Tuesday, August 11, 2015

चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँJaipur

नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की एक कहानी बहुत चर्चित रही थी – ‘दिल्ली में एक मौत’. महानगर के लोगों के लिए मौत भी किस तरह एक भावहीन रूटीन हो जाती है, इस बात को उभारने वाली इस कहानी ने लोगों को चौंकाया  कम व्यथित ज्यादा किया था. मौत का नाम आते ही एक औसत भारतीय अतिरिक्त संवेदनशील हो उठता है. कबीर के बहुत सारे पद याद आने लगते हैं. जैसे यह:
                                हम का ओढ़ावै चदरिया चलती बिरियाँ।
                                प्रान राम जब निकसन लागे उलट गई दोउ नैन पुतरियाँ।।
                                भीतर से जब बाहर लाये छूट गई सब महल अटरियाँ।।
                                चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँ।।
                                कहत कबीर सुनो भाई साधो संग चलीं वह सूखी लकरियाँ।। 

लेकिन बदलते समय का क्या कीजिए जिसमें यह भावुकता भी बहुत तेज़ी से विस्थापित होती जा रही है! इधर सुनने में आया है कि बहुत सारी ऑनलाइन कम्पनियां खुल गई हैं जो अंतिम  संस्कार का सारा प्रबन्ध  अपने बलिष्ठ कन्धों पर लेने को बेताब  हैं. आप बस एक बार इन्हें सेवा का मौका तो दीजिए. इनके नाम देखिये ना: पण्डितजीऑनलाइन डॉट कॉम, गयापहुंचाओ  डॉट  कॉम, काशीमोक्ष डॉट कॉम, मातृगया डॉट कॉम आदि. ये ऑनलाइन कम्पनियां पण्डित, कर्मकाण्ड आदि का सारा प्रबन्ध करने का वादा करती हैं. मुझे बहुत रोचक बात तो यह लगी कि इससे भी आगे बढ़कर कुछ कम्पनियां हनीमून पैकेज की  तर्ज पर  अंतिम संस्कार टुअर पैकेज भी पेश करने लगी हैं जिनमें आपको अस्थि विसर्जन के लिए सुपरिचित धार्मिक नगरों में ले जाने, वहां पण्डों आदि की विश्वसनीय व्यवस्था करने और समग्र कर्मकाण्ड विधि विधान पूर्वक पूरा कराने के वादे किए जाते हैं. बहुत सारी कम्पनियां हैं जो आपकी गैर हाजिरी में आपकी तरफ से भी ये सारे धार्मिक कृत्य करने को तत्पर हैं. आप उन्हें कूरियर से अस्थियां भेज दें, बाकी काम उनका. अगर आप चाहेंगे तो वे अस्थि विसर्जन की वीडियो क्लिप बनाकर आपको भेज देंगे जिसे आप वॉट्सएप पर अपने परिजनों के साथ साझा भी भी कर सकेंगे. कई कम्पनियां इससे पहले वाले यानि दाह संस्कार के दायित्व निबाहने  को भी तैयार हैं.

सवाल यह है कि इस बदले परिदृश्य को कैसे देखा जाए? क्या यह कहकर अपनी पीड़ा ज़ाहिर की जाए कि देखो कैसा आ ज़माना गया है! लोग कितने संवेदनशून्य हो गए हैं! या इस आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की जाए?  जब मैं अपने चारों तरफ के माहौल पर नज़र डालता हूं तो पाता हूं कि हालात बहुत बदल गए हैं. पहले जहां लोग बल्कि कई पीढ़ियां एक ही गांव, कस्बे या शहर में अपना जीवन बिता लेते थे, आज लोग दो-चार पांच बरस भी अगर एक शहर में टिक जाएं तो उन्हें अपनी गतिशीलता पर सन्देह होने लगता है. लोग शहर बदलते हैं, नौकरियां बदलते हैं और यह सब करते हुए उनका परिवेश खुद ब खुद बदल जाता है. ऐसे में अब न वे पण्डित रह गए हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आपके सुख दुख में काम आते थे और न वे दोस्त पड़ोसी और सहकर्मी हैं जिनसे आपका कोई खास नाता हो. सब कुछ गतिशील और परिवर्तनशील. कबीर ने जिन चार लोगों के द्वारा खाट उठाने का ज़िक्र किया वे चार लोग भी कहां से लाएं? आप किसी नए शहर में पहुंचते हैं जहां आपकी कोई जड़ें नहीं होती हैं. तब पारम्परिक रूप से तो रस्मों और कर्मों का निर्वहन नहीं हो सकता ना! कोई न कोई विकल्प तो चाहिये!

और इसी विकल्पहीनता को लपक लेता है बाज़ार! अगर पण्डित नहीं है, कोई जानकार नहीं है, कोई परिजन नहीं है तो वो यानि सेवा प्रदाता तो  है ना! हम देखते हैं कि विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर भी ईवेण्ट मैनेजमेण्ट के रूप में बाज़ार परिजनों की कमी महसूस नहीं होने देने का हर मुमकिन जतन करता है, तो शोक में क्यों न वह अपना दायित्व वहन करे? मुझे लगता है कि यह पारस्परिक  जरूरत का मामला है. बाज़ार को आपका पैसा चाहिए और आपको अपनी रस्मों और दायित्वों के निर्वहन की तमाम सुविधाएं, जिन्हें अन्यथा जुटा पाना अब आपके लिए सम्भव नहीं रह गया है. ऐसे में, भले ही अंतिम संस्कार पैकेज की बात आपको चौंकाए या आहत करती प्रतीत हो, इसकी ज़रूरत और एक हद तक इसके औचित्य से इंकार कर पाना भी सम्भव नहीं लगता. अब देखिये ना, अगर पारस्परिक संवाद की जगह दूरभाष ने ले ली है, चिट्ठी की जगह ई मेल ने ले ली है, कष्ट और श्रम साध्य तीर्थयात्रा की जगह सुविधापूर्ण और द्रुत यात्राओं ने ले ली है तो और और मामलों में बदलाव क्यों नहीं आएंगे? और कड़वा ही सही यथार्थ  यह है कि आप भले ही न चाहें बदलाव तो आते ही हैं, और आप भी रो-झींक कर उन्हें स्वीकार करते हैं.

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 11 अगस्त, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 
नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की एक कहानी बहुत चर्चित रही थी – ‘दिल्ली में एक मौत’. महानगर के लोगों के लिए मौत भी किस तरह एक भावहीन रूटीन हो जाती है, इस बात को उभारने वाली इस कहानी ने लोगों को चौंकाया  कम व्यथित ज्यादा किया था. मौत का नाम आते ही एक औसत भारतीय अतिरिक्त संवेदनशील हो उठता है. कबीर के बहुत सारे पद याद आने लगते हैं. जैसे यह :                        
                                हम का ओढ़ावै चदरिया चलती बिरियाँ।
                                प्रान राम जब निकसन लागे उलट गई दोउ नैन पुतरियाँ।।
                                भीतर से जब बाहर लाये छूट गई सब महल अटरियाँ।।
                                चार जने मिली खाट उठाइन रोवत लै चले डगर-डगरियाँ।।
                                कहत कबीर सुनो भाई साधो संग चलीं वह सूखी लकरियाँ।। 

लेकिन बदलते समय का क्या कीजिए जिसमें यह भावुकता भी बहुत तेज़ी से विस्थापित होती जा रही है! इधर सुनने में आया है कि बहुत सारी ऑनलाइन कम्पनियां खुल गई हैं जो अंतिम  संस्कार का सारा प्रबन्ध  अपने बलिष्ठ कन्धों पर लेने को बेताब  हैं. आप बस एक बार इन्हें सेवा का मौका तो दीजिए. इनके नाम देखिये ना: पण्डितजीऑनलाइन डॉट कॉम, गयापहुंचाओ  डॉट  कॉम, काशीमोक्ष डॉट कॉम, मातृगया डॉट कॉम आदि. ये ऑनलाइन कम्पनियां पण्डित, कर्मकाण्ड आदि का सारा प्रबन्ध करने का वादा करती हैं. मुझे बहुत रोचक बात तो यह लगी कि इससे भी आगे बढ़कर कुछ कम्पनियां हनीमून पैकेज की  तर्ज पर  अंतिम संस्कार टुअर पैकेज भी पेश करने लगी हैं जिनमें आपको अस्थि विसर्जन के लिए सुपरिचित धार्मिक नगरों में ले जाने, वहां पण्डों आदि की विश्वसनीय व्यवस्था करने और समग्र कर्मकाण्ड विधि विधान पूर्वक पूरा कराने के वादे किए जाते हैं. बहुत सारी कम्पनियां हैं जो आपकी गैर हाजिरी में आपकी तरफ से भी ये सारे धार्मिक कृत्य करने को तत्पर हैं. आप उन्हें कूरियर से अस्थियां भेज दें, बाकी काम उनका. अगर आप चाहेंगे तो वे अस्थि विसर्जन की वीडियो क्लिप बनाकर आपको भेज देंगे जिसे आप वॉट्सएप पर अपने परिजनों के साथ साझा भी भी कर सकेंगे. कई कम्पनियां इससे पहले वाले यानि दाह संस्कार के दायित्व निबाहने  को भी तैयार हैं.

सवाल यह है कि इस बदले परिदृश्य को कैसे देखा जाए? क्या यह कहकर अपनी पीड़ा ज़ाहिर की जाए कि देखो कैसा आ ज़माना गया है! लोग कितने संवेदनशून्य हो गए हैं! या इस आ रहे बदलाव को समझने की कोशिश की जाए?  जब मैं अपने चारों तरफ के माहौल पर नज़र डालता हूं तो पाता हूं कि हालात बहुत बदल गए हैं. पहले जहां लोग बल्कि कई पीढ़ियां एक ही गांव, कस्बे या शहर में अपना जीवन बिता लेते थे, आज लोग दो-चार पांच बरस भी अगर एक शहर में टिक जाएं तो उन्हें अपनी गतिशीलता पर सन्देह होने लगता है. लोग शहर बदलते हैं, नौकरियां बदलते हैं और यह सब करते हुए उनका परिवेश खुद ब खुद बदल जाता है. ऐसे में अब न वे पण्डित रह गए हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी आपके सुख दुख में काम आते थे और न वे दोस्त पड़ोसी और सहकर्मी हैं जिनसे आपका कोई खास नाता हो. सब कुछ गतिशील और परिवर्तनशील. कबीर ने जिन चार लोगों के द्वारा खाट उठाने का ज़िक्र किया वे चार लोग भी कहां से लाएं? आप किसी नए शहर में पहुंचते हैं जहां आपकी कोई जड़ें नहीं होती हैं. तब पारम्परिक रूप से तो रस्मों और कर्मों का निर्वहन नहीं हो सकता ना! कोई न कोई विकल्प तो चाहिये!

