Wednesday, February 6, 2008

उलझा-उलझा है भाषाई परिदृश्य

सन्दर्भ : अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष
18 मई 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2008 को अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की. विश्व संस्था का यह निर्णय उसके इस सोच को पुष्ट करता है कि भाषाओं की असल बहुलता के द्वारा ही अनेकता में एकता की रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय समझ का विकास सम्भव है. इसी सन्दर्भ में यूनेस्को के महानिदेशक मात्सुरा कोईचोरो का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि भाषाओं की जितनी अहमियत वैयक्तिक अस्मिता के लिए है उतनी ही शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए भी है. उनके कथन की महता इस बात से और भी बढ जाती है कि यूनेस्को को ही अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष विषयक गतिविधियों के समन्वय का दायित्व सौंपा गया है. हम भी अगर भाषाओं की महत्ता पर विचार करें तो पाएंगे कि साक्षरता और शिक्षा की तो कोई कल्पना ही भाषा के बिना समभव है. आखिर शिक्षक भाषा के बिना अपनी बात कह ही कैसे सकता है?
अगर हम भाषाओं के महत्व पर थोडी और गहराई से विचार करें तो पाते हैं कि व्यक्तियों और समूहों की पहचान बनाये रखने में भी भाषाओं की बडी भूमिका होती है. सांस्कृतिक वैविध्य की कोई भी परिकल्पना भाषाई विविधता के बिना असम्भव है. लेकिन, बावज़ूद इस सच्चाई के, दुखद तथ्य यह है कि दुनिया में बोली जा रही लगभग सात हज़ार भाषाओं में से आधी से अधिक तो आगामी कुछ सालों में ही विलुप्त हो जाने वाली है. 1996 में पहली बार प्रकाशित ‘विलुप्त होने के कगार पर दुनिया की भाषाओं का एटलस’ में इस समस्या को बखूबी उभारा गया है. यह भी एक दुखद तथ्य है कि अभी हमने जिन सात हज़ार भाषाओं का ज़िक्र किया उनमें से एक चौथाई से भी कम का प्रयोग स्कूलों वगैरह में होता है और हज़ारों भाषाएं ऐसी हैं जो वैसे तो दुनिया की आबादी के एक बडे हिस्से की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शरीक हैं लेकिन शिक्षा व्यवस्था, संचार तंत्र, प्रकाशन जगत आदि से पूरी तरह अनुपस्थित हैं. शायद यही वजह है कि यूनेस्को के महानिदेशक ने कहा है कि इस मुद्दे पर गहनता से विचार करते हुए हमें एक ऐसी भाषा नीति की तरफ बढना चहिए जो प्रत्येक भाषाई समूह को इस बात के लिए प्रेरित करे कि वह प्रथम भाषा के रूप में अपनी मातृ भाषा का व्यापकतम प्रयोग तो करे ही, साथ ही किसी क्षेत्रीय अथवा राष्ट्रीय भाषा को भी सीखे और अगर सम्भव हो तो एक या अधिक अंतर्राष्ट्रीय भाषा का भी ज्ञान प्राप्त करे. उन्होंने यह भी सलाह दी है कि एक वर्चस्वशाली भाषा के प्रयोक्ताओं को किसी अन्य क्षेत्रीय या राष्ट्रीय भाषा को भी सीखना चाहिए. आखिर भषाओं की बहुलता के द्वारा ही तो सभी भाषाओं के अस्तित्व की रक्षा की जा सकेगी.
संयुक्त राष्ट्र संघ और उसके घटक यूनेस्को के ये विचार बहुत ही सदाशयतापूर्ण हैं. इनके पीछे की पवित्र भावनाओं से भी भला कोई असहमति हो सकती है? लेकिन हो गई. जहां दुनिया के ज़्यादातर देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इस विचार का स्वागत करते हुए उसके साथ सहयोग करने का इरादा ज़ाहिर किया वहीं दुनिया के चौधरी अमरीका ने एक विवादी स्वर लगा दिया. विश्व संगठन में अमरीकी राजदूत ने बुश प्रशासन के इस दावे को आधार बनाते हुए कि भाषा कोई विज्ञान द्वारा पुष्ट तथ्य नहीं अपितु एक सिद्धांत मात्र है, और खुद राष्ट्रपति बुश यह मानते हैं कि ईश्वर ने मात्र छह दिनों में अंग्रेज़ी का निर्माण किया था, इस प्रस्ताव से अपनी असहमति की घोषणा कर डाली. अमरीका सरकार की असहमति के मूल में उसकी यह आशंका भी है कि उसके किसी बहु-देशीय संधि में शरीक होने से दुनिया में अंग्रेज़ी के प्रसार को अघात पहुंचेगा. और इस नेक इरादे से अपनी असहमति ज़ाहिर करने वाला अमरीका अकेला देश नहीं है. यूनेस्को में अरबी बोलने वाले प्रतिनिधियों ने भी इसी तरह हिब्रू का विरोध कर इस प्रस्ताव की क्रियान्विति में अडंगा लगाया. और ऐसा ही कुछ किया कोरियाई प्रतिनिधियों ने भी.
वैसे, अगर अतीत की तरफ झांकें तो हम पाते हैं कि भाषाओं के मामले में खुद संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका भी प्रशंसनीय नहीं रही है. जब चीन में दूसरी भाषाओं को कुचला जा रहा था तो संयुक्त राष्ट्र संघ मौन दर्शक था. जब पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने सिंधी बोलने वालों को देखते ही गोली मार देने के आदेश दिये तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं समझी. ऐसा ही उसने फ्रांस द्वारा अंग्रेज़ी पर रोक के वक़्त भी किया. वैसे भी, जिस संयुक्त राष्ट्र संघ के देखते-देखते यूरोपीय संघ अपनी 23 आधिकारिक भाषाओं के बावज़ूद अपना ज़्यादा काम अंग्रेज़ी में करता है, और खुद यह विश्व संगठन लगभग सारा ही काम अंग्रेज़ी में करता है, वही जब भाषाओं की बहुलता की बात करता है तो आश्चर्य होता है.
लेकिन अगर आप आशावादी हों, और किसी की नीयत पर सन्देह करने के शौकीन न हों तो यह भी सोच सकते हैं कि सुबह का भूला संयुक्त राष्ट्र संघ अब शाम को घर लौट रहा है. वह कम से कम अब तो अंग्रेज़ी के दिग्विजय अभियान को रोकना चाहता है. यूनेस्को ने तो यह भी कहा है कि वह दुनिया की उन गडबडी वाली जगहों पर अपने नीले हेलमेट वाले संयुक्त राष्ट्रीय भाषाई रक्षक तैनात करेगा जहां जबरन दूसरी भाषाओं का दमन किया जाता है, जैसे आयरलैण्ड में जहां हालांकि सरकारी भाषा आयरिश है लेकिन नये नागरिकों पर बलात अंग्रेज़ी लादी जा रही है.

इसी उथल-पुथलभरे वैश्विक परिदृश्य के साथ ही आइये, ज़रा भारत के भाषाई परिदृश्य का भी जायज़ा ले लें. संविधान ने हमारे यहां दो राज भाषाओं – हिन्दी और अंग्रेज़ी- को मान्यता दे रखी है. इनके अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में 18 और भाषाएं भी सूचीबद्ध हैं. राजस्थानी जैसी महत्वपूर्ण भाषा अभी भी इस अनुसूची में प्रवेश पाने के लिए संघर्षरत है. इनके अलावा, 418 और ऐसी सूचीबद्ध भाषाएं हैं जिनमें से प्रत्येक के बोलने वालों की संख्या कम से कम दस हज़ार है. हमारा सरकारी रेडियो – आकाशवाणी 24 भाषाओं और 146 बोलियों में प्रसारण करता है. कम से कम 34 भाषाओं में हमारे यहां अखबार छपते हैं और 67 भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा दी जाती है. संविधान सभी नागरिकों को उनकी भाषा के संरक्षण का अधिकार देते हुए सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि की शैक्षिक संस्था चुनने का अधिकार प्रदान करता है. लेकिन ये सारे तथ्य और आंकडे उस वक़्त किताबी लगते हैं जब हम यह देखते हैं कि बहु भाषा भाषी हमारे देश में ही कम से कम 1600 भाषाएं और बोलियां ऐसी हैं जिन्हें लोग अपनी मातृ भाषा के रूप में तो प्रयुक्त करते हैं लेकिन जिन्हें किसी भी तरह का वैधानिक या सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं है.
भाषाई आधार पर हुए राज्यों के पुनर्गठन पर अब भी सवालिया निशान लगाए जाते हैं. इसी के साथ भाषाओं को लेकर हुए हिंसक विवादों को भी भुलाया नहीं जा सकता. दक्षिण के कतिपय इलाकों में हुआ हिन्दी का तथाकथित उग्र विरोध और एक दूसरे समय में उत्तर भारत में तेज़ी से फैला अंग्रेज़ी हटाओ आन्दोलन आज भी लोगों की स्मृतियों में है. भाषाओं को लेकर वैसा उत्तेजक माहौल आज भले ही न हो, जानने वाले जानते हैं कि आज भारत में हर बडी भाषा अपनी से छोटी भाषा का अधिकार छीन-हडप रही है. ऐसा करने में शीर्ष पर है अंग्रेज़ी. कहने को यह देश की दो राज भाषाओं में से एक है लेकिन कभी-कभी लगता है कि असल राज भाषा तो यही है. इस देश में अंग्रेज़ी जाने बगैर आपका कोई अस्तित्व ही नहीं है. कोई छोटी से छोटी सरकारी नौकरी आपको अंग्रेज़ी ज्ञान के बगैर नहीं मिल सकती. जबकि दूसरी राजभाषा हिन्दी के साथ ऐसा नहीं है. अगर आप हिन्दी नहीं भी जानते हैं तो कोई बात नहीं. बल्कि बहुतों के लिए तो हिन्दी न जानना गर्व का कारण होता है. इधर वैश्वीकरण और उदारीकरण के चलते और दुनिया के सपाट होते जाने के कारण अंग्रेज़ी का वर्चस्व और बढता जा रहा है. रही सही कसर सूचना प्रौद्योगिकी ने पूरी कर दी है. लोगों ने मान लिया है कि वहां तो अंग्रेज़ी के बिना काम चल ही नहीं सकता, और बिना सूचना प्रौद्योगिकी के आज की दुनिया में जीना बेकार है. हालांकि दोनों ही बातें सच से बहुत दूर हैं. सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने की भी पूरी सुविधाएं हैं, और भारत जैसे धीमी गति और संतोषी मानसिकता वाले देश में द्रुतगामी सूचना प्रौद्योगिकी जीवन शैली का हिस्सा बनेगी, इसमें अभी काफी वक़्त लगेगा.
लेकिन अंग्रेज़ी हमारे मन मष्तिष्क पर बुरी तरह हावी है. हमारे फिल्मी सितारे काम भले ही भाषाई फिल्मों में करें, बात अंग्रेज़ी में ही करना पसन्द करते हैं. नेता लोग चुनाव के वक़्त भले ही हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाएं काम में ले लें, अपने प्रभाव स्थापन के लिए टूटी-फूटी और हास्यास्पद ही सही अंग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते दिखाई सुनाई देते हैं. समाज का प्रभु वर्ग अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों में ही भेजता है. यहां तक कि जो लोग परम्परा, धर्म, संस्कृति वगैरह की कमाई खाते हैं वे भी अपने बच्चों का भविष्य अंग्रेज़ी में ही देखते हैं. निश्चय ही यह मनोवृत्ति हिन्दी सहित तमाम देशी भाषाओं के लिए घातक सिद्ध हो रही है. इनका विकास अवरुद्ध हो रहा है, और इनके प्रयोक्ताओं की संख्या निरंतर घटती जा रही है. हिन्दी की स्थिति तो फिर भी ठीक है, लेकिन जिन भाषाओं या बोलियों को बोलने वाले कम हैं उनके अस्तित्व पर मण्डराते खतरों को साफ देखा जा सकता है.
ऐसे में एक तरफ जहां संयुक्त राष्ट्र संघ की इस सदाशयता पूर्ण पहल का महत्व समझ में आता है वहीं दूसरी तरफ लुप्त होती जा रही भाषाओं की स्वाभाविक परिणति सांस्कृतिक वैविध्य की क्षति चिंतित भी करती है. चिंताजनक बात यह भी है आज भाषाएं किसी के भी एजेण्डा में नहीं हैं. कहीं हम भाषा विहीन भविष्य की तरफ तो नहीं बढ रहे हैं?
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Sunday, February 3, 2008

जोडने वाला पुल

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


भारत में रहकर इतना पता नहीं चलता कि तकनीक किस तरह और किस हद तक आपके जीवन को बदल रही है, जबकि परिवर्तन वहां भी कम नहीं हुए हैं. मेरी पीढी के लोगों की स्मृति में वह ज़माना ताज़ा ही है जब टेलीफोन एक विलासिता की चीज़ हुआ करता था और उसके बदसूरत काले चोगे को उठाकर दूसरी तरफ से आने वाली ऑपरेटर की ऊबी हुई, कर्कश आवाज़ में 'नम्बर प्लीज़' की प्रतीक्षा करनी होती थी. प्रतीक्षा इसलिए कि यह क़तई ज़रूरी नहीं था कि ड्यूटी के समय भी ऑपरेटर महोदय/महोदया अपनी सीट पर हों ही. उनका चाय पान या गप्प गोष्टी में व्यस्त होना अपवाद से अधिक नियम ही हुआ करता था, और तब बन्दा कर भी क्या सकता था इंतज़ार करने के सिवा. उस ज़माने में, जो अभी भी ज़्यादा पुराना नहीं हुआ है, यह भी आम ही था कि आप डाकतार विभाग के पीसीओ में जाकर ट्रंक काल बुक करवाते थे और आपका कॉल 6-8-10-20 घण्टे में लगता था, नहीं भी लगता था. तब संचार का मुख्य माध्यम चिट्ठियां हुआ करती थीं. टेलीग्राम तो किसी इमर्जेंसी में ही दिया जाता था. 'तार वाला' सुनते ही कलेजा धक्क से बैठ जाया करता था, कहीं कोई बुरी खबर न हो! और इस बात को भी कितने दिन बीते हैं कि टीवी का केवल एक ही चैनल हुआ करता था, वह भी श्वेत-श्याम, और उस पर कृषि दर्शन जैसे विकासात्मक कार्यक्रमों के बीच एकमात्र आकर्षण हुआ करता था सप्ताह में एक या दो बार आने वाला चित्रहार. और ऐसी ही कितनी ही बातें. कितनी तेज़ी से बदला है हमारा चतुर्दिक !

लेकिन भारत से अमरीका आकर, यहां की ज़िन्दगी देख कर लगा कि अभी तो बहुत कुछ बदलना शेष है हमारे यहां. ऐसा नहीं है कि हम पिछड़े हुए हैं, हमने तरक्की नहीं की है. मैं तो मात्र यह कहना चाह रहा हूं यहां बहुत कुछ ऐसा है जो अभी हमारे यहां नहीं है. चाहें तो यह समझ लें कि तकनीक के लिहाज़ से हमारी तरक्की की रफ्तार धीमी है. यह अमरीका में ही पता चलता है कि तकनीक ने किस तरह लोगों की ज़िन्दगी को बदला है.
इस लेख में मेरा लक्ष्य सारे तकनीकी परिवर्तनों को सूचीबद्ध या चिह्नित करना नहीं है. न तो यह सम्भव है और न मैं इसके लिए योग्य हूं. मैं तो केवल इतना कर रहा हूं कि अमरीका में तकनीक के क्षेत्र में जो मुझे अच्छा व नया लगा, उसका वर्णन कर रहा हूं. तकनीक के साथ जो दूसरे बहुत सारे मुद्दे जुड़े हुए हैं उनके विस्तार में जाने का का यह उपयुक्त स्थान नहीं है, इसलिये उन पर चर्चा फिर कभी.

पिछले तीन-चार दशकों में कम्प्यूटर ने सारी दुनिया में बड़े और क्रांतिकारी बदलाव किए हैं. अब यही देखिये कि भारत में ही यह किसने सोचा था कि आप जैसलमेर में बैठकर जमशेदपुर से कन्याकुमारी तक का रेल आरक्षण करवा सकेंगे? यह कल्पना अब एक ऐसी हक़ीक़त बन गई है कि किसी का इस पर ध्यान तक नहीं जाता. यह कमाल कम्प्यूटर और इण्टरनेट का है. बावज़ूद इसके कि भारत में अभी भी कम्प्यूटर आम नहीं खास ही है और इण्टरनेट की गति अभी भी बैल गाड़ी वाली ही है. यहां अमरीका में और वह भी माइक्रोसॉफ्ट के मुख्यालय वाले शहर रेडमंड (सिएटल) में और यहां भी सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स के साथ रहते हुए कम्प्यूटर और इण्टरनेट के जो उपयोग देखे उनसे मैं एक साथ ही चकित और आह्लादित दोनों ही हुआ. यह जैसे हमारे आने वाले कल की एक झलक थी मेरे लिये.

यहां कागज़-कलम तो जैसे अब अजायबघर की चीज़ हो गए हैं. सारा ही काम कम्प्यूटर पर हो जाता है. अगर कभी लिखने की तलब भी हो तो डिजी पेन (Digi-pen) से कम्प्यूटर के स्क्रीन पर ही लिख लिया जाता है. आपको दफ्तर छुट्टी की अर्जी भेजनी है, ई-मेल कर दिया. पार्टी का निमंत्रण देना, उस निमंत्रण को स्वीकार-अस्वीकार करना है, ई मेल सेवा चौबीसों घण्टे हाज़िर है. डाकिये की प्रतीक्षा बीते ज़माने की बात हो गई है. घर का सारा हिसाब-किताब, सारा रिकार्ड, सारे दस्तावेज़ों की शरणगाह कम्प्यूटर है. इस कम्प्यूटर ने आपकी स्मृति से बहुत सारा दायित्व लेकर अपने ऊपर ओढ़ लिया है. मित्रों-रिश्तेदारों के जन्म-दिन वगैरह आप क्यों याद रखें? कम्प्यूटर जी हैं न आपकी इस सेवा के लिये. बल्कि, आप अगर चाहें तो साल-छह महीने पहले ही, जब भी आपको फुर्सत हो, ई-कार्ड ही कम्प्यूटर में फीड करके रख दें. कम्प्यूटर स्वतः यथासमय उन्हें प्रेषित कर देगा. वह आपको यह भी बता देगा कि आपका कार्ड कब देखा गया.

