति मनुष्य के सारे पद चिह्न मिटा पायेगी?
पर्यावरण के बारे में ज़्यादातर समकालीन किताबें स्यापा करके खत्म हो जाती हैं. वे यह बताने के लिए कि हम उसे कैसे और कितना बरबाद कर रहे, प्राकृतिक विश्व का गुणगान करती हैं. निश्चय ही उनका उद्देश्य तो परिवर्तन होता है पर उस उद्देश्य में वे प्राय: कामयाब नहीं हो पातीं, बल्कि कभी-कभी तो होता यह है कि ऐसी किताबें नींद की गोली बन कर रह जाती हैं. ऐसे में वाइज़मैन की इस किताब का महत्व और भी अधिक है . यह हमारे समय की सबसे बडी समस्या पर सर्जनात्मक और दिलचस्प तरीके से विचार करती है. किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से वाइज़मैन ने खुद का इलाज़ करने की पृथ्वी और मानवता की अद्भुत क्षमता को उजागर किया है. जब वे चेर्नोबिल की चर्चा करते हुए बताते हैं कि 1986 के भीषण विकीरण रिसाव के बाद अब वहां जंतुओं की वापसी होने लगी है, या उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच के असैन्यीकृत क्षेत्र में लगभग विलुप्त हो चुके पहाडी बकरे और चीते 1953 से ही दिखाई देने लगे हैं, तो अन्धेरे में प्रकाश की किरण नज़र आती है. इसी तरह जब वे यह कहते हैं कि मानवीकृत विनाश के बावज़ूद हमारी कला-संस्कृति के कुछ उत्कृष्ट नमूने तो बचे ही रहेंगे तो वे बहुत बारीकी से विनाश की विभीषिका के खिलाफ एक ऐसा मूलभूत और कारगर विकल्प सुझाते हैं जो हमारे अपने विलोपन पर निर्भर नहीं है. इस तरह यह किताब हमारे अपने चतुर्दिक के बारे में सार्थक चिंता के उम्दा प्रयास के रूप में सामने आती है.
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ऐसे में, यह कल्पना कि अगर अचानक पूरी मानव-जाति लुप्त हो जाए तो क्या होगा?
यह दुष्टतापूर्ण कल्पना की है ‘ईको इन माय ब्लड’ (1999) पुस्तक के लेखक, जाने-माने और बहु पुरस्कृत पत्रकार एलन वाइज़मैन ने अपनी सद्य प्रकाशित किताब ‘द वर्ल्ड विदाउट अस’ में. वाइज़मैन ने सवाल किया है कि अगर कोई विषैला वायरस या किसी भी तरह की कोई हलचल रातों-रात हमारी इस पृथ्वी को जन-विहीन कर दे तो जो कुछ मानव ने अब तक बनाया-संजोया है वह और कब तक बचा रह सकेगा. बेशक वाइज़मैन की यह कल्पना शरारती है, एक हद तक रुग्ण भी, लेकिन है विचारोत्तेजक. और यह भी कि किताब इस सवाल पर ही खत्म नहीं हो जाती, इससे आगे भी जाती है. किताब की उपादेयता इस बात से और बढती है कि अपने इस सवाल का जवाब पाने के लिए लेखक ने सॉलिड साइंस और कल्पना का जो मिश्रण तैयार किया है वह हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करता है.
वाइज़मैन कहते हैं कि मानव जाति के विलुप्त हो जाने के दो दिन बाद ही मैनहट्टन के सबवे’ज़ को सूखा रखने वाले पम्प काम करना बन्द कर देंगे, कुछ ही दिनों बाद टनल्स में पानी भर जाएगा, सडकों के नीचे की सारी मिट्टी बह जाएगी और सदियों तक बने रहने के लिए निर्मित गगन चुम्बी अट्टालिकाओं की नींवें ढहने लगेंगी. रोज़मर्रा काम में आने वाली चीज़ें फॉसिल बन जायेंगी और सारी धातुएं गल-पिघलकर लाल रंग की चट्टानों जैसी दीखने लगेंगी. हो सकता है कि मनुष्य के शुरुआती दौर की कुछ इमारतें ही स्थापत्य के अवशेष के बतौर बची रह जाएं. यह सारी कल्पना वाइज़मैन ने बगैर किसी आधार के नहीं कर डाली है. इसके लिए उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों से चर्चा की, पर्यावरण वैज्ञानिकों, कला संरक्षकों, प्राणी वैज्ञानिकों, तेल शोधकों, यहां तक कि धर्म गुरुओं से भी गम्भीर विमर्श किया और विश्व भर के महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा की. तब जाकर तैयार हुई है यह 336 पन्नों की रोमांचक, उत्तेजक, अवसादक और सम्मोहक किताब. किताब के पन्नों से गुज़रते हुए वाइज़मैन की नीयत साफ हो जाती है. हालांकि वे एक भयावह तस्वीर उकेरकर आगत से हमें डराते हैं लेकिन उनका मक़सद है हमें अपने अंधाधुंध विकास के खतरों के प्रति सजग करना.
वाइज़मैन ने अपने वृत्तांत को इस सोच के साथ बुना है कि अगर पृथ्वी पर से सारा मानवीय दबाव एकबारगी ही खत्म हो जाए तो उस की प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी ! हमने जबसे और जो-जो ज़्यादतियां उस पर की हैं, उनसे पहले का महौल पुनर्स्थापित होने में कितना समय लगेगा. मानव-निर्मित कंकरीट का जंगल नष्ट हो जाने के बाद असली जंगल कितने समय में उग सकेगा? और, आदम के इस धरा पर अवतरित होने से पहले के हालात और स्वर्गोपम धरा की वापसी होगी भी या नहीं. क्या प्रकृति मनुष्य के सारे पद चिह्न मिटा पायेगी?
पर्यावरण के बारे में ज़्यादातर समकालीन किताबें स्यापा करके खत्म हो जाती हैं. वे यह बताने के लिए कि हम उसे कैसे और कितना बरबाद कर रहे, प्राकृतिक विश्व का गुणगान करती हैं. निश्चय ही उनका उद्देश्य तो परिवर्तन होता है पर उस उद्देश्य में वे प्राय: कामयाब नहीं हो पातीं, बल्कि कभी-कभी तो होता यह है कि ऐसी किताबें नींद की गोली बन कर रह जाती हैं. ऐसे में वाइज़मैन की इस किताब का महत्व और भी अधिक है . यह हमारे समय की सबसे बडी समस्या पर सर्जनात्मक और दिलचस्प तरीके से विचार करती है. किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से वाइज़मैन ने खुद का इलाज़ करने की पृथ्वी और मानवता की अद्भुत क्षमता को उजागर किया है. जब वे चेर्नोबिल की चर्चा करते हुए बताते हैं कि 1986 के भीषण विकीरण रिसाव के बाद अब वहां जंतुओं की वापसी होने लगी है, या उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच के असैन्यीकृत क्षेत्र में लगभग विलुप्त हो चुके पहाडी बकरे और चीते 1953 से ही दिखाई देने लगे हैं, तो अन्धेरे में प्रकाश की किरण नज़र आती है. इसी तरह जब वे यह कहते हैं कि मानवीकृत विनाश के बावज़ूद हमारी कला-संस्कृति के कुछ उत्कृष्ट नमूने तो बचे ही रहेंगे तो वे बहुत बारीकी से विनाश की विभीषिका के खिलाफ एक ऐसा मूलभूत और कारगर विकल्प सुझाते हैं जो हमारे अपने विलोपन पर निर्भर नहीं है. इस तरह यह किताब हमारे अपने चतुर्दिक के बारे में सार्थक चिंता के उम्दा प्रयास के रूप में सामने आती है.
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Friday, October 19, 2007
जो चाहोगे वही मिलेगा
माइकेल जे. लोज़ियर की ताज़ा किताब लॉ ऑफ अट्रेक्शन: द साइंस ऑफ अट्रेक्टिंग मोर ऑफ व्हाट यू वाण्ट एण्ड लेस ऑफ व्हाट यू डोण्ट जीवन की एक महत्वपूर्ण गुत्थी को सुलझाने और जीवन पथ को सुगम बनने का एक दिलचस्प प्रयास है. जीवन में कई बार ऐसा होता है कि आप किसी चीज़ के बारे में शिद्दत से सोचते हैं और अनायास वह आपको मिल जाती है, आप अपने किसी प्रिय को याद करते हैं और अचानक वह आपके सामने आ जाता है. आप सोचते हैं कि यह या तो संयोग है या भाग्य. लेकिन लोज़ियर कहते हैं कि यह लॉ ऑफ अट्रेक्शन का परिणाम है.
अपनी लॉ ऑफ अट्रेक्शन की अवधारणा को समझाते हुए लोज़ियर बताते हैं कि आप अपने जीवन में उसी को अपनी तरफ खींचते और प्राप्त करते हैं जिस पर आप अपनी ऊर्जा और ध्यान केन्द्रित करते हैं. कभी ऐसा आपके चाहने से, आपके जाने में होता है, कभी अनजाने में. बकौल लोज़ियर, हमारे जीवन में सब कुछ ऐसी ऊर्जा से निर्मित है जो एक खास स्तर पर कम्पायमान होती रहती है. जब किसी के मन में कुविचार आते हैं तो नकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है. अधिकांश भाषाओं में ऐसे अनेक मुहावरें और कहावतें पाई जाती हैं जिनसे इस लॉ ऑफ़ अट्रेक्शन की पुष्टि होती है, जैसे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे, बर्ड्स ऑफ द सेम फेदर फ्लॉक टुगेदर आदि.
लोज़ियर अपनी बात को और साफ करते हुए कहते हैं कि हम जिस तरह के भाव अपने मन में संचारित करते हैं, लॉ ऑफ अट्रेक्शन की वजह से वैसे ही और भाव उनके पास आते हैं. हमारी देह में भावों का यही कम्पन अनुभूतियों में तब्दील होता चलता है. उदाहरणार्थ, जब हम उत्साह, प्रेम, आत्म विश्वास या संतोष का अनुभव करते हैं तो यह कम्पन सकारात्मक होता है. इसके विपरीत, जब हम उदास, तनावग्रस्त, क्रुद्ध या लज्जित अनुभव करते हैं तब हमारा कम्पन नकारात्मक होता है. यही कारण है कि सुन्दर या प्रीतिकर को देखकर हम अच्छा अनुभव करते हैं और कुरूप या अप्रीतिकर को देखकर बुरा अनुभव करते हैं.
कहा भी जाता है कि हम अपना यथार्थ खुद रचते हैं. चाहे हम जान-बूझ्कर ऐसा करें या अनजाने में, हम सदा ही अपनी अनुभूतियों के अनुरूप ही व्यक्तियों और स्थितियों को आकृष्ट करते हैं. हम लगातार जैसा सोचते हैं, लॉ ऑफ अट्रेक्शन वैसी ही अनुभूतियों को उपजाकर तदनुरूप स्थितियां निर्मित कर देता है. और इसीलिए लॉज़ियर इस लॉ के ज़रिये हमें यह सिखाते हैं कि हम किस तरह उसे अपनी तरफ आकृष्ट कर सकते हैं जो हमें वांछित है और कैसे उसे दूर रख सकते हैं जिसे हम नहीं चाहते.
लॉज़ियर ऐसा करने के लिए एक त्रि-सूत्रीय फॉर्मूला सुझाते हैं. फॉर्मूला बहुत सरल है.
1. अपनी आकांक्षाओं को पहचानें अर्थात अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों की विषमताओं को सीमित करें,
2. अपनी अनुभूतियों को उसके अनुरूप ढालें, अर्थात जो आप चाहते हैं उसी पर ध्यान केन्द्रित करें और जो नहीं चाहते हैं, उसकी तरफ से ध्यान हटायें, और
3. इसे विकसित होने दें, यानि ऐसा करने में जो मानसिक रुकावटें हैं , उन पर काबू पाएं.
इन तीन सूत्रों की क्रियान्विति के लिए लॉज़ियर कुछ व्यावहारिक तकनीकें भी सुझाते हैं और कहते हैं कि इनके सतत प्रयोग और अभ्यास से आप अपने सपनों को हक़ीक़त में बदल सकते हैं.
किताब रोचक तो है ही, सकारात्मक सोच का सहज विकास कर आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिहाज़ से उपयोगी भी है. लोज़ियर कोई नई बात तो नहीं करते, लेकिन हमारी जानी हुई बात को नए, विश्वसनीय और प्रभावशाली तरीके से पेश ज़रूर करते हैं. लोज़ियर खुद कहते हैं कि वे अपने पाठक को यह नहीं सिखा रहे कि वे जीवन में कुछ कैसे हासिल करें, क्योंकि इस किताब को पढे बिना भी हम में से हरेक कुछ न कुछ तो हासिल करता ही रहता है. लोज़ियर तो बहुत सहज और सम्प्रेषणीय भाषा और शिल्प में केवल यह बताते हैं कि हम जो कर रहे हैं उसे और बेहतर तरीके से कैसे करें. कैसे प्रयत्न पूर्वक कुछ हासिल करें, कैसे जीवन में जो काम्य है उसे अपनी ओर खींचने में सक्षम बनें और कैसे प्रयत्नपूर्वक उसे दूर रखें जिसे हम पास नहीं आने देना चाहते. अंतर केवल प्रयत्न का है. जो हम अनायासम, बिना प्रयत्न के हासिल कर रहे हैं, अगर समझ कर, प्रयत्न कर उसे हासिल करना चाहेंगे तो अधिक सफलता मिलना निश्चित है. इस तरह, लॉ ऑफ अट्रेक्शन हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने में मददगार होने का प्रयास करती है. किताब हमें अपने शब्दों और विचारों के बारे में और अधिक सजग होने के लिए प्रेरित करती है और कम से कम इस बात के महत्व पर कोई असहमति नहीं हो सकती.
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अपनी लॉ ऑफ अट्रेक्शन की अवधारणा को समझाते हुए लोज़ियर बताते हैं कि आप अपने जीवन में उसी को अपनी तरफ खींचते और प्राप्त करते हैं जिस पर आप अपनी ऊर्जा और ध्यान केन्द्रित करते हैं. कभी ऐसा आपके चाहने से, आपके जाने में होता है, कभी अनजाने में. बकौल लोज़ियर, हमारे जीवन में सब कुछ ऐसी ऊर्जा से निर्मित है जो एक खास स्तर पर कम्पायमान होती रहती है. जब किसी के मन में कुविचार आते हैं तो नकारात्मक ऊर्जा का संचार भी होता है. अधिकांश भाषाओं में ऐसे अनेक मुहावरें और कहावतें पाई जाती हैं जिनसे इस लॉ ऑफ़ अट्रेक्शन की पुष्टि होती है, जैसे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे, बर्ड्स ऑफ द सेम फेदर फ्लॉक टुगेदर आदि.
लोज़ियर अपनी बात को और साफ करते हुए कहते हैं कि हम जिस तरह के भाव अपने मन में संचारित करते हैं, लॉ ऑफ अट्रेक्शन की वजह से वैसे ही और भाव उनके पास आते हैं. हमारी देह में भावों का यही कम्पन अनुभूतियों में तब्दील होता चलता है. उदाहरणार्थ, जब हम उत्साह, प्रेम, आत्म विश्वास या संतोष का अनुभव करते हैं तो यह कम्पन सकारात्मक होता है. इसके विपरीत, जब हम उदास, तनावग्रस्त, क्रुद्ध या लज्जित अनुभव करते हैं तब हमारा कम्पन नकारात्मक होता है. यही कारण है कि सुन्दर या प्रीतिकर को देखकर हम अच्छा अनुभव करते हैं और कुरूप या अप्रीतिकर को देखकर बुरा अनुभव करते हैं.
कहा भी जाता है कि हम अपना यथार्थ खुद रचते हैं. चाहे हम जान-बूझ्कर ऐसा करें या अनजाने में, हम सदा ही अपनी अनुभूतियों के अनुरूप ही व्यक्तियों और स्थितियों को आकृष्ट करते हैं. हम लगातार जैसा सोचते हैं, लॉ ऑफ अट्रेक्शन वैसी ही अनुभूतियों को उपजाकर तदनुरूप स्थितियां निर्मित कर देता है. और इसीलिए लॉज़ियर इस लॉ के ज़रिये हमें यह सिखाते हैं कि हम किस तरह उसे अपनी तरफ आकृष्ट कर सकते हैं जो हमें वांछित है और कैसे उसे दूर रख सकते हैं जिसे हम नहीं चाहते.
लॉज़ियर ऐसा करने के लिए एक त्रि-सूत्रीय फॉर्मूला सुझाते हैं. फॉर्मूला बहुत सरल है.
1. अपनी आकांक्षाओं को पहचानें अर्थात अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों की विषमताओं को सीमित करें,
2. अपनी अनुभूतियों को उसके अनुरूप ढालें, अर्थात जो आप चाहते हैं उसी पर ध्यान केन्द्रित करें और जो नहीं चाहते हैं, उसकी तरफ से ध्यान हटायें, और
3. इसे विकसित होने दें, यानि ऐसा करने में जो मानसिक रुकावटें हैं , उन पर काबू पाएं.
इन तीन सूत्रों की क्रियान्विति के लिए लॉज़ियर कुछ व्यावहारिक तकनीकें भी सुझाते हैं और कहते हैं कि इनके सतत प्रयोग और अभ्यास से आप अपने सपनों को हक़ीक़त में बदल सकते हैं.
किताब रोचक तो है ही, सकारात्मक सोच का सहज विकास कर आपके जीवन को बेहतर बनाने के लिहाज़ से उपयोगी भी है. लोज़ियर कोई नई बात तो नहीं करते, लेकिन हमारी जानी हुई बात को नए, विश्वसनीय और प्रभावशाली तरीके से पेश ज़रूर करते हैं. लोज़ियर खुद कहते हैं कि वे अपने पाठक को यह नहीं सिखा रहे कि वे जीवन में कुछ कैसे हासिल करें, क्योंकि इस किताब को पढे बिना भी हम में से हरेक कुछ न कुछ तो हासिल करता ही रहता है. लोज़ियर तो बहुत सहज और सम्प्रेषणीय भाषा और शिल्प में केवल यह बताते हैं कि हम जो कर रहे हैं उसे और बेहतर तरीके से कैसे करें. कैसे प्रयत्न पूर्वक कुछ हासिल करें, कैसे जीवन में जो काम्य है उसे अपनी ओर खींचने में सक्षम बनें और कैसे प्रयत्नपूर्वक उसे दूर रखें जिसे हम पास नहीं आने देना चाहते. अंतर केवल प्रयत्न का है. जो हम अनायासम, बिना प्रयत्न के हासिल कर रहे हैं, अगर समझ कर, प्रयत्न कर उसे हासिल करना चाहेंगे तो अधिक सफलता मिलना निश्चित है. इस तरह, लॉ ऑफ अट्रेक्शन हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी को बेहतर बनाने में मददगार होने का प्रयास करती है. किताब हमें अपने शब्दों और विचारों के बारे में और अधिक सजग होने के लिए प्रेरित करती है और कम से कम इस बात के महत्व पर कोई असहमति नहीं हो सकती.
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भारत और चीन में आर्थिक उदारीकरण के पक्ष में
दो बडे देश – चीन और भारत. दोनों ही एक अरब से ऊपर आबादी वाले और दोनों ही पारम्परिक. अब ये दोनों देश विश्व व्यापार जगत में पहले से जमे हुए देशों के लिए कडी चुनौती पेश कर रहे हैं. हांग कांग में रह रहीं, फॉर्ब्स पत्रिका की एशिया सम्पादक, बहु-पुरस्कृत पत्रकार रॉबिन मेरेडिथ ने अपनी 256 पन्नों की 16 जुलाई 2007 को प्रकाशित किताब ‘द एलीफेण्ट एण्ड द ड्रेगन : द राइज़ ऑफ इण्डिया एण्ड चाइना एण्ड व्हाट इट मीन्स फॉर ऑल ऑफ अस’ में इन दोनों देशों के इसी बदलाव की पश्चिमी और पूंजीवादी नज़रिये से पडताल की है.