और इसी विकल्पहीनता को लपक लेता है बाज़ार! अगर पण्डित नहीं है, कोई जानकार नहीं है, कोई परिजन नहीं है तो वो यानि सेवा प्रदाता तो  है ना! हम देखते हैं कि विवाह जैसे मांगलिक अवसर पर भी ईवेण्ट मैनेजमेण्ट के रूप में बाज़ार परिजनों की कमी महसूस नहीं होने देने का हर मुमकिन जतन करता है, तो शोक में क्यों न वह अपना दायित्व वहन करे? मुझे लगता है कि यह पारस्परिक  जरूरत का मामला है. बाज़ार को आपका पैसा चाहिए और आपको अपनी रस्मों और दायित्वों के निर्वहन की तमाम सुविधाएं, जिन्हें अन्यथा जुटा पाना अब आपके लिए सम्भव नहीं रह गया है. ऐसे में, भले ही अंतिम संस्कार पैकेज की बात आपको चौंकाए या आहत करती प्रतीत हो, इसकी ज़रूरत और एक हद तक इसके औचित्य से इंकार कर पाना भी सम्भव नहीं लगता. अब देखिये ना, अगर पारस्परिक संवाद की जगह दूरभाष ने ले ली है, चिट्ठी की जगह ई मेल ने ले ली है, कष्ट और श्रम साध्य तीर्थयात्रा की जगह सुविधापूर्ण और द्रुत यात्राओं ने ले ली है तो और और मामलों में बदलाव क्यों नहीं आएंगे? और कड़वा ही सही यथार्थ  यह है कि आप भले ही न चाहें बदलाव तो आते ही हैं, और आप भी रो-झींक कर उन्हें स्वीकार करते हैं.

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Tuesday, August 4, 2015

थोड़ी-सी बेवफ़ाई......

कुछ बातें  ऐसी होती हैं जिनकी उड़ती-उड़ती-सी ख़बर तो होती है लेकिन जिनके बारे में आपको कोई पुष्ट प्रामाणिक जानकारी नहीं होती है,  और जब वो जानकारी आपको मिलती है तो आप न सिर्फ  चौंक जाते हैं, आहत भी महसूस करते हैं.  हाल ही में जब मैंने कनाडा में अवस्थित एक ऑनलाइन डेटिंग और सोशल नेटवर्किंग सर्विस के हाईजैक हो जाने की ख़बर पढ़ी और सहज जिज्ञासावश इसके विस्तार में गया तो मेरे साथ यही हुआ. दो महिलाओं के लोकप्रिय नामों एशले और मैडिसन को जोड़कर बनाई गई यह सशुल्क सर्विस इतनी फैली हुई है कि दुनिया के 46 देशों में इसके करीब चार करोड़ सदस्य हैं. इस साल के आंकड़ों की मानें तो हर माह इसे करीब सवा करोड़ विज़िट्स मिलती हैं और इसे दुनिया की एडल्ट वेबसाइट्स में अठारहवां स्थान हासिल है. यह तो कोई ख़ास बात नहीं है. दुनिया में इस तरह की बहुत सारी सर्विसें और साइट्स मौज़ूद हैं. मेरा ध्यान तो इस साइट की तरफ इस खबर की वजह से गया कि इम्पैक्ट टीम नामक हैकरों के एक समूह ने यह दावा किया कि उन्होंने इस साइट के उपभोक्ता खज़ाने से लोगों की निजी जानकारियां चुरा लीं हैं और अगर इस साइट को फौरन बन्द नहीं कर दिया गया तो इस जानकारी को सार्वजनिक कर दिया जाएगा.

पड़ताल की तो मुझे यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि यह साइट हिन्दी में भी उपलब्ध है और इसकी टैग लाइन है: जीवन अल्प है. एक अफ़ेयर कर लें. इतना ही नहीं, भारत में फरवरी 2014 में लॉंच की गई इस सेवा के फिलहाल करीब पौने तीन लाख सशुल्क सदस्य हैं. इन सदस्यों में लगभग पचास हज़ार तो वे स्त्रियां हैं जो मुख्यत: दिल्ली और राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र में रहती हैं और इस सर्विस के लॉंच होने के पहले ही दिन इससे जुड़ गई थीं. भारतीय स्त्री पुरुषों और उनके वैवाहिक सम्बन्धों की एकनिष्ठता के बारे में जो आम छवि प्रचलित है, उसे वे आंकड़े जो इस सर्विस ने पिछले बरस जारी किए थे, छिन्न भिन्न कर देते हैं. सर्विस के एक सर्वे के अनुसार अब 76 प्रतिशत भारतीय स्त्रियां और 61 प्रतिशत भारतीय पुरुष बेवफाई को गुनाह या अनैतिक नहीं मानते हैं. यह सर्वे दस शहरों में 75,321 स्त्री-पुरुषों पर किया गया था और इसके उत्तर दाताओं में से 80 प्रतिशत विवाहित थे. अगर यह पढ़कर आप चौंके नहीं हैं तो फिर यह बात और जान लीजिए कि उत्तरदाताओं में से 80 प्रतिशत वे थे जिनकी पारम्परिक यानि अरेंज्ड शादी हुई थी और इन उत्तर दाताओं में से 81 प्रतिशत पुरुषों और 68 प्रतिशत स्त्रियों ने न केवल यह स्वीकार किया कि  उनके विवाहेत्तर सम्बन्ध हैं, उन्होंने यह भी माना कि इन सम्बन्धों  का उनके वैवाहिक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. इस सर्वे में जिन स्त्री पुरुषों को शामिल किया गया उनकी औसत उम्र क्रमश: 31 और 45 वर्ष थी. कहना अनावश्यक है कि ये तमाम जानकारियां बेहद चिंतित और क्षुब्ध करने वाली हैं.

असल में पति पत्नी के साथ  ‘वो’ की मौज़ूदगी  की बात हमारे फिल्म और टीवी धारावाहिक जैसे  लोकप्रिय मनोरंजन माध्यम तो काफी समय से करते आ रहे हैं और यह सिलसिला अभी भी जारी है. वरिष्ठ गांधीवादी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार कभी तब  के  बेहद लोकप्रिय एक साप्ताहिक में  पत्नी के अलावा एक अदद प्रेमिका की वकालत कर चुके हैं, यह बात बहुतों को याद होगी. लेकिन जिस सर्विस की मैंने चर्चा की है उस पर जो प्रवृत्ति सामने आ रही है वह मूलत: हमारे सामाजिक ढांचे में आ रहे बदलाव की चिंताजनक देन है. काम काज के तौर तरीके तेज़ी से बदल रहे हैं. पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियां भी ज़्यादा डिमाण्डिंग और चैलेंजिंग़ दायित्व स्वीकार करने लगी हैं, ज़्यादा यात्राएं, ज़्यादा समय तक ऑफिस में रुकना और अपने सहकर्मियों से निकटता के अवसर बढ़ना आम होता जा रहा है. इसी के साथ दाम्पत्य जीवन में साथ रहने के समय में भी स्वभावत: कमी आती जा रही है. मुझे याद आती है यह बात कि नीदरलैण्ड की टिलबर्ग यूनिवर्सिटी में  2011 में एक सर्वे में यह बात सामने आई थी कि बढ़ती जा रही आर्थिक और सामाजिक सशक्तता अब स्त्रियों को भी वही सुविधा दे रही है जिसका उपभोग पुरुष सदियों से करते आ रहे थे. लेकिन क्या यह ऐसी बात है जिस पर गर्व किया जाए? और क्या ऐसा ही हमारे अपने देश में भी नहीं हो रहा है?

सोचने की बात यह है कि चाहे एक छोटे और सीमित वर्ग में ही सही, विवाह संस्था के प्रति लोगों के नज़रिये में यह जो परिवर्तन आ रहा है क्या उसे हमारी परम्पराओं, हमारे मूल्यों  और सामाजिक संरचना की सेहत के लिए खतरे की घण्टी के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए?

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 04 अगस्त, 2015 को पति पत्नी और वो, बज रही है ख़तरे की घण्टी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.    

Tuesday, July 21, 2015

रफ़्तार-ए-उम्र पर ब्रेक

वैसे तो फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों की शादी की खबरें समाचार माध्यमों को कुछ ज़्यादा ही आकर्षित करती हैं, लेकिन हाल ही में जब यह खबर आई कि ‘दिल चाहता है’  और ‘लगान’  जैसी फिल्मों में काम कर चुकीं अभिनेत्री सुहासिनी मुले ने 2011 में मुम्बई के एक फिजिसिस्ट अतुल गुर्टू से शादी कर ली थी तो तमाम माध्यम यह बताना नहीं भूले कि उस समय सुहासिनी  साठ की और अतुल पैंसठ के हो चुके थे. बल्कि ख़ास  खबर ही यह थी कि साठ बरस की एक स्त्री ने पैंसठ  बरस के एक पुरुष से विवाह किया है. दरअसल हम सब बुढापे को लेकर कुछ ज़्यादा ही आक्रांत रहते हैं. हिन्दी के एक बड़े कवि हुए हैं केशवदास. उनके बारे में यह बात विख्यात है कि अपनी वृद्धावस्था में एक बार वे किसी कुएं पर बैठे हुए थे. तभी कुछ स्त्रियां वहां पानी भरने के लिए आईं और उन्हें ‘बाबा’ कह दिया. इस पर व्यथित होकर उन्होंने यह  दोहा कहा:  

केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिं।
चंद्रवदन  मृगलोचनी  बाबा कहि कहि जाहिं।।

इसे गद्य में कहें तो यह कि केशव दास कहते हैं कि मेरे साथ मेरे केशों (यानि सफेद बालों) ने जैसा  दुर्व्यवहार किया है वैसा तो शत्रु भी नहीं करते हैं. और यह दुर्व्यवहार क्या है? चांद जैसे चेहरे और हिरनी जैसी आंखों वालियां मुझे बाबा कहकर सम्बोधित कर रही हैं! ज़ाहिर है कि या तो उस ज़माने में बाल काला करने वाले रसायन सुलभ नहीं थे या केशव उनका प्रयोग नहीं करते थे! लेकिन बाल रंगने से भी क्या हो जाता है? काले बालों वाले क्या बूढ़े नहीं  होते? बुढ़ापा भी तो कई तरह से आता है! मिर्ज़ा ग़ालिब का एक बहुत मशहूर शे’र है: ग़ो हाथ को नहीं ज़ुम्बिश, आंखों में तो दम है/ रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे! शायर वृद्ध हो गया है, उसके हाथ अशक्त हो गए हैं, लेकिन मन की लालसाएं अभी भी बरक़रार हैं. वो यह कहते हुए मदिरा पात्र सामने रखे रहने  देने का अनुरोध कर रहा है कि उसकी आंखें अभी भी मदिरा पान  करने में समर्थ  हैं!

