Tuesday, August 11, 2009

अब वह सपने भी हिंदी में देखने लगी है


पुरस्कृत संस्मरण पुस्तक द रेड डेविल: टू हेल विथ कैंसर – एण्ड बैक की लेखिका कैथरीन रसेल रिच जो न्यूयॉर्क टाइम्स मैगज़ीन, वाशिगटन पोस्ट, नेशनल पब्लिक रेडियो और सलोन डॉट कॉम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के लिए लिखती रही हैं, की नवीनतम पुस्तक ड्रीमिंग इन हिंदी का सम्बन्ध हमारे अपने देश और अपनी भाषा से है.

कैथरीन लिखती हैं, “मुझे कैंसर था और यह भीतर ही भीतर मेरी हड्डियों को नष्ट कर रहा था. एक रात मैंने सपना देखा कि मैं एक छोटे-से कपड़े के लिए एक औरत से जूझ रही हूं. कपड़ा मुलायम और नीला है. वह औरत उसे मुझसे छीन लेना चह रही है. मैं चिल्लाती हूं, ‘यह तो मेरा है, मैंने ही तो इसे बुना है.’ वह औरत थोड़ी शांत होती है और कहती है, ‘हो सकता है तुमने इसे बनाया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम इसे अपने पास रख भी सकती हो.’ बाद में मेरी एक दोस्त मुझे समझाती है कि यह कपड़ा मेरी ज़िन्दगी का प्रतीक था.” तो, इस तरह अपनी ज़िन्दगी के लिए जूझ रही और इसी दौरान अपने प्यार में भी असफल हो चुकी कैथरीन अनायास ही सम्पर्क में आती है न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की हिंदी प्रोफेसर, मूलत: अल्जीरिया की गैब्रियाला इलियेवा के. गैब्रियाला जब कैथरीन को हिंदी भाषा की विशेषताओं से परिचित कराती है तो वह इसकी काव्यात्मकता पर मुग्ध हो उठती है. कैथरीन कहती हैं, “इन हिंदी, यू ड्रिंक अ सिगरेट, नाइट स्प्रेड्स, यू ईट ए बीटिंग. यू ईट द सन.” और वह भारत जाकर एक साल हिंदी सीखने का फैसला कर लेती है, बावज़ूद इस बात के कि ऐसा करने के लिए कोई खास योग्यता उसके पास नहीं थी. लेकिन वह जैसे अपने कष्टपूर्ण रोग से दूर भागना चाहती थी.

जब कैथरीन अपनी कैंसर चिकित्सक को यह बताती है कि वह एक बरस के लिए भारत जा रही है तो एक बारगी तो वह भी चौंक पड़ती है. कैथरीन की दशा कोई खास अच्छी नहीं है और डॉक्टर लोग भी उसका निश्चित इलाज़ करने की बजाय प्रयोग ही कर रहे हैं, क्योंकि वे और कुछ कर पाने में समर्थ नहीं हैं. कैथरीन की स्थिति वाला शायद ही कोई मरीज़ अपने देश से दूर गया हो, लेकिन डॉक्टर और रोगी के बीच एक गहरी आत्मीय समझ विकसित हो चुकी है. कैथरीन कहती हैं, “उन्होंने मुझे इतने बरसों ज़िन्दा रखा है. अब भला वे मुझे अपनी ज़िन्दगी को जीने से कैसे रोक सकती हैं?”

और कैथरीन भारत आने को तैयार हो जाती हैं. सप्ताह में बीस घण्टे का उच्चारण, व्याकरण और फिल्म चर्चा का कार्यक्रम, और हिंदी भाषी परिवारों के साथ सहजीवन का अनुभव. कैथरीन उदयपुर आती हैं और हिंदी भाषी लोगों व परिवारों के साथ रहकर हिंदी और भारतीय जीवन पद्धति सीखती हैं.

कैथरीन एक जगह लिखती हैं, “मेरे पास अपनी ज़िन्दगी को बयान करने वाली भाषा नहीं थी. इसलिए मैंने कोई दूसरी भाषा उधार लेने का फैसला किया.” और यह करते हुए वे खुद भी बदलती गईं. कहा जाता है कि जब आप किसी पराई भाषा को अपनाते हैं तो आप खुद भी थोड़े बदल जाते हैं. कैथरीन को भी ऐसा ही लगा. उन्होंने नोट किया कि हिंदी में यह कह पाना कठिन है कि यह चीज़ मेरी है, और इस तरह उनसे अपने पराये का भाव छूटा, हिंदी में मैं की बजाय हम कहना अधिक प्रचलित है, तो कैथरीन को लगा कि जैसे वे सबसे जुड़ती जा रही हैं. इस बीच कुछेक दुर्घटनाएं भी हुईं. जैसे, कैथरीन जिस जैन परिवार के साथ रह रही थीं, उनको कैथरीन की वैवाहिक स्थिति को लेकर कुछ गलतफहमी हुई, और कैथरीन को उन लोगों का घर छोड़ना पड़ा. लेकिन इस तरह उन्होंने एक इतर भाषा को सीखते हुए उसकी संस्कृति को भी आत्मसात किया. धीरे-धीरे वे इस भाषा में इतनी निष्णात हो गईं कि न केवल हिंदी में मज़ाक करने लगीं, उन्हें सपने भी हिंदी में ही आने लगे.

कैथरीन की यह संस्मरणात्मक किताब हमें एक अलग तरह की भारत की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाती है. एक अनुभवी पत्रकार, संपादक और लेखक होने के नाते वे अपनी इस किताब को केवल अपने वर्णनों तक ही सीमित नहीं रखतीं, बल्कि यथास्थान भाषाविदों और न्यूरोलॉजिस्ट्स के साक्षात्कारों से इसे प्रामाणिक भी बनाती हैं. हमारी भाषा और संस्कृति दूसरों को कैसी दिखाई देती है, अगर यह जानने की इच्छा हो तो इस किताब को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए.


Discussed book:
Dreaming in Hindi
By Katherine Russell Rich
Published by Houghton Mifflin Co
Hardcover, 384 pages
US $ 26.00

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 09 अगस्त, 2009 को प्रकाशित.








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Sunday, July 26, 2009

आने वाला समय मुफ़्त का है


2006 की बेस्ट सेलर द लोंग टैल के लेखक, वायर्ड पत्रिका के सम्पादक क्रिस एंडरसन की स्थापना है कि हमारी अर्थव्यवस्था की नियति है मुफ़्त, यानि फ्री. अपनी सद्य प्रकाशित किताब फ्री: द फ्यूचर ऑफ अ रेडिकल प्राइस के शुरू में ही वे लिखते हैं कि देर-सबेर हर कंपनी को किसी न किसी तरह यह देखना पड़ेगा कि वह अपने व्यापार के विस्तार के लिए फ्री का प्रयोग कैसे करे, या कैसे फ्री से प्रतिस्पर्धा करे. यह बात वे मुख्यत: डिजिटल अर्थव्यवस्था के सन्दर्भ में करते हैं, लेकिन समझा जा सकता है कि अंतत: इससे शेष अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुए बग़ैर नहीं रहने वाली है.

डिजिटल दुनिया में आज बहुत कुछ मुफ़्त में उपलब्ध है. आप मुफ्त में अपना ई मेल खाता बनाते हैं, आप मुफ्त में फेस बुक, यू ट्यूब वगैरह का इस्तेमाल करते हैं. टेलीविज़न तो आप बहुत पहले से मुफ्त में देख ही रहे थे. एंडरसन इसे इस तरह समझाते हैं. वे कहते हैं कि तकनीक निरंतर सस्ती होती जा रही है. 1961 में जहां एक ट्रांज़िस्टर की कीमत दस डॉलर थी, आज इंटेल आपको दो बिलियन ट्रांज़िस्टर सिर्फ़ 1100 डॉलर में दे रहा है, यानि एक ट्रांज़िस्टर का मूल्य आज घट कर सिर्फ .000055 सेंट रह गया है. इसी तरह आज एक घण्टे का वीडियो कार्यक्रम एक व्यक्ति तक पहुंचाने का खर्च मात्र 0.25 डॉलर है और अगले साल तक यह घट कर 0.15 डॉलर ही रह जायेगा. कीमतों के घटने की परिणति मांग के बहुत ज़्यादा बढने में होती है और इस मुफ्त से अभाव की जगह इफरात का दौर शुरू होता है. लेकिन, यहीं से एंडरसन एक खास बात कहते हैं. वे कहते हैं कि उपभोक्ता के लिहाज़ से सस्ते और मुफ्त में बड़ा फर्क़ है. बहुत सारे उदाहरणों से वे साफ करते हैं कि कोई चीज़ चाहे कितनी ही सस्ती क्यों ना हो, वह उतने लोगों को आकृष्ट नहीं करती जितनी कोई मुफ्त चीज़ करती है. क्यों?

एंडरसन समझाते हैं कि हम सब मानसिक रूप से आलसी हैं और यही बात मुफ्त को प्रोत्साहित करती है. जब आपको किसी वस्तु का मूल्य चुकाना होता है, चाहे वह एक पैसा ही क्यों ना हो, आप सोचते हैं कि कहीं यह क़ीमत अधिक तो नहीं है. जब कोई चीज़ मुफ्त में मिलती है तो आपके दिमाग को सोचने की यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती और आप तुरंत उस चीज़ को ले लेने के लिए तैयार हो जाते हैं. दो प्रख्यात चाकलेटों के उदाहरण से वे इस बात को पुष्ट करते हैं. जब किसेज़ नाम की चॉकलेट 1 सेंट और ट्रफल्स नाम की चॉकलेट 15 सेंट में दी गई तो 75 प्रतिशत लोगों ने ट्रफल्स को चुना. इसके बाद एक और प्रयोग किया गया. दोनों की कीमत एक सेंट घटा दी गई. यानि किसेज़ मुफ्त में और ट्रफल्स 14 सेंट में दी गई. परिणाम चौंकाने वाले थे. 69 प्रतिशत ने किसेज़ को चुना. अब देखिए, कीमत का फर्क़ तो सिर्फ एक सेंट था, लेकिन पसंद बदल गई.

एंडरसन कहते हैं कि सारी दुनिया में पीढिगत दृष्टि से मूल्य को लेकर एक बड़ा परिवर्तन आ रहा है. 30 साल से कम उम्र के लोग अब सूचना के लिए कुछ भी खर्च नहीं करना चाहते, क्योंकि वे जानते हैं कि यह कहीं न कहीं तो मुफ़्त में मिल ही जायेगी. विचारों से निर्मित उत्पाद प्राय: मुफ्त उपलब्ध होने लगे हैं. मज़े की बात यह है कि यह मुफ़्त भी चिंताजनक नहीं है. चीन में जितने संगीत का उपभोग होता है, उसका 95% पाइरेसी से होता है. लेकिन कलाकार फिर भी खुश हैं. उन्हें प्रचार मिलता है और इससे उनके कंसर्ट और दूसरी आय में इज़ाफा होता है.

एंडरसन अपनी इस चर्चा को पत्रकारिता की दुनिया तक भी ले जाते हैं और भविष्यवाणी करते हैं बहुत जल्दी पत्रकारिता एक व्यवसाय के साथ-साथ शौक़ भी बन जाने वाली है. लोग आजीविका के लिए पत्रकारिता पर निर्भर नहीं रह पायेंगे. पत्रकारों को पेट भरने के लिए पढ़ाने या दूसरों से बेहतर लिखवाने के काम में लगना पड़ेगा. हम देख ही रहे हैं कि आज ब्लॉग़्ज़ के प्रचलन के साथ शौकिया पत्रकार व्यावसायिक पत्रकारों को कड़ी टक्कर देने लगे हैं और प्रकाशन की दुनिया पर भी भी पेशेवर लोगों का एकाधिकार नहीं रह गया है. पत्रकारों और प्रकाशकों के लिए चुनौतियां बढती जा रही है. लेकिन एंडरसन इसे पत्रकारों के लिए बुरा नहीं बताते. वे इसे उनकी मुक्ति का नाम देते हैं.

एंडरसन ने अपनी किताब का ढांचा कुल चार स्थापनाओं पर खड़ा किया है: तकनीकी(डिजिटल संरचना प्रभावी रूप से मुफ्त में उपलब्ध है), मनोवैज्ञानिक(हर उपभोक्ता मुफ्त में पाना पसंद करता है), प्रक्रियात्मक(मुफ्त के लिए आपके दिमाग को कोई तक़लीफ नहीं करनी पड़ती) और व्यावसायिक(मुफ्त की तकनीक और मनोवैज्ञानिक मुफ्त की परिणति भरपूर मुनाफे में होती है).

और अंत में यह और बताता चलूं कि एंडरसन की यह किताब इंटरनेट पर मुफ्त में पढ़ी जा सकती है.

Discussed book:
Free: The Future of a Radical Price
By Chris Anderson
Published by: Hyperion
288 pages, Hardcover
US $ 26.99

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 26 जुलाई, 2009 को प्रकाशित.








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Sunday, July 12, 2009

ईश्वर का विकास




इधर कुछ वर्षों में ईश्वर विषयक अनेक पुस्तकें आई हैं. नास्तिक लेखकों जैसे सेम हैरिस, रिचार्ड डॉकिंस, क्रिस्टोफर हिचेंस ने लगभग बेबाक शब्दों में कहा है कि अगर आप ईश्वर के प्रति अनास्थावान नहीं हैं तो आप नशेड़ी हैं. हैरिस ने तो अपने एथीस्ट मेनिफेस्टो (प्रथम प्रकाशन 2005) में साफ कहा है कि “धार्मिक मध्यमार्गियों का यह कहना कि कोई विवेकवान इंसान सिर्फ इसलिए ईश्वर में भरोसा कर सकता है कि यह भरोसा उसे सुख प्रदान करता है, बेहूदा है.” इसी क्रम में हाल ही में आई मार्क्सवादी चिंतक टेरी ईगलटन की नई किताब रीज़न, फेथ, एण्ड रिवोल्यूशन: रिफलेक्शंस ऑन द गॉड डिबेट भी बहुत चर्चा में है. लेकिन आज हम एक और किताब की चर्चा कर रहे हैं. रॉबर्ट राइट अपनी ताज़ा किताब द इवोल्यूशन ऑफ गॉड में इस बहस में नहीं उलझते है कि ईश्वर है या नहीं है. हालांकि वे ईश्वर का होना सिद्ध करने के लिए उसकी तुलना वैज्ञानिकों की दुनिया के इलेक्ट्रॉन से करते हैं और कहते हैं कि इलेक्ट्रॉन को भी तो हममें से किसी ने नहीं देखा है, लेकिन दुनिया पर पड़ने वाले उसके प्रभावों के कारण उसके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं. यही बात ईश्वर के बारे में भी है. ईश्वर के प्रभावों के रूप में वे सत्य और प्रेम का नाम लेते हैं. राइट मूलत: एक पत्रकार हैं और विकासवादी मनोविज्ञान के विशेषज्ञ हैं. उनकी पिछली किताब नॉनज़ीरो: द लॉजिक ऑफ ह्युमन डेस्टिनी बहु चर्चित रही है.