दरअसल अमरीका में कम्प्यूटर विलासिता या सुविधा की चीज़ न रहकर ज़रूरत की चीज़ बन गया है. नित नए शोध और त्वरित विकास के कारण उसकी कीमत भी अब आम आदमी की पहुंच से बाहर नहीं रह गई है. ऊपर से इंटरनेट की सुलभता व तेज़ गति. वस्तुतः इण्टरनेट की जितनी तेज़ गति यहां है उसकी भारत में रहकर कल्पना भी नहीं होती. सोने पर सुहागा, वायरलेस कनेक्टिविटी (Wireless connectivity) यानि बिना तार के ही इण्टरनेट से जुड़ जाने की सुविधा. यह पूरा सिएटल शहर ही वायरलेस इण्टरनेट युक्त है. यानि आप अपना लैप टॉप लेकर शहर में कहीं भी इण्टरनेट का इस्तेमाल कर सकते हैं. अलबत्ता इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. कीमत क्रेडिट कार्ड के माध्यम से ऑन लाइन ही चुका दी जा सकती है. परिणाम यह कि पार्कों में, रेस्तराओं में, शॉपिंग मॉल्स में, पिकनिक स्थलों पर, हवाई अड्डों पर - हर कहीं लोग अपने-अपने लैप टॉप्स पर काम करते नज़र आते हैं. यहां का काफी कुछ, कहें तो सब कुछ, इण्टरनेट पर है. आपको सिनेमा जाना है, नेट पर देख लें शो कितनी बजे शुरू होता है. यह भी कि थिएटर तक पहुंचने का रास्ता क्या है. टिकिट भी नेट पर ही खरीद लें. यहां ज़्यादातर चीज़ों के टिकिट नेट पर खरीदे जा सकते हैं. हम सिएटल से लास वेगस गए आए. वायुयान टिकिट खरीदने कहीं जाना नहीं पड़ा. इण्टरनेट पर ही काम हो गया. वहां के होटल की बुकिंग भी घर बैठे ही नेट से करवा ली. वैंकुवर (कनाडा) में भारतीय फिल्मी सितारों शाहरुख, रानी मुखर्जी, प्रीति ज़िण्टा, अर्जुन रामपाल वगैरह का एक शो देखने गए. टिकिट घर बैठे इण्टरनेट पर खरीदे और प्रिण्टर पर उनके प्रिण्ट निकाल लिए. इतना ही नहीं, घर पर ही यह भी देख लिया पचास हज़ार दर्शकों की क्षमता वाले उस कोलीज़ियम (थिएटर) में हमारी सीटें कहां होंगी. पूरा नक्शा नेट पर था. कनाडा की सड़कों वगैरह के भी विस्तृत मान-चित्र नेट पर थे. हम अपने घर, सिएटल, से कनाडा की सड़कों का पूरा मानचित्र नेट से उतार कर लेकर चले थे और उसी के सहारे बगैर एक भी जगह किसी से पूछे सीधे आयोजन स्थल पर ही पहुंचे.

दुकानों वगैरह में कम्प्यूटर का इस्तेमाल बहुत आम है. बल्कि इस कारण व्यापार-कर्म बहुत सुगम हो गया है. वैसे यह भारत में भी थोड़ा-बहुत हुआ है, खास तौर पर बड़े स्टोर्स में. पर यहां तो बहुत सारी खरीद-फरोख्त इण्टरनेट पर ही हो जाती है. इसमें दो-तीन बातों की बड़ी भूमिका को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. व्यापार यहां एकदम साफ-सुथरा है. यानि जो माल बताया या प्रचारित किया गया है, हू-ब-हू वही आपको मिलेगा. कोई धोखा-धड़ी नहीं होगी. कोई झूठ-फरेब नहीं. मोल-भाव होता नहीं. और इसके बाद भी, पसन्द न आने पर माल वापस लौटाने की खुली सुविधा तो है ही. लोगों के पास समय की भी कमी है. फलतः इण्टरनेट पर व्यापार खूब फल-फूल रहा है. दुकानों में ग्राहकों की सुविधा के लिए भी अनेक कम्प्यूटर लगे रहते हैं.

अमरीका में कम्प्यूटर व इण्टरनेट की सफलता व लोकप्रियता में बहुत बड़ी भूमिका भाषा की भी है. पश्चिम में तकनीक की भाषा अंग्रेज़ी ही है, इसलिए यहां के लोगों को कोई असुविधा नहीं होती. भारत जैसे बहु भाषा-भाषी देश में, जहां अभी शिक्षा का भी ज़्यादा प्रसार नहीं हो पाया है, अंग्रेज़ी का कम्प्यूटर कैसे आम हो सकता है? ऐसा नहीं है कि कम्प्यूटर पर हिन्दीकरण के प्रयास ही नहीं हुए हैं. विश्व की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कम्पनी माइक्रोसॉफ्ट ने अपने बहुत सारे लोकप्रिय सॉफ्टवेयर्स के हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के संस्करण भी बाज़ार में उतारे हैं. पर वे अभी अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाए हैं. अलावा इसके कि खुद भारत के सरकारी तंत्र की कोई गहन रुचि भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने में नहीं है, और इस कारण बाहर की दुनिया भी हमारी भाषाओं को तवज्जोह नहीं देती है, अन्य कई कारण भी हैं कि कम्प्यूटर पर भारतीय भाषाएं आम नहीं हो पा रही हैं. हिन्दी की ही बात लें. अभी तो हिन्दी का कोई मानक तथा सर्वमान्य कुंजी पटल ही नहीं है, हिन्दी फॉण्ट्स की परस्पर परिवर्तनीयता की दिक्कतें हैं, तकनीकी शब्दों के एकरूप हिन्दी पर्याय सुलभ नहीं हैं, आदि. फिर जो आदमी ज़रा-सा भी पढ़ा लिखा है वह भारतीय भाषा की बजाय अंग्रेज़ी का प्रयोग कर अपने 'शिक्षित' होने का परिचय देना चाहता है. ऐसे में कोई भी व्यावसायिक सॉफ्टवेयर कम्पनी भारतीय भाषाओं में सॉफ्टवेयर क्यों बनाए? इस तरह एक दुश्चक्र बन जाता है. अमरीका में इस तरह की दिक्कतें नहीं हैं. और भी बातें हैं. लोगों में परिष्कृत नागरिक बोध है. वे चीज़ों को तोड़ते-फोड़ते या विकृत नहीं करते. इसलिए तकनीक की जन-सुलभता भी सम्भव हो जाती है. लेकिन इसी के साथ यह भी कि यहां चीज़ों का रख रखाव बहुत नियमितता से होता है. अगर सार्वजनिक टेलीफोन या कम्प्यूटर है तो वह चालू तो होगा ही. भारत में यह ज़रा कम देखने को मिलता है. टेलीफोन होता है पर अक्सर खराब. इससे लोगों में खीझ होती है और वह खीझ तोड़फोड़ के रूप में व्यक्त होती है. अमरीका में व्यवस्था का काम करना अपवाद नहीं नियम है. अगर कोई साइट है तो वह अद्यतन तो होगी ही. भारत में अभी यह संस्कृति नहीं है. बहुत सारे विभागों ने अपनी साइट्स तो बना दी है पर सूचनाओं को ताज़ा करने में वे कोई दिलचस्पी नहीं लेते. जन संचार से जुड़े एक बड़े प्रतिष्ठान की साइट देख रहा था. पाया कि सर्वोच्च अधिकारी के रूप में उन भद्र महिला का नाम ही चल रहा है जो छह माह पहले स्थानांतरित होकर जा चुकी हैं. मैंने चाहा कि संस्थान को ई-मेल कर यह संशोधन करवा दूं, तो पता चला कि संस्थान का ई-मेल अकाउण्ट ही सक्रिय नहीं है. यह तो एक नमूना है. वस्तुतः हमने अभी तकनोलॉजी को अपने जीवन का भाग बनाया ही नहीं है. यहां तक कि आप आम तौर पर यह भी उम्मीद नहीं कर सकते कि टेलीफोन करने से ही आपका काम हो जाएगा. आपसे यह अपेक्षा की जाएगी कि आप खुद हाज़िर हों. लुत्फे-मै तुझ से क्या कहूं? हाय कमबख्त तूने पी ही नहीं ! इसी के साथ एक और बात. बहुत मामलों में अमरीकी समाज एक नैतिक समाज है. है या बना दिया गया है. जो हो, इसके सुफल दिखाई देते हैं. यहां पाइरेटेड सॉफ्टवेयर(Pirated Software) का प्रयोग करीब करीब नहीं होता. सॉफ्टवेयर बनाने वालों को अपने किये का पूरा-पूरा प्रतिफल मिलता है, परिणामतः नए-नए सॉफ्टवेयर विकसित होते हैं, इससे प्रयोक्ता को काम करने में आसानी होती है. एक सुचक्र बनता है.
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इसी कम्प्यूटर तथा इण्टरनेट ने और भी अनेक रोचक तथा उपयोगी बदलाव किए हैं. मुझे यहां यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि फिल्म रोल वाले कैमरे अब पूरी तरह लुप्त हो गए हैं. उनकी जगह ले ली है डिजिटल कैमरों ने. न फिल्म खरीदने, लोड करने का झंझट, न उसे डेवलप और प्रिण्ट कराने का. बटन दबाओ और फोटो तैयार. इससे भी आगे, आप खुद कलाकार बन जाएं अगर आपके पास कम्प्यूटर हो. अपने कैमरे से सीधे कम्प्यूटर पर फोटो अपलोड (upload) करें और फिर उस फोटो में मन चाहे सुधार, संशोधन, परिवर्तन कर लें. बहुत ज़्यादा कलात्मक निपुणता होनी भी ज़रूरी नहीं. यह दायित्व सॉफ्टवेयर ही वहन कर लेता है. घर में अगर प्रिण्टर भी हो तो फोटो का प्रिण्ट भी निकाल लें अन्यथा कैमरा या केवल उसकी मेमोरी (माचिस की लम्बाई-चौड़ाई के आकार की एकदम पतली पट्टी) या किसी और माध्यम पर अपनी छवियां ले जाकर प्रिण्ट बनवा लें , बल्कि खुद ही बना लें . अमरीका में तो ऐसी मशीनें जगह-जगह लगी हैं जिन पर आप खुद अपने प्रिण्ट बना सकते हैं. इस डिजिटल तकनीक ने फिल्म रोल वगैरह का झंझट तो खत्म किया ही है, इससे एक बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन यह हुआ है कि बेहतर फोटोग्राफी के लिए आप जितने चाहें उतने फोटो खींच सकते हैं, बिना यह चिंता किए कि फिल्म खर्च हो रही है. जो फोटो अच्छा लगे उसे रख लें, शेष को मिटा दें. परिणाम तत्क्षण देखे जा सकते हैं (कैमरे के पीछे ही छोटा-सा स्क्रीन होता है) इसलिए यह तै करना भी सम्भव है कि एक ही दृश्य को और शूट किया जाए या नहीं.

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कुछ ऐसा ही बदलाव संगीत के क्षेत्र में भी आया है. चलते फिरते संगीत सुनने की सुविधा वॉकमेन ने सुलभ कराई थी. जब संगीत डिजिटल हुआ तो सीडी बजाने वाले डिस्कमैन आ गए. सीडी की ध्वनि निश्चय ही कैसेट की ध्वनि से बेहतर होती है. इस बीच 78 आरपीएम(RPM) के रिकार्ड, तथा ईपी(EP), एलपी(LP) तो गायब ही हो गए. अब आई एक नई तकनीक ने कैसेट या सीडी को भी अप्रासंगिक कर दिया है. आप इण्टरनेट से सीधे ही संगीत खरीद कर उसे अपने प्लेयर या कम्प्यूटर पर सुन तथा सुरक्षित रख सकते हैं. यानि संगीत का संग्रह आपके उपकरण की स्मृति में ही. अलग से कैसेट, सीडी,डीवीडी रखने की आवश्यकता नहीं. फिलहाल तो इससे पायरेसी पर भी नियंत्रण हुआ है. सभी जानते हैं कि पायरेसी संगीत को किस तरह तबाह करने लगी थी. इस नई तकनीक में जो भी संगीत आप डाउनलोड करते हैं उसका मूल्य चुकाना ही होता है. इस तकनीक में संगीत की क्वालिटी बेहतर होती है और उसे संग्रह करने में जगह प्रयुक्त नहीं होती. एक और बड़ी बात यह कि नवींतम संगीत सारी दुनिया में एकसाथ सुलभ हो जाता है. यह नहीं कि आप प्रतीक्षा करें कि आपके म्यूज़िक स्टोर पर नया सीडी आया है या नहीं. और यह भी कि आप केवल अपना मनचाहा संगीत खरीदते हैं. पसन्द का एक गीत खरीदने के लिए पूरा सीडी नहीं खरीदना पड़ता.

एक और बदलाव की चर्चा मैं यहां करना चाहता हूं. वह है पेपर करेंसी (भारतीय भाषा में नोट, अमरीकी अंग्रेज़ी में बिल) का लगभग पूरी तरह विस्थापन. अमरीका में क्रेडिट कार्ड का चलन बहुत अधिक है. दुकानों, सेवाओं, यहां तक कि सरकारी संस्थानों तक में क्रेडिट कार्ड स्वीकार्य हैं. आपको जेब में पैसे रखने की ज़रूरत ही नहीं. दुकानदार को हिसाब किताब करने की ज़रूरत नहीं. सारा काम कम्प्यूटर कर लेता है. इसी वजह से कर चोरी भी नहीं होती.

परिवर्तन और भी बहुतेरे हो रहे हैं. पर अभी वे बहुत लोकप्रिय नहीं हुए हैं. लेकिन एक बात पक्की है. इन सभी परिवर्तनों से मनुष्य का जीवन अधिक सुगम होता जा रहा है. द ग्रेट डिजिटल डिवाइड (The great digital divide) की सारी चर्चाओं तथा इस बात के बावज़ूद कि यह तकनोलॉजी नए सिरे से दुनिया को ‘हैव्स और हैव नॉट्स’ (Haves and have-nots) में बांट रही है, मुझे यह लगता है कि इन परिवर्तनों का लाभ अब जल्दी जल्दी नीचे तक पहुंचने लगा है. तकनोलॉजी अब विलासिता की वस्तु नहीं रह गई है. टेलीफोन करते हुए, मनीऑर्डर भेजते हुए, रेल का आरक्षण कराते हुए, और ऐसे ही बहुत सारे कामों में कतार का आखिरी आदमी भी तकनोलॉजी से लाभान्वित होता है. इस तरह एक अर्थ में तो तकनोलॉजी गरीब-अमीर, विकसित-अविकसित, पूर्व-पश्चिम की खाई को पाट भी रही है. भला ऐसी सकारात्मक और जोड़ने वाली तकनीक का स्वागत कौन न करना चाहेगा?


Saturday, February 2, 2008

बीस साल बाद (व्यंग्य)


सन् 2025 के किसी रविवार की खुशनुमा शाम ! घर में हम दो ही. बच्चे तो वैसे भी बरसों से दूर ही हैं. और यों, रिश्ते में ही बच्चे हैं वे, वरना तो बाल उनके भी सफेद हो चले हैं. पत्नी का मन खाना बनाने का नहीं था तो सोचा कि किसी रेस्तरां से ही कुछ मंगवा लिया जाए. खयाल आया कि सुबह ही अखबार में शहर में एक नए खुले रेस्तरां की धुंआधार तारीफ पढ़ी थी. पहले कई दिन तक इसके आकर्षक विज्ञापन भी मेरा ध्यान खींचते रहे थे. अखबार उठाया, पन्ने पलटे, रेस्तरां का फोन नम्बर देखा और अपने मोबाइल पर वह नम्बर डायल किया.

उधर से एक सुरीली आवाज़ आई, "नमस्कार. रेस्तरां को फोन करने के लिए धन्यवाद. हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?" ऐसी चाशनी में पगी आवाज़ें आजकल आम हैं. आप किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान को फोन करें, फोन में से रस धारा ही बहने लगती है. अब इसका कोई असर भी मुझ पर नहीं होता. मैंने बात को आगे बढ़ने का मौका न देते हुए कहा, " मैं, ऑर्डर देना चाहता हूं." "कृपया अपना कार्ड नम्बर बोलिये"- उधर से घुंघरू खनके. मुझे पहले से पता था. वैसे अब मेरी ज़रूरतें इतनी सीमित हो गई हैं कि बहुत ज़्यादा फोन नहीं करता. लेकिन आजकल कहीं भी फोन कीजिए, यही पूछा जाता है.

जवाब दिया, " जी मेरा नम्बर है नौ तीन शून्य पांच सात दो आठ चार एक सात शून्य तीन दो सात पांच" और मैं आखिरी वाले पांच का च पूरा करूं-करूं, उससे पहले ही उधर से फिर घण्टियां बजीं : " नमस्कार डॉ अग्रवाल! ई- दो बटा दो सौ ग्यारह, चित्रकूट. आपका घर का फोन नम्बर है तीन पांच सात..., दूसरा फोन नम्बर है दो चार आठ... लेकिन इस वक़्त आप अपने मोबाइल से हमें फोन कर रहे हैं, वैसे आपकी पत्नी के पास भी एक मोबाइल है, जिसका नम्बर है...." भद्र महिला इस पुराण को आगे बढ़ातीं इतना धैर्य मेरी जिज्ञासा वृत्ति को मंज़ूर नहीं था. "मेरे बारे में इतनी सारी जानकारियां आपके पास...?"

"हमारे कम्प्यूटर में है यह सब डॉ अग्रवाल." संतूर के तार झंकृत हुए. मुझे आश्चर्य भी नहीं हुआ. आखिर छोटे-से मोबाइल पर भी तो ढेर सारी सूचनाएं आ जाती हैं.

"मैं मसाला डोसा ऑर्डर करना चाहता हूं."

"मत कीजिए!" उधर से आवाज़ आई, गोया किसी ने कंकड़ मारा हो.

"क्यों?"
"हमारा कम्प्यूटर रिकार्ड बताता है कि आपकी उम्र इस समय 82 साल है, आपको हाई ब्लड प्रेशर रहता है, जिसके लिए आप रोज़ दस मिलीग्राम की होपकार्ड लेते हैं, आपका कॉलेस्ट्रॉल लेवल भी बढ़ा हुआ है; तीन साल पहले आपको हार्ट अटैक भी हो चुका है."

"फिर मुझे क्या ऑर्डर करना चाहिये?"

"बेहतर हो आप बेक्ड सलाद डोसा ऑर्डर करें." स्वर में एक ऐसी निश्चयात्मकता थी जो मुझे अच्छी नहीं लगी. आखिर कह ही दिया, "आप सुझा नहीं रही, मेरी तरफ से जैसे आदेश ही दे रही हैं."

देवी जी के पास इसका भी जवाब मौज़ूद था. "आपने दस दिन पहले ही केंद्रीय लाइब्रेरी से चिकनाई रहित पकवानों के किताब इश्यू करवाई थी. उसी से हमें लगा कि आप यह डिश पसन्द करेंगे."

मैं कह भी क्या सकता था सिवा इसके कि "ठीक है, आप मुझे दो बेक्ड सलाद डोसे भिजवा दें. कितना देना होगा?"

कोयल कूकी : "हां श्रीमती अग्रवाल और आपके लिए ये दो डोसे पर्याप्त होंगे. इनका मूल्य होगा ग्यारह सौ अट्ठाइस रूपये."

"धन्यवाद! मैं यह भुगतान अपने क्रेडिट कार्ड से कर दूंगा."

जवाब में उधर की आवाज़ में कुछ और गाढ़ी चाशनी घुली, " जी नहीं. आपको नकद भुगतान करना होगा. आप इस महीने की अपनी क्रेडिट कार्ड लिमिट पहले ही क्रॉस कर चुके हैं, और इस
महीने तो आपको अपना क्रेडिट कार्ड रिन्यू भी करवाना था, जो आपने अभी तक करवाया नहीं है."

"तो ठीक है. मैं ऐसा करता हूं कि आपके डिलीवरी ब्वाय के आने से पहले नज़दीक के एटीएम से पैसे निकाल लाता हूं."

"हमारा कम्प्यूटर बताता है कि आपका खाता यूटीआई बैंक में है और उसके एटीएम से एक दिन में जितनी रकम निकाली जा सकती है उतनी आप आज सुबह ग्यारह बज कर दो मिनिट पर निकाल चुके हैं." कोयल के गले की मिठास थोड़ी कम होने लगी थी. आवाज़ भावहीन तो थी ही.
"आप फिक़्र न करें. डोसे भिजवा दें. मेरी पत्नी के पर्स में इतने रुपये हैं. कितनी देर में भिजवा देंगी?" दरअसल पत्नी सारी बात सुन रही थी, उसी ने इस बीच अपने पर्स की तरफ इशारा कर मुझे प्रेरित किया था यह कहने को.
"ठीक सैंतालीस मिनिट लगेंगे. लेकिन अगर आपको जल्दी है तो आप अपनी वैगन आर में आकर ले जाएं.."