केशव और बिहारी दोनों मुझे याद इसलिए आए कि एक अंतर्राष्ट्रीय शोध समूह ने न्यूज़ीलैण्ड के एक ही शहर में 1972-73 में जन्मे 954 लोगों का अध्ययन कर प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज़ में एक रिपोर्ट प्रकाशित कराई है जिसके अनुसार एक ही साल में जन्म लेने वाले लोगों की बायोलॉजिकल उम्र अलग-अलग हो सकती है और होती है. आपको वो विज्ञापन तो ज़रूर याद होगा – साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान! ठीक वही बात  कि साठ साल का एक व्यक्ति बूढ़ा हो सकता है और साठ ही साल का दूसरा व्यक्ति जवान भी  हो सकता है. इस अध्ययन के दौरान पाया गया कि  कुछ लोगों की उम्र थम गई थी जबकि कुछ की उम्र तीन गुना तेज़ रफ्तार से बढ़ रही  थी यानि वे एक साल में तीन साल आगे जा रहे थे.

इस बात  को ठीक से समझने के लिए यह जानना उपयोगी होगा कि विशेषज्ञ हमारी उम्र को चार अलग-अलग तरहों से आंकते और मापते हैं. सबसे पहला और सुपरिचित तरीका वो है जिसे क्रोनॉलोजिकल (कैलेण्डर के मुताबिक बढ़ने वाली) उम्र कहते हैं. हमारी आम बातचीत इसी आधार पर होती है और तमाम जगहों पर हम इसी उम्र को दर्ज़ भी करते हैं.  लेकिन अब यह माना जाने लगा है कि उम्र की यह गणना दोषपूर्ण है. उम्र को मापने का दूसरा तरीका है बायोलॉजिकल उम्र या जैविक उम्र, जिसकी गणना कुछ ख़ास बायोमार्कर्स के आधार पर की जाती है और जिसमें शरीर के साथ-साथ मानसिक विकास और बदलाव को भी मद्देनज़र रखा जाता है. उक्त अध्ययन में इसी बायोलॉजिकल उम्र को आधार बनाया गया है. तीसरा तरीका है मनोवैज्ञानिक उम्र, जिसकी गणना का आधार मनुष्य के सोचने, तर्क करने और उसकी भावनात्मक परिपक्वता जैसी गैर शारीरिक विशेषताएं होती हैं. और चौथा तरीका  है फंक्शनल उम्र जो इन तीनों प्रकारों का मिश्रित रूप है.

ऊपर मैंने जिस रिपोर्ट का ज़िक्र किया उसमें एक ही साल में पैदा हुए लोगों के वज़न, उनके गुर्दों के काम करने के तरीके और मसूढों की तन्दुरुस्ती को परखा गया था. लेकिन इस रिपोर्ट का ज़्यादा महत्व इस बात में है कि अगर उम्र बढ़ने की रफ्तार के बारे में और अधिक अध्ययन हुआ तो बहुत मुमकिन है उम्र को बढ़ाने वाले कारणों का भी पता चल जाए और फिर उन कारणों पर नियंत्रण कर उम्र के बढ़ने की रफ्तार को कम भी कर लिया जाए! जिस तरह हमने रोगों पर काबू पाया है और बहुत सारे प्राणघातक रोगों से बिल्कुल मुक्ति   पा ली है उसे देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि अगर उम्र की रफ्तार पूरी तरह थम न भी जाए तो धीमी तो हो ही जाएगी.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़  टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 21 जुलाई, 2015 को रफ़्तारे उम्र पर ब्रेक, साठ साल का बूढ़ा या साठ साल का जवान शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ.    

Tuesday, July 14, 2015

काश! बूढ़ा पादरी फ्रांस में हुआ होता!

दो समाचार एक साथ पढ़ने को मिले. हाल ही में जर्मनी के बोन शहर में हुई यूनेस्को की 39 वीं सालाना बैठक में दुनिया की जिन 24 जगहों को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया, उनमें से दो फ्रांस से हैं. आपको याद ही होगा कि सन 2010  में इस सूची में हमारे अपने जंतर मंतर को भी शामिल किया गया था. लेकिन पहले बात फ्रांस की. फ्रांस की जिन दो जगहों और चीज़ों को इस बार विश्व विरासत का दर्ज़ा प्रदान किया गया है उनमें से एक है वहां की शैम्पेन इण्डस्ट्री से जुड़ी जगहें और दूसरी है वहां की विख्यात रेड वाइन के लिए अंगूर उगाने वाला इलाका बरगण्डी. यूनेस्को ने कहा है कि जिस शैम्पेन इण्डस्ट्री को वे विरासत का दर्ज़ा दे रहे हैं वह एक बहुत ही विशिष्ट कलात्मक गतिविधि है जो कि अब एक कृषि-औद्योगिक उद्यम में रूपांतरित हो चुकी है. आगे बढ़ने से पहले बताता चलूं कि दुनिया में कुल 1031 जगहों और चीज़ों को वर्ल्ड हेरिटेज का दर्जा दिया जा चुका है, जिनमें से मात्र 32 भारत में हैं. यूनेस्को दस घोषित मानदण्डों की कसौटी पर इन विरासत स्थलों का चुनाव करता है. ये मानदण्ड  समय-समय पर संशोधित होते रहते हैं.  यूनेस्को जब किसी जगह आदि को विश्व विरासत घोषित करता  है तो उसको संरक्षित करने की पूरी ज़िम्मेदारी भी अपने ऊपर ले लेता है. इसके अलावा भी, किसी जगह के साथ विश्व विरासत स्थल होने का तमगा जुड़ जाने से उसकी लोकप्रियता और ख्याति में वृद्धि  होती  है और इस तरह उसके विकास के अनेक मार्ग खुल जाते हैं. यहीं यह बात भी स्मरणीय  है कि यूनेस्को की इस  सूची में 48 स्थल खतरे में  बताए गए हैं. सुखद बात यह कि भारत का एक भी विरासत  स्थल खतरे में नहीं है.

आगे बढ़ने से पहले दूसरे समाचार की चर्चा कर लूं. भारत में एक बहुत लोकप्रिय श्यामवर्णी  पेय पदार्थ रहा है जिसे उसके हिन्दी-प्रेमी कद्रदां बूढ़ा पादरी के नाम से जानते हैं. कहना अनावश्यक है कि यह उसके ब्राण्ड के नाम का हिन्दी अनुवाद है. सेना में, बुद्धिजीवियों और कलाकारों में और आम लोगों में भी इस पदार्थ के प्रति क्रेज़ रहा है. इस पेय-विधा विशेष के विशेषज्ञों का कहना है कि कदाचित इस श्रेणी में यही एक पेय है जिसे पूरी तरह जेन्युइन  यानि खरा कहा और  माना जा सकता है, शेष सभी में जो कहा जाता है वो होता नहीं है बल्कि  सुगन्ध और रंग के इस्तेमाल से वैसा दिखाने का प्रयत्न मात्र होता है. बहरहाल, बहुत लम्बे समय तक लोकप्रियता की शीर्ष पायदान पर टिके रहने के बाद अब यह पदार्थ बिक्री के  मामले में बहुत तेज़ी से पिछड़ता जा रहा है. अगर आंकड़ों की बात करें तो यह कि 2010 से अब तक आते-आते इसकी बिक्री में लगभग 55 प्रतिशत की कमी आ चुकी है. और अगर यही हाल रहा, जो कि रहेगा ही, तो वो दिन दूर नहीं है जब यह पेय केवल उल्लेखों में बच रहेगा. अब आप इसके पराभव की वजह भी जान लीजिए. एक ज़माने में अस्सी लाख बोतलें हर साल तक बिक जाने वाली यह डार्क रम अपनी मर्दाना गुणवत्ता के लिए विख्यात थी. गुणवत्ता इसकी अब भी जस की तस है, लेकिन इस बीच बाज़ार में इसके बहुत सारे प्रतिस्पर्धी और आ गए, जिनका रंग रूप तो अलहदा था  ही, जिनके पीछे बड़े मल्टी नेशनल घरानों की बहुत बड़ी प्रचार-प्रसार की ताकत भी थी. तो इस दुनिया में भी दीये और तूफान की कहानी शुरु हुई, और अब हम कहानी के उस मुकाम पर हैं जहां बस तूफान के एक तेज़ झोंके की ज़रूरत है इस दीये की लौ को सदा-सदा  के लिए बुझा डालने के लिए.