राइट इस किताब में हमें एक ऐतिहासिक यात्रा पर ले जाते हैं और यह बताते हैं कि ईश्वर की अवधारणा का विकास किस तरह हुआ है और उसमें समय के साथ क्या बदलाव आये हैं. राइट अपनी यह खोज यात्रा मानवीय विकास की यात्रा के समानांतर चलाते हैं. प्रारंभ के आखेट जीवी लोगों के लिए प्रकृति से भी बड़ी चीज़ थी आत्मा, कबीलाई ज़िन्दगी में बहुलदेव वाद आ गया और और उनके बहुत सारे देवता ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं पर नियंत्रण करने लगे. लेकिन, राइट बताते हैं कि इनमें से अधिकतर देवता सही जीवन के आदर्श नहीं हैं. ये सनकी और क्रूर भी हैं. कालांतर में इन देवताओं की जगह देवताओं की एक आधिपत्य पूर्ण व्यवस्था ने ले ली जिसमें एक सर्वशक्तिमान ईश्वर सबका प्रभारी होने लगा, और इसके बाद एक ऐसी व्यवस्था बनी जिसमें नगर-राज्यों में सिर्फ एक ईश्वर की उपासना होने लगी, बग़ैर यह स्वीकार किए कि वही एकमात्र ईश्वर है, हालांकि उसे अन्य ईश्वरों से बेहतर ज़रूर माना जाता था.

राइट बलपूर्वक कहते हैं कि तीन प्रमुख अब्राहमी धर्मों के धर्मग्रंथ वास्तविक व्यक्तियों के द्वारा लिखे गए हैं और उनका मक़सद था आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक सुधार करना. कालांतर में जैसे-जैसे समाजों का विकास होता गया, और वे अधिक जटिल और वैश्विक होते गये, ईश्वर की अवधारणा भी बदलती गई और समाजों की उससे अपेक्षा भी अधिक नैतिक होती गई. राइट इसी बात को आगे बढाते हुए ईश्वर और धर्म की अवधारणा को इसलिए पसंद करते हैं कि इनसे हमारी ज़िन्दगी का अनुकूलन होता है, हम अच्छे और बुरे में अंतर करते हैं और जीवन के सुख दुख को सम दृष्टि से देखना सीखते हैं.
किताब का बहुलांश एकेश्वरवादी सम्प्रदायों जैसे हिब्रू, इसाई बाइबिल और क़ुरान शरीफ के इर्द- गिर्द ही है. स्वाभाविक ही है कि राइट बाइबिल का विश्लेषण अधिक विस्तार से करते हैं. भारतीय सन्दर्भ में किताब की एक बड़ी सीमा यह नज़र आती है कि यह हिन्दु और बौद्ध धर्मों को स्पर्श ही नहीं करती. और यह भी कि हमारे यहां यह स्वीकार करना मुश्क़िल लगता है कि हम सब एक सहकारी किस्म के एकेश्वरवाद की तरफ अग्रसर हो रहे हैं. बौद्ध लोग जहां अपने धर्म में किसी देवी-देवता की ज़रूरत ही महसूस नहीं करते, वहीं हिन्दु 36 करोड़ देवी देवताओं को भी कम मानते हैं. लेकिन इस सबके बावज़ूद जब राइट यह उम्मीद करते हैं कि सब कुछ के बावज़ूद दुनिया के लोग शांति से रह सकते हैं, और इसके लिए वे अब तक के बदलावों को प्रमाण के तौर पर पेश करते हैं, तो उनसे असहमत होने का मन नहीं करता.

Discussed book:
Let’s Talk About God
By Robert Wright
Published by Little, Brown and Company
Hardcover, 576 pages
US $ 25.99

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 12 जुलाई 2009 को प्रकाशित.







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Monday, June 29, 2009

क्यों अच्छा लगता है कोई विचार?


अगर कभी आपके मन में भी यह सवाल उठा हो कि लोग क्यों और कैसे धर्म, सम्प्रदायों, विज्ञापनों, वगैरह के ग़ुलाम बन जाते हैं, तो यह किताब आपके लिए है. रिचर्ड ब्रोडी का कहना है कि यह सब दिमागी विषाणुओं (माइण्ड वाइरस) यानी मीम्स की वजह से होता है. जो लोग इस बात को समझते हैं वे इन्हें सफलतापूर्वक आपके दिमाग में घुसा देते हैं.
अपनी पिछली किताब, अंतर्राष्ट्रीय बेस्ट सेलर गेटिंग पास्ट ओ के के रचनाकार रिचर्ड ब्रोडी की एक और ख्याति यह है कि उन्हें माइक्रोसॉफ्ट वर्ड का मूल रचनाकार माना जाता है. इन्हीं रिचर्ड ब्रोडी की सद्य प्रकाशित किताब वाइरस ऑफ द माइण्ड: द न्यू साइंस ऑफ द मीम्स का सम्बन्ध विज्ञान की एक नई लेकिन विवादास्पद शाखा मीमेटिक्स से है. मीमेटिक्स असल में मनोविज्ञान, जीव विज्ञान, नृतत्वशास्त्र और संज्ञानात्मक विज्ञान की ऐसी शाखा है जो मानवीय समाज के अदृश्य किंतु यथार्थ डी एन ए का अध्ययन विश्लेषण करती है. रिचर्ड डॉकिंस, डगलस हॉफ्स्टेडटर, डैनियल डैनेट वगैरह ने विज्ञान की इस शाखा पर काफी काम किया है, लेकिन ब्रोडी इनके अध्ययन से आगे जाकर यह पड़ताल करते हैं कि इस विज्ञान का हमारी ज़िन्दगी पर क्या असर पडने वाला है. यह कुछ-कुछ उसी तरह का अध्ययन है कि आणविक भौतिकी का शीत युद्ध पर क्या प्रभाव पड़ा था? ब्रोडी का कहना है कि भले ही अणु बम ने दुनिया को बुरी तरह प्रभावित किया था, इन दिमागी विषाणुओं का असर भी उनसे कम नहीं होगा क्योंकि ये हमारी निजी ज़िन्दगी को ज़्यादा घातक तरह से प्रभावित करने वाले हैं.

यह समस्या कोई भावी समस्या नहीं है. इन विषाणुओं को फैलाने वाले अपने काम में दिन-ब-दिन अधिक सफल होते हा रहे हैं और जन संचार माध्यमों के हालिया विस्फोट और इंफर्मेशन हाइवे के विकास ने हमारी पृथ्वी को इन दिमागी विषाणुओं के पनपने की आदर्श जगह बना दिया है. ब्रोडी कहते हैं कि दिमागी विषाणु सरकारों, शिक्षा व्यवस्था और शहरों को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं और आज की अनेक समस्याएं जैसे यूथ गैंग, सरकारी स्कूलों के स्तर में गिरावट और बढती जा रही सरकारी लाल फीताशाही इसी वजह से है. सवाल यह है कि क्या मानवता एक दिमागी महामारी की तरफ बढ रही है? क्या चन्द लोग ही ऐसे होंगे जो इन विषाणुओं से अप्रभावित रहेंगे? रिचार्ड इन सब बातों पर पूरी तार्किकता से विचार करते हैं.
रिचार्ड बताते हैं कि किसी भी मानसिक विषाणु की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें कितनी संक्रमण क्षमता है, और विषाणु की इस क्षमता का उसकी उपादेयता या किसी अन्य मूल्य बोध से कोई लेना-देना नहीं होता. असल में तमाम मानसिक विषाणु मानव मस्तिष्क के एक अंतर्निर्मित तंत्र का इस्तेमाल करते हैं और इस तंत्र का सम्बन्ध होता है मनुष्य की चार मूल भावनाओं से: भय, लड़ाई, भोजन और साथी की तलाश. जो भी विषाणु इन या इनमें से किसी या किन्हीं भावनाओं के अनुकूल होता है वह ज़्यादा तेज़ी से संक्रमित होता है. समझा जा सकता है कि सारे धर्म, विज्ञान, कला, कानून, विधिक संस्थाएं, विज्ञापन, खतरे की आकांक्षाएं, अपराध और यौनाकांक्षा, यहां तक कि नारीवाद और पुरुषवाद- ये सब मानसिक विषाणु ही हैं. इस बात को और इस तरह समझें कि मनुष्य की आधारभूत रोटी, कपड़ा और मकान की ज़रूरत से आगे जो भी है वह मानसिक विषाणु ही है.

रिचार्ड एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह कहते हैं कि ये विषाणु लगातार प्रजनन करते और बढते रहते हैं, बगैर इस बात की परवाह किए कि उनसे मनुष्य को लाभ हो रहा है या हानि. यानि, मानसिक विषाणु सदा ही समूह के लिए काम करते हैं, व्यक्ति के लिए नहीं.

ब्रोडी की यह किताब एक दुधारी तलवार है. आप इसको पढकर अपने दिमाग को विषाणुओं से बचा सकते हैं, तो जिनका कोई स्वार्थ निहित है, वे इसी किताब को पढकर आपके दिमाग के लिए नए विषाणुओं के हमले की योजना भी बना सकते हैं.

Discussed book:
Virus of the Mind: The New Science of the Meme
By Richard Brodie
Publisher: Hay House
Hardcover, Pages 288
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत रविवार, 28 जून, 2009 को प्रकाशित.









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Sunday, June 14, 2009

गेब्रियल गार्सिया मार्ख़ेस की जीवनी


साहित्यानुरागियों के लिए गेब्रियल गार्सिया मार्ख़ेस (जन्म 1928) का नाम अनजाना नहीं है. बीसवीं शताब्दी के तीन महानतम उपन्यासों ‘वन हण्ड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’, ‘द ऑटम ऑफ पैट्रियार्क’ और ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा’ का यह रचियता अपने लातिन अमरीका के सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय रहा है और राष्ट्रपतियों तथा तानाशाहों से उनकी अंतरंगता, विशेष रूप से फिडेल कास्त्रो से उनकी निकटता, वाम राजनीति में उनकी सक्रिय भागीदारी और फिल्म निर्माण और उनकी पत्रकारिता पर भी निरंतर चर्चा होती रही है. मार्खेज़ को 1982 में साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है. अपने देश में तो मार्ख़ेस को एक सुपरस्टार का दर्ज़ा प्राप्त है ही, अमरीका जैसे उन देशों में भी उनको खूब पढ़ा और सराहा जाता है जिनकी आलोचना मार्ख़ेस के साहित्य में खूब है. उनको अपनी धरती का मार्क ट्वेन, देश का प्रतीक और राष्ट्रीय हास्य बोध का परिभाषक भी कहा जाता है. हिन्दी पाठकों ने जादुई यथार्थवाद के सन्दर्भ में भी उनको जाना है.
हाल ही में लातिन अमरीकी साहित्य के विशेषज्ञ, ब्रिटिश विद्वान गेराल्ड मार्टिन रचित इसी महान रचनाकार की जीवनी गेब्रियल गार्सिया मार्ख़ेस: अ लाइफ शीर्षक से प्रकाशित हुई है. इस जीवनी का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि जब 2006 में उनसे उनके अतीत के बारे में कुछ पूछा गया तो मार्ख़ेस ने कहा था कि इस तरह की बातों के लिए तो आपको मेरे ऑफिशियल जीवनीकार गेराल्ड मार्टिन से ही पूछना चाहिये. खुद मार्ख़ेस ने कभी कहा था कि हरेक शख़्स की तीन ज़िन्दगियां होती हैं: एक सार्वजनिक ज़िन्दगी, एक निजी ज़िन्दगी और एक गोपनीय ज़िन्दगी. अब यह तो पाठक ही तै करेंगे कि मार्टिन 17 वर्षों की शोध और लगभग 300 इण्टरव्यू करने के बाद अपने नायक मार्ख़ेस की इन तीनों ज़िन्दगियों की उलझनों को किस हद तक सुलझा पाये हैं. यह उलझन इसलिए और बढ़ जाती है कि खुद मार्ख़ेस ने 2001 में प्रकाशित अपनी संस्मरण कृति ‘लिविंग टू टेल द ट्रुथ’ में और अन्यत्र अपने बारे में काफी कुछ ऐसा लिखा-कहा है जिसे अर्ध सत्य या किंवदंती की श्रेणी में रखा जा सकता है. वैसे, यहां यह बता देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि मार्टिन मार्ख़ेस की ज़िन्दगी पर एक और वृहद किताब तैयार कर रहे हैं जिसके 2000 पृष्ट और 6000 पाद टिप्पणियां तो अभी तैयार हैं.

1965 में रचित और 1966 में प्रकाशित ‘वन हण्ड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड’ मार्ख़ेस का चौथा उपन्यास (और पांचवीं किताब) है. इससे पहले ‘लीफ स्टोर्म’ (1955), ‘नो वन राइट्स टू द कर्नल’ (1961) और ‘इन इविल आवर’ (1962) उनके परिचित साहित्यिक समुदाय के बाहर कम ही पढ़े गए और इनके अंग्रेज़ी अनुवाद भी सॉलिट्यूड की ख्याति के बाद ही हो पाये. वैसे, इस जीवनी से ज्ञात होता है कि मार्ख़ेस ने सॉलिट्यूड पर 1940 में ही काम करना शुरू कर दिया था. इसे मार्ख़ेस की साहित्यिक महानता के रूप में रेखांकित किया जाता है कि सॉलिट्यूड के आठ बरस बाद वे ‘द ऑटम ऑफ द पैट्रियार्क’ के रूप में एक और मास्टरपीस दे पाये. मर्टिन ने ठीक ही कहा है कि पैट्रियार्क एक लातिन अमरीकी किताब है, न कि कोलम्बिया के बारे में है. इस किताब में सत्ता विमर्श के प्रति मार्ख़ेस का ज़बर्दस्त रुझान साफ देखा जा सकता है. पैट्रियार्क के एक दशक बाद आया उनका तीसरा महान उपन्यास ‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा’. इन के अतिरिक्त भी मार्ख़ेस की कई किताबें प्रकाशित होती रही हैं.