"क्या...!"

"जी, हमारा कम्प्यूटर कहता है कि आपके पास आर जे 14 छह सी 1742 नम्बर की 2001 मॉडल की सफेद वैगन आर है, और यह कल ही गैरेज से सर्विस होकर आई है."

मैं तो अवाक था. क्या कुछ ऐसा भी है जो इनके कम्प्यूटर को पता न हो!

"कोई और सेवा सर?" कोयल के गले में फिर से मिश्री घुलने लगी थी. उसी का फायदा मैंने उठाया. "मैम, क्या आप हमें डोसे के साथ फ्री कोक कैन भी भिजवाएंगी? आपके किसी एड में इसका ज़िक्र था."

"हाँ, आप सही कह रहे हैं डॉ अग्रवाल, लेकिन हमारा कम्प्यूटर कहता है कि आपको तो डायबिटीज़ भी है. इसलिए हम केवल एक कैन ही भिजवाएंगे, श्रीमती अग्रवाल के लिए."

मेरा गुस्सा अपनी हद पार कर रहा था. क्या इनसे मेरा कुछ भी पोशीदा नहीं है? इन्हें मेरी सारी ज़िन्दगी का ब्यौरा रखने का हक़ दिया किसने? गुस्सा तो मुझे कुछ इतना था कि मैं मोबाइल को ज़मीन पर ही पटक डालता, लेकिन उसकी कीमत के खयाल से किया इतना कि बहुत ज़ोर से ऑफ मात्र किया.

मुश्क़िल से दो-एक पल गुज़रे होंगे कि मेरा मोबाइल फिर से घनघनाया. स्क्रीन पर उसी रेस्तरां का नाम चमक रहा था. अब क्या हुआ? जलतरंग बजी. "सर, आपने बहुत गुस्से में अपने मोबाइल को ऑफ किया है. आप हमारे बहुत सम्मानित ग्राहक है, इसलिए हम आपको कहना चाहेंगे कि इस उम्र में इतना गुस्सा आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. हमारा कम्प्यूटर बताता है कि तीन साल पहले आपको जो हार्ट अटैक हुआ था वह भी इसी तरह से गुस्सा होने की वजह से हुआ था. हैव अ नाइस डे सर, एण्ड टेक केयर !"

हद्द है. मैं अपने मोबाइल पर भी अपना गुस्सा नहीं उतार सकता. सोचने लगा, यह हाई टैक ज़माना अच्छा है या मेरी जवानी के दिनों का वह ज़माना अच्छा था जब नुक्कड का पान वाला मेरे बारे में सिर्फ उतना ही जानता था जितना कि उसके और मेरे रिश्तों को बनाये रखने के लिए पर्याप्त था. मसलन, "बहुत दिनों से दिखाई नहीं दिए, कहीं बाहर गये थे क्या?" या "आजकल भाभीजी बच्चों के पास गई हुई लगती हैं." वह ये बातें इसलिए कहता था कि सीधे यह कहना ठीक नहीं होता कि आप छह दिन से सिगरेट पीने नहीं आए या एक महीने से मीठा पान नहीं ले गए. वह मेरी निजी ज़िन्दगी में तो कोई दखल नहीं देता था. इस नई तकनीक ने तो मुझे एकदम ही नंगा करके रख दिया है.मेरा कुछ भी तो नहीं है जो इन व्यापारियों के कम्प्यूटर की खोजी निगाहों से छिपा हो.

मन को दूसरी तरफ ले जाने को अपना रेडियो ऑन करता हूं.

गीत आ रहा है : "कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन!"






Friday, February 1, 2008

एक राजनीतिक हत्या के निहितार्थ

26 अप्रेल 1998 की रात ग्वाटेमाला के प्रसिद्ध मानवाधिकार योद्धा बिशप जुआन गेरार्डी की बुरी तरह कुचली हुई और खून से सनी लाश उनके चर्च के गैराज में पाई गई. इससे ठीक चार दिन पहले ही बिशप और मानवाधिकार अन्वेषकों की उनकी टीम ने अपनी 1400 पन्नों की खोज रिपोर्ट जारी की थी. इस रिपोर्ट में ग्वाटेमाला में ‘80 व ‘90 के दशकों में सेना और सुरक्षा बलों द्वारा चलाये गये उस नृशंस अभियान का दिल दहला देना वाला ब्यौरा पेश किया गया था, जिसके द्वारा लगभग 20 हज़ार लोगों को लापता कर दिया गया या मार डाला गया था.
अब चर्चित उपन्यासकार फ्रैंसिस्कोगोल्डमेन ने इसी घटना चक्र को आधार बनाकर लगभग 400 पन्नों की एक खोजपूर्ण, लोमहर्षक किताब लिखी है : द आर्ट ऑफ पॉलिटिकल मर्डर : हू किल्ड द बिशप? इस किताब में लेखक ने सेण्ट्रल अमरीका में जारी अमरीका समर्थित युद्ध, हिंसा और भ्रष्टाचार की परम्परा के अनेक पहलुओं को उजागर किया है. गोल्डमेन का बपतिस्मा बिशप गेरार्डी के सान सेबस्टियन चर्च में ही हुआ था और उस वक़्त ग्वाटेमाला में जन्मी उनकी मां भी उपस्थित थीं. इस निजी संलग्नता ने गोल्डमेन को प्रेरित किया कि वे सूचनाओं के खज़ाने में से, जिसमें असंख्य इण्टरव्यू, डी-क्लासिफाइड दस्तावेज़, कोर्ट के रिकॉर्डस शामिल हैं, अपने काम की सामग्री का चयन कर यह लोमहर्षक वृत्तांत लिखें. असंख्य चरित्रों और घटनाओं के घटाटोप के बीच उन्होंने जो वृत्तांत रचा है वह ऐसा है कि उसके कारण गोल्डमेन की गणना मार्केस और योसा जैसे उत्कृष्ट लातीन अमरीकी रचनाकारों के साथ की जा सकती है.
इस वृत्तांत का आरम्भ बिशप की हत्या के वीभत्स दृश्य से होता है और इसके बाद गोल्डमेन आहिस्ता-आहिस्ता हत्यारों और उनके छिपे रक्षकों को सामने लाते हैं. इस प्रक्रिया में वे एक अनैतिक छाया राष्ट्र की सन्देहास्पद किंतु ताकतवर भूमिका को उभारते चलते हैं. लेखक साहित्यिक गद्य और पत्रकारिता की यथा-तथ्य भाषा के सुखद समन्वय से एक ऐसा वृत्तांत रचता है जो अनगिनत चरित्रों और पल-पल परिवर्तित होते घटनाक्रम के कारण पाठक को बांध लेता है. लेखक इस हत्या के सन्दर्भ में बार-बार हमें याद दिलाता है कि 1954 में अमरीका समर्थित ताकतों द्वारा ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति जेकोब अरबेंज़ का तख्ता पलटा गया था और उसी के बाद सेण्ट्रल अमरीका के सर्वाधिक निर्मम मिलिट्री तंत्र की स्थापना हुई थी. इसी के बाद वह लम्बा गुरिल्ला युद्ध चला जिसने 20 हज़ार निर्दोष नागरिकों की जान ली.
इसके बाद 1996 में एक शांति समझौता हुआ और ग्वाटेमाला सैद्धांतिक रूप से एक नागरिक प्रशासन वाला प्रजातंत्र बना दिया गया. लेकिन, गोल्डमेन बार-बार ज़ोर देकर कहते हैं कि इससे सत्ता की प्रकृति में कोई बदलाव नहीं आया और ग्वाटेमाला उन छद्म सैन्य ताकतों का बन्धक ही बना रहा जिनका कम्युनिस्ट विरोधी अभियान एक अपराध उद्योग में तब्दील हो चुका था. लेखक के अनुसार, बिशप गेरार्डी का मानव अधिकार एक्टिविज़्म ऐसे लोगों के लिए एक बडी चुनौती था. इसीलिए, वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि बिशप की हत्या कोई आकस्मिक अपराध नहीं था बल्कि दो ताकतवर सत्ताओं मिलिट्री और चर्च के बीच की खुली टकराहट की स्वाभाविक परिणति था.
गोल्डमेन यह भी बताते हैं कि हत्यारों ने अपने कुकृत्य को छिपाने में भी असाधारण कौशल का परिचय दिया. उन्होंने गेरार्डी का चरित्र हनन करने का एक सुनियोजित अभियान चलाया और यह स्थापित करने में लगभग कामयाब रहे कि वे समलैंगिक थे और अपने एक प्रेमी की हिंसा के शिकार हुए. यह सनसनीखेज प्रवाद कुछ इस कौशल से फैलाया गया कि इसे राष्ट्रीय मीडिया ने भी अंगीकार कर लिया और प्रतिष्ठित लेखक योसा तक इस के बहकावे में आकर बिशप और चर्च की भूमिका के प्रति संशयालु हो उठे.
द आर्ट ऑफ पॉलिटिकल मर्डर गुस्से से भरी एक ऐसी चीख है जिसे न केवल सहानुभूतिपूर्वक सुना जाना चाहिए, ऐसे हर व्यक्ति तक पहुंचाया भी जाना चाहिए जो यह मानने को तैयार हो कि सत्य कभी-कभी गल्प से भी ज़्यादा विस्मित करने वाला हो सकता है. इस किताब की महत्ता और प्रासंगिकता ग्वाटेमाला में हाल के घटनाचक्र के कारण और बढ गई है. वहां राष्ट्रीय चुनावों का ताज़ा दौर राजनीतिक हत्याओं और सरकार द्वारा लगभग ध्वस्त कर दिया गया है. राष्ट्रपति पद के दो सशक्त उम्मीदवारों में से एक ओट्टो पेरेज़ मोलिना एक भूतपूर्व आर्मी जनरल और खुफिया सेवा के चीफ हैं. वे गेरार्डी की हत्या के समय पद पर थे. अपना चुनाव वे कानून व्यवस्था को मुद्दा बना कर लड रहे हैं और कह रहे हैं कि अपराध का खात्मा करने के लिए उन्हें नागरिक अधिकारों को कुचलने में भी संकोच नहीं होगा.
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Discussed book:
The Art of Political Murder
By Francisco Goldman
Grove Press.
Hardcover, 416 pages
US $ 25.00

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत 31 जनवरी 2008 को प्रकाशित





Monday, January 28, 2008

यह कैसी पत्रकारिता?

28 जनवरी 2008 को जयपुर में विरासत फाउण्डेशन द्वारा आयोजित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल सम्पन्न हुआ. आखिरी दिन का एक आयोजन दो प्रसिद्ध राजस्थानी लेखकों श्री लाल मोहता और चन्द्रप्रकाश देवल के बीच संवाद भी था.
इसी संवाद को लेकर आज(29 जनवरी) के दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर एक समाचार छपा, जिसका शीर्षक था " राजस्थानी साहित्यकारों को मंच से उतारा". इसी समाचार के बगल में कल्पेश याग़्निक का एक विशेष सम्पादकीय भी था,"मर्यादा तोडता दम्भ". अखबार के खबर के अनुसार हुआ यह कि पिछले सत्र के देर से शुरू होने के कारण राजस्थानी का यह संवाद सत्र बीस मिनिट देर से शुरू हुआ, और जब राजस्थानी लेखकों ने चाहा कि उनका सत्र निर्धारित समय से बीस मिनिट देर तक चले तो आयोजन से जुडी अंग्रेज़ी लेखिका नमिता गोखले ने अशिष्टतापूर्वक इन दोनों साहित्यकारों को जबरन मंच से उतार दिया.
विशेष सम्पादकीय भी इसी मुद्दे पर लिखा गया.
कल रात ही दैनिक भास्कर से किसी पत्रकार ने मुझे भी इस बाबत फोन किया था. उनका नाम मैं ठीक से सुन नहीं पाया. उन्होंने इस घटना पर मेरी टिप्पणी चाही थी. मैंने उनसे कहा कि ऐसी कोई खास बात तो आयोजन के दौरान हुई नहीं. मैं उस पूरे सत्र में मौज़ूद था. उससे पहले भी और बाद में भी. हां, इतना ज़रूर हुआ था कि नमिता गोखले ने एकाधिक बार इन लेखकों से अपनी बात पूरी करने का अनुरोध किया था क्योंकि अगला सत्र शुरू होना था. आखिरी बार वे थोडे गुस्से से, और बिना एक भी शब्द बोले, उस टैण्ट से बाहर निकल गई थी. इसके भी कोई पांच सात मिनिट तक इन लेखकों ने अपनी बात पूरी की, और बाकायदा चर्चा का समापन कर नीचे उतरे. इसके बाद अगला सत्र शुरू हुआ जिसमें चित्रा मुद्गल मुख्य भूमिका में थी. चन्द्र प्रकाश देवल और श्रीलाल मोहता भी उस सत्र में काफी देर तक तो थे. मैंने सम्वाददाता से कहा कि नमिता गोखले ने बोला तो एक भी शब्द नहीं. अलबत्ता वे गुस्से से ज़रूर बाहर गईं. लेकिन यह ऐसी कोई खास बात नहीं थी. वे अपनी आयोजकीय भूमिका का निर्वाह कर रही थीं, और इसे सहजता से लिया जाना चाहिए. इसके बाद सम्वाददाता जे ने पूरे आयोजन में अंग्रेज़ी के वर्चस्व पर मुझसे थोडी चर्चा की. मेरा भी यही खयाल था कि आयोजन में अंग्रेज़ी को ज़रूरत से ज़्यादा महत्व दिया गया.
लेकिन आज सुबह अखबार में वह खबर पढकर मेरा भी चौंकना स्वाभाविक था. जो हुआ ही नहीं, उसे न केवल खबर बनाया गया, उस को अत्यधिक महत्वपूर्ण मानते हुए एक विशेष सम्पादकीय भी लिखा गया. खबर के साथ ही मुझ सहित कुछेक लूगों के बयान भी दिये गये. मज़े की बात यह कि जिनके बयान दिये गए उनमें से दो लेखक मित्र तो आयोजन में उपस्थित ही नहीं थे. माना जा सकता है कि उन्होंने सम्वाददाता के वर्णन के आधार पर अपनी टिप्पणियां दी होंगी.

मेरा आशय यहां नमिता गोखले के पक्ष में कोई टिप्पणी करने का नहीं है. आज के अखबार में उनका जो बयान छपा है, अगर वाकई उन्होंने वैसा कहा है तो वह गलत है. लेकिन, इससे पहले तो यह बात कि अखबार जो लिख रहा है वह कितना सही है!
जैसा मैंने कहा, ऐसी कोई घटना घटित ही नहीं हुई. इस बात की पुष्टि मैंने उन कई मित्रों से भी की जो उस सत्र में मेरे साथ मौज़ूद थे.
हम आयोजन में अंग्रेज़ी के महत्व स्थापन पर आपत्ति करें, यह तो ठीक लेकिन बिना बात का बतंगड खडा करें, यह तो उचित नहीं.

Thursday, January 24, 2008

एक नष्ट लडकी की करुण कथा

सन 2004 में एलेन हॉपकिंस का एक उपन्यास आया था – क्रैंक. इस बहुचर्चित रहे उपन्यास में लेखिका ने एक लडकी क्रिस्टीना ज्योर्जिया स्नो की करुण कथा कही थी. यह लडकी ड्रग के मायाजाल में फंस कर अपना सर्वस्व लुटा बैठती है. एक अन्य नशेडी क्रिस्टीना से बलात्कार करता है और वह गर्भवती हो जाती है. इस उपन्यास ने पाठकों को इतना अधिक प्रभावित किया कि उन्होंने लेखिका से सम्पर्क कर जानना चाहा कि आखिर क्रिस्टीना का क्या हुआ? इस जिज्ञासा के मूल में यह तथ्य भी था कि उपन्यास स्वयं लेखिका की बेटी की आपबीती पर आधारित था.
अब इसी उपन्यास क्रैंक की अगली कडी (सीक्वेल) के रूप में लेखिका ने अपने पाठकों की जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास किया है. सन 2007 में प्रकाशित ग्लास में एलेन हॉपकिंस ने क्रैंक की ही कथा को आगे बढाया है. यहीं यह बताता चलूं कि क्रैंक और ग्लास शब्द ड्रग्स के लिए प्रयुक्त किए जाते हैं. कहना गैर ज़रूरी है कि ग्लास भी लेखिका की आपबीती पर ही आधारित है. ग्लास की कथा क्रैंक की कथा जहां खत्म होती है उसके एक साल बाद से शुरू होती है. नायिका क्रिस्टीन अपने नवजात शिशु के साथ मां के घर लौट आई है. वह अब ड्रग के सम्मोहन से मुक्त होने का प्रयास कर रही है. उसने खुद को नवजात शिशु में रमा लिया है. डाइपर बदलने और स्तनपान कराने में उसे अपने जीवन की सार्थकता दिखाई देने लगती है.
जीवन ठीक-ठाक चल रहा है. ड्रग लेने की चाहत यदा-कदा उसे व्याकुल करती है और वह बलपूर्वक उस चाहत को दूर धकेलती है. उसी दौरान उसे अपने जीवन में ऊब महसूस होने लगती है. उसे यह भी खयाल आता है कि प्रसव ने उसकी देह को बेडौल और अनाकर्षक बना दिया है. वह स्थूल हो गई है. इस प्रतीति से उसकी ऊब और खीझ और बढ जाती है. सोचती है, क्यों न इस सबसे निज़ात पाने के लिए थोडी-सी ड्रग ले ली जाए! मन में अतीत की कटु स्मृतियां झिलमिलाती हैं. वह दृढ निश्चय करती है कि अब ड्रग को अपना स्थायी साथी नहीं बनाएगी. लेकिन एकाध बार ले लेने में क्या हर्ज़ है? शायद इससे उसकी काया भी फिर से सुडौल हो जाए. यह भी खयाल आता है कि एकाध बार के ड्रग सेवन से उसे अपने भविष्य को संवारने की ताकत मिल जाएगी. वह यह भी सोचती है कि उसका जो गडबड वर्तमान है, उससे भी, भले ही कुछ देर को ही सही, पलायन करने का सुख भी मिल जाएगा.
नायिका की इसी उहापोह का सशक्त चित्रण इस उपन्यास की जान है. क्रिस्टीन का आत्म संघर्ष जिस खूबसूरती से अंकित किया गया है वह अद्भुत है. यहीं यह भी ज़िक्र कर दूं कि क्रैंक और ग्लास दोनों ही उपन्यास पद्यबद्ध हैं. यानि पूरे उपन्यास गद्य में नहीं, पद्य में रचे गए हैं. लेखिका के चित्रण की खूबसूरती और ताकत इस बात में है कि जब आप ग्लास को पढते हैं तो जैसे आप खुद क्रिस्टीन ही बन जाते हैं. इसी को भारतीय काव्य शास्त्र में साधारणीकरण कहा गया है. क्रिस्टीना का हर कृत्य आपको वाज़िब लगता है. मुझे तो इस उपन्यास को पढते हुए बार-बार भगवतीचरण वर्मा के प्रख्यात उपन्यास चित्रलेखा की ये पंक्तियां याद आती रहीं : हम न पाप करते हैं, न पुण्य करते हैं. हम तो वह करते हैं जो हमें करना पडता है.
वास्तव में क्रिस्टीना ने जो किया वह करना उसकी विवशता ही तो थी. और बहुत बार जीवन में ऐसा होता है कि आप जानते हैं कि आप गलत कर रहे हैं, फिर भी वैसा करने से खुद को रोक नहीं पाते हैं. क्रिस्टीना फिर से ड्रग के उस मकडजाल में फंस जाती है, जिससे वह बडी मुश्किल से निकली थी. उसकी देह, उसका स्वास्थ्य, उसका परिवार सब, न चाहते हुए भी, क्रमश: ड्रग को उसके लिए अपरिहार्य बना देते हैं. मां उसे घर से निकाल देती है, हालांकि उसकी संतान को अपने पास रख लेती है. उपन्यास जहां खत्म होता है वहां यह साफ लगता है कि अब निश्चय ही लेखिका इस सीक्वेल में तीसरी कडी भी जोडेगी.
ड्रग सेवन पश्चिम में एक भयावह रूप ले चुका है. दुर्भाग्य से भारत में भी इसका प्रसार होने लगा है. ऐसे में यह उपन्यास ग्लास हमें ड्रग के भयावह दुष्परिणामों से आगाह करता है – यह बात रेखांकनीय है.
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Discussed book:
Glass
By Ellen Hopkins
Hardcover, 688 Pages
Published By Margaret K.McElderry
US $ 16.99


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 24 जनवरी 2008 को प्रकाशित.