तो एक तरफ फ्रांस की स्पार्कलिंग शैम्पेन जिसकी निर्माता कम्पनी दुनिया के लक्ज़री गुड्स की सबसे बड़ी कम्पनियों में शुमार है, और कहा जाता है कि जिसकी आर्थिक हैसियत अकूत है, और इस सबके ऊपर यह बात कि यूनेस्को ने भी अब इसी शैम्पेन के लिए ख़ास अंगूर पैदा करने वाले बागानों, तैयार शैम्पेन  को रखने वाले भूमिगत सुरागारों, शैम्पेन निर्माण स्थलों और इनका विपणन करने वाली जगहों यानि शैम्पेन  हाउसेस को विश्व विरासत सूची में शामिल करके और भी ज़्यादा मज़बूती प्रदान की है, और दूसरी तरह अन्तिम सांसें लेती हुई हमारी अपनी श्यामवर्णी ओल्ड मोंक. जिस दिन इसकी लौ बुझेगी वह दिन महज़ एक उत्पाद  के खत्म हो जाने की तारीख नहीं होगा. उस दिन एक परम्परा, एक विरासत, एक गाथा भी ख़त्म होगी. लेकिन क्या यह चिंता और अफसोस की बात नहीं होगी कि शैम्पेन और वाइन जैसी समृद्ध इण्डस्ट्रियों की तरफ अपना वरद हस्त बढ़ाने वाली संस्था की नज़र इस बेचारे दरिद्र पेय पर नहीं पड़ी!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 14 जुलाई, 2015 को इसी शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, July 7, 2015

विज्ञापन में प्रतिरोध की अनुगूंज

इधर दो बातें  ऐसी हुईं जिनका परस्पर सम्बन्ध न होते हुए भी है. हम सबने लक्षित किया कि फेसबुक पर बहुत सारे मित्रों की प्रोफाइल छवियां सतरंगी हो गईं. पता चला कि अमरीका में सेम सेक्स विवाह का रास्ता साफ करने वाले सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत और अभिनंदन करने के लिए फेसबुक ने यह इन्द्रधनुषी फिल्टर टूल उपलब्ध कराया था. दूसरी बात अपने देश में हुई. एक भारतीय एथनिक पोशाक कम्पनी ने ‘द विज़िट’ नामक  तीन मिनिट इक्कीस सेकण्ड की  एक विज्ञापन फिल्म जारी की जिसे अकेले यू ट्यूब पर दस दिनों में दो लाख से ज़्यादा लोगों ने और विविध सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तीस लाख से ज़्यादा लोगों ने देखा. इस फिल्म में एक खूबसूरत अपार्टमेण्ट में दो युवतियों को दिखाया गया है. इनमें से एक के मां-बाप आने वाले हैं और उनके स्वागत में दोनों तैयार हो रही हैं. एक उत्तर भारतीय है, दूसरी दक्षिण भारतीय. एक लम्बी है दूसरी नाटी. एक गोरी है दूसरी कृष्णवर्णा. लेकिन हाव-भाव से दोनों के बीच का गहरा अनुराग अच्छी तरह व्यक्त हो जाता है. फिल्म ख़त्म होते-होते आप समझ जाते हैं कि यह भी सेम सेक्स के बीच के रिश्ते का मामला है, दोनों लिव इन जैसे रिश्ते में हैं और एक लड़की इसी रूप में दूसरी को अपने मां-बाप से मिलाने वाली है. इस बात को लेकर थोड़ी हिचकिचाहट भी सामने आती है लेकिन तब वह जिसके मां-बाप आ रहे हैं दो-टूक लफ्ज़ों में कह देती है कि ‘आई एम श्योर अबाउट अस एण्ड आई डोण्ट वॉण्ट टू हाइड इट एनीमोर’. और इसके बाद दोनों मुस्कुराते हुए लिपट जाती हैं. 

कहा गया है कि यह भारत की पहली ऐसी विज्ञापन फिल्म है जिसमें एक लेस्बियन कपल को दिखाया गया है. यहीं यह भी याद किया जा सकता है कि 1983 की फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ के आलीशान नाव वाले एक दृश्य में हेमा मालिनी और परवीन बाबी के बीच भी ऐसे ही रिश्ते का संकेत था. इसी सिलसिले में  दीपा मेहता की 1996 की फिल्म ‘फायर’ को भी याद किया जा सकता है. जानकार पाठकों के लिए इतना संकेत पर्याप्त होगा कि शबाना आज़मी नन्दिता दास अभिनीत यह फिल्म इस्मत चुगताई की 1942 की बहु चर्चित कहानी ‘लिहाफ़’ पर आधारित थी.  और बात जब साहित्य की आ ही गई है तो राजकमल चौधरी के एक क्षीणकाय उपन्यास ‘मछली मरी हुई’ को भी याद करना होगा. लेकिन ‘द विज़िट’ इस विवादास्पद विषय पर आधारित पहली विज्ञापन फिल्म है.

हम सभी जानते हैं कि विज्ञापनों की, और खास तौर पर भारतीय विज्ञापनों की दुनिया खासी पारम्परिक और एक हद तक प्रतिगामी भी है. यहां बेटी के लिए दहेज जमा करने वाले और काले रंग को गोरे में तब्दील करने का वादा करने वाले विज्ञापन आम हैं. लेकिन इधर विज्ञापनों की दुनिया में बड़े बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं. आपको हाल के ऐसे बहुत सारे विज्ञापन  याद आ जाएंगे जिनमें काफी कुछ गैर पारम्परिक और लीक से हटकर है, मसलन एक आभूषण कम्पनी का वो विज्ञापन जिसमें एक मां अपनी बेटी की उपस्थिति में पुनर्विवाह करती दिखाई गई थी, या एक साबुन कम्पनी की ‘रियल वुमन’ विज्ञापन श्रंखला... 

लेकिन ‘द विज़िट’ निस्संदेह इन सबसे आगे है. असल में यह विज्ञापन अपनी तमाम खूबसूरती और कलात्मक कोमलता के बावज़ूद एक कठोर प्रतिरोधात्मक वक्तव्य के रूप में सामने आया है. सन्दर्भ यह है कि 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता के समलैंगिकता को अपराध  करार देने वाले खण्ड 377 को असंवैधानिक घोषित कर दिया  था, लेकिन माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में इस फैसले को उलट दिया. अब स्थिति यह है कि भारतीय कानून की इस धारा के तहत जेल भी हो सकती है. यहीं यह भी याद किया जा सकता है कि ब्रितानी शासन के खिलाफ़ हुए 1857 के विद्रोह  के दमन के बाद 1861 में हमारे देश में एक नई भारतीय दण्ड संहिता लागू हुई थी और वही अब तक चली आ रही है. इस दंड संहिता की बहुत सारी बातें क्वीन विक्टोरिया के  रूढ़िवादी सोच की भी परिणति थीं,  अन्यथा इससे बहुत पहले यानि करीब दो हज़ार साल पहले की मनु की संहिता में समलैंगिकता के दण्ड के लिए मात्र कपड़े पहले हुए स्नान का प्रावधान है, कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उस पर मामूली आर्थिक दण्ड का प्रावधान है और इन सबसे बढ़कर है 600 ईसा पूर्व रचित सुश्रुत संहिता जिसमें समलैंगिकता को जन्मजात प्रवृत्ति बताया गया था.

तो यह ‘द विज़िट’ विज्ञापन एक उत्पाद का प्रचार मात्र न होकर एक बोल्ड स्टेटेमेण्ट भी है. और इसका यह पक्ष ही इसे फेसबुक के उस इन्द्रधनुषी फिल्टर टूल से जोड़ता है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम  कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 07 जुलाई, 2015 को 'द विज़िट'  विज्ञापन फिल्म में प्रतिरोध की अनुगूंज शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 30, 2015

नए व्यापारियों के तौर-तरीके

पिछले दिनों हमारे देश में व्यापार के नए तौर तरीकों को लेकर काफी चर्चाएं हुई हैं. जो लोग पारम्परिक तरीकों से व्यापार करते हैं, उनके हित इन नए खिलाड़ियों के आने से आहत हुए हैं, और इसलिए उनका इनके विरोध में आवाज़ उठाना समझ में आता है. इनसे कुछ शिकायतें सरकार की भी हैं. तौर-तरीके क्योंकि नए हैं इसलिए कुछ तो अस्पष्टताएं हैं और कुछ डण्डी मारने की प्रवृत्ति – जो हमारे स्वभाव का स्वाभाविक हिस्सा है. यह भी कि सरकार अपने नियंत्रक अधिकार और इंस्पेक्टर राज के वर्चस्व को भला क्यों छोड़ दे? कुछ और बातें भी इस बीच हुईं, मसलन एक नई कार टैक्सी सेवा में कुछ जगहों पर महिलाओं से बदसुलूकी हुई, तो इस तरह की सेवाओं के विरोध का माहौल बना.

लेकिन अपने हाल के कुछ अनुभव पहले आपसे साझा कर लूं, फिर इस बात को थोड़ा आगे बढ़ाना चाहूंगा. पिछले कई बरसों से मैं पास की एक दुकान से अण्डरवियर बनियान वगैरह  खरीदता हूं.  दुकानदार से जान-पहचान-सी हो गई है. खरीदरारी न करना हो तब भी उधर से गुज़रते हुए दुआ सलाम हो जाती है. अभी पिछले दिनों उसके पास अण्डरवियर खरीदने गया. साइज़ को लेकर कुछ अनिश्चितता लगी तो मैंने कहा कि मैं भुगतान करके ये चार अण्डरवियर ले जा रहा हूं,  अगर साइज़ को लेकर कोई दिक्कत हुई तो शाम तक लौटा दूंगा. बताता चलूं, उसके यहां ट्रायल रूम जैसी कोई सुविधा नहीं है. उसने कहा कि लौटा मैं भले ही दूं, वो नकद पैसे नहीं लौटायेगा, मुझे उतनी ही या उससे अधिक राशि की खरीदरारी ही करनी होगी. मुझे और कोई चीज़ खरीदनी नहीं थी. उसके अण्डरवियर लौटाए और अन्यत्र चला गया. ध्यान दें कि यहां उत्पाद को पहन कर देखने पर उसकी कोई आपत्ति नहीं थी. अगर होती तो वो कोई और चीज़ देने को क्यों तैयार होता. अब इसी के सामने रख कर देखें मेरा यह अनुभव. अपने वर्तमान ब्रॉडबैण्ड से असंतुष्ट हो मैंने दूसरे प्रदाता की सेवा लेने का फैसला किया. आवेदन की औपचारिकताएं पूरी कर लेने के बाद मुझे सलाह दी गई कि बेहतर हो वायरलेस मॉडेम सह राउटर मैं ही खरीद लूं. फिर वे आकर इंस्टॉलेशन कर देंगे. मैंने एक डॉट कॉम विक्रेता को एक राउटर का ऑर्डर भेज दिया, तीसरे दिन वो राउटर मुझे डिलीवर हो गया, और पांचवें दिन ब्रॉडबैण्ड कम्पनी का तकनीशियन इंस्टॉलेशन करने मेरे घर आ गया. उसने राउटर देखते ही कहा कि यह काम नहीं आएगा.  उससे बात करके मुझे समझ में आया कि मैंने ग़लत उत्पाद मंगवा लिया था. एक बार तो मन खराब हो गया कि ये पैसे बर्बाद हो गए! फिर उस विक्रेता  की साइट पर जाकर देखा तो पाया कि वहां खरीदे  हुए उत्पाद को लौटाने का भी प्रावधान है. बहुत सरल-सी प्रक्रिया पूरी की. ऑनलाइन प्रश्नावली में मुझसे यह तो पूछा गया कि मैं उनका उत्पाद क्यों लौटा रहा हूं लेकिन कोई ना-नुकर नहीं की गई. इतना ही नहीं, उनका आदमी आज सुबह मेरे घर आकर बाकायदा रसीद देकर वो उत्पाद मुझसे ले गया, यानि उसे लौटाने के लिए भी मुझे कोई कष्ट नहीं करना पड़ा. और बड़ा चमत्कार तो यह कि इस बात को बमुश्किल तीन घण्टे बीते हैं कि मेरे पास अपनी पूरी राशि के रिफण्ड होने की सूचना आ गई है.

