Thursday, July 10, 2008

मानवीय इतिहास के सबसे खतरनाक क्षण को याद करते हुए


अब तक यह माना जाता रहा है कि 1962 के मिसाइल क्राइसिस के बारे में जितना लिखा जा सकता था, सब लिखा जा चुका है. लेकिन हाल ही में प्रकाशित वाशिंगटन पोस्ट के अनुभवी रिपोर्टर माइकेल डॉब्ब्स की किताब वन मिनट टु मिडनाइट: केनेडी, ख्रुश्चेव, एण्ड कास्त्रो ऑन द ब्रिंक ऑफ न्युक्लियर वार को पढकर लगता है कि काफी कुछ अब तक अनकहा और अनजाना ही था. बेलफास्ट, आयरलैण्ड में जन्मे माइकेल डॉब्ब्स का ज़्यादा समय साम्यवाद के पतन का अध्ययन करने में बीता है और उनकी एक किताब ‘डाउन विद बिग ब्रदर: द फॉल ऑफ सोवियत एम्पायर’ 1997 के पेन अवार्ड्स की अंतिम सूची तक पहुंच चुकी है.

अक्टूबर, 1962 में, जब शीत युद्ध अपने उफान पर था, संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ क्यूबा में मिसाइलों की तैनाती के मुद्दे पर तेज़ी से आणविक संघर्ष की दिशा में बढते प्रतीत हो रहे थे. डॉब्ब्स ने अब तक अछूते अमरीकी, सोवियत और क्यूबाई दस्तावेजों, साक्ष्यों और चित्रों को खंगाल कर क्यूबाई मिसाइल संकट पर अब तक की सर्वाधिक आधिकारिक पुस्तक की रचना की है. कुछ चौंकाने वाले नए प्रसंग उजागर कर डॉब्ब्स यह बताने में पूरी तरह सफल होते हैं कि दुनिया महायुद्ध और महाविनाश के कितना नज़दीक पहुंच गई थी.

इस किताब में पहली बार हमें गुआण्टानामो स्थित अमरीकी नौसैनिक ठिकानों को तबाह कर डालने के ख्रुश्चेव के इरादों का दिल दहला देने वाला वृत्तांत पढने को मिलता है. यह भी पढने को मिलता है कि कैसे गलती से एक अमरीकी जासूसी वायुयान सोवियत संघ के आकाश में उडान भरने लगा था. क्यूबा में सी आई ए एजेण्ट्स की गतिविधियों और एक अमरीकी टी 106 जेट वायुयान की, जिसमें आणविक हथियार भरे थे, क्रैश लैण्डिंग का ब्यौरा भी हमें पढने को मिलता है.

डॉब्ब्स हमें व्हाइट हाउस और क्रेमलिन के भीतर ले जाते हैं और हम यह जान पाते हैं कि किस तरह विचारधारात्मक सन्देहों ने केनेडी और ख्रुश्चेव जैसे विवेकी और बुद्धिमान नेताओं के बीच की दूरियां बढा दीं और कैसे वे युद्ध की आशंका से व्यथित हुए. हम देखते हैं कि ये दोनों नेता आणविक युद्ध की भयावह हक़ीक़तों को पहचानते हैं, लेकिन दूसरी तरफ कास्त्रो हैं जो वैसे तो कभी भी पारम्परिक राजनीतिक सोच के प्रवाह में नहीं बहते, लेकिन एक मसीही सपना पाले रहते हैं कि उन्हें तो इतिहास ने एक खास मिशन के लिए चुना है. जैसे-जैसे नए प्रसंग उजागर होते हैं, डॉब्ब्स हमें क्यूबा की निगरानी कर रहे अमरीकी जहाजों के डैक्स पर ले जाते हैं, मियामी की गलियों की सैर कराते हैं जहां कास्त्रो विरोधी निर्वासित उनके तख्ता पलट की योजना बनाने में जुटे हैं.


डॉब्ब्स बताते हैं कि ख्रुश्चेव कास्त्रो को ‘एक बेटे की तरह’ प्यार करते थे, लेकिन साथ ही उनकी भावनात्मक स्थिरता के बारे में आशंकित भी रहते थे. इसीलिए वे कास्त्रो के हाथों में आणविक हथियार सौंपने को तैयार नहीं थे. और जहां तक कास्त्रो का सवाल है, उनकी पूरी रणनीति ही चुनौती पर आधारित थी. वे अपने शत्रुओं के समक्ष ज़रा भी कमज़ोर नहीं पडना चाहते थे. वे किसी मक़सद के लिए अपने देशवासियों को साथ लेकर मरने को तैयार थे. अगर मौका आता, वे क्यूबा की धरती पर अमरीकी घुसपैठ रोकने के लिए आणविक युद्ध शुरू करने की अनुमति देने में क़तई नहीं हिचकिचाते.

डॉब्ब्स ने यह किताब नई पीढी के पाठकों को 27 अक्टूबर 1962 के उस स्याह शुक्रवार की तथा उसकी पूर्ववर्ती घटनाओं की जानकारी देने के लिए लिखी है, जिसे इतिहासकार आर्थर एम श्लेसिंगर ने मानवीय इतिहास का सबसे खतरनाक क्षण कह कर पुकारा था. किताब अमरीकी, रूसी और क्यूबाई तीनों पक्षों के चरित्रों के मानवीय पक्ष को बखूबी उभारती है. इससे पता चलता है कि असल संकट केनेडी और ख्रुश्चेव के सीधे टकराव का नहीं था. संकट तो पैदा हुआ एक के बाद एक अप्रत्याशित रूप से घटित होने वाली घटनाओं के कारण. और फिर जब एक बार युद्ध के नगाडे बजने ही लग गए तो उन्हें रोकना किसी के भी वश में नहीं रह गया. उस स्याह शुक्रवार को, जब दोनों ही पक्षों को महसूस हुआ कि अब स्थितियों पर उनकी पकड नहीं रह गई है तो बजाय टकराने के, वे एक दूसरे की विपरीत दिशाओं में चले गए. केनेडी पर यह दबाव डाला जा रहा था कि वे प्रक्षेपास्त्रों के ठिकानों पर बमबारी करें और क्यूबा पर हमला कर दें. समझा जा सकता है कि अगर उन्होंने ऐसा कर दिया होता तो तो सोवियत संघ भी अमरीकी आक्रामक ताकतों का सामना अपने आणविक हथियारों से ज़रूर करता. फिर क्या हुआ होता, इसकी कल्पना ही हमें दहशत से भर देती है.

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Discussed book:

One Minute to Midnight: Kennedy, Khrushchev, and Castro on the Brink of Nuclear War

By Michael Dobbs

Published by: Knopf Publishing Group

Hardcover, 448 pages

US $ 28.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अन्तर्गत 10 जुलाई, 2008 को प्रकाशित.





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Tuesday, July 8, 2008

साहित्यिक पुरस्कारों पर विवाद

राजस्थान की साहित्यिक दुनिया में इन दिनों बडा उद्वेलन है. कारण है राजस्थान साहित्य अकादमी के तीन ताज़ा निर्णय. राजस्थान साहित्य अकादमी ने हाल ही में अपने दो पुरस्कार बन्द या समाप्त करने की घोषणा की है. एक है साहित्यिक पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला प्रकाश जैन पुरस्कार, और दूसरा है अंतरप्रांतीय साहित्य बन्धुत्व अनुवाद पुरस्कार. कारण यह बताया गया कि विगत कुछ वर्षों से इन पुरस्कारों के लिए वांछित प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थीं. प्रांत के साहित्यकारों की नाराज़गी इन कारणों से है. एक तो यह कि ‘लहर’ के यशस्वी सम्पादक प्रकाश जैन के नाम पर दिया जा रहा पुरस्कार बन्द कर अकादमी ने अपनी तरह से उनकी स्मृति के साथ अपमानजनक व्यवहार किया है, और दूसरे यह कि साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद की महत्ता को नकारा गया है. और जहां तक अकादमी के इस विचार का प्रश्न है कि इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां प्राप्त नहीं हो रही थी, तो पहले तो यह देखा जाना चाहिए कि क्या राजस्थान में साहित्यिक पत्रकारिता और अनुवाद के क्षेत्र में तालाबन्दी हो गई है? न तो कोई साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और न अनुवाद किये जा रहे हैं? ऐसा नहीं है. तो फिर सवाल यह उठना चाहिए कि क्या कारण है कि लोग इन पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां ही नहीं भेजते? कहीं इस बात का सम्बन्ध अकादमी की प्रतिष्ठा के क्षरण से तो नहीं है? लेकिन इस बात पर भला अकादमी के कर्ता धर्ता तो क्यों विचार करने लगे? लोग लाख कहें कि अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ का स्तर बहुत गिर गया है, इतना कि अब स्तर बचा ही नहीं है, तो भी इस पत्रिका के सम्पादक को क्यों चिंता हो? आखिर आत्ममुग्धता भी कोई चीज़ होती है!
दूसरी बात जिसने लोगों को उद्वेलित किया है वह है जीवित लेखकों द्वारा अपने नाम पर पुरस्कार घोषित करवाना. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल ने अकादमी को कुछ राशि दी और अकादमी ने उनके नाम पर पुरस्कार देने की घोषणा कर दी. साहित्य की दुनिया में अपने नामों पर या अपने निकट के लोगों के नाम पर पुरस्कार का सिलसिला पुराना है, और इसमें कोई बडी आपत्ति भी नज़र नहीं आती. अगर मुझे लगे कि मेरे पास काफी पैसा है और उसका सदुपयोग मैं किसी को पुरस्कृत करके करना चाहता हूं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इस बात से भी कोई फर्क़ नहीं पडता कि यह ‘मैं’ कोई लेखक है या व्यवसायी या राजा या तस्कर. आखिर ऐसे अनेक लोगों के नाम पर शिक्षण संस्थान भी तो हैं! किसी को इनका पुरस्कार ग्रहण करना हो, करे; न करना हो अस्वीकार कर दे. गडबड तब होती है जब निजी और सार्वजनिक का गठबन्धन होता है. भगवान अटलानी और सरला अग्रवाल अपने स्तर पर पुरस्कार देते, किसी को आपत्ति नहीं होती. आपति की बात यह है कि जनता के पैसों से संचालित एक सार्वजनिक संस्थान राजस्थान साहित्य अकादमी ने ये निजी नाम वाले पुरस्कार देने की घोषणा की है. शायद जीवन के अन्य क्षेत्रों में आ रही पी पी पी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) की अवधारणा का यह साहित्य की दुनिया में प्रवेश है. लेकिन, अगर हम इसी तर्क को थोडा आगे तक ले जाएं तो इस व्यवस्था की विसंगति सामने आ जाएगी. मान लीजिए कोई लेखक, या कोई भी अन्य व्यक्ति, जिसके पास बहुत सारा धन है, यह कहे कि मैं पूरी राजस्थान साहित्य अकादमी को ही खरीदना चाहता हूं, या कि अपने नाम पर करवा लेना चाहता हूं तो क्या होगा? कल आप घसीटामल राजस्थान साहित्य अकादमी बना देंगे? हो सकता है कुछ लोगों को इस पर कोई ऐतराज़ न हो, लेकिन अन्य बहुतों को है. जीवन में कुछ चीज़ें तो साफ-सुथरी बची रहें, यह जिनकी आकांक्षा है, उन को ऐतराज़ है.
फिर एक बात और हुई. इसी अकादमी ने दो पुरस्कार और शुरू किए. डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी के नाम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार, और हनुमान प्रसाद पोद्दार के नाम पर राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च अकादमी पुरस्कार. जिन्हें स्मरण न हो उन्हें करा दें कि सिंघवी जी एक सुविख्यात न्यायविद थे और अधिक से अधिक हिन्दी सेवी थे, तथा पोद्दार जी सुपरिचित धार्मिक (साहित्यिक नहीं) पत्रिका ‘कल्याण’ के संस्थापक-संपादक थे. अकादमी प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर देश और दुनिया तक अपने पंख फैला रही है, यह अच्छा है. लेकिन अगर घर की उपेक्षा करके बाहर दिया जलाना चाहती है तो चिंत्य है. एक तरफ तो उसके पास राजस्थान में काम करने केलिए पर्याप्त संसाधन नहीं है, तभी तो लोगों के पैसों से पुरस्कार शुरू करने पड रहे हैं, और दूसरी तरफ वह अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार देना चाह रही है. यह कितना वाज़िब है? और फिर पुरस्कार किनके नाम पर? इनका साहित्यिक अवदान है ही नहीं, या बहुत अल्प है. और याद कीजिए कि जिनका है,(मेरा इशारा प्रकाश जैन की तरफ है) उनके नाम वाले पुरस्कार को साथ-साथ बन्द भी कर रही है.

तो, कोढ में खाज यह कि ये तीनों चीज़ें एक साथ हो गईं. पता नहीं यह आकस्मिक है या सुचिंतित, लेकिन एक तरफ तो प्रकाश जैन का नाम मिटाने की चेष्टा हुई और दूसरी तरफ दो लेखकों को जैसा-तैसा अमरत्व प्रदान करने की कोशिश हुई. और तीसरी तरफ दो साहित्येतर व्यक्तियों के नाम पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार शुरू कर उन्हें साहित्यिक अमरत्व प्रदान करने की चेष्टा की गई. तो इस कॉकटेल ने लोगों को और ज़्यादा परेशान किया है. प्रकाश जैन का साहित्यिक पत्रकारिता में जो अवदान है उसे कोई बे-पढा लिखा ही नकारेगा. उनके नाम से चल रहे पुरस्कार को बन्द करना निश्चय ही उनकी स्मृति का अपमान है. जिन लेखकों के नाम पर पुरस्कार शुरू किए जा रहे हैं, उनके महत्व पर कोई टिप्पणी गैर ज़रूरी है. इसलिए गैर ज़रूरी है ये पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व की वजह से नहीं, उनके धन-बल की वजह से शुरू किए जा रहे हैं, इसलिए टिपणी अनावश्यक होगी. इतना ज़रूर है कि इस सन्दर्भ में स्वयंप्रकाश की एक कहानी ‘चौथमल पुरस्कार’ बेसाख्ता याद आती है. और जहां तक राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की बात है उसमें ये दोनों बातें जुड जाती हैं: जिनके नाम पर पुरस्कार उनके साहित्यिक महत्व पर प्रशन चिह्न और इन पुरस्कारों की ज़रूरत.

राजस्थान साहित्य अकादमी के इन निर्णयों ने एक बार फिर इस संस्थान की रीति-नीति को विमर्श के दायरे में ला खडा किया है. इस संस्थान की और तमाम सार्वजनिक संस्थानों की. जिन्होंने ऐसे निर्णय किए, स्वाभाविक है कि वे इन्हें डिफेण्ड करेंगे, कर रहे हैं. लेकिन बजाय किसी ज़िद के, बेहतर हो, इस तरह के मुद्दों पर खुले मन से विचार हो. आखिर इस तरह के फैसलों के परिणाम दूरगामी हुआ करते हैं. सार्वजनिक और निजी की लक्ष्मण रेखाएं तो तै की ही जानी चाहिए.







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Thursday, July 3, 2008

दूसरों की नज़रों में हम

“इस बात की तो किसी ने ख्वाब में भी कल्पना नहीं की होगी कि तीन हज़ार सालों के जातिगत भेदभाव के बाद तथाकथित पिछडी जाति की एक महिला देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य की मुख्यमंत्री बन जाएगी. लेकिन दो बार ऐसा हो गया. इसी तरह, 2004 में भारत में जो हुआ वह तो मानवता के इतिहास में अभूतपूर्व है. एक अरब से ज़्यादा आबादी वाले इस दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में चुनाव हुआ और एक कैथोलिक राजनीतिक नेता (सोनिया गांधी) ने एक सिख के लिए देश के प्रधानमन्त्री पद का त्याग किया. और बात यहीं खत्म नहीं होती. सिख मनमोहन सिंह को शपथ दिलाई देश के मुस्लिम राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने. यह याद रहे कि देश की 81 प्रतिशत आबादी हिन्दू है.:”

इस और ऐसी ही अनेक टिप्पणियों से भरी रोचक किताब इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स: द राइज़ ऑफ मॉडर्न इण्डिया में ब्रिटिश पत्रकार एडवर्ड लूसे ने तेज़ी से उभर रही आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत भारत की विकास यात्रा की पडताल की है, उसके अवरोधकों को रेखांकित किया है और विकास की गति तेज़ करने के लिए सुझाव दिए हैं. एडवर्ड लूसे 2001 से 2005 तक नई दिल्ली में फाइनेंशियल टाइम्स के दक्षिणी एशिया ब्यूरो चीफ रहे है और आजकल इसी पत्र के वाशिंगटन कमेंटेटर हैं. उनकी पत्नी भारतीय है. इस किताब के लिए लूसे ने महत्वपूर्ण राजनेताओं, धर्म गुरुओं, आर्थिक विश्लेषकों से लगाकर ग्रामीण मज़दूरों तक से बात की और खूब यात्राएं की. यह किताब रिपोर्ताज और विश्लेषण का अनूठा मिश्रण है और भारतीय समाज और व्यवस्था की जटिलताओं को बखूबी उभारती है. लूसे जल्दबाजी और भावुकता में कोई टिप्पणी करने की बजाय आंकडों और तथ्यों से पुष्ट बात कहकर अपनी बात को प्रामाणिकता प्रदान करते हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों, आर्थिक विकास और महाशक्ति बनने के दावों के बरक्स अनेक अध्ययनों ने यह बताया है कि दिया तले अन्धेरा भी घना है. एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हज़ार लोगों के पीछे मात्र चौरासी टेलीविजन सेट्स हैं, जबकि अमरीका में नौ सौ अडतीस हैं. भारत में प्रति हज़ार 7.2 पर्सनल कम्प्यूटर हैं, ऑस्ट्रेलिया में 564.5 हैं. भारत में इण्टरनेट अभी महज़ दो प्रतिशत को सुलभ है, मलेशिया में चौंतीस प्रतिशत को. भारत की श्रम शक्ति का महज़ पांच प्रतिशत ही औपचारिक रूप से नियोजित है, यानि मात्र साढे तीन करोड लोगों को ही रोज़गार सुरक्षा सुलभ है. लगभग इतनी ही आबादी इनकम टैक्स देती है. भारत के तीस करोड लोग अडसठ लाख ऐसे गांवों में निवास करते हैं जहां शुद्ध पेय जल तक ठीक से सुलभ नहीं है. ज़्यादातर झोंपडियां गोबर से बनी हैं, चूल्हे जिस तरह जलाये जाते हैं उससे श्वास सम्बन्धी बीमारियां उग्र होती हैं. देश की पैसठ प्रतिशत जनसंख्या ही पढ सकती है. गांवों में तो साक्षरता दर मात्र तैंतीस प्रतिशत ही है. याद रखें, चीन में यह दर नब्बे प्रतिशत है. लेकिन, भारत के विकास में अवरोधक तत्वों की चर्चा करते हुए भी लूसे भारत में चीन का मॉडल अपनाने की हिमायत नहीं करते.