खुद मार्ख़ेस का जीवन जैसा है, उसे देखते हुए यह उचित ही है कि जीवनीकार मार्टिन ने खुद को तथ्यों तक सीमित रखा है. मार्ख़ेस के बाल्यकाल के बारे में तो पहले भी काफी कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए मार्टिन के पास नया कुछ बताने का अधिक स्कोप नहीं था, लेकिन उन्होंने एक महत्वपूर्ण काम यह किया है कि उनके बाल्यकाल और शेष जीवन को उनके रचनाकर्म के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है. मार्ख़ेस का बचपन उनके नाना निकोलस मार्ख़ेस मेज़िया के सान्निध्य में बीता था, वे नौ वर्ष की उम्र तक अपने नाना के पास ही रहे. नाना एक समृद्ध जौहरी थे और उन्होंने कोलम्बिया के विख्यात विनाशक एक हज़ार दिनों तक चले गृह युद्ध में भाग लिया था और उन्हें कर्नल की उपाधि प्रदान की गई थी. मार्टिन उस काल को इस महान कथाकार के साहित्य में चिह्नित करते हैं. इस जीवनी से हमें ज्ञात होता है कि सॉलिट्यूड और जादुई यथार्थवाद की जड़ें मार्ख़ेस के अराकटाका में बीते बचपन की घटनाओं में हैं. उपन्यास का काल्पनिक कस्बा मकोण्डो वहीं निकट के एक केले के बगीचे वाली जगह का रूपांतरण है और उपन्यास का विख्यात नरसंहार 1928 के एक वास्तविक नरसंहार का पुनर्सृजन है. मार्ख़ेस के जादुई यथार्थवाद की जड़ें उनकी नानी ट्रैंक्वेलिना में बी देखी जा सकती हैं जो खुद एक अन्ध विश्वासी औरत थी और अपनी दिनचर्या आंधी तूफान, तितलियां, सपने, गुज़रती हुई शव यात्राओं जैसे वातावरणीय संकेतों के आधार पर संचालित करती थी. तो इस तरह मार्ख़ेस पर उनके नाना और नानी के परस्पर भिन्न व्यक्तित्वों की गहरी छाप पड़ी. मार्टिन ने मार्ख़ेस के उनके पिता से तनावपूर्ण रिश्तों, 13 वर्ष की अल्प वय में उनके वेश्या गमन, 9 साल की मर्सीडीज़ से उनके 10 बरस लम्बे प्रणय प्रसंग वगैरह का रोचक और रंगारंग वृत्तांत प्रस्तुत किया है. उनके जीवन में आने वाली कई स्त्रियों से भी वे हमें परिचित कराते हैं. मार्टिन यह भी बताते हैं कि उम्र के दूसरे दशक के उत्तरार्ध में जब मार्ख़ेस पेरिस में थे, वे स्पैनिश एक्ट्रेस टैकिया क़्विंटाना के प्रेम में पागल हो उठे थे. इस प्रणय प्रसंग को मार्टिन ने मार्ख़ेस की कृति ‘नो वन राइट्स टू द कर्नल’ में ढूंढ निकाला है. मार्टिन ने अपने नायक के पत्रकारिता जीवन का भी विस्तृत ब्यौरा दिया है.

बावज़ूद इस बात के कि मार्ख़ेस ने उन्हें अपना आधिकारिक जीवनीकार कहा है, मार्टिन मार्ख़ेस के जीवन की बहुत सारे कोनों को प्रकाशित नहीं भी कर पाये हैं. मसलन जब मार्टिन इस पेरिस वाले प्रेम प्रसंग के बारे में मार्ख़ेस से जानना चाहते हैं तो वे कुछ भी बताने से इंकार कर देते हैं. तब मार्टिन अपने स्तर पर उस 82 वर्षीय महिला को तलाशते हैं और उससे इण्टरव्यू करके सेक्स प्रेम, और तीनों तरह की ज़िन्दगियों के बारे में मार्ख़ेस के सोच को उभारने का प्रयास करते हैं. यह एक उदाहरण है. मार्टिन का प्रयास निश्चय ही अपने समय के इस बड़े कथाकार को समझने में सहायक सिद्ध होगा.
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Discussed book:
Gabriel Garcia Màrquez: A Life
By Gerald Martin
Alfred A. Knopf,
642 pages, Illustrated
US $ 37.50

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 14 जून, 2009 को प्रकाशित आलेख का असंक्षिप्त रूप.








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Sunday, May 31, 2009

धोखा-धड़ी की दुनिया के भीतर से


अगर आप इंटरनेट और ई मेल का इस्तेमाल करते हैं तो आपको कभी न कभी इस आशय का ई मेल ज़रूर मिला होगा कि दूर किसी देश में कोई बेहद अमीर बहुत बड़ी दौलत छोड़ कर मर गया है और उसकी बेवा आपकी सहायता से वह दौलत देश से बाहर भेजना चाहती है. निश्चय ही आपको इस सेवा का पर्याप्त मोल चुकाया जाएगा. इतनी बड़ी रकम की बात सुनकर अगर आप ललचा जाएं और बाद के पत्राचारों में अपने बैंक खाते का विवरण भेज दें तो आपका ठगा जाना पक्का होता है. इस तरह की धोखाधड़ी का केन्द्र है नाइजीरिया. वहीं की लेखिका अडाओबी ट्रिशिया न्वाउबानी ने अपने पहले उपन्यास आई डू नॉट कम टु यू बाय चांस में इसी धोखाधड़ी को केन्द्र में रखकर एक दिलचस्प कथा कही है.

अपने परिवार का बड़ा बेटा किंग्सले इबे केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर भी बेरोज़गार है. गरीब लेकिन आदर्शवादी मां-बाप ने बचपन से ही उसे सिखाया है कि शिक्षा से सारे बंद दरवाज़े खुल जाते हैं, लेकिन अब वह जानने लगा है कि दरवाज़े केवल शिक्षा से नहीं, जान-पहचान, जिसे नाइजीरिया में लोंग लेग कहा जाता है, से खुलते हैं. उसके बीमार पिता का निधन हो जाता है तो उसे अपने भाई बहनों की स्कूल की फीस तक चुकाना मुश्क़िल लगने लगता है. और जैसे इतना ही काफी न हो, उसकी खूबसूरत प्रेमिका ओला महंगी घड़ी और ब्राण्डेड चप्पलें दिला सकने वाले प्रेमी की खातिर उसे छोड़ देती है. मज़बूरन किंग्सले को अपने एक अंकल बोनीफेस की तरफ कर्ज़ के लिए हाथ पसारना पड़ता है. बहुत कम शिक्षित लेकिन खूब शान-ओ-शौकत से रहने वाले इस अंकल को कैश डैडी के नाम से जाना जाता है और यह उसी धोखा धड़ी का सफल संचालक है, जिसका मैंने प्रारम्भ में ज़िक्र किया और जिसे 419 के नाम से जाना जाता है. 419 असल में नाइजीरियाई कानून की वह धारा है जिसका सम्बन्ध धोखा-धड़ी से है. 419 को 420 का पर्याय माना जा सकता है.

परिवार की स्थिति बिगड़ती जाती है और किंग्सले कैश डैडी के जाल में गहरे फंसते जाता है. अपनी शिक्षा का इस्तेमाल करते हुए वह कैश डैडी के लिए भोले-भाले लोगों को मोहक ई मेल लिखना शुरू करता है. पहले तो उसे लगता है कि भला कौन इस तरह के ई मेल के झांसे में आयेगा, लेकिन जब उसके भेजे ई मेलों के जवाब आने लगते हैं तो उसकी अंतरात्मा उसे कचोटने लगती है कि वह भोले-भाले बेगुनाह लोगों को ठग रहा है. कैश डैडी उसे समझाता है कि अमरीका और यूरोप, जहां से ये जवाब आ रहे हैं, भला नाइजीरिया की तरह के मुल्क थोड़े ही हैं जहां अभाव और कष्ट हैं. उन समृद्ध मुल्कों में तो सरकार अपने नागरिकों के सारे दुख दर्द दूर करती ही रहती है. इसलिए किंग्सले को वहां के लोगों के कष्टों की चिंता नहीं करनी चाहिए. इस तरह अपराध बोध कम होने से वह धीरे-धीरे इस व्यवसाय में रमने लगता है और फिर तो आहिस्ता-आहिस्ता उसे भौतिक सुख-सुविधाएं रास आने लगती हैं. उसके भाई बहन भी उसकी इस नव अर्जित अमीरी का सुख भोगने लगते हैं. व्यवसाय में तरक्की करते-करते वह कैश डैडी का नम्बर दो ही बन जाता है.
उधर कैश डैडी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पालने लगता है और इसी क्रम में कुछ ऐसे ताकतवर लोगों को अपना शत्रु बना लेता है जो उसे नेस्तनाबूद करने पर उतारू हो जाते हैं तो कहानी एक नया मोड़ लेती है.

निश्चय ही इस कथा का नायक किंग्सले दूध का धुला नहीं है. लेकिन उन लोगों को क्या कहिए जो किंग्सले के शिकार इसलिए बनते हैं कि उन्हें बिना मेहनत किये अमीर होना है? याद आता है कि कई वर्ष पहले नाइजीरियाई दूतावास ने वाशिंगटन में एक बयान जारी किया था कि “419 जैसा कोई घोटाला न हो, अगर दुनिया में बिना बोये ही फसल काट लेने के इच्छुक सहज विश्वासी, लालची और अपराधी वृत्ति के लोग न हों.” नाइजीरिया के जन-जीवन और इस घोटाले की बारीकियों के चित्रण के लिहाज़ से उपन्यास खासा रोचक है.



Discussed book:
I Do Not Come To You By Chance
By Adaobi Tricia Nwaubani
Published by Hyperion
416 pages, Paperback
US $ 15.99

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 31 मई, 2009 को प्रकाशित.









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Monday, May 18, 2009

भारत: नई सुपरपॉवर


अपनी बहु-चर्चित किताब पोस्ट अमरीकन वर्ल्ड में फरीद ज़कारिया ने भविष्यवाणी की थी कि आने वाले वर्षों में अमरीका महाशक्ति नहीं रह जाएगा. और अब अपनी ताज़ा किताब इण्डिया एक्सप्रेस: द फ्यूचर ऑफ अ न्यू सुपरपॉवर में डेनियल लाक कह रहे हैं कि एशिया का अमरीका बनने की संभावनाएं भारत में हैं. कनाडा निवासी डेनियल लॉक लगभग दो दशक तक भारत और निकटवर्ती क्षेत्रों में बीबीसी के लिए काम कर चुके हैं और इस पूरे क्षेत्र से भली-भांति परिचित हैं. अपनी इस किताब में वे इतिहास, आंकड़ों, साक्षात्कारों और निजी अनुभवों के मेल से भारत की एक ऐसी उजली छवि रचते हैं जो काफी हद तक विश्वसनीय है. किताब की शुरुआत वे चेन्नई के एक कपड़े इस्तरी करने वाले राम नामक निम्न वर्गीय व्यक्ति के वृतांत से करते हैं जो अपने अमीर ग्राहकों से कर्ज़ा लेकर अपने बेटे को पढ़ाता है और इस तरह आर्थिक प्रगति की सीढियां चढता है. लाक इस इस्तरी वाले को समकालीन भारत के एक प्रतीक की तरह पेश करते हैं, जो पुरानी जंजीरों, जातिवाद और पिछड़ेपन से मुक्त हो कर अपने भविष्य का निर्माण कर रहा है.

डेनियल लाक मानते हैं कि आज़ादी के बाद से प्रजातंत्र का सतत निर्वाह करके भारत ने इस पूरे इलाके में खुद को बेजोड़ सिद्ध कर दिया है. उनका यह भी मानना है कि गठबंधन की राजनीति भारतीय प्रजातंत्र की परिपक्वता की सूचक है. उन्हें यह अच्छा लगा है कि गठबन्धन की राजनीति ने केन्द्र की ताकत में कमी की है. लाक याद दिलाते हैं कि भारत में 1996 से ही लगभग लगातार गठबन्धन सरकारें रही हैं और इन्हीं के दौर में महत्वपूर्ण आर्थिक बदलाव हुए हैं. आर्थिक मुद्दों की चर्चा करते हुए वे यह बताना भी नहीं भूलते कि हाल ही में अमरीका में बहुत सारी बड़ी वित्तीय संस्थाओं के चरमरा जाने से भारत, चीन, ब्रज़ील और रूस की अहमियत बढ़ी है.

प्रजातंत्र की वजह से वे इस इलाके में भारत को चीन की तुलना में बेहतर मानते हैं. उन्हें इस बात की खुशी है कि प्रजातांत्रिक भारत उन कई अतियों से बचा रह सका है जिनकी शिकार चीन की जनता हुई है. वे चीन से भारत की कोई तुलना इसलिए भी उचित नहीं मानते कि चीन की 94% जनता तो एक ही भाषा-भाषी है. लाक भारत की विविधता को इसकी बड़ी पूंजी मानते हैं. उन के अनुसार, भारत की जनता अपनी विविधता की वजह से व्यापक वैश्विक परिदृश्य में भी बेहतर स्थान पाने की हक़दार है क्योंकि पूरी दुनिया भी वैविध्यपूर्ण ही है और भारतीय जनता उसकी जटिलताओं को ज़्यादा अच्छी तरह समझ और उनके साथ निर्वाह कर सकती है. इसी विविधता की वजह से वे भारत की तुलना अमरीका से करना पसन्द करते हैं, जहां, उनके अनुसार, दुनिया का हर धर्म और विश्वास मौज़ूद है.

जब लाक भारत को एक महाशक्ति के रूप में देखते और पेश करते हैं तो यह बात वे सैन्य दृष्टि से नहीं कहते. वे भारत को पुराने अमरीका और रूस की तरह की सैन्य महाशक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसी महाशक्ति के रूप में देखते और पेश करते हैं जिसके पास अपने उदार मूल्य और दुनिया की बेहतरी की योजनाएं हैं और जो एड्स और पर्यावरण जैसे प्रश्नों को सुलझाने में जुटा है.

ऐसा नहीं है कि लाक का नज़रिया सिर्फ सकारात्मक है. भारत में बहुत सारी कमियां भी उन्हें नज़र आई हैं. गरीबी, भ्रष्टाचार, बढते शहरीकरण, विभिन्न धर्मों, जातियों और स्त्री-पुरुष के बीच की भारी असमानता आदि को वे भारत की प्रगति के राह की सबसे बड़ी अड़चनों के रूप में देखते हैं. लाक को भारत के पड़ोसी देश भी इसके लिए एक समस्या नज़र आते हैं लेकिन इसके लिए वे चाहते हैं कि भारत बेहतर डिप्लोमेसी का इस्तेमाल करे और इन देशों के साथ अपना बर्ताव सुधारे.

डेनियल लाक के पास भारत की उन्नति के लिए एक ख़ास नुस्खा यह है कि भारत को शासन का संघीय ढांचा अपना लेना चाहिए. वे चाहते हैं कि भारत में भी अमरीका की तरह लगभग स्वतंत्र राज्य सरकारें हों जो टैक्स वगैरह लगाकर खुद अपने वित्तीय संसाधन जुटा सके. केन्द्र के पास तो सिर्फ बड़े मुद्दे जैसे रक्षा, आर्थिक नीतियां, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, स्वास्थ्य, शिक्षा वगैरह रहने चाहिए. अपनी बात को पुष्ट करने के लिए वे अमरीका के अलावा कनाडा, स्विटज़रलैण्ड और जर्मनी का उदाहरण देते हैं जिन्होंने संघीय ढांचा अपना कर खुद को आगे बढाया है.