Sunday, January 20, 2008

उलझा-उलझा है भाषाई परिदृश्य

18 मई 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2008 को अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा की. विश्व संस्था का यह निर्णय उसके इस सोच को पुष्ट करता है कि भाषाओं की असल बहुलता के द्वारा ही अनेकता में एकता की रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय समझ का विकास सम्भव है. इसी सन्दर्भ में यूनेस्को के महानिदेशक मात्सुरा कोईचोरो का यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि भाषाओं की जितनी अहमियत वैयक्तिक अस्मिता के लिए है उतनी ही शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए भी है. उनके कथन की महता इस बात से और भी बढ जाती है कि यूनेस्को को ही अंतर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष विषयक गतिविधियों के समन्वय का दायित्व सौंपा गया है. हम भी अगर भाषाओं की महत्ता पर विचार करें तो पाएंगे कि साक्षरता और शिक्षा की तो कोई कल्पना ही भाषा के बिना समभव है. आखिर शिक्षक भाषा के बिना अपनी बात कह ही कैसे सकता है?
अगर हम भाषाओं के महत्व पर थोडी और गहराई से विचार करें तो पाते हैं कि व्यक्तियों और समूहों की पहचान बनाये रखने में भी भाषाओं की बडी भूमिका होती है. सांस्कृतिक वैविध्य की कोई भी परिकल्पना भाषाई विविधता के बिना असम्भव है. लेकिन, बावज़ूद इस सच्चाई के, दुखद तथ्य यह है कि दुनिया में बोली जा रही लगभग सात हज़ार भाषाओं में से आधी से अधिक तो आगामी कुछ सालों में ही विलुप्त हो जाने वाली है. 1996 में पहली बार प्रकाशित ‘विलुप्त होने के कगार पर दुनिया की भाषाओं का एटलस’ में इस समस्या को बखूबी उभारा गया है. यह भी एक दुखद तथ्य है कि अभी हमने जिन सात हज़ार भाषाओं का ज़िक्र किया उनमें से एक चौथाई से भी कम का प्रयोग स्कूलों वगैरह में होता है और हज़ारों भाषाएं ऐसी हैं जो वैसे तो दुनिया की आबादी के एक बडे हिस्से की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में शरीक हैं लेकिन शिक्षा व्यवस्था, संचार तंत्र, प्रकाशन जगत आदि से पूरी तरह अनुपस्थित हैं. शायद यही वजह है कि यूनेस्को के महानिदेशक ने कहा है कि इस मुद्दे पर गहनता से विचार करते हुए हमें एक ऐसी भाषा नीति की तरफ बढना चहिए जो प्रत्येक भाषाई समूह को इस बात के लिए प्रेरित करे कि वह प्रथम भाषा के रूप में अपनी मातृ भाषा का व्यापकतम प्रयोग तो करे ही, साथ ही किसी क्षेत्रीय अथवा राष्ट्रीय भाषा को भी सीखे और अगर सम्भव हो तो एक या अधिक अंतर्राष्ट्रीय भाषा का भी ज्ञान प्राप्त करे. उन्होंने यह भी सलाह दी है कि एक वर्चस्वशाली भाषा के प्रयोक्ताओं को किसी अन्य क्षेत्रीय या राष्ट्रीय भाषा को भी सीखना चाहिए. आखिर भषाओं की बहुलता के द्वारा ही तो सभी भाषाओं के अस्तित्व की रक्षा की जा सकेगी.
संयुक्त राष्ट्र संघ और उसके घटक यूनेस्को के ये विचार बहुत ही सदाशयतापूर्ण हैं. इनके पीछे की पवित्र भावनाओं से भी भला कोई असहमति हो सकती है? लेकिन हो गई. जहां दुनिया के ज़्यादातर देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इस विचार का स्वागत करते हुए उसके साथ सहयोग करने का इरादा ज़ाहिर किया वहीं दुनिया के चौधरी अमरीका ने एक विवादी स्वर लगा दिया. विश्व संगठन में अमरीकी राजदूत ने बुश प्रशासन के इस दावे को आधार बनाते हुए कि भाषा कोई विज्ञान द्वारा पुष्ट तथ्य नहीं अपितु एक सिद्धांत मात्र है, और खुद राष्ट्रपति बुश यह मानते हैं कि ईश्वर ने मात्र छह दिनों में अंग्रेज़ी का निर्माण किया था, इस प्रस्ताव से अपनी असहमति की घोषणा कर डाली. अमरीका सरकार की असहमति के मूल में उसकी यह आशंका भी है कि उसके किसी बहु-देशीय संधि में शरीक होने से दुनिया में अंग्रेज़ी के प्रसार को अघात पहुंचेगा. और इस नेक इरादे से अपनी असहमति ज़ाहिर करने वाला अमरीका अकेला देश नहीं है. यूनेस्को में अरबी बोलने वाले प्रतिनिधियों ने भी इसी तरह हिब्रू का विरोध कर इस प्रस्ताव की क्रियान्विति में अडंगा लगाया. और ऐसा ही कुछ किया कोरियाई प्रतिनिधियों ने भी.
वैसे, अगर अतीत की तरफ झांकें तो हम पाते हैं कि भाषाओं के मामले में खुद संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका भी प्रशंसनीय नहीं रही है. जब चीन में दूसरी भाषाओं को कुचला जा रहा था तो संयुक्त राष्ट्र संघ मौन दर्शक था. जब पाकिस्तान में जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने सिंधी बोलने वालों को देखते ही गोली मार देने के आदेश दिये तो संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं समझी. ऐसा ही उसने फ्रांस द्वारा अंग्रेज़ी पर रोक के वक़्त भी किया. वैसे भी, जिस संयुक्त राष्ट्र संघ के देखते-देखते यूरोपीय संघ अपनी 23 आधिकारिक भाषाओं के बावज़ूद अपना ज़्यादा काम अंग्रेज़ी में करता है, और खुद यह विश्व संगठन लगभग सारा ही काम अंग्रेज़ी में करता है, वही जब भाषाओं की बहुलता की बात करता है तो आश्चर्य होता है.
लेकिन अगर आप आशावादी हों, और किसी की नीयत पर सन्देह करने के शौकीन न हों तो यह भी सोच सकते हैं कि सुबह का भूला संयुक्त राष्ट्र संघ अब शाम को घर लौट रहा है. वह कम से कम अब तो अंग्रेज़ी के दिग्विजय अभियान को रोकना चाहता है. यूनेस्को ने तो यह भी कहा है कि वह दुनिया की उन गडबडी वाली जगहों पर अपने नीले हेलमेट वाले संयुक्त राष्ट्रीय भाषाई रक्षक तैनात करेगा जहां जबरन दूसरी भाषाओं का दमन किया जाता है, जैसे आयरलैण्ड में जहां हालांकि सरकारी भाषा आयरिश है लेकिन नये नागरिकों पर बलात अंग्रेज़ी लादी जा रही है.

इसी उथल-पुथलभरे वैश्विक परिदृश्य के साथ ही आइये, ज़रा भारत के भाषाई परिदृश्य का भी जायज़ा ले लें. संविधान ने हमारे यहां दो राज भाषाओं – हिन्दी और अंग्रेज़ी- को मान्यता दे रखी है. इनके अलावा संविधान की आठवीं अनुसूची में 18 और भाषाएं भी सूचीबद्ध हैं. राजस्थानी जैसी महत्वपूर्ण भाषा अभी भी इस अनुसूची में प्रवेश पाने के लिए संघर्षरत है. इनके अलावा, 418 और ऐसी सूचीबद्ध भाषाएं हैं जिनमें से प्रत्येक के बोलने वालों की संख्या कम से कम दस हज़ार है. हमारा सरकारी रेडियो – आकाशवाणी 24 भाषाओं और 146 बोलियों में प्रसारण करता है. कम से कम 34 भाषाओं में हमारे यहां अखबार छपते हैं और 67 भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा दी जाती है. संविधान सभी नागरिकों को उनकी भाषा के संरक्षण का अधिकार देते हुए सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि की शैक्षिक संस्था चुनने का अधिकार प्रदान करता है. लेकिन ये सारे तथ्य और आंकडे उस वक़्त किताबी लगते हैं जब हम यह देखते हैं कि बहु भाषा भाषी हमारे देश में ही कम से कम 1600 भाषाएं और बोलियां ऐसी हैं जिन्हें लोग अपनी मातृ भाषा के रूप में तो प्रयुक्त करते हैं लेकिन जिन्हें किसी भी तरह का वैधानिक या सरकारी संरक्षण प्राप्त नहीं है.
भाषाई आधार पर हुए राज्यों के पुनर्गठन पर अब भी सवालिया निशान लगाए जाते हैं. इसी के साथ भाषाओं को लेकर हुए हिंसक विवादों को भी भुलाया नहीं जा सकता. दक्षिण के कतिपय इलाकों में हुआ हिन्दी का तथाकथित उग्र विरोध और एक दूसरे समय में उत्तर भारत में तेज़ी से फैला अंग्रेज़ी हटाओ आन्दोलन आज भी लोगों की स्मृतियों में है. भाषाओं को लेकर वैसा उत्तेजक माहौल आज भले ही न हो, जानने वाले जानते हैं कि आज भारत में हर बडी भाषा अपनी से छोटी भाषा का अधिकार छीन-हडप रही है. ऐसा करने में शीर्ष पर है अंग्रेज़ी. कहने को यह देश की दो राज भाषाओं में से एक है लेकिन कभी-कभी लगता है कि असल राज भाषा तो यही है. इस देश में अंग्रेज़ी जाने बगैर आपका कोई अस्तित्व ही नहीं है. कोई छोटी से छोटी सरकारी नौकरी आपको अंग्रेज़ी ज्ञान के बगैर नहीं मिल सकती. जबकि दूसरी राजभाषा हिन्दी के साथ ऐसा नहीं है. अगर आप हिन्दी नहीं भी जानते हैं तो कोई बात नहीं. बल्कि बहुतों के लिए तो हिन्दी न जानना गर्व का कारण होता है. इधर वैश्वीकरण और उदारीकरण के चलते और दुनिया के सपाट होते जाने के कारण अंग्रेज़ी का वर्चस्व और बढता जा रहा है. रही सही कसर सूचना प्रौद्योगिकी ने पूरी कर दी है. लोगों ने मान लिया है कि वहां तो अंग्रेज़ी के बिना काम चल ही नहीं सकता, और बिना सूचना प्रौद्योगिकी के आज की दुनिया में जीना बेकार है. हालांकि दोनों ही बातें सच से बहुत दूर हैं. सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में काम करने की भी पूरी सुविधाएं हैं, और भारत जैसे धीमी गति और संतोषी मानसिकता वाले देश में द्रुतगामी सूचना प्रौद्योगिकी जीवन शैली का हिस्सा बनेगी, इसमें अभी काफी वक़्त लगेगा.
लेकिन अंग्रेज़ी हमारे मन मष्तिष्क पर बुरी तरह हावी है. हमारे फिल्मी सितारे काम भले ही भाषाई फिल्मों में करें, बात अंग्रेज़ी में ही करना पसन्द करते हैं. नेता लोग चुनाव के वक़्त भले ही हिन्दी या क्षेत्रीय भाषाएं काम में ले लें, अपने प्रभाव स्थापन के लिए टूटी-फूटी और हास्यास्पद ही सही अंग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते दिखाई सुनाई देते हैं. समाज का प्रभु वर्ग अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूलों में ही भेजता है. यहां तक कि जो लोग परम्परा, धर्म, संस्कृति वगैरह की कमाई खाते हैं वे भी अपने बच्चों का भविष्य अंग्रेज़ी में ही देखते हैं. निश्चय ही यह मनोवृत्ति हिन्दी सहित तमाम देशी भाषाओं के लिए घातक सिद्ध हो रही है. इनका विकास अवरुद्ध हो रहा है, और इनके प्रयोक्ताओं की संख्या निरंतर घटती जा रही है. हिन्दी की स्थिति तो फिर भी ठीक है, लेकिन जिन भाषाओं या बोलियों को बोलने वाले कम हैं उनके अस्तित्व पर मण्डराते खतरों को साफ देखा जा सकता है.
ऐसे में एक तरफ जहां संयुक्त राष्ट्र संघ की इस सदाशयता पूर्ण पहल का महत्व समझ में आता है वहीं दूसरी तरफ लुप्त होती जा रही भाषाओं की स्वाभाविक परिणति सांस्कृतिक वैविध्य की क्षति चिंतित भी करती है. चिंताजनक बात यह भी है आज भाषाएं किसी के भी एजेण्डा में नहीं हैं. कहीं हम भाषा विहीन भविष्य की तरफ तो नहीं बढ रहे हैं?

Thursday, January 17, 2008

एक घोषणा पत्र खाने वालों के लिए

मनुष्य प्रजाति सदियों से यह जानती है कि ठीक से क्या और कैसे खाया जाए, लेकिन अब खाद्य उद्योग के मार्केटिंग कर्मियों, पोषण वैज्ञानिकों और इनसे सम्बद्ध पत्रकारों ने उसे उलझा-भरमा दिया है. खाद्य और पोषण विषयक उलझनें जितनी बढती हैं उतना ही इनका धन्धा चमकता है. आज तो एक ऐसा खाद्य परिदृश्य बन गया है जो खराब सलाहों और ‘अवास्तविक’ भोजन से भरा है. ये भोजन जैसे दिखने वाले पदार्थ अक्सर मिथ्या या भ्रामक तथ्यों से भरी पैकिंग में प्रस्तुत किए जाते हैं. असल भोजन तो बाज़ार से लुप्त होता जा रहा है. उसकी जगह लेते जा रहे हैं तथाकथित न्यूट्रीएण्ट्स जो न केवल हमारे खाने को बल्कि हमारी सेहत को भी खराब कर रहे हैं.
ये और ऐसी ही अनेक चौंकाने वाली बातें कही हैं माइकेल पोलान ने अपनी ताज़ा किताब ‘इन डिफेंस ऑफ फूड : एन ईटर्स मेनीफेस्टो’ में. पोलन की दो टूक सलाह है : ऐसी कोई चीज़ मत खाओ जिसे तुम्हारी पड दादी खाद्य पदार्थ के रूप में न पहचान सके.
न्यूयॉर्क टाइम्स के सुपरिचित पत्रकार, बर्कले विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के प्रोफेसर माइकेल पोलन की इससे पहले इसी श्रंखला की दो और किताबें ‘द बॉटेनी ऑफ डिज़ायर’ और ‘द ओम्नीवोर्स डाइलेमा’ क्रमश: भोजन से हमारे रिश्तों की पडताल और हमारे भोजन के वैविध्य के विश्लेषण के लिए चर्चित-प्रशंसित रही हैं. यहां इस नई किताब में पोलन का सन्देश बहुत स्पष्ट है : भोजन का आनंद लें. ज़्यादा न खायें. जहां तक हो, वानस्पतिक भोजन का अधिकतम प्रयोग करें.
यह किताब तीन खण्डों में है. पहला खण्ड न्यूट्रीशनिज़्म की पडताल करता है और बताता है कि इस विचार ने हमारे भोजन को न्यूट्रीएण्ट्स में बांट डाला है. पोलन कहते हैं कि यह न्यूट्रीशनिज़्म खाद्य पदार्थ विक्रेताओं के लिए वरदान सिद्ध हो रहा है क्योंकि इसी की मदद से वे अपने उत्पादों को तेज़ी से बेच पाने में सफल होते हैं. पोलन खाद्य वैज्ञानिकों और खाद्य पदार्थ विक्रेताओं के बीच के मैत्रीपूर्ण रिश्तों को भी उजागर करते हैं और बताते हैं कि इन वैज्ञानिकों की नित नई खोजों से नए-नए खाद्य उत्पाद बाज़ार में उतारने की सहूलियत पैदा होती है. वे मज़े लेकर बताते हैं कि पोषण विज्ञान की नई-नई खोजों के कारण जो खाद्य पदार्थ कल तक उच्च वसा युक्त होने के कारण त्याज्य था वही अब लाभदायक वसा युक्त माना जाकर चहेता बना दिया जाता है. वे याद दिलाते हैं कि अमरीका में 2003 मं एटकिन्स डाइट के हल्ले के कारण ब्रेड और पास्ता अचानक लोकप्रिय हो उठे और बेचारे आलू व गाजर खलनायक बन गए. पोलन साफ कहते हैं कि पोषण विज्ञान की एक ऐसी नई शाखा बन गई है जो खाद्य उद्योग के अनुदान पर ही फल फूल रही है. इस शाखा का काम ही यह है कि उद्योग जिस पदार्थ के लिए कहे उसी को तमाम पोषक तत्वों से युक्त सिद्ध कर दिया जाए. अपने इस कथन को पुष्ट करने के लिए पोलन बताते हैं कि अमरीका के एक प्रसिद्ध कॉर्पोरेशन ने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में चॉकलेट साइन्स के लिए एक चेयर स्थापित की है और यह चेयर अब चॉकलेट में एण्टी ऑक्सीडेण्ट खोजने में जुटी हुई है. बहुत जल्दी आपको यह बताया जा सकता है कि चॉकलेट तमाम स्वास्थ्यवर्धक तत्वों की खान है.
पोलन यह भी बताते हैं कि खाद्य उद्योग के दबाव किस तरह सरकारी घोषणाओं को भी बदलवाने में कामयाब रहते हैं. 1977 में एक सीनेट समिति ने कहा : मांस का उपभोग कम करें. खाद्य उद्योग के दबाव के कारण यह इबारत बदल दी गई और कहा गया : सैचुरेटेड वसा को कम करने वाले मांस मछली का उपभोग करें. ज़ाहिर है, यह कथन अर्ध सत्य था और खाद्य उद्योग के हित में था. किताब का दूसरा खण्ड है ‘पश्चिमी भोजन और सभ्यता का रोग’ जहां पोलन कई उदाहरण देकर यह बताते हैं कि आधुनिक पश्चिमी भोजन किस तरह हमारे स्वास्थ्य के साथ खिलवाड करता है.
किताब का तीसरा खण्ड इस पश्चिमी भोजन से बचने के उपाय सुझाता है. पोलन की सलाह है कि रसायनिक तत्वों से युक्त डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ कम-से-कम काम में लिये जाएं. यह भी कि एक जगह बैठकर ही खायें, अकेले न खायें और धीरे-धीरे खायें. पोलन हमसे हमारी खाने-पीने की आदतों में बदलाव करने को ही नहीं कहते बल्कि एक ऐसे आन्दोलन में शरीक होने का आह्वान करते हैं जो सामूहिकता और आनन्द के ज़रिये भोजन से स्वास्थ्य की राह पर ले जाता है. वे ऐसी खाद्य संस्कृति का प्रस्ताव करते हैं खाद्य उद्योग के इशारों पर नाचने की बजाय पारिस्थितिकी और परम्परा से संचालित हो.
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Discussed book:
In Defense of Food: An Eater’s Manifesto
By Michael Pollan
Published by: Penguin Press HC, The
256 Pages, Hardcover
US $ 21.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 17 जनवरी 2008 को प्रकाशित.