अब एक अन्य प्रसंग. अभी तीन दिन पहले किसी पारिवारिक प्रसंग में रेल से कहीं जाना हुआ. जैसे ही रेल्वे स्टेशन से बाहर निकले हमेशा की तरह ऑटो  वालों ने घेर लिया. पूछने पर बताया कि मेरे घर तक पहुंचाने का वे एक सौ पचास रुपया लेंगे. जब मैंने कहा कि यह काफी ज़्यादा है तो वे लोग बोले कि हमने आपको सामान का पैसा तो बताया ही नहीं  है,  वो हम अलग चार्ज करते हैं. मुझे ऑटो में आना नहीं था. क्यों आता? विकल्प मुझे मालूम था. एक दिन पहले ही तो मैं घर से स्टेशन गया था. एकदम मुंह अन्धेरे मेरी ट्रेन थी. अपने स्मार्ट फोन पर एप के ज़रिये  टैक्सी कॉल की थी. ठीक साढ़े तीन मिनिट में टैक्सी आ गई थी (जबकि ऑटो बुलाने मुझे थोड़ी दूर जाना पड़ता) और घर से स्टेशन की अठारह मिनिट में पूरी हुई साढ़े आठ किलोमीटर की यात्रा का  बिल छियानवे रुपये का बना था.  कोई मुझे बताए कि एक वातानुकूलित टैक्सी कार आपको जो दूरी छियानवे रुपये में तै करवा रही हो उसी दूरी के लिए आप ऑटो को एक सौ पचास रुपये क्यों देना चाहेंगे?

मेरी सहानुभूति हमेशा बड़े खिलाड़ियों की तुलना में छोटे खिलाड़ियों के प्रति रहती है. बहुत बार यहां तक हुआ है कि ऑटो छोड़कर मैंने रिक्शा पकड़ा है. मॉल की बजाय नुक्कड़ का दुकानदार हमेशा मेरा प्रिय रहा है. लेकिन जब इस तरह के अनुभव होते हैं तो सोचना पड़ता है कि मेरी और मुझ जैसों की सहानुभूति के दम पर ये कब तक टिके रहेंगे?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अन्तर्गत मंगलवार, 30 जून, 2015 को नए व्यापारियों के तौर-तरीके, अच्छी सेवा से ब्राण्ड बनाना शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 23, 2015

क्या ज़रूरी है हरेक के लिए शादी करना?

हाल में हैदराबाद के एक ऑनलाइन डेटिंग पोर्टल ‘क्वैक क्वैक’  ने ‘हैप्पीली सिंगल’ नाम से एक अभियान चलाया जो फेसबुक पर बहुत जल्दी वायरल हो कर लगभग  25 लाख लोगों तक पहुंच चुका है. इस अभियान में बैंगलूर के युवाओं से यह जानने की कोशिश की गई कि उनके मां-बाप क्या-क्या तर्क देकर उन पर शादी के बंधन में बंध जाने का दबाव बनाते हैं. इनमें से अधिकांश तर्क वे हैं जिन्हें  हम अपनी फिल्मों के चिर-परिचित संवादों के रूप में जानने के साथ-साथ अपने इर्द गिर्द भी कई दफा सुन चुके होंगे. ऐसे कुछ तर्कों का आनंद आप भी लीजिए:

अगर तुमने शादी नहीं की तो समाज में तुम्हारे पिता की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी./ तुम गैर ज़िम्मेदार और निकम्मे हो. शादी करने से ज़िम्मेदारी आ जाएगी./ जब तक तुम शादी नहीं कर लोगे तुम्हारी छोटी बहिन की भी शादी नहीं होगी./ लड़का अमीर खानदान का है. वो तुम्हें सुखी रखेगा./ मेरे दादाजी की अंतिम इच्छा  यही है कि न सही अपना पड़पोता, कम से कम वे पोते की शादी तो देख लें./ यह शिक्षा कैरियर, बिज़नेस सब बेकार है, अगर तुम्हारा अपना परिवार न हो./ तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए क्योंकि हमारे पड़ोसी इस बात को लेकर बहुत बातें बनाने लगे  हैं./ तुम्हारे सारे दोस्तों की शादियां हो गई है, अब तो तुम भी कर  लो./ अपने कज़िन को ही देखो, उसकी शादी हो चुकी है और वो बहुत खुश है./ मेरे मां बाप बूढ़े हो रहे हैं इसलिए वे चाहते हैं कि अब तो मेरी देखभाल करने वाला कोई हो./ वो एक गोरी, खूबसूरत ब्राह्मण लड़की है. तुम्हें भला और क्या चाहिये?/ उम्र गुज़र जाने के बाद तुम्हें कोई लड़का नहीं मिलने वाला./ अगर तुमने देर से शादी की तो तुम्हारे बच्चे नहीं हो पाएंगे./ इससे पहले कि लड़की मुंह काला करवा दे, इसकी शादी कर डालो./ हमने तुम्हारे लिए इतना सब कुछ किया है और तुम हमारी यह एक छोटी-सी तमन्ना भी पूरी नहीं कर सकते?/ और आखिरी और सबसे ज्यादा पॉपुलर कथन है -  लोग क्या कहेंगे?

कहना अनावश्यक है कि इस बदले हुए समय में, जब विवाह की औसत आयु काफी ऊपर जा चुकी है, युवाओं के सपने नई ऊंचाइयां छूने लगे हैं, शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ कैरियर से जुड़ी आकांक्षाएं निरंतर बड़ी होती जा रही हैं, जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं का महत्व बढ़ता जा रहा है, नैतिकता और दैहिक शुचिता के पुराने मानदण्ड अप्रासंगिक होते जा रहे हैं, युवाओं को अपने मां बाप से इस तरह के संवाद सुनना प्रीतिकर नहीं लगता है. कभी वे बातों को टालते हैं, कभी कम या ज़्यादा कड़ा प्रतिरोध करते हैं, और कभी उनके आगे समर्पण कर अपनी तमन्नाओं का खून भी हो जाने देते  हैं.

लेकिन मैं यह सारी चर्चा यह सवाल उठाने के लिए कर रहा हूं कि क्या विवाह आवश्यक है? और यह कितना उचित है कि मां-बाप अपनी संतान पर दबाव बनाएं या इमोशनल ब्लैक मेल करके उनको विवाह के लिए विवश करें? अब जबकि पढ़े लिखे परिवारों में सामान्यत: ठीक ठाक उम्र हो जाने तक युवा अपनी शादी के बारे में सोचते ही नहीं हैं, यानि तब तक वे खासे परिपक्व भी हो चुके होते हैं, तो फिर उनके शादी करने न करने का फैसला भी क्या उन पर ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए? और स्पष्ट कहूं कि क्या शादी न करने के विकल्प को भी पारिवारिक और सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल जानी चाहिए?

विवाह संस्था के समर्थन में जो तर्क अब तक दिये जाते रहे हैं, हम उनके विस्तार और पक्ष विपक्ष में न जाएं और केवल यह सोचें कि जिस देश में स्त्री-पुरुष अनुपात 943 है और इसमें लगातार गिरावट आती जा रही  है, वहां सबका विवाह तो वैसे ही मुमकिन नहीं है. लेकिन  ज़्यादा महत्व की बात यह है कि क्या अब मां-बाप के दायित्वों और सामाजिक संरचना  को नए सिरे से परिभाषित करने का समय नहीं आ गया है? एक समय था जब मां-बाप अपने बच्चों की शादी करके ही अपने आप को दायित्व मुक्त मानते थे, हालांकि दायित्व  मुक्त होते तब भी नहीं थे. क्या हर्ज़ है अगर अब वे अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर, आत्म निर्भर बना कर उनके जीवन के अन्य निर्णय खुद उन्हें करने के लिए स्वतंत्र छोड़ दें? अब तो कैरियर के मामले में भी यह हो रहा है कि जहां पहले मां-बाप यह कहते थे कि हम अपने बच्चों को ये बनाएंगे और वो बनाएंगे, उनकी जगह आज के समझदार मां-बाप कहने लगे हैं कि हमारे बच्चे जो बनना चाहेंगे वो बनने में हम उनको सहयोग देंगे. ऐसे में अगर कोई युवक या युवती विवाह न करने का फैसला करता है तो क्यों न उस फैसले को भी सहर्ष स्वीकार किया जाए!

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत  मंगलवार, 23 जून, 2015 को 'क्या शादी के लिए ज़रूरी है इमोशनल अत्याचार'  शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.         

Tuesday, June 16, 2015

महिलाएं ही क्यों बदलें अपना नाम

बात काफी पुरानी है. मैं शायद कॉलेज का विद्यार्थी था. एक कवियित्री की कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. फिर यकायक वे दृश्य से गायब हो गईं. वो मीडिया सक्रियता का ज़माना भी नहीं था कि कुछ पता चलता. फिर कुछ समय बाद एक और कवयित्री अवतरित हुईं जिनका प्रथम नाम वही था, लेकिन कुलनाम या सरनेम  भिन्न था. हमें यह बात पता लगने में काफी समय लग गया कि विवाह के बाद वे अपने पिता के कुलनाम  की जगह पति का कुलनाम  लगाने लगी थीं. वैसे भारतीय समाज में यह बात आम है. लड़कियां विवाह के बाद उस कुलनाम को जिसका प्रयोग वे अब तक कर रही थीं, त्याग कर अपने पति का कुलनाम लगाने लगती हैं.