1991 से पहले भारत में कोटा-परमिट राज था. पी वी नरसिंहा राव ने उसे बदला. विदेशी निवेश भी बढा, और काफी कुछ बदला. टेलीविजन चैनल एक से एक सौ पचास तक पहुंचे, सडकों पर कारों के नए मॉडल्स आए, नई दुकानें और मॉल खुले और उनमें नई तरह के उत्पाद दिखाई देने लगे. फिर भी भारत के उभरते मध्यवर्ग, शिक्षित शहरी अभिजात वर्ग और गांवों में रह रहे गरीबों के बीच असमानता की खाई न केवल बनी हुई है, और गहरी हुई है. लूसे ने इसी तरह के अंतर्विरोधों से अपनी किताब का ताना-बाना बुना है. किताब का शीर्षक भी ऐसे ही एक अंतर्विरोध को उजागर करता है और बाद में एक जगह वे भारत के अभ्युदय पर अचरज करते हुए कहते हैं कि भारत एक तरफ तो एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक ताकत बनता जा रहा है और दूसरी तरफ अभी भी एक धार्मिक, आध्यात्मिक और कुछ मानों में अन्धविश्वासी समाज बना हुआ है.

आर्थिक सुधारों के बावज़ूद लाल फीताशाही में कमी नहीं आई है और व्यापक भ्रष्टाचार आर्थिक प्रगति को रोके हुए है. लूसे केरल के हाइवे विभाग के मुखिया वी जे कुरियन का हवाला देते हुए बताते हैं कि वे कुछ साल पहले कोच्चि में एक हवाई अड्डा बनाना चाहते थे. उन्हें दो लाख डॉलर की रिश्वत का प्रस्ताव दिया गया कि वे रनवे निर्माण के लिए सबसे कम दर वाली बोली को अस्वीकार कर उससे अधिक दर वाली बोली को मंज़ूरी दे दें. उन्होंने जब इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तो उनका तबादला एक अन्य कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया गया. ऐसे अनेक प्रसंग इस किताब को रोचक बनाते हैं. लूसे भारत की तरक्की के लिए जिन बातों को ज़रूरी मानते हैं वे हैं – ऊर्जा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन. वे नियोजन विरोधी श्रम कानूनों को भी बदलने पर बल देते हैं

लूसे भारत की चर्चा करते हुए भारत से बाहर भी निकलते हैं. वे यह भी पडताल करते हैं कि भारत और चीन का उभरना दुनिया के भू राजनीतिक मानचित्र को कैसे प्रभावित करेगा. वे बताते हैं कि कैसे भारत और चीन के रिश्तों में बदलाव आया है और कैसे वही अमरीका जो शीत युद्ध के समय भारत को शक़ की निगाहों से देखता था, अब चीन की उभरती ताकत को संतुलित करने के लिए इसके निकट आता जा रहा है.

.

मैंने कहा था कि लूसे अपनी इस किताब के कथनों को आंकडों के ज़रिये प्रामाणिक बनाने का प्रयास करते हैं. लेकिन यहां यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में आंकडे कभी भी सही तस्वीर पेश नहीं कर सकते. यही इस किताब की एक बडी सीमा भी है. किताब की एक दूसरी सीमा इसका शीर्षक है, जो किताब की विषय वस्तु से मेल नहीं खाता. फिर भी, किताब दिलचस्प है और यह बताती है कि दूसरे हमें किस तरह देखते हैं.
◙◙◙

Discussed book:
In Spite of the Gods: The Rise of Modern India
By Edward Luce
Published by: Anchor
Paperback, 416 pages
US $ 14.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम 'वर्ल्ड ऑफ बुक्स' के अंतर्गत 3 जुलाई 2008 को प्रकाशित.

दूसरों की नज़रों में हम



“इस बात की तो किसी ने ख्वाब में भी कल्पना नहीं की होगी कि तीन हज़ार सालों के जातिगत भेदभाव के बाद तथाकथित पिछडी जाति की एक महिला देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्य की मुख्यमंत्री बन जाएगी. लेकिन दो बार ऐसा हो गया. इसी तरह, 2004 में भारत में जो हुआ वह तो मानवता के इतिहास में अभूतपूर्व है. एक अरब से ज़्यादा आबादी वाले इस दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में चुनाव हुआ और एक कैथोलिक राजनीतिक नेता (सोनिया गांधी) ने एक सिख के लिए देश के प्रधानमन्त्री पद का त्याग किया. और बात यहीं खत्म नहीं होती. सिख मनमोहन सिंह को शपथ दिलाई देश के मुस्लिम राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने. यह याद रहे कि देश की 81 प्रतिशत आबादी हिन्दू है.:”

इस और ऐसी ही अनेक टिप्पणियों से भरी रोचक किताब इन स्पाइट ऑफ द गॉड्स: द राइज़ ऑफ मॉडर्न इण्डिया में ब्रिटिश पत्रकार एडवर्ड लूसे ने तेज़ी से उभर रही आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत भारत की विकास यात्रा की पडताल की है, उसके अवरोधकों को रेखांकित किया है और विकास की गति तेज़ करने के लिए सुझाव दिए हैं. एडवर्ड लूसे 2001 से 2005 तक नई दिल्ली में फाइनेंशियल टाइम्स के दक्षिणी एशिया ब्यूरो चीफ रहे है और आजकल इसी पत्र के वाशिंगटन कमेंटेटर हैं. उनकी पत्नी भारतीय है. इस किताब के लिए लूसे ने महत्वपूर्ण राजनेताओं, धर्म गुरुओं, आर्थिक विश्लेषकों से लगाकर ग्रामीण मज़दूरों तक से बात की और खूब यात्राएं की. यह किताब रिपोर्ताज और विश्लेषण का अनूठा मिश्रण है और भारतीय समाज और व्यवस्था की जटिलताओं को बखूबी उभारती है. लूसे जल्दबाजी और भावुकता में कोई टिप्पणी करने की बजाय आंकडों और तथ्यों से पुष्ट बात कहकर अपनी बात को प्रामाणिकता प्रदान करते हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों, आर्थिक विकास और महाशक्ति बनने के दावों के बरक्स अनेक अध्ययनों ने यह बताया है कि दिया तले अन्धेरा भी घना है. एक अध्ययन के अनुसार, भारत में हज़ार लोगों के पीछे मात्र चौरासी टेलीविजन सेट्स हैं, जबकि अमरीका में नौ सौ अडतीस हैं. भारत में प्रति हज़ार 7.2 पर्सनल कम्प्यूटर हैं, ऑस्ट्रेलिया में 564.5 हैं. भारत में इण्टरनेट अभी महज़ दो प्रतिशत को सुलभ है, मलेशिया में चौंतीस प्रतिशत को. भारत की श्रम शक्ति का महज़ पांच प्रतिशत ही औपचारिक रूप से नियोजित है, यानि मात्र साढे तीन करोड लोगों को ही रोज़गार सुरक्षा सुलभ है. लगभग इतनी ही आबादी इनकम टैक्स देती है. भारत के तीस करोड लोग अडसठ लाख ऐसे गांवों में निवास करते हैं जहां शुद्ध पेय जल तक ठीक से सुलभ नहीं है. ज़्यादातर झोंपडियां गोबर से बनी हैं, चूल्हे जिस तरह जलाये जाते हैं उससे श्वास सम्बन्धी बीमारियां उग्र होती हैं. देश की पैसठ प्रतिशत जनसंख्या ही पढ सकती है. गांवों में तो साक्षरता दर मात्र तैंतीस प्रतिशत ही है. याद रखें, चीन में यह दर नब्बे प्रतिशत है. लेकिन, भारत के विकास में अवरोधक तत्वों की चर्चा करते हुए भी लूसे भारत में चीन का मॉडल अपनाने की हिमायत नहीं करते.

1991 से पहले भारत में कोटा-परमिट राज था. पी वी नरसिंहा राव ने उसे बदला. विदेशी निवेश भी बढा, और काफी कुछ बदला. टेलीविजन चैनल एक से एक सौ पचास तक पहुंचे, सडकों पर कारों के नए मॉडल्स आए, नई दुकानें और मॉल खुले और उनमें नई तरह के उत्पाद दिखाई देने लगे. फिर भी भारत के उभरते मध्यवर्ग, शिक्षित शहरी अभिजात वर्ग और गांवों में रह रहे गरीबों के बीच असमानता की खाई न केवल बनी हुई है, और गहरी हुई है. लूसे ने इसी तरह के अंतर्विरोधों से अपनी किताब का ताना-बाना बुना है. किताब का शीर्षक भी ऐसे ही एक अंतर्विरोध को उजागर करता है और बाद में एक जगह वे भारत के अभ्युदय पर अचरज करते हुए कहते हैं कि भारत एक तरफ तो एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और आर्थिक ताकत बनता जा रहा है और दूसरी तरफ अभी भी एक धार्मिक, आध्यात्मिक और कुछ मानों में अन्धविश्वासी समाज बना हुआ है.

आर्थिक सुधारों के बावज़ूद लाल फीताशाही में कमी नहीं आई है और व्यापक भ्रष्टाचार आर्थिक प्रगति को रोके हुए है. लूसे केरल के हाइवे विभाग के मुखिया वी जे कुरियन का हवाला देते हुए बताते हैं कि वे कुछ साल पहले कोच्चि में एक हवाई अड्डा बनाना चाहते थे. उन्हें दो लाख डॉलर की रिश्वत का प्रस्ताव दिया गया कि वे रनवे निर्माण के लिए सबसे कम दर वाली बोली को अस्वीकार कर उससे अधिक दर वाली बोली को मंज़ूरी दे दें. उन्होंने जब इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तो उनका तबादला एक अन्य कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया गया. ऐसे अनेक प्रसंग इस किताब को रोचक बनाते हैं. लूसे भारत की तरक्की के लिए जिन बातों को ज़रूरी मानते हैं वे हैं – ऊर्जा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन. वे नियोजन विरोधी श्रम कानूनों को भी बदलने पर बल देते हैं

लूसे भारत की चर्चा करते हुए भारत से बाहर भी निकलते हैं. वे यह भी पडताल करते हैं कि भारत और चीन का उभरना दुनिया के भू राजनीतिक मानचित्र को कैसे प्रभावित करेगा. वे बताते हैं कि कैसे भारत और चीन के रिश्तों में बदलाव आया है और कैसे वही अमरीका जो शीत युद्ध के समय भारत को शक़ की निगाहों से देखता था, अब चीन की उभरती ताकत को संतुलित करने के लिए इसके निकट आता जा रहा है.

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मैंने कहा था कि लूसे अपनी इस किताब के कथनों को आंकडों के ज़रिये प्रामाणिक बनाने का प्रयास करते हैं. लेकिन यहां यह समझ लेना भी ज़रूरी है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में आंकडे कभी भी सही तस्वीर पेश नहीं कर सकते. यही इस किताब की एक बडी सीमा भी है. किताब की एक दूसरी सीमा इसका शीर्षक है, जो किताब की विषय वस्तु से मेल नहीं खाता. फिर भी, किताब दिलचस्प है और यह बताती है कि दूसरे हमें किस तरह देखते हैं.
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Discussed book:
In Spite of the Gods: The Rise of Modern India
By Edward Luce
Published by: Anchor
Paperback, 416 pages
US $ 14.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 3 जुलाई, 2008 को प्रकाशित.











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Wednesday, July 2, 2008

क्या आपके मन में खोट है?

पिछले दिनों कुछ चड्डियों के विज्ञापन (कु)चर्चा में रहे थे. कारण जाहिर है, अश्लीलता था. अब अश्लीलता का मामला ज़रा टेढा होता है. जो शुद्ध सात्विक लोग हैं वे बाबा तुलसीदास को भी याद कर सकते हैं – जाकि रही भावना जैसी! यानि अश्लीलता किसी तस्वीर या सन्देश में नहीं होती, ग्रहण करने वाले के मन में होती है. वे विज्ञापन तो बडे मासूम थे, अब अगर आपके ही मन में गन्दगी हो तो कोई क्या करे?

इधर ऐसे ही दो और विज्ञापन देखने को मिले हैं. लगता है विज्ञापन दाताओं का कौशल चड्डी से हटकर अब मोबाइल फोन तक पहुंच गया है.

पहले ज़रा विज्ञापन की बात कर लूं. पहले विज्ञापन में एक मर्द बनियान पहन कर सोया हुआ है, उसके पास एक कुछ उदास-सी लडकी बैठी है, शमीज़ जैसा कुछ पहने हुए और वह मानो कह रही है, “विश युअर बैटरी हेड मोर स्टैमिना?’ यानि काश! तुम्हारी बैटरी में और क्षमता/ताकत होती? और इस तस्वीर के पास ही विज्ञापित मोबाइल हैण्डसेट की तस्वीर है जिसके नीचे बारीक अक्षरों में, जो करीब-करीब अपठनीय हैं, इस हैण्डसेट के अन्य गुणों के अलावा ‘स्टैमिना बैटरी’ भी लिखा है. यानि इसकी बैटरी स्टैमिना वाली है. अब, विज्ञापन दाता को बैटरी का स्टैमिना बताने के लिए एक सोये हुए पुरुष और जागी हुई उदास युवती की तस्वीर देनी पडी है. क्या दोनों में कोई रिश्ता बनता है? क्या पति के फोन की बैटरी बहुत जल्दी चुक गई और इसलिए वह सो गया, और स्त्री उदास है? या यहां किसी और बैटरी की तरफ संकेत है, जो जल्दी चुक गई, मर्द सो गया, और स्त्री उदास है? निश्चय ही विज्ञापन देने वालों ने इस युगल की तस्वीर देकर मोबाइल की बैटरी जल्दी चुक जाने की पीडा व्यक्त की है. सही भी है. किसी से बात कर रहे होंगे और बैटरी खत्म हो गई. पुरुष बेचारा शर्मिन्दा होकर सो गया. लडकी उदास बैठी है. उदास न हो तो क्या करे? काश बैटरी में ज़्यादा दम होता. कहिये, आपको भी यही समझ आया न?

अब इसी श्रंखला का दूसरा विज्ञापन. दो युवतियां. आंखों में एक खास तरह की चमक, जिसे चाहें तो ‘सेक्सी’ कह सकते हैं, क्लीवेज दिखाती हुई. कह रही हैं, “कैन यू हैण्डल बोथ?’ यानि क्या तुम (हम) दोनों को सम्भाल सकते हो? अगर आप इस कथन का कोई खास मतलब निकालते हैं तो खोट आपके मन में है. इसलिए कि पास ही एक मोबाइल हैण्डसेट की तस्वीर है, और उसके नीचे, सूक्ष्म अक्षरों में बता दिया गया है कि यह ‘डुएल सिम’ वाला है, यानि यह दो सिम हैण्डल कर सकता है. अब अगर इस लिखावट को पढने में मुझे ज़ोर पड रहा है तो यह मेरी अंखों (या उम्र) का कसूर है. विज्ञापन देने वाले की नीयत तो एकदम पाक साफ है.

लेकिन क्या करूं? मेरे लिए यह समझना थोडा कठिन है कि ये उत्तेजक आंखें, युवा देह जब कह रही हैं कि ‘कैन यू हैण्डल बोथ” तो ये मोबाइल फोन की भूमिका अदा कर रही हैं. इन युवतियों को देख कर मेरे मन में तो किसी भी तरह दोहरी सिम वाली मोबाइल का खयाल नहीं आता. आपके मन में आता है? अगर आता है तो आप के मन में खोट नहीं है. मैं स्वीकार करता हूं कि मेरे मन में खोट है.

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Thursday, June 26, 2008

एक और दिन ऐसा

‘ट्यूज़डेज़ विद मॉरी’ और ‘फाइव पीपुल यू मीट इन हेवन’ जैसी बेस्टसेलर किताबों के लेखक मिच एल्बॉम का पेपरबैक संस्करण में हाल ही में आया उपन्यास फोर वन मोर डे उन आंतरिक संघर्षों को उजागर करता है जिनसे हममें से हरेक को कभी न कभी जूझना पडता है. मानवीय सम्बन्धों में, चाहे वे परिवारजन के हों, मित्रों के हों या अजनबियों के, कभी-न-कभी मन में यह बात आती ही है कि क्या हम इनका निर्वाह और ज़्यादा बेहतर तरीके से नहीं कर सकते थे? और जो बीत चुका है उसके सन्दर्भ में यह सवाल भी उठता है कि अब क्या किया जा सकता है!

‘फोर वन मोर डे’ उपन्यास का आधार यह विचार है कि अगर आपको जीवन का एक और दिन एक ऐसे व्यक्ति के साथ बिताने को मिले जो अब आपकी ज़िन्दगी में नहीं है, तो वह व्यक्ति कौन होगा! उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र चार्ल्स ‘चिक’ बेनेटो के लिए तो यह व्यक्ति उसकी मां है. उपन्यास के प्रारम्भ में हम पाते हैं कि एक अवसाद भरी रात में चार्ल्स, अधेड उम्र का शराबी, आत्म हत्या करने के कगार पर है. उसका काम काज और परिवार सब टूट-बिखर चुके हैं. धीरे-धीरे हम इस चार्ल्स के जीवन से परिचित होते हैं. बचपन में उसके पिता कहा करते थे कि या तो तुम मामा’ज़ बॉय हो सकते हो या पापा’ज़ बॉय; दोनों एक साथ नहीं हो सकते. चार्ल्स ने पिता का लाडला होना चुना. न केवल चुना, अपनी युवावस्था पिता को खुश करने में झोंक भी डाली. पिता ने चाहा कि वह बेसबॉल खेले, तो उसने खेला. यहां तक कि जब चार्ल्स 11 साल का था, तब उसके पिता हालांकि उसे छोड गये, फिर भी उसने बेसबॉल चैम्पियन बनने के उनके सपने से नाता नहीं तोडा. आखिर वह एक छोटी टीम का सदस्य बना और धीरे-धीरे तरक्की करता चला.

