Tuesday, March 18, 2014

तुम क्या जानो क्या हाल कर दिया था तुमने हमारा

हम सबको इस तरह के अनुभव होते ही रहते हैं. किसी की तनिक-सी उदासीनता, या लापरवाही, या ग़ैर ज़िम्मेदारी – आप जो भी चाहे नाम दे लें उसे, दूसरों के लिए बहुत बड़ी परेशानी का सबब बन जाती है. ऐसा नहीं है कि ऐसी  ग़लती सिर्फ दूसरों से ही होती है, मुझसे  कभी हुई ही नहीं. मुझसे भी शायद अनेक दफ़ा ऐसी चूक हुई होगी, और मेरे अनजाने में उसे दूसरों ने भुगता होगा. इसीलिए आज  किसी और की एक चूक की चर्चा आपसे कर रहा  हूं.

उस दिन अस्पताल गया तो किसी और ही काम से था, लेकिन लगा कि अपना बीपी भी लगे हाथों चैक करवा लूं. डॉक्टर साहब से दुआ-सलाम थी. उन्होंने बीपी चैक करके  कहा कि बेहतर होगा मैं अपना ईसीजी करवा लूं. न सिर्फ कहा, ईसीजी करने वाले टैक्नीशियन को बुला मुझे उनके हवाले भी कर दिया. तब मैं जयपुर के नज़दीक, कोटपुतली  के स्नातकोत्तर  कॉलेज में उपाचार्य था. कुछ ही दिनों  पहले सिरोही से पदोन्नति पर वहां पहुंचा था. संयोगवश टैक्नीशियन महोदय उसी कॉलोनी में रहते थे जिसमें मैं रहता था, और मुझे पहचानते थे. उन्होंने तसल्ली से मेरा ईसीजी किया और उसका प्रिण्ट आउट मुझे देकर डॉक्टर साहब के पास भेज दिया.

ईसीजी की उस रपट को देखते ही डॉक्टर साहब की मुख मुद्रा गम्भीर हो गई. उन्होंने सलाह दी कि मुझे फौरन जयपुर जाकर एस एम एस अस्पताल में खुद को दिखाना चाहिए. मैंने पूछा कि क्या कोई ख़ास चिंता की बात है, तो वे मेरे सवाल  को टाल गए. मुझे कुछ ही देर बाद एक शादी में शमिल होने के लिए सिरोही जाने के लिए कोटपुतली से निकलना  था. घर आया. मुंह ज़रूर ही लटका हुआ होगा. पत्नी ने पूछा कि क्या बात है, तो मैंने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने भी  स्थिति की गम्भीरता समझ ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया. अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हम लोग कोटपुतली से निकल कर अगली सुबह सिरोही पहुंच गए. मैं रास्ते भर अनमना बना रहा. स्वाभाविक ही है कि मेरे अनमनेपन का असर पत्नी पर भी पड़ा. शादी में जाने का उत्साह और उल्लास हवा हो चुका था.

नहा धोकर सिरोही के सरकारी अस्पताल पहुंचा, जहां मेरे एक अत्यंत आत्मीय डॉक्टर सामने ही मिल गए. उदासी शायद मेरे चेहरे पर चिपकी हुई थी. उन्होंने वजह पूछी तो मैंने ईसीजी की रपट आगे कर दी. उन्होंने एक नज़र उस पर डालते ही पूछा कि “अग्रवाल साहब, यह किसकी रिपोर्ट उठा लाए?”  जब मैंने कहा कि यह तो मेरी ही रिपोर्ट है, तो उन्होंने अविश्वास  भरी नज़र से मुझे देखा, जैसे कह रहे हों, क्यों मज़ाक करते हो? मैंने फिर से उन्हें कहा कि यह मेरी ही रिपोर्ट  है, कल ही मैंने अपना ईसीजी करवाया है और इसी के  आधार पर डॉक्टर साहब ने मुझे राज्य के सबसे बड़े अस्पताल चले जाने की अर्जेण्ट सलाह दी है.

मेरे मित्र डॉक्टर साहब को शायद उस रिपोर्ट पर क़तई विश्वास नहीं हो रहा था. असल में कोतपुतली जाने से पहले मैं उनके नियमित सम्पर्क में था और मेरे स्वास्थ्य की स्थिति  से वे भली-भांति परिचित थे. उन्होंने पहले मेरा बीपी चैक किया और फिर मुझे एक बार और ईसीजी करवा लेने के लिए कहा. मैं बड़ी उलझन में था कि मामला आखिर क्या है! लेकिन अपने यहां इस बात का कोई रिवाज़ नहीं है डॉक्टर, चाहे वो आपका कितना ही नज़दीकी क्यों न हो, आपके मर्ज़ के बारे में आपसे खुलकर  बात करे. बहरहाल, मैंने एक बार फिर अपना ईसीजी करवाया और उसकी रिपोर्ट लेकर डॉक्टर साहब के पास पहुंचा. एक नज़र उस पर डालते ही वे मुझसे बोले, “देखो, मैंने कहा था ना कि वो रिपोर्ट आपकी हो ही नहीं सकती! आप एकदम ठीक हैं!” उन्होंने मुझे एक बार फिर आश्वस्त किया कि मैं तनिक भी चिंता न करूं, सब कुछ ठीक है, और फिर मुझे चाय पिला कर  विदा किया.

माहौल बदल चुका था. खुशी-खुशी घर  आया, पत्नी को सारा किस्सा बताया राहत की खूब लम्बी सांस ली, बहुत मज़े से शादी का लुत्फ लिया, और फिर हम दोनों कोटपुतली लौट गए.
यह संयोग ही था, कि अगले दिन जैसे ही मैं घर से कॉलेज जाने के लिए निकला, सामने वे तकनीशियन महोदय मिल  गए. मैंने शिकायत भरे लहज़े में उनसे कहा कि आपने मेरा कैसा ईसीजी किया.......मेरी तो जान ही निकाल दी! पहले तो उन्होंने मुझसे पूरा वाकया सुना, और फिर बड़े बेपरवाह लहज़े में बोले, “हां, सर, हमारी वो मशीन थोड़ी खराब है. कई बार वो ग़लत रिपोर्ट  दे देती है.” यानि उन्हें अपनी मशीन के चाल चलन की जानकारी थी.

मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उनसे क्या कहूं? उनकी मासूमियत लाजवाब थी. होती भी क्यों नहीं? उन्हें क्या पता कि मैं इस बीच कितने विकट मानसिक तनाव से गुज़र चुका था!

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत मंगलवार, 18 मार्च 2014 को 'खराब मशीन की ईसीजी ने बढ़ा दी धड़कन' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल पाठ 

Tuesday, March 11, 2014

अच्छे काम की तारीफ़ भी की जानी चाहिए!

कुछ विभागों के बारे में इतना ज़्यादा  नकारात्मक पढ़ने सुनने को मिल चुका होता है कि हम यह मानने को तैयार ही नहीं होते हैं कि ये विभाग कोई सही और  अच्छा काम भी करते हैं! ऐसे विभागों की अगर कोई सूची बनाई जाए तो पुलिस विभाग का नाम उसमें काफी ऊपर आएगा. लेकिन अगर कोई कहे कि पुलिस के बारे में जो बातें बार-बार कही-सुनी जाती हैं, वे पूरी तरह सच नहीं है, और पुलिस ईमानदारी से काम करती है, तो भला कौन विश्वास करेगा? मैं भी नहीं करता, अगर मुझे एक ख़ास अनुभव नहीं हुआ होता. और उस अनुभव ने पुलिस के बारे में मेरी धारणा को एकदम बदल दिया.

बात ज़्यादा पुरानी नहीं हुई है. हम लोग जयपुर में अपना घर बंद करके छह महीनों के लिए अमरीका गए थे. पड़ोसी बहुत अच्छे हैं, इसलिए किसी को घर पर सुलाया नहीं, उन्हीं को कह कर चले गए कि वे घर का ध्यान रखें! साढ़े चार महीने सकुशल निकल गए. अचानक एक दिन जयपुर से अमरीका फोन आया कि हमारे घर  में चोरी हो गई है और घर का कुण्डा ताला टूटा पड़ा है.  घबराहट स्वाभाविक थी. पहले तो अपने  एक  स्थानीय रिश्तेदार से कहा कि वो जाकर घर सम्हाले, टूटा कुण्डा ताला वगैरह  बदलवा दे, और फिर सूरत में रह रहे बेटे से कहा कि वो एक दफा जयपुर आ जाए और घर को सम्हाल कर पुलिस में रपट वगैरह  लिखवा दे. और ये सारे काम हो गए.