रॉबिन मेरेडिथ कहती हैं कि अब ऐसा उत्पाद ढूंढना जो चीन में न बना हो और ऐसा तकनीकी सहयोग प्राप्त करना जिसका उद्गम भारत में न हो, क्रमश:कठिनतर होता जा रहा है. भारत में तेज़ी से पैर पसार रहे कॉल सेंटर व्यवसाय के बारे में वैसे भी बहुत कहा-लिखा जाता है. बकौल मेरेडिथ, इस बदलते परिदृश्य की परिणति कई रूपों में दिखाई देती है. वे बताती हैं कि 1978 में जहां शंघाई में मात्र 15 स्काई स्क्रेपर (गगन चुम्बी भवन) थे, अब उनकी संख्या 3800 हो गई है. इतने स्काई स्क्रेपर तो शिकागो और लॉस एंजिलस में मिलाकर भी नहीं हैं. इधर दुनिया की सबसे बडी दस सूचना प्रौद्योगिकी कम्पनियों में से तीन भारत में अवस्थित हैं. इतना ही नहीं, अकेले आई बी एम में 53 हज़ार लोग काम करते हैं जबकि 1992 तक यह कम्पनी भारत में थी ही नहीं.
लेकिन सब कुछ इतना अच्छा भी नहीं है. दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से बीस चीन में हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस पर्यावरणीय विभीषिका से तो बच भी जाए, आर्थिक विनाश से नहीं बच सकेगा क्योंकि वहां की सत्तर प्रतिशत सार्वजनिक कम्पनियां बेकार हैं. खुद चीनी प्रधानमंत्री स्वीकार करते हैं कि वहां की अर्थव्यवस्था अस्थिर, असंतुलित और असमन्वित है. यह भी अनुमान है कि चीन की बैंक व्यवस्था चरमरा रही है. भारत के बारे में भी कई बातें चिंताजनक हैं. यहां की चालीस प्रतिशत आबादी अभी भी निरक्षर है, यहां के साठ प्रतिशत लोग अभी भी कृषि पर निर्भर हैं और बमुश्किल दो वक़्त की रोटी जुटा पाते हैं क्योंकि खेती करने के उनके तौर-तरीके बेहद पुराने हैं. अमर्त्य सेन ने भी कहा है कि भारत के बारे में जितना अच्छा कहा जाता है, उसका उलट भी उतना ही सही होता है.
मेरेडिथ ने दोनों देशों में आये बदलाव की विवेचना करते हुए बताया है कि चीन में बाज़ार केन्द्रित आर्थिक सुधारों की शुरुआत 1978 में और भारत में 1991 में हुई. इन सुधारों का परिणाम यह हुआ कि अकेले नब्बे के दशक में दोनों देशों में कुल मिलाकर बीस करोड लोग गरीबी से निज़ात पा सके. अगर दोनों देशों की आर्थिक प्रगति की रफ्तार पर एक नज़र डालें तो पाते हैं कि 1980 में जहां चीन और भारत जीडीपी और पर केपिटा इन्कम के मामले में समान धरातल पर थे, 2000 तक आते-आते चीन का जीडीपी भारत से दुगुना हो गया और निर्यात के मामले में उसकी रफ्तार भारत से आठ गुना ज़्यादा हो गई. आखिर ऐसा कैसे हुआ? मेरेडिथ के अनुसर, चीन ने भारत से तेईस साल पहले माओवादी बन्द अर्थव्यवस्था को तिलांजलि देकर मुक्त बाज़ार केन्द्रित अर्थ व्यवस्था को अपना लिया. मेरेडिथ बताती हैं कि चीन में माओ की सामूहिक कृषि नीति की वजह से 1959 से 1962 तक तीन से चार करोड लोग भुखमरी के शिकार हुए थे. सांस्कृतिक क्रांति के दौर में वहां की लगभग सारी यूनिवर्सिटियां बन्द हो गई थीं. भारत में भी, आज़ादी के बाद के समाजवादी रुझान और केन्द्रीय योजना के कारण आर्थिक विकास की दर बहुत धीमी रही. निकम्मी, संरक्षणवादी उद्यमी नीतियों ने गरीबी का उन्मूलन नहीं, उसका संरक्षण किया. मेरेडिथ ने भारत के एक पूर्व वित्त मंत्री को यह कहते हुए उद्धृत किया है कि हमने कुछ बरस पहले प्रतिस्पर्धी एजेण्डा अपना कर गरीबों के लिए जितना कर दिया उतना तो हम कई दशकों के गरीबी हटाओ एजेण्डा के माध्यम से भी नहीं कर पाये थे.
जैसा मैंने प्रारम्भ में इंगित किया, किताब पश्चिमी नज़रिये को केन्द्र में रखती है. इसीलिए मेरेडिथ इस बात की भी चर्चा करना नहीं भूलती कि इन दोनों देशों में जो हो रहा है उससे अमरीका का रोज़गार (आउट सोर्सिंग और ऑफ शोरिंग की वजह से) इन दोनों देशों में स्थानांतरित होता जा रहा है. लेकिन, यह चर्चा करने के बाद वे अपने अमरीकी पाठकों को सांत्वना देना भी नहीं भूलतीं कि उन्हें दुखी नहीं होना चाहिये क्योंकि सस्ते उत्पाद और सस्ती सेवाओं का फायदा भी तो उन्हीं को मिल रहा है. और यही अमरीकी पक्षधरता और पूंजीवाद की एक तरफा हिमायत इस किताब की सबसे बडी सीमा है. मेरेडिथ तस्वीर का एक ही रुख सामने लाती हैं. मुक्तबाज़ार व्यवस्था कैसे इन दोनों देशों के जीवन में बहुत सारी विकृतियां ला रही हैं, अगर मेरेडिथ उन पर भी कुछ कहतीं तो मुझे ज़्यादा अच्छा लगता. लेकिन वे क्यों कहतीं? तब मुक्त बाज़ार और पूंजीवाद की तस्वीर इतनी उजली कैसे प्रस्तुत हो पाती?
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रॉबिन मेरेडिथ कहती हैं कि अब ऐसा उत्पाद ढूंढना जो चीन में न बना हो और ऐसा तकनीकी सहयोग प्राप्त करना जिसका उद्गम भारत में न हो, क्रमश:कठिनतर होता जा रहा है. भारत में तेज़ी से पैर पसार रहे कॉल सेंटर व्यवसाय के बारे में वैसे भी बहुत कहा-लिखा जाता है. बकौल मेरेडिथ, इस बदलते परिदृश्य की परिणति कई रूपों में दिखाई देती है. वे बताती हैं कि 1978 में जहां शंघाई में मात्र 15 स्काई स्क्रेपर (गगन चुम्बी भवन) थे, अब उनकी संख्या 3800 हो गई है. इतने स्काई स्क्रेपर तो शिकागो और लॉस एंजिलस में मिलाकर भी नहीं हैं. इधर दुनिया की सबसे बडी दस सूचना प्रौद्योगिकी कम्पनियों में से तीन भारत में अवस्थित हैं. इतना ही नहीं, अकेले आई बी एम में 53 हज़ार लोग काम करते हैं जबकि 1992 तक यह कम्पनी भारत में थी ही नहीं.
लेकिन सब कुछ इतना अच्छा भी नहीं है. दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से बीस चीन में हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस पर्यावरणीय विभीषिका से तो बच भी जाए, आर्थिक विनाश से नहीं बच सकेगा क्योंकि वहां की सत्तर प्रतिशत सार्वजनिक कम्पनियां बेकार हैं. खुद चीनी प्रधानमंत्री स्वीकार करते हैं कि वहां की अर्थव्यवस्था अस्थिर, असंतुलित और असमन्वित है. यह भी अनुमान है कि चीन की बैंक व्यवस्था चरमरा रही है. भारत के बारे में भी कई बातें चिंताजनक हैं. यहां की चालीस प्रतिशत आबादी अभी भी निरक्षर है, यहां के साठ प्रतिशत लोग अभी भी कृषि पर निर्भर हैं और बमुश्किल दो वक़्त की रोटी जुटा पाते हैं क्योंकि खेती करने के उनके तौर-तरीके बेहद पुराने हैं. अमर्त्य सेन ने भी कहा है कि भारत के बारे में जितना अच्छा कहा जाता है, उसका उलट भी उतना ही सही होता है.
मेरेडिथ ने दोनों देशों में आये बदलाव की विवेचना करते हुए बताया है कि चीन में बाज़ार केन्द्रित आर्थिक सुधारों की शुरुआत 1978 में और भारत में 1991 में हुई. इन सुधारों का परिणाम यह हुआ कि अकेले नब्बे के दशक में दोनों देशों में कुल मिलाकर बीस करोड लोग गरीबी से निज़ात पा सके. अगर दोनों देशों की आर्थिक प्रगति की रफ्तार पर एक नज़र डालें तो पाते हैं कि 1980 में जहां चीन और भारत जीडीपी और पर केपिटा इन्कम के मामले में समान धरातल पर थे, 2000 तक आते-आते चीन का जीडीपी भारत से दुगुना हो गया और निर्यात के मामले में उसकी रफ्तार भारत से आठ गुना ज़्यादा हो गई. आखिर ऐसा कैसे हुआ? मेरेडिथ के अनुसर, चीन ने भारत से तेईस साल पहले माओवादी बन्द अर्थव्यवस्था को तिलांजलि देकर मुक्त बाज़ार केन्द्रित अर्थ व्यवस्था को अपना लिया. मेरेडिथ बताती हैं कि चीन में माओ की सामूहिक कृषि नीति की वजह से 1959 से 1962 तक तीन से चार करोड लोग भुखमरी के शिकार हुए थे. सांस्कृतिक क्रांति के दौर में वहां की लगभग सारी यूनिवर्सिटियां बन्द हो गई थीं. भारत में भी, आज़ादी के बाद के समाजवादी रुझान और केन्द्रीय योजना के कारण आर्थिक विकास की दर बहुत धीमी रही. निकम्मी, संरक्षणवादी उद्यमी नीतियों ने गरीबी का उन्मूलन नहीं, उसका संरक्षण किया. मेरेडिथ ने भारत के एक पूर्व वित्त मंत्री को यह कहते हुए उद्धृत किया है कि हमने कुछ बरस पहले प्रतिस्पर्धी एजेण्डा अपना कर गरीबों के लिए जितना कर दिया उतना तो हम कई दशकों के गरीबी हटाओ एजेण्डा के माध्यम से भी नहीं कर पाये थे.
जैसा मैंने प्रारम्भ में इंगित किया, किताब पश्चिमी नज़रिये को केन्द्र में रखती है. इसीलिए मेरेडिथ इस बात की भी चर्चा करना नहीं भूलती कि इन दोनों देशों में जो हो रहा है उससे अमरीका का रोज़गार (आउट सोर्सिंग और ऑफ शोरिंग की वजह से) इन दोनों देशों में स्थानांतरित होता जा रहा है. लेकिन, यह चर्चा करने के बाद वे अपने अमरीकी पाठकों को सांत्वना देना भी नहीं भूलतीं कि उन्हें दुखी नहीं होना चाहिये क्योंकि सस्ते उत्पाद और सस्ती सेवाओं का फायदा भी तो उन्हीं को मिल रहा है. और यही अमरीकी पक्षधरता और पूंजीवाद की एक तरफा हिमायत इस किताब की सबसे बडी सीमा है. मेरेडिथ तस्वीर का एक ही रुख सामने लाती हैं. मुक्तबाज़ार व्यवस्था कैसे इन दोनों देशों के जीवन में बहुत सारी विकृतियां ला रही हैं, अगर मेरेडिथ उन पर भी कुछ कहतीं तो मुझे ज़्यादा अच्छा लगता. लेकिन वे क्यों कहतीं? तब मुक्त बाज़ार और पूंजीवाद की तस्वीर इतनी उजली कैसे प्रस्तुत हो पाती?
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लेखक का काम है सभ्यताओं को नष्ट होने से बचाना
कुछ असफ़लताओं की परिणति इतनी सुखद होती है कि उन्हें असफ़लता कहते भी संकोच होता है। 49 वर्षीय अमरीकी पर्वतारोही ग्रेग मोर्टेन्सन की असफ़लता का किस्सा कुछ ऐसा ही है। मिरगी ने ग्रेग की 23 वर्षीया बहिन क्रिस्टी को उससे जुदा कर दिया तो ग्रेग ने 1993 में एक पर्वतारोहण अभियान के द्वारा दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची चोटी, काराकोरम श्रंखला की के-2 पर विजय प्राप्त कर उसका नेकलेस वहां स्थापित करने की ठानी। दुर्भाग्य (या इसे सौभाग्य कहा जाए!) से ग्रेग अभियान में नाकामयाब रहे। इतना ही नहीं, इस जोखिम भरे अभियान से लौटते हुए वे अपने समूह से बिछड़ कर भटकते हुए उत्तरी पाकिस्तान के ऐसे दुर्गम क्षेत्र में जा पहुंचे जहां न पानी था, न खाना और न कोई आश्रय। तब उन्हें सात सप्ताह तक शरण और मदद देकर उनकी जान बचाई उस छोटे-से गांव के भोले-भाले बाशिन्दों ने। उसी दौरान ग्रेग ने देखा कि गांव इतना दरिद्र है कि एक शिक्षक का वेतन तक नहीं जुटा सकता और वहां के 84 बच्चे रेत पर लकड़ी की डंडियों से लिखने का प्रयास करते हैं। गांव वालों के प्रति प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ग्रेग ने वादा किया कि वे उस गांव का पहला स्कूल बनवायेंगे। और ग्रेग का यही वादा बन गया हमारे वक़्त की निहायत अविश्वसनीय मानवीय महागाथा जहां मात्र एक आदमी अपने विश्वास के बल पर ऐन तालिबान पैदा करने वाली धरती पर आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई में स्कूल और शिक्षा को हथियार बनाने में कामयाब होता है। ग्रेग खुद कोई अमीर नहीं थे। उन्होंने अपने घर सेन फ़्रांसिसको लौट कर अमरीका के 580 धनी मानी लोगों को खत लिखे। एन बी सी के टॉम ब्रोकॉ एकमात्र ऐसे सज्जन थे जिन्होंने जवाब में सौ डॉलर का चैक भेजा। ग्रेग ने अपना सब कुछ भी बेच डाला, लेकिन इससे भी महज़ दो सौ डॉलर ही जुट पाए। वे हताश होने ही को थे कि विस्कान्सिन के स्कूली बच्चों ने पेनी-पेनी जोड़कर 623 डॉलर उन्हें भेजे। इस बात से औरों को भी प्रेरणा मिली, अभियान ने गति पकड़ी और ग्रेग ने अगले एक दशक में सेण्ट्रल एशिया इन्स्टीट्यूट नामक अपने संगठन के माध्यम से पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के उस निहायत दुरूह, दुर्गम, दरिद्र और खतरनाक इलाके में खास तौर पर लड़कियों के लिए 58 स्कूल बनवा डाले। इस साल ये स्कूल कुल मिलाकर 24,000 बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं जिनमें से 14,000 लड़कियां हैं।
तो, एक असफ़ल पर्वतारोहण अभियान के सफ़ल शिक्षादान अभियान में परिणत होने की रोचक, रोमांचक और प्रेरक गाथा है ग्रेग मोर्टेन्सन की किताब ‘थ्री कप्स ऑफ़ टी : वन मेन्स मिशन टू प्रोमोट पीस……वन स्कूल एट अ टाइम’ । 6 मार्च 2006 को हार्ड कवर में प्रकाशित इस किताब का पेपर बैक संस्करण हाल ही में आया है। इस बीच इस किताब को किरियामा प्राइज़ फ़ॉर नॉन फ़िक्शन, न्यूयॉर्क टाइम्स का बेस्ट सेलर सम्मान, टाइम मैगज़ीन की ओर से एशियन बुक ऑफ़ द ईयर, मोण्टाना ऑनर बुक अवार्ड आदि मिल चुके हैं। मोर्टेन्सन के सह लेखक हैं डेविड ऑलिवर रेलिन। रेलिन विस्तार से ग्रेग के प्रयत्नों का वर्णन करते हैं, गांव के प्रेरक चेहरों को उकेरते हैं और मुज़ाहिदीन, तालिबान अफ़सरों तथा महत्वाकांक्षी लड़कियों से हमारी मुलाक़ात कराते हैं। जिन इलाकों में ये लोग काम कर रहे थे वहां अमरीकियों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता। मोर्टेन्सन को भी अगवा करने की कोशिशें हुईं, नाराज़ मुल्लाओं ने दो बार उनके खिलाफ़ फ़तवे जारी किए, 9/11 के बाद अमरीकियों ने उन्हें मुस्लिमों के बीच काम करने के लिए डराया धमकाया, लेकिन वे अपने मिशन से नहीं डिगे। नेल्सन मण्डेला ने कहा था कि दुनिया को बदलने के लिए शिक्षा से अधिक कारगर कोई हथियार नहीं है। अपने अनुभवों ने मोर्टेन्सन को भी यही सिखाया है कि आतंकवाद से लड़ाई बमों से नहीं किताबों से ही लड़ी जा सकती है। उन्होंने कहा भी है कि आप कण्डोम बांट सकते हैं, बम गिरा सकते हैं, सड़कें बना सकते हैं, बिजली ला सकते हैं, लेकिन लड़कियों को शिक्षित किए बगैर समाज को नहीं बदल सकते।
368 पन्नों की यह किताब दिलचस्प होने के साथ ही प्रेरक भी है। कुछ समीक्षकों ने इसे अपने समय की महत्वपूर्ण साहस गाथा कहा है तो कुछ ने कहा है कि यह हमारे समय को जानने-समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ‘तालिबान : मिलिटेण्ट इस्लाम, ऑयल एण्ड फ़ण्डामेण्टलिज़्म इन सेण्ट्रल एशिया’ नामक चर्चित किताब के लेखक अहमद रशीद ने तो यहां तक कहा है कि मोर्टेन्सन जो काम कर रहे हैं –निर्धनतम बच्चों को सन्तुलित शिक्षा देने का– उसकी वजह से अतिवादी मदरसों के लिए नए रंगरूट जुटाना मुश्क़िल होता जा रहा है। मुझे इस सन्दर्भ में अल्बेयर कामू याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि लेखक का काम है सभ्यताओं को नष्ट होने से बचाना। यह किताब इस कथन की पुष्टि करती है।
तो, एक असफ़ल पर्वतारोहण अभियान के सफ़ल शिक्षादान अभियान में परिणत होने की रोचक, रोमांचक और प्रेरक गाथा है ग्रेग मोर्टेन्सन की किताब ‘थ्री कप्स ऑफ़ टी : वन मेन्स मिशन टू प्रोमोट पीस……वन स्कूल एट अ टाइम’ । 6 मार्च 2006 को हार्ड कवर में प्रकाशित इस किताब का पेपर बैक संस्करण हाल ही में आया है। इस बीच इस किताब को किरियामा प्राइज़ फ़ॉर नॉन फ़िक्शन, न्यूयॉर्क टाइम्स का बेस्ट सेलर सम्मान, टाइम मैगज़ीन की ओर से एशियन बुक ऑफ़ द ईयर, मोण्टाना ऑनर बुक अवार्ड आदि मिल चुके हैं। मोर्टेन्सन के सह लेखक हैं डेविड ऑलिवर रेलिन। रेलिन विस्तार से ग्रेग के प्रयत्नों का वर्णन करते हैं, गांव के प्रेरक चेहरों को उकेरते हैं और मुज़ाहिदीन, तालिबान अफ़सरों तथा महत्वाकांक्षी लड़कियों से हमारी मुलाक़ात कराते हैं। जिन इलाकों में ये लोग काम कर रहे थे वहां अमरीकियों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता। मोर्टेन्सन को भी अगवा करने की कोशिशें हुईं, नाराज़ मुल्लाओं ने दो बार उनके खिलाफ़ फ़तवे जारी किए, 9/11 के बाद अमरीकियों ने उन्हें मुस्लिमों के बीच काम करने के लिए डराया धमकाया, लेकिन वे अपने मिशन से नहीं डिगे। नेल्सन मण्डेला ने कहा था कि दुनिया को बदलने के लिए शिक्षा से अधिक कारगर कोई हथियार नहीं है। अपने अनुभवों ने मोर्टेन्सन को भी यही सिखाया है कि आतंकवाद से लड़ाई बमों से नहीं किताबों से ही लड़ी जा सकती है। उन्होंने कहा भी है कि आप कण्डोम बांट सकते हैं, बम गिरा सकते हैं, सड़कें बना सकते हैं, बिजली ला सकते हैं, लेकिन लड़कियों को शिक्षित किए बगैर समाज को नहीं बदल सकते।
368 पन्नों की यह किताब दिलचस्प होने के साथ ही प्रेरक भी है। कुछ समीक्षकों ने इसे अपने समय की महत्वपूर्ण साहस गाथा कहा है तो कुछ ने कहा है कि यह हमारे समय को जानने-समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। ‘तालिबान : मिलिटेण्ट इस्लाम, ऑयल एण्ड फ़ण्डामेण्टलिज़्म इन सेण्ट्रल एशिया’ नामक चर्चित किताब के लेखक अहमद रशीद ने तो यहां तक कहा है कि मोर्टेन्सन जो काम कर रहे हैं –निर्धनतम बच्चों को सन्तुलित शिक्षा देने का– उसकी वजह से अतिवादी मदरसों के लिए नए रंगरूट जुटाना मुश्क़िल होता जा रहा है। मुझे इस सन्दर्भ में अल्बेयर कामू याद आते हैं जिन्होंने कहा था कि लेखक का काम है सभ्यताओं को नष्ट होने से बचाना। यह किताब इस कथन की पुष्टि करती है।
आतंकवाद का अंतरंग
न्यूयॉर्कर के स्टाफ राइटर और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के सेंटर ऑन लॉ एण्ड सिक्यूरिटी के फैलो लॉरेंस राइट की नई किताब ‘द लूमिंग टावर : अल क़ायदा एण्ड द रोड टू 9/11’ आतंकवाद के इतिहास पर एक सुचिंतित और विचारोत्तेजक रचना है. मध्यपूर्व मामलों में राइट की गहरी दिलचस्पी रही है और 11 सितम्बर (अमरीका में इसे 9/11 लिखा जाता है) की घटना के तुरंत बाद वे अल-क़ायदा की बीट पर भी रहे हैं. यह किताब लिखने के लिए उन्होंने पांच साल मेहनत की और मिश्र, सऊदी अरब, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सूडान, इंगलैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, स्पैन और अमरीका में 560 इण्टरव्यू किए. जिनसे उन्होंने इण्टरव्यू किए उनमें बिन लादेन के कॉलेज के ज़माने के अंतरंग मित्र, रिचार्ड ए. क्लार्क, सऊदी राजपरिवार के सदस्य, अफगानी मुज़ाहिदीन और अल जज़ीरा के सम्वाददाता भी शामिल हैं. तब जाकर तैयार हुई यह किताब जो 11 सितम्बर की घटना के ठीक पहले के घटनाचक्र का सरसरी तौर पर हवाला देते हुए व्यक्तियों और विचारों, आतंकवादी योजनाओं और पश्चिमी खुफिया तंत्र की उस असफलता पर रोशनी डालती है जिसके कारण 11 सितम्बर घटित हुआ. द लूमिंग टॉवर पुस्तक का महत्व इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि इसे वर्ष 2007 में जनरल नॉन फिक्शन श्रेणी में प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरस्कार प्रदान किया गया है.