इस सबके साथ उसकी मां पोसी ने बमुश्किल उसे पाला पोसा, बहिन रॉबर्टा ने भी उसके लिए अनेक त्याग किए. चार्ल्स उम्र भर अपने पिता को ही खुश करने में लगा रहा, मां की उपेक्षा करके भी. एक हादसे में उसकी टांग चोटग्रस्त होती है तो बेसबॉल का बडा खिलाडी बनने का उसका (असल में तो उसके पिता का) ख्वाब चकनाचूर हो जाता है. तब चार्ल्स को महसूस होता है कि पिता से उसका रिश्ता तो इस खिलाडी वाले कैरियर की नींव पर टिका था. उसके जेह्न से पिता धीरे-धीरे धूमिल होने लगते हैं और वह अपना ग़म ग़लत करने के लिए शराब का सहारा लेता है. इसी दौरान उसकी नौकरी भी छूट जाती है. वह यह भी पाता है कि उसके आर्थिक संकटों से उबरने में उसके पिता उसकी तनिक भी मदद नहीं करते. तब उसे एहसास होता है कि उसने अपनी मां की तो घोर उपेक्षा की थी. लेकिन तब तक मां को मरे को आठ साल बीत चुके हैं. उसे एक और गहरा आघात इस बात का लगता है कि खुद उसकी बेटी उसे न तो अपनी शादी के बारे में बताती है और न उसमें उसे बुलाती है. इन सबसे व्यथित होकर वह आत्महत्या का इरादा बनाता है. यही है इस उपन्यास का प्रस्थान बिन्दु!

लेकिन, आत्महत्या से पहले वह अपने छोटे-से गांव जाता है और संयोगवश अपने पुराने घर जा पहुंचता है. वहां पहुंच कर वह स्तब्ध रह जता है. उसकी मां, जो आठ साल पहले मर चुकी है, अब भी वहीं रह रही है और वह उसका स्वागत ऐसे करती है जैसे इस बीच कुछ हुआ ही नहीं है. और फिर बीतता है एक और दिन, आम दिन, ऐसा दिन जो हममें से हरेक बिताना चाहता है. अपने खोये मां-बाप के साथ, परिवार की भूली बिसरी बातें करते हुए, अपने किये - न किये के लिये क्षमा याचना करते हुए. इसी बातचीत के दौरान उसे अपनी मां के किये बहुत सारे ऐसे त्यागों का पता चलता है जिनसे वह अब तक अनजान था. मां उसे ढाढस बंधाती है और वह आत्महत्या का इरादा छोड अपनी ज़िन्दगी की पटरी से उतरी गाडी को फिर से पटरी पर लाने का निश्चय करता है.

इस कथा को बहुत आसानी से भूत-प्रेत की कथा कह कर खारिज किया जा सकता है. लेकिन सोचिए, क्या हर परिवार के पास इस तरह की कोई प्रेत कथा नहीं होती? जो लोग दुनिया छोड चुके हैं वे भी तो हमारी स्मृति में बने रहते हैं. अगर उन्हें भूत-प्रेत कह दिया जाए तो क्या हर्ज़ है? एक और बात, जब आप चार्ल्स और उसकी मां की बातचीत पढते हैं तो जो मानसिक विरेचन होता है और जैसी नैतिक सलाह आपको मिलती है, लगता है कि वह इस प्रविधि से ही सम्भव थी. पूरा उपन्यास एक ही बात कहता है और वह यह कि जीवन में सबसे बडी अहमियत प्रेम की है. वैसे, मिच घुमा फिराकर यही बात अपनी हर कृति में कहते हैं. आज के टूटते-दरकते मानवीय सम्बन्धों वाले विकट समय में इस सन्देश की कितनी ज़रूरत है, यह कहने की आवश्यकता नहीं.

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Discussed book:
For One More Day
By Mitch Albom
Published by: Hyperion
Paperback, 197 pages
US $ 10.80

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट 'जस्ट जयपुर' में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 26 जून 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, June 12, 2008

असल चुनौती है उम्मीद खोजना

अमरीकी राष्ट्रपति पद के प्रबल प्रत्याशी बराक ओबामा की दूसरी किताब द ऑडेसिटी ऑफ होप: थॉट्स ऑन रिक्लेमिंग द अमेरिकन ड्रीम एक ऐसी राजनीतिक किताब है जो न तो अपने प्रतिपक्षियों पर दोषारोपण करती है, न ‘हम बनाम तुम’ का वाक युद्ध रचती है. यह किताब अपने बहुलांश में बहुत सारे नीतिगत मुद्दों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, ईराक में युद्ध वगैरह पर ओबामा का पक्ष प्रस्तुत करती है. यह करते हुए ओबामा अपने पाठक का ध्यान उन अमरीकी समानताओं और मूल्यों की तरफ भी आकृष्ट करते हैं जो राजनीतिक मत वैभिन्य के बावज़ूद बरकरार हैं. ओबामा बडी समस्याओं के लिए आम सहमति के समाधानों की तलाश करते हुए परस्पर विरोधी विचारों को समझने की ज़रूरत पर बल देते हैं. लेकिन, यह समझौता नहीं है. यही है उम्मीद की साहसिकता, ऑडेसिटी ऑफ होप, जिसे ओबामा ने एक चर्च में प्रवचन सुनते हुए ग्रहण किया था. खुद ओबामा ने अपनी इस किताब पर बोलते हुए कहा है, “गलतियां ढूंढना आसान है. असल चुनौतियां तो उम्मीद तलाशने में हैं.”

किताब की महत्ता उस विज़न में है जो ओबामा अमरीकी राजनीति के लिए पेश करते हैं. यह एक ऐसा विज़न है जो सबको साथ लेकर चलना चाहता है. ओबामा की खासियत ही यह है कि वे विविध परिदृश्यों के ताने-बाने से एक सुसंगत और सुगठित समग्र रचते हैं. इसी कारण यह किताब आज की जटिल होती जा रही दुनिया में अमरीकी अस्मिता और उसकी भूमिका के लिए एक उत्तर-आधुनिक वृत्तांत रचती है. ओबामा मुख्यधारा की राजनीति के दबावों और तनावों को भली-भांति समझ कर खासकर रिपब्लिकन शैली की विभेदक पक्षधरता के विरोध में खडे होकर व्यापक अमरीकी मूल्यों पर आधारित बीच की राजनीति का पक्ष लेते हैं. ऐसा करते हुए वे कहीं-कहीं अंतर्विरोधी भी हो जाते हैं. जैसे, वे मुक्त व्यापार का समर्थन करते हैं लेकिन अमरीकी कामगारों पर उसके दुष्प्रभाव से व्यथित भी होते हैं, फिर जैसे अपने इस परस्पर विरोधी स्टैण्ड को कुछ दुरुस्त करते हुए आधे मन से यह भी जोडते हैं कि अंतत: तो शिक्षा, विज्ञान और नवीनीकरणीय ऊर्जा को ज़्यादा सहयोग देकर अर्थव्यवस्था पर भूमंडलीकरण के कुप्रभावों की भरपाई की जा सकेगी. अवसर बढाने के लिए भी वे शिक्षा, विज्ञान, तकनीकी और ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक सार्वजनिक निवेश की पैरवी करते हैं. ऐसा, हालांकि 1970 से ही हो रहा है, लेकिन ओबामा को लगता है कि इसमें राष्ट्रीय महता की भावना का अभाव रहा है. इसी तरह वे राजनीतिज्ञों पर धन संग्रह, विभिन्न हित-समूहों, मीडिया, सौदेबाजी वगैरह के कारण बढते दबावों और उनकी समझौता परस्ती की चिंता करते हैं, लेकिन उस चिंता से बाहर नहीं निकल पाते.

ज़ाहिर है कि किताब का सम्बन्ध अमरीकी जीवन और राजनीति से है, लेकिन इसे पढते हुए बार-बार लगता है कि हम अपने देश के बारे में पढ रहे हैं. जब हम ओबामा का यह कथन पढते हैं कि संविधान को जन्म देने वाले सिद्धांतों की तरफ लौटकर ही अमरीकी अपने देश की टूट-फूट चुकी राजनीतिक प्रक्रिया को दुरुस्त कर सकते हैं और उस सरकार को फिर से काम-चलाऊ बना सकते हैं जो लाखों आम अमरीकियों से कट चुकी है, तो लगता है कि यह बात हमारे देश के बारे में भी तो कही जा सकती है.

ओबामा इस किताब की भूमिका में एक दिलचस्प घटना याद करते हैं. लगभग दस बरस पहले, जब उन्होंने पहली बार चुनाव लडा, वे जगह-जगह लोगों से मिलते, और हर बार घुमा फिराकर उनसे एक ही सवाल पूछा जाता, “आप तो खासे भले इंसान लगते हैं. आप राजनीति की गन्दी दुनिया में क्यों जा रहे हैं?” ओबामा इस आम धारणा का विश्लेषण भी करते हैं और कहते हैं कि राजनीति कर्मियों के वचन भंग की लम्बी परम्परा के कारण ऐसी धारणा बनी और मज़बूत हुई है. सोचें, क्या भारत में भी ऐसा ही नहीं हुआ है?

किताब में ऐसा ही एक और मार्मिक प्रसंग है जहां ओबामा व्हाइट हाउस में जॉर्ज डब्ल्यू बुश से हुई एक मुलाक़ात को याद करते हैं. बुश ने बडी गर्मजोशी से उनसे हाथ मिलाया, और फिर पास ही खडे अपने सेवक की तरफ मुडे. सेवक ने तुरंत उनके हाथ पर खूब सारा सेनिटाइज़र (एक तरह का साबुन) डाल दिया. राष्ट्रपति जी अपने इस मेहमान की तरफ भी थोडा-सा सेनिटाइज़र बढाते हैं, यह कहते हुए कि “अच्छी चीज़ है. इससे आप जुकाम से भी बचे रहते हैं.”

किताब की एक बहुत बडी विशेषता इसकी भाषा है. ‘उनकी आंखों में दुर्व्यवस्था की कौंध थी’, ‘कम्बल की झीनी ऊष्मा’, ‘अपने कूल्हों पर अनाम शिशुओं को टिकाए’ जैसे वाक्यांश और अपने बीबी-बच्चों से दूर वाशिंगटन डी सी में रहने की पीडा को ‘उनके आलिंगन की ऊष्मा और उनकी त्वचा की मधुर गंध के लिए तडपता हुआ’ कहकर व्यक्त करने वाला यह राजनीतिज्ञ अपनी भाषा की काव्यात्मक संवेदनशीलता से भी कम प्रभावित नहीं करता.


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Discussed book:
The Audacity of Hope: Thoughts on Reclaiming American Dream
By: Barrack Obama
Published By: Crown Publishing Group
Hardcover, 384 pages
US $ 25.00


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 12 जून, 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, June 5, 2008

छीन लिया बचपन

सितम्बर, 2007. सेण्ट जॉर्ज का खचाखच भरा एक न्यायालय कक्ष. बहुविवाही पंथ के मुखिया वारेन जेफ्स के खिलाफ एलिसा वॉल की दिल दहला देने वाली गवाही कि किस तरह जेफ्स ने उसे 14 बरस की कच्ची उम्र में अपने चचेरे भाई से शादी के लिए बाध्य किया. एलिसा वॉल की इस मर्मांतक गवाही को जेफ्स के खिलाफ सबसे अधिक प्रभावी प्रमाण माना गया. इसी गवाही ने दुनिया के सामने यह उजागर किया कि किस तरह और किस हद तक जाकर जेफ्स अपने इस गुप्त पंथ की औरतों को नियंत्रित करता था.

अब, एलिसा वॉल ने लिज़ा पुलिट्ज़र के साथ मिलकर अपनी ताज़ा किताब स्टोलन इन्नोसेन्स: माय स्टोरी ऑफ ग्रोइंग अप इन अ पॉलीगेमस सेक्ट, बिकमिंग अ टीन एज ब्राइड, एण्ड ब्रेकिंग फ्री ऑफ वारेन जेफ्स में एक करीब-करीब अविश्वसनीय लेकिन प्रेरक वृत्तांत के माध्यम से यह बताया है कि कैसे वह फण्डामेंटलिस्ट चर्च ऑफ लेटर डे सेंट्स (FLDS) के चंगुल से मुक्त हो सकी और कैसे अमरीका के सर्वाधिक कुख्यात अपराधियों में से एक, वारेन जेफ्स, को सज़ा दिलवा सकी. एफ एल डी एस की भीतरी ज़िन्दगी को एक बालिका की मासूम नज़रों से देखते-परखते हुए एलिसा अपनी ऊबड-खाबड युवावस्था का मार्मिक वर्णन तो करती ही है, अतीत में जाकर यह भी बताती है कि कैसे उसके परिवार का अशांत अतीत उसके दृढ निश्चय से टकराया और यह तै कर लिया गया कि उस जैसी ‘ज़िद्दी’ लडकी को केवल शादी के ज़रिये ही नियंत्रित किया जा सकता है. यह सब बयान करते हुए एलिसा यह भी बताती है कि जेफ्स का चर्च यानि अपने पंथ पर कितना गहरा असर था और कैसे उसने अपने इस असर का दुरुपयोग करके चर्च के पहले से कट्टर विचारों को नई खतरनाक दिशाओं में मोड दिया.

एलिसा अपनी शादी के माहौल का बडा सजीव चित्रण करती है कि कैसे उसकी मां लगभग ज़बर्दस्ती उससे इस शादी के लिए हां भरवाती है. और शादी? 14 साल की एलिसा विवाह के शारीरिक पक्ष से नितांत अपरिचित, लेकिन पति के लिए जैसे वही सब कुछ! उसका बचपन जैसे चूर-चूर हो जाता है क्योंकि उसे जेफ्स के निर्देशानुसार अपने पति को ‘तन, मन और आत्मा के साथ’ पूरी तरह समर्पित होना ही है. उसके पास न तो पैसा है और न बाहरी दुनिया की कोई समझ और जानकारी, सो इस यातना भरी क़ैद से कोई निज़ात भी नहीं है. प्रेम विहीन रिश्ते की सारी यातना झेलते-झेलते. हालात इतने बिगडते हैं कि उसे अपने उप्तीडक पति की शैया संगिनी बनने की बजाय खुले में ट्रक में रात बिताना अधिक सुखद लगता है.

लेकिन उन स्याह दिनों में भी उसके मन में इस उम्मीद की एक लौ झिलमिलाती रहती है कि कभी तो उसे इस यातना गृह से मुक्ति मिलेगी. और ऐसा होता भी है. अचानक एक अजनबी लामोण्ट बार्लो उसकी ज़िन्दगी में आता है. परिचय दोस्ती में बदलता है, दोस्ती रोमांस में ढलती है और यह रिश्ता उसे अंतत: अपने त्रासद अतीत और चर्च की जंजीरों से आज़ाद होने की ताकत देता है. किताब में एलिसा उस कठिन समय का मार्मिक वर्णन करती है जब वह अपने पंथ से बाहर निकल कर जेफ्स के विरुद्ध इसलिए आवाज़ बुलन्द करती है कि जो लडकियां अभी भी चर्च की जंजीरों में क़ैद हैं उन्हें भी यातनाओं से मुक्ति मिल सके.

किताब सत्य और तथ्य पर आधारित है लेकिन लेखिका का अन्दाज़े-बयां और घटनाक्रम की रोमांचक विलक्षणता इसे उपन्यास की–सी रोचकता प्रदान करते हैं. एलिसा के बचपन की स्मृतियां, जहां वह अपनी तीन माताओं के साथ रहती है, और उन तीनों औरतों की आपसी ईर्ष्याएं और शत्रुताएं! और इन्हीं के बीच से उभरता है एलिसा की अपनी मां शेरॉन स्टीड का चरित्र, जिसके लिए महाकवि निराला की पंक्ति याद आती है, “दुख ही जीवन की कथा रही”. कभी सौत के लिए उसे घर से निकाला जाता है तो कभी उसके लिए सौत को. लेकिन सारी टूट-फूट के बीच भी अपने पंथ में उसकी आस्था अडिग रहती है. हालांकि एलिसा के बडे भाई-बहनों का एक-एक कर इन आस्थाओं से मोह-भंग होता रहता है और वे परिवार से अपने रिश्ते तोडते जाते हैं. इन सबका गहरा असर एलिसा के कच्चे मन पर पडता है, और खुद शेरॉन पर भी. अंतत: शेरॉन भी परिवार के माहौल से टूट-बिखर कर फ्रेड जेसोप की तरफ झुकती है और फिर उससे शादी कर लेती है. बाद में, यही अंकल फ्रेड एलिसा की शादी उसके चचेरे भाई एलेन स्टीड से कराने का ज़िम्मेदार सिद्ध होता है.

निश्चय ही एलिसा के जीवन की यह त्रासद कथा उसके अपने परिवेश की निर्मिति है. लेकिन, उसकी यह करुण कथा परिवार, शिक्षा, आस्थाओं, धार्मिक पंथों और उनके मुखियाओं के बारे में बडे तथा महत्वपूर्ण सवाल उठाती है. आस्था लोगों को किस हद तक अंधा कर देती है, यह तब ज़ाहिर होता है जब मां एलिसा से कहती है कि अपने धर्म से लडने से तो अच्छा था कि तुम मर गई होती!