Monday, January 14, 2008

ज़माना है मीडियाक्रिटी का

13 जनवरी 2008 की दैनिक जनसत्ता में अपने साप्ताहिक कॉलम ‘कभी कभार’ में अशोक वाजपेयी ने एक मार्के की बात कही है. मैं उन्हीं को उद्धृत कर रहा हूं :समकालीन भारत की कई विडम्बनाओं में से एक बडी यह है कि हम अर्थ और वाणिज्य में तो मूर्धन्यता की ओर लगातार बढ रहे हैं, लेकिन ज्ञान-विज्ञान जैसे क्षेत्रों में मूर्धन्यता से अपसरण हो रहा है. सिर्फ अपसरण भर नहीं, मीडियाक्रिटी का राज तेज़ी से फैल रहा है. यह कहने के बाद अशोक जी ने अनेक क्षेत्रों की चर्चा की है जिनमें राजनीति, शिक्षा,धर्म, सार्वजनिक जीवन आदि सम्मिलित हैं. अपनी टिप्पणी का अंत उन्होंने साहित्य अकादेमी के भावी अध्य़क्ष की चर्चा से किया है. हम सभी जानते हैं कि वर्तमान अध्यक्ष अपने क्रिया-कलापों की वजह से खासे विवादास्पद रहे हैं. अशोक जी ने यह खबर देते हुए कि जल्दी ही नारंग जी से छुटकारा मिल जाएगा (वैसे चर्चा तो यह भी है कि वे दुबारा चुने जाने के लिए जी-तोड प्रयास कर रहे हैं) लिखा है कि “उनके विकल्प के रूप में जो दो नाम सामने हैं - मलयालम के एमटी वासुदेवन नायर और बांग्ला के सुनील गंगोपाध्याय का – वे किस प्रतिमान से मूर्धन्य माने जा सकते हैं?”

सहज जिज्ञासावश मैंने शब्द कोश टटोला तो पाया कि कोश के अनुसार मूर्धन्य का अर्थ है श्रेष्ठ या शीर्ष- स्थानीय. अब अगर आप शीर्ष की बात करेंगे तो पाएंगे कि शीर्ष कोई भी हो सकता है. अगर एक खराब अभिव्यक्ति याद करूं तो ‘अन्धों में....’ याद आती है. यानि जहां सारे ही लल्लू हों वहां उनसे थोडा कम लल्लू भी तो मूर्धन्य ही कहा-माना जाना चाहिए. लेकिन यह तो हुई शब्दार्थ की बात. असल में जब हम मूर्धन्य की बात करते हैं तो हमारा आशय उससे होता है जो सामान्य से बहुत अलग, असाधारण हो. मैं मलयालम और बांग्ला साहित्य से अधिक परिचित नहीं हूं इसलिए नहीं कह सकता कि नायर और गंगोपाध्याय सही अर्थों में मूर्धन्य हैं या नहीं, लेकिन इस टिप्पणी को पढकर सोचने लगा कि अगर साहित्य अकादेमी की अध्यक्षता के लिए हिन्दी साहित्य के वर्तमान लेखकों में से किसी के नाम पर विचार किया जाना हो तो कौन उपयुक्त हो सकता है? यानि मन ही मन हिन्दी साहित्य के मूर्धन्यों की एक सूची बनाने लगा. ऐसे नाम जो रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय के कद वाले हों. बीते ज़माने के तो और भी अनेक नाम याद आए, प्रेमचन्द, जैनेन्द्र, जयशंकर प्रसाद, अमृत लाल नागर, रांगेय राघव, महादेवी वर्मा, दिनकर...... लेकिन जब वर्तमान पर आया, यानि उनके बारे में सोचने लगा जो अभी भी हमारे बीच हैं तो कुछ उलझन में पडा. बडे-बडे नाम याद आए, जैसे नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, मन्नू भण्डारी, खुद अशोक वाजपेयी, मैनेजर पण्डेय, केदारनाथ सिंह या इनके थोडा बाद उदय प्रकाश, असगर वज़ाहत, मैत्रेयी पुष्पा, काशीनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, ममता कालिया,.... लेकिन लगा कि ये सब तो ‘खद्योत सम’ हैं जो ‘जहां तहां करत प्रकास’. हो सकता है अचानक लिखी जा रही इस टिप्पणी में कुछ महत्वपूर्ण नाम लेना मैं भूल गया होऊं. लेकिन अपनी व्यक्तिगत पसन्द नापसन्द और लाभ हानि की सम्भावनाओं को परे रखकर अगर मुझे ही इनमें से किसी एक को मूर्धन्य कहना-मानना हो तो? सूची को घटाते-घटाते मैं केवल नामवर सिंह पर टिकूंगा. लेकिन मूर्धन्य कहने में या कि जो नाम मैंने पहले गिनाये, उनकी कतार में इन्हें रखने में तो मुझे फिर भी थोडी उदारता का ही प्रयोग करना पडेगा. आप क्या सोचते हैं? क्या आपके मन में ऐसा कोई एक या एकाधिक नाम हिन्दी जगत से है जिसे आप मूर्धन्य कह सकें?

और जब इस मूर्धन्य पर मेरा मन अटका था तभी मन का एक हिस्सा भारत रत्न विवाद की तरफ भी भटक गया. सबसे पहले अडवानी जी ने वाजपेयी जी के लिए भारत रत्न की मांग की (दुष्टों को इसमें ‘इस हाथ ले, उस हाथ दे’ नज़र आया. वाजपेयी जी ने अडवानी जी को प्रधानमंत्री का ख्वाब दिखाया तो बदले में अडवानी जी ने उन्हें भारत रत्न का सपना दिखा दिया!) और फिर तो जैसे भावी भारत रत्नों की क़्यू ही लग गई. ज्योति बसु, जगजीवन राम, कांशी राम और भी न जाने कौन-कौन! और अभी मांगों का सिलसिला खत्म कहां हुआ है? वैसे हमारे देश में इतने बडे पैमाने पर यह पहली बार हुआ है कि भारत रत्न की मांग की जा रही है! कहना अनावश्यक है कि इस तरह की बयान बाजी से भारत रत्न जैसे अलंकरण का तो अवमूल्यन हो ही रहा है, उन लोगों के सम्मान पर भी थोडी-बहुत आंच आ रही है जिन्हें विगत में यह अलंकार प्रदान किया गया था. वैसे, कुछेक अपवादों को छोडकर, भारत रत्न पर प्राय: राजनेताओं का ही एकाधिकार रहा है. लगभग हर प्रधानमंत्री-पूर्व प्रधानमंत्री को पदेन भारत रत्न बना दिया गया. यह राजनीति के प्रति हमारे अतिरिक्त मोह का परिचायक होने के साथ ही उन लोगों की निकट दृष्टि का भी परिचायक रहा जो इस तरह के अलंकरणों के निर्णायक-नियामक होते हैं. अब भी अगर हम यह सोचें कि राजनीति की दुनिया में से ही भारत रत्न चुने जाने हैं तो कौन-कौन से नाम आपके जेह्न में आते हैं? लेकिन सोचते वक़्त एक काम ज़रूर करें. अपनी राजनीतिक संलग्नता को ज़रा अलग रख दें. यानि अगर आप भाजपा के प्रति सहानुभूतिशील हैं तो कृपया वाजपेयी-अडवानी से अलग हटकर और वामपंथी हैं तो ज्योति बसु को छोडकर और बसपा समर्थक हैं तो कांशीराम-मायावती से अलग हटकर विचार करें. मैंने इस तरह सोचा तो पाया कि अगर मेरे वश में हो तो मैं किसी को भी भारत रत्न न दूं. कम से कम राजनीति की दुनिया से तो किसी को भी नहीं. आप का क्या विचार है?




Sunday, January 13, 2008

दर्शक दीर्घा में बैठकर न देखें प्रजातंत्र का खेला

अब तक महिला विषयक लेखन के लिए सुपरिचित बेस्ट सेलर लेखिका नाओमी वुल्फ अपनी नई किताब ‘द एण्ड ऑफ अमरीका: लेटर ऑफ वार्निंग टू अ यंग पैट्रिअट’ के माध्यम से अपने देशवासियों को आगाह करती हैं कि उनके देश में प्रजातंत्र का बने रहना इस बात पर निर्भर है कि वे उसमें कितनी भागीदारी निबाहते हैं. यूरोपीय व अन्य देशों के सत्तावादी उभारों के इतिहास का स्मरण करते हुए वह भयावह आशंका जताती है कि अमरीका में भी ऐसा हो सकता है. वुल्फ बताती हैं कि किस तरह दुनिया के तमाम निरंकुश अत्याचारी शासक एक खास क्रम में उठाये गए दस कदमों से प्रजातंत्र को कुचलते रहे हैं. ये दस कदम हैं : सबसे पहले आंतरिक और बाह्य संकट का हौव्वा खडा किया जाए, गुप्त कारागार स्थापित किए जाएं, एक पैरा मिलिट्री फोर्स बनाई जाए, आम नागरिकों की निगरानी शुरू की जाए, नागरिक समूहों में घुसपैठ की जाए, मनमाने तरीके से नागरिकों की पकड-धकड की जाए और बिना किसी तर्क के उन्हें छोड भी दिया जाए, मुख्य व्यक्तियों को निशाना बनाया जाए, प्रेस को नियंत्रित किया जाए, आलोचना को ‘जासूसी’ का और असहमति को ‘देशद्रोह’ का नाम दिया जाए, और न्याय पूर्ण व्यवस्था को नष्ट किया जाए. सारी दुनिया में इन कदमों का प्रयोग खुले समाजों को बर्बाद करने में किया जाता रहा है.
नाओमी वुल्फ की यह किताब भयावह है क्योंकि यह अमरीका के आज के घटनाक्रम और बीसवीं शताब्दी के मध्य के उस घटनाक्रम में साम्य दर्शाती है जिसकी परिणति फासीवाद और द्वितीय विश्व युद्ध में हुई थी. वुल्फ ज़ोर देकर कहती हैं कि समाज तानाशाही की तरफ यकायक नहीं मुड जाया करते. प्राय: होता यह है कि ज़्यादातर लोगों की सामान्य नियमित दिनचर्या अप्रभावित रहती है. हो सकता है कि हम ‘अमरीकन आइडल’ देखते रहें, मॉल में जाकर पिज़्ज़ा ऑर्डर करते रहें और उसी वक़्त हमारी आज़ादी हमसे छीनी जाती रहे. इसीलिए वे कहती हैं कि अमरीका आज जिस रास्ते पर चल रहा है वह डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए क्योंकि आज़ादी का लोप तो सबको ही प्रभावित करेगा.
वुल्फ पूरी ऊर्जा और शिद्दत से यह एहसास कराती है कि बुश प्रशासन की नीतियों की वजह से उनका देश एक खतरनाक फासिस्ट शिफ्ट से गुज़र रहा है. वे कहती हैं कि फासीवाद तानाशाही के बगैर भी पनप सकता है.
हालांकि आम अमरीकी यह मानने को तैयार नहीं होता कि 9/11 के बाद उसका देश किसी भी तरह नाज़ी जर्मनी और चिली के फासीवाद और सर्वसत्तावादी कालखण्ड के समकक्ष बनता जा रहा है, लेकिन एक बहुत छोटे किंतु प्रतिबद्ध प्रकाशक के यहां से प्रकाशित वुल्फ की महज़ 192 पृष्ठों की किताब यह स्थापित करने में पूरी तरह कामयाब है कि उन समाजों और आज के अमरीकी समाज के बीच की समानांतरता और समानताओं या कि अनुगूंजों को अनसुना नहीं किया जा सकता. इस तरह यह किताब एक साथ ही चौंकाती है, डराती है और हमारी संवेदनाओं को झकझोरती है.
नोआमी वुल्फ इस किताब में 30 के दशक के जर्मनी, 40 के दशक के रूस, 50 के दशक के पूर्वी जर्मनी, 60 के दशक के चेकोस्लोवाकिया, 70 के दशक के चिली और 80 के दशक के चीन के परिदृश्य से 2000 के बाद के अमरीका की समानताएं दिखाकर प्रजातंत्र के सम्भावित पटाक्षेप के खिलाफ जनमत जगाने का मूल्यवान प्रयास करती हैं. वे साफ शब्दों में कहती हैं कि प्रजातंत्र ऐसा तमाशा नहीं है जिसे दर्शक दीर्घा में बैठकर देख जाए. अमरीका के संस्थापकों ने ऐसे देश की कल्पना नहीं की थी जहां वकील, स्कॉलर, राजनीतिज्ञ जैसे प्रोफेशनल ही संविधान की व्याख्या और जनाधिकारों की चिंता करें. उन लोगों ने यह कभी नहीं चाहा था कि आम लोगों से अलग ताकतवर लोग आज़ादी की रक्षा करें. उन्होंने तो यह चाहा था कि आम लोग ही अपनी आज़ादी की रक्षा करें. अमरीका के संस्थापकों ने आज़ादी को नैसर्गिक, ईश्वर प्रदत्त और ऐसी व्यवस्था कभी नहीं कहा-समझा जिसमें सभ्यता स्वत: बनी रहेगी. बल्कि उन्होंने तो अत्याचार और दमन को यथास्थिति तथा स्वाधीनता को अपवाद माना. ऐसा अपवाद जिसको पाने के लिए संघर्ष किया जाए और जो अगर मिल जाए तो उसे सीने से लगाकर रखा जाए. नोआमी वुल्फ को शिकायत है कि अमरीकियों ने प्रजातंत्र को बहुत अगम्भीरता से लिया है, जबकि इसका तो अस्तित्व ही नागरिकों की सहभागिता और सक्रियता पर निर्भर है.
किताब अमरीका को सम्बोधित है, लेकिन हम भारतीयों के लिए भी इसकी प्रासंगिकता कम नहीं है. आज अमरीका इतनी बडी वैश्विक शक्ति बन चुका है कि वहां की हर छोटी-बडी हलचल शेष विश्व को भी प्रभावित करती है. अगर वहां प्रजातंत्र का क्षरण होता है तो उसका असर हम सब पर भी पडेगा. इस बात के अतिरिक्त भी, जो बातें नोआमी अमरीका को सम्बोधित कर कह रही हैं, उन्हें हमें भी सुनना और गुनना चाहिए. कभी पण्डित नेहरु ने भी तो कहा था : एटर्नल विजिलेंस इज़ द प्राइस ऑफ लिबर्टी.
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चर्चित पुस्तक :

The End of America: Letter of Warning To A Young Patriot
By Naomi Wolf
Publisher: Chelsea Green Publishing; White River Jct., VT 05001,USA
Pages: 192
US $ 13.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत प्रकाशित.



Thursday, January 10, 2008

हंसाते-हंसाते रुला देने वाला उपन्यास

पडौसी देश पाकिस्तान से हाल ही में आया ‘खोया पानी’ व्यंग्य(और हास्य भी) का एक अनूठा उपन्यास है. टोंक में जन्मे और अब लन्दन में रह रहे मुश्ताक़ अहमद यूसुफी का यह उपन्यास (हिन्दी अनुवाद: तुफैल चतुर्वेदी) पांच कहानी नुमा निबन्धों या निबन्ध नुमा कहानियों से बुना हुआ है. कहानियां हैं हवेली, धीरजगंज का पहला यादगार मुशायरा, स्कूल मास्टर का ख्वाब, खण्डहर में दीवाली, और कार, काबुलीवाला और अलादीन बेचिराग. उपन्यास में कोई एक सीधी सपाट कथा नहीं है, लेकिन जो वृत्तांत है उससे मुख्य चरित्र गुस्सैल किबला यानि बिशारत के ससुर, खुद बिशारत फारूक़ी और मुल्ला अब्दुल मन्नान आरसी भिक्षु और उनका परिवेश कुछ इस तरह साकार होते है आपके मुंह से एक साथ ही ‘वाह’ और ‘आह’ दोनों निकल पडते हैं. उपन्यास की एक बडी ताकत इसकी चुस्त-चपल और हास्य-व्यंग्य से भरपूर भाषा है. कुछ बानगियां देखें :
•शेर को इस तरह नाक से गाकर सिर्फ वही मौलवी पढ सकता है जो गाने को वाकई हराम समझकर गाता हो. किसी शख्स को गाने, सूफीज़्म, फारसी और मौलवी चारों से एक ही समय में नफरत करानी हो तो मसनवी के दो शेर इस धुन में सुनवा दीजिए.
•शेरो-शायरी या नोविलों में देहाती ज़िन्दगी को रोमांटिसाइज़ करके उसकी निश्छलता, सादगी, सब्र और प्राकृतिक सौन्दर्य पर सर धुनना और धुनवाना और बात है लेकिन सचमुच किसी किसान के आधे पक्के या मिट्टी गारे के घर में ठहरना किसी शहरी इण्टेलेक्चुअल के बस का रोग नहीं.
•भोगे हुए यथार्थ के पर्दे में जितनी दाद तवायफ को उर्दू फिक्शन लिखने वालों से मिली उतनी अपने रात के ग्राहकों से भी न मिली होगी.
•बिशारत स्तब्ध रह गये, मर्द ऐसे मौकों पर खून कर देते हैं और नामर्द खुदकुशी कर लेते हैं. उन्होंने यह सब नहीं किया, नौकरी की जो क़त्ल और खुदकुशी दोनों से कहीं ज़ियादा मुश्क़िल है.
•अरे साहब! मैं भी एक बिज़नेसमैन को जानता हूं. उनके घर पर कालीनों के लिये फर्श पर जगह न रही तो दीवारों पर लटका दिये. कालीन हटा-हटा कर मुझे दिखाते रहे कि इनके नीचे निहायत कीमती रंगीन मारबल है.

लेखक का सबसे बडा कौशल इस बात में है कि वे हंसाते-हंसाते अचानक उदास कर देते हैं. मार्मिक चित्रण में तो वे बेजोड हैं. कुछ बानगियां देखें :
•यह कैसी बस्ती है. जहां बच्चे न घर में खेल सकते हैं न, बाहर. जहां बेटियां दो गज़ ज़मीन पर एक ही जगह बैठे-बैठे पेडों की तरह बडी हो जाती हैं, जब ये दुल्हन ब्याह के परदेस जायेगी तो इसमे मन में बचपन और मायके की क्या तस्वीर होगी? फिर खयाल आया, कैसा परदेस, कहां का परदेस. यह तो बस लाल कपडे पहन कर यहीं-कहीं एक झुग्गी से दूसरी झुग्गी में पैदल चली जाएगी. यही सखी सहेलियां “काहे को ब्याही बिदेसी रे! लिखी बाबुल मोरे!” गाती हुई इसे दो गज़ पराई ज़मीन के टुकडे तक छोड आयेंगी. फिर एक दिन मेंह बरसते में जब ऐसा ही समां होगा, वहां से अंतिम दो गज़ ज़मीन की ओर डोली उठेगी और धरती का बोझ धरती की छाती में समा जायेगा.
•कब्रिस्तान भी सीख लेने की जगह है. कभी जाने का मौक़ा मिलता है तो हर कब्र को देख ध्यान आता है कि जिस दिन इसमें लाश उतरी होगी, कैसा कुहराम मचा होगा. रोने वाले कैसे बिलख-बिलख, कर तडप-तडप कर रोये होंगे. फिर यही रोने वाले दूसरों को रुला-रुला कर यहीं बारी-बारी मिट्टी का पैबन्द होते चले गये. साहब ! यही सब कुछ होना है तो फिर कैसा शोक किसका दुखा, काहे का रोना.