द लूमिंग टावर का वृत्तांत चार लोगों की ज़िन्दगियों के सहारे आगे बढता है. ये चार हैं अल-क़ायदा के दो नेता ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरि, एफ बी आई के आतंकवाद निरोधी मुखिया जॉन ओ नील और सऊदी खुफिया विभाग के पूर्व हेड प्रिंस तुर्की अल फैज़ल. जैसे-जैसे इन चारों की ज़िन्दगी की परतें खुलती चलती हैं, हम आधुनिक इस्लाम की उन परस्पर विरोधी धाराओं से परिचित होते जाते हैं जिन्होंने जवाहिरि और बिन लादेन में आमूल-चूल परिवर्तन किया; हम यह भी जान पाते हैं कि अल-क़ायदा का जन्म और ऐसा विकास कैसे हुआ कि यह संगठन केन्या और तांजानिया में अमरीकी दूतावासों पर बमबारी करवा पाया, और ओ नील ने 11 सितम्बर से पहले अल क़ायदा की पडताल के लिए कैसे दुर्धर्ष प्रयास किए और कैसे वह बेचारा वर्ल्ड ट्रेड टॉवर्स में मौत का शिकार हुआ. किताब यह भी बताती है कि कैसे प्रिंस तुर्की बिन लादेन के साथी से उसका दुश्मन बना और कैसे एफ बी आई, सी आई ए और एन एस ए अपनी-अपनी सूचनाओं का साझा करने में नाकामयाब रहे.
यह सब समझाने के लिए लूमिंग टॉवर हमें अंतरंग वृत्तान्त देता है. यहां हम आधुनिक इस्लामी मूवमेण्ट के संस्थापक सईद कुत्ब से मिलते हैं जो 1940 के अमरीका में तन्हा और हताश हैं. हम बिन लादेन और जवाहिरि के शानदार बचपन की छवियां देखते हैं और परिचित होते हैं सूडान और अफगानिस्तान में अल-क़ायदा के अड्डों के पारिवारिक जीवन से. इन सबसे ज़्यादा दिलचस्प है ओ नील का रोमांचक-उत्तेजक व्यवसायी जीवन और उससे भी ज़्यादा दिलचस्प है उसकी निजी ज़िन्दगी जो वह तीन औरतों के साथ गुज़ारता है. मज़े की बात कि ये तीनों ही औरतें एक दूसरे के अस्तित्व से अनजान रहती हैं. कम दिलचस्प तो अमरीकी गुप्तचर एजेंसियों की पारस्परिक लडाइयां भी नहीं हैं.
किताब की शुरुआत राइट के इस विचार से होती है कि आतंक और हत्याओं के ‘उम्दा’ रिकॉर्ड के बावज़ूद द्वितीय महायुद्धोत्तर इस्लामी सैन्यवाद किसी भी अरब देश में मज़हबी निज़ाम कायम नहीं कर सका. इनमें से कईयों ने 1979 के रूसी हमले का प्रतिकार करने में अफगानिस्तान की मदद की. फिर इसके बेरोज़गार योद्धा अपने घर में सक्रिय हुए. 1988 में अफगानिस्तान में गठित अल-क़ायदा ने ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में एक अलग ही राह चुनी. यह राह थी इस्लाम की समस्याओं का ठीकरा अमरीका के सर फोडने की. राइट बताते हैं कि लादेन उतने अमीर नहीं हैं जितना उन्हें माना जाता है, लेकिन वे संगठन और जन सम्पर्क के माहिर हैं. दस साल बाद लादेन अफ्रीका में अमरीकी दूतावास उडाकर धन और रंगरूटों को अपनी तरफ आकर्षित करने की शानदार शुरुआत कर पाते हैं. अल-क़ायदा के कई अभियानों का विस्तृत ब्यौरा देते हुए राइट बताते हैं कि आतंक की योजना बनाना कितना जटिल और जोखिम भरा होता है. यहीं वे इस तरफ भी इशारा करते हैं कि 11 सितम्बर की दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं घटती, अगर एफ बी आई, सी आई ए और एन एस ए ने तालमेल से काम किया होता.
पीटर बर्गेन की बहुचर्चित किताब ‘द ओसामा बिन लादेन आई नो’ (2006) को पढने के बाद यह किताब पढी जाए तो और भी अधिक महत्वपूर्ण लगेगी.
◙◙◙
Discussed book:
Title: The Looming Tower: Al-Qaeda and the Road to 9/11
Writer: Lawrence Wright
Page: 480
Publisher: Knopf
द लूमिंग टावर का वृत्तांत चार लोगों की ज़िन्दगियों के सहारे आगे बढता है. ये चार हैं अल-क़ायदा के दो नेता ओसामा बिन लादेन और अयमान अल जवाहिरि, एफ बी आई के आतंकवाद निरोधी मुखिया जॉन ओ नील और सऊदी खुफिया विभाग के पूर्व हेड प्रिंस तुर्की अल फैज़ल. जैसे-जैसे इन चारों की ज़िन्दगी की परतें खुलती चलती हैं, हम आधुनिक इस्लाम की उन परस्पर विरोधी धाराओं से परिचित होते जाते हैं जिन्होंने जवाहिरि और बिन लादेन में आमूल-चूल परिवर्तन किया; हम यह भी जान पाते हैं कि अल-क़ायदा का जन्म और ऐसा विकास कैसे हुआ कि यह संगठन केन्या और तांजानिया में अमरीकी दूतावासों पर बमबारी करवा पाया, और ओ नील ने 11 सितम्बर से पहले अल क़ायदा की पडताल के लिए कैसे दुर्धर्ष प्रयास किए और कैसे वह बेचारा वर्ल्ड ट्रेड टॉवर्स में मौत का शिकार हुआ. किताब यह भी बताती है कि कैसे प्रिंस तुर्की बिन लादेन के साथी से उसका दुश्मन बना और कैसे एफ बी आई, सी आई ए और एन एस ए अपनी-अपनी सूचनाओं का साझा करने में नाकामयाब रहे.
यह सब समझाने के लिए लूमिंग टॉवर हमें अंतरंग वृत्तान्त देता है. यहां हम आधुनिक इस्लामी मूवमेण्ट के संस्थापक सईद कुत्ब से मिलते हैं जो 1940 के अमरीका में तन्हा और हताश हैं. हम बिन लादेन और जवाहिरि के शानदार बचपन की छवियां देखते हैं और परिचित होते हैं सूडान और अफगानिस्तान में अल-क़ायदा के अड्डों के पारिवारिक जीवन से. इन सबसे ज़्यादा दिलचस्प है ओ नील का रोमांचक-उत्तेजक व्यवसायी जीवन और उससे भी ज़्यादा दिलचस्प है उसकी निजी ज़िन्दगी जो वह तीन औरतों के साथ गुज़ारता है. मज़े की बात कि ये तीनों ही औरतें एक दूसरे के अस्तित्व से अनजान रहती हैं. कम दिलचस्प तो अमरीकी गुप्तचर एजेंसियों की पारस्परिक लडाइयां भी नहीं हैं.
किताब की शुरुआत राइट के इस विचार से होती है कि आतंक और हत्याओं के ‘उम्दा’ रिकॉर्ड के बावज़ूद द्वितीय महायुद्धोत्तर इस्लामी सैन्यवाद किसी भी अरब देश में मज़हबी निज़ाम कायम नहीं कर सका. इनमें से कईयों ने 1979 के रूसी हमले का प्रतिकार करने में अफगानिस्तान की मदद की. फिर इसके बेरोज़गार योद्धा अपने घर में सक्रिय हुए. 1988 में अफगानिस्तान में गठित अल-क़ायदा ने ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में एक अलग ही राह चुनी. यह राह थी इस्लाम की समस्याओं का ठीकरा अमरीका के सर फोडने की. राइट बताते हैं कि लादेन उतने अमीर नहीं हैं जितना उन्हें माना जाता है, लेकिन वे संगठन और जन सम्पर्क के माहिर हैं. दस साल बाद लादेन अफ्रीका में अमरीकी दूतावास उडाकर धन और रंगरूटों को अपनी तरफ आकर्षित करने की शानदार शुरुआत कर पाते हैं. अल-क़ायदा के कई अभियानों का विस्तृत ब्यौरा देते हुए राइट बताते हैं कि आतंक की योजना बनाना कितना जटिल और जोखिम भरा होता है. यहीं वे इस तरफ भी इशारा करते हैं कि 11 सितम्बर की दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं घटती, अगर एफ बी आई, सी आई ए और एन एस ए ने तालमेल से काम किया होता.
पीटर बर्गेन की बहुचर्चित किताब ‘द ओसामा बिन लादेन आई नो’ (2006) को पढने के बाद यह किताब पढी जाए तो और भी अधिक महत्वपूर्ण लगेगी.
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Discussed book:
Title: The Looming Tower: Al-Qaeda and the Road to 9/11
Writer: Lawrence Wright
Page: 480
Publisher: Knopf
शीशे के दुर्ग से पीछे देखते हुए
न्यूयॉर्क शहर के पॉश इलाके से एक युवती टैक्सी से गुज़र रही है. अचानक उसकी नज़र एक औरत पर पडती है जो कचरे के डिब्बे में से कुछ बीन रही है. दोनों के बीच बमुश्किल पन्द्रह फुट का फासला है. युवती कार में नीचे झुक जाती है जिससे कि उस औरत की नज़र से बच जाए. वह घर पहुंचती है लेकिन सहज नहीं रह पाती. कारण? वह कचरा खंगालती औरत उसकी मां थी. पार्क एवेन्यू का महंगा अपार्टमेण्ट, मोतियों का बेशकीमती हार, कमरे में सजी बहुमूल्य कलाकृतियां और कचरे के ढेर में से खाने को कुछ ढूंढते और जैसे-तैसे ठण्ड से बचने का जुगाड करते मां-बाप! ये परस्पर विपरीत छवियां उसे बेचैन करती हैं.
कुछ दिनों बाद यही युवती मां को सन्देश भेजती है कि वह उसके घर आए. लेकिन मां रेस्तरां में मिलना पसन्द करती है क्योंकि उसे बाहर खाना ज़्यादा अच्छा लगता है. रेस्तरां में पहुंच कर मां आहिस्ता-आहिस्ता नमक-मिर्च-सॉस-शक्कर वगैरह की पुडियाएं अपने पर्स में खिसकाती रहती है, कुछ सूखे नूडल्स भी पर्स में डाल लेती है, ताकि “बाद में भी कुछ नाश्ता हो सके.” और यह करते हुए बेटी से पिकासो की चित्रकला पर गम्भीर चर्चा भी करती रहती है. बेटी के यह कहने पर कि वह मां की कुछ मदद करना चाहती है, मां किसी ब्यूटी पार्लर में जाने की तमन्ना का इज़हार करती है. ज़ाहिर है, बेटी को यह जंचता नहीं. वह कहती है कि वह तो मां की कोई ऐसी मदद करना चाहती है जिससे उसकी ज़िन्दगी बदल सके. मां जवाब देती है कि बदलाव की ज़रूरत उसे नहीं, बेटी को है क्योंकि उसका मूल्यबोध गडबड है. थोडी बहस होती है, और उसी दौरान बेटी मां को उस घटना की याद दिलाती है जिससे मैंने इस आलेख की शुरुआत की है. मां को ज़रा भी संकोच नहीं होता. वह पूरे आत्मविश्वास से कहती है कि इस देश के लोग बहुत अपव्यय करते हैं, वह तो उसी को दुरुस्त कर रही है. यानि मां (रोज़ मेरी) अपनी स्थिति से ज़रा भी दुखी नहीं है. यह मां एक कलाकार बनते-बनते रह गई थी. पिता रेक्स भी उससे अलग नहीं हैं. वे बहुत प्रबुद्ध हैं. दोनों जैसे एक दूसरे के लिए बने हैं : राम मिलाई जोडी. दोनों के गैर ज़िम्मेदाराना, झक्की और घुमक्कड जीवन ने चार बच्चों पर क्या क़हर बरपा किया होगा, इसका कुछ अन्दाज़ा उन्हीं चार में से एक, जीनेट वाल्स की इस संस्मरणात्मक किताब को पढकर लगाया जा सकता है.
कैसा होता है अपने त्रासद अतीत को आत्मीयता से याद करना? जीवन की जिन कटु, अप्रिय स्थितियों को आप पीछे छोड आए हैं, क्या उन्हें भी बगैर कडुआहट के पेश किया जा सकता है? जिन मां-बाप ने आपके प्रति अपने कर्तव्य निर्वहन की ज़रा भी चेष्टा नहीं की हो, उनको आखिर कितने अपनेपन से याद किया जा सकता है? इन और ऐसे अनेक सवालों के जवाब मिलते हैं फ्री- लांस लेखिका जीनेट वाल्स की संस्मरण पुस्तक ‘द ग्लास कासल’ को पढते हुए. जीनेट को उसके पिता पहाडी बकरी कहा करते थे. जीनेट ने अनायास ही अपने इस नाम को सार्थक कर दिया है. किताब में वह एक ऐसी लडकी के रूप में सामने आती है जिसने बहुत हिम्मत और कुशलता से अपने बाल्य-काल की ऊबड-खाबड और सीधी चढाई वाली ज़िन्दगी का सामना किया, जैसे पहाडी बकरियां किया करती हैं.
किताब में जीनेट बहुत मर्मस्पर्शी तरीके से अपने उस बचपन को सामने लाती है जहां उसे सेफ्टी पिन से जुडे जूते पहनने पडते थे और पैण्ट के छेदों को छिपाने के लिए अपनी त्वचा को मार्कर से रंगना पडता था. एक कामुक अंकल के यौनिक दुराचरण पर उसे यह शिक्षा दी गई कि ये सारी बातें मनगढंत हैं, और बाप ने तो हद्द ही कर दी, एक मदिरालय में उसी की दलाली कर डाली.. उसका बाप था तो बहुत बुद्धिमान, लेकिन कोई भी काम टिक कर करना उसकी फितरत में नहीं था. मां-बाप दोनों ही का खयाल था कि बच्चों को अपनी गलती से सीखने देना चाहिये, हालांकि खुद उन्होंने कभी कुछ नहीं सीखा और अंतत: सडक पर जा पहुंचे. लेकिन एक बात ज़रूर थी. वे अपने अभावों को लेकर कभी दुखी नहीं हुए. मां के पास तो हर बात के लिए सकारात्मक व्याख्या मौज़ूद थी. अगर फ्लैट की दीवारें बहुत ही पतली हैं तो क्या हुआ? पडौस की बातचीत सुन-सुनकर बच्चे बगैर ट्यूटर के थोडी बहुत स्पैनिश ही सीख लेंगे. पालतू जानवरों को खिलाने के लिए कुछ नहीं है तो क्या हुआ? वे अपने आप कुछ जुगाड करेंगे, उनमें आत्मनिर्भरता का गुण विकसित होगा. इतना ही नहीं, बेघरबार मां-बाप आत्मदया या हीनभाव से ग्रस्त नहीं हैं, इसमें उन्हें एडवेंचर नज़र आता है.
किताब की खासियत इस बात में है कि यहां लेखिका अपने मां-बाप के गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार की भर्त्सना करने की बजाय इस बात को अधिक उभारती है कि कैसे उन्होंने एक गैर-पारम्परिक जीवन जिया, वह भी अपनी शर्तों पर, और कैसे उस जीवन को जीते हुए वे गर्व से सर उठाये रहे. निश्चय ही जेनेट के मां-बाप का जीवन आदर्श जीवन नहीं था, लेकिन वह आम जीवन भी नहीं था. अपने कष्टों को नेपथ्य में कर जेनेट उन्हें इतनी आत्मीयता से याद करती है, यही बात इस किताब को भीड से अलग और महत्वपूर्ण बनाती है.
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कुछ दिनों बाद यही युवती मां को सन्देश भेजती है कि वह उसके घर आए. लेकिन मां रेस्तरां में मिलना पसन्द करती है क्योंकि उसे बाहर खाना ज़्यादा अच्छा लगता है. रेस्तरां में पहुंच कर मां आहिस्ता-आहिस्ता नमक-मिर्च-सॉस-शक्कर वगैरह की पुडियाएं अपने पर्स में खिसकाती रहती है, कुछ सूखे नूडल्स भी पर्स में डाल लेती है, ताकि “बाद में भी कुछ नाश्ता हो सके.” और यह करते हुए बेटी से पिकासो की चित्रकला पर गम्भीर चर्चा भी करती रहती है. बेटी के यह कहने पर कि वह मां की कुछ मदद करना चाहती है, मां किसी ब्यूटी पार्लर में जाने की तमन्ना का इज़हार करती है. ज़ाहिर है, बेटी को यह जंचता नहीं. वह कहती है कि वह तो मां की कोई ऐसी मदद करना चाहती है जिससे उसकी ज़िन्दगी बदल सके. मां जवाब देती है कि बदलाव की ज़रूरत उसे नहीं, बेटी को है क्योंकि उसका मूल्यबोध गडबड है. थोडी बहस होती है, और उसी दौरान बेटी मां को उस घटना की याद दिलाती है जिससे मैंने इस आलेख की शुरुआत की है. मां को ज़रा भी संकोच नहीं होता. वह पूरे आत्मविश्वास से कहती है कि इस देश के लोग बहुत अपव्यय करते हैं, वह तो उसी को दुरुस्त कर रही है. यानि मां (रोज़ मेरी) अपनी स्थिति से ज़रा भी दुखी नहीं है. यह मां एक कलाकार बनते-बनते रह गई थी. पिता रेक्स भी उससे अलग नहीं हैं. वे बहुत प्रबुद्ध हैं. दोनों जैसे एक दूसरे के लिए बने हैं : राम मिलाई जोडी. दोनों के गैर ज़िम्मेदाराना, झक्की और घुमक्कड जीवन ने चार बच्चों पर क्या क़हर बरपा किया होगा, इसका कुछ अन्दाज़ा उन्हीं चार में से एक, जीनेट वाल्स की इस संस्मरणात्मक किताब को पढकर लगाया जा सकता है.