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Discussed book:
Stolen Innocence: My Story of Growing Up in a Polygamous Sect, Becoming a Teenage Bride,and Breaking Free of Warren Jeffs
By Elissa Wall and Lisa Pulitzer
Published by: William Morrow
Hardcover, 448 pages
US $ 25.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 05 जून 2008 को प्रकाशित.








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Sunday, June 1, 2008

तो फिर भगवान ही मालिक है....


राजस्थान में पिछले लगभग एक सप्ताह से एक बडे आन्दोलन की वजह से जन-जीवन बुरी तरह दुष्प्रभावित है. जन-धन की अपार हानि हुई है और लोगों को भयंकर असुविधाओं का सामना करना पड रहा है. राज्य के आधे ज़िलों में इस आन्दोलन का असर है. आन्दोलन राजस्थान की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी अपनी लपटों से झुलसा चुका है. जिन मांगों को लेकर यह आन्दोलन हुआ है, उन्हीं मांगों को लेकर ठीक एक बरस पहले भी ऐसा ही आन्दोलन हुआ था. यहां हम इस आन्दोलन के पीछे की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं करना चाहते. वह अलग से चर्चा और बहस का विषय है. महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह है कि एक स्वस्थ प्रजातंत्र में क्या इस तरह के आन्दोलन की कोई जगह होनी चाहिए? मेरा ज़ोर इस तरह पर है. इस तरह का, यानि जिसमें हिंसा हो, गोलियां चलें, बसों के शीशे तोडे जाएं, चलती गाडियों पर पथराव किए जाएं, रेलों की पटरियां उखाडी जाएं, सम्पत्ति का -चाहे निजी हो या सार्वजनिक- नुकसान किया जाए, लोगों को अपने काम पर जाने से रोका जाए, रास्ते रोके जाएं, रेलों बसों का संचालन बन्द करना पडे, सैंकडों हज़ारों लोगों को रोजी रोटी से महरूम रहना पडे, आदि. और यह सब इसलिए कि समाज का एक वर्ग सरकार से कुछ चाहे और सरकार वह न देना चाहे या न दे सकती हो. अगर यह उचित है और यही होना है तो फिर मैं यह जानना चाहूंगा कि यह एक सभ्य समाज है या जंगल की दुनिया? ऐसी दुनिया, जिसमें बाहुबल ही सब कुछ है! समाज का एक वर्ग अपनी ताकत के बल पर यह ज़िद ठान ले कि जो उसे चाहिए वह लेकर रहेगा. अगर एक साथ कई वर्ग ऐसा करने लगें तो? कल्पना करके ही डर लगने लगता है. वैसे, इसी आन्दोलन वाली मांग के सन्दर्भ में हम इस भयावह स्थिति के कगार पर जाकर पिछले ही साल लौटे हैं. अब भी पता नहीं कि वैसा खतरा हमसे कितनी दूर है!
लेकिन, जैसा मैंने अभी कहा मैं यहां इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं कर रहा. इसलिए नहीं कि उस पर मेरे कोई विचार नहीं हैं. बल्कि इसलिए कि मैं उससे पहले एक आधारभूत मुद्दे पर बात करना चाहता हूं.
सोचिए, एक वर्ग अपनी कोई मांग सरकार के सामने रखता है और कहता है कि आप इस मांग पर विचार कर इसे अमुक तारीख तक पूरा कीजिए. वह वर्ग सरकार को पर्याप्त समय देता है कि सरकार उस मांग को पूरा करने की दिशा में कुछ करे, अगर मांग पूरा करना किसी भी कारण सम्भव न हो, या तुरंत पूरा करना सम्भव न हो, सरकार के अधिकार क्षेत्र के बाहर हो, तो भी इस समय में सरकार उस पक्ष से बात तो कर ही सकती है. लेकिन सरकार कुछ नहीं करती. मुहावरे की भाषा में कहें तो सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. न केवल इतना, वह वर्ग एक बडे आन्दोलन की तैयारी करता रहता है और सरकार के आंख कान ज़रा भी हरकत में नहीं आते. यानि अपनी इण्टेलीजेंस से भी सरकार को उस वर्ग के आन्दोलन की भीषण तैयारियों की कोई सूचना नहीं मिलती. और आन्दोलन शुरू हो जाता है. तब भी सरकार आन्दोलनकारियों से कोई सम्वाद नहीं करती. आखिर सरकार तो सरकार होती है ना! वह भला कैसे ऐसे वैसों से बात कर सकती है? लेकिन जब पानी हद से गुज़रने लगता है तो सरकार के हाथ-पांव फूलने लगते हैं. लेकिन तब तक आन्दोलनकारी ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके होते हैं कि वहां से उनके लिए पीछे हटना मुमकिन नहीं रह जाता...
सवाल यह है कि क्या प्रजातंत्र में ऐसा होना चाहिए? क्या जनता की बात सरकार को नहीं सुननी चाहिए? मैं केवल सुनने की बात कर रहा हूं, न कि मांग पूरी करने की. हम जानते हैं कि प्रारम्भिक स्तर पर बहुत सारी समस्याएं संवाद से ही सुलझ जाती हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई मामूली चोट लगे तो छोटा-मोटा प्राथमिक उपचार ही काफी होता है, लेकिन जब उस चोट की उपेक्षा की जाती है तो चोट को घाव में और घाव को नासूर में तब्दील होते वक़्त नहीं लगता. तो, सरकार अपनी प्रजा से बात न करे यह बहुत बडी गडबड है. यहां यह बात भी सामने आएगी कि जनता की सरकार से इतनी अधिक अपेक्षाएं होती हैं कि उन्हें पूरा करना तो दूर, सुनना भी सम्भव नहीं होता. और यहीं यह बात भी सामने आएगी, कि ऐसा तभी होता है जब सरकार चन्द लोगों तक सिमट कर रह जाए. सरकार का मतलब केवल मुख्य मंत्री या मंत्री मण्डल ही नहीं होता, विधायक भी सरकार है, पार्षद भी सरकार है, हर जन प्रतिनिधि सरकार है. आखिर जनता और सरकार के बीच इतनी दूरी क्यों हो? दूरी केवल चुनाव के वक़्त पाटी जाए और फिर सरकार अपने महलों में घुस कर ‘प्रवेश निषेध’ का बोर्ड लटका दे, तो ऐसा ही होगा. जिन्हें जनता ने चुना है वे जनता से संवाद भी न कर सकें, तो यह माना जाना चाहिए वे सही जन प्रतिनिधि नहीं हैं. और यह भी कि जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनने में गलती की है. गलती की है तो सज़ा भी भुगतनी ही पडेगी. और वही सज़ा आज हम सब भुगत रहे हैं. वरना यह तो नहीं होना था न कि जनता एक तरफ, यानि जनता का एक बडा हिस्सा, और सरकार दूसरी तरफ. मैं फिर कह रहा हूं कि इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर मैं यहां कोई टिप्पणी नहीं कर रहा. लेकिन अगर दस बीस पचास हज़ार लोग भी कोई मांग रख रहे हैं तो ऐसा कैसे कि उनके प्रतिनिधि न तो उस मांग से सहमत हैं और न वे अपने उन मतदाताओं को समझा पा रहे हैं कि तुम्हारी मांग गलत है! आप किसी भी आन्दोलन को याद कर लीजिए, जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि सदा ही कोई स्टैंड लेने से कतराते हैं. इसलिए कि वे अपने मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते. न केवल इतना, वे चुनाव के वक़्त या कि किसी भी आन्दोलन के वक़्त, अगर वह उनके प्रतिपक्षी द्वारा चलाया जा रहा हो, किसी भी हद तक जाकर अव्यावहारिक वादे करने से नहीं चूकते.

दूसरी बात, सरकार की ताकत की. एक वर्ग या समूह आन्दोलन की चेतावनी देता है, उसकी तैयारी करता है. सरकार उसे रोक पाने में कतई समर्थ नहीं रहती. पहले तो उसे पता ही नहीं चलता और फिर उस आन्दोलन को कुचलना उचित या सम्भव नहीं रह जाता. क्या यह क्षम्य है? इस आन्दोलन में जो जन-धन की हानि हुई है, रेलों की पटरियां उखाडी गई हैं, सम्पत्ति का नाश किया गया है, मानवीय दिवसों का नुकसान किया गया है, उस सब का नुकसान किसे उठाना पडेगा? आपको और मुझे! हम क्यों उठायें यह नुकसान? करे कोई भरे कोई! क्या इसकी जवाबदेही नही तै होनी चाहिए?
यह सब कहते हुए मैंने एक बात अब तक नहीं कही है. जब मैं प्रजातंत्र की बात करता हूं तो प्रजा के तंत्र की बात करता हूं. एक ऐसा तंत्र जिसमें हम सब एक बडे तंत्र के हिस्से हैं. क्या हमने, यानि इस देश के आम नागरिक ने अपनी कोई ज़िम्मेदारी समझी है? एक पूरे प्रांत में आन्दोलन करने वाले लोग कितने हैं और वे कितने जो उस आन्दोलन से असहमत या अलग हैं? अगर प्रतिशत में बात करें तो शायद 5 और 95 होंगे. या इससे कुछ कम ज़्यादा. तो, बडा हिस्सा तो उनका है जो इस सारी तोड फोड से सहमत नहीं है. वह बडा हिस्सा क्या कर रहा है? एक वर्ग ‘बन्द’ की घोषणा करता है, सारे लोग चुपचाप बन्द कर देते हैं, यह कहते हुए कि ‘कौन झगडा मोल ले?’ शायद सरकार भी यही सोचती है. शायद नहीं, निश्चित रूप से. जो वर्ग मांग कर रहा है, उसे मना करके क्यों नाराज़ किया जाए? चलो गेंद केन्द्र के पाले में फेंक देते हैं. वैसे मांग पूरी कर भी देते, अगर दूसरे वर्ग की नाराज़गी का डर नहीं होता. अपनी जेब से क्या जा रहा है? बडे ‘पैकेज’ यही सोच कर तो घोषित किए जाते हैं. उनकी जेब से कुछ नहीं जा रहा, लेकिन जिनकी जेब से जा रहा है वह भी तो चुप है. यानि आप और हम.

हालात बहुत गंभीर हैं. आप जितना सोचते हैं उतने ही भयाक्रांत होते हैं. कभी शिव मंगल सिंह सुमन ने लिखा था, ‘मेरा देश जल रहा कोई नहीं बुझाने वाला.’ जो मेरे प्रांत राजस्थान में हो रहा है कमोबेश वही अन्य प्रांतों में, पूरे देश में हो रहा है. लेकिन, सोचिए, बुझाने वाला क्या किसी और लोक से आएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस निष्क्रिय उदासीनता के मूल में यह उम्मीद छिपी है कि ‘यदा यदा ही धर्मस्य...’. जब भी द्रौपदी पर संकट आएगा, भगवान उसकी मदद को हाज़िर हो जाएंगे.... यह कि हमारी मदद करने आसमां से फरिश्ते उतर कर आयेंगे. हमें कुछ करने की क्या ज़रूरत है? अगर ऐसा है तो फिर भगवान ही मालिक है!
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तो फिर भगवान ही मालिक है....

राजस्थान में पिछले लगभग एक सप्ताह से एक बडे आन्दोलन की वजह से जन-जीवन बुरी तरह दुष्प्रभावित है. जन-धन की अपार हानि हुई है और लोगों को भयंकर असुविधाओं का सामना करना पड रहा है. राज्य के आधे ज़िलों में इस आन्दोलन का असर है. आन्दोलन राजस्थान की सीमाओं को पार कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को भी अपनी लपटों से झुलसा चुका है. जिन मांगों को लेकर यह आन्दोलन हुआ है, उन्हीं मांगों को लेकर ठीक एक बरस पहले भी ऐसा ही आन्दोलन हुआ था. यहां हम इस आन्दोलन के पीछे की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं करना चाहते. वह अलग से चर्चा और बहस का विषय है. महत्वपूर्ण और विचारणीय बात यह है कि एक स्वस्थ प्रजातंत्र में क्या इस तरह के आन्दोलन की कोई जगह होनी चाहिए? मेरा ज़ोर इस तरह पर है. इस तरह का, यानि जिसमें हिंसा हो, गोलियां चलें, बसों के शीशे तोडे जाएं, चलती गाडियों पर पथराव किए जाएं, रेलों की पटरियां उखाडी जाएं, सम्पत्ति का -चाहे निजी हो या सार्वजनिक- नुकसान किया जाए, लोगों को अपने काम पर जाने से रोका जाए, रास्ते रोके जाएं, रेलों बसों का संचालन बन्द करना पडे, सैंकडों हज़ारों लोगों को रोजी रोटी से महरूम रहना पडे, आदि. और यह सब इसलिए कि समाज का एक वर्ग सरकार से कुछ चाहे और सरकार वह न देना चाहे या न दे सकती हो. अगर यह उचित है और यही होना है तो फिर मैं यह जानना चाहूंगा कि यह एक सभ्य समाज है या जंगल की दुनिया? ऐसी दुनिया, जिसमें बाहुबल ही सब कुछ है! समाज का एक वर्ग अपनी ताकत के बल पर यह ज़िद ठान ले कि जो उसे चाहिए वह लेकर रहेगा. अगर एक साथ कई वर्ग ऐसा करने लगें तो? कल्पना करके ही डर लगने लगता है. वैसे, इसी आन्दोलन वाली मांग के सन्दर्भ में हम इस भयावह स्थिति के कगार पर जाकर पिछले ही साल लौटे हैं. अब भी पता नहीं कि वैसा खतरा हमसे कितनी दूर है!
लेकिन, जैसा मैंने अभी कहा मैं यहां इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर कोई चर्चा नहीं कर रहा. इसलिए नहीं कि उस पर मेरे कोई विचार नहीं हैं. बल्कि इसलिए कि मैं उससे पहले एक आधारभूत मुद्दे पर बात करना चाहता हूं.
सोचिए, एक वर्ग अपनी कोई मांग सरकार के सामने रखता है और कहता है कि आप इस मांग पर विचार कर इसे अमुक तारीख तक पूरा कीजिए. वह वर्ग सरकार को पर्याप्त समय देता है कि सरकार उस मांग को पूरा करने की दिशा में कुछ करे, अगर मांग पूरा करना किसी भी कारण सम्भव न हो, या तुरंत पूरा करना सम्भव न हो, सरकार के अधिकार क्षेत्र के बाहर हो, तो भी इस समय में सरकार उस पक्ष से बात तो कर ही सकती है. लेकिन सरकार कुछ नहीं करती. मुहावरे की भाषा में कहें तो सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. न केवल इतना, वह वर्ग एक बडे आन्दोलन की तैयारी करता रहता है और सरकार के आंख कान ज़रा भी हरकत में नहीं आते. यानि अपनी इण्टेलीजेंस से भी सरकार को उस वर्ग के आन्दोलन की भीषण तैयारियों की कोई सूचना नहीं मिलती. और आन्दोलन शुरू हो जाता है. तब भी सरकार आन्दोलनकारियों से कोई सम्वाद नहीं करती. आखिर सरकार तो सरकार होती है ना! वह भला कैसे ऐसे वैसों से बात कर सकती है? लेकिन जब पानी हद से गुज़रने लगता है तो सरकार के हाथ-पांव फूलने लगते हैं. लेकिन तब तक आन्दोलनकारी ऐसे मुकाम पर पहुंच चुके होते हैं कि वहां से उनके लिए पीछे हटना मुमकिन नहीं रह जाता...
सवाल यह है कि क्या प्रजातंत्र में ऐसा होना चाहिए? क्या जनता की बात सरकार को नहीं सुननी चाहिए? मैं केवल सुनने की बात कर रहा हूं, न कि मांग पूरी करने की. हम जानते हैं कि प्रारम्भिक स्तर पर बहुत सारी समस्याएं संवाद से ही सुलझ जाती हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कोई मामूली चोट लगे तो छोटा-मोटा प्राथमिक उपचार ही काफी होता है, लेकिन जब उस चोट की उपेक्षा की जाती है तो चोट को घाव में और घाव को नासूर में तब्दील होते वक़्त नहीं लगता. तो, सरकार अपनी प्रजा से बात न करे यह बहुत बडी गडबड है. यहां यह बात भी सामने आएगी कि जनता की सरकार से इतनी अधिक अपेक्षाएं होती हैं कि उन्हें पूरा करना तो दूर, सुनना भी सम्भव नहीं होता. और यहीं यह बात भी सामने आएगी, कि ऐसा तभी होता है जब सरकार चन्द लोगों तक सिमट कर रह जाए. सरकार का मतलब केवल मुख्य मंत्री या मंत्री मण्डल ही नहीं होता, विधायक भी सरकार है, पार्षद भी सरकार है, हर जन प्रतिनिधि सरकार है. आखिर जनता और सरकार के बीच इतनी दूरी क्यों हो? दूरी केवल चुनाव के वक़्त पाटी जाए और फिर सरकार अपने महलों में घुस कर ‘प्रवेश निषेध’ का बोर्ड लटका दे, तो ऐसा ही होगा. जिन्हें जनता ने चुना है वे जनता से संवाद भी न कर सकें, तो यह माना जाना चाहिए वे सही जन प्रतिनिधि नहीं हैं. और यह भी कि जनता ने अपने प्रतिनिधि चुनने में गलती की है. गलती की है तो सज़ा भी भुगतनी ही पडेगी. और वही सज़ा आज हम सब भुगत रहे हैं. वरना यह तो नहीं होना था न कि जनता एक तरफ, यानि जनता का एक बडा हिस्सा, और सरकार दूसरी तरफ. मैं फिर कह रहा हूं कि इस आन्दोलन की मांगों के औचित्य पर मैं यहां कोई टिप्पणी नहीं कर रहा. लेकिन अगर दस बीस पचास हज़ार लोग भी कोई मांग रख रहे हैं तो ऐसा कैसे कि उनके प्रतिनिधि न तो उस मांग से सहमत हैं और न वे अपने उन मतदाताओं को समझा पा रहे हैं कि तुम्हारी मांग गलत है! आप किसी भी आन्दोलन को याद कर लीजिए, जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि सदा ही कोई स्टैंड लेने से कतराते हैं. इसलिए कि वे अपने मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहते. न केवल इतना, वे चुनाव के वक़्त या कि किसी भी आन्दोलन के वक़्त, अगर वह उनके प्रतिपक्षी द्वारा चलाया जा रहा हो, किसी भी हद तक जाकर अव्यावहारिक वादे करने से नहीं चूकते.