या ये सूक्ति नुमा वाक्य देखिये :
•देहात में वक़्त भी बैलगाडी में बैठ जाता है.
•जिन कामों में मेहनत अधिक पडती है लोग उन्हें नीचा और घृणित समझते हैं.
•आप रिश्वतखोर, व्यभिचारी और शराबी को हमेशा मिलनसार और मीठे स्वभाव का पायेंगे. इस वास्ते कि वो अक्खडपना, सख्ती और बदतमीज़ी एफोर्ड कर ही नहीं सकता.
•आज काम तो बडे हो रहे हैं, मगर आदमी छोटे हो गए हैं.

उपन्यास में कथाओं-उपकथाओं के शीर्षक देने में भी गज़ब की कलाकारी है. जानी-पहचानी गज़लों, गीतों और मिस्रों को शीर्षक बना कर जो लज़्ज़त पैदा की गई है, उसका क्या कहना! हम चुप रहे, हम रो दिये; कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या; जग में चले पवन की चाल; कोई दीवार सी गिरी है अभी; एक उम्र से हूं लज़्ज़ते-गिरियां से भी महरूम; कश्का खेंचा, दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया; वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है आदि.

लेखक बीते ज़माने की तस्वीर बनाता है, खुद उसके मज़े लेता है, आपको हंसाता है, व्यंग्य करता है और अचानक कोई ऐसी बात कह जाता है कि आपकी आंखें नम हो जाती हैं. उसकी सहानुभूति सर्वत्र वंचित के साथ है. कहीं भी वह उसके प्रति क्रूर नहीं होता. उपन्यास अतीत और वर्तमान के बीच बहुत सहजता से आता-जाता है. यह उपन्यास एक ऐसी रचना है जिसकी उत्कृष्टता का असल अनुभव इसे खुद पढकर ही किया जा सकता है. जब आप इसे पढते हैं तो इसके एक-एक वाक्य, एक-एक प्रसंग के साथ डूबते-उतरते हैं, लेकिन जब पढकर खत्म करते हैं तो बरबस फिराक़ गोरखपुरी याद आ जाते हैं :
आए थे हंसते खेलते मैखाने में फिराक़
जब पी चुके शराब तो संज़ीदा हो गए!
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चर्चित पुस्तक:
खोया पानी (अद्भुत व्यंग्य उपन्यास)
मुश्ताक़ अहमद यूसुफी
अनुवाद : तुफैल चतुर्वेदी
प्रकाशक : लफ्ज़, प-12, नर्मदा मार्ग, सेक्टर – II, नोएडा-201301
पहला संस्करण : 2007
पृष्ठ : 348
मूल्य : 200.00

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत दिनांक 10 जनवरी 2008 को प्रकाशित.

Thursday, January 3, 2008

विज्ञान गल्प का समृद्ध संसार

हमारे समय के सबसे ज़्यादा चर्चित-प्रशंसित कथाकारों में से एक, फाहरेनहाइट 451 सहित 30 से अधिक पुस्तकों के लेखक 90 वर्षीय रे ब्रेडबरी की नई किताब नाऊ एण्ड फॉरएवर: समव्हेयर अ बैण्ड इज़ प्लेइंग एण्ड लेवियाथन ’99 कृतित्व के दो नितांत भिन्न आयामों से हमारा परिचय कराती है. रे ब्रेडबरी की ख्याति विज्ञान कथा और फैण्टेसी लेखक के रूप में अधिक है. इस किताब में उनकी अब तक अप्रकाशित दो उपन्यासिकाएं हैं.
पहली उपन्यासिका समव्हेयर अ बैण्ड इज़ प्लेइंग को आलोचकों ने एक स्वर से ब्रेडबरी की ‘फाहरेनहाइट 451’ के बाद की श्रेष्टतम रचना माना है. उपन्यासिका का प्रारम्भ होता है एक कविता से जिसका आशय कुछ इस तरह से है कि कहीं एक बैण्ड बज रहा है, उसे सुनो. अगर तुमने उसकी धुन को सुन लिया तो तुम सदा नृत्य रत रहोगे, और मौत सदा को शांत हो जाएगी.. इस कविता को पढते हुए उपन्यासिका का मुख्य पात्र पत्रकार जेम्स कार्डिफ अपनी आंखें मूंद लेता है और क्रमश: समरटन, एरिज़ोना नामक एक विलक्षण कस्बे की तरफ आकृष्ट होता है. वह उसी रात ट्रेन पकड कर अपने सपनों के इस कस्बे की ओर चल पडता है जहां कोई ट्रेन रुकती ही नहीं है क्योंकि यह कस्बा नक्शे तक में नहीं है. अंतत: वह चलती ट्रेन से ही इस कस्बे में कूद पडता है. वहां उसका ऐसे स्वागत होता है जैसे उसका इंतज़ार ही किया जा रहा हो. रेगिस्तान के बीच में बसा यह समरटन लगभग स्वर्ग जैसा ही है. स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ और उत्कृष्ट मदिरा से भरा. गाडियों में लदी ताज़ा ब्रेड हर रोज़ कस्बा वासियों को मिलती है, हर घर के हरे-भरे तराशे हुए खूबसूरत लॉन में उगे विशाल सूरजमुखी के फूल सूरज को ताकते हैं, मीठी प्यारी हवा सांसों में ताज़गी भरती रहती है. और भी सब कुछ सर्वोत्क़ृष्ट. समय और उद्योग इस कस्बे को जल्दी ही बदल डालने को है. लेकिन कार्डिफ को लगता है कि कुछ महत्वपूर्ण है जो अनुपस्थित है. वहां न तो बच्चे हैं, न बेसबाल के बल्ले और न बास्केटबाल के खम्भे. है एक उजडा-सा स्कूल, जिसमें पढने वाला कोई नहीं है. कस्बे में केवल युवा हैं. कोई डॉक्टर भी वहां नहीं है. एक बहुत अजीब-सा कब्रिस्तान ज़रूर है. कस्बे के सारे लोग बहुत स्वस्थ और प्रमुदित हैं. अजीब इसलिए कि वहां कब्रों पर जो पत्थर लगे हैं. उन पर मृत्यु तिथि की बजाय जन्म तिथियां अंकित हैं. कस्बे में कोई न तो बूढा होता है और न मरता है. वहां हरेक व्यक्ति एक लेखक है. जेम्स को इजिप्शियन व्यू आर्म्स नामक एक विशाल विक्टोरियन बोर्डिंग हाउस में ले जाया जाता है. इसकी मालकिन है रहस्यमयी नेफ. बला की खूबसूरत और सम्मोहक. जेम्स को लगता है जैसे वह नेफ को युगों-युगों से जानता है और नेफ जैसे उसी का इंतज़ार कर रही है. महत्वपूर्ण है समरटन की हवा में फैली रहस्य की गंध. कार्डिफ उसी गंध को सूंघ कर उसका पीछा करता है और जो कुछ पाता है उसे हमारे लिए लिखता है. उसके मन में द्वन्द्व है कि क्या वह कस्बे वालों को यह बता दे कि सरकार बहुत जल्दी उस कस्बे को नेस्तनाबूद कर वहां एक हाइवे बनाने वाली है. उपन्यास का गद्य इतना काव्यात्मक है कि चाहें तो केवल उसके आस्वाद के लिए ही इसे पढ लें.
इस कथा से एकदम भिन्न है लेवियाथन ’99 की कथा. अगर संगीत की भाषा में कहें तो कह सकत हैं कि पहली कथा आलाप जैसी है और दूसरी किसी द्रुत गत जैसी. लेवियाथन दर असल हरमन मेलविल के सुप्रसिद्ध उपन्यास मॉबी डिक का आधुनिक रुपांतरण है. ब्रेडबरी पूरी ज़िन्दगी मॉबी डिक से प्रभावित रहे हैं. 1955 में उन्हें इस उपन्यास का स्क्रीन प्ले तैयार करने को कहा गया था. अपने वर्तमान रूप में ब्रेडबरी का यह लघु उपन्यास सफेद व्हेल और पागल कप्तान अहाब के साथ ब्रेडबरी की मुठभेड की परिणति है. इस कथा का काल 2099 है और यह घटित होती है एक विशाल जहाज सेस्टस 7 पर. एक जहाजी इस्माइल जोंस अपनी जान बचाने और कप्तान के आदेश का पालन करने के द्वन्द्व में फंसा है. अन्धा और पागल कप्तान ब्रह्माण्ड के सर्वाधिक प्रभावशाली और विनाशक धूमकेतु लेवियाथन से आतंकित है.यहां ब्रेडबरी ने मेलविल की व्हेल को धूमकेतु में रुपांतरित किया है. उन्होंने ने मेलविल की कथा की दार्शनिक गहनता को भी बहुत खूबी से उभारा है.
ब्रेडबरी जब किसी स्थान का वर्णन करते हैं तो लगता है जैसे आप वहां मौज़ूद हैं और जब वे किसी मौसम के बारे में लिखते हैं तो आप खुद उस मौसम का अनुभव करते हैं. ब्रेडबरी के लेखन के रसज्ञों का कहना है कि यहां उनकी कल्पनाशीलता अपने चरम पर है. दोनों उपन्यासिकाओं का अंत बता कर मैं अपने पाठकों के सुख को छीनने का अपराधी नहीं बनना चाहता. विज्ञान कथा लेखन के शीर्ष रचनाकार ब्रेडबरी की ये दोनों उपन्यासिकाएं आपको कुछ इस तरह अभिभूत करती हैं कि इनके प्रभाव से मुक्त होने का मन ही नहीं करता.
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राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स में 3 जनवरी 2008 को प्रकाशित.

Thursday, December 27, 2007

ऐसे भी पढा जा सकता है किताब को

पेरिस विश्वविद्यालय में फ्रेंच साहित्य के प्रोफेसर और प्रतिष्ठित मनोविश्लेषक पियरे बेयार्ड की बहु चर्चित किताब का मूल फ्रेंच से जेफ्री मेहलमान द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद ‘हाऊ टू टाक अबाउट बुक्स यू हेवण्ट रेड’ इधर खूब पढा जा रहा है. बावन वर्षीय प्रोफेसर बेयार्ड ने इस मज़ेदार और ऊपर से हल्की लगने वाली किताब के माध्यम से उन लोगों की मदद करने का रोचक प्रयास किया है जो विद्वत्समाज में इस बात से शर्मिन्दगी महसूस करते हैं कि उन्होंने कोई खास क्लैसिक या चर्चित किताब नहीं पढी है. बेयार्ड पहले तो उन्हें यह कहकर दिलासा देते हैं कि न पढने वालों की बिरादरी बहुत बडी है. वे बताते हैं कि पॉल वेलेरी को लेखकों से उनकी अन-पढी किताबों की तारीफ के अनेक तरीके आते थे और मोन्तेन को अपना पढा प्राय: याद नहीं रहता था. इतना ही नहीं, बेयार्ड ग्राहम ग्रीन, डेविड लॉज आदि उपन्यासकारों के ऐसे अनेक चरित्रों की भी याद दिलाते हैं जो पढने की ज़रूरत पर ही प्रश्न चिह्न लगाते रहे हैं. इतना करने के बाद बेयार्ड किसी किताब को बिना पढे उसके बारे में बात करने के तरीके सुझाते हैं. यह करते हुए वे बलपूर्वक कहते हैं कि पढना क़तई ज़रूरी नहीं है, और वे खुद अनेक पुस्तकों को बिना पढे या महज़ उनके पन्ने पलट कर उनके बारे में अपने विद्यार्थियों को प्रभावशाली व्याख्यान दे चुके हैं.
किताब का रोचक हिस्सा वह है जहां बेयार्ड आपको यह सलाह देते हैं कि अगर आप किसी सुसंस्कृत, सुपठित समुदाय में किसी पुस्तक की चर्चा के दौरान फंस जाएं तो क्या करें! वे सलाह देते हैं कि आपको भी उसी तरह की किसी अन्य किताब का ज़िक्र छेड देना चाहिए, या उसी लेखक की किसी अन्य किताब की बात करने लग जाना चाहिए. अगर यह मुमकिन न हो तो अपनी ही लिखी किसी किताब या उस किताब पर जिसे आप लिखना चाहते हैं, बात करने लग जाना चाहिए. वैसे आप वह भी कर सकते हैं जो अनेक समीक्षक करते हैं: किताब की भूमिका पढ लें और उसका अंतिम अध्याय देख लें. इतना भी सम्भव न हो तो उसकी विषय सूची ही देख लें. और अगर आपका सामना किसी पुस्तक के लेखक से ही हो जाए तो? बेयार्ड सलाह देते हैं कि आप उनसे कहें कि यह आपकी उत्कृष्टम रचना है, या कि इस बार तो आपने कमाल ही कर दिया. यानि विस्तार में जाए बगैर प्रशंसा करें. और फिर आहिस्ता से चर्चा को रचना से हटाकर रचनाकार पर ले आएं. हर लेखक खुद के बारे में बात करके प्रसन्न होता है.
वैसे वास्तव में यह किताब एक किताब विरोधी का सर्जन नहीं है. खुद लेखक ने कहा है कि “यह किताब एक ऐसे काल्पनिक चरित्र की सृष्टि है जो न पढने की डींगें हांकता है, और वह चरित्र मैं नहीं हूं.” उन्होंने ऐसी किताब क्यों लिखी, इसका जवाब उन्होंने यह कहकर दिया है कि वे फ्रांस के लोगों, विद्यार्थियों और आमजन के मन में बैठे उस सांस्कृतिक डर को भगाना चाहते थे जो साहित्य को लेकर उत्पन्न कर दिया गया है. यहीं यह बता देना भी आवश्यक है कि फ्रांस में किताबों को बहुत पवित्र माना जाता है और वहां लेखक की हैसियत धर्मगुरु और रॉक स्टार के बीच की है. वस्तुत: पाश्चात्य संस्कृति ने किताबों को लगभग उसी तरह पूजा की वस्तु बना दिया है जिस तरह उसने स्तनों और धन को बना दिया है. हमारा पढना एक ऐसे क्षयकारी आदर्शवाद से संचालित होता है जो हमें एक प्रच्छ्न्न लज्जा भाव से भरता रहता है कि हमें इस किताब को और अधिक अच्छी तरह से पढना चाहिये था. बेयार्ड इसे गलत मानते हैं. वे किसी भी किताब को शब्दश: पढने के पक्ष में नहीं हैं और कहते हैं कि असल पढना तो करीब-करीब न पढना ही है. इसे और खोलते हुए वे कहते हैं कि न पढने से आशय कुछ ऐसी सकारात्मक वैकल्पिक क्रियाओं से है जिन्हें हमें अपनाना और अपने बच्चों को भी सिखाना चाहिए, जैसे किताबों के आवरणों को देखना और उनके आरम्भिक अंशों को पढना वगैरह. बेयार्ड मानते हैं कि किसी किताब की गहन जानकारी से अधिक महत्वपूर्ण है किसी ‘सामूहिक पुस्तकालय’ के परिप्रेक्ष्य में उस किताब की अवस्थिति से परिचित होना. सामूहिक पुस्तकालय से उनका आशय है उस तरह की किताबों का समूह. बेयार्ड का कहना है कि किताब को आरम्भ से अंत तक पढने के अलावा और तरह से भी पढा जा सकता है. यहां-वहां से, या पन्ने पलटकर. आखिर किताब की महता तो उसमें सर्वत्र विद्यमान होती है. आप पन्ने पलटते हैं तब भी उसकी श्रेष्ठता के सम्पर्क में तो आते ही हैं. इसके अलावा, किताब की महत्ता इस बात में भी तो निहित होती है कि उसकी समग्र अवधारणा आपके जीवन से कैसे बावस्ता होती है.

दर असल इस किताब का उद्देश्य है लोगों को अधिक आज़ादी के साथ पढने के लिए प्रेरित करना. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही लेखक ने एक गम्भीर विषय को हास्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है.
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Discussed book:
How to Talk About Books You Haven’t Read
By Pierre Bayard
Translated from French By Jeffrey Mehiman
Published By Bloomsbury, USA
Pages 208
$ 19.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत 27 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित.

Thursday, December 20, 2007

सूचना प्रौद्योगिकी, चीन और भारत

आज की दुनिया की आर्थिक हलचलों के किसी भी जागरूक अध्येता से पूछें कि वर्तमान समय का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक बदलाव क्या है, तो उत्तर इसके सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता: चीन और भारत का अभ्युदय. बात को आगे बढाएं और जानने की कोशिश करें कि दुनिया के जिस उद्योग-व्यवसाय पर अब तक पश्चिम का वर्चस्व रहा है, उस पर इस अभ्युदय का क्या प्रभाव हो सकता है, तो निश्चय ही कई उत्तर मिलेंगे. यह स्वाभाविक भी है.