कैसा होता है अपने त्रासद अतीत को आत्मीयता से याद करना? जीवन की जिन कटु, अप्रिय स्थितियों को आप पीछे छोड आए हैं, क्या उन्हें भी बगैर कडुआहट के पेश किया जा सकता है? जिन मां-बाप ने आपके प्रति अपने कर्तव्य निर्वहन की ज़रा भी चेष्टा नहीं की हो, उनको आखिर कितने अपनेपन से याद किया जा सकता है? इन और ऐसे अनेक सवालों के जवाब मिलते हैं फ्री- लांस लेखिका जीनेट वाल्स की संस्मरण पुस्तक ‘द ग्लास कासल’ को पढते हुए. जीनेट को उसके पिता पहाडी बकरी कहा करते थे. जीनेट ने अनायास ही अपने इस नाम को सार्थक कर दिया है. किताब में वह एक ऐसी लडकी के रूप में सामने आती है जिसने बहुत हिम्मत और कुशलता से अपने बाल्य-काल की ऊबड-खाबड और सीधी चढाई वाली ज़िन्दगी का सामना किया, जैसे पहाडी बकरियां किया करती हैं.
किताब में जीनेट बहुत मर्मस्पर्शी तरीके से अपने उस बचपन को सामने लाती है जहां उसे सेफ्टी पिन से जुडे जूते पहनने पडते थे और पैण्ट के छेदों को छिपाने के लिए अपनी त्वचा को मार्कर से रंगना पडता था. एक कामुक अंकल के यौनिक दुराचरण पर उसे यह शिक्षा दी गई कि ये सारी बातें मनगढंत हैं, और बाप ने तो हद्द ही कर दी, एक मदिरालय में उसी की दलाली कर डाली.. उसका बाप था तो बहुत बुद्धिमान, लेकिन कोई भी काम टिक कर करना उसकी फितरत में नहीं था. मां-बाप दोनों ही का खयाल था कि बच्चों को अपनी गलती से सीखने देना चाहिये, हालांकि खुद उन्होंने कभी कुछ नहीं सीखा और अंतत: सडक पर जा पहुंचे. लेकिन एक बात ज़रूर थी. वे अपने अभावों को लेकर कभी दुखी नहीं हुए. मां के पास तो हर बात के लिए सकारात्मक व्याख्या मौज़ूद थी. अगर फ्लैट की दीवारें बहुत ही पतली हैं तो क्या हुआ? पडौस की बातचीत सुन-सुनकर बच्चे बगैर ट्यूटर के थोडी बहुत स्पैनिश ही सीख लेंगे. पालतू जानवरों को खिलाने के लिए कुछ नहीं है तो क्या हुआ? वे अपने आप कुछ जुगाड करेंगे, उनमें आत्मनिर्भरता का गुण विकसित होगा. इतना ही नहीं, बेघरबार मां-बाप आत्मदया या हीनभाव से ग्रस्त नहीं हैं, इसमें उन्हें एडवेंचर नज़र आता है.
किताब की खासियत इस बात में है कि यहां लेखिका अपने मां-बाप के गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार की भर्त्सना करने की बजाय इस बात को अधिक उभारती है कि कैसे उन्होंने एक गैर-पारम्परिक जीवन जिया, वह भी अपनी शर्तों पर, और कैसे उस जीवन को जीते हुए वे गर्व से सर उठाये रहे. निश्चय ही जेनेट के मां-बाप का जीवन आदर्श जीवन नहीं था, लेकिन वह आम जीवन भी नहीं था. अपने कष्टों को नेपथ्य में कर जेनेट उन्हें इतनी आत्मीयता से याद करती है, यही बात इस किताब को भीड से अलग और महत्वपूर्ण बनाती है.
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Tuesday, October 16, 2007
लेखक का मनोजगत
साहित्य के लिए वर्ष 2006 का नोबल पुरस्कार पाने वाले, 1952 में जन्मे तुर्की लेखक ओरहान पामुक के निबन्धों और कहानी की नई किताब “अदर कलर्स : एस्सेज़ एण्ड अ स्टोरी” हमें एक बडे लेखक के मनोजगत में झांकने का विरल अवसर प्रदान करती है. पामुक पिछले तीन दशकों से साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं. उनके सात उपन्यास और अनेक निजी, चिंतनपरक और आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित हो चुके हैं. नोबल पुरस्कार मिलने के बाद प्रकाशित इस पहली किताब में उनके इसी लेखन का एक उत्कृष्ट चयन संजोया गया है.
इस किताब में वे जैसे एक खिडकी खोलकर अपने जीवन की कुछ झांकियां हमें दिखाते हैं. बचपन में स्कूल के प्रति उनकी अरुचि, उनकी बेटी का अकाल अवसाद, धूम्रपान छोडने का उनका सफल संघर्ष, न्यूयॉर्क में अनायास टकरा गए एक फटीचर-से लुटेरे के खिलाफ बयान देने की आशंका से उपजा त्रास ऐसी ही कुछ झांकियां हैं. लेकिन वे केवल झांकियां ही नहीं देते. पासपोर्ट के लिए आवेदन करने या रिश्तेदारों के साथ किसी भोज में सहभागिता करने का विवरण देते-देते वे बहुत सहजता से आपको कल्पना की अद्भुत उडान पर भी ले जाते हैं. इसी तरह इस्ताम्बुल में आए एक भीषण भूकम्प के बाद के दिनों के हालात का वर्णन करते-करते वे हमें मनुष्य के मन के आदिम भय और उम्मीद के विशाल आकाश के सामने भी ले जाकर खडा करते हैं. पामुक ने खुद लिखा है कि “इस किताब में मेरे विचार, बिम्ब और जीवनांश हैं जो अब तक मेरे उपन्यासों में रूपायित नहीं हो पाये हैं”. लेकिन, इन सारे अंशों को एक साथ पढकर हम बहुत सघनता से जान पाते हैं कि उनके उपन्यासों की रचना किस गारे-मिट्टी से और किस चाक पर हुई है. अपने इस गैर-कथात्मक लेखन की अहमियत से पामुक अपरिचित नहीं हैं. तभी तो उन्होंने लिखा है, “इन अंशों को मैंने एक आत्मकथात्मक परिप्रेक्ष्य को केन्द्र में रखते हुए एक नई किताब के रूप में संजोया है.”
वैसे, पामुक बार-बार कथा की सामर्थ्य का बखान करते हैं, लॉरेंस स्टर्न और फ्योदोर दॉस्ताएवस्की जसे पुरोधाओं के लेखन के हवाले देते हैं, अपनी लिखी डायरियों से अंश उद्धृत करते हैं और खुद के उपन्यासों पर भी टिप्पणियां करते हैं. पामुक ने इस किताब में उपन्यास के महत्व पर बहुत बढिया टिप्पणी की है: “उपन्यास, कहानियां और मिथक पढकर हम उन विचारो से परिचित होते हैं जो हमारी दुनिया को संचालित करते हैं. कथा साहित्य हमें उन सच्चाइयों तक पहुंचाता है जिन्हें हमारे परिवार, हमारा स्कूल और हमारा समाज हमसे छिपाता रहा है. और, उपन्यास कला हमें खुद से यह पूछने की इज़ाजत देती है कि असल में हम कौन हैं?”
किताब के 75 से ज़्यादा अंशों में जो “जीना और सोचना”, “राजनीति, यूरोप और स्व की अन्य समस्याएं” जैसे खण्डों में विभक्त हैं, आत्म निरीक्षण और सांस्कृतिक विकास ये दो बिन्दु केन्द्रीय चिंता के रूप में उभरते हैं. उदाहरण के लिए, सहस्र रजनी चरित पर विचार करते हुए वे कहते हैं, “उन दिनों खुद को आधुनिक समझने वाले मुझ जैसे तुर्की पूर्वी साहित्य के क्लैसिक्स को एक गहन और अभेद्य जंगल की मानिन्द देखते थे.” पामुक का यह सोच उन्हें अंतत: राजनीतिक चिंताओं से जोडता है. एक जगह वे लिखते हैं, ”इराक में युद्ध के बारे में झूठी बातों और गुप्त सीआईए(CIA) कारागारों ने तुर्की में पश्चिम की विश्वसनीयता को इतना आहत किया है कि...देश के इस भाग में अब मुझ जैसे लोगों के लिए सही पश्चिमी जनतंत्र के लिए समर्थन जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है.”
जगहों, परिवार-जन और मिलने-जुलने वालों, लेखकों, संस्कृति, कला और राजनीति पर केन्द्रित ये लेख स्वतंत्र रूप से तो पठनीय और मननीय हैं ही, अपनी समष्टि में ये एक रचनाकार के रूप में पामुक की मानसिक संरचना से परिचित कराते हैं. पामुक बार-बार पढने और लिखने के समृद्धि कारक अनुभवों का गुणानुवाद करते हैं और अपनी इस पसन्द का ज़िक्र करते हैं कि टेबल के सामने अकेले बैठ कर सोचा जाए. उनके अनुसार लेखक का निर्माण एकांत, कल्पना और परकाया प्रवेश से होता है. पामुक के शब्द हैं, “ जब मैं लिखने की बात करता हूं तो सबसे पहले मेरे जेहन में कोई उपन्यास, कविता या साहित्यिक परम्परा नहीं आते, बल्कि एक ऐसा आदमी आता है जिसने खुद को एक कमरे में बन्द कर लिया है, वह टेबल के सामने बैठ गया है और अपने में डूब गया है. अनेकानेक छायाओं के बीच वह शब्दों से एक नई दुनिया रचता है...धैर्य से, ज़िद से, और उल्लास से.” और जब वह यह नई दुनिया रचता है तो उसके मन में यह खयाल बराबर बना रहता है कि उसकी अपनी जडें कहां हैं! जहां जडें हैं, वहां पूर्व और पश्चिम के बीच गहन संघर्ष है. यही कारण है कि प्रबुद्ध पाठक को पामुक के लेखन में ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की अनुगूंजें सुनाई पडती हैं. पश्चिम की साहित्यिक परम्पराओं से भली-भांति परिचित पामुक अपने देश की साहित्य धारा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि “तुर्की को दो प्रवृत्तियों, दो भिन्न संस्कृतियों, दो आत्माओं से व्यथित नहीं होना चाहिए. खण्डित मानसिकता (स्किज़ोफ्रेनिया) तो आपको बुद्धिमान ही बनाती है”. क्या पामुक का यह सम्बोधन भारत में भी नहीं सुना और गुना जाना चाहिए?
Discussed book:
Other Colors: Essays and a Story
By Orhan Pamuk
Translated by: Maureen Freely
Publisher: Knopf
यह आलेख राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ठ ' जस्ट जयपुर' में दिनांक 16 अक्टूबर 2007 को प्रकाशित हुआ है.
इस किताब में वे जैसे एक खिडकी खोलकर अपने जीवन की कुछ झांकियां हमें दिखाते हैं. बचपन में स्कूल के प्रति उनकी अरुचि, उनकी बेटी का अकाल अवसाद, धूम्रपान छोडने का उनका सफल संघर्ष, न्यूयॉर्क में अनायास टकरा गए एक फटीचर-से लुटेरे के खिलाफ बयान देने की आशंका से उपजा त्रास ऐसी ही कुछ झांकियां हैं. लेकिन वे केवल झांकियां ही नहीं देते. पासपोर्ट के लिए आवेदन करने या रिश्तेदारों के साथ किसी भोज में सहभागिता करने का विवरण देते-देते वे बहुत सहजता से आपको कल्पना की अद्भुत उडान पर भी ले जाते हैं. इसी तरह इस्ताम्बुल में आए एक भीषण भूकम्प के बाद के दिनों के हालात का वर्णन करते-करते वे हमें मनुष्य के मन के आदिम भय और उम्मीद के विशाल आकाश के सामने भी ले जाकर खडा करते हैं. पामुक ने खुद लिखा है कि “इस किताब में मेरे विचार, बिम्ब और जीवनांश हैं जो अब तक मेरे उपन्यासों में रूपायित नहीं हो पाये हैं”. लेकिन, इन सारे अंशों को एक साथ पढकर हम बहुत सघनता से जान पाते हैं कि उनके उपन्यासों की रचना किस गारे-मिट्टी से और किस चाक पर हुई है. अपने इस गैर-कथात्मक लेखन की अहमियत से पामुक अपरिचित नहीं हैं. तभी तो उन्होंने लिखा है, “इन अंशों को मैंने एक आत्मकथात्मक परिप्रेक्ष्य को केन्द्र में रखते हुए एक नई किताब के रूप में संजोया है.”
वैसे, पामुक बार-बार कथा की सामर्थ्य का बखान करते हैं, लॉरेंस स्टर्न और फ्योदोर दॉस्ताएवस्की जसे पुरोधाओं के लेखन के हवाले देते हैं, अपनी लिखी डायरियों से अंश उद्धृत करते हैं और खुद के उपन्यासों पर भी टिप्पणियां करते हैं. पामुक ने इस किताब में उपन्यास के महत्व पर बहुत बढिया टिप्पणी की है: “उपन्यास, कहानियां और मिथक पढकर हम उन विचारो से परिचित होते हैं जो हमारी दुनिया को संचालित करते हैं. कथा साहित्य हमें उन सच्चाइयों तक पहुंचाता है जिन्हें हमारे परिवार, हमारा स्कूल और हमारा समाज हमसे छिपाता रहा है. और, उपन्यास कला हमें खुद से यह पूछने की इज़ाजत देती है कि असल में हम कौन हैं?”
किताब के 75 से ज़्यादा अंशों में जो “जीना और सोचना”, “राजनीति, यूरोप और स्व की अन्य समस्याएं” जैसे खण्डों में विभक्त हैं, आत्म निरीक्षण और सांस्कृतिक विकास ये दो बिन्दु केन्द्रीय चिंता के रूप में उभरते हैं. उदाहरण के लिए, सहस्र रजनी चरित पर विचार करते हुए वे कहते हैं, “उन दिनों खुद को आधुनिक समझने वाले मुझ जैसे तुर्की पूर्वी साहित्य के क्लैसिक्स को एक गहन और अभेद्य जंगल की मानिन्द देखते थे.” पामुक का यह सोच उन्हें अंतत: राजनीतिक चिंताओं से जोडता है. एक जगह वे लिखते हैं, ”इराक में युद्ध के बारे में झूठी बातों और गुप्त सीआईए(CIA) कारागारों ने तुर्की में पश्चिम की विश्वसनीयता को इतना आहत किया है कि...देश के इस भाग में अब मुझ जैसे लोगों के लिए सही पश्चिमी जनतंत्र के लिए समर्थन जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है.”
जगहों, परिवार-जन और मिलने-जुलने वालों, लेखकों, संस्कृति, कला और राजनीति पर केन्द्रित ये लेख स्वतंत्र रूप से तो पठनीय और मननीय हैं ही, अपनी समष्टि में ये एक रचनाकार के रूप में पामुक की मानसिक संरचना से परिचित कराते हैं. पामुक बार-बार पढने और लिखने के समृद्धि कारक अनुभवों का गुणानुवाद करते हैं और अपनी इस पसन्द का ज़िक्र करते हैं कि टेबल के सामने अकेले बैठ कर सोचा जाए. उनके अनुसार लेखक का निर्माण एकांत, कल्पना और परकाया प्रवेश से होता है. पामुक के शब्द हैं, “ जब मैं लिखने की बात करता हूं तो सबसे पहले मेरे जेहन में कोई उपन्यास, कविता या साहित्यिक परम्परा नहीं आते, बल्कि एक ऐसा आदमी आता है जिसने खुद को एक कमरे में बन्द कर लिया है, वह टेबल के सामने बैठ गया है और अपने में डूब गया है. अनेकानेक छायाओं के बीच वह शब्दों से एक नई दुनिया रचता है...धैर्य से, ज़िद से, और उल्लास से.” और जब वह यह नई दुनिया रचता है तो उसके मन में यह खयाल बराबर बना रहता है कि उसकी अपनी जडें कहां हैं! जहां जडें हैं, वहां पूर्व और पश्चिम के बीच गहन संघर्ष है. यही कारण है कि प्रबुद्ध पाठक को पामुक के लेखन में ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ की अनुगूंजें सुनाई पडती हैं. पश्चिम की साहित्यिक परम्पराओं से भली-भांति परिचित पामुक अपने देश की साहित्य धारा को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि “तुर्की को दो प्रवृत्तियों, दो भिन्न संस्कृतियों, दो आत्माओं से व्यथित नहीं होना चाहिए. खण्डित मानसिकता (स्किज़ोफ्रेनिया) तो आपको बुद्धिमान ही बनाती है”. क्या पामुक का यह सम्बोधन भारत में भी नहीं सुना और गुना जाना चाहिए?
Discussed book:
Other Colors: Essays and a Story
By Orhan Pamuk
Translated by: Maureen Freely
Publisher: Knopf
यह आलेख राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ठ ' जस्ट जयपुर' में दिनांक 16 अक्टूबर 2007 को प्रकाशित हुआ है.
Wednesday, October 10, 2007
भाषा के बारे में नया चिंतन
भाषिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में सुविख्यात और वैज्ञानिक प्रतिष्ठान को अक्सर झकझोरते रहने वाले 52 वर्षीय संज्ञानात्मक वैज्ञानिक स्टीवेन पिंकर ने अपनी नई किताब ‘द स्टफ़ ऑफ थॉट : लैंग्वेज एज़ अ विण्डो इण्टू ह्यूमन नेचर’ से एक बार फिर वैचारिक उत्तेजना का वातावरण उत्पन्न किया है. पिंकर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर हैं और टाइम पत्रिका वर्ष 2006 में उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल कर चुकी है. करीब पांच साल पहले प्रकाशित उन की किताब ‘द ब्लैक स्लेट : द मॉडर्न डिनायल ऑफ ह्यूमन नेचर’ बहु चर्चित रही है. अपनी इस नई किताब में उन्होंने अपने प्रिय दो क्षेत्रों – भाषा और मानव प्रकृति की अनूठी जुगलबन्दी प्रस्तुत की है. यहां पिंकर ने यह पडताल करने की कोशिश की है कि हमारे शब्द किस तरह हमारी प्रकृति (या स्वभाव) को उजागर करते हैं. अगर हम किसी को गाली भी देते हैं तो उससे हमारी भावनाएं अभिव्यक्त हो जाती हैं. हमारी वक्रोक्तियां हमारे रिश्तों को प्रकट कर डालती हैं. पिंकर कहते हैं कि हमारी भाषा के छोटे-से-छोटे उपकरण हमारे मनोभावों का परिचय दे देते हैं. यहां तक कि हम अपने बच्चों के जो नाम रखते हैं उनसे भी उनसे तथा समाज से हमारे रिश्ते प्रकट हो जाते हैं. पिंकर यहां एक शास्त्रीय प्रश्न से भी जूझते हैं कि क्या हमारी भाषा हमारे विचारों को प्रभावित करती है?पिंकर बताते हैं कि भाषा हमारे मस्तिष्क की संरचना का प्रतिरूप होती है. जब हम किसी चीज़ के बारे में बात करते हैं तो उसके पीछे हमारी मानसिक बनावट की बडी भूमिका होती है. यही कारण है कि हम एक ही बात को अलहदा-अलहदा स्थितियों में अलग-अलग तरह से कहते हैं. कभी हम कहते हैं कि मैं पानी पी रहा हूं, कभी – मैं गिलास से पानी पी रहा हूं, और कभी- मोहन मुझे पानी पिला रहा है. पिंकर कहते हैं कि मानव मस्तिष्क एक ही बात को अनेक तरह से अभिव्यक्त करने की क्षमता रखता है.
किताब के अलग-अलग अध्यायों में वे कार्य-कारण सम्बन्ध, नामकरण, गाली देना, और विनम्रता प्रदर्शन की उन उपकरणों के रूप में विशद व्याख्या करते हैं जिनके द्वारा हमारा मस्तिष्क सूचनाओं के प्रवाह को व्यवस्थित करता है. इसी सन्दर्भ में वे भाषा के लाक्षणिक और आलंकारिक प्रयोग पर विशेष बल देते हैं. पिंकर बताते हैं कि हम भाषा से दो काम लेते हैं. एक तो यह कि हम कोई सन्देश या सूचना देते हैं, और दूसरा यह कि उसी के द्वारा अपनी सामाजिक अवस्थिति की भी अभिव्यक्ति करते हैं. इस बात को वे एक उदाहरण से और स्पष्ट करते हैं. मान लीजिये आप डाइनिंग टेबल पर बैठे हैं और अपने पास बैठे व्यक्ति से कहते हैं : “क्या आप वह नमकदानी मुझे देने का कष्ट करेंगे?” पिंकर समझाते हैं कि यह वाक्य बोलकर आप न केवल नमकदानी मांग रहे हैं, आप यह भी जता रहे हैं कि आप दूसरे को ऐरा-गैरा नहीं मानते हैं, और आपका स्वभाव आदेश देने का नहीं है. इसलिए यह वाक्य बेवजह विनम्र और औपचारिक नहीं है, बल्कि आपके स्वभाव का द्योतक भी है.