कोई पंद्रह बीस दिन बाद हमारे पड़ोसियों ने बेटे को फोन करके कहा कि वो पुलिस से सम्पर्क करे, और जब उसने पुलिस से सम्पर्क किया तो उसे बताया गया कि हमारे घर में चोरी करने वाले को पकड़ लिया गया है और उससे काफी सामान बरामद हुआ है. आगे जो हुआ उसे संक्षेप में कहूं तो मात्र इतना कि हमारा चोरी गया सामान करीब-करीब पूरा मिल गया, और वो भी यथा कार्यक्रम अपना अमरीका प्रवास पूरा करके हमारे भारत  लौटने  के बाद. तब तक वो सामान पुलिस के पास सुरक्षित पड़ा रहा, कोई अमानत में खयानत नहीं हुई. हां, अदालती औपचारिकताएं हमें पूरी करनी पड़ीं, और उनमें कुछ अलग तरह के अनुभव भी हुए,  लेकिन  उनकी चर्चा यहां अप्रासंगिक होगी. 

दिलचस्प और प्रशंसनीय बात यह है कि पुलिस ने हमारे यहां चोरी करने वाले उस चोर को पकड़ा कैसे? हुआ यह कि पुलिस की नियमित गतिविधि के तहत एक चोर पकड़ा गया और उसके पास से काफी सारा माल बरामद हुआ. पुलिस उस चोर से यह नहीं जान सकी कि उसने कहां-कहां चोरी की थी. पुलिस चाहती तो आसानी से उस माल को हजम कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. उसने उस माल के मालिक का पता लगाने की भरपूर  कोशिश की. जो माल पुलिस को उससे बरामद हुआ, उसमें एक टू-इन-वन यानि रेडियो कम कैसेट रिकॉर्डर भी था, जिस पर किसी रेडियो रिपेयरिंग शॉप का लेबल लगा था. पुलिस उस टू-इन-वन को लेकर उस शॉप पर पहुंची और वहां से पता लगा कि यह टू इन वन अमुक जगह रहने वाले किसी व्यक्ति का था. जब पुलिस उस व्यक्ति को  तलाश करती वहां पहुंची तो बताया गया कि वह व्यक्ति तो वहां से अमुक कॉलोनी में रहने चला गया है. उसी बरामद हुए सामान में एक कीमती कैमरा भी था जिसमें एक आधी काम में ली हुई फोटो फिल्म भी थी. पुलिस ने उस फिल्म को धुलवाया तो उसमें किसी बच्चे की बर्थ डे पार्टी की कुछ तस्वीरें मिलीं. पुलिस उन तस्वीरों को लेकर हमारे घर वाली कॉलोनी में आई और वो तस्वीरें जब हमारे पड़ोसियों को दिखाई गईं तो उन्होंने तुरंत बता दिया कि वे हमारे पोते के जन्म दिन की तस्वीरें हैं. तो इस तरह उस रेडियो रिपेयरिंग शॉप और कैमरे की फिल्म के माध्यम से पुलिस ने यह पता लगाया कि बरामद हुआ यह सामान हमारा   है.

यह पूरा वृत्तांत लिखने का मेरा मकसद यही बताना है कि जिस पुलिस को कोसने का कोई मौका हम नहीं छोड़ते हैं, वो भी काम करती है लेकिन उसके काम की कोई तारीफ़  नहीं करता. मुझे यह कहना भी ज़रूरी लग रहा है कि मेरे घर हुई इस चोरी के मामले में पुलिस ने जो भी किया वो अपनी पहल पर किया, न कि मेरे किसी दबाव या प्रभाव के कारण. एक नागरिक के रूप में मुझे लगता है कि जो लोग हमारी सेवा के लिए नियोजित हैं, उनके मूल्यांकन में बेवजह अनुदार और नकारात्मक होकर हम उन्हें हतोत्साहित ही करते हैं. अगर उनके प्रति हम अपना रुख सकारात्मक बनाएं तो निश्चय ही वे और अधिक उत्साह  के साथ हमारी सेवा करेंगे.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 मार्च 2014 को कभी-कभी पुलिस भी होती है तारीफ की हक़दार शीर्षक से प्रकाशित कड़ी का मूल पाठ. 

Thursday, March 6, 2014

यह योग्यता हममें भरपूर मात्रा में है!

पिछले दिनों एक सरकारी विभाग के अनुभव की अपनी व्यथा-कथा सोशल मीडिया के मंच पर साझा की तो बहुत सारे मित्रों ने भी अपने वैसे ही अनुभव साझा कर दिए. लगा कि  बस ज़ख्म को कुरेद भर देने की देर थी. वैसे अपने यहां सरकारी दफ़्तरों  में कमोबेश एक-सा हाल है. अगर कभी कहीं सुगमता से काम हो जाए तो विश्वास ही नहीं होता है. आप किसी दफ़्तर में किसी भी काम के लिए चले जाएं,  पहला जवाब तो यही मिलेगा कि यह काम नहीं हो सकता. बल्कि उससे भी पहले यह होगा कि अगर आप सुबह पहुंचे हैं तो बताया जाएगा कि यह काम शाम को होता है और शाम को पहुंचे हैं तो आपको सुबह आना चाहिए था. अगर किसी चमत्कार से आप सही सुबह या सही शाम पहुंच भी गए हों तो जो सज्जन आपका काम करने के लिए नियुक्त हैं वे छुट्टी पर/दौरे पर/मीटिंग में होंगे, इसलिए आपको कलआना होगा. एंड यू नो, टुमारो नेवर कम्स!

काम करवाने की प्रक्रिया भी आसान नहीं होती है. एक आवेदन पत्र लिखिए, उसके साथ आवश्यक दस्तावेजों की राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित करवाई हुई फोटो प्रतियां नत्थी कीजिए, उस आवेदन पत्र पर दफ्तर के बड़े साहब से मार्किंग करवाइये, फीस जमा करवाइये, और फिर आवेदन पत्र जमा करवाइये. शायद ही कभी ऐसा हो कि आपको बताया जाए कि कल आपका काम हो जाएगा, और हो जाए! लगाते रहिये चक्कर! तंग आकर बड़े साहब से मिलना चाहेंगे तो या तो वे चेम्बर में नहीं होंगे (दौरे पर या  मीटिंग में कौन जाएगा?) और अगर हुए तो उनका पी ए आपको उनसे मिलने नहीं देगा.

इससे मुझे याद आया कि कुछ बरस पहले जब मैं अपने विभाग के एक बड़े पद पर आसीन हुआ और वहां आने वाले लोगों को सहज रूप से सुलभ होने लगा तो सबसे पहली शिकायत मेरे पी ए साहब को ही हुई. पहले तो उन्होंने मुझे सदाशयतापूर्ण सलाह दी कि मैं इस तरह आसानी से लोगों से न मिला करूं और जब मैंने उनकी सलाह नहीं मानी तो उन्होंने इधर-  उधर कहना शुरु किया कि ये साहब तो दफ्तर का अनुशासन ही ख़त्म किए दे रहे हैं!

जब बात सरकारी काम काज की चल  ही निकली है तो लगे हाथों अपना एक और मज़ेदार अनुभव आपसे साझा कर लूं. हुआ यह कि मेरी बेटी ने,  जिस शहर में वो पढ़ रही थी वहां एक मोपेड खरीदी. परिवहन विभाग के एक अजीबो गरीब नियम के अनुसार  उसका रजिस्ट्रेशन उसी शहर में हो सकता था जहां के आप मूल निवासी हों. और हमारा यह मूल निवास बेटी की पढ़ाई वाले उस शहर से 200 किलोमीटर दूर था. मेरे शहर के डीटीओ (ज़िला परिवहन अधिकारी) से मेरी अच्छी जान पहचान थी, सो मैं उनके पास सारे कागज़ात लेकर पहुंचा कि वे उस वाहन का रजिस्ट्रेशन कर दें. उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे बिठाया, चाय पिलाई और फिर मेरे कागज़ देखकर पूछा कि वाहन कहां है? मैंने बताया कि वाहन तो वहीं है जहां से उसे खरीदा गया है. उन्होंने बहुत ही सहजता से कहा कि बस आप दो मिनिट के लिए वो वाहन  यहां ले आइये, मैं फौरन रजिस्ट्रेशन कर दूंगा, ज़रा भी देर नहीं लगाऊंगा. मेरे सारे अनुरोध उनकी  सरकारी नियमों से बंधी कर्तव्यपरायणता के आगे निष्फल रहे. मुंह लटका कर बाहर निकल ही रहा था कि मेरा एक पड़ोसी  मिल गया. दुआ सलाम के बाद उसने मुझसे वहां आने की वजह पूछी, और मैंने अपनी पूरी राम कहानी उसे सुना दी. वो वहीं मुझे एक ट्रांसपोर्ट एजेण्ट के पास ले गया, जो संयोग से मेरा भी परिचित था. उसने कहा कि यह तो कोई काम ही नहीं है. आसानी से हो जाता, लेकिन आप क्योंकि साहब के पास चले गए थे और मामला उनके ध्यान में आ चुका है, इसलिए थोड़ा खर्चा होगा. जितना खर्चा उसने बताया वो 200 किलोमीटर दूर से वाहन लाने ले जाने से तो कम ही था. मैंने हामी भरी, कागज़ात उसे सौंपे, और अगले दिन उसके बताए समय पर जब पहुंचा तो वाहन के रजिस्ट्रेशन के कागज़ात तैयार थे. एक बार तो मेरा मन हुआ कि अपने उन डीटीओ मित्र के पास जाऊं और पूछूं  कि कल जो काम नियम  विरुद्ध था, आज वही काम उन्हीं के हस्ताक्षरों से कैसे हो गया, लेकिन फिर सोचा मेरा चाहे कुछ न बिगड़े, उस एजेण्ट को परेशानी हो सकती है, और यह सोचकर सीधा अपने घर चला आया.