दूसरी बात, सरकार की ताकत की. एक वर्ग या समूह आन्दोलन की चेतावनी देता है, उसकी तैयारी करता है. सरकार उसे रोक पाने में कतई समर्थ नहीं रहती. पहले तो उसे पता ही नहीं चलता और फिर उस आन्दोलन को कुचलना उचित या सम्भव नहीं रह जाता. क्या यह क्षम्य है? इस आन्दोलन में जो जन-धन की हानि हुई है, रेलों की पटरियां उखाडी गई हैं, सम्पत्ति का नाश किया गया है, मानवीय दिवसों का नुकसान किया गया है, उस सब का नुकसान किसे उठाना पडेगा? आपको और मुझे! हम क्यों उठायें यह नुकसान? करे कोई भरे कोई! क्या इसकी जवाबदेही नही तै होनी चाहिए?
यह सब कहते हुए मैंने एक बात अब तक नहीं कही है. जब मैं प्रजातंत्र की बात करता हूं तो प्रजा के तंत्र की बात करता हूं. एक ऐसा तंत्र जिसमें हम सब एक बडे तंत्र के हिस्से हैं. क्या हमने, यानि इस देश के आम नागरिक ने अपनी कोई ज़िम्मेदारी समझी है? एक पूरे प्रांत में आन्दोलन करने वाले लोग कितने हैं और वे कितने जो उस आन्दोलन से असहमत या अलग हैं? अगर प्रतिशत में बात करें तो शायद 5 और 95 होंगे. या इससे कुछ कम ज़्यादा. तो, बडा हिस्सा तो उनका है जो इस सारी तोड फोड से सहमत नहीं है. वह बडा हिस्सा क्या कर रहा है? एक वर्ग ‘बन्द’ की घोषणा करता है, सारे लोग चुपचाप बन्द कर देते हैं, यह कहते हुए कि ‘कौन झगडा मोल ले?’ शायद सरकार भी यही सोचती है. शायद नहीं, निश्चित रूप से. जो वर्ग मांग कर रहा है, उसे मना करके क्यों नाराज़ किया जाए? चलो गेंद केन्द्र के पाले में फेंक देते हैं. वैसे मांग पूरी कर भी देते, अगर दूसरे वर्ग की नाराज़गी का डर नहीं होता. अपनी जेब से क्या जा रहा है? बडे ‘पैकेज’ यही सोच कर तो घोषित किए जाते हैं. उनकी जेब से कुछ नहीं जा रहा, लेकिन जिनकी जेब से जा रहा है वह भी तो चुप है. यानि आप और हम.

हालात बहुत गंभीर हैं. आप जितना सोचते हैं उतने ही भयाक्रांत होते हैं. कभी शिव मंगल सिंह सुमन ने लिखा था, ‘मेरा देश जल रहा कोई नहीं बुझाने वाला.’ जो मेरे प्रांत राजस्थान में हो रहा है कमोबेश वही अन्य प्रांतों में, पूरे देश में हो रहा है. लेकिन, सोचिए, बुझाने वाला क्या किसी और लोक से आएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस निष्क्रिय उदासीनता के मूल में यह उम्मीद छिपी है कि ‘यदा यदा ही धर्मस्य...’. जब भी द्रौपदी पर संकट आएगा, भगवान उसकी मदद को हाज़िर हो जाएंगे.... यह कि हमारी मदद करने आसमां से फरिश्ते उतर कर आयेंगे. हमें कुछ करने की क्या ज़रूरत है? अगर ऐसा है तो फिर भगवान ही मालिक है!
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Thursday, May 29, 2008

कैसा है डिजिटल युग का युवा

संस्कृति और अमरीकी जीवन के गहन अध्येता और एमॉरी विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर मार्क बॉयेर्लाइन की नई किताब ‘द डम्बेस्ट जनरेशन: हाउ द डिजिटल एज स्टुपिफाइज़ यंग अमरीकन्स एण्ड जिओपार्डाइजेज़ अवर फ्यूचर’ अमरीका की तीस साल तक की उम्र वाली वर्तमान पीढी के बौद्धिक खालीपन को जिस शिद्दत के साथ उजागर करती है वह हमें भी बहुत कुछ सोचने को विवश करता है. मार्क बेबाकी से कहते हैं कि सायबर कल्चर अमरीका को कुछ भी नहीं जानने वालों के देश में तब्दील करती जा रही है. वे चिंतित होकर पूछते हैं कि अगर किसी देश की नई पीढी का समझदार होना अवरुद्ध हो जाए तो क्या वह देश अपनी राजनीतिक और आर्थिक श्रेष्ठता कायम रख सकता है?

वैसे तो पॉप कल्चर और युवा पीढी पर उसके प्रभावों को लेकर काफी समय से बहस हो रही है. वर्तमान डिजिटल युग जब शुरू हुआ तो बहुतों ने यह आस बांधी थी कि इण्टरनेट, ई मेल, ब्लॉग्ज़, इण्टरएक्टिव वीडियो गेम्स वगैरह के कारण एक नई, अधिक जागरूक, ज़्यादा तीक्ष्ण बुद्धि वाली और बौद्धिक रूप से परिष्कृत पीढी तैयार होगी. इंफर्मेशन सुपर हाइवे और नॉलेज इकोनॉमी जैसे नए शब्द हमारी ज़िन्दगी में आए और उम्मीद की जाने लगी कि नई तकनीक के इस्तेमाल में दक्ष युवा अपने से पिछली पीढी से बेहतर होंगे. लेकिन, दुर्भाग्य, कि यह आस आस ही रही. जिस तकनीक से यह उम्मीद थी कि उसके कारण युवा अधिक समझदार, विविध रुचि वाले और बेहतर सम्प्रेषण कौशल सम्पन्न होंगे, उसका असर उलटा हुआ. ताज़ा रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमरीका की नई पीढी के ज़्यादातर लोग न तो साहित्य पढते हैं, न म्यूज़ियम्स जाते हैं और न वोट देते हैं. वे साधारण वैज्ञानिक अवधारणाएं भी नहीं समझ-समझा सकते हैं. उन्हें न तो अमरीकी इतिहास की जानकारी है और न वे अपने स्थानीय नेताओं को जानते हैं. उन्हें यह भी नहीं पता कि दुनिया के नक्शे में ईराक या इज़राइल कहां है.
इन्हीं सारे कारणों से मार्क बॉयेर्लाइन ने उन युवाओं को, जो अभी हाई स्कूल में हैं, द डम्बेस्ट जनरेशन का नाम दिया है. बॉयेर्लाइन ने जो तथ्य दिए हैं वे बहुत अच्छी तरह यह स्थापित करते हैं कि आज का युवा डिजिटल मीडिया के माध्यम से और ज़्यादा आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है. वह नई तकनीक का इस्तेमाल किताब पढने या पूरा वाक्य लिखने जैसी गतिविधियों से अलग जाकर सतही, अहंकारवादी और भटकाने वाली ऑन लाइन दुनिया में रत रहने में कर रहा है. बॉयेर्लाइन यू ट्यूब और माय स्पेस का नाम लेते हैं और कहते हैं कि इन और इन जैसे दूसरे वेब अड्डों पर युवाओं ने अपनी मनचाही जीवन शैली विषयक सामग्री की भरमार कर रखी है और वे इस संकुचित परिधि से बाहर नहीं निकलते हैं. मार्क इस मिथ को भी तोडते हैं कि इण्टरनेट में बढती दिलचस्पी ने युवाओं के बुद्धू बक्सा-मोह को कम किया है. वे आंकडों के माध्यम से स्थापित करते हैं कि युवाओं ने इण्टरनेट को दिया जाने वाला समय मुद्रित शब्द से छीना है और उनका टी वी प्रेम तो ज्यों का त्यों है. मार्क बताते हैं कि 1981 से 2003 तक आते-आते पन्द्रह से सत्रह साल वाले किशोरों का फुर्सती पढने का वक़्त अठारह मिनिट से घटकर सात मिनिट रह गया है.

इससे आगे बढकर मार्क यह भी कहते हैं कि 12 वीं कक्षा के छियालीस प्रतिशत विद्यार्थी विज्ञान में बेसिक स्तर को भी नहीं छू पाते हैं, एडवांस्ड स्तर तक तो महज़ दो प्रतिशत ही पहुंचते हैं. यही हाल उनकी राजनीतिक समझ का भी है. हाई स्कूल के महज़ छब्बीस प्रतिशत बच्चे नागरिक शास्त्र में सामान्य स्तर के हैं. नेशनल असेसमेण्ट ऑफ एज्यूकेशनल प्रोग्रेस की इसी रिपोर्ट के अनुसार बारहवीं कक्षा के बच्चों में 1992 से 2005 के बीच पढने की आदत में भी भारी कमी आई है. इस कक्षा के केवल चौबीस प्रतिशत बच्चे ही ठीक-ठाक वर्तनी और व्याकरण वाला काम-चलाऊ गद्य लिख सकने में समर्थ हैं. यही हाल उनकी मौखिक अभिव्यक्ति का भी है.

मार्क का निष्कर्ष है कि आज की सांस्कृतिक और तकनीकी ताकतें ज्ञान और चिंतन के नए आयाम विकसित करने की बजाय सार्वजनिक अज्ञान का एक ऐसा माहौल रच रही है जो अमरीकी प्रजातंत्र के लिए घातक है. मार्क जो बात अमरीका के लिए कह रहे हैं, विचारणीय है कि कहीं वही बात भारत के युवा पर भी लागू तो नहीं हो रही? खतरे की घण्टी के स्वरों को हमें भी अनसुना नहीं करना चाहिए.
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Discussed book:
The Dumbest Generation: How the Digital Age Stupefies Young Americans and Jeopardizes Our Future
By Mark Bauerlein
Published By: Tarcher
273 pages, Hardcover
US $ 24.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 29 मई 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, May 22, 2008

उत्तर-अमरीकी दुनिया

न्यूज़वीक के सम्पादक, भारत में जन्मे और लम्बे समय से न्यूयॉर्क में रह रहे फरीद ज़करिया की एकदम ताज़ा किताब ‘द पोस्ट-अमेरिकन वर्ल्ड’ अर्थात उत्तर अमरीकी दुनिया, एक ऐसे भावी परिदृश्य की कल्पना करती है जिसमें आज का सर्वशक्तिमान अमरीका न तो वैश्विक अर्थव्यवस्था का नियंता है, न भू-राजनीति का संचालक और न संस्कृतियों का परिचालन कर्ता. ज़करिया को चीन, भारत, ब्राज़ील, रूस और कई अन्य देशों का उत्थान, जिसे वे ‘राइज़ ऑफ द रेस्ट’ का नाम देते हैं, एक ऐसी परिघटना नज़र आता है जो दुनिया की तस्वीर बदल देने वाला है. दुनिया की सबसे ऊंची इमारतें, सबसे बडे बांध, सबसे ज़्यादा चलने वाली फिल्में और नवीनतम सेलफोन – इन सबका निर्माण अमरीका के बाहर ही हो रहा है. और, बावज़ूद इसके कि विश्व की आबादी बढ रही है, कम से कम दुनिया के तीन चौथाई देशों में अत्यधिक गरीबी में रह रहे लोगों की संख्या में कमी हो रही है.

ज़करिया लिखते हैं कि अब तक तो अमरीका एक राजनैतिक और सैन्य महाशक्ति है, लेकिन इन दो को छोडकर शेष तमाम क्षेत्रों में शक्ति संतुलन की तस्वीर बदलती जा रही है. औद्योगिक, वित्तीय, शैक्षिक, सामाजिक, सांस्कृतिक – इन सारे क्षेत्रों में अमरीकी वर्चस्व के गढ ढहते जा रहे हैं. चीन, भारत और अन्य उभरते बाज़ारों तथा दुनिया के बडे भाग में हो रहे आर्थिक विकास और दुनिया के लगातार विकेन्द्रिकृत और आपस में जुडते जाने की वजह से हम एक ऐसी उत्तर-अमरीकी दुनिया की तरफ बढ रहे हैं जिसे कई जगहों से कई लोग परिभाषित और निर्मित कर रहे हैं.

ज़करिया कहते हैं कि हमारा दौर पिछले 500 बरसों के तीसरे महान टेक्टॉनिक पॉवर शिफ्ट का दौर है. पहला दौर था आधुनिकता, विज्ञान, तकनीक, वाणिज्य, पूंजीवाद, कृषि और औद्योगिक क्रांति का, जिसे हम पश्चिम के अभुदय का दौर भी कह सकते हैं. दूसरा दौर बीसवीं शताब्दी में अमरीका के उत्थान का दौर था. और तीसरा यानि वर्तमान दौर है ‘राइज़ ऑफ द रेस्ट’ का जिसमें चीन और भारत अपने पास (और दूर भी) बडी शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं, रूस अधिक आक्रामक हो रहा है और बाज़ार तथा अर्थशास्त्र के क्षेत्र में यूरोप अधिक शक्तिशाली और अर्थपूर्ण ढंग से सक्रिय हो रहा है..
ज़करिया संस्मरणात्मक होते हुए लिखते हैं कि अस्सी के दशक में जब वे भारत आते तो पाते थे कि यहां के ज़्यादातर लोग अमरीका से अभिभूत थे. इस भाव के मूल में अमरीका का शक्तिशाली होना या कोई अन्य बौद्धिक कारण नहीं थे. अक्सर लोग उनसे, यानि ज़करिया से, डोनाल्ड ट्रम्प के बारे में पूछते क्योंकि वही अमरीका का प्रतीक था - चमकदार, अमीर और आधुनिक! ट्रम्प इस विचार का मूर्त रूप था कि अगर आप कुछ भी बडा करना या पाना चाहते हो तो अमरीका में ही कर या पा सकते हैं. लेकिन, आज, मनोरंजन की दुनिया को छोड दें तो अमरीकी व्यक्तित्वों में किसी की दिलचस्पी नहीं बची है. आप भारत के अखबार पढिए, यहां का टी वी देखिए. आप पाएंगे कि यहां के अनेक व्यापारी डोनाल्ड ट्रम्प से ज़्यादा अमीर हैं. आज भारतीयों के पास अपने अभिभूतकारी रियल एस्टेट धनपति हैं. और, जैसा भारत में हो रहा है, वैसा ही दुनिया के अधिकतर देशों में हो रहा है.

ज़करिया एक अहम बात यह कहते हैं कि यह ‘राइज़ ऑफ द रेस्ट’ अमरीकी विचारों और कृत्यों का ही परिणाम है. पिछले साठ सालों से अमरीकी राजनेता और राजनयिक दुनिया भर में मुक्त बाज़ार, मुक्त राजनीति तथा व्यापार और तकनीक के गठजोड की वकालत करते घूम रहे हैं. उसी का परिणाम है कि आज दुनिया के अनेक देश अमरीका के समकक्ष खडे हो गए हैं. सवाल यह है कि इस तेज़ी से बदलती जा रही, एक ध्रुवीय दुनिया में अमरीका की भूमिका क्या होगी? ज़करिया की सलाह है कि अमरीका को अपने हठधर्मी पूर्ण और आदेश देने वाले महाशक्ति के रूप को त्याग कर अन्य देशों से निकट और समानता के सम्बन्ध बनाने होंगे और उन्हें सलाह देनी होगी, उनसे सहयोग करना होगा, यहां तक कि उनसे समझौते भी करने होंगे. इस नई दुनिया में अमरीका की भूमिका एक वैश्विक दलाल की ही हो सकती है.

ज़करिया की एक बडी चिंता इस बात को लेकर है कि दुनिया के एक साथ कई देशों का विकास के पथ पर अग्रसर होना, और किसी नियंत्रक महाशक्ति का न होना, किसी बडे गडबडझाले का कारण हो सकता है. उनका कहना है कि आर्थिक वैश्वीकरण से विकास आता है और विकास के साथ ही आता है राष्ट्रवाद भी. राष्ट्रीय गर्व का यह भाव स्वभावत: सहयोग-भाव को घटाता है. और यही है आज की और कल की दुनिया की सबसे बडी विडम्बना और सबसे बडी चिंता. ज़करिया से इसका हल पूछें तो वे कहते हैं : हॉरिजॉण्टल, नॉट वर्टिकल; को-ऑपरेटिव, नॉट हायरार्किकल!


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Discussed book:
The Post-American World
By Fareed Zakaria
Published by: Norton, W.W. & Company, Inc.
Hardcover. 288 Pages.
US $ 25.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 22 मई 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, May 15, 2008

जाने क्या तूने कही, जाने क्या मैंने सुनी

पति पत्नी कार में कहीं जा रहे हैं. पत्नी पूछती है, “आप कॉफी के लिए कहीं रुकना चाहेंगे?” ”नहीं, धन्यवाद!” पति ईमानदारी से जवाब देता है और यात्रा जारी रहती है.
परिणाम? दरअसल पत्नी जो खुद कॉफी के लिए रुकना चाहती थी, यह सोच कर नाराज़ हो जाती है कि पति ने उसकी इच्छा का मान नहीं रखा. उधर, पत्नी को नाराज़ देख पति भी परेशान हो जाता है और समझ नहीं पाता कि पत्नी कॉफी पीना ही चाहती थी तो साफ-साफ क्यों नहीं बोली?

इस प्रकरण में पति तो यह नहीं समझ सका कि पत्नी ने जो पूछा था, उसका असल मक़सद पूछना नहीं, संवाद शुरू करना था, और पत्नी यह नहीं महसूस कर सकी कि पति ने जब कॉफी के लिए मना किया तो उसने महज़ अपनी पसन्द ज़ाहिर की थी, कोई हुक्म नहीं दिया था.
हम सब की ज़िन्दगी में अक्सर ऐसा होता है. जब स्त्री और पुरुष अपनी-अपनी तरह से भाषा को बरतते हैं तो उसकी परिणति एक दूसरे पर स्वार्थी और ज़िद्दी होने का इलज़ाम लगाने में होती है.