एक प्रसिद्ध सूचना प्रौद्योगिकी सलाहकार समूह गार्टनर से सम्बद्ध दो जाने-माने विश्लेषकों जेम्स एम. पॉपकिन और पार्थ आयंगार की नई किताब ‘आई टी एण्ड द ईस्ट: हाऊ चाइना एण्ड इण्डिया आर आल्टरिंग द फ्यूचर ऑफ टेक्नोलॉजी एण्ड इन्नोवेशन’ ने यही किया है. बेशुमार आंकडों, तथ्यों और उनके गहन विश्लेषण से वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझने के प्रयत्न में जब वे चीन और भारत के लिए कहते हैं कि ऐसे प्रतिस्पर्धी हमने अपने जीवन में तो देखे नहीं, तो उनसे असहमत होना कठिन होता है.
किताब मोटे तौर पर तीन मुख्य खण्डों में विभाजित है. पहला खण्ड भारत को, दूसरा चीन को और तीसरा संयुक्त रूप से दोनों को समर्पित है. लेखक ने चाइना और इण्डिया को मिलाकर एक नया शब्द गढा है: चिण्डिया. प्रथम दो खण्डों में क्रमश: भारत व चीन के इतिहास, अर्थ तंत्र और उसकी दिशाओं का वर्णन है. इन खण्डों में प्रत्येक देश के लिए 2012 तक की अर्थ-यात्रा की परिकल्पना भी की गई है. ऐसा करते हुए हर देश के लिए तीन सम्भावित मार्गों पर विचार किया गया है. भारत के बारे में लेखक द्वय को सर्वाधिक सम्भावना यह लगती है कि यहां संरचनात्मक सुधार तो खूब होंगे लेकिन शैक्षिक संस्थानों पर अभिजात वर्ग का वर्चस्व बरकरार रहेगा. इस कारण हेव्ज़ और हेव नॉट्स के बीच की खाई भी बनी रहेगी. लेखक द्वय कहते हैं कि एक बन्द सरकारी व्यवस्था वाला देश होने की वजह से चीन के भविष्य की कल्पना का खाका खींचना अपेक्षाकृत कठिन है. हो सकता है, चीन एक गतिशील उद्यमी ताकत बन जाए, या फिर संरक्षणवादी खोल में जा घुसे. दोनों देशों की बात करते हुए वे कहते हैं कि इन्हें ऐसी राह चुननी चाहिए जो एक दूसरे की कमज़ोरियों और ताकतों से तालमेल रख सके. अगर ऐसा किया गया तो भारत और चीन हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों ही के बाज़ारों की ऐसी ताकत बन जाएंगे जिससे मानव संसाधन और लागत, किसी भी मोर्चे पर पार पाना किसी भी देश के लिए कठिन होगा.
भारत और चीन दुनिया के श्रेष्ठतम कम्प्यूटर वैज्ञानिक और सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं. पश्चिम की बडी से बडी कम्पनियां अपना असेंबली कार्य तो पहले ही से इन दोनों देशों को आउटसोर्स कर रही हैं, अब तो वे नवाचारों के लिए भी इनकी तरफ देखने लगी हैं. फिर भी, एक अध्ययन यह बताता है कि चीन के केवल दस प्रतिशत स्नातक ही वैश्विक निगमों में सीधे भर्ती की पात्रता रखते हैं, शेष के लिए कम से कम छह माह का प्रशिक्षण आवश्यक होता है. भारत की स्थिति भी बहुत भिन्न नहीं है. हालांकि भारत के कुल सेवा निर्यात का उनचास प्रतिशत(वर्ष 2003-04 में 25 बिलियन डॉलर) सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में ही है और इसमें प्रतिवर्ष छत्तीस प्रतिशत की दर से इज़ाफा हो रहा है, और अगर इतना ही काफी न हो तो यह भी कि दुनिया के ऑफ शोरिंग का दो तिहाई भारत को ही मिल रहा है, हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी संतोषप्रद नहीं है. यहां के स्नातकों में से मात्र पच्चीस प्रतिशत ही बहुराष्ट्रीय निगमों में सीधे प्रवेश की योग्यता रखते हैं. इसके अलावा, लाइसेंस परमिट के झमेलों के मामलों में हम अमरीका से ही नहीं, चीन से भी बदतर स्थिति में हैं. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियां तो हैं ही, क्षेत्रीय और धार्मिक विवाद, सरकार में घुसे अपराधी तत्व, नीतियों पर बेवजह की खींचतान, भाषाओं की विविधता आदि भी तस्वीर को धुंधलाने में अपना अपना योग देते हैं. ये ही कारण हैं कि वर्ष 2004-05 में भारत को बाह्य निवेश के रूप में साढे पांच बिलियन डॉलर मिले, जबकि उसी अवधि में चीन को एक सौ तरेपन बिलियन डॉलर की प्राप्ति हुई. चीन का प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय उत्पाद भी भारत से दुगुना है.
इस तरह की अन्य अनेक किताबों की तरह यह किताब भी पश्चिम के और विशेष रूप से वहां के बहुराष्ट्रीय निगमों के नज़रिये से लिखी गई है, लेकिन इसके बावज़ूद यह हमें अपनी कमियों और क्षमताओं को समझने में बहुत मदद देती है. इस तरह की किताबें यह भी बताती हैं कि भारत और चीन में किस तरह पश्चिम की दिलचस्पी बढती जा रही है. कहना अनावश्यक है कि इस बढती दिलचस्पी का सबसे ज़्यादा फायदा हमारी युवा पीढी को मिलना है.
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Disucssed Book :
IT and the East: How China and India Are Altering the Future of Technology and Innovation
By: James M. Popkin and Partha Iyengar
Published by: Harvard Business School Press
Hardcover, 226 pages.

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स में 20 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित.


Monday, December 17, 2007

लघु कथा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी


रायपुर । छत्तीसगढ़ की बहुआयामी और रचनाकारों की सांस्कृतिक संस्था "सृजन-सम्मान" द्वारा आगामी 16-17 फरवरी को रायपुर में नये समय की सबसे कारगर विधा लघुकथा पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है । विमर्श का केंद्रीय विषय "लघुकथाः नई सदी की केंद्रीय विधा" रखा गया है । इस राष्ट्रीय विमर्श में लघुकथा आंदोलन से संबंद्ध रहे 100 सक्रिय लघुकथाकार सहित लगभग 300 साहित्यकार, पत्रकार, शिक्षाविद् एवं आलोचक सम्मिलित होंगे ।
विमर्श एवं ग्रंथ हेतु शोध आलेख आमंत्रितसंस्था द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव की कड़ी के रूप में होने वाले इस राष्ट्रीय विमर्श में लघुकथा विधा के विभिन्न आयामों पर आलेख वाचन, संवाद एवं हस्तक्षेप का सत्र रखा गया है । विमर्श में प्राप्त आलेखों का प्रकाशन भी किया जायेगा। संगोष्ठी हेतु लघुकथाकारों, शिक्षाविदों, आलोचकों, साहित्यकारों से निःशुल्क आलेख आमंत्रित किया जा रहा है ।
आलेख भेजने के नियमः-1. मूल आलेख अधिकतम 3-4 पृष्ठ का होना चाहिए । विस्तृत आलेख अलग से भेजा सकता है ।2. आलेख टाइप या हस्तलिखित हो सकता है किन्तु वह पठनीय हो ।3. आलेख के साथ रचनाकार अपना फोटो, संक्षिप्त परिचय अवश्य भेजें । 4. प्रविष्टि प्राप्ति की अधिकतम तिथि 30 जनवरी, 2008 ।५. अंतिम रूप से चयनित 45 आलेख लेखक विमर्श में आलेख वाचन कर सकेंगे । लेखक विमर्श में समुपस्थित रह सकेंगे । उनके आलेखों का प्रकाशन भी किया जायेगा । 6. समस्त आलेख लेखकों को प्रकाशित विमर्श-कृति की एक-एक प्रति निःशुल्क भेंट की जायेगी । 7. विमर्श के सम्मिलित प्रतीभागियों के आवास, भोजन आदि की निःशुल्क व्यवस्था संस्था द्वारा की जायेगी ।
लघुकथाकार के विकास में योगदान देने वालों का सम्मानहिंदी लघुकथा की विधा के विकास में संघर्षरत रहे एवं अपनी रचनात्मकता से इस विधा को गति देने वाले देश के वरिष्ठ लघुकथाकारों, लघुकथा केंद्रित पत्रिका संपादकों, आलोचकों, शोधार्थियों, अनुवादकों, संगठनों का इस साहित्य महोत्सव में राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी किया जायेगा । उन्हें इस अवसर पर देश के प्रख्यात साहित्यकारों, आलोचकों एवं महामहिम राज्यपाल, संस्कृति मंत्री, शिक्षामंत्री के करकमलों से "लघुकथा-गौरव" एवं "सृजन-श्री" अलंकरण प्रदान कर उनके साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया जायेगा । सम्मान स्वरूप रचनाकारों को एक प्रशस्ति-पत्र, प्रतीक चिन्ह, 1000 रूपयों की साहित्यिक कृतियाँ भेंट की जायेगी ।
\n\u003cp\>इस हेतु एक चयन समिति का गठन किया गया है जो देश के प्रमुख विद्वानों से प्राप्त संस्तुतियों पर अंतिम निर्णय देगी । इस सम्मान हेतु लघुकथा विधा से संबंद्ध रचनाकार, आलोचक, पत्रिका संपादक सहित आदरणीय लघुकथा पाठक भी अपना खुला प्रस्ताव दे सकते हैं । \n\u003c/p\>\n\u003cp\>\u003cfont color\u003d\"#000099\"\>\u003cstrong\>लघुकथा पाठ का राष्ट्रीय आयोजन\u003c/strong\>\u003c/font\>\u003cbr\>इस महती आयोजन में 16 फरवरी, 2007 को रात्रि 8 बजे से 12 बजे तक राष्ट्रीय लघुकथा पाठ का आयोजन भी किया जा रहा है, जिसमें हिंदी सहित अन्य भाषाओं के लघुकथाकार भी हिंदी अनुवाद का पाठ कर सकेंगे । यह सत्र आंशिक रूप से खुला सत्र है। लघुकथा पाठ हेतु देश के सभी प्रदेशों के चुनिंदे लघुकथाकारों को आमंत्रित किया गया जा रहा है किन्तु इच्छुक लघुकथाकार भी लघुकथा पाठ हेतु संबंधित एवं प्रतिनिधि लघुकथा की एक प्रति डाक से भेज सकते हैं । लघुकथा पाठ हेतु लघुकथाकारों का अंतिम चयन कर उन्हें सूचित कर दिया जायेगा । लघुकथा पाठ हेतु प्रतिभागियों के भोजन एवं आवास की व्यवस्था संस्था द्वारा की जायेगी । \n\u003c/p\>\n\u003cp\>\u003cfont color\u003d\"#000099\"\>\u003cstrong\>लघुकथा प्रदर्शिनी\u003c/strong\>\u003c/font\>\u003cbr\>सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ के इस महत्वपूर्ण आयोजन में लघुकथा पर केंद्रित एक प्रदर्शिनी भी लगाई जायेगी जिसमें ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण लघुकथा, लघुकथा संग्रह, लघुकथा केंद्रित लघु-पत्रिका, विशेषांक आदि प्रदर्शित की जायेंगी । लघुकथा के संवर्धन एवं विकास से जुड़ी संस्थायें एवं लघुकथाकार अपनी सामग्री 30 जनवरी 2007 तक भेज सकते हैं । प्रदर्शित सामग्री वे प्रदर्शिनी पश्चात वापस ले सकते हैं । \n\u003c/p\>\n\u003cp\>\u003cfont color\u003d\"#000099\"\>\u003cstrong\>लघुकथा संग्रह हेतु रचनायें आमन्त्रित\u003c/strong\>\u003c/font\>\u003cbr\>संस्था द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में केंद्रित विषय पर एक उत्कृष्ट संग्रह का प्रकाशन भी विधागत उन्नयन हेतु किया जाता है । इसी कड़ी में इस वर्ष लघुकथा संग्रह का प्रकाशन भी संस्था द्वारा निःशुल्क किया जा रहा है । लघुकथाकार वर्ष 2005 से अब तक लिखी गई, प्रकाशित या अप्रकाशित केवल 1 प्रतिनिधि लघुकथा भेज सकते हैं । इस संग्रह का विमोचन भी उक्त अवसर पर किया जायेगा तथा लघुकथाकारों को एक-एक प्रति भेंट की जायेगी । लघुकथाकार अपनी लघुकथा 20 जनवरी, 2007 के पूर्व तक भेज सकते हैं । \n\u003c/p\>\n\u003cp\>\u003cstrong\>\u003cfont color\u003d\"#000099\"\>संपर्क-सूत्र-\u003c/font\>\u003c/strong\>\u003cbr\>१. जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान,एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001 (मोबाइल-94241-82664) ",1]
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इस हेतु एक चयन समिति का गठन किया गया है जो देश के प्रमुख विद्वानों से प्राप्त संस्तुतियों पर अंतिम निर्णय देगी । इस सम्मान हेतु लघुकथा विधा से संबंद्ध रचनाकार, आलोचक, पत्रिका संपादक सहित आदरणीय लघुकथा पाठक भी अपना खुला प्रस्ताव दे सकते हैं ।
लघुकथा पाठ का राष्ट्रीय आयोजनइस महती आयोजन में 16 फरवरी, 2007 को रात्रि 8 बजे से 12 बजे तक राष्ट्रीय लघुकथा पाठ का आयोजन भी किया जा रहा है, जिसमें हिंदी सहित अन्य भाषाओं के लघुकथाकार भी हिंदी अनुवाद का पाठ कर सकेंगे । यह सत्र आंशिक रूप से खुला सत्र है। लघुकथा पाठ हेतु देश के सभी प्रदेशों के चुनिंदे लघुकथाकारों को आमंत्रित किया गया जा रहा है किन्तु इच्छुक लघुकथाकार भी लघुकथा पाठ हेतु संबंधित एवं प्रतिनिधि लघुकथा की एक प्रति डाक से भेज सकते हैं । लघुकथा पाठ हेतु लघुकथाकारों का अंतिम चयन कर उन्हें सूचित कर दिया जायेगा । लघुकथा पाठ हेतु प्रतिभागियों के भोजन एवं आवास की व्यवस्था संस्था द्वारा की जायेगी ।
लघुकथा प्रदर्शिनीसृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ के इस महत्वपूर्ण आयोजन में लघुकथा पर केंद्रित एक प्रदर्शिनी भी लगाई जायेगी जिसमें ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण लघुकथा, लघुकथा संग्रह, लघुकथा केंद्रित लघु-पत्रिका, विशेषांक आदि प्रदर्शित की जायेंगी । लघुकथा के संवर्धन एवं विकास से जुड़ी संस्थायें एवं लघुकथाकार अपनी सामग्री 30 जनवरी 2007 तक भेज सकते हैं । प्रदर्शित सामग्री वे प्रदर्शिनी पश्चात वापस ले सकते हैं ।
लघुकथा संग्रह हेतु रचनायें आमन्त्रितसंस्था द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में केंद्रित विषय पर एक उत्कृष्ट संग्रह का प्रकाशन भी विधागत उन्नयन हेतु किया जाता है । इसी कड़ी में इस वर्ष लघुकथा संग्रह का प्रकाशन भी संस्था द्वारा निःशुल्क किया जा रहा है । लघुकथाकार वर्ष 2005 से अब तक लिखी गई, प्रकाशित या अप्रकाशित केवल 1 प्रतिनिधि लघुकथा भेज सकते हैं । इस संग्रह का विमोचन भी उक्त अवसर पर किया जायेगा तथा लघुकथाकारों को एक-एक प्रति भेंट की जायेगी । लघुकथाकार अपनी लघुकथा 20 जनवरी, 2007 के पूर्व तक भेज सकते हैं ।
संपर्क-सूत्र-१. जयप्रकाश मानस, सृजन-सम्मान,एफ-3, छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल, आवासीय कॉलोनी, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001 (मोबाइल-94241-82664)
या\u003cbr\>२. डॉ. सुधीर शर्मा, राष्ट्रीय संयोजक, सृजन-सम्मान, वैभव प्रकाशन, शिवा इलेक्ट्रानिक के पास, पुरानी बस्ती, रायपुर, 492001 (मोबाइल-94253-58748) या \n\u003cbr\>३. श्री राम पटवा, महासचिव, सृजन-सम्मान, बसंत पार्क, गुरुतेगबहादूर नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001- (मोबाइल- 98271-78279)\u003c/p\>\n\u003cp\>\u003cfont color\u003d\"#000099\"\>\u003cstrong\>ई-मेल-\u003c/strong\>\u003c/font\>\u003cbr\>\u003ca href\u003d\"mailto:srijan2samman@gmail.com\" target\u003d\"_blank\" onclick\u003d\"return top.js.OpenExtLink(window,event,this)\"\>srijan2samman@gmail.com\u003c/a\> \u003c/p\>\u003c/blockquote\>\u003c/div\>\u003cbr\>प्रेषक- जयप्रकाश मानस\u003c/div\>\u003c/div\>\u003c/blockquote\>\n\u003cdiv\>रायपुर\u003c/div\>\u003c/div\>\u003cbr\>\n",0]
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या२. डॉ. सुधीर शर्मा, राष्ट्रीय संयोजक, सृजन-सम्मान, वैभव प्रकाशन, शिवा इलेक्ट्रानिक के पास, पुरानी बस्ती, रायपुर, 492001 (मोबाइल-94253-58748) या ३. श्री राम पटवा, महासचिव, सृजन-सम्मान, बसंत पार्क, गुरुतेगबहादूर नगर, रायपुर, छत्तीसगढ़-492001- (मोबाइल- 98271-78279)
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Tuesday, December 11, 2007

जगजीत सिंह का गाया एक हिन्दी गीत्

जगजीत सिंह का नाम किसी परिचय का मोहताज़ नहीं रह गया है. गज़ल को उन्होंने भारत में जो लोकप्रियता प्रदान की है, उसकी प्रशंसा करना मानो सूरज को दीपक दिखाना है. मैं वह नहीं करूंगा.
लेकिन, जगजीत की गायकी का एक पक्ष प्राय: अनदेखा किया गया है. उन्होंने कुछ बहुत उम्दा हिन्दी गीत भी गाए हैं - इस तरफ लोगों का ध्यान कम ही गया है. यह भी कि हिन्दी गीतों को भी उतनी ही अच्छी तरह से गाया जा सकता है, जितनी अच्छी तरह से उर्दू गज़लों-नज़्मों को गाया गया है.
सुनिए जगजीत की मखमली आवाज़ में यह गीत. इसकी भाषा के माधुर्य पर भी ध्यान दीजिए, और फिर बताइये कि जगजीत को ऐसे ही और गीत क्यों नहीं गाने चाहिए?

http://www.esnips.com/doc/6790588f-1404-4e98-8d9c-25da098f980a/Bujh-Gayee-Tapate-Hue-Din-Ki-Agan/?widget=flash_turning

http://www.esnips.com/doc/6790588f-1404-4e98-8d9c-25da098f980a/Bujh-Gayee-Tapate-Hue-Din-Ki-Agan




Friday, December 7, 2007

जीवन की पाठशाला के सबक

मेरे बूढे प्रोफेसर की आखिरी कक्षाएं सप्ताह में एक दिन उनके अध्ययन कक्ष की खिडकी के पास होती थी जहां से वे एक छोटे-से जपाकुसुम से झरती पीली पत्तियों को देख सकते थे. कक्षा हर मंगलवार को होती थी. विषय होता था : जीवन का मक़सद. इसे अनुभवों से पढाया जाता था.
कोई अंक नहीं दिये जाते, लेकिन हर सप्ताह मौखिक परीक्षा होती. सवालों के जवाब देने होते थे, लेकिन आप सवाल पूछ भी सकते थे. विद्यार्थी को कुछ मशक्कत भी करनी होती थी – जैसे तकिये पर प्रोफेसर का सर टिकाना, या उनकी नाक पर चश्मे को ठीक करना. विदा के वक़्त चुम्बन के लिए अतिरिक्त श्रेय दिया जाता था.
किताबों की ज़रूरत नहीं थी, फिर भी बहुत सारे विषय जैसे प्रेम, कर्म, समुदाय, परिवार, बुढापा, क्षमा और अंतत: मृत्यु, पढाये गए. अंतिम लेक्चर बहुत संक्षिप्त था, महज़ चन्द शब्दों का.
दीक्षांत समारोह के रूप में हुआ अंतिम संस्कार.
कोई वार्षिक परीक्षा नहीं होनी थी, लेकिन अपेक्षा थी कि जो सीखा गया है उसके आधार पर एक लम्बा पर्चा लिखा जाएगा. वही पर्चा यहां प्रस्तुत है.
मेरे प्रोफेसर की अंतिम कक्षा में केवल एक विद्यार्थी था.
मैं ही वह विद्यार्थी था.