डेनियल लाक अपनी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में बेपनाह संघर्ष करने वाली भारत की जनता को इसकी सबसे बड़ी सम्पदा मानते हैं. मैं उन्हीं को उद्धृत कर रहा हूं: “एक भारतीय होने का अर्थ है दुनिया का सबसे बड़ा समस्या हल करने वाला होना, क्योंकि हर रोज़ आपको बेहद मुश्किल ज़िन्दगी से जूझना पड़ता है. बच्चों की शिक्षा से लगाकर चिकित्सा सुविधा और जीवन की आधारभूत ज़रूरतों तक, यानि अपने दैनिक जीवन के तमाम क्षेत्रों में गतिशील रहने के लिए आपको अत्यधिक चरित्रिक शक्ति की आवश्यकता होती है.” डेनियल लाक को यह शक्ति भारतीय जनता में नज़र आई है और इसीलिए उन्हें लगता है कि 2040 तक भारत एक महाशक्ति के रूप में पहचाना जाने लगेगा.
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Discussed book:
INDIA EXPRESS: The future of the New Superpower
By Daniel Lak
Published by Palgrave Macmillan
272 pages, Hardcover
US $ 26.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत रविवार, 17 मई, 2009 को प्रकाशित.








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Monday, May 4, 2009

दास्तान लापता पाण्डुलिपि, हत्या और अफीम व्यापार की


कथाकार चार्ल्स डिकेंस एक बार फिर से चर्चा में हैं. 2009 के शुरू में डैन साइमंस की किताब आई ड्रुड जो डिकेंस की अपूर्ण कृति द मिस्ट्री ऑफ एडविन ड्रुड पर आधारित थी, और अब आई है मैथ्यू पर्ल की किताब द लास्ट डिकेंस. चार्ल्स डिकेंस का निधन 9 जून 1870 को मात्र 58 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से हुआ था. उस समय वे अपने उपन्यास द मिस्ट्री ऑफ एडविन ड्रुड की, जो कुल 12 धारावाहिक किश्तों में छपना था, महज़ छह किश्तें लिख पाए थे. धारावाहिक के बाद इसे पुस्तकाकार छपना था. इस उपन्यास का अंत क्या हो सकता था, यह आज भी साहित्यिक हलकों में चर्चा का प्रिय विषय है. एड्विन ड्रुड ज़िन्दा है या मारा जा चुका है? क्या उसे उसके चाचा जॉन जैस्पर ने मारा? या कि वह बच निकला? कुछ ऐसे ही सवालों की रोचक परिणति है मैथ्यू पर्ल का यह उपन्यास. पर्ल आधी हक़ीक़त आधा फसाना शैली में अपने उपन्यास लिखा करते हैं, जिन्हें अब ऐतिहासिक उपन्यास विधा की एक उप शैली साहित्यिक थ्रिलर के अंतर्गत रखा जाने लगा है. इस शैली के उनके दो उपन्यास पहले ही खासे चर्चित रह चुके हैं: द दांते क्लब और द पो शेडो.

अपने इस ताज़ा उपन्यास द लास्ट डिकेंस की शुरुआत वे डिकेंस के बेटे फ्रैंक के वर्णन के साथ करते हैं जो भारत में बंगाल माउण्टेड पुलिस में सुपरिंटेंडेंट है. लेकिन उपन्यास की केन्द्रीय कथा का ताल्ल्लुक चार्ल्स डिकेंस के इस असमाप्त उपन्यास से है. फ्रैंक की कथा बाद में इससे जुड़ती है.

यह कथा बोस्टन शहर से शुरू होती है जहां डिकेंस के अमरीकी प्रकाशक फ़ील्ड्स, ऑस्गुड एण्ड कम्पनी के लोग इंग्लैण्ड से इस धारावाहिक उपन्यास की अगली किश्त के आने के इंतज़ार में हैं. कम्पनी के पार्टनर जेम्स ऑस्गुड ने अपने एक युवा क्लर्क डैनियल सैण्ड्स को बोस्टन समुद्र तट पर भेजा है कि वह लंदन से भेजी हुई यह किश्त लेकर आए, लेकिन कुछ किताब तस्कर और एक रहस्यपूर्ण व्यक्ति उसका पीछा करते हैं और उसे घायल करके मार डालते हैं. उपन्यास की किश्त गायब हो जाती है. पुलिस को शक़ है कि सैण्ड्स खुद इस पाण्डुलिपि को गायब करने के षडयंत्र में शामिल था. प्रकाशक के लिए यह जीवन मरण का प्रश्न है. डिकेंस उस ज़माने में इतने लोकप्रिय थे कि उनकी किताबों को खरीदने के लिए डेढ़ मील लम्बी कतार लगा करती थी. ऐसे लेखक का उपन्यास अधूरा रह जाए तो उन्हें भारी नुकसान होगा. तो, खुद जेम्स ऑस्गुड अपने प्रकाशन संस्थान की एक युवा विधवा कर्मी रेबेका सैण्ड को साथ लेकर लंदन रवाना होते हैं, यह पता करने कि डिकेंस ने उपन्यास पूरा भी किया या नहीं, और डिकेंस ने उपन्यास पूरा न भी किया हो तो, उपन्यास का अंत क्या हो सकता था? रेबेका उसी मृत क्लर्क की बहन है. ऑस्गुड के सामने दोहरी चुनौती है. एक, डिकेंस के उपन्यास के रहस्य की तह में पहुंच कर अपने व्यापार को बचाने की, और रेबेका का दिल जीतने की.

केण्ट में ऑस्गुड डिकेंस के परिवार के लोगों से मिलते हैं, उन ग्रामीणों से मिलते हैं, जिन के आधार पर कथाकार ने एड्विन ड्रुड सहित अपने कई चरित्रों की रचना की. और इस तरह मैथ्यू पर्ल उस महान कथाकार डिकेंस की एक प्रामाणिक तस्वीर भी उकेर पाते हैं. केण्ट में ही यह रचना एक नया मोड़ भी लेती है. पर्ल यहां से डिकेंस के अपूर्ण उपन्यास की कथा को उस अफीम व्यापार से जोड़ते हैं जो इंगलैण्ड द्वारा भारत से संचालित किया जा रहा था और जिसका लक्ष्य था पूरे चीन को नशे का गुलाम बना डालना. स्वाभाविक है कि इस नशे के व्यापार का एक आयाम संगठित अपराध भी था. और इसीलिए यह कृति साहित्यिक थ्रिलर की कोटि में आती है. पर्ल ने इतिहास और कल्पना का बहुत खूबसूरत मेल किया है.

बहुत कुशलता से बुना गया यह उपन्यास अपने पाठक को रोमांचक अनुभूति तो देता ही है, 19 वीं शताब्दी के मध्य के जन-जीवन से भी परिचित कराता है. यहां एक साहित्यकार, उसकी असमाप्त कृति, जटिल चरित्र, तेज़ गति से घटती घटनाएं, अफीम की तस्करी, खून-खराबा, प्रकाशकों की आपसी प्रतिस्पर्धा, साहित्यिक पायरेसी, और मोहक प्रेम-कथा सब कुछ है. एक पाठक को और भला चाहिए भी क्या?

Discussed book:
The Last Dickens
By Mathew Pearl
Random House
386 pages
US $ 25

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 03 मई 2009 को प्रकाशित.








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Monday, April 13, 2009

नए भारत में प्रेम की तलाश


तीस पार की अनिता जैन एक पत्रकार हैं. हॉर्वर्ड में पढी और न्यूयॉर्क मैगज़ीन, वाल स्ट्रीट जर्नल, फाइनेंशियल टाइम्स, ट्रेवल एण्ड लेज़र जैसी पत्रिकाओं में छपती रही हैं और मेक्सिको सिटी, लंदन, न्यूयॉर्क वगैरह में काम कर चुकी हैं. 2005 में उन्होंने न्यूयॉर्क मैगज़ीन में एक लेख लिखा कि वे अमरीकी डेटिंग व्यवस्था से ऊब चुकी हैं और अब उस परम्परागत ‘अरेंज्ड’ भारतीय विवाह के बारे में सोच रही हैं जिसके अब तक वे खिलाफ रही थीं. मेरिइंग अनिता: अ क्वेस्ट फोर लव इन द न्यू इण्डिया शीर्षक अपनी संस्मरणात्मक किताब में अनिता ने इसी बारे में अपनी भारत यात्रा का दिलचस्प वृत्तांत प्रस्तुत किया है. अनिता उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने आधुनिकता को न केवल जिया, बल्कि भली भांति समझा भी है और इसीलिए वे उसके बारे में सवाल उठाने में भी समर्थ हैं. उनका यह पूछना कि क्या आधुनिकता वाकई हमें आगे ले जा रही है, बहुत अर्थपूर्ण है. इसलिए अर्थपूर्ण है कि अगर स्त्री के सदर्भ में आधुनिकता का अर्थ आज़ादी है तो फिर क्यों इतनी बड़ी तादाद में स्त्रियां अपने ही रचे अकेलेपन के जाल में कैद हैं?

हम भारतीयों को अनिता की इस टिप्पणी से खुशी होगी कि दिल्ली में डेटिंग न्यूयॉर्क की तुलना में कम जटिल, कम भरमाने वाली और अहं को कम आहत करने वाली है. यह बात वे पुराने किस्म के वधू-आकांक्षी मर्दों और नए ज़माने के आत्म-विश्वास से लबरेज़ भारतीय युवकों की तुलना के बाद कहती हैं. उन्होंने अनुभव किया कि न्यूयॉर्क के युवा ड्रिंक्स पर या ऑनलाइन डेटिंग पर भले ही मज़ाकिया और सुसंस्कृत होने का आभास देते हों, उनमें व्यक्तित्व और कमिटमेण्ट का अभाव साफ नज़र आता है. वे खुद को न्यूयॉर्क की अन्य महिलाओं की ही तरह मानती हैं जिनकी शिकायत होती है कि मर्द लोग या तो बेहद महत्वाकांक्षी होते हैं या क़तई नहीं, वे या तो बहुत आतुर होते हैं, या बिल्कुल भी नहीं. पत्नी के रूप में उन्हें एक ऐसी स्त्री की तलाश होती है जो उनके बॉस, दोस्तों और परिवार के सामने गर्व से प्रस्तुत की जा सके. वे चाहते हैं कि उनकी पत्नी किसी पार्टी में जाकर महज़ डाइट कोक ही न ले, मार्टिनी भी सिप करे. लेकिन उनकी चाहत यह भी होती है कि वह मार्टिनी के तीन गिलास न पी जाए.

अनिता दिल्ली आकर बदले हुए भारतीय यथार्थ से रू-ब-रू होती हैं और अमरीकी यथार्थ से उसकी तुलना करती चलती हैं. वैसे तो उन्हें लगता है कि अमरीका में अपने मूल देश के बारे में वे जो सुनती रही है, असलियत उससे काफी आगे निकल चुकी है और पिछले पांच-दस बरसों में शहरी भारत बहुत बदला है. फिर भी भारत का बड़ा हिस्सा अभी भी जाति और वर्ग की गिरफ्त में है. उन्हें भारत में ऐसे युवा मिलते हैं जो एक तरफ तो मुक्त जीवन के आकांक्षी हैं और दूसरी तरफ जाति की बेड़ियों में भी मज़बूती से जकड़े हुए हैं. उनकी कई चचेरी बहनें हैं जो छोटे कस्बों में रहती हैं और जिन्हें इतनी भी आज़ादी मयस्सर नहीं है कि वे अपने मन से अपने गहने तक उतार सकें, लेकिन फिर भी वे खुश हैं.

अनिता कहती हैं कि ज़्यादातर भारतीय भाषाओं में शादी या इसका समानार्थक शब्द ही वह शब्द है जो बच्चा मम्मी और पापा शब्दों के बाद सीख लेता है. मां-बाप के मन पर अपनी बेटी की चिंता सदा छायी रहती है. वे बताती हैं कि जब अपने छुटपन में वे एक तीन-मंज़िला इमारत की बालकनी से नीचे गिर पड़ी तो उनकी मां की पहली चिन्ता यही थी कि इस लड़की का हाथ टूट चुका है, यह जानने के बाद कौन लड़का इससे शादी करेगा?

अनिता पाती हैं कि भारत में शादी के मामले में पढाकू डॉक्टर या इंजीनियर की सबसे ज़्यादा मांग है, लेकिन उनकी अपनी मानसिकता इनकी बजाय किसी पढे लिखे, फेमिनिस्ट मानसिकता वाले, खूब दुनिया देखे जीवन साथी की चाह रखती है. यहां वे एक 35 वर्षीय भारतीय वकील से मिलती हैं, जिसका नाम नील है. नील कहता है कि यह कैसी अजीब बात है कि अमरीका में एक युगल वर्षों डेटिंग करता है फिर भी तै नहीं कर पाता कि उन्हें शादी करनी है या नहीं, जबकि भारत में एक या दो मुलाक़ातों में ही इस बात का निर्णय हो जाता है. अनिता कहती हैं कि उन जैसी स्त्रियों की तो यह आदत ही बन चुकी है कि डेटिंग के मामले में वे दो तरह के रवैये रखती हैं. जब वे किसी भारतीय के साथ डेट पर जाती हैं तो उससे जो बात कहती हैं (मैं चाहती हूं कि मेरा पति मेरे घर के काम काज में हाथ बंटाये) वह बात वे किसी अमरीकी युवक से कभी नहीं कहतीं.

अनिता सबसे खास बात यह कहती हैं कि न्यूयॉर्क में उनकी कुछ एकल मित्र अभी भी इस बात के प्रति आश्वस्त नहीं हैं कि उन्हें शादी कर ही लेनी चाहिए. असल में, कोई भी आधुनिक स्त्री किसी भी विकल्प का दरवाज़ा बन्द नहीं करना चाहती. अनिता यह भी कहती हैं कि अमरीका और भारत दोनों ही देशों में किसी स्वतंत्र विचारों वाली, मज़बूत राय रखने वाली और ज़्यादा मीन-मेख निकालने वाली लड़की की शादी हो पाना मुश्क़िल है. वे सबसे खास बात तो यह कहती हैं कि आप भले ही किसी लड़की को अमरीका से बाहर ले जाएं, अमरीकी आदर्शों को उसके दिल से बाहर नहीं निकाल सकते.

क्या यही बात हिन्दुस्तानी लड़कियों के बारे में भी नहीं कही जा सकती?


राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत रविवार, दिनांक 12 अप्रेल, 2009 को प्रकाशित आलेख का किंचित विस्तृत पाठ.