किताब का एक रोचक अंश मनुष्य की गाली देने की प्रवृत्ति पर केन्द्रित है. पिंकर बताते हैं कि हम अपना गुस्सा पांच तरह से व्यक्त करते हैं : सेक्स, धर्म, मल-मूत्र त्याग, तिरस्कृत समूहों, और बीमारी-अपंगता विषयक अभिव्यक्तियों से. इन अभिव्यक्तियों में भी समय और समाज के अनुरूप परिवर्तन होता रहता है. मसलन कभी अंग्रेज़ी में अभिशाप के लिए ‘तुझे चेचक हो जाए’ जैसी अभिव्यक्ति प्रचलित थी. अब यह अभिव्यक्ति गायब हो गई है. कारण ज़ाहिर है. पिंकर यह भी बताते हैं कि गुस्से या शाप के लिए वर्जित शब्दों का प्रयोग तीव्र नकारात्मक भाव उपजाता है. इन शब्दों को पढने-सुनने से हमरे मस्तिष्क के बादाम के आकार वाले एक हिस्से जिसे एमिग्डाला के नाम से जाना जाता है में हलचल होती है. मस्तिष्क के इसी भाग में आक्रामकता, भय आदि नकारात्मक भावों की अवस्थितित मानी जाती है.
किताब का बहुत रोचक भाग है भाषा में आलंकारिकता या लाक्षणिकता के विश्लेषण वाला. जी नहीं, कवियों-लेखकों वाली आलंकारिक भाषा नहीं, बल्कि हमारी, आम आदमी की रोज़मर्रा की भाषा. भला इस भाषा में भी कोई आलंकरिकता हो सकती है? पिंकर ध्यान दिलाते हैं कि आप एक बार अपना बोला-लिखा एक पैरेग्राफ पढकर तो देखिए. आप पाएंगे कि उसमें पांच छह उपमा रूपक वगैरह मौज़ूद हैं. अगर आप गहराई से पडताल करें तो पाएंगे कि हमारा बोला हुआ 95% अलंकार ही है. ऐसा क्यों है? इसका जवाब भी पिंकर के पास है. वे कहते हैं कि मेटाफर यानि अलंकार नए विचारों को प्रकट करने का सरलतम तरीका है, क्योंकि इस तरह आप नई अभिव्यक्ति गढने के श्रम से बच जाते हैं. वे यह भी कहते हैं कि हमारा मस्तिष्क काम ही इसी तरह से करता है, यानि हम साम्यों के रूप में ही सोचते हैं, इसलिए स्वाभाविक ही है कि हमारी भाषा में भी साम्य (अलंकार) खुद-ब-खुद चले आते हैं. पिंकर यह भी कहते हैं कि आलंकारिकता का प्रयोग संवाद के लिए नहीं होता, बल्कि आलंकरिकता तो खुद ही संवाद है.
तो, अगली बार जब भी कुछ बोलें, ध्यान रखें कि आप महज़ एक सूचना ही नहीं दे रहे हैं, अपना परिचय भी दे रहे हैं.
◙◙◙
Discussed book:
The Stuff of Thought: Language as a Window Into Human Nature
By: Steven Pinker
Publisher: Viking Adult
Page: 512
$ 29.95
किताब के अलग-अलग अध्यायों में वे कार्य-कारण सम्बन्ध, नामकरण, गाली देना, और विनम्रता प्रदर्शन की उन उपकरणों के रूप में विशद व्याख्या करते हैं जिनके द्वारा हमारा मस्तिष्क सूचनाओं के प्रवाह को व्यवस्थित करता है. इसी सन्दर्भ में वे भाषा के लाक्षणिक और आलंकारिक प्रयोग पर विशेष बल देते हैं. पिंकर बताते हैं कि हम भाषा से दो काम लेते हैं. एक तो यह कि हम कोई सन्देश या सूचना देते हैं, और दूसरा यह कि उसी के द्वारा अपनी सामाजिक अवस्थिति की भी अभिव्यक्ति करते हैं. इस बात को वे एक उदाहरण से और स्पष्ट करते हैं. मान लीजिये आप डाइनिंग टेबल पर बैठे हैं और अपने पास बैठे व्यक्ति से कहते हैं : “क्या आप वह नमकदानी मुझे देने का कष्ट करेंगे?” पिंकर समझाते हैं कि यह वाक्य बोलकर आप न केवल नमकदानी मांग रहे हैं, आप यह भी जता रहे हैं कि आप दूसरे को ऐरा-गैरा नहीं मानते हैं, और आपका स्वभाव आदेश देने का नहीं है. इसलिए यह वाक्य बेवजह विनम्र और औपचारिक नहीं है, बल्कि आपके स्वभाव का द्योतक भी है.
किताब का एक रोचक अंश मनुष्य की गाली देने की प्रवृत्ति पर केन्द्रित है. पिंकर बताते हैं कि हम अपना गुस्सा पांच तरह से व्यक्त करते हैं : सेक्स, धर्म, मल-मूत्र त्याग, तिरस्कृत समूहों, और बीमारी-अपंगता विषयक अभिव्यक्तियों से. इन अभिव्यक्तियों में भी समय और समाज के अनुरूप परिवर्तन होता रहता है. मसलन कभी अंग्रेज़ी में अभिशाप के लिए ‘तुझे चेचक हो जाए’ जैसी अभिव्यक्ति प्रचलित थी. अब यह अभिव्यक्ति गायब हो गई है. कारण ज़ाहिर है. पिंकर यह भी बताते हैं कि गुस्से या शाप के लिए वर्जित शब्दों का प्रयोग तीव्र नकारात्मक भाव उपजाता है. इन शब्दों को पढने-सुनने से हमरे मस्तिष्क के बादाम के आकार वाले एक हिस्से जिसे एमिग्डाला के नाम से जाना जाता है में हलचल होती है. मस्तिष्क के इसी भाग में आक्रामकता, भय आदि नकारात्मक भावों की अवस्थितित मानी जाती है.
किताब का बहुत रोचक भाग है भाषा में आलंकारिकता या लाक्षणिकता के विश्लेषण वाला. जी नहीं, कवियों-लेखकों वाली आलंकारिक भाषा नहीं, बल्कि हमारी, आम आदमी की रोज़मर्रा की भाषा. भला इस भाषा में भी कोई आलंकरिकता हो सकती है? पिंकर ध्यान दिलाते हैं कि आप एक बार अपना बोला-लिखा एक पैरेग्राफ पढकर तो देखिए. आप पाएंगे कि उसमें पांच छह उपमा रूपक वगैरह मौज़ूद हैं. अगर आप गहराई से पडताल करें तो पाएंगे कि हमारा बोला हुआ 95% अलंकार ही है. ऐसा क्यों है? इसका जवाब भी पिंकर के पास है. वे कहते हैं कि मेटाफर यानि अलंकार नए विचारों को प्रकट करने का सरलतम तरीका है, क्योंकि इस तरह आप नई अभिव्यक्ति गढने के श्रम से बच जाते हैं. वे यह भी कहते हैं कि हमारा मस्तिष्क काम ही इसी तरह से करता है, यानि हम साम्यों के रूप में ही सोचते हैं, इसलिए स्वाभाविक ही है कि हमारी भाषा में भी साम्य (अलंकार) खुद-ब-खुद चले आते हैं. पिंकर यह भी कहते हैं कि आलंकारिकता का प्रयोग संवाद के लिए नहीं होता, बल्कि आलंकरिकता तो खुद ही संवाद है.
तो, अगली बार जब भी कुछ बोलें, ध्यान रखें कि आप महज़ एक सूचना ही नहीं दे रहे हैं, अपना परिचय भी दे रहे हैं.
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Discussed book:
The Stuff of Thought: Language as a Window Into Human Nature
By: Steven Pinker
Publisher: Viking Adult
Page: 512
$ 29.95
Tuesday, September 25, 2007
बदलें अपना सोच, अपना जीवन
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
ईसा मसीह के जन्म से पांच सौ बरस पहले चीन में लाओ त्से नाम के एक बडे विद्वान हुए हैं. इन द्वारा लिखवाये गए 81 पदों को मानवीय अस्तित्व की प्रकृति पर अंतिम टिप्पणी माना जाता है. ये 81 पद जिन्हें ताओ-ते-चिंग यानि महान पथ के नाम से जाना जाता है, ऐसी सलाहें देते हैं जो संतुलित, नैतिक, आध्यात्मिक और सत्कर्म की प्रेरक मानी जाती हैं. इन सलाहों में व्यक्तिगत आध्यात्म से लगाकार मनुष्य-मनुष्य के बीच के रिश्तों और राजनीति तक का समावेश है. चीनी दर्शन शास्त्र के क्षेत्र में ताओ ते चिंग का अत्यधिक महत्व है. चीनी सौंदर्यशास्त्र की अनेक अवधारणाओं का उद्गम भी यहीं से माना जाता है.
स्व विकास के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के लेखक और वक्ता डॉ वैन डब्ल्यू डायर ने अपनी सद्य प्रकाशित किताब चेंज युअर थॉट्स – चेंज युअर लाइफ : लिविंग द विज़डम ऑफ द ताओ में इसी ताओ-ते-चिंग के सैक़डों उपलब्ध अनुवादों का अध्ययन करने के बाद 81 लेख प्रस्तुत किए हैं जो यह बताते हैं कि लाओ त्से की प्राचीन विद्वत्ता को आज के जीवन पर कैसे लागू किया जाए. इस पुस्तक में डॉ डायर ने ताओ के 12 सर्वाधिक प्रशंसित अनुवादों के आधार पर सभी 81 पद भी प्रस्तुत किए हैं.
81 अध्यायों वाली इस किताब का हर अध्याय ताओ के एक पद से प्रारम्भ होता है. फिर एक शीर्षक जो उस अध्याय की सीख का परिचय देता है, जैसे नमनीयता के साथ जीना, या दुश्मनों के बिना जीना. इसके बाद है उस पद पर डॉ डायर की टिप्पणी और व्याख्या. अध्याय के अंत में है संक्षिप्त निर्देश कि उस सीख को अपने जीवन में कैसे ढाला जाए. निर्देश बहुत सरल हैं, जैसे विचारों को अपने मन में रुकने-ठहरने दें. या हैं कुछ क्रियाएं. क्रियाएं छोटी भी हैं, बडी भीं. छोटी जैसे अपने सम्पर्क में आने वाले किसी व्यक्ति के प्रति दया-ममता-करुणा बरतें, और बडी जैसे एक दिन निराहार रहें. अध्यायों का आकार बहुत बडा नहीं है. 4 से 6 पन्ने, बस!
कहना अनावश्यक है कि इन अध्यायों में जो कहा गया है, उसमें नया कुछ भी नहीं है. सब कुछ हमारा जाना-पहचाना ही है. जैसे, आप अपने स्वभाव में विश्वास रखें, संतुष्ट रहें, या अपने सोच को लचीला रखें, उसे कठोर न बनने दें, आदि. सब-कुछ आपका जाना-पहचाना होने के बावज़ूद यह किताब इसलिए प्रभावित करती है कि आज की भाग-दौड और तनाव भरी ज़िन्दगी में शांति और सुकून की तलाश हरेक को है. डॉ डायर जीवन की चिर-परिचित बातों को बहुत ही सरल और आत्मीय अन्दाज़ में प्रस्तुत कर सहज स्वीकार्य बना देते हैं. जो सलाहें वे देते हैं, उन्हें मानने में कोई कठिनाई नहीं लगती, जैसे यह कि आप हर दिन कम से कम एक घण्टा प्रकृति के और अपने सान्निध्य में रहें. एक बहुत अच्छी बात वे यह कहते हैं कि आप छोटी-सी ही सही शुरुआत तो करें. यह कहने के लिए वे लाओ त्से की की सुपरिचित पंक्ति का सहारा लेते हैं : हज़ार मील की यात्रा एक छोटे-से कदम से शुरू होती है.
यह किताब उन चुनिन्दा किताबों में से है जो आपसे कहती है कि मुझे आहिस्ता-आहिस्ता पढो. खुद डॉ वैन ने लिखा है कि “यह एक ऐसी किताब है जो आपका अपनी ज़िन्दगी को देखने का नज़रिया सदा के लिए बदल देगी और आप एक ऐसी नई दुनिया में विचरण करने लगेंगे जिसका प्रकृति से पूर्ण तादात्म्य है. इस किताब को लिखते हुए मैं खुद बदल गया हूं. अब मैं प्राकृतिक विश्व के साथ सामंजस्य और अभूतपूर्व शांति का अनुभव कर रहा हूं. मुझे ताओ-ते- चिंग की यह व्याख्या प्रस्तुत करते हुए गर्व है”.
किताब हमको समझाती है कि यद्यपि गति और परिवर्तन जीवन के नियम हैं और हमारे चारों तरफ बदलाव होते ही रहते हैं, हमें यह विवेक जाग्रत करना चाहिए कि हमें हर परिवर्तन के साथ नहीं बहते जाना है.
आज बाज़ार बेहतर जीवन जीना सिखाने वाली किताबों से भरा पडा है. यह किताब इस तरह की किताबों की भीड में होते हुए भी उनसे अलग है. इसकी सबसे बडी खासियत इसकी शैली में निहित है जो आप पर कुछ इस तरह असर डालती है कि आप खुद-ब-खुद शांति की अनुभूति करने लगते हैं, जीवन की आपाधापी से कुछ देर के लिए ही सही विरत होकर ज़ेन का अनुभव करते हैं और पाते हैं कि आपमें कुछ सकारात्मक परिवर्तन हुआ है.
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(यह समीक्षा आलेख 'जस्ट जयपुर - राजस्थान पत्रिका' में 25 सितम्बर 2007 को प्रकाशित हुआ. )
सम्पर्क
ई-2/211, चित्रकूट
जयपुर -302021.
फोन : 2440782
मोबाइल : 98295 32504
Discussed book:
Change Your Thoughts – Change Your Life: Living the Wisdom of the Tao
By Wayne W. Dyer
Publisher: Hay House
ई-2/211, चित्रकूट
जयपुर -302021.
फोन : 2440782
मोबाइल : 98295 32504
Discussed book:
Change Your Thoughts – Change Your Life: Living the Wisdom of the Tao
By Wayne W. Dyer
Publisher: Hay House
Tuesday, September 18, 2007
बदलता चेहरा लक्ज़री का
बदलता चेहरा लक्ज़री का
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
एक वक़्त था जब लक्ज़री उत्पाद केवल चुनिन्दा, अभिजात, पुश्तैनी अमीरों और शाही खानदान के लोगों को ही मयस्सर हो पाते थे. तब ये उत्पाद एक विशिष्ठ जीवन शैली के भी परिचायक हुआ करते थे. इनकी गुणवत्ता उत्कृष्टतम होती थी और इन्हें खरीदना एक अनुपम अनुभव हुआ करता था. जिन लोगों ने ऐसे लक्ज़री उत्पादों का सिलसिला शुरू किया उनके लिए आज के इस तरह के उत्पादों के बाज़ार को पहचान पाना भी शायद मुमकिन न हो. खानदानी निर्माताओं-उत्पादकों, निष्ठा और गुणवत्ता का युग बीत चुका है. आज अरबों-खरबों डॉलर के लक्ज़री उत्पादों का उद्योग उन वैश्विक निगमों के हाथों में है जिनकी नज़रें उत्पादन वृद्धि, ब्रैण्ड अवेयरनेस, विज्ञापन और सबसे ज़्यादा तो मुनाफे पर टिकी है. हाथ से बने लक्ज़री उत्पाद करीब-करीब लुप्त हो चले हैं. कीमतें कम करने और अपना मुनाफा बढाने के लिए घटिया कच्चे माल का प्रयोग किया जाने लगा है. विलासिता पूर्ण उत्पादों का अधिकांश निर्माण चीन जैसे दूरस्थ देशों में स्थित बडे कारखानों को आउट सोर्स कर दिया गया है,और वहां बने उत्पादों को पश्चिमी यूरोप में निर्मित कह कर बेचा जाता है.
बारह साल तक पेरिस में न्यूज़वीक की संस्कृति और फैशन विषयों की लेखिका रही डाना थॉमस ने अपनी नई किताब ‘डीलक्स : हाऊ लक्ज़री लॉस्ट इट्स लस्टर’ में लक्ज़री और फैशन की दुनिया का ऐसा सामाजिक वृत्तांत लिखा है जो मनोरंजक होने के साथ साथ सूचनाप्रद और विचारोत्तेजक भी है. यह किताब लिखने के लिए डाना ने फ्रेंच परफ्यूम लेबोरेट्रीज़ और लास वेगस के शॉपिंग मॉल्स से लगाकर चीन में चल रही असेम्बली लाइन फैक्ट्रियों तक की यात्रा कर लक्ज़री उद्योग के ऐसे अनेक अन्धेरे कोनों और रहस्यों को उजागर किया है जिन्हें प्राडा, गुच्ची और बरबरी जैसे मशहूर ब्राण्ड कभी सामने नहीं आने देते. डाना थॉमस 1994 से न्यूयॉर्क टाइम्स मैगज़ीन में स्टाइल पर लिखती रही हैं, पेरिस की अमरीकन यूनिवर्सिटी में तीन साल पढा चुकी हैं और अनेक उच्च-भ्रू पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन कर कई बार पुरस्कृत हो चुकी हैं.
डाना ने इस किताब में उच्च वर्गीय शॉपिंग अनुभव की गहन पडताल करते हुए कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब भी तलाशने की कोशिश की है, जैसे लक्ज़री की नई परिभाषा क्या है, खास तौर पर इस सन्दर्भ में कि विज्ञापनों के ज़रिये लाइफ स्टाइल को मास मार्केट तक ले जाया जाने लगा है. इसी तरह यह सवाल भी कि हम उस लक्ज़री कहे जाने वाले उत्पाद के लिए महंगी कीमत क्यों चुकाते हैं जो गुणवत्ता को पीछे छोड चुका है? और अंत में यह भी कि क्या इतना होने के बाद भी अपने पैसे को लक्ज़री में झोंकना अक्लमन्दी की बात है?
पारम्परिक लक्ज़री को परिभाषित करती हुई डाना बताती है कि यह न केवल फैशन के मामले में हमारी सुरुचि सम्पन्नता की परिचायक होती है, इससे हमारे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर तथा हमारी अस्मिता का भी परिचय मिलता है. अमरीका में सुरुचि और स्टाइल के मौज़ूदा मानदण्ड नव-धनिक उद्योगपतियों जैसे वेण्डरबिल्ट्स, कार्नेगीज़, मोरगन्स, रॉकफेलर्स आदि द्वारा कायम किए गए थे. डाना के अनुसार, प्रारम्भ में लक्ज़री महज़ एक प्रॉडक्ट नहीं हुआ करती थी. इसके पीछे परम्परा, उच्चतम क्वालिटी और अक्सर एक लाड भरा खरीददारी अनुभव भी रहा करता था. उस वक़्त लक्ज़री, जैसे सही क्लब की सदस्यता या सही उपनाम का होना, उच्च वर्गीय जीवन का एक स्वाभाविक और प्रत्याशित तत्व हुआ करती था. लक्ज़री उत्पाद बहुत सीमित मात्रा में, प्राय: ऑर्डर पर, वास्तव में एलीट ग्राहकों के लिए बनाए जाते थे.