इतने बरस बहुत सारे सरकारी दफ्तरों  की  धूल फांककर मुझे एक ही बात समझ में आई है और वह यह कि काम की प्रक्रिया को जटिल बनाने में, लोगों की परेशानियों में वृद्धि  करने में और आपको ग़लत तरीकों से काम  करवाने के लिए मज़बूर करने में हमारी सरकारी मशीनरी का कोई जवाब नहीं है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे  साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर  में  मंगलवार दिनांक 05 मार्च, 2014 को 'सरकारी दफ्तर...और काम कल होने का फेर' शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ!   

Tuesday, February 25, 2014

हम किधर जा रहे हैं?

शादियों का सीज़न है. लोग आपस में बातें करते हैं तो हरेक की यही कोशिश होती है कि कैसे खुद को दूसरों से सवाया सिद्ध किया जाए! एक कहता है कि यार, मेरे पास पंद्रह शादियों  के निमंत्रण हैं, क्या करूं, कैसे सब में  जाऊं, तो दूसरा नहले पर दहला मारता हुआ कहता है कि बस, पंद्रह ही? मेरे पास तो पूरे बत्तीस निमंत्रण पत्र पड़े हैं! और इन दोनों की बातें सुनते हुए मैं सोचता हूं कि मैं बड़ा खुशनसीब हूं कि मेरे पास मात्र एक निमंत्रण है और मैं उस शादी का भरपूर लुत्फ ले रहा हूं.

वैसे शादियों की दुनिया में काफी सारे बदलाव हुए हैं. ख़ास बात तो यह कि पहले जो शुद्ध पारिवारिक उत्सव हुआ करता था वो अब एक जन सम्पर्क गतिविधि में रूपांतरित हो चुका है. अब शादी में अपने परिवार की खुशी अपने निकट के लोगों से बांटने की बजाय यह दर्शाने की भावना अधिक आ गई है कि आप कितने  साधन सम्पन्न हैं और आपका सामाजिक घेरा कितना बड़ा है. मुझे नहीं लगता कि किसी भी शादी में आए हज़ार दो हज़ार पांच हज़ार लोगों को बेटे/बेटी के मां-बाप या खुद वर-वधू व्यक्तिश: जानते होंगे. और यही बात उन अतिथियों की तरफ से भी कही जा सकती है.

शादी के पहले वाले विशुद्ध पारिवारिक आयोजनों को भी शादी जितना ही भव्य बनाया जा रहा है और सज्जा, आवभगत, जलपान, भोजन  आदि पर खर्च बढ़ाने के अजीबो-गरीब तरीके तलाश किए जा रहे हैं. हाल ही में एक सेलेब्रिटी से मुलाक़ात हुई जो किसी शादी में पंद्रह मिनिट की अपनी उपस्थिति के लिए मायानगरी से उड़कर आए थे. एक मोटे अंदाज़ के अनुसार उनकी पंद्रह  मिनिट की उपस्थिति का व्यय चार  लाख था. और उस शादी में उन जैसे तीन-चार सेलेब्रिटी बुलवाए गए थे. कहना अनावश्यक है कि जिस परिवार में शादी थी उससे उनका कोई लेना-देना नहीं था. पिछले दिनों हमने अखबारों में पढ़ा ही है कि लोग अपनी शादियों की शोभा बढ़ाने के लिए किन-किन को और कहां-कहां से बुलाते हैं!

और शादी का खाना! कल तक जिन व्यंजनों से शादी की पहचान बनती थी वे कभी के रिटायर हो चुके हैं और उनकी जगह ऐसे-ऐसे व्यंजन ले चुके हैं जो कल्पना से भी परे हैं. व्यंजनों की गिनती करने बैठेंगे तो कैलक्युलेटर की ज़रूरत  महसूस होगी. हम जैसे मध्यमवर्गीय लोग अक्सर शादियों में यह शिकायत करते सुने जाते हैं कि अरे वहां तो इतनी चीज़ें थीं कि उन्हें चखना भी मुमकिन नहीं था! मुझे लगता है कि बात इससे भी आगे बढ़ चुकी है. अब चखना तो छोड़िये, देखना भी मुमकिन नहीं रह गया है. अक्सर ही यह होता है कि एक कहता है कि अमुक व्यंजन बहुत उम्दा था, तो दूसरा कहता है कि अच्छाहमने तो  देखा ही नहीं. खाने का बाड़ा इतना बड़ा होता है कि कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव की वो बात याद आ जाती है कि भैया इतना खर्चा किया तो कुछ रिक्शा भी चलवा दिये होते!

अब जहां इतने व्यंजन होंगे वहां खाने की बर्बादी तो होनी ही है. ऐसा तो नहीं है कि होस्ट को यह बात मालूम न हो! मुझे अक्सर अपने एक मित्र की बात याद आती है. उनके साथ ऐसी ही एक भव्य शादी में जाना हुआ, तो देखता क्या हूं कि वे किसी स्टॉल पर जाते हैं, वहां से एक प्लेट लेते  हैं और फिर  उसमें से ज़रा-सा चख कर उस प्लेट को डस्टबिन में डालकर दूसरी स्टॉल की तरफ बढ़ जाते हैं. मुझसे खाने की यह बर्बादी सहन नहीं हुई तो मैंने उन्हें टोक दिया. लेकिन उनपर मेरी बात का कोई असर नहीं हुआ. बड़े सहज और लापरवाह भाव से बोले, “जिसने हमें बुलाया है, वो भी तो यही चाहता है! क्या उसे नहीं मालूम कि इतनी सारी चीज़ें हम खा नहीं सकते हैं! ससुरे ने रखी ही इसलिए है कि हम चख लें और आगे बढ़ जाएं!” बात तो ठीक थी.

और इस सब के बीच असल शादी तो नेपथ्य में चली जाती है. ताम-झाम उसके लिए चाहे जितना जुटाया जाए, उसमें दिलचस्पी किसी की नहीं होती. शायद खुद वर-वधू की भी नहीं. पण्डितजी से आग्रह किया जाता है, और आग्रह भी क्या, उन्हें तो डांट कर कहा जाता है कि जल्दी से यह सब निबटा दो.

और यह सारा तमाशा हमारी आंखों के सामने हो रहा है.  हो क्या रहा है, हम खुद इसमें शामिल हैं! मौका मिलता है तो हम भी यही सब करते हैं. अपने साधनों की सीमितता की वजह से कर नहीं पाते हैं तो करने वालों की तरफ़ हसरत भरी निगाहों से ताकते हैं और सोचते हैं कि काश! हम  भी वैसा ही कर पाते!

यारों, कभी तो रुक कर सोचो कि हम किस तरफ़ जा रहे हैं? इस दौड़  का अंत कहां होगा? क्या शादियों की पारिवारिक आत्मीयता वापस नहीं लौटनी चाहिए?  

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 25 फरवरी, 2014 को आखिर इस दौड़ का अंत क्या होगा शीर्षक से प्रकाशित आलेख का मूल पाठ. 

Tuesday, February 18, 2014

किताबें और हम

किताबों के साथ हमारा रिश्ता बहुत अजीब है. चाहते हैं कि हमारे चारों तरफ किताबें ही किताबें हों. बस उन्हें छूते, सूंघते, देखते और पढ़ते हुए ज़िंदगी कट जाए! लेकिन जब किताबें इकट्ठी हो जाती हैं तो दूसरी तरह की बेचैनी घेरने लगती है! अरे! वक़्त इतना कम है और कितना कुछ पढ़ने को शेष है! मुझ जैसे मध्यवर्गीय लोगों का एक संकट और है और वह यह कि किताबें इकट्ठी  करने वाले मन का मकान की सीमित जगह से कोई तालमेल नहीं बैठ पाता है. और अगर पत्नी सुरुचि सम्पन्न हो तो यह कष्ट और कि किताबें उनकी आंखों में रड़कती हैं. ख़ास तौर पर पुरानी और जीर्ण-शीर्ण किताबें! मेरी पीढ़ी के लोगों की एक और बहुत बड़ी चिंता यह भी है कि हमारे बाद इन किताबों का क्या होगा? अपने अनेक दिवंगत आत्मीय साहित्य रसिकों के परिवार जन को उनकी बड़े जतन से संजोई लाइब्रेरियों के लिए फिक्र करते मैंने देखा है.