Discussed book:
Marrying Anita: A Quest for Love in the New India
By Anita Jain
Published by Bloomsbury USA
Pages 320
Us $ 24.99










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Monday, March 23, 2009

अपना देश छोड़ने की पीड़ा


कैलिफोर्निया में बस चुके ईरानी आप्रवासी मां-बाप की संतान, लम्बे समय तक ‘टाइम’ पत्रिका की मध्यपूर्व सम्वाददाता और लिप्स्टिक जिहाद नामक चर्चित पुस्तक की लेखिका आज़ादेह मोआवेनी की नई संस्मरणात्मक किताब हनीमून इन तेहरान: टू ईयर्स ऑफ लव एण्ड डेंजर इन ईरान अपने पाठकों को एक बन्द समाज के भीतर झांकने का विरल अवसर प्रदान करती हैं. वे ‘टाइम’ पत्रिका के लिए महमूद अहमदीनेजाद के चुनाव की खबरें देने के लिए ईरान आती हैं और यहां आकर एक युवक के प्रेम में पड़कर ईरान के लिहाज़ से बहुत अपारम्परिक, बल्कि दुस्साहसिक ज़िन्दगी जीती हैं. वे वहां अपने बॉय फ्रैण्ड के साथ न केवल रहती हैं, विवाह पूर्व गर्भवती भी हो जाती हैं. ईरान में इस ‘ज़ुर्म’ की सज़ा मौत थी. वे लिखती हैं, “अगर हम न्यूयॉर्क, बर्लिन या ऐसी ही किसी और जगह रह रहे होते तो यह बात खास चिंता का विषय नहीं होती. लेकिन ईरान के इस्लामी गणतंत्र में यह मुमकिन नहीं है कि कोई शादी किए बगैर गर्भ धारण कर ले. किसी व्यक्ति के लिए ऐसी सामाजिक श्रेणी का यहां कोई अस्तित्व ही नहीं है.” आज़ादेह अपने गर्भ को छिपाते हुए मुस्लिम शैली से विवाह करने के लिए रिश्वत का सहारा लेती है. फिर भी यह भय तो बना ही रहता है कि अगर इस्लामी अधिकारियों को उसकी गर्भावस्था का पता चल गया तो खैर नहीं है. लेकिन, आज़ादेह बताती हैं कि रुढिग्रस्त ईरान में हर तरह की आज़ादी सुलभ थी, बशर्ते आप रिश्वत देने को तैयार हों.

किताब में आज़ादेह की प्रेम कथा के समानांतर एक और कथा चलती है. यह कथा एक मिस्टर एक्स की है जिन्हें उन पर जासूसी करने के लिए तैनात किया गया है. आज़ादेह लिखती हैं, “कुछ समय तो लगा जैसे यह शख्स एक नियंत्रक पति की भूमिका अदा कर रहा है.” कोई सात बरस तक लेखिका और मिस्टर एक्स लुका-छिपी का खेल खेलते रहते हैं. मिस्टर एक्स सब कुछ जानना चाहते हैं, लेखिका किससे मिल रही है, किसको इण्टरव्यू कर रही है, उसके दोस्त कौन- कौन हैं, वगैरह. और लेखिका यह जानने को व्यग्र हैं कि आखिर उसकी मंशा क्या है. और इस तरह उसके सामने उसकी मातृभूमि का नया चेहरा उभरता है. ऐसी मातृभूमि, जहां वाद्य वादन तक के लिए परमिट लेना पड़ता है और जहां शादी के स्वागत समारोह तक प्रतिबन्धित हैं.

बहुत सारे प्रसंग इस किताब को रोचक और मार्मिक बनाते हैं. ऐसा ही एक प्रसंग है जब वे एक विश्वविद्यालय में एक महत्वपूर्ण इण्टरव्यू के लिए जाती हैं लेकिन उन्हें दरवाज़े से ही महज़ इसलिए लौटा दिया जाता है कि उनके लबादे पर पर्याप्त बटन नहीं हैं. वे लिखती हैं, “इण्टरव्यू से वंचित किए जाने पर क्रोध और अपने अपमान की वजह से आंखों से आंसू फूट पड़े. मैंने बमुश्किल खुद को गार्ड लोगों के सामने हताश दिखाई देने से रोका और भाग कर अपनी टैक्सी में घुस गई. फिर खुल कर रोई.”. ईरान में औरतों की स्थिति पर टिप्पणी करती हुई वे बताती हैं कि उन्हें कभी भी यह कहा जा सकता है कि उन्होंने खुद को पर्याप्त रूप से ढक नहीं रखा है, या कभी भी किसी ऐसी वेब साइट को बन्द कर दिया जाता है जो स्त्री विषयक मुद्दों को उठाती है. इसी चक्कर में सरकार समाचार और राजनीति से सम्बद्ध हज़ारों वेब साइट्स को भी बन्द कर चुकी है. लेकिन इस सबके बीच भी ईरानी लोग उन नियमों-कानूनों को तोड़ने के अपने तरीके निकालते रहते हैं जिन्हें वे नापसन्द करते हैं. जैसे, बाहर की दुनिया से जुड़ने के लिए वे सेटेलाइट डिश का उपयोग कर लेते हैं. कभी युवा लोग हिम्मत करके प्रतिबन्ध तोड़ते हैं तो कभी अधिकारीगण अवहेलनाओं की अनदेखी करते हैं.

आज़ादेह के लेखन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि गहरे मानसिक संताप से गुज़रने के बवज़ूद बेहद संतुलित बनी रहती हैं और निर्मम तटस्थता के साथ चीज़ों को देखती-दिखाती हैं. उनकी निजी ज़िन्दगी के ये प्रसंग अंतत: हमें ईरान में विद्यमान स्थितियों की झलक दिखाते हैं और यह महसूस कराते हैं कि इंसान आज़ादी की कमी से कितना त्रस्त रहता है. मिस्टर एक्स उनसे कहते हैं कि जाओ दुनिया को कह दो कि हम जनतांत्रिक हैं, लेकिन आज़ादेह के अनुभव उन्हें इस बात को स्वीकार नहीं करने देते. उन्हें तो ईरान एक दमनकारी, बन्द देश ही लगता है और वे अंतत: अपने पति और बेटे के साथ देश छोड़कर लन्दन जा बसती हैं. देश छोड़ने का दर्द उनके एक-एक शब्द से रिसता है.

Discussed book:
Honeymoon in Tehran: Two Years of LOVE and DANGER in IRAN
By Azadeh Moaveni
Random House,
Hardcover, Pages 352
US $ 26

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 22 मार्च, 2009 को प्रकाशित.







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Sunday, March 8, 2009

आनन्द के पीछे छिपा अवसाद


अगर आपका यह खयाल है कि भ्रष्टाचार हिन्दी व्यंग्य लेखकों की कमज़ोरी है, तो कृपया विख्यात पत्रकार मैक्लीन जे स्टोरर की इस कृति, फॉर्वर्ड ओ पीजेण्ट को ज़रूर पढें. आप मान जाएंगे कि यह तो सर्वव्यापी है. अगर आप पहले से भी ऐसा मानते हैं तो भी कोई हर्ज़ नहीं. किताब फिर भी आपको निराश नहीं करेगी. तो, पहले किताब की ही बात कर ली जाए.

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक काल्पनिक शाखा यू एन मेट एक युवा ब्रिटिश समाज विज्ञानी डॉ फिलिप स्नो को वियतनाम भेजना चाहती है. इस शाखा का एक कर्मी, एक युवा स्वीडी, वहां से लापता हो गया है और इस कारण वहां भेजी जाने वाली सहायता राशि रुक गई है. यह भी शिकायत मिलती रही है कि बर्ड फ्लू पर शोध के लिए जो राशि दी जाती रही है उसके उपयोग में अनियमितताएं बरती जा रही हैं. स्नो को इस सबकी पड़ताल करनी है. स्नो वियतनाम के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानता. लेकिन उसने सुन रखा है कि वहां की धरती पर एक खास तरह का हानिप्रद रसायन, जिसका नाम एजेण्ट ऑरेंज है, पाया जाता है. यह रसायन कैंसर उपजाता है. ज़ाहिर है कि वह वियतनाम जाने को उत्सुक नहीं है. लेकिन उसे जाना पड़ता है.

स्नो के वियतनाम पहुंचने से वे सारे अधिकारी परेशान हो उठते हैं जो अपने-अपने तरीके से उस शोध राशि को खर्च करने की तैयारी में थे और हैं. वे लोग स्नो को अपनी जांच से विचलित करने के लिए अजीबो-गरीब हरकतें करते हैं, और वे हरकतें ही इस कृति को दिलचस्प बनाती हैं. किसम-किसम के ये अधिकारी बेहद लोलुप हैं और शुरू-शुरू में तो स्नो के प्रति लिजलिजी विनम्रता का प्रदर्शन करते हैं, लेकिन जब उन्हें लगता है कि स्नो उनके झांसे में आने वाला नहीं है और अपने काम को ईमानदारी से अंजाम देने की ज़िद्द पर अड़ा है तो वे हताश होकर जासूसी के गम्भीर आरोप में उसके घर पर आधी रात गए एक छापा पड़वा देते हैं. वियतनाम में स्नो खुद को जिन चरित्रों से घिरा पाता है वे किसी भी तरह उस तथाकथित रसायन एजेण्ट ऑरेंज से कम घातक नहीं हैं, चाहे वे आक्रामक मार्क्सिस्ट चिंतक हों, वियतनाम में रह रहे विदेशी नशेड़ी हों, ज़रूरत से ज़्यादा सजग भिखारी हों, पगले वेटर हों या कठपुतली नौकरशाह.

रचना की रोचकता उन सारी स्थितियों में है जिन्हें ये बेईमान लोग अपनी कारगुजारियों से या बचाव के लिए पैदा करते हैं. एक फुटबाल मैच के दौरान वान इम्स्ट द्वारा खराब हो चुके टीके लगाने और उनके द्वारा जर्मन खिलाड़ियों की तबियत खराब हो जाने का वर्णन हो या एक मेक्सिकी अधिकारी की वियतनाम यात्रा के दौरान उसे खुश करने के हास्यास्पद प्रयासों और खुद उस अधिकारी की बेहूदा हरकतों का वर्णन, लेखक एब्सर्ड स्थितियां रचकर स्थितियों की भयावहता उजागर करने में कामयाब रहता है.

उसके इन प्रयासों में उसकी व्यंग्यात्मक भाषा खूब मददगार सिद्ध होती है. कुछ बानगियां पेश हैं: ‘वियतनाम में रहना ऐसा ही था जैसे आपको ओमेन के बीच धकेल दिया गया है. चारों तरफ डरावनी बातें घटित हो रही थीं और उनके खत्म होने के कोई आसार भी दिखाई नहीं दे रहे थे.’ या ‘पूरा परिवार एक आउटडोर कैफे में एक बड़ी गोल टेबल के चारों तरफ बैठ कर फुटबाल के आकार की एक आइसक्रीम को निपटाने की कोशिश कर रहा था’ या डॉ स्नो के बारे में लेखक की यह टिप्पणी कि ‘वियतनाम में उसकी नियति यही थी कि या तो वह उपहास का पात्र बने या एक एटीएम मशीन बना रहे. अक्सर तो उसे दोनों ही भूमिकाओं में रहना पड़ता था.’

स्टोरर ने खुद 15 बरस वियतनाम में बिताये हैं इसलिए उन्हें वहां की अन्दरूनी स्थितियों की अच्छी जानकारी है, और उस जानकारी का उन्होंने इस किताब में बहुत उम्दा तरह से इस्तेमाल किया है. फार्वर्ड ओ पीजेण्ट की कथा निकोलाई गोगोल की विख्यात कृति ‘इंस्पेक्टर जनरल’ की याद ताज़ा करती है तो इसका अन्दाज़े-बयां श्रीलाल शुक्ल की अमर कृति ‘राग दरबारी’ का स्मरण कराता है. किताब आपको बांधे रखने में पूरी तरह कामयाब है. आप पढते हुए आनंदित होते हैं, लेकिन उस आनंद के पीछे गहरा अवसाद भी घनीभूत होता रहता है.
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Discussed book:
Forward O Peasant
By Maclean J Storer
Published by Gauss Publishing
Paperback, 324 pages
Price US $ 16.95

राजस्थान पत्रिका के  रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 08 मार्च 2009 को प्रकाशित.



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Saturday, March 7, 2009

हम तो ऐसे हैं भैया

कोई चार बरस बाद फिर से दिल्ली के इन्दिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर आना हुआ तो उसकी बदली शक्ल-सूरत देख कर बड़ा अच्छा लगा. चौबीस घण्टों के अंतराल में ही तीन अलग-अलग हवाई अड्डों को छूने का मौका मिला और अलग-अलग तरह के अनुभव हुए. दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर पहले से ज़्यादा चमक-दमक और सुविधाएं नज़र आईं लेकिन भीड़-भाड और अव्यवस्था में कोई बदलाव नहीं मिला. लंदन का हीथ्रो हवाई अड्डा अपनी विशालता की वजह से आतंकित करता लगा लेकिन यह भी महसूस हुआ कि उस विशालता के बावज़ूद वहां कोई अव्यवस्था नहीं है. अमरीका के सिएटल हवाई अड्डे को हालांकि उतना बड़ा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हमारे अपने हवाई अड्डे से काफी बड़ा होने के बावज़ूद वह अपनी सुविधाओं और व्यवस्थाओं में बहुत अंतरंग और आत्मीय लगा. इमिग्रेशन काउण्टर के ठीक पीछे बहुत बडी दीवार पर अमरीका में स्वागत की घोषणा देवनागरी लिपि में भी देखकर गर्व भी हुआ प्रसन्नता भी.

जयपुर से दिल्ली तक का टैक्सी का सफर यों तो ठीक था लेकिन बहरोड़ से निकलते ही जो भीषण ट्रैफिक जाम लगा मिला तो एक बार तो हमारे होश ही उड़ गए. गाड़ी से बाहर निकल कर पता किया तो बताया गया कि अगले दो-तीन घण्टे तो इस जाम के हटने की कोई सम्भावना नहीं है. यानि हमारी फ्लाइट तो मिस होनी ही है. गाड़ी में बैठे-बैठे ही अमरीका में बैठी बेटी से भी लगातार बात हो रही थी और हमारी चिंता के घेरे में वह भी आ रही थी. लेकिन जैसे कोई चमत्कार हुआ, जाम हटा और हम कुछ देर से ही सही, हवाई अड्डे पहुंच गये. फ्लाइट सात बजे थी, हम छह बजे पहुंच गए. वहां जाकर पता चला कि फ्लाइट भी एक घण्टा लेट है. इस बात से और ज़्यादा राहत मिली. चैक-इन हम जयपुर में अपने घर से ही कर चुके थे. तकनीक ने ज़िन्दगी को कितना आसान बना दिया है! जिस काम के लिए हवाई अड्डे पर लम्बी जद्दो-जहद करनी पड़ती थी, वह तो घर बैठे दो-चार मिनिट में ही हो गया था. न केवल दिल्ली की, लन्दन की चैक-इन भी हमने घर से ही कर ली थी और अपने बोर्डिंग पास हमारे हाथों में थे, अब तो बस सुरक्षा जांच और सामान जमा करवाने का काम बाकी था. ये काम भी आसानी से हो गए.