कलाओं और शो बिज़ की दुनिया में ऐसा नहीं भी होता है. हेमा मालिनी हमेशा हेमा मालिनी ही रहती हैं और आशा भोसले भी आशा बर्मन नहीं हो जाती हैं. याद करें तो साहित्य की दुनिया से भी ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे. मन्नू भण्डारी मन्नू यादव नहीं हुईं और न सुधा अरोड़ा सुधा भाटिया बनीं. लेकिन हमारी  सामाजिक व्यवस्था में इन्हें अल्पसंख्यक अपवाद ही माना जाएगा. कई बार तो यह तक होता है कि विवाह के बाद लड़की को इसलिए अपना मूल नाम बदल लेना होता है कि उस नाम वाली कोई लड़की उसके नए परिवार में पहले से मौज़ूद थी.

लेकिन अब आहिस्ता-आहिस्ता यह स्थिति बदल भी रही है. शायद इसकी एक वजह यह भी है कि पहले विवाह कम उम्र में हो जाते थे और तब तक लड़की का अपना कोई व्यक्तित्व विकसित नहीं होता था, इसलिए उसे उसका विलयन नए परिवार में कर डालने में कोई असहजता अनुभव नहीं होती थी. लेकिन अब, जबकि लड़कियां जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में पांव जमा लेने और अपनी हैसियत बना लेने के बाद शादी करने लगी हैं, वे भी इन पुरातन परिपाटियों पर सवाल उठाने, इन्हें चुनौती देने, और कई बार नकारने तक लगी हैं. अमरीका की सिलिकॉन वैली की एक मनोचिकित्सक कैथरीन वेल्ड्स  ठीक ही कहती हैं कि “जैसे-जैसे कामकाजी महिलाओं की संख्या में बढोतरी हुई है उनमें खुद की पहचान बनाने की इच्छा भी बढ़ी है.”   हमें भी अपने आस-पास ऐसी बहुत सारी महिलाएं मिल जाएंगी जिन्होंने या तो विवाह के बाद अपना कुलनाम बदलना ज़रूरी नहीं समझा या पति का कुलनाम अपनाने के बावज़ूद पिता के कुलनाम का भी त्याग नहीं किया. पुरानी परिपाटियों को चुनौती देने या अस्वीकार करने  के और बहुत सारे प्रमाण वेशभूषा और सुहाग चिह्नों के मामलों में भी देखे जा सकते हैं. वही सवाल कि सुहाग चिह्न की अनिवार्यता केवल स्त्री के लिए ही क्यों? 

और इसी सवाल से मुझे याद आई यह बात कि हाल में एक अमरीकी अभिनेत्री ज़ोई साल्डान्या के पति ने अपनी तरह से परम्पराओं को चुनौती दे डाली. उनके पति मार्को पेरेगो ने विवाह के बाद अपना नाम बदलकर मार्को साल्डान्या कर दिया. लेकिन समाज, चाहे वो अमरीका का ही क्यों न हो, भला इस तरह के गैर पारम्परिक क़दमों को आसानी से कहां  स्वीकार करता है? वहां भी मार्को के इस काम की खूब आलोचना हुई, उनका मज़ाक उड़ाया गया. और तब मार्को ने अपने फेसबुक पेज पर इन लोगों को यह जवाब दिया: “इसमें इतनी हैरानी की क्या बात है? क्या इसलिए कि एक आदमी अपनी पत्नी का कुलनाम स्वीकार करेगा?” ख़ास बात तो उन्होंने आगे कही है: “पुरुषों! अपनी पत्नी का कुलनाम ले लेने से आपका वज़ूद ख़त्म नहीं हो जाएगा. बल्कि  इसके साथ ही आप बदलाव के साथ खड़े होने वालों की सूची में याद किए जाएंगे.”

और जैसा साहस मार्को ने दिखाया वैसा ही साहस  स्कॉटलैण्ड के ग्लासगो के एक म्यूज़िक प्रमोटर  बेन कॉगहिल ने भी दिखाया. बत्तीस वर्षीय बेन का कहना है कि “मुझे अपनी पत्नी रोवान मार्टिन के नाम का उच्चारण काफी पसन्द है इसलिए  उसे बदल कर मैं  बर्बाद नहीं करना चाहता." उन्होंने यह और कहा कि “यह दिखाता है कि मैं पुरुष प्रधान समाज का विचार नहीं मानता और जो मैं हूं उससे खुश हूं.”

लेकिन यह सब कहते हुए मैं इस बात को भी छिपाना नहीं चाहता कि परम्परा से चले आ रहे रीति रिवाज़ों ने हमारी चेतना में बहुत गहरे तक जगह बना रखी है. सन 2013 में एक मेट्रीमोनियल वेबसाइट टॉपनॉट डॉट कॉम ने तेरह हज़ार दुल्हनों पर किए एक सर्वे के बाद बताया था कि अस्सी प्रतिशत महिलाएं अपने पति के कुलनाम को ही अपनाना पसन्द करती हैं. ऐसे में कम से कम मुझे तो बीबीसी के एक प्रोड्यूसर एण्ड्री  ब्राउन का यह क़दम बहुत पसन्द  आया कि  जब उन्होंने हेलेन स्टोन से शादी की तो दोनों के कुलनाम को मिलाकर एक संयुक्त कुलनाम ब्राउनस्टोन्स बनाकर अपने नाम के साथ जोड़ लिया. विवाह अगर दो आत्माओं का मिलन होता है तो दो कुलनामों का भी मिलन क्यों न हो?


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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 16 जून, 2015 को पति ने लगाया पत्नी का सरनेम तो हंगामा क्यों शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 9, 2015

कबीर कह गए हैं: हम न मरैं मरिहैं संसारा

इधर कुछ दिनों से मेरा ध्यान रह-रहकर श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ की तरफ जा रहा है. इस बेहद रोचक, बहु प्रशंसित  और चर्चित उपन्यास को खोलते ही पहले पन्ने पर आप पढ़ते हैं:

सड़क  के एक ओर पेट्रोल-स्टेशन था; दूसरी ओर छप्परों, लकड़ी और टीन के सड़े टुकड़ों और स्थानीय क्षमता के अनुसार निकलने वाले कबाड़ की मदद से खड़ी की हुई दुकानें थीं. पहली निगाह में ही मालूम हो जाता था कि दुकानों की गिनती नहीं हो सकती. प्राय: सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहां गर्द, चीकट, चाय की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे  बनाया जाता था. उनमें  मिठाइयां भी थीं जो दिन-रात आंधी-पानी और मक्खी मच्छरों के हमलों का बहादुरी से मुकाबला करती थीं. वे हमारे देसी कारीगरों के हस्तकौशल का और उनकी वैज्ञानिक दक्षता का सबूत देती थीं. वे बताती थीं कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही मालूम न हो, हर कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरक़ीब सारी दुनिया में अकेले  हमीं को आती है.

लगता है लेखक स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल जी को मिठाइयों से कुछ ज़्यादा ही मोह  था. हो सकता है इसकी एक वजह उनका पण्डित होना भी हो. अब देखिये ना, आगे भी एक जगह वे लिखते हैं:

मिठाई और चाट की दुकानों के आगे काफ़ी भीड़ थी. भारतीय मिठाइयों की सौन्दर्य-साम्राज्ञी बर्फ़ी ढेर-की-ढेर लगी थी  और हर लड़का जानता था कि मारपीट में इसका इस्तेमाल पत्थर के टुकड़े-जैसा किया जा सकता है. इन मिठाइयों के बनाने में हलवाइयों और फूड इंस्पेक्टरों को बड़े-बड़े वैज्ञानिक अनुसंधान करने पड़े थे, उन्होंने बड़े परिश्रम  से मालूम किया  था कि खोये की जगह घुइयां, आलू-चावल का आटा, मिट्टी या गोबर तक का प्रयोग किया जा सकता है. वे सब समन्वयवाद के अनुयायी थे और उन्होंने क़सम खा ली थी कि वे बिना मिलावट के न तो कोई चीज़ बनायेंगे और न बेचेंगे.

आप समझ ही गये होंगे कि मुझे इस महान उपन्यास की याद इन दिनों क्यों आ रही है! वैसे, इस उपन्यास पर बहुत सारे आलोचकों ने भारतीय जीवन के यथार्थ के प्रति असंवेदनशील होने के आरोप भी लगाए हैं, लेकिन कम से कम इन पंक्तियों को पढ़ते  हुए तो लगता है कि वे यथार्थ को जस-का तस रख रहे हैं. कभी-कभी मुझे लगता है कि जैसे सफाई हमारे जीवन का मूल्य है ही नहीं. सफाई भी और शुद्धता भी. सफाई अगर मूल्य होता और हमारे जीवन में शामिल होता तो देश के नए बने प्रधानमंत्री को भी उसके लिए अलग से एक अभियान चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. सफाई और शुद्धता जैसे एक सिक्के के ही दो पहलू हैं. पेयजल जैसी आधारभूत वस्तु जहां शुद्ध रूप में सुलभ न हो, और आम जन की  तो छोड़िये, जहां सितारे वाले होटल भी आपको खाना परोसने से पहले यह पूछते हों कि आप पानी सादा लेंगे या बॉटल्ड, तो यह केवल व्यावसायिक तकाज़ा कहकर टाल देने वाली बात नहीं रह जाती है, इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि खुद उन्हें अपने यहां सुलभ पेय जल की गुणवत्ता पर संदेह है. स्ट्रीट फूड के निर्माण और जिस स्थितियों में उसे  बेचा और खाया जाता है, उसकी बात न भी करें, तो विवाह जैसे सार्वजनिक और बड़े आयोजनों में अगर आप खाना बनते हुए देख लें तो शायद उसे खाने की हिम्मत न कर पायें, और यह जानते हुए भी आप उसे बिना किसी झिझक के खाते हैं. होली दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर मावे और मिठाई में मिलावट की खबरों ने अब हमें चौंकाना भी बन्द कर दिया है.  नाले के पानी में उगी और ज़रूरत से ज़्यादा रसायनों वाली सब्ज़ियां, हानिकारक रसायनों द्वारा पकाये गये फल, मिलावटी और अवधिपर की दवाइयां - क्या है हमारे आस-पास जो शुद्ध और विश्वसनीय है?