लेकिन यह सब अब अतीत बन चुका है. डाना थॉमस आज के 35 अग्रणी लक्ज़री ब्राण्ड्स को, जिन्होंने वैश्विक बाज़ार के 60 प्रतिशत से अधिक पर कब्ज़ा जमा रखा है, इस क्षेत्र का खलनायक मानती हैं. इस सूची में शामिल हैं प्राडा, गुच्ची, ज्योर्जिओ आरमानी, शनेल और इन सबसे बडे लुई व्हीटन जिसके समूह में डिओर, फेण्डी और बरलूटी जैसे लेबल आते हैं. इन बडे और लोकप्रिय लेबल्स ने लक्ज़री उद्योग का चेहरा ही बदल डाला है. इनके कारण हुआ यह है कि पहले जो प्रोडक्ट चुनिन्दा और खासमखास का विशेषाधिकार था अब वह हर खासो-आम के लिए सुलभ हो गया है. ऐसा होने से उत्कृष्ट कलात्मकता को सबसे अधिक नुकसान हुआ है. इस बदलाव की चर्चा व व्याख्या करते हुए डाना ने लक्ज़री के प्रजातांत्रिकरण से उत्पन्न अनेक प्रभावों-दुष्प्रभावों की गहरी पडताल की है. उन्होंने आंकडे देकर बताया है कि सारे लक्ज़री उत्पादों का चालीस प्रतिशत जापान में बिकता है, सत्रह प्रतिशत अमरीका में और सोलह प्रतिशत यूरोप के देशों में. यहां तक कि भारत जैसे विकास शील देश में भी लक्ज़री उत्पादों के पचास लाख ग्राहक हैं. चालीस प्रतिशत जापानी किसी न किसी व्हीटन प्रॉडक्ट का प्रयोग करते हैं. लास वेगस के बहुत महंगे मॉल सीज़र्स पैलेस में जाने वालों की तादाद डिज़्नी लैण्ड जाने वालों की तादाद को पीछे छोड चुकी है. बकौल लेखिका औद्योगिकृत देशों में खर्च करने योग्य आय के बढने और क्रेडिट कार्ड संस्कृति के फैलाव से मध्य वर्ग भी लक्ज़री उत्पादकों के निशाने पर आ गया है और वे बडे विज्ञापन अभियानों, फिल्मी सितारों और सेलिब्रिटीज़ के माध्यम से इस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं. इस सब का एक परिणाम यह हुआ है कि जो लक्ज़री पहले चुनिन्दा अभिजात वर्ग तक सीमित थी अब वह आम आदमी की पहुंच के भीतर आ गई है. पहले फैशन के मठ पैरिस और न्यूयॉर्क ही थे, अब तो मास्को तक में क्रॉकस सिटी नाम से 690,000 वर्ग फीट का एक लक्ज़री मॉल बन गया है जिसमें दुनिया के तमाम बडे फैशन हाउसेज़ के 180 बूटीक हैं. चीन के थियानमेन स्क्वेयर में इसी साल के अंत तक ऐसा ही एक मॉल आ रहा है.
लक्ज़री और फैशन की दुनिया में एक बडा बदलाव यह भी आया है कि पहले जहां उत्पादों के लेबल बहुत छोटे हुआ करते थे अब वे लोगो (Logo) के रूप में दिखावे की चीज़ बन चुके हैं. यह भी अभिजात जीवन मूल्य में आया एक बडा बदलाव है. सटल(Subtle) की जगह लाउड ने ले ली है. इस तरह फैशन क्रांति अमीरी और आभिजात्य को नए सिरे से पारिभाषित कर रही है. लक्ज़री उत्पादों की यह कथा वैश्वीकरण, पूंजीकरण, वर्ग और संस्कृति की कथा भी है. किताब को पढते हुए उग्र आक्रामक उपभोक्तावाद की अनेक परतें खुलती हैं और हम बहुत कुछ सोचने को मज़बूर होते हैं.
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कहीं यह जंगल राज तो नहीं
अपने शहर की कुछेक घटनाओं से बहुत व्यथित हूं. ये घटनाएं तो मेरे शहर की हैं लेकिन जानता हूं कि देश के हर शहर में ऐसा ही होता रहता है. इसीलिए अपनी चिंता में आप सबको शरीक कर रहा हूं.
कल राजस्थान विश्वविद्यालय के एक कॉलेज ने एक सांसद वृंदा करात के अपने यहां परमाणु संधि पर व्याख्यान के लिए बुलाया था. वे अपना व्याख्यान दे पातीं इससे पहले ही एक दल विशेष के युवा वहां घुस आए और उनकी कोशिश थी कि वृंदा अपना व्याख्यान न दे. उनका तर्क था कि वृंदा उस विचारधारा से ताल्लुक रखती हैं जो राम को नहीं मानती, वृंदा ने पहले बाबा रामदेव का विरोध किया था, वगैरह.
कुछ दिन पहले मेरे इसी शहर में, और तमाम देश में राम सेतु के समर्थन में तीन घण्टे का बन्द रखा गया. इससे पहले गुर्जरों के समर्थन में, कभी ब्राह्मणों के समर्थन में ऐसा होता ही रहा है.
मैं मानता हूं कि जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का, अपने विचार रखने का, औरों से सहमत और असहमत होने का समान अधिकार होता है. सिद्धांत रूप में तो सब यही कहेंगे. लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है?
क्या वृंदा को अपनी बात कहने का कोई हक़ नहीं है? और आगे चलें तो क्या यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति राम और राम सेतु के बारे में वही विचार रखे जो आपके हैं? आपसे भिन्न सोच भी तो किसी की हो सकती है? जिसकी सोच भिन्न हो वह देशद्रोही होगा, यह तै करने वाले आप कौन हैं?
और इसी तरह, मामला चाहे आरक्षण का हो या कोई और, जो इन मुद्दों के समर्थन में होते हैं, उनसे भिन्न मत भी तो किसी का हो सकता है! अगर आप आरक्षण मांगते हैं तो मैं उसके विरोध में भी तो हो सकता हूं. आप अगर अपनी मांग के समर्थन में मुझे भी शामिल करते हैं तो यह तो ज़बर्दस्ती है, यह तो प्रजातंत्र नहीं है.
होना यह चाहिये कि हम अपनी बात कहें, लेकिन दूसरों को भी अपनी बात कहने का हक़ दें. हम विरोध प्रदर्शन करें लेकिन दूसरों को भी यह हक़ दें कि अगर वे न चाहें तो उस प्रदर्शन से अलग रह जाएं.
एक कॉलेज में कुछ विद्यार्थी किसी मुद्दे को लेकर हडताल करते हैं और अपनी हडताल के लिए यह ज़रूरी मानते हैं कि सारे ही विद्यार्थी उसमें शरीक हों. उनके लिहाज़ से यह ठीक हो सकता है, लेकिन जिन्हें अनचाहे उस हडताल में भागीदारी निबाहनी पड रही है, उनके लिहाज़ से भी तो सोचिये? क्या उनका कोई हक़ नहीं है? या हक़ तो सिर्फ ताकतवर का ही होता है?
क्या इसी को जंगल राज नहीं कहा जाएगा?
दुर्गाप्रसाद
कल राजस्थान विश्वविद्यालय के एक कॉलेज ने एक सांसद वृंदा करात के अपने यहां परमाणु संधि पर व्याख्यान के लिए बुलाया था. वे अपना व्याख्यान दे पातीं इससे पहले ही एक दल विशेष के युवा वहां घुस आए और उनकी कोशिश थी कि वृंदा अपना व्याख्यान न दे. उनका तर्क था कि वृंदा उस विचारधारा से ताल्लुक रखती हैं जो राम को नहीं मानती, वृंदा ने पहले बाबा रामदेव का विरोध किया था, वगैरह.
कुछ दिन पहले मेरे इसी शहर में, और तमाम देश में राम सेतु के समर्थन में तीन घण्टे का बन्द रखा गया. इससे पहले गुर्जरों के समर्थन में, कभी ब्राह्मणों के समर्थन में ऐसा होता ही रहा है.
मैं मानता हूं कि जनतंत्र में सबको अपनी बात कहने का, अपने विचार रखने का, औरों से सहमत और असहमत होने का समान अधिकार होता है. सिद्धांत रूप में तो सब यही कहेंगे. लेकिन व्यवहार में क्या हो रहा है?
क्या वृंदा को अपनी बात कहने का कोई हक़ नहीं है? और आगे चलें तो क्या यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति राम और राम सेतु के बारे में वही विचार रखे जो आपके हैं? आपसे भिन्न सोच भी तो किसी की हो सकती है? जिसकी सोच भिन्न हो वह देशद्रोही होगा, यह तै करने वाले आप कौन हैं?
और इसी तरह, मामला चाहे आरक्षण का हो या कोई और, जो इन मुद्दों के समर्थन में होते हैं, उनसे भिन्न मत भी तो किसी का हो सकता है! अगर आप आरक्षण मांगते हैं तो मैं उसके विरोध में भी तो हो सकता हूं. आप अगर अपनी मांग के समर्थन में मुझे भी शामिल करते हैं तो यह तो ज़बर्दस्ती है, यह तो प्रजातंत्र नहीं है.
होना यह चाहिये कि हम अपनी बात कहें, लेकिन दूसरों को भी अपनी बात कहने का हक़ दें. हम विरोध प्रदर्शन करें लेकिन दूसरों को भी यह हक़ दें कि अगर वे न चाहें तो उस प्रदर्शन से अलग रह जाएं.
एक कॉलेज में कुछ विद्यार्थी किसी मुद्दे को लेकर हडताल करते हैं और अपनी हडताल के लिए यह ज़रूरी मानते हैं कि सारे ही विद्यार्थी उसमें शरीक हों. उनके लिहाज़ से यह ठीक हो सकता है, लेकिन जिन्हें अनचाहे उस हडताल में भागीदारी निबाहनी पड रही है, उनके लिहाज़ से भी तो सोचिये? क्या उनका कोई हक़ नहीं है? या हक़ तो सिर्फ ताकतवर का ही होता है?
क्या इसी को जंगल राज नहीं कहा जाएगा?
दुर्गाप्रसाद
Thursday, September 13, 2007
हिन्दी दिवस पर विशेष : हिन्दी, हिन्दी, कैसी हिन्दी
हिन्दी, हिन्दी, कैसी हिन्दी
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
न्यूयॉर्क में सम्पन्न हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन पर हुआ शोर-शराबा पूरी तरह थमा भी नहीं है कि हिन्दी दिवस आ गया है. जो लोग इस सम्मेलन में जाने का जुगाड करने में कामयाब हुए उनकी मानें तो अब हिन्दी को विश्व भाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता, और जो नहीं जा पाए उनमें से अधिकांश की सुनें तो यह कि हिन्दी जहां थी उससे पीछे ही गई है, और इस तरह के सम्मेलनों से कुछ होना जाना नहीं है. और अब आ गया है यह हिन्दी दिवस, जिसे दिल-जले हिन्दी का श्राद्ध दिवस कह कर अपनी भडास निकाला करते हैं.
भारत की संविधान सभा ने 14 सितम्बर को हिन्दी को राजभाषा बनाने का फैसला किया था, उसी को याद करते हुए हिन्दी दिवस मनाया जाता है. कहने को हिन्दी हमारे देश की राजभाषा है भी सही, लेकिन इससे अधिक मिथ्या कथन और कोई शायद हो नहीं सकता. हिन्दी कितनी राजभाषा है, बताने की ज़रूरत नहीं. फिर भी, इस दिन हिन्दी प्रेमी इकट्ठा होते हैं, हिन्दी की शान में कसीदे पढते हैं, हिन्दी के लिए जीने-मरने की कसमें खाते हैं, और शाम होते-होते ये पर उपदेश कुशल वीर फिर से अपनी उस दुनिया में लौट जाते हैं जहां हिन्दी या तो होती नहीं, या बहुत ही कम होती है. घर में अंग्रेज़ी के अखबार, अंग्रेज़ी की पत्र-पत्रिकाएं, बातचीत और अगर वह किसी ‘बडे’ आदमी से हो तो अनिवार्यत: अंग्रेज़ी में, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा अंग्रेज़ी में. यानि हिन्दी के प्रयोग का उपदेश दूसरों को. उपदेश देने वाला भी इस हक़ीक़त से वाक़िफ, लेने वाला भी. इतना ही नहीं, हिन्दी के प्रति दिखावटी अनुराग का यह भाव भी क्रमश: फीका पडता जा रहा है. आज़ादी के बाद के कुछ सालों में हिन्दी के प्रति जिस तरह का लगाव नज़र आता था और लोग जिस उत्साह और भावना से हिन्दी के लिए खून-पसीना बहाने की बातें किया करते थे, अब धीरे-धीरे उसका भी लोप होता जा रहा है. अब हिन्दी दिवस महज़ एक गैर-ज़रूरी रस्म अदायगी बन कर रह गया है. राजभाषा विभाग या उसके अधिकारी को एक दिन यह ढोल बजाना है सो जैसे-तैसे बजा दिया जाता है.
निश्चय ही यह स्थिति लाने में सबसे बडी भूमिका हिन्दी वालों की रही है. मुझे लगता है कि हिन्दी का सबसे बडा अहित उसके राजभाषा बन जाने से हुआ. इसे गलत न समझा जाए. राजभाषा किसी न किसी भाषा को बनना ही था. हिन्दी का राजभाषा बनना उचित था. लेकिन गलत यह हुआ कि इसे हिन्दी वालों ने दादागिरी के भाव से ग्रहण किया: सारे देश को अब हिन्दी में काम करना पडेगा. अगर हम लोगों ने अन्य भाषाओं के प्रति अपनत्व रखा होता, अगर दूसरी भाषाओं को सीखने में ज़रा भी रुचि दिखाई होती तो हिन्दी के प्रति अन्य भाषा-भाषियों में वैसी अरुचि न होती जैसी गाहे-बगाहे प्रकट हो जाती है. आखिर कितने हिन्दी भाषी होंगे जो दक्षिण की भी, बल्कि किसी भी हिन्दीतर प्रदेश की कोई भाषा जानते हैं? प्रभाष जोशी ने ठीक ही कहा है “अन्य भारतीय भाषाओं के लोगों को हिन्दी से तभी ऐतराज़ होता है जब हिन्दी भाषी, भाषा द्वारा सत्ता को संचालित करना चाहते हैं. यानि सत्ता पर सिर्फ हिन्दी क एकाधिकार देखना अन्य भारतीय भाषी लोग पसन्द नहीं करते.”
दूसरी बात, हिन्दी समर्थक ‘निज भाषा उन्नति’ की केवल बात ही करते हैं, उसे क्रिया रूप में परिणत करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते. आज हिन्दी में अधिकांश किताबें 200 के संस्करण से आगे नहीं जा पाती, इससे अधिक क्रूर टिप्पणी हमारे भाषा प्रेम पर क्या होगी? बडे-से-बडे शहर में हिन्दी किताबों की दुकान का होना अपवाद ही होगा. यह कहना अर्ध सत्य है कि प्रकाशक या पुस्तक विक्रेता की रुचि किताब बेचने में नहीं है. आखिर वह तो बेचने को बैठा है, आप खरीदने को निकलिये तो सही. लेकिन दस हज़ार का मोबाइल, दो हज़ार का जूता और दो सौ का पिज़्ज़ा खरीदने वाले को दो सौ रुपये की किताब महंगी लगती है. न केवल अधिसंख्य हिन्दी प्रेमी खरीदते नहीं पढते भी नहीं. वे अपनी कूपमण्डूकता में ही मगन रहते हैं. हिन्दी लेखकों की स्थिति भी, जो अपने आप को हिन्दी का सबसे बडा पैरोकार मानते हैं, कोई बेहतर नहीं है. हिन्दी का बडा (बल्कि छोटा भी) लेखक किताब खरीदकर पढना अपमान की बात मानता है. अगर आप चाहते हैं कि वह आपकी किताब पढे तो आप उसे भेंट कीजिए. फुरसत होगी तो पढ लेंगे. और फुरसत होगी, इसकी ज़्यादा उम्मीद कीजिये मत. हिन्दी लेखक अपना लिखा ही नहीं पढता औरों पर क्या कृपा करेगा!
भाषा के प्रति उसका रवैया भी कम अधिनायकवादी नहीं है. वह चाहता है कि सब उससे पूछ कर, जैसी वह कहे वैसी भाषा का प्रयोग करें. इसीलिए कभी वह अखबारों की भाषा पर कुढता है, कभी टी वी की भाषा पर नाक-भौं सिकोडता है. वह खुद चाहे अपने जीवन में चाहे जैसी मिश्रित भाषा बोलता हो, आपसे चाहता है कि आप अपनी भाषा निहायत शुद्ध, परिष्कृत, प्रांजल, संस्कृतनिष्ठ वगैरह रखें. उसके लिए भाषा पण्डित का चौका है जहां काफी कुछ वर्जित रहता है. मज़े की बात कि यही भाषाविद इस बात पर खूब गर्व करता है कि ऑक्सफॉर्ड डिक्शनरी में इस साल इतने हिन्दी शब्द शामिल हो गए. हां, उसकी भाषा के चौके में अगर एक भी शब्द अंग्रेज़ी का आ गया तो चौका अपवित्र! इस संकुचित-संकीर्ण भाव को रखते हुए बात की जाती है हिन्दी को विश्व भाषा बनाने की. घर में नहीं दाने, अम्मां चली भुनाने!
हम हिन्दी अपनाने की बात तो बहुत करते हैं पर हिन्दी कैसी हो, इस पर कोई विमर्श नहीं करते. यह समझा जाना चाहिए कि जब हमारे दैनिक जीवन की भाषा बदली है, यह बदलाव सब जगह दिखाई देगा. जिस भाषा में साहित्य रचा जाता है, वह भाषा आम आदमी की नहीं हो सकती. किसी भी काल में नहीं रही, हालांकि भवानी प्रसाद मिश्र ने कहा था, ‘जिस तरह तू बोलता है उस तरह तू लिख’. वैसे, नई तकनीक के आने से साहित्य की दुनिया में भी आम आदमी और उसकी भाषा की आमद-रफ्त बढी है, इसे भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. कम्प्यूटर और इण्टरनेट के लगातार सुलभ और लोकप्रिय होने से आज हममें से बहुत सारे लोग अपने लिखे के खुद ही प्रकाशक भी हो गए हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है. अब साहित्य कुछ खास लोगों तक सीमित नहीं रह गया है. आज हिन्दी में ही लगभग 500 ब्लॉग चल रहे हैं. इनमें से अधिकतर की भाषा उस भाषा से बहुत अलग है जिसे आदर्श भाषा के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है. यहां दूसरी भाषाओं से शब्दों की खुली आवाजाही है और व्याकरण के नियमों में भारी शिथिलता है. दलित साहित्य ने भी भाषा को एक हद तक आज़ाद किया है.
इधर तकनीक ने भाषा के प्रचार-प्रसार में बहुत बडी भूमिका अदा की है. कम्प्यूटर पर लगभग सारा काम हिन्दी में करना सम्भव हुआ है और बहुत सारे हिन्दी प्रेमियों ने हिन्दी को तकनीक के लिए स्वीकार्य बनाने में वह काम किया है जो सरकारों को करना चाहिये था. बालेन्दु दाधीच और रविशंकर श्रीवास्तव उर्फ रवि रतलामी ऐसे लोगों में अग्रगण्य हैं. लेकिन आम हिन्दी लेखक ने तकनीक से एक दूरी ही बना रखी है. नई तकनीक के विरोध में उनके पास अनगिनत तर्क हैं. ‘मैं कम्प्यूटर नहीं जानता’ इस बात को संकोच से नहीं, गर्व से कहने वाले ‘एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं.’ इस परहेज़ से न उनका भला है न हिन्दी का. सुखद आश्चर्य तो यह कि ऐसे लोगों के बावज़ूद तकनीक की दुनिया में हिन्दी फल-फूल रही है. दर असल पारम्परिक साहित्यकारों से अलग एक नई पीढी इण्टरनेट के माध्यम से साहित्य द्वार पर ज़ोरदार दस्तक दे रही है. इनके भाषा संस्कार भिन्न हैं और अलग है साहित्य को लेकर इनका नज़रिया. नेट पत्रिकाओं और ब्लॉग्ज़ में इनके तेवर अलग से देखे-जाने जा सकते हैं. कोई आश्चर्य नहीं होगा कि अगले कुछ सालों में ये ही साहित्य की मुख्यधारा का रूप ले लें. आखिर कहां हिन्दी की एक किताब का 200 का संस्करण और कहां नेट की असीमित दुनिया!
हिन्दी फल-फूल बाज़ार में भी रही है. यह वैश्वीकरण का युग है. सबको अपना-अपना माल बेचने की पडी है. शहरों में बेच चुके तो अब कस्बों का रुख किया जा रहा है. और कस्बों की जनता को, बल्कि कहें उपभोक्ता को, तो हिन्दी में ही सम्बोधित किया जा सकता है, सो बाज़ार दौड कर हिन्दी को गले लगा रहा है. यह बात अगर गर्व करने की नहीं है तो स्यापा करने की भी नहीं है. आखिर हिन्दी का प्रसार तो हो ही रहा है. वैसे वैश्वीकरण की भाषा, एक बडे भू भाग में अंग्रेज़ी है, लेकिन भारत में उसने बाज़ार के दबाव में आकर हिन्दी के आगे घुटने टिकाये हैं. इसी प्रक्रिया में हिन्दी और अंग्रेज़ी के रिश्ते भी पहले की तुलना में अधिक सद्भावपूर्ण बने हैं. ज़रूरत इस बात की है कि आज इन नए बने रिश्तों को समझा जाए और पुरानी शत्रुताओं को भुलाया जाए. आज जो अंग्रेज़ी हमारे चारों तरफ है उसे ब्रिटिश साम्राज्य से जोड कर देखना उचित नहीं. हमें इस नई अंग्रेज़ी के साथ रहना है, इसे स्वीकार कर अपनी भाषा के विकास की रणनीति तैयार की जानी चाहिए.