जॉर्ज़ टाउन विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान की प्रोफेसर और विख्यात समाज-भाषा वैज्ञानिक डेबोराह तान्नेन ने अपनी नई किताब यू जस्ट डॉण्ट अण्डर स्टैण्ड : वुमन एण्ड मेन इन कन्वर्सेशन में स्त्री और पुरुष द्वारा भाषा के इसी भिन्न व्यवहार पर गहन किंतु रोचक विमर्श किया है. उनका स्पष्ट मत है कि ज़्यादातर स्त्रियां बातचीत को सम्पर्क और संवाद के लिए प्रयोग करती हैं जबकि पुरुष इसका प्रयोग सामाजिक हैसियत अर्जित करने या बनाए रखने के लिए और ज्ञान देने के लिए करते हैं. डेबोराह ने स्त्रियों की बातचीत को निजी बातचीत (रैपो टॉक) और पुरुषों की बातचीत को सार्वजनिक बातचीत (रिपोर्ट टॉक) की संज्ञा दी है.
लेखिका ने अनेक उदाहरणों से यह समझाया है कि स्त्रियां सहेलियों और प्रेमियों से बात करके निकटता स्थापित करती हैं. वे अपनी समस्याओं का साझा भी करती हैं. लेकिन पुरुष प्राय: ऐसा नहीं करते. अगर स्त्री उनके सामने कोई समस्या रखती है तो वे तुरंत उसका समाधान पेश करते हैं. तब, स्त्री को लगता है कि पुरुष उसकी समस्या में रुचि नहीं ले रहा है. स्त्री को सुनने वाले की चाहना थी, न कि समाधान देने वाले की. तब, पुरुष शिकायत करता है कि स्त्री तो अपना ही रोना रोती रहती है, और समाधान में उसकी कोई रुचि नहीं है. पुरुष की इस शिकायत के मूल में है स्त्री की आधारभूत प्रकृति से उसका अपरिचय. खुद पुरुष किसी से अपनी समस्या की चर्चा तब तक नहीं करता जब तक कि उसे समाधान की ज़रूरत न हो.
इस बात के उदाहरण के रूप में डेबोराह लिखती हैं, “जब मेरी मां मेरे पिता से कहती हैं कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है तो मेरे पिता उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास चलने को कहते हैं. उनकी यह प्रतिक्रिया मेरी मां को अच्छी नहीं लगती. पिता समस्या का समाधान पेश करते हैं जबकि मां केवल उनकी सहानुभूति चाहती हैं.”

स्त्री और पुरुष भाषा की भिन्नता की खोज करते हुए डेबोराह ने लडके और लडकियों के खेलने के तौर-तरीकों का भी विश्लेषण किया है. वे बताती हैं कि लडके बडे समूहों में और प्राय: बाहर खेलने में रुचि रखते हैं. उनके समूह में एक पदानुक्रम भी होता है, यानि एक ग्रुप लीडर होता है जो सबको हुक्म देता है. लडकों के खेल-में हार-जीत भी होती है. इसके विपरीत, लडकियां अक्सर छोटे समूह में या जोडियों में ही खेलना पसन्द करती हैं और हरेक की कोई न कोई बेस्ट फ्रेंण्ड होती है. उनके यहां कोई आदेश नहीं दिए जाते. लडकियों के लिए निकटता महत्वपूर्ण होती है. उनके खेलों में हार-जीत भी नहीं होती. उनकी प्रकृति का यह अंतर उनकी संवाद शैली का भी निर्माण करता है.

लेखिका ने स्त्री और पुरुष संवादों की तह में जाकर खोजा है कि हर स्त्री अंतत: एक ही बात पूछती है: क्या तुम मुझे पसन्द करते हो? और इसी तरह हर पुरुष भी एक ही बात पूछता है: क्या तुम मेरा सम्मान करते/करती हो?

निष्कर्ष के रूप में डेबोराह सलाह देती हैं कि स्त्री-पुरुष दोनों को ही एक-दूसरे की संवाद शैली की मूलभूत भिन्नताओं को समझना चाहिए. जैसे, स्त्रियां जैसी बातें अपनी सहेलियों से करती हैं वैसी ही बातें अगर अपने पुरुष मित्रों से भी करेंगी तो यह उन्हें अपनी सहेली में तब्दील करने जैसा होगा. और इसी तरह, पुरुष को भी यह समझना चाहिए कि जब कोई स्त्री उससे मुखातिब है तो वह दर असल कुछ कह नहीं रही बल्कि अपने रिश्ते को मज़बूत करने की चेष्टा कर रही है. वे कहती हैं कि दोनों को किसी मध्य बिन्दु तक आने का प्रयास भी करना चाहिए. कुल मिलाकर, अगर स्त्री और पुरुष दोनों ही एक दूसरे से यह उम्मीद करना बन्द कर दें कि वे उन्हीं की तरह संवाद करेंगे तो ज़िन्दगी ज़्यादा खूबसूरत हो सकती है.
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Discussed book:
You Just Don’t Understand: Women and Men in Conversation
By Deborah Tannen
Published by Harper Collins Publishers
352 pp
US $ 13.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 15 मई 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, May 8, 2008

ये मेरा प्रेम पत्र पढकर.....

लाइफ पत्रिका के पूर्व सम्पादक बिल शापिरो को एक पुराना खत मिला. यह खत उस महिला का था, जिससे कभी वे डेटिंग किया करते थे. खत उस महिला को किसी ने तब लिखा था जब शापिरो उसकी ज़िन्दगी में नहीं आए थे. इस खत ने शापिरो को यह सोचने को प्रेरित किया कि किसी के लिए ऐसे खतों की क्या अहमियत हो सकती है, और क्यों ऐसा होता है कि कुछ लोग तो ताज़िन्दगी खतों को सीने से लगाए रहते हैं और कुछ उन्हें बिल्कुल भी महत्व नहीं देते! सोच का सिलसिला आगे बढा तो वे अपने मित्रों-परिचितों से उनके प्रेम-पत्र प्राप्त करने में जुट गए. अपनी तलाश को और भी विस्तार देते हुए उन्होंने लोगों के घरों की टाण्डों, अलमारियों, यहां तक कि उनके सिगार और शू बॉक्सेज़ तक़ को टटोल लिया. इस तरह उनके हाथ लगा विविध वर्णी, असल प्रेम पत्रों का एक बडा खज़ाना. इन खतों में थी सम्वेदनाओं की नाज़ुकी, रिश्तों की कमनीयता, अभिव्यक्ति की बेबाकी, मन का अपराध बोध, बेपनाह गुस्सा और भी न जाने क्या-क्या. लेकिन जो भी था, था बेहद ईमानदार क्योंकि ये खत केवल और केवल प्रेम करने वाले के लिए लिखे गए थे. इन सारे खतों में से चुनिन्दा खतों का खूबसूरत संकलन बिल शापिरो ने “अदर पीपुल्स लव लैटर्स: 150 लैटर यू वर नेवर मेण्ट टू सी” शीर्षक से प्रस्तुत किया है. ये खत एक बात तो यह साफ करते हैं कि आज का प्रेम केवल वरदान नहीं है. इन खतों के माध्यम से हम रिश्तों के एक ऐसे बडे कैनवस से रू-ब-रू होते हैं जिसमें उल्लास से लेकर अवसाद तक सब कुछ है. इन पत्रों को पढते हुए यह भी एहसास होता है कि हमारा समाज देह के पीछे किस हद तक पागल है, और यह भी कि इसका उसे अफसोस भी है.
किताब में जो सामग्री है, उसे खत कहने में थोडी उदारता बरतनी पड रही है, क्योंकि जो कुछ यहां प्रस्तुत किया गया है वह सब पारम्परिक अर्थ में खत नहीं है. कहीं किसी पोस्टकार्ड पर कुछ घसीट दिया गया है, तो कहीं किसी पोस्ट-इट नोट पर ही कुछ लिख दिया गया है. कहीं किसी कॉकटेल नैपकिन पर कुछ लिख दिया गया है तो कहीं वह भी न मिलने पर माचिस की डिबिया का ही इस्तेमाल कर लिया गया है. ये पत्र क्योंकि अत्यंत साधारण लोगों के हैं, इनमें से कई की लिखावट ऐसी है कि उसे पढने में खासा प्रयत्न करना पडता है. वर्तनी और व्याकरण की भूलों की कोई कमी नहीं है. लेकिन यही सहजता इन पत्रों को उन पत्रों से अलग करके आत्मीय बनाती है जो पेशेवर लोगों की किताबों में मिलते हैं. इन पत्रों का दर्द और पश्चाताप इतना असल और हृदयस्पर्शी है कि आपको लगता है, जैसे आपने ही इन्हें जिया और लिखा है.

इन पत्रों की कालावधि खासी लम्बी है. पुलिस चीफ पीटर जे डोर्टी का 22 दिसम्बर 1911 को ‘डियरेस्ट लिज़ी’ को लिखा पत्र हमें पीछे ले जाता है तो ई मेल, टेक्स्ट मैसेज और यहां तक कि ब्लॉग्ज़ भी, हमें आज के समय में ले आते हैं. इन अलग-अलग काल खण्डों के पत्र यह भी साफ करते हैं कि ई मेल जैसी नई तकनीक लिखने की कला पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है. शब्दों के सधे और कलात्मक प्रयोग का स्थान अब दो-टूक और सपाट अभिव्यक्ति ले रही है. एक मेल का यह अंश देखें : ‘आज मेरे मन में फिर से दुष्ट विचार आ रहे हैं. क्या तुम उनके बारे में जानना चाहोगी?’ किताब प्रेम के बदलते स्वरूप का परिचय देने के साथ-साथ इस बात से भी आह्लादित करती है कि प्रेम के आरम्भिक दिनों का माधुर्य अगर बाद तक भी बना रहता है तो कितना प्रीतिकर हो जाता है. किताब में लम्बे समय से विवाहित कुछ युगलों के पत्र इस बात का एहसास कराते हैं. इसी तरह 1969 में वियतनाम से लिखा गया एक सैनिक का पत्र अपनी मार्मिकता में विलक्षण है.

शापिरो खतों को जस-का तस प्रस्तुत करके ही नहीं रुक गए हैं, उन्होंने इन पत्र लेखकों में से अनेक से बात करके यह भी जाना और बताया है कि बाद में उनके सम्बन्धों की परिणति क्या हुई. किताब का एक बडा आकर्षण इस बात में है कि इन सारे पत्रों को यहां उनके मूल रूप में, छाया के रूप में, प्रस्तुत किया गया है. इसलिए इन्हें पढने के साथ देखने का भी अनुभव जुड जाता है. हम सलवटों से भरे कागज़, मुडे-तुडे नैपकिंस, कीडे-मकोडों जैसी हस्त लिपि, फैली स्याही – इन सबसे बावस्ता होते हुए, यह जानते हुए भी कि दूसरों की निजी ज़िन्दगी में झांकना शालीनता के खिलाफ हैं, ऐसा करके स्वयं को समृद्ध करते हैं.

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Discussed book:
Other People’s Love Letters: 150 Letters You Were Never Meant to See
By Bill Shapiro (Editor)
Published by: Crown Publishing Group
192 Pages, Hardcover
2007.


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 08 मई 2008 को प्रकाशित.








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Thursday, May 1, 2008

वैज्ञानिक प्रयोग भी खूबसूरत होते हैं

महाकवि कीट्स ने कहा था, सौन्दर्य सत्य है, और सत्य ही सौन्दर्य है. विश्व के अनेक बडे वैज्ञानिकों ने भी अपने कार्य द्वारा इस कथन को पुष्ट किया है. ब्रिटेन के सुविख्यात क्वांटम सिद्धांतकार डिराक ने शायद इसीलिए अपने कार्य को ‘खूबसूरत गणित की खोज’ कहा था. अनेकानेक वैज्ञानिक सौन्दर्यशास्त्री समीकरणों और तथ्यों के सुन्दर संयोजन पर मुग्ध होते रहे हैं. कुछ अन्यों ने शोधकर्म में ही सौदर्य के दर्शन किए हैं. ऐसे ही अन्यों की सूची में एक नाम और जुडा है. यह नाम है न्यूयॉर्क टाइम्स के विज्ञान लेखक जॉर्ज जॉनसन का. जॉर्ज की सद्य प्रकाशित किताब ‘द टेन मोस्ट ब्यूटीफुल एक्सपरीमेण्ट्स’ जैसे कीट्स के उपरोक्त कथन का ही विस्तार है. यहां जॉर्ज ने आधुनिक विज्ञान के चार शताब्दियों के इतिहास को खंगाल कर परिकल्पना की साहसिकता, सामग्री के संयोजन, व्याख्या की गहनता और परिणामों की महत्ता की खूबसूरती को चिह्नित किया है.

जॉर्ज ने इस किताब की प्रस्तावना में लिखा है कि उन्होंने जान बूझकर ऐसे प्रयोगों को चुना है जो आज के औद्योगिकृत, विशाल, अरबों-खरबों डॉलर के खर्च, ढेरों-ढेर उपकरणों और किसी कॉर्पोरेशन के आकार वाली वैज्ञानिकों की बडी टीम के द्वारा किए जाने वाले प्रयोगों के काल से पहले के हैं. जॉर्ज अपने पाठक को उस काल में ले जाते हैं जब दुनिया को रहस्यपूर्ण शक्तियों से परिपूर्ण माना जाता था और वैज्ञानिक भी प्रकाश और विद्युत से चमत्कृत हो जाता था. इसके बाद जॉनसन हमें वैज्ञानिकों की उस पुरातन दुनिया में ले जाते हैं जहां कोई अकेला शोधकर्ता घर में ही बनाए गए उपकरण, या उसके भी बगैर, ज्ञान के दरवाज़े पर दस्तक दिया करता था. कुछ उदाहरण देखिए: न्यूटन का इन्द्रधनुष, पावलोव के कुत्ते या फिर एण्टोइन-लॉरेण्ट द’ लेवोइज़ियर की यह खोज कि ऑक्सीजन एक तत्व है. इस तरह के सादगी से किए गए प्रयोगों का बखान कर जॉनसन हमें उस दुनिया से मिलाते हैं जिसमें सारी शोध बेहद व्यावहारिक हुआ करती थी. वे कहते हैं कि ‘विज्ञान की महानतम खोजें अज्ञात से टकराने वाले एकल मस्तिष्कों की देन है.’ जॉनसन की इस किताब का हर वैज्ञानिक किसी न किसी अज्ञात की खोज करता है.

अपनी इस किताब के लिए जॉनसन ने दस ऐसे वैज्ञानिकों और उनके प्रयोगों को चुना है जिन्होंने अपनी तार्किकता, स्पष्टता और साक्षातता के दम पर अपने समय की हठवादिता को धराशायी किया. इस किताब में सुविख्यात और कम ख्यात या अलक्षित रह गए, दोनों तरह के प्रयोग हैं. पहला अध्याय ढाल पर से गेंदों को लुढका कर गति का अध्ययन करने वाले गैलिलियो के उस प्रयोग के बारे में है जिसे आधुनिक विज्ञान का संस्थापक प्रयोग माना जाता है. एक अन्य अध्याय आइज़ैक न्यूटन द्वारा रंगों की प्रकृति का अध्ययन करने के लिए प्रिज़्म का प्रयोग करने के बारे में है. एक अध्याय है विद्युत की व्याख्या करने वाले लुइगी गालवानी के बारे में. एक अन्य अध्याय में एडवर्ड मॉर्ले के साथ मिलकर प्रकाश की सतत गति निर्धारित करने वाले एल्बर्ट मिचेलसन के काम का विवरण है. एक अध्याय है कुत्तों वाले सुविख्यात प्रयोग द्वारा शरीर विज्ञान और स्नायु विज्ञान को गति प्रदान करने वाले इवान पावलोव के बारे में.

किताब इस सवाल पर भी विचार करती है कि वह क्या चीज़ है जो किसी वैज्ञानिक प्रयोग को सुन्दर बनाती है. कहना अनावश्यक है, जॉनसन सादगी के पक्षधर हैं. उन्हें वह प्रयोग सुन्दर लगता है जो सीधा-सादा किंतु कलात्मक हो. लेकिन केवल इतना ही नहीं. यह और कि ऐसा प्रयोग जो साधारण व्याख्याओं के ज़रिए बद्धमूल धारणाओं को ध्वस्त भी करता हो. जैसे, गैलिलियो ने सारे पदार्थों की गति पर समान गणित लागू कर अरस्तू के इस विचार को ध्वस्त किया कि भारी पदार्थ अधिक तीव्र गति से गिरते हैं. इसी तरह विलियम हारवे ने प्रचलित धारणा को तोडते हुए यह स्थापित किया कि पूरे शरीर में एक ही तरह का रक्त संचारित होता है. न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि रंग अपवर्तित प्रकाश किरणें मात्र हैं, जबकि उनसे पहले दकार्ते इन्हें ‘ईथर की घूमती गोलिआओं’ जैसी जटिल चीज़ घोषित कर चुके थे, और इसे आम स्वीकृति हासिल थी.

जॉनसन ने यह स्वीकार किया है कि इस किताब के लिए दस प्रयोगों का उनका चयन मनमाना है, लेकिन अपनी सफाई में उन्होंने यह भी कहा है कि इन सारे प्रयोगों को उन्होंने एक तो इनकी सादगी की वजह से और दूसरे इस वजह से कि ये विज्ञान के आधारभूत क्षेत्रों की पडताल करते हैं, चुना है. जॉनसन यह भी चाहते हैं कि उनके पाठक भी प्रयोगों की इस सूची में अपनी-अपनी पसन्द के प्रयोग जोडें.

जॉनसन का निष्कर्ष है कि वे वैज्ञानिक जिन्होंने दुनिया की जटिलताओं को समझ कर उनकी साफ-सुथरी व्याख्याएं कीं वे प्राचीन यूनान और रोम के उन वैज्ञानिकों के समतुल्य हैं जिन्होंने पत्थरों के ढेरों का अध्ययन कर भवन निर्माण के आधारभूत सिद्धांत बनाए. जॉनसन बहुत कुशलता से विज्ञान की खूबसूरती को रेखांकित करते हैं.