ऐसे में कल रात व्हाट्सएप पर जब यह संदेश मिला तो लगा कि दास कबीर बहुत पहले सही ही कह गए थे. क्या कह गए थे, यह जानने से पहले कल रात मिला संदेश पढ़ लीजिए:

सड़े तेल में डूबे भटूरे और समोसे, सल्फर के तेज़ाब वाले पानी के गोलगप्पे, बर्ड फ्लू वाले जख्मी मुर्गे की चांप, एक ही पत्ती से कई बार बनी चाय, डिटर्जेण्ट पाउडर वाला दूध, धूल वाली सड़क पे खुले कटे फलों  की चाट, नाली किनारे  बिकती सब्ज़ियां, कभी ना साफ हुई टंकी की प्याऊ का पानी, खुजलाते हाथों की ढाबे की रोटियां, मरे मच्छरों  की चाशनी में डूबी जलेबियां, और सूखे दूध के नकली मेवे की मिठाई जिसका बाल भी बांका नहीं कर सके, उसका मैगी की लीड  क्या बिगाड़ लेगी?

कबीर बहुत पहले कह गए थे: हम न मरैं मरिहैं संसारा.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत इसी शीर्षक से आज मंगलवार, 09 जून, 2015 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, June 2, 2015

आपसे ज्यादा महत्व है आपके डेटा का

आप किसी स्टोर में खरीददारी करने जाते हैं और जब बिलिंग की बारी आती है तो आपसे नाम पूछने के बाद प्राय: आपका मोबाइल नम्बर भी पूछा जाता है. आप सहज रूप से बता देते हैं. आप इण्टरनेट पर किसी सेवा, चाहे वो ई मेल खाता हो, कोई सोशल नेटवर्किंग साइट हो या कुछ और, के लिए साइन इन करते हैं तब आपके सामने एक बॉक्स आता है, जिसके आगे छपा होता है – आई एक्सेप्ट यानि मैं स्वीकार करता हूं. आप उस पर टिक कर देते हैं. हममें से शायद ही कोई इतना जागरूक या धैर्यवान हो कि वह उस पूरी इबारत को पढ़े जिसे उसने स्वीकार किया है.

ये और इस तरह की बहुत सारी निरापद लगने वाली हरकतें करते समय हम शायद ही इस बात से वाक़िफ हों कि ऐसा करते हुए हम न केवल दूसरों को अपनी निजता में ताका झांकी करने का अधिकार सौंप रहे हैं, अनजाने में ही उस परिघटना का शिकार भी हो रहे हैं जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के ज्ञान और प्रबंधन के निदेशक नजीब अल शोराबजी ने अपने एक भाषण में ‘डेटा कोलोनियलिज़्म’ का नाम दिया था. कोलोनियलिज़्म यानि उपनिवेशवाद का नाम आते ही हमारे कान खड़े हो जाते हैं. क्या है यह डेटा कोलोनियलिज़्म? इन नजीब अल शोराबजी ने तो डेटा कोलोनियलिज़्म संज्ञा का प्रयोग उस स्थिति के लिए किया था जिसमें पश्चिमी  देश अफ्रीकी राष्ट्रों के स्वास्थ्य विषयक डेटा का दोहन कर रहे हैं, बिना अफ्रीकी देशों को इसका तनिक भी लाभ दिये. लेकिन यह तस्वीर का बहुत छोटा हिस्सा  है. इस डेटा कोलोनियलिज़्म का आकार कितना बड़ा हो चुका है इसका अन्दाज़ आप सिर्फ इस जानकारी से लगा लीजिए कि इस बरस यानि 2015 में अकेले भारत में इसका मूल्य एक बिलियन डॉलर यानि करीब सात हज़ार करोड़ रुपये  आंका गया है.

असल में आज की दुनिया में डेटा एक कमोडिटी बन गया है, एक ऐसी वस्तु  जिसका मोल सोने से भी ज़्यादा है. यह जो उन तमाम वेबसाइट्स का मायाजाल है जो आपके सामने आकर गिड़गिड़ाती हैं कि आप अपने स्मार्ट फोन पर उनकी एप डाउनलोड कर लें – क्या यह बेवजह है? मुझे बहुत खुशी होती है जब किसी एप की वजह से तुरंत मेरी गैस बुक हो जाती है या बिना यह बताए कि मैं कहां खड़ा हूं, मेरी बुलाई हुई कैब आकर मेरे सामने खड़ी हो जाती है. लेकिन यह सब तस्वीर का एक पहलू ही है. दूसरा पहलू जो ज्यादा चौंकाने और विचलित करने वाला है वह यह है कि इस तरह मेरे पूरे बर्ताव पर नजर रखी जा रही है. क्या आपने कभी नोट किया है कि जब आप अपने किसी ई मेल में किसी हिल स्टेशन पर जाने की बात लिखते हैं, तो उसी समय उस पेज के दाहिनी तरफ  उसी हिल स्टेशन के होटलों के विज्ञापन क्यों दिखाई देने  लगते हैं? जब आप किसी पुस्तक विक्रेता की साइट पर किसी किताब को तलाश करते हैं तो उससे मिलती जुलती किताबों के सुझाव कैसे आने लगते हैं? जब आप कोई पोर्न साइट विज़िट करते हैं तो क्यों और कैसे उसी समय आपके शहर का नाम लेते हुए आपको यह सूचनाएं मिलने लगती हैं कि वहां  रास रचाने की सुविधाएं आपके इंतज़ार में हैं. ये चन्द उदाहरण हैं जिनसे  आप अनुमान लगा सकते हैं कि आपके अनजाने में आपके क्रिया कलाप पर नज़र रखी जा रही है.

और इसी ताका-झांकी के खेल, बल्कि बड़े कारोबार की तरफ मैं आपका ध्यान खींचना चाह रहा हूं.  दरअसल इस तरह डेटा संग्रहण करते हुए भविष्य की एक ऐसी संरचना की कल्पना की जा रही है जिसमें मानवीय विवेक को इन सूचनाओं के संसाधन द्वारा प्राप्त निष्कर्षों पर कुर्बान कर दिया जाएगा. जन्म से मृत्यु तक आपकी हर गतिविधि को लगातार रिकॉर्ड और संसाधित किया जाएगा और उसी के अनुसार तमाम गतिविधियों जिनमें व्यावसायिक और प्रशासनिक सभी तरह की गतिविधियां शामिल हैं, संचालित किया जाएगा. ऊपर से यह बात भले ही आकर्षक लगे, इसमें जो ख़तरे निहित हैं उनकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती. मसलन यह कि सोच और अनुभव को डेटा विस्थापित कर डाले और यह भी कि अगर इन डेटा को तोड़ मरोड़ कर मनचाहे निष्कर्ष निकाल लिये जाएं तो? वायर्ड  पत्रिका के पूर्व मुख्य सम्पादक क्रिस एण्डरसन ने जब अपने एक चर्चित लेख में यह कहा था कि इस तरह आंकड़ों   पर अत्यधिक निर्भरता कार्य कारण पद्धति को अप्रासंगिक कर देगी, तो  को दुनिया का चौंक जाना स्वाभाविक ही था. चिंता की बात यह है कि हम अपने अनजाने में आहिस्ता-आहिस्ता उसी व्यवस्था की तरफ बढ़ते जा रहे हैं जिसमें डेटा निर्माण के कच्चे माल यानि ‘लोगों’ की आवाज़ को न सुनकर सिर्फ डेटा की आवाज़ को ही सुना जाएगा. हताशा की बात यह है कि इस चिंताजनक स्थिति में हम अपने आपको बेबस पा रहे हैं.  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 02 जून, 2015 को डेटा कोलोनियलिज़्म: आज़ादी का दुश्मन शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, May 26, 2015

क्या ज़रूरत है खेलों में स्त्री देह की

बहुत मुमकिन है कि आपने भी मेरा यह आलेख पढ़ने से पहले ग्रिड गर्ल्स का नाम न सुना हो! यह खबर पढ़ने से पहले कि दुनिया भर की स्पोर्ट्स कारों की श्रंखला एफआईए वर्ल्ड एण्ड्यूरेंस चैम्पियनशिप, जिसे संक्षेप में डब्ल्यूईसी नाम से जाना जाता है, ने यह घोषणा की है कि वह अपनी रेसों के दौरान ग्रिड गर्ल्स को इस्तेमाल नहीं करेगी, मैं भी इनके बारे में कुछ नहीं जानता था. लेकिन अब आपको बता सकता हूं कि रोमांचक कार रेसों की दुनिया में ग्रिड गर्ल्स वे खूबसूरत बालाएं होती हैं जो रेस शुरु होने से पहले अत्यल्प और बदन से चिपके वस्त्रों में रेसिंग कारों के साथ खड़ी नज़र आती हैं. आम तौर पर इनके हाथों में कार के स्थान के नम्बर का प्ले कार्ड भी होता है. चाहें तो मान सकते हैं कि कार रेसिंग में इनका वही स्थान है जो आईपीएल जैसी क्रिकेट श्रंखलाओं  में चीयर लीडर्स का होता है.

डब्ल्यूईसी की इस घोषणा को दुनिया भर में प्रचलित स्त्रियों को एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में देखने और प्रयोग करने की अनुचित प्रवृत्ति से मुक्ति के एक कदम के रूप में देखा जा रहा है. हम पाते हैं कि दुनिया भर में ऐसे तमाम उत्पादों को बेचने के लिए भी स्त्री देह का प्रयोग किया जाता है जिनसे स्त्री का दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है. हमारा अपना देश भी इसका अपवाद नहीं है. ऐसे में अगर मोटर स्पोर्ट्स को और क्रिकेट जैसे खेल को बेचने के लिए स्त्री देह का प्रयोग किया जाता है तो इस पर कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए. बेचने वाले का तो पूरा ध्यान मुनाफे पर ही होता है. अगर ऐसा न होता तो दुनिया भर में बहुत सारे नुकसानदेह पदार्थों के कारोबार भी इस कदर फलते-फूलते नहीं. लेकिन हम तो अपनी मूल बात पर लौटते हैं.