आज भाषा और हिन्दी भाषा के प्रश्न पर न तो भावुकता के साथ सही विचार हो सकता है और न अपने अतीत के प्रति अन्ध भक्ति भाव रखते हुए. ऐसा हमने बहुत कर लिया. अब तो ज़रूरत इस बात की है कि बदलते समय की आहटों को सुना जाए और भाषा को तदनुरूप विकसित होने दिया जाए. इसी में हिन्दी का भला है, और हमारा भी.
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Sunday, September 2, 2007
एक और दिलचस्प किताब के बारे में
क्या नहीं, कैसे
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
आज की दुनिया बहुत बदल गई है। हर किसी के पास इण्टरनेट पर माय स्पेस है और वह प्रकाशक है, हर किसी के पास कैमरा युक्त मोबाइल है, और वह चलता फ़िरता फ़ोटो पत्रकार है, हर कोई यू ट्यूब पर अपना बनाया वीडियो अपलोड कर सकता है और वह फ़िल्मकार है। यानि हम में से हरेक अब प्रकाशक, पत्रकार, फ़िल्मकार वगैरह है और हमारी ज़द में आने वाला हर व्यक्ति एक सार्वजनिक व्यक्ति है। इस बदलाव के कारण हमारी ज़िन्दगी पर और खासकर व्यापार पर जो असर पड रहा है उसी की गम्भीर पडताल की है एल आर एन नामक एक बिज़नेस एथिक्स कम्पनी के संस्थापक और सी ई ओ डोव सीडमेन ने अपनी नई किताब हाउ (HOW) में।
सीडमेन की स्थापना का सार यह है कि आज की अत्यधिक पारदर्शी दुनिया में यह पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि आप कैसे अपनी ज़िन्दगी जीते हैं और कैसे अपना व्यापार चलाते हैं क्योंकि आज पहले से कहीं ज़्यादा लोग बिना किसी सम्पादक-प्रकाशक के आपके अन्तरंग में झांक पाने और उसे औरों को दिखा पाने में समर्थ हैं। इसलिए, अगर आपको आज की दुनिया में सफ़ल होना है तो इन नई स्थितियों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना सीखना होगा।
इसी के साथ यह भी कि आज नई पीढी के लिए यह जानना समझना भी ज़रूरी है कि आज जो भी किया, कहा या लिखा जाता है वह तुरंत डिजिटल जगत में अमिट हो जाता है। उसे मिटाया ही नहीं जा सकता, कभी भी। इसलिए, हमाई ज़रा-सी चूक या भूल, जैसे हमारे सी वी पर की गई छोटी-सी गलतबयानी, या कहीं की गई कोई टिप्पणी हमारे लिए सदा के लिए कष्टदायक बन सकती है। इलेक्ट्रॉनिक और सायबर स्पेस में स्मृति की अक्षुण्णता ने यह स्थिति पैदा कर दी है कि आपको कोई दूसरा मौका नहीं मिलने वाला। इसीलिए सीडमेन कहते हैं कि “इस सूचना युग में जीवन में कोई अध्याय या अलमारी बन्द नहीं है जहां आप कुछ गोपनीय रख सकें। आप कुछ भी पीछे नहीं छोड सकते और न अपना कूडा-कबाड कहीं छिपा सकते हैं। आपका अतीत ही आपका वर्तमान है। इसलिए, अगर जीवन में आगे बढना है तो ‘कैसे’ को सम्भालना होगा।“
यही बात व्यापार के बारे में भी है। वह समय पीछे छूट गया है जब कम्पनियां कुछ जन सम्पर्क कर्मियों को खिला-पिलाकर, दे-दिलाकर अपनी छवि दुरुस्त कर लिया करती थी। आज तो हममें से हरेक एक रिपोर्टर है और उसकी बात पूरी दुनिया में पढी-सुनी जाती है। लेकिन, सीडमेन कहते हैं, इसी में अनन्त सम्भावनाएं भी छिपी हैं। वे कहते हैं कि आज आप जो माल बनाते हैं, उसकी तो सारी दुनिया नकल करके बेच सकती है, लेकिन आप कैसे अपने ग्राहकों से बर्ताव करते हैं, कैसे उनसे अपने वादे निबाहते हैं, कैसे अपने सहयोगियों के साथ रिश्ते रखते हैं – इसकी कोई नकल नहीं हो सकती। इसी ‘कैसे’ में छिपा होता है आपकी सफ़लता का रहस्य! सीडमेन एक बहुत खू्बसूरत बात कहते हैं : मानवीय व्यवहार में इतना वैविध्य है और यह इतना वैश्विक है कि इससे अनंत सम्भावनाएं उपजती हैं।
सीडमेन कुछ उदाहरण देकर अपनी बात पुष्ट करते हैं। मिशिगन के एक अस्पताल ने अपने डॉक्टरों को पाबन्द किया कि वे कोई भी गलती करने पर माफ़ी मांगें। सीडमेन कहते हैं कि इसके बाद उस अस्पताल के माल प्रैक्टिस (दुराचरण) क्लेम्स में ज़बर्दस्त कमी आई। इसी तरह टेक्सस में एक मोटर कम्पनी ने अपने मैकेनिकों को यह छूट दे दी कि वे सही काम करने के लिए कम्पनी का चाहे कितना भी खर्च कर सकते हैं। बकौल सीडमेन, ग्राहक संतुष्टि बढने के कारण कम्पनी का असल खर्च कम हो गया। इसी तरह न्यूयॉर्क की एक गली के डोनट सेलर ने अपने ग्राहकों पर विश्वास करते हुए यह व्यवस्था की कि वे अपनी शेष रेज़गारी उसके गल्ले से खुद उठा लें, तो उसने पाया कि न केवल वह ज़्यादा ग्राहकों की सेवा कर पा रहा है, उसके इस विश्वास प्रदर्शन से उसके ग्राहकों की संख्या भी बढ गई है।
इस तरह के उदाहरणों से सीडमेन स्थापित करते हैं कि अब हम कांच के घरों में नहीं रहते हैं। बल्कि घरों की तो दीवारें भी होती हैं, हम तो कांच के माइक्रोस्कोपिक स्लाइड्स पर धरे हैं, जिन्हें हर कोई देख सकता है। इसलिए चाहे आप कार बेचते हों या अखबार, या इन्हें खरीदते हों, अपना ‘कैसे’ दुरुस्त रखिये। यानि कोशिश कीजिये कि विश्वास कायम करें, साथ मिलकर काम करें, सही तरह से नेतृत्व करें और मौका आये तो अपनी गलती के लिए ईमानदारी से क्षमा याचना करें। इसलिए, कि पहले से ज़्यादा लोग जानते हैं, जान सकते हैं कि आप क्या करते हैं और क्या नहीं।
सीडमेन बहुत ज़ोर देकर कहते हैं कि इस अत्यधिक पारदर्शी और बेहद जुडे हुए विश्व में हमें अपनी भूमिका और कामों पर पुनर्विचार करना पडेगा। अब जब सूचना अपरिमित हो चली है, उसकी जमाखोरी निरर्थक है। इसकी बजाय हमें उसे अधिक सुलभ कराना चाहिये। आज जब दुनिया में वैश्विक पार्टनर्स के साथ मिलकर काम करना व्यापार के लिए ज़रूरी होता जा रहा है, व्यापार की सफ़लता के लिए सूचनाओं का साझा ज़रूरी है। आज का नया मंत्र है : जुडो और साथ मिलकर काम करो। जो ज़्यादा अच्छी तरह ऐसा कर पाएंगे, भविष्य उन्हीं का होगा।
कहना अनावश्यक है, सीडमेन की यह सीख जितनी व्यापारिक गतिविधियों पर लागू होती है, उतनी ही वैयक्तिक आचरण पर भी।
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डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
आज की दुनिया बहुत बदल गई है। हर किसी के पास इण्टरनेट पर माय स्पेस है और वह प्रकाशक है, हर किसी के पास कैमरा युक्त मोबाइल है, और वह चलता फ़िरता फ़ोटो पत्रकार है, हर कोई यू ट्यूब पर अपना बनाया वीडियो अपलोड कर सकता है और वह फ़िल्मकार है। यानि हम में से हरेक अब प्रकाशक, पत्रकार, फ़िल्मकार वगैरह है और हमारी ज़द में आने वाला हर व्यक्ति एक सार्वजनिक व्यक्ति है। इस बदलाव के कारण हमारी ज़िन्दगी पर और खासकर व्यापार पर जो असर पड रहा है उसी की गम्भीर पडताल की है एल आर एन नामक एक बिज़नेस एथिक्स कम्पनी के संस्थापक और सी ई ओ डोव सीडमेन ने अपनी नई किताब हाउ (HOW) में।
सीडमेन की स्थापना का सार यह है कि आज की अत्यधिक पारदर्शी दुनिया में यह पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि आप कैसे अपनी ज़िन्दगी जीते हैं और कैसे अपना व्यापार चलाते हैं क्योंकि आज पहले से कहीं ज़्यादा लोग बिना किसी सम्पादक-प्रकाशक के आपके अन्तरंग में झांक पाने और उसे औरों को दिखा पाने में समर्थ हैं। इसलिए, अगर आपको आज की दुनिया में सफ़ल होना है तो इन नई स्थितियों को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना सीखना होगा।
इसी के साथ यह भी कि आज नई पीढी के लिए यह जानना समझना भी ज़रूरी है कि आज जो भी किया, कहा या लिखा जाता है वह तुरंत डिजिटल जगत में अमिट हो जाता है। उसे मिटाया ही नहीं जा सकता, कभी भी। इसलिए, हमाई ज़रा-सी चूक या भूल, जैसे हमारे सी वी पर की गई छोटी-सी गलतबयानी, या कहीं की गई कोई टिप्पणी हमारे लिए सदा के लिए कष्टदायक बन सकती है। इलेक्ट्रॉनिक और सायबर स्पेस में स्मृति की अक्षुण्णता ने यह स्थिति पैदा कर दी है कि आपको कोई दूसरा मौका नहीं मिलने वाला। इसीलिए सीडमेन कहते हैं कि “इस सूचना युग में जीवन में कोई अध्याय या अलमारी बन्द नहीं है जहां आप कुछ गोपनीय रख सकें। आप कुछ भी पीछे नहीं छोड सकते और न अपना कूडा-कबाड कहीं छिपा सकते हैं। आपका अतीत ही आपका वर्तमान है। इसलिए, अगर जीवन में आगे बढना है तो ‘कैसे’ को सम्भालना होगा।“
यही बात व्यापार के बारे में भी है। वह समय पीछे छूट गया है जब कम्पनियां कुछ जन सम्पर्क कर्मियों को खिला-पिलाकर, दे-दिलाकर अपनी छवि दुरुस्त कर लिया करती थी। आज तो हममें से हरेक एक रिपोर्टर है और उसकी बात पूरी दुनिया में पढी-सुनी जाती है। लेकिन, सीडमेन कहते हैं, इसी में अनन्त सम्भावनाएं भी छिपी हैं। वे कहते हैं कि आज आप जो माल बनाते हैं, उसकी तो सारी दुनिया नकल करके बेच सकती है, लेकिन आप कैसे अपने ग्राहकों से बर्ताव करते हैं, कैसे उनसे अपने वादे निबाहते हैं, कैसे अपने सहयोगियों के साथ रिश्ते रखते हैं – इसकी कोई नकल नहीं हो सकती। इसी ‘कैसे’ में छिपा होता है आपकी सफ़लता का रहस्य! सीडमेन एक बहुत खू्बसूरत बात कहते हैं : मानवीय व्यवहार में इतना वैविध्य है और यह इतना वैश्विक है कि इससे अनंत सम्भावनाएं उपजती हैं।
सीडमेन कुछ उदाहरण देकर अपनी बात पुष्ट करते हैं। मिशिगन के एक अस्पताल ने अपने डॉक्टरों को पाबन्द किया कि वे कोई भी गलती करने पर माफ़ी मांगें। सीडमेन कहते हैं कि इसके बाद उस अस्पताल के माल प्रैक्टिस (दुराचरण) क्लेम्स में ज़बर्दस्त कमी आई। इसी तरह टेक्सस में एक मोटर कम्पनी ने अपने मैकेनिकों को यह छूट दे दी कि वे सही काम करने के लिए कम्पनी का चाहे कितना भी खर्च कर सकते हैं। बकौल सीडमेन, ग्राहक संतुष्टि बढने के कारण कम्पनी का असल खर्च कम हो गया। इसी तरह न्यूयॉर्क की एक गली के डोनट सेलर ने अपने ग्राहकों पर विश्वास करते हुए यह व्यवस्था की कि वे अपनी शेष रेज़गारी उसके गल्ले से खुद उठा लें, तो उसने पाया कि न केवल वह ज़्यादा ग्राहकों की सेवा कर पा रहा है, उसके इस विश्वास प्रदर्शन से उसके ग्राहकों की संख्या भी बढ गई है।
इस तरह के उदाहरणों से सीडमेन स्थापित करते हैं कि अब हम कांच के घरों में नहीं रहते हैं। बल्कि घरों की तो दीवारें भी होती हैं, हम तो कांच के माइक्रोस्कोपिक स्लाइड्स पर धरे हैं, जिन्हें हर कोई देख सकता है। इसलिए चाहे आप कार बेचते हों या अखबार, या इन्हें खरीदते हों, अपना ‘कैसे’ दुरुस्त रखिये। यानि कोशिश कीजिये कि विश्वास कायम करें, साथ मिलकर काम करें, सही तरह से नेतृत्व करें और मौका आये तो अपनी गलती के लिए ईमानदारी से क्षमा याचना करें। इसलिए, कि पहले से ज़्यादा लोग जानते हैं, जान सकते हैं कि आप क्या करते हैं और क्या नहीं।
सीडमेन बहुत ज़ोर देकर कहते हैं कि इस अत्यधिक पारदर्शी और बेहद जुडे हुए विश्व में हमें अपनी भूमिका और कामों पर पुनर्विचार करना पडेगा। अब जब सूचना अपरिमित हो चली है, उसकी जमाखोरी निरर्थक है। इसकी बजाय हमें उसे अधिक सुलभ कराना चाहिये। आज जब दुनिया में वैश्विक पार्टनर्स के साथ मिलकर काम करना व्यापार के लिए ज़रूरी होता जा रहा है, व्यापार की सफ़लता के लिए सूचनाओं का साझा ज़रूरी है। आज का नया मंत्र है : जुडो और साथ मिलकर काम करो। जो ज़्यादा अच्छी तरह ऐसा कर पाएंगे, भविष्य उन्हीं का होगा।
कहना अनावश्यक है, सीडमेन की यह सीख जितनी व्यापारिक गतिविधियों पर लागू होती है, उतनी ही वैयक्तिक आचरण पर भी।
◙◙◙
Wednesday, August 29, 2007
An interesting book
हंसते-हंसते दर्शन शास्त्र
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
उम्र के सत्तर बरस पूरे कर लेने के बाद थॉमसन ने सोचा कि अब उसे अपनी जीवन शैली को बदल डालना चाहिये ताकि कुछ बरस और जिया जा सके। बेहद संतुलित भोजन, जॉगिंग, तैराकी – इन सब का असर यह हुआ कि तीन माह में उसका हुलिया ही बदल गया। वज़न में तीस पाउण्ड और कमर के घेरे में 30 इंच की कमी हो गई। उत्साहित होकर उसने सोचा कि अब इस युवा लगती काया के अनुरूप हेयर स्टाइल भी हो जाए! गया एक हेयर कटिंग सेलून में, बाल कटवाये, और जैसे ही बाहर निकला, एक बस की चपेट में आ गया।
गिरते-गिरते भी उसके मुंह से निकला , “ हे भगवान, तूने मेरे साथ ऐसा क्यूं किया?”
जवाब में आकाशवाणी हुई, “थॉमसन सच तो यह है कि मैं तुम्हें पहचान ही नहीं पाया।“
दर्शन शास्त्र की किताब में यह लतीफ़ा! कुछ अजीब नहीं लगता? थॉमस केथकार्ट और डेनियल क्लाइन की ताज़ा किताब ‘प्लेटो एण्ड अ प्लेटिपस वॉक इण्टु अ बार : अण्डरस्टैंडिंग फ़िलोसॉफ़ी थ्रू जोक्स’ में यही बेमेल लगने वाला संयोजन चौंकाता भी है, आनन्दित भी करता है। टॉम (यानि थॉमस) और डेनियल हार्वर्ड विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र पढे हैं और बहुधन्धी है। डैन तो अनेक जाने माने कॉमेडियनों के लिए लतीफ़े लिखते भी हैं। इनकी पिछली किताब ‘मेचो मेडिटेशंस’ भी खासी चर्चित रह चुकी है। अपनी इस नई किताब में इन्होंने लतीफ़ो के माध्यम से दर्शन शास्त्र की जटिल अवधारणाओं को समझाने का मज़ेदार उपक्रम किया है।
पूरी किताब इन दो दोस्तों के बीच का सम्वाद है और उसी के बीच लतीफ़े, फ़िल्मी प्रसंग, गीत, समसामयिक घटनाओं के हवाले और छोटे-छोटे प्रसंग सब आते रहते हैं। प्रसंगवश, प्लेटो को भी सम्वाद शैली प्रिय थी। तत्वमीमांसा, तर्क शास्त्र, ज्ञानमीमांसा, नीति शास्त्र, अस्तित्ववाद, भाषा दर्शन, नारीवाद वगैरह सब कुछ यहां मौज़ूद है। महान दार्शनिकों ने जो कुछ पढा-सीखा-समझा और समझाया उस सबको यह किताब हल्के फ़ुलके लतीफ़ों के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। यहीं यह भी बता दूं कि किताब के शीर्षक में उल्लिखित प्लेटिपस एक ऑस्ट्रेलियाई प्राणी है जो जल और थल दोनों में विचरण करता है। यह कुछ-कुछ बत्तख से मिलता-जुलता होता है।
किताब उन लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो गम्भीर चीज़ों को सरल तरह से समझना चाहते हैं। दुनिया की सभी महान दार्शनिक परम्पराओं, शैलियों, शाखाओं, अवधारणाओं और विचारकों को इसमें समेटा गया है। ऊपर हमने जिस लतीफ़े को उद्धृत किया है उसका इस्तेमाल अरस्तू की ज़रूरी (एसेन्शियल) और आकस्मिक (एक्सीडेण्टल) की अवधारणा को समझाने के लिए किया गया है।
लेखक द्वय का कहना है कि लतीफ़ों और दार्शनिक अवधारणाओं की निर्मिति और परिणति में बहुत कुछ समान है। दोनों ही आपके मस्तिष्क को समान तरह से उद्वेलित करते हैं, दोनों का उद्गम समान है, दोनों चीज़ों के बारे में आपकी सम्वेदना को उलट-पलट डालते हैं, सोच की दुनिया को औंधे मुंह खडा करते हैं और आपके भीतर छिपे,प्राय: असुविधाजनक सत्यों को बाहर ले आते हैं।
मज़े की बात यह कि आप चाहें तो 200 पन्नों की इस किताब को महज़ एक जोक बुक की तरह भी पढ सकते हैं और अगर उससे आगे जाना चाहें तो पायेंगे कि ये लतीफ़े दर्शन शास्त्र की विविध धाराओं और शैलियों के क्रम में संयोजित हैं और आप इनके माध्यम से दर्शन शास्त्र की प्रारम्भिक जानकारी पा सकते हैं।
इसी किताब में एक प्रसंग प्रख्यात जासूस शर्लक होम्स का है। होम्स की ख्याति उसकी निगमन पद्धति के कारण है। इस किताब के लेखक द्वय का कहना है कि होम्स निगमन नहीं आगमन पद्धति का प्रयोग करता है। वह स्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन करता है और फ़िर अपने विगत अनुभवों के आधार पर साम्य और सम्भाव्यता को मिलाकर सामान्यीकरण करता है। इस बात को इस प्रसंग से समझाया गया है:
शर्लक होम्स और उसका मित्र वाट्सन कैम्पिंग पर हैं। रात है। दोनों सो रहे हैं। अचानक होम्स उठता है, वाट्सन को जगाता है। कहता है, “वाट्सन, ऊपर आकाश की तरफ़ देखो और मुझे बताओ कि तुम क्या देख रहे हो।“
वाट्सन जवाब देता है, “ मुझे अनगिनत तारे दिखाई दे रहे हैं।“
होम्स पूछता है, “इसका मतलब?”