बहरहाल, आज तो मुझे किताबों से जुड़ी एक मज़ेदार घटना की याद आ रही है, उसी को आपसे साझा कर रहा  हूं. इस घटना को साझा करने से पहले यह कह दूं कि जिन मित्र से इस घटना का ताल्लुक है, उनके प्रति अवज्ञा या अवमानना का लेश मात्र भी भाव मेरे मन में नहीं है और उनकी मज़बूरी को अच्छी तरह समझता हूं.  महज़ अपने पाठकों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए इसे साझा कर रहा  हूं.

दिवाली से पहले के दिन थे. ये दिन कबाड़ियों के लिए ख़ास होते हैं. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं, अनुपयोगी सामान निकालते हैं और इस वजह से कबाड़ी लोगों का कारोबार उन दिनों अपने यौवन पर होता है. वो एक छोटा-सा कस्बा था जहां हम रहते थे. कुछेक कबाड़ी जो ठेलों पर अपना धंधा चलाते थे, मुझे भी जानते थे. जानने की वजह यह थी जब भी उनके ठेलों पर किताबें नज़र आतीं, मैं उन्हें रोकता और उनमें से अपने काम की किताबें छांट कर बिना मोलभाव किए खरीद लिया करता था. वे कबाड़ी कोई खास पढ़े लिखे तो थे नहीं, पर उन्हें यह ज़रूर समझ में आता था  कि  यह आदमी वो किताबें खरीदता है जिन्हें कोई दूसरा छूता तक नहीं है. मुझे इन कबाड़ियों से कई दफा बेशकीमती साहित्यिक सामग्री मिल चुकी थी, इसलिए मैं भी उनकी  तलाश में रहता था.

तो उस दिन जब मैं अपने कॉलेज जा रहा था, ऐसे ही एक परिचित कबाड़ी ने मुझे आवाज़ दी, और कहा कि साहब आज तो आपके काम का बहुत सारा माल मेरे पास आया है. मैं रुका, उसने अपना ठेला सड़क के किनारे खड़ा किया और किताबों के एक बड़े ढेर की तरफ इशारा कर मुझे अपने पसंद की किताबें चुन लेने को आमंत्रित किया. वाकई वे उम्दा साहित्यिक किताबें थीं. कविताओं की, कहानियों  की, लेखों की, आलोचना की. शीर्षक देख कर एक किताब हाथ में ली, उसे खोला तो देखा भीतरी पन्ने पर लिखा था – आदरणीय अमुक जी को सादर भेंट! और नीचे लेखक के हस्ताक्षर थे. मेरी दिलचस्पी जागी. दूसरी किताब देखी, वही बात. तीसरी, चौथी, पांचवीं....यानि ये सारी किताबें मेरे मित्र और सहकर्मी के यहां से आई थीं. बात मुझे समझ में आ गई. रचनाकार, विशेष रूप से युवा और उभरते हुए रचनाकार अपनी  नव प्रकाशित किताबें  सम्मति और  आशीर्वाद के लिए अपने वरिष्ठ रचनाकार सथियों को भेंट करते हैं. मेरे उन  मित्र को भी स्वभावत: ऐसी बहुत सारी किताबें  भेंट  में प्राप्त हुई थीं, और उन्होंने दिवाली की सफाई के दौरान उन किताबों से इस तरह निज़ात पाई थी. जैसा मैंने कहा, हम मध्यवर्गीय  लोगों के घरों में इतनी जगह नहीं होती कि जितनी किताबें हम चाहते हैं उन सबको सहेज कर रख सकें, ऐसे में किताबों की छंटनी एक मज़बूरी के रूप में सामने आती है.

ख़ैर! मुझे मज़ाक सूझा. दोस्तों में यह आम बात है. मैंने कोई बीसेक किताबें उस ठेले से खरीदीं. तब वो पचास पैसे में एक किताब देता था. दस रुपये बहुत ज़्यादा नहीं थे मज़ाक के नाम पर. किताबें घर लाया, और जहां-जहां उनके लेखकों ने मेरे परम मित्र का नाम लिखकर अपने दस्तखत कर रखे थे, उनके ठीक नीचे लिखा, आदरणीय अमुक जी को पुन: सादर भेंट! और अपने हस्ताक्षर कर दिए. शाम को उनके घर गया, और पूरी गम्भीरता और विनम्रता से उनसे कहा कि आपके लिए एक छोटी-सी भेंट लेकर हाज़िर हुआ हूं. और यह कहकर उन किताबों का ठीक से बनाया हुआ पैकेट उनके सामने रख दिया. उन्होंने बड़ी उत्सुकता से उस बण्डल को खोला......

और फिर?

बस! फिर क्या हुआ यह मत पूछिये!

इतना कह दूं कि बरसों बीत जाने के बाद अब भी हमारी दोस्ती उतनी ही प्रगाढ़ है! 

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लोकप्रिय दैनिक न्यूज़ टुडै  में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर में 18 फरवरी, 2014 को सप्रेम मिली किताबें कबाड़ी को चढ़ी भेंट शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख. 

Tuesday, February 11, 2014

यादें सांस्कृतिक कार्यक्रमों की

पिछले कुछ बरसों से जनवरी-फरवरी के महीने अपने प्रांत में शिक्षण संस्थाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए आरक्षित हो गए हैं. अगस्त में छात्र संघों के चुनाव होते हैं, फिर नेताओं की उपलब्धता के अनुसार उनका उद्घाटन होता है (आजकल तो छात्र संघ कार्यालयों का उद्घाटन अलग से होने लगा है) और फिर साल बदलते-बदलते सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मूड बनने लगता है. अपनी पैंतीस से भी ज़्यादा  सालों की नौकरी के दौरान मुझे सांस्कृतिक कार्यक्रमों  के अनगिनत रोचक और मज़ेदार अनुभव हुए हैं. आज उन्हीं  में  से कुछ आपसे साझा कर रहा हूं.

जिस  ज़माने की मैं बात कर रहा हूं उस ज़माने में मेरे उस कॉलेज में विद्यार्थियों को नाटक करने का बड़ा शौक था. एक पूरी सांझ नाट्य संध्या के नाम से आयोजित की जाती थी और कम से कम दस-बारह एकांकी मंचित किए जाते थे. कलाकारों का उत्साह अपनी जगह और दर्शकों की हिम्मत अपनी जगह. दोनों में जैसे रस्साकसी चलती थी. उस रात नाट्य संध्या का संयोजन मैं कर रहा था. तेज़ सर्दी थी. कोई छठा या सातवां नाटक ख़त्म हुआ था, मैंने अगले नाटक की उद्घोषणा की और नेपथ्य में अपनी कुर्सी पर आ बैठा. कोई चार-पांच मिनिट हुए होंगे कि उस नाटक के कलाकार भी स्टेज छोड़ वहीं आने लगे. मुझे ताज्ज्जुब हुआ. पूछा क्या हुआ? तो बजाय कुछ बोलने के उन्होंने मुझे मंच की तरफ जाने का इशारा कर दिया.  जाकर  देखा तो ऐसी तनहाई का जवाब नहींवाला आलम था. पूरा पाण्डाल खाली पड़ा था. बेचारे किसके लिए नाटक करते?

थोड़ा और पीछे की तरफ लौटता हूं तो याद आता है कि उस छोटे कस्बे में सहशिक्षा का कॉलेज होने के बावज़ूद लड़कियां मंच पर आने में झिझकती थीं. लड़कियों की भूमिकाएं लड़कों को ही निबाहनी पड़ती थीं. हम लोग एक साहित्यिक नाटक कर रहे थे और सभी चाहते थे कि उसमें नायिका का रोल कोई लड़की ही करे. कई छात्राओं से बात की लेकिन सभी ने अपने मां-बाप की मनाही की दुहाई देते हुए मना कर दिया. अंतत: एक साथी प्राध्यापिका ने मां बाप को मनाने की ठानी और वे बड़े उत्साह के साथ एक लड़की के घर जा पहुंची. अभिभावकों ने भी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया, चाय-पानी करवाया. लेकिन जैसे ही उन्होंने यह अनुरोध किया कि वे अपनी बेटी को नाटक में अभिनय करने की अनुमति दें, मां-बाप के तेवर एकदम से बदल गए. दोनों एक स्वर में बोले: “देखो मैडम जी, नौकरी आप करती हो. आपको जो करना है कर लो. हमारी बेटी तो स्टेज पर न आज जाएगी और न कल!” कहना गैर ज़रूरी है कि उस साल वो  नाटक नहीं हुआ.