हम भारत में हैं और भारतीयों के बीच हैं यह एहसास हुआ कुछ देर बाद. ब्रिटिश एयरवेज़ की दिल्ली-लन्दन फ्लाइट में जहाज के अन्दर घुसने के इंतज़ार में हम जहां बैठे थे, उस जगह के ठीक सामने एक टेलीफोन बूथ था. नज़ारा यह था कि एक आदमी फोन पर बात करता और दस उससे करीब-करीब सटकर अपनी बारी का इंतज़ार करते. इंतज़ार करते हुए वे खूब जोर-जोर से बातें भी करते जा रहे थे. ज़ाहिर है ये दोनों स्थितियां टेलीफोन करने वाले के लिए कष्टप्रद थीं. थोडी देर बाद एक और नज़ारा सामने आया. जैसे ही यह घोषणा हुई कि बोर्डिंग शुरू हो रही है, लोग दरवाज़ों की तरफ उमड़ पडे. कुछ इस अन्दाज़ में कि अगर पहले नहीं घुसे तो सीट से हाथ धोना पड़ जाएगा, जबकि हरेक की सीट पूर्व निर्धारित होती है. आप पहले जाएं या बाद में, सीट वही रहती है. बार-बार कहा जा रहा था कि पहले अमुक-अमुक श्रेणी के लोग प्रवेश करेंगे, लेकिन इसके बावज़ूद दूसरी श्रेणियों के यात्री भी भीतर जाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. बेचारी हवाई कम्पनी की लड़कियों की हालत उन्हें रोकने में खराब हो रही थी. मैं सोच रहा था, भारत में अभी भी हवाई यात्रा समाज के अपेक्षाकृत सम्पन्न और शिक्षित वर्ग तक सीमित है, लेकिन इस वर्ग के व्यवहार से यह कहीं भी नहीं लगता कि किसी तरह के अनुशासन और व्यवस्था के संस्कार इनमें हैं. ऐसा ही थोड़ी देर बाद फिर से महसूस हुआ. हवाई जहाज जब उड़ान भरने लगता है तो यात्रियों से अनुरोध किया जाता है कि वे अपने सेल फोन, लप टॉप वगैरह बन्द कर दें, सीट बेल्ट बांध लें और सीट अगर पीछे की हुई है तो उसे सीधा कर लें. ज़्यादातर यात्रियों ने इन निर्देशों की अनदेखी की और बेचारी एयर होस्टेसों को हर यात्री से अलग-अलग इस बात का अनुरोध करना पड़ा. लंदन से सिएटल की फ्लाइट में जहां, भारतीय यात्री अपेक्षाकृत कम थे, यह देखने को नहीं मिला. यात्रियों ने स्वत: निर्देशों का पालन किया बल्कि, जो थोड़े बहुत भारतीय भी फ्लाइट पर थे, देखा-देखी उनका व्यवहार भी बेहतर था. आखिर ऐसा क्यों होता है कि जब हम भारत में होते हैं तो हमारा व्यवहार अलग होता है, और जब हम भारत से बाहर होते हैं तो अलग!

क्या भारत में हम भारतीय हमेशा ऐसे ही रहेंगे?








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Monday, February 23, 2009

किस्सा शेक्सपीयर की दूसरी पत्नी का


अत्यधिक ख्याति और लोकप्रियता के धनी विलियम शेक्सपीयर के साथ कई रहस्य अब भी बने हुए हैं. साहित्य की दुनिया में इस बात को लेकर अभी भी बहस जारी है कि जो रचनाएं उनके नाम से जानी जाती हैं क्या वे वाकई उन्हीं ने रची थीं. एक अन्य रहस्य उनके जीवन के एक विशेष कालखण्ड के बारे में है, जिसे ‘मिस्ट्री ईयर्स’ के नाम से जाना जाता है. कोई नहीं जानता कि अपनी किशोरावस्था के इन वर्षों में वे क्या करते रहे. शेक्सपीयर को लेकर जो तीसरा रहस्य है उसका सम्बन्ध उनके विवाह से है. उनका विवाह 28 नवम्बर 1582 को शोटेरी की एनी हाथावे से हुआ था. एनी के स्वर्गीय पिता के दो दोस्तों ने 40 पाउण्ड लेकर शेक्सपीयर को बलात इस विवाह के लिए प्रस्तुत किया. एनी तब गर्भवती थी. इस विवाह का विधिक प्रमाण लैटिन भाषा में उपलब्ध है. रहस्य की बात यह है कि इस विवाह से ठीक एक दिन पहले, एक अलग स्थान पर, स्ट्रेट्फर्ड के निकट के एक गांव में विलियम शेक्सपीयर ने टेम्पल ग्राफ्टन की एनी व्हाटले से विवाह किया. इसका भी प्रमाण उपलब्ध है. वुरसेस्टर संग्रहालय में उपलब्ध 27 नवम्बर, 1582 का एक दस्तावेज इस विवाह की पुष्टि करता है.
वैसे तो इस प्रमाण को कलम की फिसलन कहकर खारिज भी किया जा सकता है, क्योंकि एनी नाम दोनों ही प्रमाणों में समान है. लेकिन, ऐसा न करके, शेक्सपीयर के नाटकों और उनके जीवन से अनेक साक्ष्य जुटाकर, ऐतिहासिक उपन्यासकार कारेन हार्पर ने एक उपन्यास लिखा है मिस्ट्रेस शेक्सपीयर. कारेन एक लोकप्रिय उपन्यासकार हैं और उनके ऐतिहासिक और समकालीन दोनों ही तरह के उपन्यास खूब बिके हैं.

कारेन ने इस उपन्यास में उपलब्ध तथ्यों और कल्पना के सहारे जो रोचक कथा बुनी है उसके अनुसार शेक्सपीयर को सच्चा प्यार तो एनी व्हाटले से ही था. यह एनी और शेक्सपीयर स्ट्रेट्फर्ड में बालपन के साथी थे, लेकिन पारिवारिक वैमनस्य की वजह से एक दूसरे से दूर हो गए थे. युवावस्था में ये फिर एक दूसरे के नज़दीक आए और पारिवारिक असहमतियों के बावज़ूद इन्होंने विवाह करने का निश्चय किया. लेकिन, जब विलियम को एनी हाथावे से विवाह कर लेना पड़ा तो भग्न हृदया एनी व्हाटले ने लंदन जाकर खुद को पारिवारिक व्यवसाय में डुबो लिया. वर्षों बाद जब विलियम शेक्सपीयर भी लंदन आये तब भी दोनों के दिलों में एक दूसरे के प्रति प्यार और आकर्षण बरकरार था. ये दोनों फिर से मिले और तब एनी व्हाटले ने उनको कामयाब बनाने के लिए अथक प्रयास किए.

उपन्यासकार ने श्यामा सुन्दरी एनी व्हाटले को बहादुर और चतुर युवती के रूप में चित्रित किया है. यह इतालवी मां की संतान थी. अपनी चतुरता और साहस के बल पर यह विलियम शेक्सपीयर को अनेक राजनीतिक संकटों से आगाह करती है और महाकवि के अनेक सॉनेट्स तथा उनके प्रसिद्ध नाटक लव्ज़ लेबर लॉस्ट की प्रेरणा बनती है. इस नाटक को पूरा करने में तो उसका योगदान है ही, इसकी बिक्री में भी वह मदद करती है और शेक्सपीयर के लिए संरक्षक भी जुटाती है. इतना ही नहीं, ग्लोब थिएटर में हुए एक अग्निकाण्ड से उनकी प्राण रक्षा भी करती है. अनेक वास्तविक चरित्र जैसे क्रिस्टोफर मारलो, डॉ डी, सर वाल्टर रैले और एलिज़ाबेथ प्रथम इस उपन्यास के पन्नों की ऐतिहासिकता को प्रगाढ करते हैं तो महाकवि के नाटकों और कविताओं के अंश इसकी साहित्यिकता में वृद्धि करते हैं. उपन्यास का एक और आयाम है एलिज़ाबेथ कालीन लंदन के पचास साला राजनीतिक जीवन और तत्कालीन दुरभिसंधियों का कलाकारों और उनके संरक्षकों के नज़रिये से जीवंत चित्रण.

उपन्यास के केन्द्र में महाकवि शेक्सपीयर नहीं, उनकी प्रेमिका एनी व्हाटले है, जो अपनी कहानी खुद बयां करती है. स्वाभाविक ही है कि इस कारण उपन्यास में शेक्सपीयर का चरित्र पूरी तरह नहीं उभरा है, लेकिन शायद कारेन ने चाहा भी यही था. इस जीवनीपरक उपन्यास में यद्यपि कोई बड़ा रहस्य तत्व नहीं है, प्रेम में आकण्ठ डूबे शेक्सपीयर की कथा अपनी वैविध्यपूर्ण बुनावट और प्रामाणिकता का आभास देने वाले ब्यौरों के कारण पाठक को बांधे रखने में पूरी तरह कामयाब है.
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Discussed book:
Mistress Shakespeare
By Karen Harper
Published by Penguin/Putnam
384 pages
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ठ में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 22 फरवरी, 2009 को प्रकाशित.










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Sunday, February 8, 2009

कैसी होगी इक्कीसवीं सदी?


भविष्यवाणियां, चाहे वे ज्योतिषियों ने की हों, विज्ञान गल्प लेखकों ने या भू-राजनीतिज्ञों ने, सदा ही मानव को आकर्षित करती रही हैं. बावज़ूद इस बात के कि उनकी सत्यता और विश्वसनीयता प्राय: सन्दिग्ध रही है. फिर भी दुनिया की अग्रणी निजी गुप्तचरी और भविष्यवाणी करने वाली कम्पनी स्ट्रेटफॉर के सी ई ओ, मीडिया विशेषज्ञ और अब तक चार पुस्तकों के लेखक जॉर्ज फ्रीडमेन ने एक बार फिर गलत साबित होने का खतरा उठाया है. अपनी नई किताब द नेक्स्ट हण्ड्रेड ईयर्स: अ फोरकास्ट फोर द ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी के प्रारम्भ में ही फ्रीडमेन ने लिख दिया है कि वे जानते हैं कि उनकी अनेक भविष्यवाणियां ग़लत साबित होंगी, फिर भी उन्होंने इस किताब के माध्यम से भविष्य का एक एहसास सम्प्रेषित करने की कोशिश की है.

उन्होंने यह भी कहा है कि “हालांकि मेरे पास कोई क्रिस्टल बॉल (भविष्य देखने-दिखाने वाली गेंद) नहीं है, लेकिन मेरे पास एक ऐसी प्रविधि ज़रूर है, जो चाहे थोड़ी कम मुकम्मिल हो, मेरे तो ठीक ही काम आई है. उसी के ज़रिये मैं विगत को समझ सका हूं और आगत का अनुमान लगा सका हूं.” अपनी बात को कुछ और खोलते हुए वे कहते हैं कि मेरा तो काम ही यह है कि इतिहास की उथल-पुथल के पीछे छिपी व्यवस्था को देखूं-समझूं और यह अनुमान लगाऊं कि अब क्या घटनाएं, प्रवृत्तियां और तकनीक सामने आएंगी.”

क्या है फ्रीडमेन की खास-खास भविष्यवाणियां?

वे कहते हैं कि चीन एक बड़े और लम्बे आंतरिक संघर्ष के दौर से गुज़रेगा और मेक्सिको एक बड़ी वैश्विक शक्ति के रूप में उभरेगा. फ्रीडमेन अनेक विशेषज्ञों के इस कथन से असहमत हैं कि अमरीका के सामने चीन बड़ी चुनौती है, न कि रूस. अनेक तर्कों द्वारा वे चीन की कमज़ोरियां उभारते हैं और अमरीका को आश्वस्त करते हैं कि चीन से डरने की ज़रूरत नहीं है. एक और भविष्यकथन वे यह करते हैं कि शताब्दी के मध्य में अमरीका और पूर्वी यूरॉप, यूरेशिया और दूर पूर्व के एक अप्रत्याशित साझा संगठन के बीच एक विश्व युद्ध होगा. राहत की बात यह कि इस युद्ध में सेना का आकार अपेक्षाकृत छोटा होगा और यह विनाशक भी कम होगा.

अमरीका और जिहादियों के बीच का संघर्ष खत्म हो जाएगा, लेकिन उसके स्थान पर अमरीका रूस से उलझ जाएगा. फ्रीडमेन अमरीका का भविष्य कुछ ज़्यदा ही उज्ज्वल देखते हैं. वे तो यहां तक कह जाते हैं कि आने वाली शताब्दी अमरीका की शताब्दी होगी. इस बात को और साफ करते हुए वे यह बताते हैं भले ही ऐसा प्रतीत होता हो कि अमरीका विनाश की ओर बढ रहा है, असल में तो वह अभी भी बेहद शक्तिशाली है, वह इस्लामी आतंकवादी खतरों से भली-भांति पार पा लेगा, 2010 और 2020 वाले दशकों में उभरने वाले सोवियत रूस को भी पीछे छोड़ देगा और अन्तत: अंतरिक्ष आधारित मिसाइल सिस्टम को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लेगा. शताब्दी के मध्य का समय अमरीका के लिए स्वर्णिम काल होगा. इस बात को लेखक ने बहुत विस्तार से समझाया है. और जब हम उनके तर्कों को पढते हैं तो उनसे असहमत होना कठिन लगता है.

एक और बड़ी भविष्यवाणी फ्रीडमेन यह करते हैं कि आने वाले समय की तकनीक, सैन्य उपयोग के लिए और नए ऊर्जा संसाधन के लिए, अंतरिक्ष पर केन्द्रित होगी तथा इसके पर्यावरणीय प्रभाव दूरगामी और क्रांतिकारी होंगे.

पूरी किताब से गुज़र कर फ्रीडमेन की यह बात तो सही लगती है कि भविष्यकथन को जितनी छिछोरी हरकत माना जाता है, उतनी वह है नहीं. उसमें भी बुद्धि और तर्कसंगतता कम नहीं है. अगर हम घटना विशेष के आलोक में भविष्यवाणियों को परखने की बजाय यह देखें कि वे किन प्रवृत्तियों की तरफ संकेत करती हैं तो हम उनसे लाभान्वित भी हो सकते हैं. शायद यही इस किताब का मक़सद भी है.