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Discussed book:
The Ten Most Beautiful Experiments
By George Johnson
Knopf Publishing Group
208 pp. Hardcover
US $ 22.95


राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 1 मई 2008 को प्रकाशित.









Thursday, April 17, 2008

एक सफल स्टार की करुण कथा

माय फेयर लेडी, साउण्ड ऑफ म्यूज़िक और मेरी पॉपिंस की स्टार जूली एण्ड्र्यूज़ को सब जानते हैं, लेकिन जिन ऊबड-खाबड राहों पर चलकर वे इन शिखरों तक पहुंची वे तो अब तक अजानी ही थीं. जूली एण्ड्र्यूज़ ने बच्चों के लिए कई किताबें भी लिखी हैं. कुछ अकेले और कुछ अपनी बेटी के साथ मिलकर. उनके लिखे को खूब सराहा भी गया है. वे नियमितता से डायरी भी लिखती रही हैं. उन्हीं के आधार पर रचित होम: ए मेमोयर ऑफ माय अर्ली ईयर्स शीर्षक अपनी सद्य प्रकाशित आत्मकथा में उन्होंने 1935 में अपने जन्म से प्रारम्भ कर 60 के दशक के मध्य में फिल्मी दुनिया में धमाकेदार दस्तक के बाद वाल्ट डिज़्नी के साथ जुडने तक की जीवन यात्रा को प्रस्तुत किया है. वाल्ट डिज़्नी ने ही उन्हें 1963 में मेरी पॉपिंस में काम करने का अवसर दिया था.
जूली की इस आत्मकथा का प्रारम्भ 1935 के इंग्लैण्ड से होता है जहां सरे नामक छोटे किंतु रमणीय गांव में कला क्षेत्र में स्थान बनाने की अभिलाषी मां बारबरा और सामान्य से लोहार-सुथार पिता टेड वेल्स के घर जूली का जन्म होता है. जूली का खूबसूरत बचपन आगे बढ पाता उससे पहले ही उसके मां-बाप में तलाक हो जाता है. कारण यह कि मां अपनी संगीत यात्राओं के साथी टेड एंड्र्यूज़ से प्यार करने लगती है. और अंतत: उससे विवाह कर लेती है. उनका परिवार सरे से लंदन आ जाता है और युद्धोत्तर लन्दन में हवाई हमलों की दहशत के बीच बडी होती है जूली. सौतेले पिता के साथ मां को भी म्यूजिकल थिएटर में अपनी कला प्रदर्शित करने का मौका मिलता है. नए पिता जूली को भी संगीत सीखने को प्रेरित करते हैं और उसी दौरान यह पता चलता है कि जूली की आवाज़ विलक्षण है. 12 साल की छोटी वय में तो उसे रॉयल कमाण्ड पर्फोर्मेंस में युवतम एकल गायिका होने का सम्मान मिल जाता है. जूली लिखती हैं कि जब वे गाना शुरू करतीं तो लगता कि जैसे कार्यक्रम वहीं थम जाता और लोग खडे होकर तालियां बजाने लगते. तालियां थमने का नाम ही नहीं लेतीं. इसी काल में जब वह करीब 15 साल की है उसकी मां यह रहस्योद्घाटन करती है कि उसके पिता उसके जैविक पिता नहीं थे. स्वाभाविक है कि उसे गहरा सदमा पहुंचता है. यही वह समय है जब जूली को कुछ समय लन्दन के स्लम्स में भी रहना पडा क्योंकि उसके मां बाप की आय बहुत सीमित थी. लेकिन जैसे-तैसे खुद को सम्भाल वह अपनी कला-साधना जारी रखती है और किशोरावस्था की देहली पर पहुंचते-पहुंचते तो वह अपनी स्टेज पर्फॉर्मेंस से पूरे परिवार का भरण पोषण तक करने लग जाती है. इस किशोरावस्था में जूली को कुछ ग्लैमरपूर्ण भूमिकाएं अदा करने का भी अवसर मिलता है, लेकिन विडम्बना यह कि जब वह ये भूमिकाएं अदा करती, उसके मोजे प्राय: फटे होते थे.

जब जूली 18 साल की होती है, उसे लन्दन पैलेडियम में एक पैंटोमाइम प्रस्तुत करने का मौका मिलता है और यह मौका उसके लिए ब्रॉडवे की एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति द बॉयफ्रैण्ड में एक महत्वपूर्ण भूमिका दिलाने का साधन बन जाता है. इसी से शुरू होता है उसका म्यूज़िकल कॉमेडी वाला दौर. इसके बाद तो रैक्स हैरिसन के साथ माय फेयर लेडी में काम करना जैसे दूर नहीं रह जाता है. लेकिन जूली माय फेयर लेडी की शूटिंग के दौरान रेक्स हैरिसन के लगभग अमानवीय व्यवहार को भी याद करना नहीं भूलती. वह रिचर्ड बर्टन के उस प्रणय निवेदन का भी ज़िक्र करती है, जिसे उसने करीब-करीब स्वीकार कर ही लिया था, बावज़ूद इस बात के कि तब उसने अपने बचपन के दोस्त टोनी वाल्टन से शादी की ही थी. किताब के अनेक मार्मिक प्रसंगों में से एक है प्रख्यात छायाकर सेसिल बीटन का प्रसंग. सेसिल घण्टों जूली का फोटो सेशन करता है और अंत में यह कहते हुए अपनी ही कला पर मुग्ध होता है कि जूली कितनी अनफोटोजीनिक है!
जूली का यह आत्मकथात्मक वृत्तांत खत्म होता है ऑस्कर विजेता फिल्म मेरी पॉपिंस में उसके डेब्यू के साथ. लेकिन इससे पहले हमारे सामने एक लगभग साधारण युवती की ऐसी दारुण कथा उभरती है जिसके मनमौजी कण्ठ को असमय ही प्रौढ हो जाना पडा था (क्या आपको लता याद आती हैं?) और जिसे बेफिक्रे बचपन को भुलाकर एक संघर्ष भरी और जटिल पारिवारिक ज़िन्दगी का वरण करना पडा था (याद कीजिए रेखा को!) जूली से उसके एक विश्लेषक ने, जिसे किताब में कई बार उद्धृत किया गया है, एक बार पूछा था कि अपने मां बाप में से किससे उसे अधिक नफरत है? जूली ने बहुत कुशलता से इस सवाल को टाल दिया था. यह वृत्तांत पढते हुए लगता है कि वह किसका नाम लेती? मां बाप का तलाक, बचपन में ही स्टेज पर धकेल दिया जाना, पिता से जुदाई, मां का दुर्व्यवहार और उसका शराबी बन जाना, सौतेले पिता द्वारा की गई पिटाइयां और यदा-कदा उनके यौनिक दुर्व्यवहार - ये सब ऐसे आघात हैं जिनकी टीस उसे साठ बरस बाद भी महसूस होती है.
यह वर्णन पढते समय ही हम उस भ्रम जाल से भी निकलते हैं जो जूली की बाद की वैभवपूर्ण ज़िन्दगी को देख हमारे मन में निर्मित होता है. इस वृत्तांत को पढकर एहसास होता है कि चन्द खुशकिस्मतों को छोड दें तो दुनिया में शायद ही ऐसा कोई मिले जिसे गरीबी, मौत, भूख, युद्ध, परिवार आदि के झंझटों में से किसी न किसी से न जूझना पडा हो.
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Discussed book:
Home: A Memoir of My Early Years
By Julie Andrews
Published by: Hyperion
Hardcover, 320 pages
US $ 26.95

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 17 अप्रेल 2008 को प्रकाशित.







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Thursday, April 10, 2008

प्रयास पूर्व और पश्चिम के संघर्ष को समझने का

पीपुल्स एण्ड एम्पायर्स और यूरोपियन एन्काउण्टर्स विद द न्यू वर्ल्ड जैसी बहु प्रशंसित-चर्चित किताबों के लेखक, ब्रिटिश इतिहासकार एंथनी पग्डेन की ताज़ा किताब वर्ल्ड्स एट वार: द 2500 ईयर स्ट्रगल बिटवीन ईस्ट एण्ड वेस्ट लगभग साढे छह सौ पन्नों में सभ्यताओं के संघर्ष के ढाई हज़ार वर्षों के इतिहास की पडताल का विचारोत्तेजक प्रयास है.

किताब का प्रारम्भ उस प्राचीन विश्व के वर्णन से होता है जहां यूनान फारसी साम्राज्य के विरुद्ध अपने पहले संघर्ष को आज़ादी और गुलामी के, प्रजातंत्र और राजशाही के तथा वैयक्तिकता और ईश्वर के रूप में मनुष्य की पूजा के संघर्ष के रूप में देखता है. इसके बाद पग्डेन की कथा उस रोम में प्रवेश करती है जहां नागरिकता और नियामक कानून की आधुनिक अवधारणाओं ने जन्म लिया. बकौल पग्डेन, रोम के नेता अपने विजितों को स्वाधीन मानते थे, जबकि पूर्व में विजित विजेता की सम्पत्ति माने जाते थे. पग्डेन इसाई धर्म के जन्म और पश्चिम द्वारा उसे शासन का औज़ार बनाने का भी नाटकीय वर्णन करते हैं. दरअसल यहीं से धर्म निरपेक्ष और शेष ताकतों के बीच उस संघर्ष की शुरुआत होती है जो अब भी चल रहा है. इसके बाद आता है इस्लाम. और फिर पूर्व और पश्चिम के धार्मिक विश्वासों में टकराहट बढती जाती है.
और फिर होती है चर्चा प्रथम विश्व युद्ध की. पग्डेन कहते हैं कि इसके अनेक छद्म उद्देश्यों में से एक था ताकत के बल पर मुस्लिम दुनिया को नए रूपाकार में ढालना. और आज तो पश्चिम, पूर्व पर अपनी तरह का प्रजातंत्र और अपनी तरह की धर्म निरपेक्षता थोपने के लिए प्रयत्नरत है. एक चेतावनी के साथ लेखक अपनी बात समेटता है: आतंकवाद और युद्ध तब तक खत्म नहीं होंगे जब तक कि धार्मिकता और धर्मनिरपेक्षता की अवधारणाएं साफ नहीं हो जातीं.
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1798 में जब नेपोलियन बोनापार्ट ने अपनी सेनाओं के साथ मिश्र में प्रवेश किया तो उसके मन में केवल सैन्य विजय का ही भाव नहीं था. तीस हज़ार सैनिकों के अलावा उसके साथ एक चल विश्वविद्यालय भी था जिसमें अर्थशास्त्री, कवि, वास्तुकार, खगोलशास्त्री यहां तक कि पेरिस ऑपेरा के गायक तक थे. इनके अलावा था हज़ारों किताबों का एक पुस्तकालय जिसमें मांटेस्क्यू, रूसो, मांतेन, वाल्टेयर और पश्चिमी धर्म-विधान के सारे क्लैसिक थे.
इसके लगभग दो शताब्दी बाद, 1971 में ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी ने एक प्राचीन फारसी महल के प्रांगण में विदेशी गणमान्य लोगों के लिए दो हज़ार मिलियन डॉलर खर्च कर एक शानदार जश्न आयोजित किया. मक़सद था शाह को महान डेरियस और ज़ेरेक्स का वंशज सिद्ध करना.
इन दोनों प्रसंग के ज़रिए पग्डेन यह बताना चाहते हैं कि नेपोलियन और शाह, जो क्रमश: पश्चिम और पूर्व के प्रतिनिधि हैं, खुद को अपने-अपनी स्वर्णिम सभ्यताओं का वारिस मानते हैं. लेकिन, पग्डेन यह बताना भी नहीं भूलते कि दोनों में ही कुछ विलक्षणताएं भी हैं. स्विटज़रलैण्ड में शिक्षित शाह आधुनिकीकरण के धर्म निरपेक्ष समर्थक थे. जबकि नेपोलियन ने महज़ स्थानीय मौलवियों को खुश करने के लिए मिश्रियों के समक्ष यह घोषित किया कि वह पैगम्बर मुहम्मद साहब और पवित्र कुरान का आराधक है.
किंवदंतियों, प्रसंगों और प्रभावशाली वृत्तांत के माध्यम से महज़ बारह अध्यायों में ढाई हज़ार वर्ष का इतिहास समेटते हुए पग्डेन नीरस इतिहास को जीवंत बनाने में कोई कसर नहीं छोडते. लेकिन इस रोचकता के बीच भी सजग पाठक यह लक्षित किए बगैर नहीं रहता कि जिसे हेरोडोटस ने स्थायी शत्रुता कहा था, उसे पश्चिम और पूर्व के बीच स्थापित करने के प्रयास में पग्डेन चीन, जापान, सुदूर पूर्व और भारत की करीब-करीब अनदेखी कर जाते हैं. दूसरे शब्दों में उनका पूर्व इस्लामी समाज तक सिमट कर रह गया है.
एक और बात यह महसूस होती है कि यह किताब पूर्व और पश्चिम बीच कम, धर्म और एनलाइटनमेण्ट के बीच टकराव की कथा अधिक है, और उसमें भी लेखक के निशाने पर इस्लाम का वह अंश है जो चर्च और राज्य के बीच दूरी की पश्चिमी सोच से असहमति रखता है. पग्डेन ओसामा बिन लादेन को यह कहते हुए उद्धृत करते हैं कि पश्चिम का सबसे बडा अपराध यही है कि वह धर्म को अपनी राजनीति से अलग रखता है. पग्डेन मानते हैं कि अधिकांश मुस्लिम धर्मशास्त्री और न्यायविद इस बात से सहमत हैं. लगता तो यह भी है कि पग्डेन की इस्लाम की समझ उन मुल्ला-मौलवियों के कहे तक महदूद है जो हिंसा का समर्थन करते हैं.
एक और महत्वपूर्ण बात यह भी कि किताब पूर्व को ‘सभ्य और आधुनिक’ बनाने के पश्चिम के सुदीर्घ और असफल किंतु हास्यास्पद प्रयासों को सामने ले आती है. निश्चय ही यह लेखक के अनचाहे ही हो गया है.
अपनी इन सीमाओं के बावज़ूद किताब खासी रोचक और विचारोत्तेजक है. लेखक से इस बात पर तो सहमत होना ही पडता है कि पूर्व और पश्चिम के बीच बडा अंतर तो मूल्यों और संस्कृति का है, न कि अधिनायकवाद बनाम प्रजातंत्र का, या धार्मिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का, या मुस्लिम बनाम इसाई का.
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Discussed book:
Worlds at War: The 2,500-Year Struggle between East and West
By: Anthony Pagden
Published by: Random House
Hardcover, 656 pages
US $ 35.00

राजस्थान पत्रिका के नगर परिशिष्ट जस्ट जयपुर में मेरे साप्ताहिक कॉलम वर्ल्ड ऑफ बुक्स के अंतर्गत 10 अप्रेल, 2008 को प्रकाशित.