एक साल तो और भी मज़ेदार वाकया हुआ. मैं नृत्य प्रतियोगिता का प्रभारी था. प्रभारी के नाते मेरी सबसे बड़ी फिक्र यह थी कि कोई अशालीन प्रस्तुति न हो जाए. एक शाम मैं नृत्य प्रस्तुतियों की स्क्रीनिंग कर रहा था. उन दिनों कैसेट पर संगीत बजाकर नृत्य किए जाते थे. ज़्यादातर विद्यार्थी फिल्मी और राजस्थानी गाने बजाकर उनपर नृत्य करने के इच्छुक थे. तभी एक सीनियर छात्र काफी बड़ा कैसेट प्लेयर लेकर आया. मैंने उससे पूछा कि वो किस गाने पर नृत्य करेगा, तो उसने कुछ लापरवाही के भाव से कहा, सर! मैं इंगलिश गाने पर डांस करूंगा.  मैंने उससे गाने का नाम जानना चाहा तो उसने फिर वही जवाब दुहरा दिया. शायद  उसे लगा होगा कि ये हिंदी के प्रोफेसर साहब भला अंग्रेज़ी गाने की अदरक का स्वाद क्या जानते होंगे! ख़ैर! उसने अपना कैसेट प्लेयर सेट किया, अपना हुलिया दुरुस्त किया और अपने एक साथी को इशारा किया तो उसने प्लेयर का प्ले बटन दबा दिया और इसने थिरकना-मटकना शुरु कर दिया. तीन-चार सैकण्ड बीते होंगे कि मुझे समझ में आ गया कि जिस इंगलिशगाने पर वो डांस  करना चाहता है वो फ्रेंच संगीतकार शेरोने का उन दिनों कुख्यात नम्बर लव इन सी-माइनर था  जिसमें  शारीरिक सम्बंधों के  संकेत देने वाले ड्रम और  कामोत्तेजक ध्वनियां थीं. ज़ाहिर है कि मैं उस नम्बर से भली  भांति परिचित था (अखिर हम भी तो जवान थे) और उस पर डांस करने की अनुमति देने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था. मैंने फौरन संगीत बंद करने का इशारा किया, और कहा कि वह अपने डांस के लिए कोई और गाना चुन ले. वह विद्यार्थी बार-बार कह रहा था कि सर यह अंग्रेज़ी गाना है, और मैं इसी पर डांस करना चाहता हूं,  और मैं था कि बार-बार उससे कह रहा  था कि वो कोई और गाना चुने. उसे लग रहा था कि मुझे अंग्रेज़ी गाना समझ में नहीं आ रहा है जबकि  मुझे वो नम्बर  कुछ ज़्यादा ही समझ में आ रहा था. चचा ग़ालिब ने शायद  ऐसी ही किसी स्थिति में कहा  होगा: 
यारब न  वो समझे  हैं  न समझेंगे  मेरी बात
दे और दिल उनको जो न दें मुझको ज़ुबाँ और.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत 11 फरवरी, 2014 को जब हिंदी के प्राध्यापक ने जाना अंग्रेज़ी गाना शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी का मूल आलेख. 

Wednesday, February 5, 2014

जब ज्योतिष में मेरे अविश्वास को चुनौती मिली

आप इसे मात्र एक तथ्य कथन के  रूप में लें  कि ज्योतिष  में मेरा तनिक भी विश्वास  नहीं है. कृपया इसे इस शास्त्र अथवा विज्ञान अथवा विद्या – यह जो भी हो, पर मेरी किसी टिप्पणी के रूप में न पढ़ें. हर इंसान की कुछ कमज़ोरियां और कुछ ज़िदें होती हैं, तो मेरी भी है, बस! मां-बाप ने मेरी जन्म पत्री बनवा दी, तो बनी हुई रखी है. मेरे परिवार वालों ने मेरे बच्चों की जन्म पत्रियां बनवा दीं, वो हमने अपने बच्चों को दे दीं. यदा-कदा बच्चे चाहते हैं तो उनकी इच्छानुसार उनकी जन्म पत्रियां दिखाकर जो बताया जाता है वो उन तक पहुंचा भी देते हैं. यानि ज्योतिष  को लेकर किसी तरह की नकारात्मक कट्टरता का भाव भी मन में नहीं है.  लेकिन जैसा मैंने कहा, मैंने कभी किसी ज्योतिषी को अपना हाथ नहीं दिखाया, और न कभी किसी पण्डित से अपना भविष्य पूछा.

बहुत मज़े की बात यह कि यह सब मैं इसलिए लिख रहा हूं कि जीवन में कम से कम एक अनुभव मुझे ऐसा हुआ जिसने मेरे इस अविश्वास को हिला डाला. 

बात करीब ढाई दशक पुरानी है. मेरा  ट्रांसफर एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में हो गया था और मैं उसे निरस्त कराने के लिए बार-बार राजधानी के चक्कर लगा रहा था. ऐसे ही एक चक्कर के दौरान तीन-चार दिन जयपुर में टिकना पड़ा. तब संयोग से मेरे साथ मेरे ही  कॉलेज के भौतिक शास्त्र के एक प्रोफेसर मित्र भी समान कष्ट के निवारण के लिए ठहरे हुए थे. ज्योतिष में उनकी बहुत अच्छी गति थी. अगर कोई पूछता तो वे  तर्क संगत व वैज्ञानिक तरह से गणना आदि करके भविष्य बता दिया करते थे. परेशानी के उस आलम में मैं भी उनसे पूछ बैठा कि मेरा ट्रांसफर कब तक निरस्त हो जाएगा! उन्होंने बाकायदा लम्बी चौड़ी गणना करके मुझे एक तारीख बताई, कि इस तारीख को, मान लीजिए बारह तारीख को,  मेरा काम हो जाएगा.

घटनाक्रम कुछ इस तरह चला कि दस तारीख को, यानि उनकी बताई तिथि से दो दिन  पहले मुझे मेरा इच्छित आदेश मिल गया. अपना मनचाहा हो जाने की खुशी के साथ-साथ मेरे मन में एक दुष्टतापूर्ण  खुशी यह भी थी कि ज्योतिष ग़लत साबित हो गया. मैं बड़ी खुशी-खुशी वो आदेश लेकर जब उस कॉलेज में पहुंचा जहां से रिलीव होकर मुझे फिर से अपने पसन्दीदा कॉलेज में पद भार ग्रहण करना था तो वहां के प्राचार्य ने उस आदेश को पढ़कर कहा कि उस आदेश के आधार पर तो वे मुझे रिलीव नहीं कर सकते. मैंने भी आदेश को ध्यान  से पढा  तो पाया कि एक  क्लर्कीय ग़लती की वजह से उसमें कॉलेजों के नाम में उलटफेर हो गई है और जहां से मुझे रिलीव होना है उस  कॉलेज की बजाय जहां मुझे ज्वाइन करना है उस कॉलेज का नाम लिख दिया गया है. मैंने प्राचार्य जी को समझाने की बहुत  कोशिश की कि यह महज़ एक क्लैरिकल मिस्टेक है, और इस आदेश का  कोई अन्य अर्थ निकल ही नहीं सकता है,  लेकिन वे मेरी बात से सहमत होकर भी उस आदेश को स्वीकार करने का ख़तरा  उठाने को  तैयार नहीं हुए. अब मेरे पास इस बात के सिवा कोई चारा नहीं था कि मैं उस आदेश को लेकर फिर से पाँच  सौ किलोमीटर दूर राजधानी जाऊं और आदेश को संशोधित करवा कर लाऊं. तब तक इण्टरनेट आदि हमारी ज़िन्दगी में नहीं आए थे, और आज जब आ गए हैं तब भी सरकारी काम तो अपनी ही तरह से होते हैं.

रात भर की यात्रा कर जयपुर आया, सम्बद्ध अधिकारी के सम्मुख उपस्थित हुआ, उनसे अपनी पीड़ा बयान की, उस आदेश में संशोधन करवाया, उसे लेकर फिर पाँच  सौ किलोमीटर की यात्रा कर अपने अनचाहे कार्यस्थल पर पहुंचा, प्राचार्य जी के समक्ष वो नया आदेश पेश किया, उसके आधार पर वहां से अपने इच्छित कॉलेज में ज्वाइन करने के लिए रिलीव हुआ और वहां से रिलीव होते ही अस्सी किलोमेटर की यात्रा कर अपने इच्छित कॉलेज में पहुंचकर फिर से ज्वाइन किया. कहना अनावश्यक है कि यह काम उसी बारह तारीख को हुआ जिसकी भविष्यवाणी मेरे उक्त प्रोफेसर मित्र ने की थी.