Discussed book:
The Next 100 Years: A Forecast for the 21stCentury
By George Friedman
Published by: Doubleday
272 pages, Hardcover
US $ 25.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम 'किताबों की दुनिया' के अंतर्गत 08 फरवरी 2009 को प्रकाशित.









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Wednesday, January 28, 2009

उदयपुर में आयोजित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक गोष्ठी की रपट


उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक डॉ. माधव हाड़ा ने भगवानदास मोरवाल के चर्चित उपन्यास रेत के संबंध में कहा कि समाजशास्त्रीयता इस उपन्यास का साहित्येतर मूल्य है। उन्होंने कहा कि अस्मितावादी आग्रहों से परे होने पर भी रेत की संवेदना हाशिये के समाज से इस तरह संपृक्त है कि उसे अनदेखा करना अनुचित होगा। डॉ. हाड़ा ने किस्सा गोई को उपन्यास के शैल्पिक विन्यास की बड़ी सफलता बताया।
साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका बनास द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के डॉ. आशुतोष मोहन ने मोरवाल के तीनों उपन्यासों की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी उपन्यास अपनी पारम्परिक रूढ़ियों को तोड़कर नया रूप और अर्थवत्ता ग्रहण कर रहा है। डॉ. मोहन ने रेत की तुलना दूसरे अस्मितावादी उपन्यासों से किए जाने को गैर जरूरी बताते हुए इसकी नायिका रुक्मिणी को एक यादगार चरित्र बताया।
संगोष्ठी में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के सह-आचार्य डॉ. मलय पानेरी ने रेत पर पत्र वाचन किया। डॉ. पानेरी ने मोरवाल की लेखन शैली को प्रेमचन्द की कथा धारा का सबाल्टर्न विस्तार बताते हुए कहा कि यह उपन्यास अपने प्रवाह और सन्देश में विशिष्ट है। बनास के सम्पादक डॉ. पल्लव ने कहा कि चटखारा लेने की प्रवृत्ति उपन्यास को कमजोर बनाती है, मोरवाल की प्रशंसा इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि वे ऐसे आकर्षण में नहीं पड़ते।
इससे पूर्व संयोजन कर रहे शोध छात्र गजेन्द्र मीणा ने उपन्यास के कुछ महत्त्वपूर्ण अंशों का वाचन किया। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि रेत हमारे बीच रहने वाले एक कलंकित समुदाय को मानवीय दृष्टि से समझने की संवेदना हमें देता है। उन्होंने रेत की पठनीयता का कारण उसकी कथावस्तु की नवीनता को बताते हुए कहा कि यह हाशिये के बाहर के एक समाज की जन्मना अभिशापित औरत की जीवनचर्या को सामने लाती है। प्रो. नवल किशोर ने उपन्यास और स्त्री विमर्श के दैहिक पक्ष पर भी विस्तृत टिप्पणी की। चर्चा में जन संस्कृति मंच के संयोजक हिमांशु पण्ड्या, आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास, शोध छात्र नन्दलाल जोशी सहित अन्य पाठकों ने भी भागीदारी की। अन्त में गणेश लाल मीणा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

गणेशलाल मीणा
152, टैगोर नगर,
हिरण मगरी से.4,
उदयपुर - 313 002








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Monday, January 26, 2009

साहित्य का अविस्मरणीय मेला


पांच दिवसीय (21 से 25 जनवरी 2009) डी एस सी जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न हो गया. अपने आयोजन के इस चौथे वर्ष में आ पहुंचे इस फेस्टिवल ने अब साहित्यकारों और साहित्य रसिकों के मन में सम्मान पूर्ण स्थान बना लिया है. राजस्थान की राजधानी -गुलाबी नगरी जयपुर- के बीचो बीच स्थित डिग़ी पैलेस में आयोजित इस फेस्टिवल में दुनिया भर के लगभग 200 लेखकों-प्रकाशकों, अनगिनत कलाकारों और बहुत बड़ी संख्या में साहित्यानुरागियों ने शिरकत की.

पहले ज़रा इस आयोजन में शामिल हुए लेखकों की सूची पर एक नज़र डालें. शशि थरूर, विक्रम सेठ, चेतन भगत, विलियम डालरिम्पल, उर्वशी बुटालिया, तरुण तेजपाल, पवन के. वर्मा, पंकज मिश्रा, विकास स्वरूप, लीला सेठ, नंदन नीलेकनी, तहमीना अनम, मोहम्मद हनीफ, आशीष नंदी, जिलियन राइट, गुरुचरन दास, दानियल मुइनुद्दीन, के सच्चिदानन्दन, यू आर अनंतमूर्ति, गुलज़ार, हरि कुंजुरु, पॉल ज़करिया, पिको अय्यर, निकिता लालवाने, निरुपमा दत्त, तुलसी बद्रीनाथ, अंतरा देव सेन, नबनीता देव सेन, अपूर्व नारायण, आलोक राय, अशोक वाजपेयी, अलका सरावगी, उदयन वाजपेयी, अशोक चक्रधर, नूर ज़हीर, शक्ति दान कविया, माली राम शर्मा, हरि राम मीणा, सत्यनारायण, गोविन्द माथुर आदि. कहना अनावश्यक है कि यह पूरी सूची नहीं है, लेकिन इस सूची से यह साफ ज़ाहिर है कि देश-विदेश के, हिन्दी और हिन्दीतर भाषाओं के अनेक शीर्षस्थ लेखक इस फेस्टिवल में शामिल हुए. गीतकार प्रसून जोशी, फिल्म निर्देशक मुज़फ्फर अली, विधु विनोद चोपड़ा, कलाकार अमिताभ बच्चन, नंदिता दास, दीप्ति नवल, अनुपम खेर, गंभीर फिल्म विश्लेषक नसरीन मुन्नी कबीर ने भी अलग-अलग सत्रों में शिरकत की और आयोजन स्थल पर मुक्त रूप से लोगों से मिलते-जुलते रहे. यह भी कहना ज़रूरी है कि अनुपम खेर, जो शहर में किसी शूटिंग के सिलसिले में थे, बिना निमंत्रण के ही फेस्टिवल में चले आए.

अब, जिस आयोजन में इतने सारे लेखक आए हों, उसकी भव्यता के बारे में तो कुछ भी कहना गैर ज़रूरी है. इस आयोजन ने न केवल लेखकों को आपस में मिलने-जुलने का और विभिन्न विषयों पर औपचारिक-अनौपचारिक विमर्श करने का अवसर उपलब्ध कराया, साहित्यानुरागियों को भी अपने प्रिय लेखकों से रू-ब-रू होने का अविस्मरणीय अनुभव प्रदान किया.
पांच दिनों तक सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक डिग्गी पैलेस में ही तीन स्थलों पर (और कभी-कभी चार जगहों पर भी) एक-एक घण्टे के सत्र एक के बाद एक चलते रहे. जिसका जहां मन हो जाए. किसी भी सत्र में जाने का मन न हो तो लॉन में, मैदान में कहीं भी बैठ कर गपशप करे. खास बात यह कि तमाम बड़े और स्टार लेखक भी यही करते रहे. इसलिए यह बात बहुत आम रही कि जिस टेबल पर आप बैठें हैं उसके पास वाली टेबल पर चेतन भगत या विक्रम सेठ या तरुण तेजपाल या अशोक वाजपेयी बैठे हैं. कोई औपचारिकता नहीं, कोई रोक-पाबन्दी नहीं. आप का मन हो जिससे बात करें, उसके ऑटोग्राफ लें या उसके साथ फोटो खिंचवाएं. स्कूल कॉलेजों के विद्यार्थी दिन भर लेखकों को घेरे रहते और मुझ जैसे बूढे भी कभी यू आर अनंतमूर्ति तो कभी अशोक वाजपेयी तो कभी गुलज़ार के साथ फोटो खिंचवाते नज़र आते. कार्यक्रम शाम छह बजे बाद भी जारी रहते. एक दिन बाउल गायक थे तो एक दिन फ्यूज़न संगीत. एक शाम प्रसून जोशी और दीप्ति नवल ने अपनी कविताएं भी सुनाईं.

पूरे कार्यक्रम में कहीं भी खास और आम के बीच भेद नहीं था. जहां कुर्सी नज़र आए, बैठ जाएं. कुर्सी न हो तो ज़मीन पर बैठ जाएं, हॉल में न घुस पाएं तो बाहर बड़े-बडे एल सी डी स्क्रीन पर भीतर की कार्यवाही देख लें. एक सत्र में तरुण तेजपाल देर से आए और बिना किसी संकोच के ज़मीन पर बैठ गए. उसी सत्र में तरुण विजय कहीं पीछे ज़मीन पर बैठे थे. न इन लेखकों ने इसे अपना अपमान समझा और न आयोजक इस बात को लेकर अतिरिक्त सजग नज़र आए. यही हाल खाने पीने के दौरान भी रहा. सारे लेखक, चाहे वो विक्रम सेठ हों, गुलज़ार हों, प्रसून जोशी हों, चेतन भगत हो, विलियम डालरिम्पल हों, अशोक वाजपेयी हों, दूसरे तमाम ज्ञात-अज्ञात लोगों के साथ समान भाव से खाते-पीते रहे. आयोजकों की तारीफ इस बात के लिए भी करना ज़रूरी है कि उन्होंने लेखकों के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया. राजस्थान के किसी छोटे-से कस्बे से आने वाले लेखक को भी उसी होटल (पंच सितारा) में ठहराया जहां विक्रम सेठ, चेतन भगत, गुलज़ार, या प्रसून जोशी को ठहराया.

आयोजन के सत्रों में औपचारिकता न्यूनतम थी. माल्यार्पण वगैरह कुछ नहीं. एक दो वाक्यों में पैनल का परिचय और विमर्श शुरू. सत्र एकदम ठीक समय पर शुरू और ठीक वक़्त पर खतम. अगर ऐसी समय की पाबन्दी हमारी ज़िन्दगी में आ जाए, या कम से कम हमारे आयोजनों में ही आ जाए, तो कितना अच्छा हो. पैनल के विचार विमर्श के बाद श्रोताओं को खुली आज़ादी होती कि वे सवाल पूछें.

कुछ लोगों को लगा कि यह आयोजन अंग्रेज़ी की तरफ अधिक झुका हुआ था. हम लोगों का सम्बन्ध भारतीय भाषाओं से है इसलिए स्वाभाविक है कि हम ऐसे आयोजनों में उनकी अधिक सहभागिता की अपेक्षा करते हैं. अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति की वजह से इस फेस्टिवल में अंग्रेज़ी सहित अंक भारतीय-अभारतीय भाषाओं की मौज़ूदगी थी, इसलिए मुझे तो स्वाभाविक ही लगा कि हिन्दी, बांगला, उर्दू,राजस्थानी वगैरह के हिस्से में एक दो तीन सत्र ही आ पाए. लेकिन अगर भारतीय भाषाओं की सहभागिता और बढाई जाए तो अच्छा ही रहेगा.

आयोजन को सफल बनाने में नमिता गोखले और टीम वर्क के संजॉय रॉय जिस तरह जुटे रहे, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है. कुल मिलाकर, यह फेस्टिवल मुझ जैसे साहित्य प्रेमी के लिए तो किसी बहुत बड़ी दावत की मानिन्द था. एक ऐसी दावत, जिसका ज़ायका बहुत लम्बे समय तक मुंह में बना रहेगा.

आयोजन के कुछ फोटो यहां देखें:
http://picasaweb.google.com/dpagrawal24/JaipurLiteratureFestival?authkey=BbkqVwzdw8c#










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Sunday, January 25, 2009

युवा लेखक का पहला उपन्यास

दिल्ली में जन्मे 24 वर्षीय करण महाजन स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि अर्जित करने के बाद अब उस ब्रुकलिन शहर में रहते हैं, जहां, उन्हीं के शब्दों में, हर कोई या तो लेखक है, या शिशु या दोनों ही. हाल ही में फेमिली प्लानिंग शीर्षक से उनका पहला उपन्यास आया है, जिसकी खूब चर्चा और सराहना से उत्साहित हो अब वे अपनी दूसरी किताब पर काम कर रहे हैं. अपने इस पहले उपन्यास के लिए करण ने एक करोड़ की आबादी वाले दिल्ली शहर को केन्द्र बनाया है. इसके बहुत सारे हाई वे और ओवर पास कथानायक राकेश आहूजा ने बनवाये हैं. राकेश, जो इंजीनियर हैं और शहरी विकास मंत्री भी. जितने उत्पादक वे अपने विभाग में हैं, उससे कम अपने घर में नहीं हैं. उनके तेरह बच्चे हैं और चौदहवां आने वाला है. राकेश की पहली पत्नी का निधन अमरीका में एक वाहन दुर्घटना में हो गया था और दूसरी पत्नी संगीता, हालांकि उनकी मन वांछिता नहीं है, फिर भी उनके तेरह बच्चों की मां है. सबसे बड़ा बेटा सोलह वर्षीय अर्जुन मंत्री जी की पहली पत्नी की संतान है.

उपन्यास की शुरुआत एक रोचक दृश्य से होती है. अर्जुन अपने पिता को गर्भवती मां के साथ प्रणय रत देख लेता है. हालांकि वह उन्हें महज़ 1.67 सेकण्ड के लिए देखता है, लेकिन अब तक प्रणय के बारे में उसने जो भी जाना है, खास तौर पर अमरीका के माध्यम से, वह सब झन्न से टूट-बिखर जाता है. अर्जुन अपने पिता से सीधे पूछता है, “आप और मां लगातार बच्चे क्यों पैदा किए जा रहे हो?” इस सवाल से हतप्रभ पिता राकेश कुछ सोच कर जवाब देते हैं, “बेटा, मैंने तुम्हें योगराज कमीशन की रिपोर्ट के बारे में बताया तो था. फिर? तुम तो जानते ही हो कि मैं धर्मान्ध नहीं हूं लेकिन आयोग ने जो कुछ कहा वह सौ फीसदी स्पष्ट है. हमें देश में ज़्यादा हिन्दुओं की ज़रूरत है.” बेटा तिलमिलाकर सवाल करता है, “तो मैं, बल्कि हम सब, आपके लिए सिर्फ राजनीतिक मोहरे हैं?” बाप सफाई देते हुए कहता है, “ नहीं, बेटा. लेकिन तुम तो जानते ही हो कि ये लोग.... इनके तो एक से ज़्यादा बीबियां होती हैं और इनके परिवार बढते रहते हैं, जबकि.....” अर्जुन तल्खी से पूछता है, “क्या आपको मेरा नाम भी याद है?”