जाने माने स्पोर्ट्स लेखक मिश अल्बॉम की बहु-प्रसंसित और बेस्ट सेलर पुस्तक ‘ट्यूज़डे’ज़ विद मॉरी : एन ओल्ड मेन, अ यंग मेन, एण्ड लाइफ्स ग्रेटेस्ट लेसंस’ की ये पंक्तियां आपको एक ऐसे विरल अनुभव जगत में ले जाती हैं जिसके प्रभाव और सम्मोहन से उबर पाना लगभग संभव है. 1958 में न्यू जर्सी में जन्मे मिश ने 1979 में मैसाचुएट्स राज्य के ब्रैडाइज़ विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि अर्जित की. यहां उन्हें सुविख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर मॉरी श्वार्ट्ज़ (जन्म 1916) का विद्यार्थी होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. हालांकि गुरु ने शिष्य से कहा था कि वह सम्पर्क बनाए रखे लेकिन मिश पढाई पूरी कर जीवन की व्यस्तताओं में ऐसे डूबे कि यह वादा पूरा नहीं कर पाए. एक रात टी वी चैनल पलटते-पलटते उन्हें अपने प्रोफेसर की सुपरिचित आवाज़ सुनाई दी और वे उनसे सम्पर्क को व्याकुल हो उठे. लम्बी दूरी तै कर मिश मॉरी के पास पहुंचे और फिर शुरू हुई उनकी मंगलवारीय कक्षाएं.
इस बीच प्रोफेसर के जीवन में भी बहुत कुछ घटित हो चुका है. साठ के होते-होते वे अस्थमा के शिकार हो चुके थे. सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी. कुछ बरसों बाद चलने में मुश्किल होने लगी. सत्तर तक पहुंचते-पहुंचते और भी बीमारियों ने उन्हें घेर लिया. और 1995 में एक दिन लम्बी जांच–पडताल के बाद डॉक्टर ने उन्हें बताया कि वे एमियोट्रॉपिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ए एल एस) नामक गम्भीर और लाइलाज़ बीमारी के भी शिकार हैं.
1995 के मध्य का यही वह समय था जब मिश ने मॉरी से मुलाक़ातों के दूसरे सिलसिले की शुरुआत की. इस दूसरे दौर में पहली बार वे एक मंगलवार को मिले और इसके बाद हर मंगलवार को मिलने का एक क्रम बन गया. इन कुल 14 मंगलवारीय मुलाक़ातों में शिष्य ने अपने गुरु से जीवन का मक़सद विषय पढा. पढाई के दौरान अक्सर गुरु अपने शिष्य का हाथ थामे रहता. उनके बीच का रिश्ता गुरु-शिष्य से भी आगे बढकर पिता-पुत्र का हो गया था. अपने एकदम अंतिम दिनों में मॉरी ने कहा भी कि अगर उनके एक और संतान हो सकती तो वे चाहेंगे कि वह संतान मिश ही हो.

मॉरी-मिश सम्वाद का यह वृत्तांत उनके विश्वविद्यालयीय काल की स्मृतियों के फ्लैशबैक से सज्जित है. अपने इन चौदह पाठों में मॉरी बार-बार कहते हैं कि प्रेम मनुष्य जीवन और हर रिश्ते का सार तत्व है और प्रेम के बगैर रहना मानो न रहने जैसा है. मॉरी अपने प्रिय कवि डब्ल्यू एच ऑडेन को भी इस सन्दर्भ में उद्धृत करते हैं. मॉरी आज की पॉप्युलर कल्चर पर भी तीखी टिप्पणियां करते हैं. वे मिश को सलाह देते हैं कि वह पॉप्युलर कल्चर को त्याग कर खुद की एक ऐसी संस्कृति रचे जो प्रेम, स्वीकृति और मानवीय श्रेष्ठता पर आधारित हो तथा नैतिक मूल्यों की संवाहक हो. उन्हें लगता है कि पॉप्युलर कल्चर लालच, स्वार्थ और उथलेपन पर टिकी है और मानवता को नुकसान पहुंचा रही है. मॉरी मिश को बुढापे और मृत्यु को स्वीकार करने की भी सलाह देते हैं क्योंकि ये दोनों अपरिहार्य हैं. खुद मॉरी अपनी आसन्न मृत्यु को बडे तटस्थ और अनासक्त भाव से लेते हैं. यह अनासक्ति उन्होंने बौद्ध दर्शन से सीखी थी.
यह किताब उन किताबों में से है जिन्हें अगर आप चाहें तो यह कह कर एक दम खारिज़ कर सकते हैं कि इसमें नया क्या है. लेकिन अगर आप इसे पढने लगते हैं तो फिर इसमें डूबते जाते हैं, और जब पढकर पूरी करते हैं तो लगता है कि आपका पुनर्जन्म हुआ है. शायद यही कारण है इस किताब को हाल की सर्वाधिक लोकप्रिय किताबों में से एक माना जा रहा है.
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Discussed book :
Tuesdays with Morrie : An Old Man, a Young Man, and Life’s Greatest Lessons
By : Mitch Albom
Published By: Mass Market Paperback/ Anchor
208 Pages
राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में दिनांक 06 दिसम्बर '07 को मेरे कॉलम 'जस्ट जयपुर' में प्रकाशित.



मॉरी उवाच

मृत्यु जीवन को खत्म करती है, रिश्ते को नहीं.
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जब आप मरना सीख लेते हैं, जीना अपने आप आ जाता है.
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जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है यह जानना कि प्यार कैसे लुटाया जाए और कैसे प्यार को अपनी ज़िन्दगी में आ जाने दिया जाए.
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सब कुछ जाना जा चुका है, सिवा इसके कि ज़िन्दगी को जिएं कैसे.
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आप लहर नहीं हैं, आप तो समुद्र का अंश हैं.
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शरद देवडा नहीं रहे.

हम कैसे स्मृति विहीन समय में रह रहे हैं. जो लोग कुछ समय पहले तक हमारी ज़िन्दगी के केन्द्र में थे, आज वे हाशिये पर भी नहीं हैं.
मुझे अच्छे तरह याद है कि जब साठ के दशक में मैं कॉलेज का विद्यार्थी था, शरद देवडा का नाम मन में कितना उद्वेलन पैदा करता था. उनके उपन्यास कॉलेज स्ट्रीट के नए मसीहा के माध्यम से मैंने और मेरी पीढी ने बीटनीक जनरेशन का ककहरा पढा था. उन्हीं के एक और उपन्यास 'टूटती इकाइयां' को पढा तो यह समझा कि कथा में प्रयोग करना किसे कहते हैं. वे ज्ञानोदय के सम्पादक रहे, और आज की पीढी को यह बताना ज़रूरी है कि उस ज़माने में ज्ञानोदय का मतलब था साहित्य का शीर्ष. फिर अणिमा निकाली और खूब धूम धाम से निकाली.
प्रयोग करने की उनकी लालसा कभी चुकी नहीं. आकाश एक आपबीती और प्रेमी प्रेमिका सम्वाद में भी उन्होंने भरपूर प्रयोग किए. कभी कभी लगता है कि वे अपने समय से कुछ आगे के रचनाकार थे. आगे होते- होते वे आज 7 दिसम्बर 07 को जयपुर में इस दुनिया से ही कूच कर गए.

हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि.

Thursday, November 29, 2007

समतल नहीं हुई है दुनिया

लगभग दो साल पहले न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तम्भकार थॉमस फ्रीडमेन की एक किताब आई थी, ‘द वर्ल्ड इज़ फ्लैट’. इस किताब में स्थापित किया गया था कि कई घटकों ने, जिनमें तकनोलोजी प्रमुख है, बेहतर कनेक्टिविटी देकर और पारस्परिक सहयोग को बढाकर दुनिया को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए समतल बना डाला है. किताब बहुचर्चित रही और अभी भी बेस्ट सेलर सूचियों में जगह बनाये हुए है. शायद ही किसी ने फ्रीडमेन की इस स्थापना से असहमति जताई हो कि वैश्वीकरण हो चुका है. अधिकतर असहमतियां वैश्वीकरण के पक्ष-प्रतिपक्ष को लेकर हुई हैं.

लेकिन हाल ही में आई भारतीय मूल के प्रोफेसर पंकज घेमावत की किताब ‘रीडिफाइनिंग ग्लोबल स्ट्रेटेजी: क्रॉसिंग बॉर्डर्स इन अ वर्ल्ड व्हेयर डिफरेंसेस स्टिल मैटर’ इस अवधारणा का पुरज़ोर तरीके से खण्डन करती है. पंकज बार्सीलोना के आई ई एस ई बिज़नेस स्कूल और हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल में प्रोफेसर हैं. अपने एक लेख के लिए 2005 में उन्हें मैक किंसे अवार्ड से भी नवाज़ा जा चुका है.

पंकज ने यह किताब फ्रीडमेन की किताब के जवाब में नहीं लिखी है. वे तो इस विषय पर पिछले दस सालों से काम कर रहे थे. उनकी दिलचस्पी यह जानने में थी कि क्यों कई शक्तिशाली उत्पाद वैश्विक बाज़ार में पिट जाते हैं, बावज़ूद इसके कि उनके ब्राण्ड नाम सुस्थापित होते हैं और उन्हें सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोडी जाती है. अपने सवाल का जवाब तलाशते हुए पंकज ने उन कई घटकों की पडताल की जिन्हें वैश्वीकरण का सूचक माना जाता है, जैसे लोगों, सूचना और धन का प्रवाह. इसके बाद उन्होंने यह पडताल की कि इनमें से कितने घटक देशों की सीमाओं के भीतर प्रवाहित होते हैं और कितने सीमाओं के पार! तभी उन्हें ज्ञात हुआ कि ज़्यादा संचरण तो देशों की सीमाओं के भीतर ही होता है. इससे पंकज इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि हम प्राय: सीमा पर के भेदों की अनदेखी कर जाते हैं. बडे उत्पादक बडे बाज़ार में अपना माल बेच डालने के लालच में, दुनिया को सीमा रहित मानने का भ्रम पालते हुए, सारी दुनिया के लिए मार्केटिंग की यकसां रणनीति तैयार करते हैं और फिर मुंह के बल गिरते हैं. पंकज ज़ोर देकर कहते हैं कि हमें दुनिया के देशों में जितनी समानताएं दिखाई जाती हैं असमानताएं उनसे बहुत अधिक हैं. यही कारण है कि दुनिया को फ्लैट मानकर अपना माल बेचने की रणनीतियां प्राय: असफल हो जाती हैं.

व्यापारिक रणनीतिकारों की एक बडी चूक पंकज को यह भी दिखाई देती है कि वे प्रवृत्तियों की बजाय छिट-पुट छवियों के आधार पर अपनी धारणाएं बनाते हैं और आंख मूंदकर वैश्वीकरण को स्वीकार कर लेते हैं. इस चूक को दुरुस्त करने के लिए पंकज आंकडा-आधारित प्रवृत्ति विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं. वे बताते हैं कि पूरी दुनिया की आबादी का महज़ 2.9 प्रतिशत ही इमिग्रेट हुआ है. इसी तरह पूरी दुनिया के पूंजी निवेश का मात्र दस प्रतिशत ही फॉरेन डाइरेक्ट इंवेस्टमेंट में लगा है और सबसे खास बात इण्टरनेट पर सूचनाओं की आवाजाही: पंकज तथ्यों के हवाले से बताते हैं कि तमाम सूचनाओं का मात्र बीस प्रतिशत अंश ही देशों की सीमाओं को लांघ पाता है. यानि 80 प्रतिशत सूचनाएं तो देशों की सीमाओं के भीतर ही संचारित होती हैं.

इन आधारों पर पंकज फ्रीडमैन की स्थापनाओं को खारिज करते हुए कहते हैं कि दुनिया अभी भी मोटे तौर पर असमतल ही है और संस्कृति, भौगोलिक स्थितियां, प्रशासनिक व आर्थिक संरचनाएं वगैरह अभी भी महत्वपूर्ण बनी हुई हैं.
दरअसल पंकज की यह किताब बडे व्यवसायों के हित चिंतन के लिहाज़ से लिखी गई है. पंकज उन्हें बताना चाहते हैं कि वे यह भ्रम कतई न पालें कि सारी दुनिया यकसां हो गई है और उसे एक ही तरह का उत्पाद एक समान तरीके से बेचा जा सकता है. इसीलिए पंकज उन्हें समझाते हैं कि दुनिया अभी भी सेमी-ग्लोबलाइज़ेशन (अर्ध वैश्वीकरण) की अवस्था में है. इस तथ्य को समझकर ही व्यावसायिक कामयाबी की मंज़िल तक पहुंचा जा सकता है. यहीं पंकज यह कहना भी नहीं भूलते कि दुनिया के देशों के बीच के ये भेद व्यवाय के लिए कोई बाधा नहीं हैं. बल्कि, अगर कम्पनियां चाहें तो इन भेदों से और अधिक फायदे भी उठा सकती हैं.

ऐसा करने के लिए वे उन्हें एक रणनीति भी सिखाते हैं. इसके तीन मुख्य घटक हैं : ट्रिपल ए ट्राएंगल, केज और एडिंग. पंकज समझाते हैं कि किस तरह इन घटकों का इस्तेमाल कर कार निर्माता टोय़ोटा, सीमेण्ट निर्माता सीमेक्स, रिटेल श्रंखला वाल मार्ट, हेल्थकेयर उत्पादक प्रॉक्टर एण्ड गेम्बल, आई टी वाले आई बी एम, कोका कोला आदि ने सफलता प्राप्त की है. किताब का केन्द्र बिन्दु यह रणनीति ही है,

किताब का महत्व इस बात में है कि यह फ्रीडमेन के सोच पर एक अन्य कोण से विचार करने को प्रेरित करती है.
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Discussed Book:

Re defining Global Strategy: Crossing Borders in a World Where Differences Still Matter
By: Pankaj Ghemawat
Hardcover: 304 pages
Published by: Harvard Business School Press

$ 29.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' में 29 नवम्बर 2007 को प्रकाशित.

Friday, November 23, 2007

पिकासो की जीवनी

दुनिया के महानतम चित्रकारों में से एक पाब्लो पिकासो की जीवनी का बहु प्रतीक्षित तीसरा खण्ड हाल ही में आया है. जॉन रिचर्डसन ने, जो इससे पहले मॉनेट और ब्रेक़ जैसे चित्रकारों पर भी लिख चुके हैं और अमरीका में क्रिस्टी की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निबाह चुके हैं, 608 पन्नों के इस खण्ड में पिकासो के जीवन के मध्यवर्ती काल पर रोशनी डाली है.
‘अ लाइफ ऑफ पिकासो : द ट्रायम्फेण्ट ईयर्स 1917-1932’ शीर्षक यह खण्ड 1917 से प्रारम्भ होता है जब पिकासो युद्धकालीन पेरिस को छोड परेड नामक प्रस्तुति के लिए रोम जाते हैं. इसी काल खण्ड में वे नेपल्स भी जाते हैं जहां के क्लासिकी स्थापत्य का उनके भावी कला कर्म पर अमिट प्रभाव पडता है. पेरिस में वे रूसी बैलेरिना ओल्गा खोखलोवा के प्रेम में कुछ इस तरह डूबते हैं कि अपनी बोहेमियन ज़िन्दगी का परित्याग कर पेरिस की अभिजात जीवन शैली को अंगीकार कर लेते हैं. यह भी एक वजह है कि वे नव क्लासीवाद की तरफ मुडकर आखिरकार घनवादी शैली को अपना लेते हैं. इसे उनके कला कर्म का डचेस काल भी कहा जाता है. जीवनी के इस खण्ड में रिचर्डसन अपने वृत्तांत को वहां से उठाते हैं जहां पिकासो अपने घनवादी (क्यूबिस्ट) काल के बाद दियाघिलेव के बैले के लिए कॉस्ट्यूम डिज़ाइन करने और नव-क्लासिकी काल में प्रवेश करने को तत्पर हैं. इसी काल खण्ड में ओल्गा खोखलोवा के साथ, जो उनकी एकमात्र वैध संतान पाओलो की मां भी है, उनके दाम्पत्य जीवन का वृत्तांत भी समाहित है. रिचर्डसन ने पिकासो की कला-यात्रा और उनके जीवन में आई अनेक स्त्रियों के बीच का अंत: सम्बन्ध बहुत कुशलता से उकेरा है.

1923 की गर्मियों में पिकासो और उनके अमरीकी दोस्त गेराल्ड तथा सारा मर्फी होटल डू केप के मालिकों को इस बात के लिए मना लेते हैं कि वे अपने फ्रेंच रिवेरा को शीतकालीन रिसोर्ट से ग्रीष्मकालीन रिसोर्ट में तब्दील कर दें. इस परिवर्तन के कारण फ्रेंच रिवेरा यूरोपीय कला का एक महत्वपूर्ण घटनास्थल बन जाता है. पिकासो की ज़िन्दगी का एक अन्य महत्वपूर्ण वर्ष है 1927. इस वर्ष वे एक 17 वर्षीया कन्या मेरी थेरेसे वाल्टर के प्यार में कुछ इस तरह मुब्तिला होते हैं कि दुनिया-जहान की सुध बुध ही खो बैठते हैं. स्वाभाविक है कि उनकी पत्नी इस बात को सहन नहीं कर पाती है. उधर मेरी के प्यार में पागल पिकासो इसी वजह से पत्नी से नफरत करने लगते हैं. जीवनीकार रिचर्डसन ने बहुत बारीकी से इस त्रिकोण की मन:स्थितियों का चित्रण किया है.
किताब के आखिरी तीन अध्याय 1931 से 1932 के उस काल खण्ड को समर्पित हैं जब पिकासो अपने जीवन की अर्ध शती पूरी करते हैं. समय बीतने के साथ उनकी यह धारणा मज़बूत होने लगती है कि चित्रकला एक जादुई कर्म है. यहां आते-आते पिकासो स्थापत्य का पुनराविष्कार करते हैं और क्लासिकी परम्परा का पिकासीकरण करते हैं. 1932 की गर्मियों में पेरिस और ज्यूरिख में हुई प्रदर्शनियों में वे आधुनिक कला के पुरोधा के रूप में स्थापित हो जाते हैं.

पिकासो की जीवनी का यह खण्ड उनकी ज़िन्दगी के एक बेहद जटिल दौर को सामने लाता है. यह काल खण्ड यूरोपीय इतिहास में भी उतना ही जटिल और उथल-पुथल भरा है. कला के लिहाज़ से पिकासो इस काल में ‘थ्री म्यूज़ीशियंस’ में घनवादी ज्यामितियां दर्शाते हैं तो परिवार और दोस्तों के नव-क्लासिकी पोर्ट्रेट भी रचते हैं. इसी काल में वे अत्यधिक साहसिक प्रयोगशील स्थापत्यों के त्रि-आयामी रूपों से भी खेलते हैं. यही वह काल है जब पिकासो थिएटर की दुनिया से भी गहन प्रेरणा लेते हैं. दरअसल उनके इस काल के सृजन को समझने के लिए थिएटर एक महत्वपूर्ण कुंजी है.
रिचर्डसन हालांकि पिकासो की जीवनी के इस खण्ड में एक हद तक सुपरिचित कथा कहते हैं, उनका अन्दाज़े-बयां कुछ ऐसा है कि यह सब पढते हुए हम न केवल पिकासो की कला को बल्कि उस पूरे काल-खण्ड की कला-संस्कृति की हलचलों को भी बेहतर तरीके से समझ पाते हैं. रिचर्डसन पिकासो की अनेक कृतियों की भी सूक्ष्मता से चर्चा और व्याख्या करते हैं. 1929 की एक न्यूड पेंटिंग का विश्लेषण करते हुए वे याद दिलाते हैं कि यह पेंटिंग कूर्वे की एक पेंटिंग की उन चट्टानों की याद दिलाती है जो मोपांसा की रचनाओं से प्रेरित हैं. स्वभावत: इस तरह के ब्यौरे हमें पेंटिंग की तहों तक ले जाते हैं. रिचर्डसन के लिए पिकासो एक ऐसे महामानव हैं जिनके समस्त क्रियाकलाप तर्क, व्याख्या और आलोचना से परे हैं.
निश्चय ही आधुनिक चित्रकला के रसिकों के लिए यह किताब पिकासो के जीवन और उनकी कला को और अधिक खोलने में पूरी तरह कामयाब है. हमें अब बहुत बेसब्री से इस किताब के चौथे और आखिरी खण्ड का इंतज़ार है.
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Discussed book :
A Life of Picasso: The Triumphant Years, 1917-1932
By John Richardson
Publisher : Knopf
Pages : 608
US $ 40


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत 22 नवम्बर 2007 को प्रकाशित.