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Tuesday, April 8, 2008

स्वयंप्रकाश : साढे तीन दशक का दोस्ताना

तारीख और साल ठीक से याद नहीं, लेकिन मंज़र ज्यों का त्यों मन के पर्दे पर अंकित है. मैं चित्तौड कॉलेज में हिन्दी प्राध्यापक था. एक दिन (अनुमान करता हूं कि '70 के आसपास की बात है) किसी ने घर की कॉल बैल बजाई. देखा, धर्मेन्द्र जैसा एक युवक है. सदाशिव श्रोत्रिय का घर तलाश रहा था. मैं भी कॉलेज में पढाता हूं इस कारण मेरे घर की घण्टी बजा दी. सदाशिव जी उसी कॉलेज में अंग्रेज़ी पढाते थे, और पास ही रहते थे. दिल के तो और भी ज़्यादा पास. मकान का पता बताने के सिलसिले में जाना कि पता पूछने वाला युवक स्वयंप्रकाश हैं. स्वयंप्रकाश के नाम से मैं सदाशिव श्रोत्रिय के कारण ही अधिक परिचित था तब तक, हालांकि स्वयंप्रकाश एक लेखक के रूप में खासे ख्यात हो चुके थे. उसी शाम सदाशिव जी ने हमें भी अपने घर बुला लिया और तब पहली बार ठीक से स्वयंप्रकाश से मुलाक़ात हुई. उस शाम स्वयंप्रकाश ने सदाशिव जी के घर के बाहर वाले चौक में बहुत सारे गीत-गज़ल सुनाए. रात भी है कुछ भीगी-भीगी, चांद भी है कुछ मद्धम मद्धम आज भी जब सुनता हूं तो मुझे लता मंगेशकर की बजाय स्वयंप्रकाश की आवाज़ में ही सुनाई पडता है. उस शाम और रात स्वयंप्रकाश ने बहुत सारी चीज़ें सुनाई. शायद मेहदी हसन की गाई कुछ गज़लें, किशोर कुमार के कुछ गीत, गोपाल सिंह नेपाली की एक कविता...
1974 में मेरा तबादला चित्तौड से सिरोही हो गया. सदाशिव श्रोत्रिय का बहुत प्यारा साथ छूट गया. बल्कि यों कहूं कि चित्तौड छोडने से बडा दर्द सदाशिव जी के सान्निध्य से वंचित होने का था, तो ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं होगी. लेकिन नौकरी तो नौकरी है. अनमने मन से सिरोही आना पडा. जैसे तैसे व्यवस्थित हुए. अच्छा भी लगने लगा. इतना कि नौकरी और उम्र के कोई 25 साल उस कस्बे में गुज़र गए. लेकिन वह तो अलग किस्सा है. पता चला कि स्वयंप्रकाश पास ही के कस्बे सुमेरपुर में, जो सिरोही से महज़ 40 किलोमीटर की दूरी पर है, टेलीफोन विभाग में आर एस ए पद पर कार्यरत है. उन दिनों टेलीफोन आज की तरह आम नहीं खास था. टेलीफोन किसी आपात स्थिति में ही किया जाता था. खैर. स्वयंप्रकाश से सम्पर्क हुआ. कभी हम दोनों, बल्कि हमारे दोनों बच्चों को भी तो याद करें, चारों सुमेरपुर चले जाते, और कभी स्वयंप्रकाश सिरोही आ जाते. मेरा किराये का घर ऐसी जगह था कि मुम्बई से सुमेरपुर की तरफ जाने वाले वाहन ऐन मेरे घर के सामने से ही गुज़रते. तो अक्सर ऐसा होता कि स्वयंप्रकाश सुमेरपुर से किसी ट्रक में बैठ कर मेरे घर के सामने उतरते, या मैं, घर के बाहर ही खडा होकर किसी ट्रक को हाथ देकर रुकवाता, और सुमेरपुर जा पहुंचता. हम लोगों ने स्कूटर खरीद लिया तो जब भी मन करता स्कूटर उठाते और सुमेरपुर जा पहुंचते. दोस्ती धीरे-धीरे परवान चढने लगी. चालीस किलोमीटर की दूरी जैसे कोई दूरी थी ही नहीं. जवानी भी तो थी. हमारी भी, स्वयंप्रकाश की भी.
उन दिनों न जाने कितनी बार स्वयंप्रकाश के साथ हमने अपने शांति नगर के उस छोटे-से घर के और भी छोटे कमरे में गीत-संगीत की महफिलें सजाईं. सिरोही के दोस्त जब भी इसरार करते, हम स्वयंप्रकाश को आवाज़ देते, और वे फौरन से पेश्तर चले आते. अपने उस छोटे-से कमरे में हमने स्वयंप्रकाश से उनका बहुत प्यारा गीत आज एक लडकी को नींद नहीं आएगी न जाने कितनी बार सुना है. उनकी अनेक क्रांतिकारी किस्म की कविताएं और भी बहुत सारी कविताएं, और कहानियां भी. नीलकांत का सफर को वे जिस बेहतरीन अन्दाज़ में सुनाते हैं, उसका तो कहना ही क्या. और मेहदी हसन, गुलाम अली, जगजीत की बेशुमार गज़लें. तब तक मैं भी साहित्य से अधिक गहराई से जुडने लगा था. और आज यह निस्संकोच स्वीकार करना चाहूंगा कि इस जुडाव में स्वयंप्रकाश की बहुत बडी भूमिका थी. उन्होंने मेरे साहित्य के संस्कारों को और संवारा. साहित्य में विचारधारा के महत्व से परिचित कराया. और आज मेरा जुडाव प्रगतिशील विचारधारा से है तो इसका सारा श्रेय स्वयंप्रकाश के उन दिनों के साथ को है.
उन दिनों मेरे कॉलेज का हिन्दी विभाग भी बहुत सक्रिय था. हमने अनेक बार स्वयंप्रकाश को अपने विभाग के और कॉलेज के कर्यक्रमों में बुलाया. अक्सर बिना किराया तक दिये. पारिश्रमिक की तो बात ही क्या कीजिये. आज यह बात अजीब भी लगती है और मुझे लगता है कि यह मेरी मूर्खता भी थी. लेकिन थी, और की. स्वयंप्रकाश ने ऐसी मूर्खता करने की भरपूर छूट मुझे दी, और मैंने ली. उनसे भाषण करवाये, कविताएं सुनीं, पुरस्कार वितरित कराए. क्या-क्या नहीं किया. उन दिनों (अब स्वर्गीय) एम. के. भार्गव मेरे प्रिंसिपल थे. वे भी स्वयंप्रकाश से बहुत आत्मीयता रखते. अगर कुछ दिन बीत जाते तो खुद ही पूछ लेते कि क्या बात है स्वयंप्रकाश नहीं आए, और मैं संकोच से बताता कि आए तो थे, तो नाराज़ होते कि मिलवाया क्यों नहीं. अगर मेरे कॉलेज में कुछ भी खास होता तो स्वयंप्रकाश दौडे चले आते. मुझे याद आता है कि एक बार मैंने अपने कॉलेज में एम एस सथ्यु की अद्भुत फिल्म ‘गरम हवा’ का प्रदर्शन किया था. उससे अगले ही दिन स्वयंप्रकाश हमारे यहां आए. मैंने उनसे इस फिल्म का ज़िक्र किया तो वे भी इसे देखने को व्याकुल हो उठे. तब मैंने अपने कॉलेज के स्टाफ रूम में, रविवार के दिन खुद प्रोजेक्टर चला कर उन्हें वह फिल्म दिखाई. मज़े की बात यह कि हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक स्वयंप्रकाश खुद तब तक हिन्दी के एम ए नहीं थे. लगभग उन्हीं दिनों उन्होंने यह इरादा किया कि वे हिन्दी में एम ए करेंगे. मेरे ही सिरोही कॉलेज से उन्होंने प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में हिन्दी में एम ए किया. उन दिनों हमारे कॉलेज की लाइब्रेरी, खास तौर पर उसका हिन्दी खण्ड ऐसा था कि शायद पूरे राजस्थान में अन्यत्र कहीं नहीं था. स्वयंप्रकाश ने उसका भरपूर उपयोग किया. सिरोही एक छोटा-सा कस्बा था और अब भी है. वहां कुछ भी आपका निजी नहीं होता. स्वयंप्रकाश मेरे दोस्त हैं, यह सबको पता था. इस हद तक कि मेरी मां का निधन हुआ तो कॉलेज से, बिना मेरे कहे, मेरे ऑफिस सुपरिनटेण्डेण्ट मोहम्मद शब्बीर खान ने स्वयंप्रकाश को फोन कर यह सूचना दे दी, और स्वयंप्रकाश भी सुमेरपुर से सीधे सिरोही के श्मसान पहुंच गये. मुझे आज भी याद है, स्वयंप्रकाश के गले लगते ही मेरी रुलाई फूट पडी थी, जो तब तक अवरुद्ध ही थी.
दोस्ती के उन शानदार दिनों में स्वयंप्रकाश के अनेक मित्रों से भी हमारी दोस्ती हुई. शिवगंज (सुमेरपुर का जुडवां कस्बा) के सुपरिचित डॉक्टर एस पी पुरोहित से दोस्ती हुई, जो अब तक बरकरार है. सुमेरपुर में अंग्रेज़ी की अध्यापिका मंजु पाल से जो दोस्ती और पारिवारिकता उस वक़्त हुई वह समय के साथ और मज़बूत हुई है और मंजु आज भी हमारे परिवार की सदस्य बनी हुई है. दोस्ती के उन्हीं दिनों में स्वयंप्रकाश ने शादी भी की. पत्नी और मैं उनकी शादी में शरीक हुए. उनकी बारात में उनकी बहनों ने जो शानदार डांस किए उनकी स्मृति और साथ ही यह स्मृति भी कि जाने-माने कवि नन्द भारद्वाज को भी मैंने उसी अवसर पर नाचते देखा था, अब भी आह्लादित करती है. इसके बाद तो जितनी आत्मीयता स्वयंप्रकाश से थी उतनी ही उनकी पत्नी रश्मि से भी हो गई. सुमेरपुर जाकर उनका आतिथ्य ग्रहण करना हमारे लिए सदैव आकर्षण का विषय रहता, और हम बार-बार जाते. वे लोग भी इसी तरह हमारे यहां आते और हमारी ज़िन्दगी को खुशनुमा बनाते. उसी दौर में स्वयंप्रकाश को लगा कि उसने एम ए तो कर ही लिया है, अब हिन्दी में ही पी-एच डी भी कर ली जाए. मैंने अपने गुरु डॉ कृष्ण कुमार शर्मा जी से बात की तो उन्होंने सहर्ष अपनी सहमति प्रदान कर दी, और इस तरह मित्र स्वयंप्रकाश मेरे गुरु-भाई भी हो गए. हंसते-खेलते उन्होंने अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाने का अधिकार भी अर्जित कर लिया. हंसते-खेलते इसलिए कि जो विषय उन्होंने चुना था ‘राजस्थान की हिन्दी कहानी’ उस पर उनका ज्ञान, अध्ययन और समझ उन्हें डी लिट्ट भी दिला सकती थी. डॉ कृष्ण कुमार शर्मा ने स्वयंप्रकाश को एक लेखक वाला मान देकर पी-एच डी कराई – यह बात मैं कभी नहीं भूलूंगा. वैसे, इससे उनकी विशाल हृदयता के साथ-साथ उनकी गुण ग्राहकता भी प्रमाणित होती है.
हिन्दी में एम. ए. और फिर पी-एच डी कर लेने के बाद स्वयंप्रकाश को लगने लगा कि उन्हें टेलीफोन विभाग की छोटी-सी दुनिया से बाहर निकलना चाहिए. और जल्दी ही वे निकल भी गए. हिन्दुस्तान ज़िंक में राजभाषा अधिकारी बन कर वे सुमेरपुर से और हमसे दूर चले गए. उदयपुर, जावर माइंस, सर्गीपल्ली(उडीसा) चन्देरिया-चित्तौडगढ वगैरह जगह-जगह घूमते रहे. जब वे सर्गीपल्ली थे उन्हीं दिनों श्रीमती गांधी की हत्या हुई थी. स्वयंप्रकाश ने उन उथल पुथल भरे और अमानवीय दिनों में अपनी एक रेल यात्रा का वर्णन करते हुए मुझे एक लम्बा पत्र लिखा था, बाद में इसी अनुभव पर उन्होंने अपनी एक अमर कहानी लिखी – क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है. इन अनेक जगहों पर जाने से उनका अनुभव संसार और अधिक समृद्ध हुआ. सर्गीपल्ली को छोडकर सभी जगह हम उनके घर गए. जावर माइंस में उनके घर जाकर एक खास अनुभव हुआ, जो बाद में मेरे भी खासा काम आया.
जावर माइंस में हम उनके ड्राइंग रूम में बैठे थे. उनके एक सहकर्मी दम्पती आए. भद्र महिला उनकी बुक रैक देखने लगी. तभी उनकी नज़र एक किताब पर पडी जिस पर लेखक के रूप में अंकित था – स्वयंप्रकाश. भद्र महिला ने बहुत आश्चर्य से पूछा कि भाई साहब, यह किताब आपकी लिखी हुई है? आप लिखते भी हैं, हमें तो पता ही नहीं था. और स्वयंप्रकाश ने इस बात को लगभग टाल-सा दिया. उन लोगों के जाने के बाद स्वयंप्रकाश ने हमें बताया कि वे अपनी नौकरी और अपने लेखन को अलग-अलग रखते हैं. यही कारण है कि उनके ज़्यादातर सहकर्मियों को यह पता नहीं है कि वे एक लेखक भी हैं. यहीं यह उल्लेख कर देना ज़रूरी है कि उस समय तक स्वयंप्रकाश राष्ट्रीय पहचान अर्जित कर चुके थे. स्वयंप्रकाश की यह बात मेरे भीतर भी कहीं जम गई, और काम तब आई जब मुझे जयपुर में आई ए एस अधिकारियों के साथ काम करने का मौका मिला. मैं अपने रचनाकर्म को घर रख कर नौकरी करने जाता रहा और ठीक-ठाक तरह से नौकरी कर सेवा निवृत्त हुआ. मुझे भी लगा कि नौकरी और लेखकी को अलग-अलग रखना ही ठीक है. जब आप लेखक हों, लेखकों के साथ हों, तो यह भूल जाएं कि आपका पद क्या है, और जब नौकरी कर रहे हों तो यह याद न रखें कि लेखक के रूप में आपका क़द क्या है. इसी में जीवन का सुख निहित है.
स्वयंप्रकाश जहां भी रहे मुझे लम्बे-लम्बे खत लिखते रहे. वे खत सूचनाप्रद होते, मनोरंजक होते और होते नए-नए विचारों से भरपूर. पत्रों में एक तरह से वे मेरी क्लास लेते. नई किताबों के बारे में बताते, नई देखी नई-पुरानी फिल्मों की चर्चा करते, खेलों पर टिप्पणी करते, वेज-नॉन वेज लतीफे शेयर करते, दीन-दुनिया की बातें करते, ज़िन्दगी की छोटी-छोटी बातों में मिलने वाले रस का और भी अधिक रसपूर्ण बयान करते, अपने नए अनुभवों को साझा करते और मुझे साहित्यिक रूप से सक्रिय होने के लिए प्रेरित करते, मेरे निकम्मे पन के लिए प्रताडित करते. मैंने उनसे इस बात के लिए तो अनेक बार डांट खाई है कि मैं बहुत संक्षिप्त पत्र लिखता हूं. नौकरी के अंतिम काल में हुए अनेक तबादलों में मेरी जो सबसे मूल्यवान क्षति हुई है वह स्वयंप्रकाश के उन पत्रों की ही है. बहुत सम्हालकर रखा था उन पत्रों को. लेकिन आखिर वे खो ही गए. अगर वे पत्र मेरे पास होते, तो मुझे यह लेख लिखने की बजाय उन पत्रों में से कुछ को उद्धृत करना ज़्यादा प्रभावशाली लगता. क़्या नहीं था उन पत्रों में? उम्मीद करता हूं कि अनेक मित्रों ने स्वयंप्रकाश के पत्रों को सम्हालकर रखा होगा.
स्वयंप्रकाश मेरे लिए तो फ्रेण्ड फिलॉसोफर और गाइड हैं ही, पत्नी विमला के लिए बहुत प्यारे देवर या छोटे भाई हैं, जिनसे भरपूर मज़ाक की जा सकती है और जिन्हें चाहे जो खिलाकर भरपूर सराहना पाई जा सकती है. हम दोनों से ज़्यादा हमारे बच्चे उन्हें चाहते हैं. विश्वास और चारु दोनों स्वयंप्रकाश के भक्त हैं. बेटा विश्वास प्राय: अपनी बातचीत में स्वयंप्रकाश के फिकरों और मुहावरों को इस्तेमाल कर लिया करता है. चारु तो उनके लिखे एक-एक शब्द को पी जाना चाहती है. स्वयंप्रकाश ने अपनी किताब दूसरा पहलू की प्रति मुझे नहीं, अपनी इस प्यारी बेटी चारु को ही देना पसन्द किया था. अब चारु अमरीका में रहती हुई भी अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच यह पूछ लेती है कि अंकल जी ने इधर नया क्या लिखा है? स्वयंप्रकाश को भी इन बच्चों और अब तो इनके बच्चों से भी, इतना ही लगाव है. बहुत सारी असुविधाएं झेलकर भी वह चारु की शादी में शरीक होने जालोर जैसी अटपटी जगह आया, और न केवल आया, अपनी उपस्थिति से पूरे माहौल को जीवंत बनाये रखा. उस मौके पर स्वयंप्रकाश ने जो एक अभूतपूर्व डांस किया उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग मेरे एक मित्र ने कर ली थी. अगर उस क्लिप को श्यामक डावर देख ले तो वह खुद स्वयंप्रकाश का गण्डा बंद शागिर्द बन जाए. ऐसा मस्त डांस देखने का सौभाग्य जीवन में बहुत कम लोगों को मिला होगा. मेरी बेटी भाग्यशाली है कि उसके विवाह के अवसर पर हिन्दी के इतने बडे रचनाकार ने यह कमाल (और धमाल) किया.
वैसे मसखरी स्वयंप्रकाश के व्यक्तित्व का एक अभिन्न पक्ष है. उसके लेखन में तो यह खूब देखा ही जा सकता है. बल्कि अनेक आलोचकों ने उसकी भाषा के खिलंदडे पन को खास तौर पर पसन्द किया है. पाठकों को तो यह अच्छा लगता ही है. उसके पत्रों में भी यह मसखरी खूब होती है. और रोज़मर्रा के व्यवहार में भी. मुझे याद आता है कि एक बार वह, शायद उदयपुर से, हमारे घर सिरोही आया. रात के दो-तीन बजे होंगे. हम लोग अपनी फाटक पर ताला लगा दिया करते थे. बाउण्ड्री वाल कूद कर वह अन्दर आया, दरवाज़ा खटखटाया. कई बार खटखटाया. और जब आधे सोये--आधे जागे मैंने या पत्नी ने पूछा कौन? तो बडी गम्भीरता से बोला- ‘मैं चोर’. हम लोग एक बार तो कांप से गये. डरते-डरते सावधानी से दरवाज़ा खोला तो ज़ोर का ठहाका, और फिर चाय की चुस्कियां..
चाय और सिगरेट स्वयंप्रकाश को बे-इन्तिहा पसन्द है. चाय वह कभी भी, कहीं भी, कितनी ही बार पी सकता है. और सिगरेट, वह भी पनामा – वह तो उसे चाय से अधिक प्रिय है. लेकिन चाय को लेकर उसके मन में कोई नखरे का भाव मैंने कभी नहीं पाया. बल्कि, पिछले दिनों जब उससे मुलाक़ात हुई और मैं एक ठीक-ठाक से रेस्तरां में चाय पिलाने ले गया तो वह बलात मुझे वहां से बाहर निकाल लाया और फिर सडक किनारे एक ठेले वाले की मुड्डियों पर बैठकर चाय पीते हुए ही हमने डेढ दो घण्टे अपने सुख-दुख साझा किए.

इधर स्वयंप्रकाश के जीवन का एक नया दौर और मोड उसे हमसे थोडा और दूर ले गया है. हिन्दुस्तान ज़िंक से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर अंतत: उसने फिर अपनी जडों की तरफ लौटने का फैसला कर लिया. राजस्थान छोडकर फिर बैतलवा भोपाल जा बैठा. कुछ नई तरह से ज़िन्दगी शुरू करने की उसकी व्यस्तताएं और कुछ मेरी अपनी व्यस्तताएं. चिट्ठी पत्री का सिलसिला लगभग टूट-सा गया है. मिलना-जुलना भी कम हो गया है. अंकिता की शादी में उसने बुलाया और हम लोग भी बहुत दिनों से योजना बना रहे थे कि इस मौके पर तो भोपाल जाएंगे ही, लेकिन नहीं जा पाए. स्वयंप्रकाश और रश्मि ने इसका बुरा क्यों नहीं माना होगा? मानना ही चाहिए. अब तो कभी-कभार औरों से उनके समाचार मिलते हैं. अब उम्र के जिस मोड और मुकाम पर हम हैं, वहां उन बीते खूबसूरत दिनों को याद करते हुए स्वयंप्रकाश के ही एक कहानी संग्रह का शीर्षक थोडे से परिवर्तन के साथ दुहराने का मन करता है : आएंगे अच्छे दिन भी?

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