अगर इस एक घटना को प्रमाण माना जा सके तो मैं मानने को विवश हो गया कि ज्योतिष एक विश्वसनीय शास्त्र है, बशर्ते कोई उसको बरतने की योग्यता रखता हो. क्योंकि इस घटना के बाद मेरे जीवन में ऐसा कोई मौका नहीं आया जब मुझे  किसी भविष्यवक्ता की शरण में जाना पड़ा हो, इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि  मेरा उक्त अनुभव संयोग था या कुछ और!      

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जयपुर से प्रकाशित लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अन्तर्गत दिनांक 4 फरवरी, 2014 को 'क्लर्क की भूल ने करा दिया ज्योतिष पर यकीन' शीर्षक से प्रकाशित मेरे आलेख का मूल पाठ.  

Friday, January 31, 2014

विज्ञापन की हद्द!

हमारा देश विविधता  में एकता का ही नहीं एकता में विविधता का भी देश है.  अगर आपको एकाधिक गांवों-कस्बों-शहरों में रहने का मौका मिला हो तो आपने देखा होगा कि एक-से लगने वाले रीति-रिवाज़ों के पालन और निर्वहन में भी कुछ न कुछ स्थानीय विविधता ज़रूर होती है. आपने देखा होगा कि मकर संक्रांति अलग-अलग शहरों में अलग–अलग तरह से मनाई जाती है, तो दशहरे के मौके पर अहमदाबाद में फाफड़ा जलेबी खाने की अलग ही परम्परा है. यह विविधता उत्सवों में ही नहीं शोक में भी देखने को मिलती है. उदयपुर में मैंने पाया कि ‘उठावना’ (यानि तीये की बैठक) के बाद एकत्रित सभी लोग निकटवर्ती किसी मंदिर में जाते हैं, जबकि जयपुर में इस बैठक का स्वरूप थोड़ा अलग होता  है. न केवल बैठक का स्वरूप अलग होता है, अलग-अलग रुचि के लोग उसमें भी और थोड़े बहुत बदलाव कर लेते हैं.

मसलन, कुछ समय पहले तक आम रिवाज़ यह था कि पण्डित जी गरुड़ पुराण के एक अंश  का वाचन किया करते थे. धीरे-धीरे जब कुछ लोगों  को यह अरुचिकर लगने लगा तो उन्होंने इसकी बजाय पण्डितजी के श्रीमुख से उपदेशात्मक या वैराग्य मूलक प्रवचन कराने शुरु कर दिए. कुछ और लोगों ने अपनी रुचि के अनुसार प्रवचन की जगह संगीत को दे दी, और यथा सामर्थ्य एकल गायक  या पूरी टीम को वाद्यों के साथ भजन गायन के लिए बुलाया जाने लगा. इनमें भी लोगों ने अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भजन करवाने के प्रबन्ध  किए. कुछ ने सगुण  भजन चुने तो कुछ ने निर्गुण. हमारे एक सुरुचि सम्पन्न साहित्यकार मित्र के निधन पर आयोजित बैठक में कुमार गन्धर्व के निर्गुण भजन बजाए गए. 
   
जयपुर में तीये की बैठक में सबसे ख़ास बात मैंने समय की पाबन्दी की पाई. आम तौर पर एक घण्टे  की बैठक ठीक समय पर (मौसम के अनुसार) शाम चार या पाँच बजे शुरु होती है और ठीक एक घण्टा पूरा होते-होते उसके समापन की कार्यवाही शुरु हो जाती है. अगर न हो तो कोई न कोई समझदार बन्दा  ‘पण्डितजी, तुलसी पत्र वितरित करवाइये’ जैसा कोई वाक्य बोल कर पण्डितजी को चेता भी देता है. बहुत नज़दीक के लोग ही ठीक समय पर आते हैं और पूरे समय रहते हैं, जबकि अधिकांश लोग लगभग आधा घण्टा बीतने के बाद आते हैं और बार-बार घड़ी देख कर बैठक के विसर्जन का इंतज़ार करते रहते हैं.

सभा के अंत में पण्डितजी यह निर्देश देते हैं कि “अब दिवंगत की छवि पर पुष्प  अर्पित किए जाएंगे,  पहले घर के लोग और फिर अन्य लोग यह काम करें!”  उदयपुर में मैंने देखा कि व्यवसाय कुशल फोटोग्राफर अख़बार में शोक सन्देश देखकर फोटो तैयार कर यथासमय शोक वाले घर पहुंच जाते हैं और उस फोटो की अच्छी खासी राशि वसूल कर लेते हैं. उस शोक की घड़ी में भला मोल-भाव कौन कर सकता है? लेकिन जयपुर की एक तीये की बैठक का अनुभव मुझे भुलाये नहीं भूलता है. वही आज साझा कर रहा हूं.

पण्डितजी के प्रवचन और तुलसी पत्र के वितरण  के बाद जब स्वर्गीय की छवि पर पुष्पांजलि अर्पित करने की बारी आई तो लोग पण्डितजी के सामने से होकर दिवंगत को पुष्प अर्पित करने के लिए पंक्तिबद्ध होकर बढ़ रहे थे. अपने हारमोनियम के साथ बिराजे पण्डित जी उनमें से हरेक के हाथ में कुछ प्रदान करते जा रहे थे. यह तो नई बात थी. मैं जानने को व्याकुल हो उठा कि पण्डितजी क्या प्रदान  कर रहे हैं? जब मेरी बारी आई तो मैंने भी अपने आगे वालों के बर्ताव का अनुकरण करते हुए पण्डितजी के आगे अपना हाथ बढ़ा दिया! पण्डितजी ने एक सुमुद्रित कार्ड मेरे भी हाथ में थमा दिया. दिवंगत की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करने के बाद मैंने उस कार्ड को ठीक से पढ़ा तो  समझ में आया कि वह पण्डितजी का बिज़नेस  कार्ड था, जिसका आशय था कि जब भी  आपको इस तरह की ज़रूरत पड़े, मैं सेवा के लिए सहर्ष प्रस्तुत हूं! अब अगर इस संदेश का अनुवाद करूं तो अर्थ यह होगा कि आपके घर-परिवार में मृत्य होने पर मैं अपनी सेवाएं देने को हाज़िर हूं! पता नहीं, यह अनुवाद पढ़कर  आपको कैसा लग रहा है, मुझे तो क़तई अच्छा नहीं लगा. व्यापार और विज्ञापन की भी कोई तो हद्द होती है! आप कैसे किसी को यह कह सकते हैं कि अपने अमंगल में मुझे याद कीजिए! मुझे नहीं मालूम कि पण्डितजी ने अपना कार्ड छपवाते और उसे बांटते हुए यह सब सोचा होगा या नहीं! शायद  नहीं ही सोचा होगा. अगर सोचा होता तो वे इस तरह अपना विज्ञापन नहीं करते!

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लोकप्रिय दैनिक समाचार पत्र न्यूज़ टुडै में प्रकाशित मेरे साप्ताहिक कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत 28 जनवरी, 2014 को 'तीये की बैठक में भी प्रचार कर रहे थे पण्डितजी' शीर्षक से प्रकाशित लेख का मूल! 

Tuesday, January 21, 2014

जब पूरा आलेख ही बांच दिया गया.....

एक ज़माना था जब तमाम नेता, छोटे हों या बड़े, कुछ नितान्त  औपचारिक अवसरों को छोड़कर, मौलिक भाषण दिया  करते थे. वे भाषण  न केवल उनके व्यक्तित्व और उनके सोच के परिचायक होते थे, उनसे लोग प्रेरणा भी लेते थे और यथासमय  उन्हें उद्धृत भी करते थे. महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरु, राममनोहर लोहिया, जे. बी कृपलानी उन नेताओं में से हैं जिनके भाषण बहुत ग़ौर से सुने जाते थे. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता स्थितियां बदलीं और हम लोग इस बात के गवाह हैं कि हमारे माननीय नेताओं ने अब यह यह काम आउटसोर्स कर दिया है. अब स्थिति यह है लगभग सारे के सारे भाषण औरों के द्वारा तैयार किये हुए होते  हैं और भाषण देने वालों की स्थिति प्लेबैक सिंगर्स जैसी होकर रह गई है. अब भाषण देने वाले का मूल्यांकन भी भाषण में निहित  विचारों के आधार पर कम, उसकी भाषण देने की कला के आधार पर अधिक होने लगा है. तब और अब के इस अंतर को देखता हूं तो बरबस अपने साथ घटी एक घटना याद आ जाती है. घटना का ताल्लुक संक्रमण काल से है, यानि जब मौलिक भाषण भी दिए जाते थे और (औरों के द्वारा) लिखित भाषण  भी पढ़े जाते थे.