डब्ल्यूईसी के इस फैसले का जिन महत्वपूर्ण लोगों ने स्वागत किया है उनमें से एक हैं 22 साल की केटी मेक जो अमरीका के फ्लोरिडा राज्य  में रहती हैं. केटी का मानना है कि बिना बात किए  आप किसी सोच में बदलाव नहीं ला सकते या फिर बुरे हालात को बदल नहीं सकते. केटी ने अपने इसी सोच के तहत डब्ल्यूईसी के इस फैसले का अपने ट्वीट्स के माध्यम से पुरज़ोर समर्थन किया है और उन्हें भी खूब समर्थन  मिला है, उनके ट्वीट्स को खूब दुहराया गया है. 2013 में केटी को जब थायरॉयड  कैंसर हुआ तो उनका इलाज जिस डॉक्टर ने किया वो खुद भी स्पोर्ट्स कार की ड्रावर रह चुकी और ग्रैण्ड एम सिरीज़ की रेस में हिस्सा ले चुकी थीं. इस डॉक्टर से केटी की मुलाकात भी एक रेसिंग प्रतियोगिता के दौरान ही हुई थी. केटी का विचार है कि रेस एक उम्दा खेल है लेकिन इसे और विकसित करने की जरूरत है. वे इसी उम्मीद से इस खेल  के दौरान लाइव ट्वीट्स करती हैं कि हो सकता है कि जो इस रेस को पसन्द नहीं करता है वो भी इसे पसन्द करने लग जाए. केटी मानती हैं कि रेसिंग भी दुनिया के अन्य खेलों जैसा ही है. बेहतरीन मशीन का ट्रैक पर भागने का रोमांच आपको अपने आप इसका दीवाना बना देता है. केटी यह बात अच्छी तरह से जानती हैं कि मोटरस्पोर्ट्स  में ज़्यादातर रेसर पुरुष हैं लेकिन वे इसे कोई समस्या नहीं मानती हैं.  समस्या दूसरी है. उनके ट्वीट्स को पढ़कर कई महिलाओं ने उनसे सम्पर्क  किया और बताया कि उन्हें ट्रैक पर सेक्सिज़्म  का शिकार बनना पड़ा. बकौल केटी, उनके वृत्तांत दिल दहला देने वाले थे.  लेकिन इसके बावज़ूद केटी सच्चे मन से चाहती हैं कि मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में महिलाओं को लेकर जो सोच है वह बदलना चाहिए. और उन्हें लगता है कि बदलाव आ भी रहा है. बहुत सारी महिलाएं अब इस स्पोर्ट्स को पसन्द करने लगी हैं और युवा लड़कियां भी रेसिंग के प्रति उत्साहित नज़र आने लगी हैं.

असल में सभी जगह हो यह रहा है, चाहे वो खेल हो या कुछ और,  कि  मूल की बजाय या उसके साथ-साथ उसकी पैकेजिंग पर खासा ज़ोर दिया जा रहा है ताकि जिनकी उसमें कोई रुचि नहीं है वे भी इतर कारणों से उसकी तरफ खिंचे चले आएं. सीधे-सीधे कहूं तो यह कि आपकी इस खेल विशेष में रुचि नहीं है, तो कोई बात नहीं, आप तो हमारी ग्रिड गर्ल्स या चीयर लीडर्स को देखने के लिए ही टिकिट खरीद लीजिए. हमें आपकी रुचि में नहीं आपके पर्स में दिलचस्पी है. लेकिन, खुशी की बात यह है कि आयोजक भी अब गतिविधि विशेष के प्रति गम्भीर होने लगे हैं और उससे जोड़ी जाने वाली अवांछित हरकतों के विरोध में उठ खड़े होने लगे हैं. आशा की जानी चाहिए कि इस मुहिम का और विस्तार होगा.

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जयपुर  से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 26 मई, 2015 को क्या ज़रूरत है खेलों में स्त्री देह की नुमाइश शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, May 19, 2015

सहमति कपड़े उतारने की

समाचार है कि किसी जनजागृति समिति नामक संगठन ने मुम्बई के डॉम्बिवली (थाणे) के अंतर्गत आने वाले रामनगर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज़ करवा कर यह मांग की है कि फिल्म अदाकारा सनी लियोनी को देश निकाला दिया जाए और भविष्य में उनके भारत प्रवेश पर रोक लगाई जाए. समिति का कहना है कि सनी लियोनी अपनी वेबसाइट पर वल्गरिटी का प्रदर्शन करतीं और स्त्रियों की गरिमा को आहत करती हैं. इस संगठन का यह भी कहना है कि उसने पिछले एक सप्ताह में महाराष्ट्र और गोवा के विभिन्न थानों में एक दर्ज़न से ज्यादा ऐसी ही शिकायतें और दर्ज़ करवाई हैं. हमारे पाठक यह तो जानते ही हैं कि 34 वर्षीया सनी लियोनी भारत मूल की कनाडाई नागरिक हैं और उनके पास अमरीका तथा कनाडा की दोहरी नागरिकता है. वे पूर्व पोर्न अदाकारा हैं और उनकी सबसे अधिक कुख्याति भी इसी वजह से है. सन 2012 में उन्होंने पूजा भट्ट की फिल्म ‘जिस्म 2’ से बॉलीवुड में प्रवेश  किया और उसके बाद कई और फिल्मों में भी काम किया. बॉलीवुड में उनका प्रवेश ‘बिग बॉस’ की मार्फत हुआ था. देश के एक बड़े अंग्रेज़ी अखबार ने  उन्हें साल 2014 की ‘मोस्ट डिज़ायरेबल वुमन’ भी घोषित किया था.

अब ज़रा दूसरी खबर की तरफ मुड़ें. टीवी धारावाहिकों की महारानी और अब अनेक लोकप्रिय फिल्मों की भी निर्मात्री एकता कपूर ने इन्हीं सनी लियोनी के साथ एक ‘बोल्ड’ फिल्म बनाने की घोषणा की. शीर्षक था – ‘एक्सएक्सएक्स’. ‘डर्टी पिक्चर’, ‘लव सेक्स और धोखा’   और ‘रागिनी एमएमएस’  जैसी फिल्में बना चुकीं एकता ने जब सनी लियोनी को अपनी इस बोल्ड फिल्म के लिए साइन किया तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि वे क्या चाहती होंगी. लेकिन ना जाने एकता की अपेक्षाएं क्या थीं कि जिस सनी लियोनी से उपरोक्त  जनजागृति समिति आतंकित है उसने भी एकता की इस फिल्म में ऐसे कुछ सीन करने से मना कर दिया जो उसे निर्वस्त्र होकर करने थे. ज़ाहिर है कि एकता ने तो उन्हें साइन ही इस आस पर किया होगा. लेकिन एकता और सनी के बीच तनानतनी इतनी ज्यादा बढ़ी कि अंतत: एकता के पास उन्हें अपनी इस फिल्म से बाहर करना ही एकमात्र विकल्प बचा, और उसका इस्तेमाल उन्होंने किया भी. लेकिन इस अप्रिय प्रसंग से उन्होंने एक सबक भी सीखा. सबक  यह कि अब उन्होंने तै कर लिया है कि वे अपनी  फिल्म  के लिए किसी भी कलाकार को साइन करने से पहले उससे ‘न्यूडिटी क्लॉज़’  पर साइन करवाएंगी. एकता ने इसकी शुरुआत बालाजी मोशन पिक्चर्स के केन घोष के निर्देशन में बनने वाले इसी इरॉटिक थ्रिलर ‘एक्सएक्सएक्स’ से कर दी है. इससे भी आगे  यह बात और कि एक नई अभिनेत्री  कायरा दत्त ने इस अनुबन्ध पर हस्ताक्षर कर भी दिये हैं. ‘नच बलिये’  सीज़न 6 की डांसर रह चुकीं  कायरा का कहना है, “मैं अपने शरीर को लेकर कम्फर्टेबल हूं और मुझे इसे कैरी करना आता है. मैंने बोल्ड दृश्य देने पर हां किया है  क्योंकि मुझे खुद पर और अपने निर्देशक पर पूरा विश्वास है.” बहुत स्वाभाविक है कि कायरा का यह वक्तव्य पढ़ते हुए हमें दीपिका पादुकोण के उस चर्चित वीडियो की भी याद आ जाए जिसका शीर्षक था ‘माय चॉइस’.
                                                                                                        
यहीं यह बता दिया जाना भी उपयुक्त होगा कि ‘न्यूडिटी क्लॉज़’  का सीधा-सादा मतलब  यह है कि इसे स्वीकार करने वाला कलाकार जितने की उससे मांग की जाएगी उतना एक्सपोज़ करने को कानूनी रूप से सहमत है. क्लॉज़ में एक्सपोज़र को और अधिक स्पष्ट करते हुए यह भी शामिल किया जा सकता है कि देह के किन भागों को अनावृत चित्रित किया जाएगा. इस क्लॉज़ में अन्य कलाकारों के साथ अंतरंग दृश्य करने की सहमति भी शामिल की जा सकती है. हॉलीवुड में तो यह क्लॉज़ काफी पहले से चलन में है और वहां विभिन्न यूनियनों ने भी अपनी गाइडलाइंस बना रखी हैं जो कलाकार और निर्माता दोनों के अधिकारों की रक्षा करती हैं. अपने देश में फिल्मों में काफी पहले से मौज़ूद न्यूडिटी के बावज़ूद कायरा दत्त इस तरह के अनुबन्ध पर हस्ताक्षर करने वाली पहली अदाकारा बन गई हैं.

अब देखने की बात यह है कि एक तरफ भारतीय सेंसर बोर्ड हमारी फिल्मों में सेक्स, हिंसा और अभद्र भाषा के प्रति कड़ा रुख अपनाने की बात कर रहा है और दूसरी तरफ फिल्म निर्माता अपने कलाकारों से अधिक मुक्त होने की अनुबन्ध शुदा  अपेक्षा कर रहे हैं. इस सन्दर्भ में श्याम बेनेगल का यह कथन भी विचारणीय है कि “आजकल जिस तरह की कहानियां बन रही हैं, इस तरह के दृश्य कहानी की मांग हैं.” लेकिन इस मामले में कलाकार की मर्जी वाली बात की अनदेखी नहीं की जा सकती. सिद्धांतत: तो लगता है कि ऐसे किसी क्लॉज़ पर दस्तखत करना न करना कलाकार की मर्जी की बात है, लेकिन क्या व्यवहार में भी ऐसा  ही होगा?

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, दिनांक 19 मई, 2015 को न्यूडिटी क्लॉज़ से फिल्मी परदे  पर कपड़े उतारने की सहमति शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.