वाट्सन कुछ क्षण सोच कर जवाब देता है, “खगोल शास्त्र के लिहाज़ से यह कि अनगिनत आकाश गंगाएं हैं और कदाचित अरबों ग्रह हैं। ज्योतिष के लिहाज़ से यह कि शनि सिंह राशि में स्थित है। समय हुआ है दो बजकर पैंतालिस मिनिट। मौसम विग़्यान के हिसाब से कल का दिन खुशगवार होने वाला है। धर्म शास्त्र के लिहाज़ से यह कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और हम अकिंचन। होम्स, ये तो मेरे निष्कर्ष है। आप क्या सोचते हैं?”
“वाट्सन, बेवकूफ़! किसी ने हमारा टेण्ट चुरा लिया है।“
Sunday, August 26, 2007
Kitab jise aap bhi padhana chaahenge.
गॉड इज़ नॉट ग्रेट : रियली?
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
इन दिनों धर्म की भूमिका की पड़ताल करने वाली अनेक मह्त्वपूर्ण किताबें आई हैं। सैम हैरिस की द एण्ड ऑफ़ फ़ेथ (2005) और रिचार्ड डॉकिन्स की द गॉड डेल्यूज़न (2006) पिछले दिनों बहु चर्चित रही हैं। इसी परम्परा को आगे बढाती है क्रिस्टोफ़र हिचेन्स की किताब ‘गॉड इज़ नॉट ग्रेट : हाऊ रिलीजन पॉइज़न्स एवरीथिंग’ । 1 मई 2007 को प्रकाशित यह किताब अपने प्रकाशन के एक सप्ताह के भीतर ही अमेज़न डॉट कॉम की बेस्ट सेलर सूची में तीसरी पायदान पर पहुंच गई। 13 अप्रेल 1949 को इंग्लैण्ड में जन्मे और अब अमरीकी नागरिक क्रिस्टोफ़र एरिक हिचेन्स की छवि मूर्ति भंजक, नास्तिक और कर्मकाण्ड विरोधी की रही है। मदर टेरेसा तक को कट्टर, रूढिवादी और फ़्रॉड कहकर वे अपने मिजाज़ का परिचय पहले ही दे चुके हैं। इस किताब में तो उन्होंने किसी भी धर्म गुरू को नहीं बख्शा है, चाहे वह दलाई लामा हो या रेवरेण्ड मार्टिन लूथर किंग जूनियर! यहां तक कि महात्मा गान्धी भी उनके प्रहारों से नहीं बच पाये हैं। बस एक अपवाद हैं सेण्ट फ़्रांसिस।
इस किताब का उप शीर्षक (हाऊ रिलीजन पॉइज़न्स एवरीथिंग) इसकी मूल स्थापना को उजागर करने के लिए काफ़ी है। हिचेन्स मानते हैं और अनेक उदाहरण देकर स्थापित करते हैं कि धर्म सब कुछ को जहरीला बनाता है, और दुनिया धर्म के बगैर ज़्यादा बेहतर हो सकती है। हिचेन्स के अनुसार धर्म हिंसक, अतार्किक, असहिष्णु, नस्लवाद, कबीलावाद और धर्मान्धता से जुडा, अज्ञान में आकण्ठ डूबा, मुक्त चिंतन के प्रति आक्रामक, स्त्री विरोधी और बाल-पीडक है। जैसे इतना ही काफ़ी न हो, वे धर्म को मानवीकृत, हत्यारा, भय से उपजा और भय के ही निर्मम दबाव के कारण टिका हुआ बताते हैं। द गॉड डेल्यूज़न के लेखक डॉकिन्स के स्वर में स्वर मिलाकर वे भी धर्म शिक्षा को बाल अपचार की श्रेणी में शुमार करते हैं। हिचेन्स धार्मिक आस्था को खतरनाक यौनिक दमन का परिणाम भी मानते हैं, कारण भी। इन सब कारणों से वे बहुत ज़ोर देकर कहते हैं कि धर्म को हटाइए और जिज्ञासा वृत्ति, मुक्त मन और विचारों की खोज को सम्मान दीजिए।
हिचेन्स यह भी स्थापित करते हैं कि धर्म की जडें केवल और केवल इच्छा पूर्ति में है। इसी आधार पर वे धर्म को मानव-निर्मित बताते हुए कहते हैं कि एक नैतिक जीवन धर्म के बगैर भी/ही जिया जा सकता है। हिचेन्स बर्ट्रेण्ड रसेल की किताब व्हाई आई एम नॉट ए क्रिश्चियन की चिन्तन परम्परा को आगे बढाते हुए विज्ञान एवम तर्क पर आधारित धर्म निरपेक्ष जीवन की वक़ालत करते हैं। हिचेन्स जब तर्क की बात करते हैं और समकालीन यौनिकता तथा यौनिक दमन को प्राचीन धार्मिक विश्वासों से जोडकर विश्लेषित करते हैं तो प्रभावित करते हैं। जब वे विभिन्न युद्धों और तानाशाही निज़ामों में धर्म की संलग्नता के ब्यौरे देते हैं तो उनकी बात में दम लगता है। लेकिन जब वे धर्म की एक अति सरलीकृत छवि बनाते हैं और फ़िर उस पर पिल पडते हैं तो बावज़ूद उनकी तेज़ाबी भाषा और दिलचस्प अन्दाज़े बयां के, हमारी असहमतियां उभरने लगती हैं। तब लगता है कि एक समीक्षक ने यह कहकर कोई ज़्यादती नहीं की है कि हिचेन्स अपने विषय से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं।
गडबड यह हुई है कि हिचेन्स ने धर्म को पूरी तरह सरलीकृत कर डाला है। उनके लिए धर्म और कर्मकाण्ड जैसे एक ही हैं। अगर धर्म वाकई वह है जो हिचेन्स बता रहे हैं तो तो निश्चय ही उसका न होना बेहतर है। दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो यह मानते हैं कि धर्म का अर्थ ऐसे ईश्वर में अन्ध श्रद्धा है जो प्रार्थना करने पर वरदान या शाप दे देता है। ऐसे बेपढे, रूढिवादी लोग ही विज्ञान और तर्क को शैतान के पंजे मानते हैं। सवाल यह है कि क्या धर्म को इस तरह परिभाषित करना उचित और तर्क संगत है? क्या कर्म काण्ड और शाप-वरदान से आगे धर्म है ही नहीं? हिचेन्स शायद यही कहना चाहते है। और यहीं हमें उनसे असहमत होना पडता है।
मुझे इस किताब की सबसे बडी ताकत भी इसी बात में लगती है कि यह अपने पाठक में गहरी असहमति जगाती है। न केवल असहमति, गहरी प्रश्नाकुलता भी। इससे बडी सार्थकता किसी किताब की और हो भी क्या सकती है! किसी किताब या किसी विचारक से यह उम्मीद करना कि उसके पास आपके सारे सवालों के जवाब होंगे निराश होने की दिशा में अग्रसर होना है। दुनिया के किसी भी विचारक और किसी भी किताब ने यह नहीं किया है। लेकिन हर उम्दा किताब, हर सुलझा विचारक आपके ठहरे हुए सोच में हलचल पैदा करने का महत्वपूर्ण काम करता है। इस किताब ने भी यही किया है।
About an interesting book
वर्ल्ड ऑफ़ बुक्स
हम यह नहीं जानते कि हम कुछ नहीं जानते
डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
पिछले कुछ सालों से नसीम निकोलस तालेब यह अध्ययन कर रहे हैं कि कैसे हम खुद को यह समझाकर भरमाते हैं कि हम बहुत कुछ जानते हैं, जबकि वास्तव में हम बहुत ही कम जानते हैं। यह भी कि हम अपने सोच को अप्रासंगिक और अतार्किक तक सीमित रखते हैं जबकि बडी घटनाएं हमें चकित करती और हमारी दुनिया को अपने सांचे में ढालती रहती हैं। अपने इसी अध्ययन को तालेब ने प्रस्तुत किया है अपनी 400 पेज की नई किताब ‘द ब्लैक स्वान : द इम्पैक्ट ऑफ़ हाइली इम्प्रोबेबल’ (प्रकाशन: 17 अप्रेल, 2007) में। यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैसाचुएट्स के प्रोफ़ेसर, आंशिक साहित्यिक निबंधकार, आंशिक गणितीय व्यापारी आदि-आदि तालेब ने इस किताब में अपनी पहली और चर्चित किताब जो 19 भाषाओं में छप चुकी है, ‘फ़ूल्ड बाय रेण्डमनेस’ के तर्कों को ही आगे बढाया है। इस किताब में तालेब ने दो टूक शब्दों में कहा है कि हम कुछ नहीं के बारे में सब कुछ जानने की गलतफ़हमी के शिकार हैं। लेकिन पहले यह तो बता दूं कि यह ब्लैक स्वान –काली बत्तख- क्या है?
तालेब कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया की खोज के पहले सारी दुनिया में यह माना जाता था कि बत्तख केवल सफ़ेद ही होती है। यह एक तरह का वैज्ञानिक सत्य था,और इस सत्य के मूल में था लोगों का आत्मानुभव। 1697 में जब कुछ पक्षी विशेषज्ञों ने ऑस्ट्रेलिया में काली बत्तख देखी तो अब तक के वैज्ञानिक सच को चुनौती मिली। अपने देखे और अपने अनुभव से अर्जित निष्कर्ष की सीमा और हमारे ज्ञान का कच्चापन सामने आया। एक काली बत्तख ने प्रकट होकर लाखों सफ़ेद बत्तखों के दर्शन से अर्जित ज्ञान को धराशायी कर दिया। इसीलिए तालेब कहते हैं , “आपके ज्ञान को चुनौती देने के लिए एक बदसूरत काली बत्तख काफ़ी है।“ इसी बात को वे और आगे बढाते हैं। उनके अनुसार, काली बत्तख (कृपया इसे शब्दश: न लें। यह तो एक प्रतीक है!) का प्रकट होना एक बाह्य परिघटना है क्यों कि यह हमारी नियमित अपेक्षाओं के बाहर घटित होती है, दूसरे इसका गहरा प्रभाव होता है, और तीसरे इस परिघटना के बाह्य होने के बावज़ूद मानवीय प्रकृति इसके प्रकटीकरण के लिए तर्क और व्याख्याएं गढकर यह विश्वास दिलाना चाहती हैं कि इस तरह की घटनाएं व्याख्येय हैं और इनकी भविष्यवाणी सम्भव है।
तालेब कहते हैं कि इन चन्द काली बत्तखों के प्रकट होने को आप अपने पूरे जीवन के साथ जोडकर देख सकते हैं। तब आप समझेंगे कि अपने चतुर्दिक के बारे में हम कितने अज्ञानी हैं और आने वाले कल के बारे में कुछ भी कह पाना कितना नामुमकिन है! हिटलर के उत्थान और विश्व युद्ध के बारे में सोचा था किसी ने? सोवियत संघ के पतन की कल्पना किसी ने की थी? इस्लामी फ़ण्डामेण्टलिज़्म की पदचाप किसको सुनाई दी थी? इण्टरनेट का तेज़ी से प्रसार, 1987 में शेयर बाज़ार का औंधे मुंह गिरना और फ़िर अचानक उठना, अनेक महामारियां, नए फ़ैशन, नए विचार, नए कलारूप, नई शैलियां, किसी किताब का बेस्टसेलर बन जाना, किसी व्यापारी का करोडपति-अरबपति बन जाना- बकौल तालेब ये सब काली बत्तखें ही तो हैं!
यद्यपि भविष्यवाणी की न्यूनतम सम्भाव्यता और उनके गहनतम प्रभावों का मेल काली बत्तखों को महत्वपूर्ण बनाता है, किताब के केन्द्र में यह बात नहीं है। तालेब अफ़सोस के साथ कहते हैं कि लगभग सारे ही समाज विज्ञानी इस मिथ्या विश्वास में जीते हैं कि उनके औज़ार अनिश्चितता की पैमाइश कर सकते हैं, और यही विश्वास घातक सिद्ध होता है। तालेब कहते हैं कि खुद उन्होंने वित्त और अर्थशास्त्र की दुनिया में ऐसा होते देखा है। सामाजिक मामलों तो होता ही है। दुनियाभर के व्यवसायी और सरकारें भविष्यवाणी पर अन्धाधुंध खर्च करते हैं। तालेब इसे फ़िज़ूलखर्ची करार देते हैं।
किताब का केन्द्रीय ताना-बाना जीवन में आकस्मिकता के प्रति सम्मान के अभाव के इर्द गिर्द बुना गया है। तालेब को अफ़सोस है कि हम पेनी को देखते हैं, डॉलर को अनदेखा करते हैं, जीवन की छोटी घटनाओं पर हम नज़र केन्द्रित करते हैं, बडी और महत्वपूर्ण घटनाओं को अनदेखा कर जाते हैं। यही कारण है कि हम अखबार पढ-पढकर और ज़्यादा अज्ञानी होते जाते हैं। तालेब साफ़ करते हैं कि हमारा जीवन कुछ महत्वपूर्ण आकस्मिक घटनाओं की मिली-जुली परिणति है। वे सलाह देते हैं कि हम अपने अस्तित्व पर नज़र डालें। यह सोचें-देखें कि हमारे पैदा होने के बाद हमारे अपने जीवन में और उसके इर्द-गिर्द क्या-क्या महत्वपूर्ण घटित हुआ। इसके बाद यह सोचें कि इनमें से कितनी बातों की हमने कल्पना की थी, कितनी बातें हमारी योजना के अनुरूप हुई हैं! हमारी नौकरी, अपने जीवन साथी से मुलाक़ात, अपनों का विश्वासघात, अचानक आई अमीरी या गरीबी – ये सब कितने प्रत्याशित थे? 11 सितम्बर 2001 का आतंकवादी काण्ड या दिसम्बर 2004 का सुनामी प्रलय – अगर इनका पूर्वानुमान होता तो क्या इन्हें रोक न लिया गया होता!
तालेब विश्लेषकों की काबिलियत को यह कह कर खारिज़ करते हैं कि वे आम लोगों से अधिक नहीं जानते। फ़र्क़ केवल इतना है कि उनका अन्दाज़े-बयां प्रभावशाली होता है और भारी भरकम शब्दावली तथा आंकडों के मायाजाल से वे हमें भरमा पाने में कामयाब होते हैं। तालेब की यह किताब दुनिया को देखने का हमारा नज़रिया बदलने की कोशिश करती है। यह हमें समझाती है कि जिसे हम जानते हैं उससे अधिक महत्वपूर्ण वह है जिसे हम नहीं जानते, और इसीलिए हमें अनजाने के प्रति अधिक ग्रहणशील और सहिष्णु होना चाहिये।
तालेब कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया की खोज के पहले सारी दुनिया में यह माना जाता था कि बत्तख केवल सफ़ेद ही होती है। यह एक तरह का वैज्ञानिक सत्य था,और इस सत्य के मूल में था लोगों का आत्मानुभव। 1697 में जब कुछ पक्षी विशेषज्ञों ने ऑस्ट्रेलिया में काली बत्तख देखी तो अब तक के वैज्ञानिक सच को चुनौती मिली। अपने देखे और अपने अनुभव से अर्जित निष्कर्ष की सीमा और हमारे ज्ञान का कच्चापन सामने आया। एक काली बत्तख ने प्रकट होकर लाखों सफ़ेद बत्तखों के दर्शन से अर्जित ज्ञान को धराशायी कर दिया। इसीलिए तालेब कहते हैं , “आपके ज्ञान को चुनौती देने के लिए एक बदसूरत काली बत्तख काफ़ी है।“ इसी बात को वे और आगे बढाते हैं। उनके अनुसार, काली बत्तख (कृपया इसे शब्दश: न लें। यह तो एक प्रतीक है!) का प्रकट होना एक बाह्य परिघटना है क्यों कि यह हमारी नियमित अपेक्षाओं के बाहर घटित होती है, दूसरे इसका गहरा प्रभाव होता है, और तीसरे इस परिघटना के बाह्य होने के बावज़ूद मानवीय प्रकृति इसके प्रकटीकरण के लिए तर्क और व्याख्याएं गढकर यह विश्वास दिलाना चाहती हैं कि इस तरह की घटनाएं व्याख्येय हैं और इनकी भविष्यवाणी सम्भव है।
तालेब कहते हैं कि इन चन्द काली बत्तखों के प्रकट होने को आप अपने पूरे जीवन के साथ जोडकर देख सकते हैं। तब आप समझेंगे कि अपने चतुर्दिक के बारे में हम कितने अज्ञानी हैं और आने वाले कल के बारे में कुछ भी कह पाना कितना नामुमकिन है! हिटलर के उत्थान और विश्व युद्ध के बारे में सोचा था किसी ने? सोवियत संघ के पतन की कल्पना किसी ने की थी? इस्लामी फ़ण्डामेण्टलिज़्म की पदचाप किसको सुनाई दी थी? इण्टरनेट का तेज़ी से प्रसार, 1987 में शेयर बाज़ार का औंधे मुंह गिरना और फ़िर अचानक उठना, अनेक महामारियां, नए फ़ैशन, नए विचार, नए कलारूप, नई शैलियां, किसी किताब का बेस्टसेलर बन जाना, किसी व्यापारी का करोडपति-अरबपति बन जाना- बकौल तालेब ये सब काली बत्तखें ही तो हैं!
यद्यपि भविष्यवाणी की न्यूनतम सम्भाव्यता और उनके गहनतम प्रभावों का मेल काली बत्तखों को महत्वपूर्ण बनाता है, किताब के केन्द्र में यह बात नहीं है। तालेब अफ़सोस के साथ कहते हैं कि लगभग सारे ही समाज विज्ञानी इस मिथ्या विश्वास में जीते हैं कि उनके औज़ार अनिश्चितता की पैमाइश कर सकते हैं, और यही विश्वास घातक सिद्ध होता है। तालेब कहते हैं कि खुद उन्होंने वित्त और अर्थशास्त्र की दुनिया में ऐसा होते देखा है। सामाजिक मामलों तो होता ही है। दुनियाभर के व्यवसायी और सरकारें भविष्यवाणी पर अन्धाधुंध खर्च करते हैं। तालेब इसे फ़िज़ूलखर्ची करार देते हैं।
किताब का केन्द्रीय ताना-बाना जीवन में आकस्मिकता के प्रति सम्मान के अभाव के इर्द गिर्द बुना गया है। तालेब को अफ़सोस है कि हम पेनी को देखते हैं, डॉलर को अनदेखा करते हैं, जीवन की छोटी घटनाओं पर हम नज़र केन्द्रित करते हैं, बडी और महत्वपूर्ण घटनाओं को अनदेखा कर जाते हैं। यही कारण है कि हम अखबार पढ-पढकर और ज़्यादा अज्ञानी होते जाते हैं। तालेब साफ़ करते हैं कि हमारा जीवन कुछ महत्वपूर्ण आकस्मिक घटनाओं की मिली-जुली परिणति है। वे सलाह देते हैं कि हम अपने अस्तित्व पर नज़र डालें। यह सोचें-देखें कि हमारे पैदा होने के बाद हमारे अपने जीवन में और उसके इर्द-गिर्द क्या-क्या महत्वपूर्ण घटित हुआ। इसके बाद यह सोचें कि इनमें से कितनी बातों की हमने कल्पना की थी, कितनी बातें हमारी योजना के अनुरूप हुई हैं! हमारी नौकरी, अपने जीवन साथी से मुलाक़ात, अपनों का विश्वासघात, अचानक आई अमीरी या गरीबी – ये सब कितने प्रत्याशित थे? 11 सितम्बर 2001 का आतंकवादी काण्ड या दिसम्बर 2004 का सुनामी प्रलय – अगर इनका पूर्वानुमान होता तो क्या इन्हें रोक न लिया गया होता!
तालेब विश्लेषकों की काबिलियत को यह कह कर खारिज़ करते हैं कि वे आम लोगों से अधिक नहीं जानते। फ़र्क़ केवल इतना है कि उनका अन्दाज़े-बयां प्रभावशाली होता है और भारी भरकम शब्दावली तथा आंकडों के मायाजाल से वे हमें भरमा पाने में कामयाब होते हैं। तालेब की यह किताब दुनिया को देखने का हमारा नज़रिया बदलने की कोशिश करती है। यह हमें समझाती है कि जिसे हम जानते हैं उससे अधिक महत्वपूर्ण वह है जिसे हम नहीं जानते, और इसीलिए हमें अनजाने के प्रति अधिक ग्रहणशील और सहिष्णु होना चाहिये।
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