राजस्थान साहित्य अकादमी का कोई साहित्यिक आयोजन था जो माउण्ट आबू के राजभवन  में हो रहा था. महामहिम उसका उद्घाटन भाषण पढ़ रहे थे. यह सर्व विदित है कि राज्यपाल ऐसे मौकों पर लिखित भाषण ही पढ़ते हैं. लेकिन उनका वो भाषण कुछ ज़्यादा ही लम्बा था.  ख़त्म ही नहीं हो रहा था. श्रोताओं की असहजता बढ़ती जा रही थी. अगर कोई और जगह होती  या  बात सामान्य साहित्यिक गोष्ठी की होती तो लोग अनेक प्रकार से अपनी ऊब व्यक्त कर सकते थे. और कुछ नहीं तो उठकर बाहर तो जा ही सकते थे. लेकिन यह राजभवन का मामला था. प्रोटोकोल का अनकहा दबाव सब पर था.

मेरे पास ही बैठे थे हिन्दी के एक बड़े आलोचक, और उससे भी पहले मेरे गुरु. उन्होंने मुझसे कान में पूछा – “यह कचरा इन्हें दिया किसने?” मैंने बहुत शालीनता से उनके कान में जवाब दिया- “आप ही के इस शिष्य ने!” कहना अनावश्यक है कि अगर राजभवन की शालीनता की चादर हमारे ऊपर न फैली होती तो हम दोनों ने एक छत-फाड़ू ठहाका ज़रूर लगाया होता!
अब ज़रा बात साफ़ कर दूं.

वे राजस्थान में साहित्यिक सक्रियता के उजले दिन थे. राजस्थान साहित्य अकादमी का स्वर्ण काल. पूरे प्रांत में, हर छोटे-बड़े कस्बे में साहित्यिक आयोजनों की धूम मची हुई थी. कहीं आंचलिक  साहित्यकार सम्मेलन हो रहे थे, तो कहीं सृजन साक्षात्कार. कहीं पाठक मंच की गोष्ठी हो रही थी तो कहीं  कोई उपनिषद.  इसी  क्रम में राजस्थान के इकलौते हिल स्टेशन  माउण्ट आबू पर  भी एक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था. राजस्थान के राज्यपाल के ग्रीष्मकालीन आबू प्रवास का लाभ उठाते हुए उन्हें इस आयोजन का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया और उन्होंने भी सहर्ष अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी. उद्घाटन सत्र राजभवन के सभा कक्ष में ही रखा गया.

मैं उन दिनों राजकीय महाविद्यालय सिरोही में हिंदी पढ़ाता था. यहीं यह याद दिलाता चलूं कि माउण्ट आबू सिरोही जिले में ही स्थित है.  शायद ऐसी कोई प्रक्रिया होती होगी, तभी सिरोही के कलक्टर महोदय के यहां से मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य जी के पास इस आशय का अनुरोध आया कि वे महामहिम के भाषण के लिए अमुक विषय पर कुछ नोट्स उपलब्ध कराएं. जैसी सरकारी रिवायत है, प्राचार्य जी ने वह अनुरोध मुझ तक सरका दिया. और मैंने भी तुरंत कोई चालीस-पचास पन्नों की सामग्री उनके माध्यम से कलक्टर महोदय के पास भिजवा दी. इस सामग्री में राजस्थान के हिन्दी साहित्य पर लिखा मेरा अन्यत्र प्रकाशित तीसेक पन्नों का एक सर्वेक्षणपरक  आलेख  भी था. इस सूचनाप्रद आलेख  में नामोल्लेख अधिक था. मेरा  खयाल था कि महामहिम के लिए भाषण तैयार करने वाले इस सामग्री में से अपने काम की चीज़ें निकाल  लेंगे और कुछ अपनी तरफ से जोड़कर उनके लिए एक अवसरोचित भाषण तैयार कर देंगे. आखिर उन्होंने नोट्स ही तो मांगे थे. अब मैं तो इसे राजभवन के सम्बद्ध अधिकारी की ज़र्रानवाज़ी ही कहूंगा कि उन्हें मेरा वह सर्वेक्षणपरक लेख इतना भाया कि उसे ज्यों का त्यों महामहिम से पढ़वा लेने के लिए प्रस्तुत कर दिया. हां, मेरे गुरुजी को ज़रूर वो कचरा लगा. और उन्होंने वैसा ही कह दिया. अगर उन्हें भी यह  पता होता कि उसका मूल लेखक कौन है तो वे भी शायद ऐसा न कहते. बहरहाल! तब जो  बात अपवाद थी, अब आम हो चुकी है.

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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक 'न्यूज़ टुडै' में मेरे साप्ताहिक  कॉलम 'कुछ इधर कुछ उधर' के अंतर्गत दिनांक 21 जनवरी, 2014 को 'महामहिम से बंचवा दिया पुराना आलेख' शीर्षक से प्रकाशित संस्मरण का मूल आलेख!   

Tuesday, January 7, 2014

बेवजह तारीफ़ कौन करता है?

दिल्ली में भी नई सरकार बन गई. राजस्थान में बन ही चुकी है. केन्द्र में भी बन जाएगी. जैसे ही कोई नई सल्तनत गद्दीनशीन  होती है, उसे मुबारक़बाद  देने वालों और उसकी शान में कसीदे पढ़ने वालों  की कतार  लग जाती है. यह स्वाभाविक भी है और एक हद तक उचित भी. आखिर किसी भी नए की सफलता की कामना की ही जानी चाहिए. लेकिन जो लोग कतारबद्ध   होकर मुबारक़बाद  पेश करते और गुणगान करते हैं, क्या वे वाकई  अपनी शुभकामना ही दे रहे होते हैं, या उनका कोई हिडन एजेण्डा भी होता है?

मुझे बरसों पहले अपने एक पुराने विद्यार्थी से हुए संवाद की याद आ  रही है. छात्र जीवन से ही साहित्य में उसकी रुचि थी. आहिस्ता-आहिस्ता स्थानीय अखबारों में और फिर छोटी-मोटी पत्रिकाओं में उसकी कविताएं नज़र आने लगी थीं. अब तो खैर उसका शुमार प्रांत के वरिष्ठ कवियों में होता है.

बात उस समय की है जब राजस्थान  साहित्य अकादमी ने अपनी मुख पत्रिका के लिए हर छह महीने में सम्पादक बदलने की एक विलक्षण योजना चलाई थी. मैंने लक्ष्य किया कि जैसे ही किसी नए सम्पादक के सम्पादन वाला पहला अंक आता, उससे अगले ही अंक में उस पर अनिवार्यत: एक प्रतिक्रिया मेरे इस सुयोग्य पूर्व शिष्य की भी ज़रूर छपती. प्रतिक्रिया यही होती कि आपने आते ही इस पत्रिका का कायाकल्प  कर दिया है. प्रतिक्रिया की ध्वनि यह होती कि इससे पहले जो पत्रिका रसातल तक जा पहुंची थी, आपने अपने सम्पादन के पहले ही अंक में उसे आसमान पर ले जाकर टाँग  दिया है. मज़े की बात यह कि हर संपादक खुशी-खुशी इस तरह के पत्र को प्रकाशित भी कर देता. 

लगातार तीन अंकों में एक-सी प्रतिक्रिया देखकर मैं थोड़ा आश्चर्यचकित था. और संयोग यह हुआ कि उन्हीं दिनों उस पूर्व शिष्य और तत्कालीन युवा कवि से मिलने का कोई अवसर भी आ गया. मैंने कुछ विनोद भाव से उसकी एक-सी प्रतिक्रिया के बारे में पूछ लिया. उसने बेहद ईमानदारी और सहज भाव से जो बताया, उसका सार यह है कि गुरुजी, मैं तो हर सम्पादक को यह लिखता हूं कि आप महान हैं, और आपने इस पत्रिका को अभूतपूर्व  ऊंचाइयों तक पहुंचाया है.  और यह लिखने के साथ ही यह भी लिख देता हूं कि मेरी कुछ कविताएं प्रकाशनार्थ संलग्न है. आम तौर पर तो सम्पादक जी मेरी उन कविताओं को तुरंत प्रकाशित कर देते हैं.... 

यहीं मैंने उसे टोका और पूछा  कि अगर कोई सम्पादक तुम्हारा पत्र तो प्रकाशित कर दे, कविताएं न करे  तो?  

उसने बहुत ईमानदारी से कहा, हां, कभी-कभी ऐसा भी होता है. तब  मैं प्रशंसा का ऐसा ही एक पत्र और लिखता  हूं. प्रशंसा की मात्रा थोड़ी और बढ़ा देता हूं, और लगे हाथों पिछले सम्पादक की थोड़ी आलोचना भी कर देता हूं. मेरा यह फॉर्मूला काम कर जाता है. कविताएं छप जाती हैं. 