लेकिन यह इस उपन्यास का एक पक्ष है. लेखक बहुत कौशल से अर्जुन के इस सवाल के बहाने राकेश को उसके अतीत में ले जाता है. वह याद करता है कि कैसे उसे चालाकी से वर्तमान पत्नी के साध बांध दिया गया था. इस स्मृति और बेटे के सवाल से व्यथित हो वह अपने मंत्री पद से इस्तीफा दे देता है. वैसे इस्तीफा उसके लिए कोई नई बात नहीं है, वह पहले भी 62 बार इस्तीफा दे चुका है. जितनी दुश्वारियां उसकी ज़िन्दगी में है, उनसे कम इस उपन्यास के अन्य पात्रों की ज़िन्दगी में नहीं हैं. राकेश की गर्भवती पत्नी संगीता बहुत दुखी है. वजह यह कि उसके प्रिय सीरियल का नायक मर गया है. न केवल संगीता, बल्कि देश भर की औरतें शोक में डूबी हैं और उन्होंने एक राष्ट्र व्यापी हड़ताल की धमकी तक दे रखी है. उधर अर्जुन अपनी स्कूल बस की खूबसूरत सहयात्री आरती को अपने रॉक बैण्ड की कथाएं सुना कर लुभाना चाहता है, लेकिन दिक्कत यह कि उसका कोई रॉक बैण्ड है ही नहीं.

राकेश की घरेलू और राजनीतिक ज़िन्दगी के हास्यास्पद प्रसंग इन सारे किरदारों की ज़िन्दगी की दुश्वारियों की विडम्बना को और गहरा जाते हैं. राकेश आहूजा की सरकार की करतूतें, उसकी पत्नी की टूटी-फूटी अंग्रेज़ी, और बेटे की संगीत विषयक हरकतें उपन्यास में हास्य के गहरे रंग भरती हैं. कथा बहु आयामी है. उपन्यास के ट्रेज़ेडी-कॉमेडी के सुविचारित मेल को इसकी सधी हुई भाषा और ज़्यादा प्रभावोत्पादक बनाती है. एक उदाहरण देखें. लेखक दिल्ली के भीषण ट्रैफिक का वर्णन करते हुए कहता है, “वे लोग कारों के अंतहीन काफिले में शरीक थे, वह काफिला जो फेफड़ों के कैंसर की धीमी तीर्थ यात्रा पर था.” इसी तरह वह युवा अर्जुन की सांगीतिक ‘प्रतिभा’ को इस तरह व्यक्त करता है: “उसकी आवाज़ ठीक वैसी ही थी जैसी कि किसी बड़े बांध से पानी के पहले रिसाव की होती है. वह भयावह थी क्योंकि यह तो शुरुआत थी और उसका भीषण रूप अभी शेष था.”

उपन्यास पढते हुए यह कहीं भी नहीं लगता कि यह एक 24 वर्षीय रचनाकार की कृति है, और वह भी प्रथम कृति. अपने व्यंग्यात्मक लहज़े और जीवन के मार्मिक क्षणों की अचूक पकड़ के कारण इसे भुला पाना कठिन है. यही है इसकी सफलता का राज़.
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Discussed book:
Family Planning (A Novel)
By Karan Mahajan
Published by Harper Collins Publishers
288 pages
US $ 13.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 25 ज़नवरी 2009 को प्रकाशित.









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Sunday, January 11, 2009

निजी भी राजनीतिक भी

तेहरान के एक पूर्व मेयर और शाह के शासन काल में ईरानी संसद की पहली महिला सांसद निज़हत नफीसी की बेटी अज़र नफीसी की संस्मरणात्मक किताब थिंग्ज़ आई हैव बीन साइलेण्ट अबाउट प्रकाशित होते ही चर्चा में आ गई है. इन्हीं अज़र नफीसी की 2003 में आई पिछली किताब रीडिंग लोलिता इन तेहरान की पन्द्रह लाख प्रतियां बिकी थीं और उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समकालीन क्लासिक माना गया था. अपनी इस नई किताब में अज़र ने बदलते हुए ईरान में तनाशाह मां के साथ बड़े होने का मर्मस्पर्शी वर्णन किया है.

किताब का स्वर साहित्य की विमुक्तकारी भूमिका की प्रशस्ति का है. प्रारम्भिक पन्नों से यह आस जगने लगती है कि लेखिका अपने जीवन के बारे में कुछ सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करेगी, लेकिन जैसे-जैसे आगे पढते हैं, हम पाते हैं कि उनकी रुचि सनसनी पैदा करने में नहीं बल्कि अपनी डिफिकल्ट मां के साथ अपने विक्षोभपूर्ण रिश्तों के बयान और उनके विश्लेषण में है. ईरान की सब कुछ को गोपन रखने की संस्कृति का अतिक्रमण करते हुए वे यह कहते हुए सब कुछ खोलती हैं कि “मां के बारे में अब सब कुछ लिखकर और अपनी चुप्पी तोड़कर मैं प्रतिरोध का एक और प्रयास कर रही हूं.” लेखिका यह कहना भी नहीं भूलतीं कि “जिन सच्चाइयों को हम जानते हैं, अब उनके बारे में चुप नहीं रहा जा सकता”.

तानाशाह मां के प्रति अपनी नाखुशी का इज़हार करते हुए अज़र नफीसी निजी इतिहास को राजनीतिक इतिहास के साथ गूंथती चलती है, और यही बात इस किताब को महत्वपूर्ण बनाती है. असल में मां के प्रति उनका क्रुद्ध और उग्र प्रतिरोध उस इस्लामी सर्व सत्तात्मक निज़ाम के प्रति भी प्रतिरोध है जो 1979 में ईरान में स्थापित हुआ था. वे लिखती हैं, “यह समझने से बहुत पहले ही कि एक निर्मम राजनीतिक सत्ता किस तरह अपने नागरिकों पर सवार होती है और उनकी पहचान और निजता छीनती है, मैंने अपने परिवार के भीतर अपने निजी जीवन में यह महसूस कर लिया था.” वे कहती हैं, “इस्लामी क्रांति के बाद मैं तो मज़ाक में यह कहा करती थी कि हमने तो अपनी मां के साथ रहते हुए खुद को पहले ही ऐसे समय के लिए तैयार कर लिया था.”

अज़र नफीसी को बहुत पहले ही यह भनक पड़ गई थी कि एक दम्पती के रूप में उनके मां-बाप सुखी नहीं हैं. मां और बाप दोनों ही अपने जीवन के बारे में गढी हुई बातें बच्चों को बताते रहे. अज़र नफीसी की मां बुद्धिमती किंतु जटिल व्यक्तित्व वाली थी. महत्व भरी और रोमाण्टिक ज़िन्दगी के उनके अपने सपने पूरे नहीं हो पाये तो उन्होंने अपने, अपने परिवार और अपने विगत के बारे में अनेक खुशनुमा वृत्तांत गढ लिए. अज़र इन वृत्तांतों की हक़ीक़त जानती थी. उधर पिता ने एक दूसरी तरह की किस्सगोई में पलायन कर राहत पाने की चेष्टा की. वे अपने बच्चों को शाहनामा जैसे क्लासिक की कथाएं सुन-सुना कर सुकून पाने लगे. पिता का साहित्यिक रुझान बेटी को विरासत में मिला. अज़र की पूरी सहानुभूति अपने पिता के साथ और खुली नाराज़गी अपनी मां के प्रति किताब के हर शब्द से टपकती है.

साठ के दशक में जब उनके पिता को राजनीतिक कारणों से पांच साल जेल में रहना पड़ा तब किशोरी अज़र को मां के दबाव में अनचाही शादी के लिए तैयार होना पड़ा. ओक्लाहोमा यूनिवर्सिटी में पढते हुए उन्होंने इस पति को तलाक दिया और ईरानी छात्र आंदोलन में कूद पड़ीं. वे कहती हैं, “सत्तर के दशक में विदेश में रह रहे किसी भी ईरानी के लिए सरकार विरोधी होना लाजमी था, लेकिन देश के भीतर स्थितियां भिन्न थीं.” 1979 में, क्रांति के बाद वे अपने नए पति के साथ ईरान लौटीं, लेकिन देश का नया शासन भी बेहतर नहीं था. अज़र और उनके दोस्तों को परेशान किया गया और जेल भी भेजा गया. जब वे तेहरान विश्वविद्यालय में पढ़ा रहीं थी तब उन्हें बुर्क़ा न पहनने के ज़ुर्म में नौकरी से हटाया गया. यह अलग बात है कि इसके बावज़ूद उन्होंने निजी अध्ययन समूह बनाकर वैकल्पिक तरीकों से अध्यापन ज़ारी रखा. अंतत: 1997 में उन्होंने देश छोड़ दिया.

अज़र के लिए लेखन प्रतिरोध का एक सशक्त माध्यम है. प्रतिरोध, चाहे दमनकारी शासन के प्रति हो या दमनकारी मां के प्रति.


Discussed book:
Things I’ve Been Silent About
By Azer Nafisi
Published by Random House Publishing Group
368 pages, Hardcover
US $ 27.00

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे पाक्षिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 11 जनवरी, 2009 को प्रकाशित.








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Sunday, December 28, 2008

दासता का एहसान

1993 की नोबल पुरस्कार विजेता टॉनी मॉरिसन अपने लेखन में बार-बार यह कहती रही हैं कि अमरीकी साहित्य और इतिहास उसकी अश्वेत जनसंख्या के निषेध पर निर्मित है और अमरीकी राष्ट्र की नींव श्वेत-अश्वेत के बीच की ‘हम’ और ‘वे’ की खाई पर टिकी है. ऐसे में यह बात अतिरिक्त महत्व अर्जित कर लेती है कि उन का नया उपन्यास अ मर्सी ( A Mercy) ठीक उसी सप्ताह में प्रकाशित हुआ है जिस सप्ताह में अमरीका ने अपने राष्ट्रपति के रूप में एक ऐसे शख्स को चुना जो इस खाई को नकारता नज़र आता है.

टॉनी मॉरिसन का यह उपन्यास अ मर्सी उनके बहु-प्रशंसित और पुलिट्ज़र विजेता उपन्यास बिलवेड (Beloved) से पहले की कथा कहता है. बिलवेड को हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स ने पिछले 25 वर्षों का महानतम उपन्यास घोषित किया है. अ मर्सी की कथा 1682 में शुरू होती है. एक भला व्यापारी जेकब वार्क है. उसके पास एक फार्म है जिससे उसे कोई खास मुनाफा नहीं हो रहा है. वह एक तम्बाकू खेत मालिक डी’ओर्टेगा से अपना कर्ज़ा वसूलने मेरीलैण्ड जाता है. ओर्टेगा कर्ज़ा चुकाने में असमर्थ है इसलिए वह अपने दो दर्ज़न गुलाम जेकब वार्क के सामने कर देता है. वार्क को यह अच्छा तो नहीं लगता लेकिन फिर भी दयावश वह एक छोटी लड़की फ्लोरेंस को चुन लेता है. उसकी यह दया ही उपन्यास का शीर्षक है. फ्लोरेंस पर दया उसकी मां ने भी की है, कि उसे ओर्टेगा के खेतों की क्रूरता से निकालकर वार्क के खेतों की अपेक्षाकृत आसान ज़िन्दगी प्रदान की है. मेरीलैण्ड गया हुआ जेकब यह सोचता है कि ओर्टेगा के पास इतना बड़ा घर और इतने उम्दा कपड़े क्यों है और क्यों वह अभावों में जी रहा है. इसी सवाल से उसे नई भावी अर्थव्यवस्था का सूत्र मिलता है. नई गुलाम श्रम व्यवस्था का. वह भी बारबाडोस के खेतों में निवेश करता है. उसका यह कृत्य प्रतीकात्मक रूप से इतिहास का वह क्षण है जब अमरीका सुदूर प्रांतों में गुलाम श्रमिकों के माध्यम से पूंजीवाद के डैने पसारने लगता है. (आज के आउटसोर्सिंग में भी इसकी अनुगूंज सुनी जा सकती है!). अपने प्रयत्न में उसे सफलता मिलती है. जब वह मरणासन्न है तो उसकी पत्नी रेबेका तीन लड़कियों की मदद से उसका करोबार संभालने के प्रयास में है. असली कथा तो इन तीन लड़कियों और रेबेका की ही है. मॉरिसन ने जैसे इन चार स्त्रियों में ही देश की उम्मीद के दीदार किए हैं.

ये चारों स्त्रियां अलग-अलग तरह से गुलाम हैं. इंग़लैण्ड से आई रेबेका को नौकर, वेश्या और पत्नी में से एक विकल्प चुनना था और उसे अंतिम विकल्प सबसे सुरक्षित लगा. लीना का पूरा परिवार उसके बाल्यकाल में ही प्लेग का शिकार हो गया था और रखैल बनकर उसने अपने जीवन को जैसे-तैसे स्थिर किया है. एक जहाज पर पली बढ़ी, कम अक्ल वाली सोरो, और फ्लोरेंस, जिसने एक गुलामी का त्याग करके दूसरी गुलामी का वरण किया. उपन्यास की धुरी है रेबेका. शेष चारों स्त्रियों के किरदार उसी की धुरी पर घूमते हैं. उसके बिना इन चारों लड़कियों का कोई ठिकाना नहीं होता और अगर ये लड़कियां न होतीं तो रेबेका कभी की मर गई होती. इस तरह स्वामी-दास के रिश्तों और स्त्रियों की अंतर्निर्भरता के इस विरोधाभास के माध्यम से टॉनी ने जैसे अमरीकी इतिहास को ही साकार कर दिया है. कथा का एक और आयाम है फ्लोरेंस का एक अफ्रीकी लुहार के प्रति अनुराग. इस लुहार को वार्क ने अपना नया घर बनाने के लिए नौकर रखा है. इस लुहार के लिए टॉनी लिखती हैं, “वह शादी कर सकता था, अपनी चीज़ें रख सकता था, यात्रा कर सकता था और अपना श्रम बेच सकता था.” यानि वह पूरी तरह से आज़ाद था. यह बात रेखांकनीय है कि टॉनी ने एक पूरी तरह मुक्त व्यक्ति के रूप में एक अफ्रीकी का सृजन कर दास-स्वामी की रूढ छवि को तोड़ा है. यह भी गौर तलब है कि यह अफ्रीकी लुहार चीज़ों को ढालता, बनाता और संवारता है. जैसे वह मानवता का लुहार है.

टॉनी कथा कहने के लिए रूढ शिल्प का प्रयोग नहीं करतीं. यहां उन्होंने हर किरदार को एक अध्याय दिया है और वे बहुत कम एक दूसरे के सामने आए हैं. उपन्यास एक तरह से मौखिक इतिहास की शक्ल में उभरता है. अपने काव्यात्मक और अनेकार्थी गद्य तथा बेहद प्रभावशाली ब्यौरों के कारण भी यह उपन्यास हमें अभिभूत करता है.

Discussed book:
A Mercy
By Toni Morrison
Published by Knopf
Hardcover, 176 pages
US $ 23.95

राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में मेरे साप्ताहिक कॉलम किताबों की दुनिया के अंतर्गत 28 दिसम्बर, 2008 को प्रकाशित.









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