अब उसकी बातों में मुझे मज़ा आने लगा था. मैंने पूछा, “कोई सम्पादक बहुत ही ढीठ हो और प्रशंसा  की हेवी डोज़ का भी उसपर कोई असर न हो तो फिर क्या करते हो?”  

मुझे यह जानकर बड़ा गर्व हुआ  कि मेरा वह शिष्य अब अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने की कला में पारंगत  हो चुका था. उसने कहा, गुरुजी, मेरे पास इसका भी इलाज है. मैंने पूछा, वह क्या है? तो उसने बताया, “फिर मैं सम्पादक को एक पत्र और लिखता हूं. और उसमें लिखता हूं कि जब से आपने इस पत्रिका का सम्पादन दायित्व  सम्हाला है, इसका स्तर निरंतर नीचे गिरता जा रहा है. अगर आपने जल्दी ही कुछ कदम नहीं उठाए तो यह पत्रिका एकदम कूड़ा हो जाएगी, और कबाड़ी भी इसे लेने से मना कर देंगे. आपकी इस पत्रिका से मेरा पुराना रिश्ता रहा है इसलिए मैं इसके स्तर को लेकर बहुत चिंतित हूं. पत्रिका के गिरते स्तर को सम्हालने के लिए अपनी कुछ कविताएं आपकी भेज रहा हूं..... और मेरा यह नुस्खा अब तक तो नाकामयाब  नहीं रहा है.”  

मैं उसकी सूझ-बूझ का कायल हो चुका था. कविताएं वो भले ही कैसी भी लिखता हो, यह समझ उसमें पर्याप्त थी कि उन्हें छपवाया कैसे जाए!

आज जब नई बनी सरकारों के अपना  काम शुरु करने से पहले ही उनका प्रशस्तिगान करने वालों की आवाज़ें सुनता हूं तो मुझे अपने उस विद्यार्थी की याद आ जाती है.  हो सकता है  कि इन प्रशस्तिगायकों में से बहुत सारे ऐसे हों जिन्हें किसी सरकार से कोई स्वार्थ न साधना  हो और  महज़ सद्भावना के वशीभूत हो ही वे ऐसा कर रहे हों;  लेकिन यह भी बहुत पक्की बात है कि अधिकांश  कीर्तनकार मेरे उस विद्यार्थी की सोच से सहमति रखने वाले ही होंगे.


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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 07  जनवरी 2014 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.  

Tuesday, December 24, 2013

जब एक विद्यार्थी ने पूरे कॉलेज को मामू बना डाला

प्रदेश में नई सरकार बन गई है और उसने जोर-शोर से काम शुरु कर दिया है. आम तौर पर सरकारें या तो शुरु में सक्रिय होती हैं या उस वक़्त जब उनके अस्तित्व पर कोई संकट आता है,  वरना तो वे सरक-सरक कर ही चलती हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि राजस्थान की नई सरकार इस धारणा को मिथ्या साबित करेगी और जन आकांक्षाओं पर खरी उतरेगी.  बहरहाल, मुझे आज याद आ रहा है 1975 का इमर्जेंसी का वो दौर जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए तमाम प्रजातांत्रिक नागरिक अधिकारों को  स्थगित कर दिया.  

उन दिनों प्रधानमंत्री का  बीस सूत्री कार्यक्रम बहुत उत्साह से प्रचारित किया जा रहा था. जनता को बताया जा रहा  था कि यह कार्यक्रम उसकी हालत बदल देगा. सरकारी संस्थाओं पर यह अनकहा दबाव था कि वे जी-जान से इसके प्रचार-प्रसार में जुट जाएं. कुछ दबाव और इससे भी अधिक सरकारी अमले की वफ़ादारी. हर तरफ बीस-बीस का ही शोर था.  मैं उन दिनों राज्य के एक छोटे कस्बे के एक महाविद्यालय में हिन्दी पढ़ाया करता था. मेरे महाविद्यालय के प्राचार्य जी को भी अपनी वफ़ादारी  दिखाने का जोश चढ़ा  और उन्होंने आनन-फानन में बीस सूत्री कार्यक्रम से होने वाले फायदों पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन  करने की घोषणा कर डाली. उस छोटे कस्बे के छोटे महाविद्यालय में कोई सभा भवन तो था नहीं. एक बड़े कमरे में वह गोष्ठी आयोजित की गई. हर संस्थान में, और ख़ास तौर पर शिक्षण संस्थानों  में ऐसे कुछ लोग अवश्य ही होते हैं जो किसी भी विषय पर अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत करने को सदा सुलभ रहते हैं. हक़ीक़त तो यह है कि ऐसे वीर पुरुषों के दम पर ही इस किस्म के  आयोजन सम्पन्न किए जाते हैं. संस्था प्रधान भी यही चाहता है कि कुछ लोग प्रस्ताव के पक्ष में कुछ सुन्दर-सुन्दर विचार व्यक्त कर दें और सुख शांति पूर्वक रस्म अदायगी हो जाए!  और यही उस गोष्ठी में भी हुआ. विद्वान प्राध्यापकों ने बताया कि बीस सूत्री कार्यक्रम के आते ही देश की तक़दीर बदलने की शुरुआत हो चुकी है और बस कुछ ही समय में सब कुछ फर्स्ट क्लास हो जाने वाला है. ‘मौका भी है, दस्तूर भी’ का निर्वहन करते हुए एक से बढ़कर एक अच्छी-अच्छी  बातें की गईं.

गोष्ठी समापन की तरफ़ बढ़ रही थी, तभी एक विद्यार्थी ने संयोजक से अनुरोध किया कि वह भी अपने विचार व्यक्त करना चाहता है. छोटा महाविद्यालय था, सभी सबको जानते थे. किसी तरह के ख़तरे की कोई आशंका नहीं थी. वो विद्यार्थी वैसे भी अच्छा वक्ता और लोकप्रिय डिबेटर था. अत:  संयोजक ने सहर्ष उसे बोलने की अनुमति दे दी. उस विद्यार्थी ने अन्य बातों के अलावा यह भी कहा कि प्रधानमंत्री जी ने बीती रात अपने बीस सूत्री कार्यक्रम में पाँच  सूत्र और जोड़े हैं और अब यह पच्चीस सूत्री कार्यक्रम हो गया है. उसने यह बात इतने आत्मविश्वास से कही कि बाद वाले किसी भी वक्ता ने न केवल उसकी  बात का खण्डन नहीं किया, पच्चीस सूत्री कार्यक्रम की ही आरती गाई. बाद में तो संयोजक ने भी उस गोष्ठी को प्रधानमंत्री के पच्चीस सूत्री कार्यक्रम के नाम कर दिया और प्राचार्य जी ने भी पच्चीस सूत्री कार्यक्रम की शान में ही कसीदे पढ़े.  आज की बात होती तो जब वह विद्यार्थी बोल रहा था तभी किसी ने अपने मोबाइल पर गूगल करके उसके कथन की सत्यता को जांच भी लिया होता. लेकिन याद रखें, वो ज़माना, इण्टरनेट का तो दूर,  टीवी का भी नहीं था. ख़बरों का एक मात्र माध्यम था सरकारी रेडियो या फिर 24 घण्टों में एक बार आने वाला अख़बार. यानि विद्यार्थी के कथन को तत्काल जांचने का कोई तरीका उपलब्ध ही नहीं था.  

गोष्ठी बहुत बढ़िया तरह से सम्पन्न हो गई. लेकिन कुछेक लोगों के मन में यह बात ज़रूर खटकती रही कि प्रधानमंत्री जी ने अपने बीस सूत्री कार्यक्रम को बढ़ाकर पच्चीस सूत्री कर दिया, और उन्हें ख़बर तक नहीं हुई! ऐसा कैसे हो गया? घर जाकर रेडियो सुना, तो पाया कि वहां तो बीस सूत्री कार्यक्रम का ही कीर्तन जारी था. किसी भी बुलेटिन में पच्चीस सूत्र नहीं थे. अगले दिन स्टाफ रूम में यही चर्चा थी. हरेक यही ताज्जुब कर रहा था कि जिन पच्चीस सूत्रों की बात उस विद्यार्थी ने कल की थी, वे तो कहीं थे ही नहीं.

ज़ाहिर है कि उस विद्यार्थी ने हम सबको मामू बना दिया था. आज भी वो घटना याद आती है तो उस विद्यार्थी के आत्मविश्वास भरे कौतुक और हम सबके अपनी जानकारी पर भरोसे की कमी को याद करते हुए एक मुस्कान उभर आती है.
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लोकप्रिय अपराह्न दैनिक न्यूज़ टुडै में मेरे साप्ताहिक कॉलम कुछ इधर कुछ उधर के अंतर्गत दिनांक 24 दिसम्बर 2013 को प्रकाशित आलेख का मूल पाठ.